सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया का ऐप

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राज्य के सुसमाचार पर उत्कृष्ट प्रश्न और उत्तर

संकलन II

I. परमेश्वर के आगमन के मार्ग पर प्रश्न और उत्तर (गुप्त और स्पष्ट)

प्रश्न 1: आपकी गवाही है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर प्रभु यीशु की वापसी हैं, यह असंभव है! बाइबल कहती है: "उन दिनों के क्लेश के तुरन्त बाद सूर्य अन्धियारा हो जाएगा, और चन्द्रमा का प्रकाश जाता रहेगा, और तारे आकाश से गिर पड़ेंगे और आकाश की शक्‍तियाँ हिलाई जाएँगी। तब मनुष्य के पुत्र का चिह्न आकाश में दिखाई देगा, और तब पृथ्वी के सब कुलों के लोग छाती पीटेंगे; और मनुष्य के पुत्र को बड़ी सामर्थ्य और ऐश्‍वर्य के साथ आकाश के बादलों पर आते देखेंगे" (मत्ती 24:29-30)। अगर प्रभु वाकई लौट आते तो वो पूरी शानोशौकत के साथ बादलों पर सवार होकर आते। और फिर, स्वर्ग और धरती काँप जाते, चाँद और सूरज रोशनी देना बंद कर देते। अब तक ऐसा तो कुछ दिखा नहीं, फिर वे ऐसा कैसे कह सकते हैं कि प्रभु लौट आए हैं। आख़िर ये सब है क्या?
प्रश्न 2: हमने बहुत पहले यह सुना था कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कलीसिया ने पहले ही प्रभु यीशु की वापसी की गवाही दी है। और वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर हैं! वे सच्चाई व्यक्त करते हैं और अंत के दिनों के अपने न्याय के कार्य करते हैं, लेकिन धार्मिक मंडलियों के अधिकांश लोग यह मानते हैं कि प्रभु बादलों से अवतरित होंगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रभु यीशु ने स्पष्ट रूप से कहा था: "तब मनुष्य के पुत्र का चिह्न आकाश में दिखाई देगा: और तब पृथ्‍वी के सब कुलों के लोग छाती पीटेंगे, और मनुष्य के पुत्र को बड़ी सामर्थ्य और ऐश्‍वर्य के साथ आकाश के बादलों पर आते देखेंगे" (मत्ती 24:30)। प्रकाशितवाक्‍य की पुस्तक ने भी भविष्यवाणी की थी: "देखो, वह बादलों के साथ आनेवाला है; और हर एक आँख उसे देखेगी, वरन् जिन्होंने उसे बेधा था वे भी उसे देखेंगे, और पृथ्वी के सारे कुल उसके कारण छाती पीटेंगे" (प्रकाशितवाक्य 1:7)। मैं स्वयं भी यह विश्वास रखती हूं कि प्रभु बादलों से अवतरित होकर हमें सीधे स्वर्ग के राज्य में ले जाएंगे। हम उस प्रभु यीशु को स्वीकार करने से इनकार करते हैं जो बादलों से अवतरित नहीं होंगे। आप कहते हैं कि प्रभु का पुनरागमन देह में वापसी और गुप्त रूप से अवतरण है। लेकिन इस बारे में कोई नहीं जानता है। फिर भी, प्रभु का खुले तौर पर बादलों से अवतरित होना निश्चित है! यही कारण है कि हम प्रभु के बादलों से अवतरित होने और हमें सीधे स्वर्ग के राज्य में ले जाने के लिए खुले तौर पर प्रकट होने का इंतजार कर रहे हैं। क्या हमारी समझ सही है या नहीं?
प्रश्न 3: जैसा कि बाइबल में भविष्यवाणी की गयी थी: "हे गलीली पुरुषो, तुम क्यों खड़े आकाश की ओर देख रहे हो? यही यीशु, जो तुम्हारे पास से स्वर्ग पर उठा लिया गया है, जिस रीति से तुम ने उसे स्वर्ग को जाते देखा है उसी रीति से वह फिर आएगा" (प्रेरितों 1:11)। प्रभु यीशु के जी उठने के बाद, आकाश में जो आरोहित हुआ, वह उनका आध्यात्मिक शरीर था। जब प्रभु लौटेंगे, तो वह उनका आध्यात्मिक शरीर होना चाहिए, जो एक बादल पर नीचे आयेगा। परंतु आप लोग यह गवाही देते हैं कि अंत के दिनों में न्याय कार्य करने के लिए परमेश्वर पुन: देहधारी – मनुष्य के पुत्र – हो गए हैं। स्वाभाविक रूप से यह बाइबल से असंगत है। पादरी और एल्डर्स अक्सर कहते हैं कि प्रभु के देहधारी हो कर आने के बारे में कोई भी गवाही झूठी है। इसलिए मैं समझता हूँ कि प्रभु के लिए देहधारी हो कर लौटना असंभव है। मैं आप लोगों की गवाही स्वीकार नहीं कर सकता। मैं बस प्रभु के बादल पर उतरने और हमें स्वर्ग के राज्य में ले जाने की प्रतीक्षा करूंगा। निश्चित रूप से यह गलत नहीं हो सकता!

II. स्वर्गारोहण पर प्रश्न और उत्तर

प्रश्न 1: आप सब गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु लौट आये हैं, और उन्होंने प्रकट होकर चीन में कार्य किया है, मुझे विश्वास है कि यह सच है, क्योंकि प्रभु यीशु ने बाइबल में यह भविष्यवाणी की थी: "क्योंकि जैसे बिजली पूर्व से निकलकर पश्‍चिम तक चमकती है, वैसे ही मनुष्य के पुत्र का भी आना होगा" (मत्ती 24:27)। लेकिन हमें लगता है कि प्रभु हमें स्वर्ग के राज्य में ले जाने के लिए अंत के दिनों में वापस आयेंगे, या कम-से-कम वे हमें बादलों पर ही उठा लें ताकि हम हवा में उनसे मिल तो सकें। जैसा कि बाइबल में पौलुस ने कहा था, "तब हम जो जीवित और बचे रहेंगे, उनके साथ बादलों पर उठा लिए जायेंगे, कि हवा में प्रभु से मिलें: और इस रीति से हम सदा प्रभु के साथ रहेंगे" (1 थिस्सलुनीकियों 4:17)। लेकिन जैसा बाइबल में बताया गया है, प्रभु वैसे क्यों नहीं आये? अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्याय के कार्य का हमारे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश से क्या लेना-देना है?
प्रश्न 2: प्रभु यीशु ने एक बार कहा था: "क्योंकि मैं तुम्हारे लिये जगह तैयार करने जाता हूँ। और यदि मैं जाकर तुम्हारे लिये जगह तैयार करूँ, तो फिर आकर तुम्हें अपने यहाँ ले जाऊँगा कि जहाँ मैं रहूँ वहाँ तुम भी रहो" (यूहन्ना 14:2-3)। प्रभु यीशु पुनर्जीवित हुए और हमारे लिये एक स्थान तैयार करने स्वर्ग लौटे, इसका अर्थ ये हुआ कि वो स्थान स्वर्ग में है। अगर प्रभु लौट आए हैं, तो उनका आना, हमें स्वर्ग में आरोहित करने के लिये होना चाहिये, पहले हमें प्रभु से मिलवाने, आसमान में ऊपर उठाने के लिये होना चाहिये। अब तुम लोग इस बात की गवाही दे रहे हो कि प्रभु यीशु लौट आये हैं, वे देहधारी हुए हैं, और धरती पर वचन बोलने और कार्य करने में लगे हैं। तो वो हमें स्वर्ग के राज्य में कैसे लेकर जाएंगे? स्वर्ग का राज्य धरती पर है या स्वर्ग में?

III. परमेश्वर की वाणी को कैसे पहचानें पर प्रश्न और उत्तर

IV. स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने की शर्तों पर प्रश्न और उत्तर

प्रश्न 1: हमने प्रभु में इतने वर्षों से विश्वास किया है। हालांकि हम प्रभु के लिए प्रवचन दे सकते हैं, कार्य कर सकते हैं, और कष्ट सह सकते हैं, फिर भी हम सदा झूठ बोल सकते हैं, छल कर सकते हैं और धोखा दे सकते हैं। हर दिन, हम अपने बचाव में बोलते हैं। अक्सर, हम घमंडी, हठी, दिखावटी होते हैं तथा दूसरों को नीचा दिखाते रहते हैं। हम देह के बंधन से छूटने में नाकाम, पाप और पश्चाताप की स्थिति में जीते हैं। प्रभु के वचन का अनुभव करना और पालन करना तो दूर, सदा से हम इसी स्थिति में रहे हैं। हमने प्रभु के वचन की किसी भी वास्तविकता को कभी नहीं जिया। हमारी स्थिति में, क्या हम स्वर्ग के राज्य में लाये भी जा सकेंगे?कुछ लोग कहते हैं, हम पाप जैसे भी करें, देह के बंधन में कैसे भी फंसे रहें, प्रभु हमें पापरहित ही देखते हैं। वे पौलुस के कथन के अनुसार चलते हैं: "और यह क्षण भर में, पलक मारते ही अन्तिम तुरही फूँकते ही होगा। क्योंकि तुरही फूँकी जाएगी और मुर्दे अविनाशी दशा में उठाए जाएँगे, और हम बदल जाएँगे" (1 कुरिन्थियों 15:52)। और मान लेते हैं कि जब प्रभु आएंगे, तो वे उसी क्षण हमारी छवि बदल देंगे और हमें स्वर्ग के राज्य में ले आएंगे। कुछ लोग इस तर्क को स्वीकार नहीं कर सकते। वे मानते हैं कि जो लोग विश्वास के कारण उद्धार प्राप्त करते हैं, लेकिन फिर भी निरंतर पाप करते रहते हैं, वे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश पाने के योग्य नहीं हैं। यह मुख्य रूप से प्रभु यीशु के वचन पर आधारित है: "जो मुझ से, 'हे प्रभु! हे प्रभु!' कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है" (मत्ती 7:21)। "…इसलिये तुम पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ" (लैव्यव्यवस्था 11:45)। ये दो परस्पर विरोधी विचार हैं, जो कोई भी स्पष्ट रूप से नहीं कह सकता, कृपया हमारे लिए चर्चा करें।
प्रश्न 2: इतने वर्षों से प्रभु में विश्वास कर के, हमने सदा यह अनुभव किया है कि, जब तक कोई विनम्रता और सहनशीलता अपना कर भाइयों और बहनों से प्रेम करता है, और प्रभु के लिए व्यय और मेहनत करके पौलुस के उदाहरण का अनुसरण कर सकता है, वह प्रभु के मार्ग का अनुसरण कर रहा है, और प्रभु के लौटने पर वह स्वर्ग के राज्य में आरोहित होगा। जैसा पौलुस ने कहा था, "मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैंने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैंने विश्वास की रखवाली की है। भविष्य में मेरे लिए धर्म का वह मुकुट रखा हुआ है…" (2 तीमुथियुस 4:7-8)। लेकिन आप सबने गवाही दी है कि जब हम प्रभु में विश्वास करते हैं, तो हमें सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के न्याय कार्य को ग्रहण करना होगा। जब हम शुद्धिकरण प्राप्त करेंगे, तब परमेश्वर हमें प्रशस्‍त करेंगे और हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश पायेंगे। मेरा एक प्रश्न है: हम इतने वर्षों से प्रभु में विश्वास करते रहे हैं, और हम प्रभु के लिए व्यय और मेहनत करते रहे हैं; क्या हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के न्याय कार्य को ग्रहण किये बिना स्वर्ग के राज्य में प्रवेश पा सकते हैं?
प्रश्न 3: हमने इतने वर्षों तक प्रभु पर विश्वास किया है, और हमने उनका नाम बनाए रखा है। हम अक्सर बाइबल पढ़ते हैं, प्रार्थना करते हैं और अपने पापों को प्रभु के सामने स्वीकार करते हैं; हम दूसरों के प्रति विनीत, धैर्यवान और अनुरागशील हैं। हम अक्सर प्रभु के लिए कार्य करने के लिए परोपकार करते हैं, दान करते हैं और सब कुछ बलिदान कर देते हैं और उनकी गवाही देने के लिए सुसमाचार फैलाते हैं। क्या हम प्रभु के वचनों का अभ्यास नहीं कर रहे हैं और उनके मार्ग का अनुसरण नहीं कर रहे हैं? आप कैसे कह सकती हैं कि हमें कभी प्रभु में विश्वास नहीं था या हम अविश्वासी हैं? बाइबल में, पौलुस ने कहा है, "मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्‍वास की रखवाली की है। भविष्य में मेरे लिये धर्म का वह मुकुट रखा हुआ है…" (2 तीमुथियुस 4:7-8)। इसलिए, मुझे लगता है कि प्रभु में हमारा विश्वास उनकी प्रशंसा प्राप्त करेगा। जब प्रभु आएंगे, तो वे निश्चित रूप से हमारा स्वर्ग के राज्य में आरोहण करेंगे।

V. बाइबल की अंदरूनी कहानी पर प्रश्न और उत्तर

प्रश्न 1: बाइबल में, पौलुस ने कहा था "सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्‍वर की प्रेरणा से रचा गया है" (2 तीमुथियुस 3:16), पौलुस के वचन बाइबल में हैं। इसीलिए, वे परमेश्‍वर द्वारा प्रेरित थे; वे परमेश्‍वर के वचन हैं। प्रभु में विश्वास करना बाइबल में विश्वास करना है। चाहे कोई भी विचारधारा क्‍यों न हो, यदि वह बाइबल से भटकती है, तो वह विधर्म है! हम प्रभु में विश्वास करते हैं, इसीलिए हमें सदा बाइबल के अनुसार कार्य करना चाहिए, अर्थात्, हमें बाइबल के वचनों का पालन करना चाहिए। बाइबल ईसाई धर्म का मूलभूत सिद्धांत है, हमारे विश्वास की नींव है। बाइबल को त्‍यागना प्रभु में अविश्‍वास करने के समान है; यदि हम बाइबल को त्‍याग देते हैं, तो हम प्रभु में कैसे विश्वास कर सकते हैं? बाइबल में प्रभु के वचन लिखे हैं। क्या कहीं और भी ऐसी जगह है जहां हम उनके वचनों को पा सकते हैं? यदि प्रभु में हमारा विश्वास बाइबल पर आधारित नहीं है, तो इसका आधार क्या है?
प्रश्न 2: पौलुस ने तीमुथियुस 2 में साफ़तौर पर कहा था कि "पूरी बाइबल परमेश्वर से प्रेरित है" और बाइबल के सारे वचन परमेश्वर के वचन हैं। हम पौलुस के वचनों के अनुसार चल रहे हैं। यह गलत कैसे हो सकता है?
प्रश्न 3: हम सोचते हैं परमेश्वर के सभी वचन और कार्य बाइबल में दर्ज हैं। बाइबल से अलग परमेश्वर के कोई वचन और कार्य नहीं हैं। इसलिए, परमेश्वर पर हमारा विश्वास बाइबल पर आधारित होना चाहिए। क्या ये गलत है?
प्रश्न 4: मैंने सुना कि आप लोगों ने इस बात का प्रमाण दिया है कि देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने लाखों वचन कहे हैं और परमेश्वर के घर से शुरू करते हुए अपना न्याय का कार्य पूरा किया है। लेकिन यह साफ़ तौर पर बाइबल से आगे निकल जाता है। इसका कारण यह है कि पादरी और नेतागण अक्सर हमसे कहा करते थे कि परमेश्वर के सभी वचन और कार्य बाइबल में दर्ज हैं। परमेश्वर का कोई भी वचन और कार्य बाइबल से बाहर नहीं है। प्रभु यीशु का उद्धार कार्य पहले ही पूरा हो चुका है। अंत में दिनों में प्रभु की वापसी विश्वासियों को सीधे स्वर्ग के राज्य में ले जाने के लिए होगी। इस प्रकार, हमेशा से हमारा यह मानना रहा है प्रभु में विश्वास बाइबल के आधार पर होना चाहिए। जब तक हम बाइबल की बातों पर कायम रहते हैं, हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने और शाश्‍वत जीवन पाने में सफल होंगे। बाइबल से दूर जाना प्रभु के रास्ते को छोड़ देना है। यह उनका विरोध करना और उनको धोखा देना है। सभी धार्मिक पादरी और एल्डर्स ऐसा ही सोचते हैं। इसमें गलत क्या हो सकता है?
प्रश्न 5: पौलुस ने 2 तिमुथियस में यह बात बिलकुल साफ़ कर दी है कि संपूर्ण बाइबल परमेश्वर की प्रेरणा है। इसका मतलब है कि बाइबल का प्रत्येक वचन परमेश्वर का वचन है, और यह कि बाइबल प्रभु का प्रतिनिधित्व करती है। प्रभु में विश्वास करना बाइबल में विश्वास करना है। बाइबल में विश्वास करना प्रभु में विश्वास करना है। बाइबल से दूर जाने का मतलब है प्रभु में विश्वास नहीं करना! प्रभु में हमारा विश्वास केवल हमसे बाइबल पर अवलंबित रहने की मांग करता है। भले ही हम अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं, हमें तब भी मुक्ति मिलेगी और हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेंगे! क्या इस समझ में कुछ गलत है?
प्रश्न 6: बाइबल बाइबल है, परमेश्‍वर परमेश्‍वर हैं। मैं समझ गयी हूँ कि बाइबल परमेश्‍वर का प्रतिनिधित्व बिल्कुल नहीं कर सकती है! लेकिन बाइबल और परमेश्‍वर के बीच संबंध क्या है? मैं अभी भी यह नहीं समझ पायी हूँ। कृपया हमारे साथ कुछ और चर्चा करें!
प्रश्न 7: आप लोग यह गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु पहले ही आ चुके हैं और वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर हैं। और यह कि उन्होंने कई सत्य व्यक्त किए हैं और वे अंतिम दिनों का न्याय का कार्य कर रहे हैं। मुझे लगता है कि यह असंभव है। हमने हमेशा यही कहा है कि परमेश्वर के वचन एवं कार्य बाइबिल में लिखे हुए हैं, और यह कि परमेश्वर के शब्द और कार्य बाइबिल के बाहर विद्यमान नहीं हैं। बाइबल में पहले से ही परमेश्वर द्वारा उद्धार की पूर्णता समाविष्ट है, बाइबिल परमेश्वर की प्रतिनिधि है। जब तक कोई व्यक्ति बाइबल का पालन करता है, तब तक वह स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेगा। प्रभु में हमारा विश्वास बाइबल पर आधारित है, बाइबल से भटकना प्रभु को इनकार तथा उनसे विश्वासघात करने का गठन करता है! क्या इस समझ में कुछ गलत है?
प्रश्न 8: 2,000 वर्षों तक, धार्मिक विश्व ने इस विश्वास का समर्थन किया है कि बाइबल परमेश्वर की प्रेरणा से दी गई है, कि यह पूरी तरह परमेश्वर का वचन है, इसलिए, बाइबल प्रभु का प्रतिनिधित्व करती है। जो इस बात से इनकार करते हैं कि बाइबल परमेश्वर की प्रेरणा से दी गई है और उनका वचन है धार्मिक विश्व निश्चित रूप से उनकी निंदा करेगा एवं उन्हें विधर्मी कहेगा। क्या इस समझ में कुछ गलत है?
प्रश्न 9: बाइबल प्रभु की गवाही है, और हमारे पंथ की नींव है। इन दो हज़ार वर्षों में, विश्वास करने वाले सभी लोगों ने अपना पंथ बाइबल पर ही आधारित किया है। इसलिए मेरा विश्वास है कि बाइबल प्रभु की प्रतिनिधि है। प्रभु में विश्वास रखने का अर्थ है बाइबल में विश्वास रखना, और बाइबल में विश्वास रखने का अर्थ है प्रभु में विश्वास रखना। चाहे कुछ भी हो, हम बाइबल से दूर नहीं जा सकते। आख़िर हम बाइबल के बिना पंथ का अभ्यास कैसे करेंगे? क्या उसे प्रभु में विश्वास कहा भी जा सकता है? मुझे बताइए, इस प्रकार से पंथ का अभ्यास करने में क्या गलत है?

VI. अंत के दिनों में परमेश्वर का न्याय का-कार्य पर प्रश्न और उत्तर

प्रश्न 1: आप सब गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु का पुनरागमन हो गया है, कोई और नहीं, स्वयं सर्वशक्तिमान परमेश्वर बनकर, जिन्होंने अंत के दिनों में न्याय कार्य करते समय सत्य व्यक्त किया है। यह कैसे संभव हो सकता है? प्रभु हमें स्वर्ग के राज्य में प्रवेश दिलवाने के लिए वास्तव में आयेंगे, वे अंत के दिनों में न्याय करने के लिए हमें पीछे कैसे छोड़ सकते थे? मुझे लगता है कि प्रभु यीशु में विश्वास करके और पवित्र आत्मा के कार्य को ग्रहण करके, हम पहले ही परमेश्वर के न्याय कार्य का अनुभव करने लगे हैं। प्रभु यीशु के वचन में साक्ष्य है: "क्योंकि यदि मैं न जाऊं, तो वह सहायक तुम्हारे पास न आयेगा; परंतु यदि मैं जाऊंगा, तो मैं उसे तुम्हारे पास भेजूँगा। और वह आकर संसार को पाप और धार्मिकता और न्याय के विषय में निरुत्तर करेगा" (यूहन्ना 16:7-8)। हमें लगता है कि जब प्रभु यीशु पुनर्जीवित होकर स्वर्गारोहित हुए, तो पिंतेकुस्‍त में पवित्र आत्मा मनुष्यों पर कार्य करने के लिए नीचे आया। इससे पहले ही लोग अपने पापों, धर्मपरायणता और न्याय के लिए, स्वयं को दोष दे चुके थे। जब हम प्रभु के सामने स्वीकार कर पश्चाताप कर लेते हैं, तो हम वास्तव में प्रभु के न्याय का अनुभव कर रहे होते हैं। इसलिए हम विश्वास करते हैं कि हालांकि प्रभु यीशु का कार्य छुटकारे का था, प्रभु यीशु के स्वर्गारोहण के बाद, पिंतेकुस्‍त में उतरे पवित्र आत्मा का कार्य अंत के दिनों में परमेश्वर का न्याय कार्य होना चाहिए। यदि यह न्याय कार्य न हुआ होता, तो "वह आकर संसार को पाप और धार्मिकता और न्याय के विषय में निरुत्तर करेगा" कैसे हुआ होता? इसके अलावा, प्रभु में विश्वास करने वाले लोग होने के नाते, पवित्र आत्मा द्वारा अक्सर हमें छुआ, फटकारा और अनुशासित किया जाता है। इसलिए, प्रभु के सामने, हम हमेशा रोते और पश्चाताप करते रहते हैं। प्रभु में अपनी श्रद्धा के कारण हमारे भीतर पैदा हुए बहुत-से अच्छे व्यवहार से ही हम पूरी तरह परिवर्तित हो सके हैं। क्या यह परमेश्वर के न्याय का अनुभव करने के कारण नहीं है? अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर का न्याय कार्य जिसकी आप सब चर्चा कर रहे हैं, वह प्रभु यीशु के कार्य से अलग कैसे है?
प्रश्न 2: आप सबने गवाही दी है कि प्रभु यीशु अंत के दिनों में सत्य व्यक्त करने और न्याय कार्य करने लौट आये हैं। मैं यह क्यों नहीं समझ पाया? मैं बस विश्वास करता हूँ कि प्रभु बादलों पर लौटेंगे; मैं केवल यह विश्वास करता हूँ कि जब प्रभु लौटेंगे, तो उसमें विश्वास करने वाले सभी लोग तुरंत बदल दिए जायेंगे और प्रभु से मिलने के लिए हवा में उठा लिए जायेंगे। जैसा कि पौलुस ने कहा, "पर हमारा स्वदेश स्वर्ग पर है; और हम एक उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह के वहाँ से आने की बाट जोह रहे हैं: वह अपनी शक्‍ति के उस प्रभाव के अनुसार जिसके द्वारा वह सब वस्तुओं को अपने वश में कर सकता है, हमारी दीन-हीन देह का रूप बदलकर, अपनी महिमा की देह के अनुकूल बना देगा" (फिलिप्पियों 3:20-21)। और आप सब कहते हैं कि प्रभु का लौटना देहधारण के लिए है, मनुष्य के पुत्र के रूप में प्रकट होने के लिए है और सत्य व्यक्त करके अंत के दिनों में न्याय कार्य करने के लिए है। मैं समझता हूँ, यह असंभव है! चूंकि परमेश्वर सर्वशक्तिमान हैं, परमेश्वर के एक अकेले वचन ने स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ों की सृष्टि की, और मरे हुओं को फिर से जीवित कर दिया। परमेश्वर एक वचन से हमें पवित्रता में बदल सकते हैं। सत्य व्यक्त करके मनुष्य के साथ न्याय और शुद्धिकरण करने के लिए, प्रभु को देहधारण करने की क्या ज़रूरत है?
प्रश्न 3: कलीसिया की सभाओं में पादरी और एल्डर अक्सर कहते हैं कि प्रभु यीशु की सूली पर कही बात "पूरा हुआ" ये साबित करती है कि मानवजाति को बचाने का कार्य पूरा हो चुका है, और यह कि सिर्फ प्रभु यीशु में विश्वास करके और उनके समक्ष अपने पापों को स्वीकार करने से ही हमारे पाप माफ़ कर दिये जाएंगे, और प्रभु आगे से हमें पापियों की तरह नहीं देखेंगे। हम केवल आस्था से ही उचित ठहराये जाते हैं और अनुग्रह से बचाये जाते हैं। प्रभु अपने वापस आने पर हमें स्वर्ग के राज्य में ले लेंगे, और संभवत: वे मानवजाति को बचाने का काम आगे बढ़ाने के लिए नहीं लौटेंगे। मुझे लगता है कि पादरी और एल्डर की यह समझ स्वीकार्य नहीं है। हाँ, आखिर प्रभु यीशु ने जब सूली पर कहा, "पूरा हुआ", तो वे किस बारे में कह रहे थे? अंत के दिनों में सत्य को व्यक्त करने, न्याय का कार्य करने और मनुष्य को शुद्ध करने के लिए परमेश्वर को वापस आने की क्या ज़रूरत है?
प्रश्न 4: हमने सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों को पढ़ा है और पाया है कि ऐसी कुछ बातें हैं जो बहुत कठोर हैं। वे मानव जाति का न्याय, निंदा और अभिशाप हैं। मुझे लगता है कि अगर परमेश्‍वर न्याय करते हैं और लोगों को शाप देते हैं, तो क्या यह उनकी निंदा और सज़ा के समान नहीं है? यह कैसे कहा जा सकता है कि इस तरह का न्याय मानव जाति को शुद्ध करने और बचाने के लिए है?

VII. देहधारण की सत्‍य पर प्रश्न और उत्तर

प्रश्न 1: आप लोग इस तथ्य के गवाह हैं कि प्रभु यीशु लौट आये हैं और उन्होंने अपना कार्य करने के लिए देहधारण किया है। यह बात मैं समझ नहीं पाया। हम सब जानते हैं कि प्रभु यीशु परमेश्वर का देहधारण थे। अपना कार्य पूरा करने के बाद, उन्हें सूली पर लटका दिया गया और तब वे फिर से जीवित हो उठे और अपने सभी शिष्यों के समक्ष प्रकट हुए और वे अपने तेजस्वी आध्यात्मिक शरीर के साथ स्वर्ग में पहुँच गए। जैसा कि बाइबल में कहा गया है: "हे गलीली पुरुषो, तुम क्यों खड़े आकाश की ओर देख रहे हो? यही यीशु, जो तुम्हारे पास से स्वर्ग पर उठा लिया गया है, जिस रीति से तुम ने उसे स्वर्ग को जाते देखा है उसी रीति से वह फिर आएगा" (प्रेरितों 1:11)। इस प्रकार, बाइबल-संबंधी शास्‍त्र इस बात की पुष्टि करते हैं कि जब प्रभु फिर से आएंगे, तो उनका पुनर्जीवित आध्यात्मिक शरीर हमारे सामने दिखाई देगा। अंत के दिनों में, परमेश्वर ने न्याय का कार्य करने के लिए मनुष्य के पुत्र के रूप में देहधारण क्यों किया है? प्रभु यीशु के पुनर्जीवित आध्यात्मिक शरीर और मनुष्य के पुत्र के रूप में उनके देहधारण के बीच क्या अंतर है?
प्रश्न 2: इन दिनों आपकी सहभागिता और गवाही को सुनकर, मुझे यह स्पष्ट हो गया है कि अंत के दिनों में प्रभु का दूसरा आगमन, यहाँ न्याय का कार्य करने के लिए देह धारण है। लेकिन हम देह धारण के सत्य को नहीं समझते हैं और इसलिए आसानी से सीसीपी सरकार तथा धार्मिक संसार के पादरियों और एल्डर्स की अफवाहों और झूठों से छले जाते हैं। नतीजतन, हम देहधारी परमेश्वर को सिर्फ़ एक मनुष्य समझ लेते हैं और यहाँ तक कि उनका विरोध और तिरस्कार भी करते हैं। इसलिए, मैं देह धारण के सत्य के बारे में आप लोगों से पूछना चाहता हूँ। देह धारण क्या है? देहधारी मसीह और परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किए गए भविष्यद्वक्‍ताओं और प्रेरितों के बीच क्या अंतर है?
प्रश्न 3: लेकिन प्रभु यीशु, जिनमें हम विश्वास करते हैं, वे देहधारी परमेश्वर हैं। प्रभु यीशु ने परमेश्वर का छुटकारे का कार्य पूरा किया, कोई भी इससे इनकार करने की हिम्मत नहीं करता, लेकिन ये सर्वशक्तिमान परमेश्वर जिनमें आप लोग विश्वास करते हैं, अनिवार्य रूप से परमेश्वर का देह धारण नहीं हैं, क्योंकि बाइबल में सर्वशक्तिमान परमेश्वर का कोई भी उल्लेख नहीं है। तो इसलिए, धार्मिक संसार के पादरी और एल्डर्स कहते हैं कि आप लोग जिनमें विश्वास करते हैं, वे सिर्फ़ एक मनुष्य हैं, यह कि आप लोगों को मूर्ख बनाया गया है। सिर्फ़ प्रभु यीशु, जिनमें हम विश्वास करते हैं, वे ही मसीह हैं, परमेश्वर के पुत्र हैं! आप लोग जिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वे सिर्फ़ एक मनुष्य हैं, यह अन्यथा कैसे हो सकता है?
प्रश्न 4: आप लोग यह गवाही देते हैं कि देहधारी परमेश्वर, बाहरी स्वरूप में एक साधारण व्यक्ति की तरह दिखते हैं, स्वयं प्रभु यीशु की तरह, उनमें न सिर्फ़ सामान्य मानवता है, बल्कि उनमें दिव्यता भी है। इतना तो पक्का है। परमेश्वर के देहधारण की सामान्य मानवता और भ्रष्ट मनुष्य की सामान्य मानवता के बीच क्या अंतर है?
प्रश्न 5: अनुग्रह के युग में परमेश्वर ने पाप की भेंट बनने और मनुष्य के पापों का बोझ अपने ऊपर लेने के लिए देह धारण की थी। इन सारी बातों का कोई कारण है। प्रभु यीशु को पवित्र आत्मा ने राजी किया था और वे अपने पापरहित शरीर में मानवजाति के छुटकारे के लिए मनुष्य के पुत्र बने। सिर्फ़ ऐसा करने की वजह से ही शैतान को नीचा दिखाया गया। अंत के दिनों में, परमेश्वर ने न्याय का कार्य करने के लिए मनुष्य के पुत्र के रूप में फिर से देह धारण की है। हमने इसे हकीकत के तौर पर देखा है। मैं यही पूछना चाहता था। परमेश्वर के दो देह धारण थोड़े अलग-अलग हैं, पहला यहूदिया में था, और दूसरा चीन में है। अब, ऐसा क्यों है कि मानवजाति को बचाने का कार्य करने के लिए परमेश्वर को दो बार देह धारण करना चाहिए? परमेश्वर के दो देहधारणों का असली महत्व क्या है?
प्रश्न 6: बाइबल कहती है कि प्रभु यीशु का बपतिस्मा होने के बाद, स्वर्ग के द्वार खुल गए थे, और पवित्र आत्मा एक कबूतर की तरह प्रभु यीशु पर उतर आया था, एक आवाज ने कहा था: "यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ" (मत्ती 3:17)। और हम सभी विश्वासी मानते हैं कि प्रभु यीशु ही मसीह यानी परमेश्वर के पुत्र हैं। फिर भी आप लोगों ने यह गवाही दी है कि देहधारी मसीह परमेश्वर का प्रकटन यानी स्वयं परमेश्वर हैं, यह कि प्रभु यीशु स्वयं परमेश्वर हैं और सर्वशक्तिमान परमेश्वर भी स्वयं परमेश्वर हैं। यह बात हमारे लिए काफ़ी रहस्यमयी है और हमारी पिछली समझ से अलग है। तो क्या देहधारी मसीह स्वयं परमेश्वर हैं या परमेश्वर के पुत्र हैं? दोनों ही स्थितियां हमें उचित लगती हैं, और दोनों ही बाइबल के अनुरूप हैं। तो कौन सी समझ सही है?
प्रश्न 7: अगर प्रभु यीशु स्वयं परमेश्वर हैं, तो ऐसा क्यों है कि जब प्रभु यीशु प्रार्थना करते हैं, तो वे परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं। यहाँ निश्चित रूप से एक रहस्य है जिसे उजागर करना जरूरी है। हमारे लिए चर्चा करें।

VIII. फरीसियों के सार का विश्लेषण करना पर प्रश्न और उत्तर

प्रश्न 1: आप लोगों ने ये गवाही दी है कि जब प्रभु अंत के दिनों में लौटेंगे तब, पहले वो देहधारण करके गुप्त रूप में आएंगे, और विजेताओं का समूह बनाने के बाद, प्रत्यक्ष रूप से लोगों के सामने प्रकट होने के लिए बादलों के साथ अवतरित होंगे। ऐसा संवाद कुछ मतलब रखता है। परंतु 2000 सालों से, प्रभु में आस्था रखने वाले ज्यादातर लोग उनका इंतजार कर रहे हैं कि वे बादलों के साथ अवतरित होंगे। धार्मिक पादरी और एल्डर्स अक्सर ऐसा कहते हैं। हम बाइबल की भविष्यवाणी के अनुसार इंतजार करके गलत कैसे हो सकते हैं? धार्मिक पादरी और एल्डर्स ऐसे लोग हैं जो प्रभु की सेवा करते हैं। वे इस प्रकार से प्रभु की वापसी की राह देख रहे हैं। मैं यह नहीं मानता वापस लौटे प्रभु इन सभी धार्मिक पादरियों और एल्डर्स को छोड़ देंगे। यह निश्चित रूप से असंभव है!
प्रश्न 2: कि पादरी और एल्डर्स सभी प्रभु द्वारा चुने और नियुक्त किए गए हैं, और यह कि ये सब वे लोग हैं जो प्रभु की सेवा करते हैं। पादरियों और एल्डर्स का आज्ञापालन करना प्रभु का आज्ञापालन करना है। यदि हम पादरियों और एल्डर्स का विरोध करते हैं और उनकी निंदा करते हैं, तो हम प्रभु का विरोध कर रहे हैं। इसके अलावा, केवल पादरी और एल्डर्स बाइबल को समझते हैं और बाइबल की व्याख्या कर सकते हैं। केवल वे हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैं जब तक पादरियों और एल्डर्स का कथन बाइबल के अनुरूप है और उसका बाइबल में आधार है, तब तक हमें अनुपालन और आज्ञापालन करना चाहिए। जब तक पादरी और एल्डर्स जो करते हैं वह बाइबल के अनुरूप है, तब तक हमें स्वीकार और अनुकरण करना चाहिए। यह कैसे गलत हो सकता है?
प्रश्न 3: पौलुस ने बाइबल में स्पष्ट रूप से कहा है: "इसलिये अपनी और पूरे झुण्ड की चौकसी करो, जिसमें पवित्र आत्मा ने तुम्हें अध्यक्ष ठहराया है, कि तुम परमेश्‍वर की कलीसिया की रखवाली करो…" (प्रेरितों 20:28)। इससे साबित होता है कि पादरी और एल्डर्स सब पवित्र आत्मा द्वारा अभिषिक्त किये जाते हैं। क्या पवित्र आत्मा द्वारा अभिषिक्त किया जाना परमेश्‍वर द्वारा अभिषिक्त किये जाने का प्रतीक नहीं है? परमेश्‍वर ने पादरियों और एल्डर्स को समुदायों के सर्वेक्षक के रूप में अभिषिक्त किया। यह गलत नहीं हो सकता है।
प्रश्न 4: धार्मिक मंडलियों में सभी पादरी बाइबल से परिचित हैं। वे अक्सर कलीसियाओं में बाइबल की व्याख्या करते हैं और बाइबल को बढ़ावा देते हैं। हमने हमेशा सोचा कि वे ऐसे लोग होने चाहिये जो परमेश्वर को जानते हैं। तो फिर अंत के दिनों के देह-धारी परमेश्वर के कार्य की धार्मिक जगत के अधिकांश पादरियों ने बुरी तरह निंदा क्यों की और इसका विरोध क्यों किया? मेरा मानना है कि धार्मिक समुदाय के ज़्यादातर पादरी और अगुवा जिसकी निंदा करते हैं शायद वो सच्चा मार्ग नहीं हो सकता!
प्रश्न 5: ये जानकर कि हमने सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार कर लिया है, पादरी और एल्डर हमें लगातार परेशान कर रहे हैं, हमें लगातार बाइबल समझा रहे हैं। हालांकि हम उनका खंडन करते हैं, उनको ठुकराते हैं, फिर भी वे नहीं छोड़ते। ये नागरिकों का गंभीर उत्पीड़न है। पहले जब कभी हम कमजोर या नकारी होते थे, वे इतनी चिंता नहीं दिखाते थे। अब जैसे ही हमने सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार किया है, वे बहुत ज़्यादा नाराज हो गये हैं, मीठी और कड़वी बातें बोल-बोल कर हमें लगातार गुस्सा दिला हैं। लगता है उनकी ये दुष्टता तब तक ख़त्म नहीं होगी, जब तक वे हमें अपने साथ नरक में नहीं घसीट लेते! मुझे समझ नहीं आता। पादरी और एल्डर, जो प्रभु की सेवा करते हैं, और जो अक्सर बाइबल के बारे में बात करते हैं, उनको यह आभास होना चाहिए कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त सभी वचन सत्य हैं। वे सत्य की खोज क्यों नहीं करते? वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर की अंधाधुंध निंदा, विरोध और तिरस्कार करने के बजाय, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य की जांच-पड़ताल क्यों नहीं करते? पादरी और एल्डर सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार करने के हमारे रास्ते में रोड़े अटकाने की भरसक कोशिश करते हैं। हमें इस मामले के पीछे की हकीकत जानने में बड़ी मुश्किल हो रही है। कृपया हमारे साथ इस बारे में संगति कीजिए।
प्रश्न 6: सीसीपी एक नास्तिक पार्टी है, एक राक्षसी समूह, जो परमेश्वर और सत्य के सबसे अधिक विरुद्ध है। राक्षस शैतान का मनुष्य रूप है। शैतान और दुष्ट आत्माओं का पुनर्जन्म है राक्षस, जोकि परमेश्वर का कट्टर दुश्मन है। इसलिए जब अंत के दिनों में परमेश्वर चीन में देहधारी होकर कार्य करते हैं, तो सीसीपी सरकार द्वारा वे जिस पागल दमन और उत्पीड़न को झेलते हैं, वह अवश्यंभावी है। परंतु धार्मिक समुदाय के अधिकतर पादरी और एल्डर्स परमेश्वर के सेवक हैं, जो बाइबल से परिचित हैं| न सिर्फ वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को खोज कर उसका अध्ययन नहीं करते, इसकी बजाय वे उस पर अपनी राय थोप कर, उसकी निंदा कर, प्रचंडता से विरोध करते हैं। यह अविश्वसनीय है! इसमें कोई अचरज नहीं कि सीसीपी सरकार परमेश्वर के कार्य की निंदा करती है। धार्मिक पादरी और एल्डर्स भी परमेश्वर के कार्य का विरोध और निंदा क्यों करते हैं?

IX. सच्चा मार्ग उत्पीड़न के अधीन क्यों है इस पर प्रश्न और उत्तर

प्रश्न 1: बाइबल में, पौलुस ने कहा है कि हमें अधिकारियों की आज्ञा माननी चाहिए। अगर हम पौलुस के शब्दों को व्‍यवहार में लाते हैं, तो हमें सत्तारूढ़ शासन की बात हमेशा सुननी चाहिए। परन्तु नास्तिक सीसीपी हमेशा धार्मिक लोगों को सताती है और परमेश्वर के शत्रु के रूप में काम करती है। सीसीपी न केवल हमें प्रभु में विश्वास करने से रोकती है, वह उन लोगों को भी पकड़ती और सताती है जो परमेश्वर का सुसमाचार फैलाते हैँ। अगर हम इसका आज्ञापालन करते हैं और प्रभु में विश्वास नहीं करते हैं या उनका सुसमाचार नहीं फैलाते हैं, तो क्या हम प्रभु का विरोध करने और उनके साथ विश्वासघात करने में शैतान का पक्ष नहीं ले रहे हैं? क्या हम तब वह नहीं बन जायेंगे जिनके भाग्य में मरना लिखा है? मैं वास्तव में यह समझ नहीं पा रहा हूँ। जब बात यह आती है कि हम सत्‍ताधारियों के साथ कैसा व्यवहार करें, हमें ऐसा क्या करना चाहिए जिससे यह सुनिश्चित हो कि हम परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हैं?
प्रश्न 2: एल्‍डर्स (गुरूजनों) तथा पादरियों को पता लगा है कि आप हमें सर्वशक्तिमान परमेश्वर की गवाही देते रहे हैं। वे चारों ओर पाखंड और झूठ फैला रहे हैं और सर्वशक्तिमान परमेश्वर की निंदा कर रहे हैं। उन्होंने कलीसिया को बंद कर दिया और हमारे भाईयों और बहनों जो कि आपके उपदेश सुनने की कोशिश करते हैं, को परेशान करना और रोकना शुरू कर दिया है। वे हमें अपनी आंख के कांटों के रूप में देखते हैं और हमसे सबसे अधिक घृणा करते हैं। वे यह भी कह रहे हैं कि वे सभी जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार करते हैं, कलीसिया से निष्कासित कर दिये जायेंगे। कलीसिया स्पष्ट रूप से दो वर्गों में विभाजित हो चुकी है। कुछ भाई बहन हमारे साथ सत्य के मार्ग का अध्ययन करना चाहते हैं। अन्य लोग चमकती पूर्वी बिजली का विरोध और निंदा करने में पादरियों और एल्‍डर्स (गुरूजनों) का अनुसरण कर रहे हैं। वे हमारे साथ अपने शत्रुओं जैसा व्यवहार भी करते हैं। इन थोड़े ही दिनों में कलीसिया इतनी ज्यादा कैसे बदल गई है?
प्रश्न 3: जब से हमने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य का अध्ययन शुरू किया है, धार्मिक पादरी और एल्डर्स सर्वशक्तिमान परमेश्वर की अधिक व्यग्रता से निंदा करने लगे हैं, हमें सच्चे मार्ग का अध्ययन करने से रोकने के लिए जो भी हो सके सब करते हुए। यहूदी फरीसियों ने प्रभु यीशु का जैसा विरोध और निंदा की थी, उससे बिल्कुल भी अलग नहीं! इन दिनों मैं सोचता रहा हूँ कि, परमेश्वर ने कार्य करने के लिए दो बार देहधारण क्यों किया, और दो बार धार्मिक समुदाय और नास्तिक सरकार द्वारा सामूहिक निंदा और उत्पीड़न क्यों झेला? अंत के दिनों में, सर्वशक्तिमान परमेश्वर मानवजाति के शुद्धिकरण और उद्धार के लिए, बोल कर और कार्य कर सत्य व्यक्त करने के लिए प्रकट होते और कार्य करते हैं। धार्मिक समुदाय और चीन की कम्युनिस्ट सरकार मसीह के विरुद्ध इतनी विद्वेषपूर्ण क्यों है कि वे मसीह की निंदा और तिरस्‍कार और ईशनिंदा करने, उनको घेरने और नष्ट कर देने के लिए मीडिया कंपनियों और सशक्त पुलिस बल तक को जुटा लेते हैं? यह मुझे याद दिलाता है कि जब राजा हेरोदस ने सुना कि यहूदियों के राजा यानी प्रभु यीशु का जन्म हुआ है, तब उसने बैतलहम में दो वर्ष से छोटे सभी नर शिशुओं की हत्या का आदेश दे दिया। उन्हें मसीह को छोड़ने की बजाय हज़ारों मासूम बच्चों की हत्या अधिक जंच रही थी। जब परमेश्वर मानवजाति के उद्धार के लिए देहधारी हुए, तो धार्मिक समुदाय और सरकार ने उनके आने का स्वागत क्यों नहीं किया, लेकिन व्यग्रता के साथ परमेश्वर के प्रकटन और कार्य की निंदा की और उनको गाली दी? उन्होंने किसी भी कीमत पर मसीह को सूली पर चढ़ा देने के लिए पूरे देश के संसाधनों को क्यों जाया कर दिया? मानवजाति क्यों इतनी दुष्ट और विद्वेषपूर्ण ढंग से परमेश्वर के विरुद्ध है?

X. शाश्वत जीवन का मार्ग पर प्रश्न और उत्तर

प्रश्न 1: बाइबल परमेश्वर के कार्य की गवाही है, यह मानवजाति के लिए अपार लाभदायक रही है। बाइबल पढ़ने के माध्यम से, हम यह समझ जाते हैं कि परमेश्‍वर ही सभी चीजों का सृष्टिकर्ता है, हम परमेश्‍वर के चमत्कारिक और पराक्रमी कर्मों और उनकी सर्वक्षमता को देखते हैं। बाइबल परमेश्वर के वचन और मनुष्‍य की परमेश्वर को गवाही का एक अभिलेख है, तो कोई बाइबल पढ़ने से शाश्‍वत जीवन क्‍यों नहीं प्राप्‍त कर सकता है। ऐसा क्यों है कि शाश्वत जीवन का मार्ग बाइबिल में नहीं पाया जाता है?
प्रश्न 2: परमेश्‍वर में अपना विश्वास रखते हुए और उनका अनुसरण करते हुए, हम शाश्‍वत जीवन प्राप्त कर सकते हैं। परमेश्‍वर के वचन इस बात का समर्थन करते हैं: प्रभु यीशु ने कहा था: "मैं ही पुनरुज्जीवन, और जीवन हूँ: जो कोई भी मुझमें विश्वास करता है, चाहे उसकी मृत्यु क्यों न हो जाएं, वह जीवित रहेगा: और जो कोई भी मुझमें जीता और विश्वास करता है, वह कभी नहीं मरता है" (यूहन्ना 11:25-26)। "परंतु जो कोई भी मेरे द्वारा दिए गये जल को पीता है, उसे प्यास फिर कभी नहीं सताएगी; परंतु जो पानी मैं उसे दूँगा वह उसमें एक कुएं का निर्माण करेगी जिससे उसे चिरस्थायी जीवन प्राप्त होगा" (यूहन्ना 4:14)। ये अंश प्रभु यीशु के वादे हैं। प्रभु यीशु हमें शाश्‍वत जीवन प्रदान कर सकते हैं, प्रभु यीशु का मार्ग शाश्‍वत जीवन का मार्ग है। बाइबल कहती है, "वह जो पुत्र पर विश्वास करता है, वह शाश्वत जीवन प्राप्त करता है: और जो पुत्र पर विश्वास नहीं करता है, उसे जीवन का प्रकाश नहीं दिखेगा; बल्कि उसे परमेश्वर का क्रोध झेलना पड़ेगा" (यूहन्ना 3:36)। क्‍या प्रभु यीशु मनुष्य का पुत्र नहीं हैं, क्या वह मसीह नहीं है? प्रभु यीशु में विश्वास करके, हमें, इस प्रकार, शाश्‍वत जीवन का मार्ग भी मिलना चाहिए। लेकिन आप लोग इस बात की गवाही देते हैं कि अंतिम दिनों में मसीह के आसन के समक्ष न्‍याय और शुद्धिकरण का अनुभव कर सकें, और अंतिम दिनों में परमेश्‍वर से उद्धार प्राप्‍त कर सकें। हमारे लिये शाश्वत जीवन का मार्ग लाएँगे। मैं यह बिल्कुल नहीं समझ पा रहा हूँ, कि हम सभी प्रभु यीशु मसीह के अनुयायी हैं। यह शाश्‍वत जीवन के मार्ग को प्राप्त करने के लिए पर्याप्त क्यों नहीं है? तो हमें अंतिम दिनों के मसीह के वचनों और कार्य को क्यों स्वीकार करना है?

XI. सीसीपी की अफवाहों और कपटों को उजागर करना और उनका खंडन करना

प्रश्न 1: आप परमेश्वर पर कुछ सालों से ही विश्वास कर रही हैं। आप अभी भी एक नौसिखिया ही हैं। मैं अपनी ज़्यादातर ज़िंदगी गुजार चुका हूँ और दशकों तक धर्मों का अध्ययन किया है। मैं आपको ज़िम्मेदारी से बता सकता हूँ, इस दुनिया में कोई परमेश्वर नहीं है, और ना ही कोई उद्धारक है। परमेश्वर पर विश्वास करने का पूरा मामला ही बहुत उलझा हुआ है। यह पूरी तरह से अव्यावहारिक है। हम दोनों ही समझदार व्यक्ति हैं; हमें मामलों को तथ्यों और विज्ञान के आईने में देखना चाहिए। हमें भौतिकवाद और डार्विनवाद जैसे वैज्ञानिक सिद्धांतों पर विश्वास करना चाहिए। आपको परमेश्वर पर विश्वास करने की क्‍या ज़रूरत है? हम कम्युनिस्ट सिर्फ नास्तिकता और विकास के सिद्धांतों पर विश्वास करते हैं। आपको पता होना चाहिए कि डार्विन का विकास का सिद्धांत मानव जाति के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक सिद्धांतों में से एक है। विकास के सिद्धांत के अनुसार, हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि सब कुछ प्रकृति के कार्य से बना है। मनुष्य प्रकृति के जैविक विकास की प्रक्रिया की सांयोगिक उत्‍पत्ति है। मनुष्य का विकास वानरों से हुआ है। इसके लिए पर्याप्त सैद्धांतिक आधार है। इससे पता चलता है कि मनुष्य को परमेश्वर ने नहीं बनाया था। बाइबल में लिखे हुए वचन मिथक और दंतकथाएं हैं, जिन्हें गंभीरता से नहीं लिया जा सकता। मैं आपको भौतिकवाद और डार्विनवाद के बारे में और ज़्यादा जानने की सलाह देता हूँ। ये बहुत ही व्यावहारिक सिद्धांत हैं जो दुविधाओं को दूर कर सकते हैं। मुझे लगता है कि जब आप इसे साफ तौर पर देखेंगी, तब आप धार्मिक विश्वासों को ठीक तरह से समझ पाएंगी और भ्रामक आस्था से बाहर आ जाएँगी। सिर्फ़ सीसीपी का अनुसरण करके ही आपका भविष्य अच्छा होगा।
प्रश्न 2: लेकिन मैंने न तो परमेश्वर को देखा है, और न ही ये देखा है कि परमेश्वर कैसे कार्य करते हैं और कैसे दुनिया पर प्रभुत्व रखते हैं। मेरे लिए परमेश्वर को समझना और स्वीकार करना मुश्किल है। इतने सालों तक धार्मिक विश्वासों का अध्ययन करने के बाद, मुझे लगता है कि धार्मिक विश्वास सिर्फ़ एक आध्यात्मिक सहारा है और मानव जाति की आध्यात्मिक शून्यता को भरने का एक साधन मात्र है। जिन्‍होंने भी परमेश्वर पर विश्वास रखा, क्या वे अंत में मर नहीं गये? किसी ने भी नहीं देखा कि कौन सा व्यक्ति स्वर्ग गया और कौन सा नरक। मैं सभी धार्मिक मान्यताओं को बहुत ही अस्पष्ट और अवास्तविक समझाता हूँ। वैज्ञानिक विकास और मनुष्य की प्रगति के साथ, हो सकता है कि धार्मिक विश्वासों को छोड़ और हटा दिया जाएगा। हमें अभी भी विज्ञान पर विश्वास करने की ज़रूरत है। केवल विज्ञान ही ऐसा सत्य और वास्तविकता है, जिससे कोई भी इन्कार नहीं कर सकता। हालांकि, विज्ञान ने परमेश्वर के अस्तित्व से इन्कार नहीं किया है, लेकिन यह परमेश्वर के अस्तित्व की गवाही भी नहीं देता है। अगर विज्ञान वास्तव में यह तय कर सकता है कि परमेश्वर का अस्तित्व है और यह गवाही देता है कि परमेश्वर सभी चीजों पर प्रभुत्व रखते हैं, तब हम भी परमेश्वर पर विश्वास करेंगे। हम कम्युनिस्ट सिर्फ विज्ञान पर विश्वास करते हैं। केवल विज्ञान पर विश्वास करके और विज्ञान का विकास करके ही मनुष्य समाज की प्रगति जारी रहेगी। विज्ञान मनुष्य समाज की कई वास्तविक समस्याओं को हल कर सकता है। परमेश्वर पर भरोसा करके लोगों को क्या मिल रहा है? थोड़ी देर की आध्यात्मिक शांति के अलावा, इसका और क्या फायदा है? यह किसी भी व्यावहारिक समस्या को हल नहीं कर सकता। इसलिए, परमेश्वर पर विश्वास करने से विज्ञान पर विश्वास करना ज़्यादा वास्तविक है, कई गुना अधिक व्यावहारिक। हमें विज्ञान पर विश्वास करना होगा।
प्रश्न 3: मैंने धार्मिक समुदाय के कई पादरी और एल्डर को यह कहते सुना है कि आप जिस पर विश्वास कर रही हैं, वह एक मनुष्य है, न कि यीशु मसीह। फिर भी आप यह गवाही देती हैं कि वह मनुष्य वापस आये प्रभु यीशु हैं, यानी, सर्वशक्तिमान परमेश्वर कार्य करने के लिए प्रकट हुए हैं। क्या आपको पता है कि कम्युनिस्ट पार्टी काफ़ी समय से एक पंथ के रूप में ईसाई धर्म और कैथलिक धर्म की निंदा करती रही है? और आप यह गवाही देने की हिम्मत कर रही हैं कि प्रभु यीशु लौट आये हैं, जो कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर हैं; क्या आप मुसीबत मोल नहीं ले रही हैं? कम्युनिस्ट पार्टी आपको कैसे माफ कर सकती है? कम्युनिस्ट पार्टी तो ईसाई और कैथोलिक धर्म को कुपंथ और और बाइबल को कुपंथी किताब घोषित करने की भी हिम्मत रखती है। यह एक खुला तथ्‍य है। क्या आप यह नहीं जानती? अगर सीसीपी दुनिया के कट्टर धर्मों की निंदा करके उन्‍हें नकार सकती है, तो वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर के प्रकटन और कार्य की निंदा क्यों नहीं कर सकती? अगर सीसीपी बाइबल को कुपंथी पुस्‍तक घोषित कर सकती है, तो वह वचन देह में प्रकट होता है को क्‍यों छोड़ेगी? सार्वजनिक सुरक्षा संस्‍थाओं ने इस किताब की कई प्रतियों को ज़ब्‍त कर लिया है। कई लोग इसका अध्ययन कर रहे हैं। मुझे बस यही समझ नहीं आ रहा है। आप लोगों को सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर विश्वास करने की ज़रूरत क्या है? सर्वशक्तिमान परमेश्वर को अंत के दिनों के मसीह साबित करने पर क्यों ज़ोर दिया जा रहा हैं? हम उनके परिवार की पृष्‍ठभूमि के बारे में सब जानते हैं। ठीक यीशु की तरह, जिन पर ईसाई धर्म विश्वास करता है, वे भी एक साधारण इंसान हैं यीशु, एक बढ़ई की संतान थे, उनके माता-पिता और भाई-बहन भी थे। वे बस एक साधारण इंसान थे। फिर भी पूरा ईसाई धर्म यीशु की परमेश्वर की तरह आराधना करता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर, जिन पर आप लोग विश्वास करते हैं, वे भी यीशु की तरह ही एक मनुष्य हैं। आपका इस बात पर ज़ोर देना कि वे परमेश्वर हैं, बहुत ही अस्वाभाविक है। एक साधारण इंसान पर विश्वास करने की वजह से आपको इतना अत्याचार और पीड़ा सहनी पड़ी है। क्‍या इसमें कोई फायदा है? मैंने सुना है कि कई लोग ऐसे हैं जिन्होंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए अपने परिवार और पेशे को छोड़ दिया है। मुझे समझ नहीं आता कि आपको इस तरह से परमेश्वर पर विश्वास करने से अंत में क्या हासिल होगा? आपका उनके परमेश्वर होने पर विश्‍वास करने का आधार क्‍या है?
प्रश्न 4: भले आप जिन पर विश्वास करते हैं वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर हैं, आप जो पढ़ती हैं वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन हैं, और आप सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम से प्रार्थना करती हैं, लेकिन हमारी जानकारी के मुताबिक तो सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की स्‍थापना एक इंसान ने की थी, जिनकी हर आज्ञा का आप पालन करती हैं। आपकी गवाहियों के मुताबिक यह मनुष्य एक पादरी है, एक ऐसा मनुष्य जिसे सभी प्रशासकीय मामलों के प्रभारी के रूप में, परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किया जाता है। इस बात ने मुझे उलझन में डाल दिया है। वो कौन था जिसने सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की स्‍थापना की थी? उसका जन्‍म कैसे हुआ था? क्या आप इस बात को समझा सकती हैं?
प्रश्न 5: बाइबल कहती है, "हर एक व्यक्‍ति शासकीय अधिकारियों के अधीन रहे, क्योंकि कोई अधिकार ऐसा नहीं जो परमेश्‍वर की ओर से न हो; और जो अधिकार हैं, वे परमेश्‍वर के ठहराए हुए हैं। इसलिये जो कोई अधिकार का विरोध करता है, वह परमेश्‍वर की विधि का सामना करता है, और सामना करनेवाले दण्ड पाएँगे" (रोमियों 13:1-2)। कई सालों तक प्रभु में विश्वास करने के बाद, आपको इस कथन का अर्थ समझना चाहिए। आखिरकार बाइबल परमेश्‍वर से प्रेरित थी। मेरा मानना है कि हम प्रभु के विश्वासियों को शासकीय अधिकारियों और सत्‍ताधारियों का आज्ञा-पालन करना चाहिए। मुझे नहीं पता कि आप इससे क्‍या समझती हैं। चीन में अधिकारियों की अवहेलना करने से काम नहीं बनता। आपको यह जानना होगा कि कम्युनिस्ट पार्टी एक क्रांतिकारी पार्टी है। यदि आप अवज्ञा करती हैं, तो यह आपके जीवन को मिटा देगी। चीन में प्रभु में विश्वास करने के लिए, किसी के लिए भी कम्युनिस्ट पार्टी के संयुक्त मोर्चे को स्वीकार कर थ्री-सेल्‍फ-चर्च में शामिल होना आवश्‍यक है। और कोई दूसरा रास्ता नहीं है! प्रभु में हमारा विश्वास क्‍या, पूरी तरह से एक अच्‍छे तालमेल वाले परिवार और शांतिपूर्ण जीवन की हमारी चाह के बारे में नहीं है? देखें कि थ्री-सेल्‍फ-चर्च के लोग कैसे समझदार हैं। हम एक देशभक्‍त और कलीसिया-प्रेमी संगठन हैं जो परमेश्‍वर का गुणगान करते और लोगों को लाभ देते हैं। हम न तो सत्तारूढ़ अधिकारियों का अपमान करते हैं और न ही बाइबल को धोखा देते हैं। हम डर के मारे छुपने के बजाय कलीसिया में खुलकर प्रभु की आराधना कर सकते हैं। क्‍या यह दोनों हाथों में लड्डू रखने जैसा नहीं है?
प्रश्न 6: कि तुम मई 28 के शेंडोंग के झाओयुआन मामले के बारे में क्या कहोगे जिसने देश और पूरी दुनिया को हिला दिया था? आखिरकार इस मामले की सुनवाई खुले न्यायालय में हुई थी! शेंडोंग के झाओयुआन मामले की घटना के बाद, सरकार ने गृह कलीसियाओं पर कार्रवाई तेज़ कर दी है, जिसके लिए सशस्त्र पुलिस बलों तक का उपयोग कर सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के सदस्यों पर कार्रवाई करने के लिए एक जबर्दस्त चंहुमुखी खोज-और-गिरफ्तारी का अभियान छेड़ा। हालांकि लोगों ने शेंडोंग के झाओयुआन मामले पर कई संदेह खड़े किए हैं, यह मानते हुए कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया पर कार्रवाई करने के पक्ष में जनमत खड़ा करने के लिए चीनी कम्युनिस्ट सरकार ने एक झूठा केस गढ़ा था, चीनी मीडिया ने इस बात पर ध्यान दिए बिना कि तथ्य सही हैं या गलत, मामले की जानकारी सार्वजनिक कर दी है। इस बात ने दुनिया के विभिन्न देशों पर कुछ प्रभाव डाला है। शेंडोंग के झाओयुआन मामले को चाहे जैसे नकारा जाए, बहुत से लोग अभी भी कम्युनिस्ट पार्टी पर विश्वास करते हैं। इसलिये मुझे बताओ कि शेंडोंग के झाओयुआन मामले के बारे में तुम्हारी क्या राय है।
प्रश्न 7: चीनी कम्युनिस्ट सरकार एक क्रांतिकारी पार्टी है। वह केवल झूठ और हिंसा में विश्वास करती है, यानी, हिंसा से सत्ता पर कब्ज़ा करने में! चीनी कम्युनिस्ट सरकार के तर्क से देखा जाये तो, "हज़ार बार दोहराये जाने पर कोई भी झूठ सच हो जाता है।" चाहे कितने ही लोग उस पर शक करें, उसे नकारें या उस पर अविश्वास करें, सरकार इसकी रत्ती भर भी परवाह नहीं करती, और वह उसी तरह झूठ बोलना और धोखा देना जारी रखती है। अपने तुरंत फायदे और उद्देश्य के लिये, उसे जो भी कीमत चुकानी पड़े, उसकी वो परवाह नहीं करती! अगर लोग उससे बगावत करते या उसके विरोध में जुलूस निकालते हैं, तो वह इससे निपटने के लिए टैंकों और मशीन गनों का उपयोग करेगी। ज़रूरत पड़ने पर वह विरोधी ताकतों का सामना करने के लिए एटम बम और मिसाइलों का उपयोग करेगी। चीनी कम्युनिस्ट सरकार सत्ता में टिके रहने के लिये किसी भी हद तक जा सकती है। जैसे ही शेंडोंग के झाओयुआन मामले की सार्वजनिक रूप से घोषणा की गयी, ईसाइयों को दबाने और किसी भी कीमत पर गिरफ़्तार करने के लिए चीनी कम्युनिस्ट सरकार ने सशस्त्र पुलिस इकाइयों की तैनाती शुरू कर दी थी। इसे कौन रोक सकता है? इसका विरोध करने की हिम्मत किस में है? विदेशी लोग चीनी कम्युनिस्ट सरकार के धोखे को देखकर भी क्या कर पाए? चीनी कम्युनिस्ट सरकार के पास पश्चिमी लोकतांत्रिक ताकतों की निंदा का मुकाबला करने के कई तरीके हैं, वह पैसों से सबकुछ निपटा लेती है। जैसा कि कहा जाता है, "भेंट पाना यानी अपनी आज़ादी बेच देना।" अब कम-से-कम देश चीनी कम्युनिस्ट सरकार की निंदा कर रहे हैं। विरोधी ताकतें अपनी आवाज़ उठाने से डर रही हैं। और चीनी कम्युनिस्ट सरकार अभी भी अपने शासन को बनाये रखने में सक्षम है। जब तक कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता में है, तुम जैसे परमेश्वर के विश्वासी स्वतंत्र होने की उम्मीद नहीं कर सकते। चीन में परमेश्वर के प्रकटन और कार्य से सीसीपी सरकार ज़रूर उस पर बंदिश लगाएगी। चाहे चीनी कम्युनिस्ट सरकार चीन में एक नास्तिक अस्तित्व के लक्ष्य को प्राप्त करे या नहीं, यह तुम्हें गिरफ़्तार करना और दबाना कभी बंद नहीं करेगी! मुझे ये पहले से पता है। इसलिए मैं तुम्हारे सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास का ज़ोरदार विरोध करता हूँ। यह सब तुम्हारे लिए है, क्या तुम्हें समझ नहीं आता?
प्रश्न 8: नर्क में जाने वाली तुम्हारी बात पर मैं विश्वास नहीं करता। किसने देखा है कि नरक कहाँ है? नरक दिखता कैसा है? मैं तो यह भी नहीं जानता कि परमेश्वर का कोई अस्तित्व है भी या नहीं। आखिर परमेश्वर कहाँ है? परमेश्वर को किसने देखा है? अगर सर्वशक्तिमान परमेश्वर सच्चे परमेश्वर हैं, जब चीनी कम्युनिस्ट सरकार सर्वशक्तिमान परमेश्वर की निंदा और आक्रमण करती है, तो परमेश्वर ने उनका विनाश क्यों नहीं किया? अगर परमेश्वर अपनी सर्वशक्तिमत्ता से कम्युनिस्ट पार्टी को नष्ट कर देते हैं, तो वे वाकई परमेश्वर हैं। इस प्रकार, सम्पूर्ण मनुष्य जाति को यह स्वीकार करना होगा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही सच्चे परमेश्वर हैं। यहाँ तक कि सीसीपी सरकार को भी सच्चे परमेश्वर की पूजा करनी होगी। परमेश्वर के विरोध की हिम्मत किसकी होगी? लेकिन वाकई हुआ क्या? मैंने देखा था कि पुलिस परमेश्वर में विश्वास रखने वालों को हर जगह गिरफ़्तार कर रही थी। परमेश्वर में विश्वास करने वाले बहुत से लोगों को जेल में सताया गया और उन्हें अपाहिज बना दिया गया। उनमें से कई मारे गए। लेकिन क्या तुम्हारे परमेश्वर ने उन्हें बचाया? यह सब कैसे किसी को विश्वास दिला सकता है कि जिस परमेश्वर में तुम विश्वास करते हो वह सच है? मैं तो तुम्हें समझ ही नहीं पा रहा हूँ। जिस परमेश्वर में तुम विश्वास करते हो वह सच हैं या झूठ? मुझे तो लगता है कि तुम भी यह नहीं जानते। ऐसे में क्या तुम बेवकूफी नहीं कर रहे? जिस परमेश्वर में तुम विश्वास करते हो वही सच्चा परमेश्वर है, क्या तुम इसे समझा सकते हो?
प्रश्न 9: पर सरकारी दस्तावेज़ों के अनुसार, जो लोग यीशु में विश्वास करते हैं, जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्होंने सुसमाचार का प्रचार करने के लिए अपने परिवार का त्याग कर दिया। कुछ लोग तो ज़िंदगी भर शादी नहीं करते। दस्तावेज़ भी यही कहते है कि सरकार उन लोगों के समूह को गिरफ़्तार करना चाहती है जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करते हैं, और दूसरे समूह को मार देना चाहती है। उन्हें मारना मतलब कुछ नहीं। ऐसा कुछ और भी है, जैसे "जब तक प्रतिबंध समाप्त नहीं हो जाता तब तक सैनिकों को नहीं हटाया जाएगा।" सर्वशक्तिमान परमेश्वर के बहुत-से विश्वासियों को बंदी बनाया गया, उन्हें घायल और अपंग बना दिया गया। कई लोगों को तो अपनी नौकरी तक खोनी पड़ी और उनके परिवार बर्बाद हो गए। इसकी बहुत आलोचना भी हुई कि परमेश्वर के विश्वासियों को अपने परिवार की चिंता नहीं होती। क्या तुम्हें यह सही लगता है? तुम न तो अपने परिवार को छोड़ सकते हो और न ही अपनी शादी को तोड़ सकते हो। अगर इस तरह से तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, तो मेरी सलाह है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास मत करो, ठीक है?
प्रश्न 10: मैं कई सालों से यूनाइटेड फ्रंट के साथ काम कर रहा हूँ, और मैंने कई धार्मिक विश्वासों का अध्ययन किया है। ईसाई धर्म, कैथोलिक धर्म, और पूर्वी परंपरागत धर्म सभी शास्त्रसम्मत धर्म हैं जो मसीह में विश्वास करते हैं। लेकिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास बिलकुल अलग है। चीनी कम्युनिस्ट सरकार के दस्तावेज़ों के अनुसार, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया का ईसाई धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। तुम ईसाई धर्म के नाम पर उन अलग-अलग संप्रदायों में सुसमाचार का प्रचार कर रहे हो जो तुम्हें एक ईसाई के रूप में पहचानते तक नहीं हैं। तो इसलिए मैं तुम्हें सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करने की अनुमति कभी नहीं दूंगा। चाहो तो केवल ईसाई धर्म में विश्वास कर सकते हो। इस तरह से सरकार की सज़ा कुछ कम होगी। अगर तुम्हें सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करने के जुर्म में जेल में डाल दिया जाता है, तो तुम्हारी ज़िंदगी बहुत ख़तरे में होगी। सीसीपी सरकार जानती है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करने वाले हमेशा से अंत के दिनों के मसीह के अनुयायी हैं जो मसीह के समर्थक और प्रेरित हैं। जिस बात से चीनी कम्युनिस्ट सरकार को सबसे अधिक डर है वह अंत के दिनों के मसीह द्वारा व्यक्त की गयी किताब वचन देह में प्रकट होता है के प्रकाशन और उसकी गवाही है, और साथ ही उस कट्टर समूह से है जो अंत के दिनों के मसीह का अनुसरण करते हैं। हमने ईसाई धर्म के इतिहास को पढ़ा है। यहूदी और रोमन साम्राज्य भी यीशु के समर्थकों और प्रेरितों से ही सबसे अधिक डरते थे। तो जब इन लोगों को पकड़ा गया तो, इन्हें अलग-अलग तरह से मौत की सज़ा दी गयी। आज, अगर अंत के दिनों के मसीह का अनुसरण करने वाले इन लोगों के समूह को दबाया नहीं गया तो, कुछ ही वर्षों में, वे पूरे धार्मिक समुदाय को अपने साथ शामिल कर लेंगे। अभी तक, चीन में कई ईसाई गुटों को सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया द्वारा शामिल किया जा चुका है। अगर चीनी कम्युनिस्ट सरकार ने झाओयुआन मामले में कुछ लोगों की झूठी आम राय न बनाई होती और नकली केस न बनाया होता तो शायद ऐसा दिन आता जब दुनिया के सभी धार्मिक समुदाय सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया में शामिल हो जाते। एक बार अगर सभी धार्मिक समुदाय सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया में शामिल हो गए तो, यह चीनी कम्युनिस्ट सरकार के शासन के लिए बिलकुल भी अच्छा नहीं होगा। इसलिए, केन्द्रीय समिति ने सारी उपलब्ध सेना को तैनात करने का एक मज़बूत निर्णय लिया है ताकि बहुत कम समय में ही सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को पूरी तरह से बंद किया जा सके। तुम्हें जानना चाहिये, चमकती पूर्वी बिजली के उभरने ने न केवल चीन में खलबली मचा दी है बल्कि इसने दुनिया को प्रभावित किया है। क्योंकि तुमने इतना बड़ा कदम उठाया है, तो चीनी कम्युनिस्ट सरकार तुम्हें दबाने और गिरफ़्तार करने की मुहिम को पूरे ज़ोरों से क्यों नहीं लागू करेगी? अगर तुम्हें परमेश्वर में विश्वास करना ही है, तो तुम केवल ईसाई धर्म में विश्वास कर सकते हो। सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास नहीं कर सकते। क्या तुम्हें यह नहीं पता कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया ईसाई धर्म में नहीं आती है?
प्रश्न 11: तुम गवाही देते हो कि यीशु और सर्वशक्तिमान परमेश्वर दोनों ही पहले और अंतिम मसीह हैं। हमारी चीनी कम्युनिस्ट सरकार इस बात को नहीं मानती, "द इंटरनेशनेल" में उसने साफ कहा है, "संसार में कोई उद्धारकर्ता कभी नहीं रहा।" तुम रक्षक मसीह की वापसी की गवाही पर ज़ोर देते हो। तो चीनी कम्युनिस्ट सरकार तुम्हारी निंदा क्यों न करे? हमारे विचार से, यीशु जिनमें ईसाई विश्वास करते हैं, एक आम व्यक्ति थे। यहाँ तक कि उन्हें सूली पर भी चढ़ा दिया गया था। यहूदी तक उन्हें मसीह नहीं मानते हैं। अंत के दिनों के जिन देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्वर की तुम गवाही देते हो वे भी तो एक आम इंसान ही हैं। चीनी कम्युनिस्ट सरकार के दस्तावेज़ों से यह साफ़ पता चलता है कि उनका एक उपनाम और पहला नाम है। यह भी एक सच है। तुम एक आम इंसान के मसीह होने की, परमेश्वर के प्रकटन होने की, गवाही क्यों देते हो? यह सच में अजीब है! इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त किसी सत्य और अंत के दिनों में किए गए न्याय के कार्य की गवाही तुम कैसे देते हो, हमारी चीनी कम्युनिस्ट सरकार कभी इस बात को नहीं मानेगी कि यह व्यक्ति परमेश्वर है। मुझे लगता है कि तुम भी ईसाई धर्म, कैथोलिक धर्म, और पूर्वी परंपरावादी के लोगों में से एक हो जो यीशु में विश्वास करते हैं, एक व्यक्ति को परमेश्वर मानना, क्या यह नासमझी नहीं है? परमेश्वर और परमेश्वर का प्रकटन और उनका कार्य दरअसल क्या है? क्या केवल सत्य को व्यक्त करना और परमेश्वर का कार्य करना, सच्चे परमेश्वर का प्रकट होना है? यह हम कभी भी स्वीकार नहीं करेंगे। अगर परमेश्वर चमत्कार और करिश्मा करके चीनी कम्युनिस्ट सरकार और उन सभी को जो उनका विरोध करते है, उनको नष्ट कर दें, तब हम उन्हें एक सच्चे परमेश्वर के रूप में मानेंगे। अगर परमेश्वर बादलों में प्रकट होते हैं, और ऐसे गरजते है कि जो पूरी मनुष्य जाति को भयभीत कर दे, वह परमेश्वर का प्रकटन होता है। तब हमारी चीनी कम्युनिस्ट सरकार उन्हें मानेगी। नहीं तो चीनी कम्युनिस्ट सरकार कभी स्वीकार नहीं करेगी कि परमेश्वर है।
प्रश्न 12: सरकार की प्रचार सामग्री के अनुसार, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को पूर्वोत्तर चीन में किसी झाहो नाम के व्यक्ति ने स्थापित किया था। यह व्यक्ति सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया में सबसे बड़ा पादरी है। यह कलीसिया का प्रमुख है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया में विश्वास करने वाले दावा करते हैं कि पवित्र आत्मा ने उसे इस काम के लिए चुना है। वे अक्सर पवित्र आत्मा द्वारा चुने गए इस व्यक्ति के उपदेशों को सुनते हैं, और वे कलीसिया के आधिकारिक कार्यों के लिए भी उसका कहा मानते हैं। हालांकि, तुम सभी सर्वशक्तिमान परमेश्वर के विश्वासी, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हो, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम पर प्रार्थना करते हो, सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा बताये गए वचन देह में प्रकट होता है को एक प्रामाणिक मत के रूप में मानते हो, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों पर अपनी सभाओं में संवाद करते हो, किसी भी मामले में, यही एक व्यक्ति है जिसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त है। इसलिए हमें इस बात का विश्वास है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया इसी व्यक्ति ने बनाई गयी है। चीनी कम्युनिस्ट सरकार और धार्मिक समुदाय दोनों ही, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को मनुष्य द्वारा बनाये गए एक संगठन के रूप में देखते हैं। और मुझे लगता है यह सच है। क्या तुम्हें यह समझ आ रहा है?
प्रश्न 13: आप सब परमेश्वर में विश्वास करते हैं; और मैं मार्क्स और लेनिन में। मैंने, तरह-तरह की धार्मिक आस्थाओं पर शोध किया है। अपने कई सालों के शोधकार्य के जरिये, मैंने एक समस्या देखी है। सभी धर्म किसी न किसी, परमेश्वर में विश्वास करते हैं। लेकिन परमेश्वर के तमाम विश्वासियों में से किसी ने भी, परमेश्वर को नहीं देखा है। उनकी आस्था सिर्फ भावनाओं की बुनियाद पर टिकी है। इसलिए, मैं धार्मिक आस्था के बारे में, इस नतीजे पर पहुंचा हूँ: धर्म विशुद्ध रूप से, काल्पनिक और अंधविश्वास है जिसका विज्ञान में, कोई आधार नहीं है। आज के समाज में विज्ञान बहुत विकसित है। गलतियाँ न करें इसके लिए हर चीज़ को, विज्ञान पर आधारित होना चाहिए। कम्युनिस्ट पार्टी इसमें विश्वास करती है। हम परमेश्वर में विश्वास नहीं करते। दी इंटरनेशनेल में लिखा है: "कभी भी दुनिया का उद्धार करनेवाला कोई नहीं हुआ, न देवता, न सम्राट, जिन पर भरोसा किया जा सके। मानवजाति को खुश रहने के लिए, खुद अपने भरोसे रहना होगा!" दी इंटरनेशनेल में साफतौर से लिखा है, "कभी भी दुनिया का उद्धार करनेवाला कोई नहीं हुआ।" हमारे पूर्वज परमेश्वर में जिस वजह से विश्वास करते थे, वह मुख्य रूप से यह है कि उस वक्त वे सूर्य, चंद्रमा और तारे जैसे अजूबों से रूबरू थे, जिनकी कोई वैज्ञानिक व्याख्या नहीं थी। इसलिए उनके दिलो-दिमाग में, अति-प्राकृतिक शक्तियों को लेकर डर और अचरज पैदा हो गया। इस तरह से धर्म की शुरुआती धारणाएं बनीं। यही नहीं, जब इंसान कुदरती तबाहियों और बीमारियों जैसी मुश्किलें हल नहीं कर पाये, तब उन्होंने परमेश्वर को आदर देकर आध्यात्मिक सहूलियत खोजी। यह है धर्म का उद्भव। हम देख सकते हैं कि यह तार्किक, या वैज्ञानिक नहीं था। आजकल हम ज़्यादा विकसित हैं विज्ञान ने बड़ी तरक्की की है। उड़ान और अंतरिक्ष उद्योग, बायोटेक्नॉलॉजी, जेनेटिक इंजिनियरिंग, और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में, मानवजाति ने बहुत तरक्की की है। पहले हम नहीं समझते थे और हमारे पास समस्याएँ हल करने के तरीके नहीं थे। लेकिन अब हम हर चीज़ को विज्ञान के जरिये समझा सकते हैं, और हल के लिए हम विज्ञान पर भरोसा करते हैं। विज्ञान और टेक्नॉलॉजी के इस युग में, परमेश्वर में विश्वास करना, क्या यह अज्ञानी होना, नहीं है? क्या आपको नहीं लगता आप पीछे छूट जाएंगे? हम सिर्फ विज्ञान में विश्वास कर सकते हैं, बस।
प्रश्न 14: परमेश्वर में अपनी आस्था को लेकर सबके अपने विचार और राय हैं। मुझे ऐसा लगता है कि आपके विचार और सिद्धांत आपकी अपनी समझ के अनुसार हैं, और ये सब सिर्फ भ्रम हैं। हम साम्यवादियों को यकीन है भौतिकवाद और विकासवाद के सिद्धांत ही सत्य हैं क्योंकि वे, विज्ञान के मुताबिक़ हैं। हमारा देश, प्राथमिक शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालय तक उपयुक्त शिक्षा देता है। ऐसा किसलिए? इसलिए कि सभी बच्चों में छोटी उम्र से ही, नास्तिकता और विकासवाद, की सोच घर कर जाए, ताकि वे धर्म और अंधविश्वास से, दूर रहें, ताकि वे हर सवाल का तर्कसंगत जवाब दे सकें। उदहारण के लिए, जीवन के उद्भव को ले लें। पहले के वक्त में, हम अनजान थे, और किस्से-कहानियों में, यकीन करते थे, जैसे कि स्वर्ग और पृथ्वी का अलग होना और नुवा द्वारा इंसान को बनाया जाना। पश्चिमी लोग विश्वास करते हैं कि परमेश्वर ने हम सबकी रचना की। दरअसल, ये सब मिथक और किस्से हैं, और विज्ञान के मुताबिक़ नहीं हैं। विकासवाद के, सिद्धांत के आने के बाद से जिसने मानवजाति के उद्भव के बारे में समझाया था, कि किस तरह, मनुष्य बंदरों से विकसित हुए, तब से, परमेश्वर द्वारा मनुष्य की रचना की कहानियाँ पूरी तरह निराधार साबित हो गयी हैं। हर चीज़ का विकास पूरी तरह से प्रकृति में हुआ है। यही सत्य है। इसलिए, हमें विज्ञान में विश्वास करना होगा और विकासवाद में। आप सभी लोग पढ़े-लिखे जानकार लोग हैं। आप परमेश्वर में कैसे विश्वास कर सकते हैं? क्या आप अपने विचार हमसे साझा कर सकेंगे?
प्रश्न 15: राष्ट्रीय नेताओं ने, ईसाई धर्म और कैथोलिक धर्म पर, कुपंथ का ठप्पा लगाया है, और पवित्र बाइबल को, कुपंथ की किताब कहा है। ये आम तौर पर माने हुए तथ्य हैं। इस सवाल पर, कि केंद्र सरकार ने ईसाई गृह कलीसियाओं, ख़ास तौर से सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया पर कुपंथ का ठप्पा क्यों लगाया है, मेरा शोध मुझे कुछ यूं यकीन करने की तरफ आगे बढ़ाता है: वे सभी जो, यह गवाही देते हैं कि परमेश्वर ने सब चीज़ों की रचना की, जो गवाही देते हैं कि परमेश्वर सृष्टिकर्ता हैं, और उन्होंने मानवजाति की रचना की, जो गवाही देते हैं कि परमेश्वर सब पर शासन करते हैं, और जो गवाही देते हैं कि परमेश्वर नियंत्रण करते हैं, और वे ब्रह्मांड के प्रभु हैं, और हमसे परमेश्वर का,सम्मान और आराधना, करवाते हैं ये कुपंथ हैं। वे सभी जो गवाही देते हैं, कि परमेश्वर धार्मिक और पवित्र हैं, और जो परमेश्वर के प्रेम और उद्धार की गवाही देते हैं, जो शैतान की मानवजाति को भ्रष्ट करनेवाली दुष्ट शासक शक्ति के रूप में निंदा करते हैं, ख़ास तौर से जो कम्युनिस्ट पार्टी पर सीधा हमला करते हैं और उसकी निंदा करते हैं ये सब कुपंथ हैं। वे सभी जो, गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु लौट आये हैं, जो देहधारी मसीह की गवाही देते हैं, और एक साधारण इंसान के काम के बारे में बात करते हैं, मानो यह किसी उद्धारकर्ता का कार्य हो, और गवाही देते और प्रचारित करते हैं कि मसीह के सभी वचन संपूर्ण सत्य हैं, और लोगों से कहते हैं, कि वे परमेश्वर को, स्वीकार करें, उनकी शरण में जाएं और कम्युनिस्ट पार्टी के बजाय उनके आगे समर्पण करें ये कुपंथ हैं। वे सभी जो, गवाही देते हैं कि, परमेश्वर के वचन, सबसे बड़े सत्य हैं, जो गवाही देते हैं कि पवित्र बाइबल परमेश्वर का वचन है वचन देह में प्रकट होता है सत्य है, और मार्क्सवाद-लेनिनवाद कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा की निंदा करते हैं ये कुपंथ हैं। वे सभी जो अंत के दिनों के मसीह की गवाही देते हैं, यह उपदेश देते हुए कि परमेश्वर वापस आ चुके हैं, पूरी मानवजाति को परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने देते हैं, जो लोगों का आह्वान करते हैं कि स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के लिए परमेश्वर का अनुसरण करें ये कुपंथ हैं। मेरी जानकारी के अनुसार, यही वजह है कि सरकार सभी ईसाई कलीसियाओं पर, ख़ास तौर से सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया पर, कुपंथ का ठप्पा लगाती है। चीन में, कम्युनिस्ट पार्टी का नियंत्रण है। कम्युनिस्ट पार्टी, मार्क्सवादी-लेनिनवादी, नास्तिक पार्टी है जो हर प्रकार की आस्तिकता का विरोध करती है। कम्युनिस्ट पार्टी परमेश्वर में विश्वास करनेवाले सभी समूहों को कुपंथ मानती है। यह उनके, संपूर्ण अधिकार को दर्शाता है। सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टी ही महान, गौरवशाली और सही है। मार्क्सवाद-लेनिनवाद का विरोध करनेवाली हर चीज़ गलत है; कम्युनिस्ट पार्टी इन सब पर बंदिश लगाना चाहती है। चीन में, आपको कम्युनिस्ट पार्टी को, महान मानना ही होगा। तो क्या, इसमें कुछ गलत है? आपकी कलीसिया का दावा है, यीशु सर्वशक्तिमान परमेश्वर के रूप में लौट आये हैं, और वे अंत के दिनों के मसीह हैं। आप यह भी, दावा करते हैं कि, सर्वशक्तिमान परमेश्वर लोगों को, शुद्ध करने के लिए सत्य व्यक्त करते हैं, इससे धार्मिक वर्ग बंट गये हैं, और करोड़ों लोग, परमेश्वर की शरण में जा रहे हैं। इसने चीन पर, बहुत बुरा असर डाला है और समाज में, अशांति फैलती जा रही है। आप लोक व्यवस्था में गड़बड़ी पैदा कर रहे हैं। इसलिए सरकार, सर्वशाक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को कुपंथ घोषित करती है, और उस पर कार्रवाई करती है। आप सबने धोखा खाया है भटक गये हैं। हम उम्मीद करते हैं कि, आप शीघ्र पश्चाताप करेंगे, थ्री-सेल्फ कलीसिया के लिए, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को छोड़ देंगे। फिर आप, आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं होंगे।
प्रश्न 16: आपका दावा है कि, सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंत के दिनों में परमेश्वर का प्रकटन हैं सत्य है। आपका, यह भी दावा है, कि परमेश्वर ने इस संसार की रचना की और वे इस पर राज करते हैं। कि पूरे इतिहास में परमेश्वर मानवता का, मार्गदर्शन कर उसे बचा रहे हैं। मुझे बताएं आपकी इन आस्थाओं का तथ्यात्मक आधार क्या है? हम कम्युनिस्ट पार्टी में, सभी लोग नास्तिक हैं। हम परमेश्वर के शासन को या उनके अस्तित्व को ज़रा भी नहीं मानते। और आप जिन देहधारी परमेश्वर में, विश्वास करते हैं उनको तो और भी नहीं। जिस यीशु में ईसाई विश्वास करते हैं, वो तो साफ़ तौर पर मनुष्य हैं। उनके माता-पिता और भाई-बहन थे। ईसाई धर्म जोर देता है कि एक सच्चे परमेश्वर के रूप में, उनकी आराधना की जाए। पूरी बकवास। सर्वशक्तिमान परमेश्वर यीशु जैसे ही हैं आप और मुझ जैसे साधारण इंसान। किस वजह से, आप विश्वास करते हैं कि, वे देहधारी परमेश्वर हैं? और आपके लिए यह क्यों ज़रूरी है कि खुद ऐसी गवाही दें, कि वे अंत के दिनों के मसीह उद्धारकर्ता हैं? यह सरासर बेवकूफी और अज्ञान है। यह सब किस्सा-कहानी है कोई परमेश्वर नहीं है। और यही नहीं, कोई देहधारी परमेश्वर नहीं हैं। मैं फिर से कहता हूँ: आपका दावा है कि परमेश्वर ने अब साधारण मनुष्य का रूप धरा है। आपके पास कोई सबूत है? क्या कोई मुझे बता सकता है कि, आपकी आस्था की बुनियाद क्या है?
प्रश्न 17: आपका दावा है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर अंत के दिनों के परमेश्वर यहाँ पृथ्वी पर हैं। और आप कहती हैं, कि आपकी आस्था सच को जीवन के सही मार्ग को, खोजने की चाह से आयी है। मगर मेरा अनुभव कहता है, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के बहुत-से अनुयायी यीशु की मिशनरियों की तरह हैं जो सुसमाचार को फैलाते हुए परमेश्वर की गवाही देते हैं परमेश्वर को अपनी देह और आत्मा अर्पित करने के लिये, बेझिझक अपने परिवार, अपने करियर को भी त्याग देते हैं, उन लोगों में, बहुत-से युवा लोग हैं जो अंत के दिनों के मसीह का अनुसरण करने की खातिर, शादी नहीं करना चाहते। आप लोगों के सुसमाचार को फैलाने के लिए सारा-कुछ छोड़ देने की वजह से, ज़्यादा-से-ज़्यादा लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं। मान लीजिए दुनिया में सभी लोग परमेश्वर की शरण में चले जाएं, तो फिर कम्युनिस्ट पार्टी के साथ कौन रहेगा? पार्टी में कौन विश्वास करेगा? इसी वजह से सरकार विश्वासियों का, दमन करती है और उन्हें गिरफ्तार करती है। क्या आपको इसमें कोई समस्या नज़र आती है? आपकी ऐसी आस्था के कारण ही इतने सारे लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है इतने सारे लोग घर छोड़कर भाग गये हैं। इतने सारे दंपत्तियों ने तलाक ले लिया है, और इतने सारे बच्चे बिना मां-बाप के हो गये हैं। बुजुर्गों की देखभाल करनेवाले, कोई नहीं हैं। परमेश्वर में आपकी ऐसी आस्था आपके ही परिवारों को तकलीफ पहुंचा रही है। आप क्या हासिल करना चाहते हैं? क्या यही आपका वो सच्चा मार्ग है जिस पर आपकी अगुवाई हुई है? पारंपरिक चीनी संस्कृति मां-बाप से जुड़ाव को बहुत मूल्यवान मानती है। कहा गया है: "मां-बाप का प्रेम सबसे ऊपर।" कन्फ्यूशियस ने कहा था: "जब आपके मां-बाप जीवित हों, तो बहुत दूर की यात्रा न करें।" मां-बाप के प्रति आदर की भावना मनुष्य के चाल-चलन की बुनियाद है। आप जिस प्रकार से परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, कि जिन्होंने आपको जीवन और पोषण दिया, उन्हीं की देखभाल न कर पायें, तो यह इंसानों द्वारा अनुसरण के लिए सही मार्ग कैसे हो सकता है? मैं अक्सर लोगों को यह कहते हुए सुनती हूँ, कि विश्वासी सबसे अच्छे लोग होते हैं। यह गलत नहीं है। लेकिन परमेश्वर की आराधना करनेवाले और उन्हें सबसे ऊपर माननेवाले आप सभी लोग, यह कम्युनिस्ट पार्टी को आग-बबूला कर देती है यह उनमें नफ़रत भर देती है। आप जगह-जगह जाकर सुसमाचार फैलाते हैं, और फिर भी आप अपने ही परिवार की देखभाल नहीं कर सकते। इसे अच्छा चाल-चलन कैसे माना जा सकता है? क्या ऐसा नहीं लगता कि आपकी आस्था आपको अपने रास्ते से एक गलत मोड़ पर घुमाकर ले जाती है? आप जो-कुछ भी कर रहे हैं, उससे क्या आप हमारे समाज में सद्भाव और संतुलन को नष्ट नहीं कर रहे हैं? मेरी आपको सलाह है यह गलती करते न रहें। आपको अपनी आस्था छोड़कर, अपने घर, अपने परिवार में लौट जाना चाहिए, उनकी देखभाल करनी चाहिए, और एक सामान्य जीवन जीना चाहिए। संतान और माँ–बाप होने के नाते यह आपका कर्तव्य है। इंसानों को यही करना चाहिए यही व्यावहारिक है।