प्रश्न 1: सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है," तो मुझे वह याद आया जो प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा" (यूहन्ना 4:14)। हम पहले से ही जानते हैं कि प्रभु यीशु जीवन के सजीव जल का स्रोत हैं, और अनन्‍त जीवन का मार्ग हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर और प्रभु यीशु समान स्रोत हों? क्या उनके कार्य और वचन दोनों पवित्र आत्मा के कार्य और वचन हैं? क्या उनका कार्य एक ही परमेश्‍वर करते हैं?

उत्तर: दोनों बार जब परमेश्‍वर ने देह धारण की तो अपने कार्य में, उन्होंने यह गवाही दी कि वे सत्‍य, मार्ग, जीवन और अनन्‍त जीवन के मार्ग हैं। यह सिद्ध करने के लिए कि मसीह सत्‍य, मार्ग और जीवन हैं, वे कई सत्‍य व्यक्त करते हैं, और व्यावहारिक कार्य का एक चरण पूरा करते हैं। जो यह सिद्ध करने के लिए काफी है कि वे एक ही स्रोत से आते हैं। दोनों ही पवित्र आत्मा की वाणी व्‍यक्‍त करते हैं। वे एक ही परमेश्‍वर का कार्य करते हैं, और दोनों ही यह गवाही देते हैं कि परमेश्‍वर अपने सभी स्वरूपों में जीवन का स्रोत हैं, क्योंकि परमेश्‍वर द्वारा व्यक्त किया गया सत्‍य जीवन जल का अनन्‍त सोता है, जो उनके सिंहासन से बहने वाली जीवन की नदी और अनन्‍त जीवन का मार्ग है। यह इस बात को और ज्‍़यादा साबित करता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर, प्रभु यीशु का दूसरा आगमन हैं, और दोनों ही अपनी प्रबंधन योजना में कार्य कर रहे परमेश्‍वर हैं। प्रभु यीशु ने कहा था: "मैं पिता में हूँ और पिता मुझ में है …" (यूहन्ना 14:10)। "मैं और पिता एक हैं" (यूहन्ना 10:30)। यह साबित करता है कि प्रभु यीशु परमेश्‍वर का प्रकटन हैं। प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की थी कि वे फ़िर आएंगे, और यह कि वे अंत के दिनों में न्याय का कार्य करने के लिए मनुष्य के पुत्र के रूप में देहधारण करेंगे। आइए, सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचन का एक अंश पढ़ें।

"यीशु और मैं एक ही पवित्रात्मा से आते हैं। यद्यपि हमारी देहों का कोई सम्बंध नहीं है, किन्तु हमारी पवित्रात्माएँ एक ही हैं; यद्यपि हम जो करते हैं और जिस कार्य को हम वहन करते हैं वे एक ही नहीं हैं, तब भी सार रूप में हम सदृश्य हैं; हमारी देहें भिन्न रूप धारण करती हैं, और यह ऐसा युग में परिवर्तन और हमारे कार्य की आवश्यकता के कारण है; हमारी सेवकाईयाँ सदृश्य नहीं हैं, इसलिए जो कार्य हम लाते और जिस स्वभाव को हम मनुष्य पर प्रकट करते हैं वे भी भिन्न हैं। …किन्तु उनकी पवित्रात्माएँ एक हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "देहधारण के महत्व को दो देहधारण पूरा करते हैं")।

"यद्यपि दो देहधारणों की देहों के कार्य भिन्न हैं, किन्तु देहों का सार, और उनके कार्यों का स्रोत समरूप है; यह केवल इतना ही है कि वे कार्य के दो विभिन्न चरणों को करने के लिए अस्तित्व में हैं, और दो विभिन्न युगों में सामने आते हैं। कुछ भी हो, देहधारी परमेश्वर के देह एक ही सार और एक ही स्रोत को साझा करते हैं—यह एक सत्य है जिसे कोई मना नहीं कर सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार")।

सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचन हमें साफ़-साफ़ बताते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर और प्रभु यीशु दोनों परमेश्‍वर की आत्मा द्वारा धारण किए हुए शरीर हैं। वे सिर्फ़ इस मायने में अलग हैं कि वे हर युग में अलग-अलग कार्य करते हैं और अलग-अलग नामों का उपयोग करते हैं, लेकिन वे एक ही परमेश्‍वर हैं। अब हम जानते हैं कि दोनों बार परमेश्‍वर ने देहधारण किया। उन्होंने यह गवाही दी कि वे जीवन जल का स्रोत हैं, और उनके पास जीवन जल का असीम भंडार है। वे यह भी गवाही देते हैं कि ख़ुद परमेश्‍वर ही अनन्‍त जीवन का मार्ग हैं। भले ही उनके वचन और बोलने का तरीका थोड़ा अलग होता है, मगर वे जो भी कहते हैं, उसका सार एक ही होता है। तो, अनन्‍त जीवन का मार्ग क्या है? अनन्‍त जीवन का मार्ग और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश में आपस में क्‍या संबंध है? प्रभु यीशु ने कहा है कि सिर्फ़ स्‍वर्गिक पिता की इच्छा का पालन करके लोग स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं। जो लोग वाकई परमेश्‍वर की इच्छा का पालन करते हैं, वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्‍वर के वचनों पर अमल करने और परमेश्‍वर की आज्ञाओं का पालन करने में सक्षम हैं। प्रभु यीशु ने हमें सिखाया कि हमें अपने हृदय, आत्मा और मन की गहराइयों से परमेश्‍वर से प्रेम करना चाहिए, और दूसरों से भी ऐसे प्रेम करना चाहिए जैसे कि हम अपने आप से करते हैं। लेकिन क्या हम उनके वचनों पर अमल कर पाये हैं? अगर हम उन वचनों पर अमल नहीं कर रहे हैं तो हम परमेश्‍वर की इच्छा के अनुसार नहीं चल रहे हैं। अगर हम परमेश्‍वर के वचनों पर अमल नहीं कर सकते और उनकी आज्ञाओं का पालन नहीं कर सकते हैं, तो हम कभी अनन्‍त जीवन के मार्ग को कैसे पाएंगे? कभी नहीं पाएंगे! अनन्‍त जीवन के मार्ग को हासिल करने का अर्थ है मनुष्यों को पवित्र करने और बचाने के लिए परमेश्‍वर द्वारा व्‍यक्‍त किये गए संपूर्ण सत्‍य को पाना और आखिर में परमेश्‍वर को जानने और उनकी इच्‍छा का पालन करने वाला इंसान बन जाना। अगर हम परमेश्‍वर में विश्वास करते हैं लेकिन सत्‍य को हासिल नहीं कर पाते, अपने जीवन स्वभाव में बदलाव नहीं लाते, और परमेश्‍वर की इच्छा का पालन नहीं करते, तो क्या हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं? तो क्या जो लोग स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के काबिल नहीं, वे अनन्‍त जीवन पा सकते हैं? इसलिए जो लोग परमेश्‍वर की इच्‍छा को नहीं मानते, उन्हें अनन्‍त जीवन का मार्ग पाने का कोई तरीका नहीं मिलेगा। बाइबल में भी यह कहा गया है: "जो पुत्र पर विश्‍वास करता है, अनन्त जीवन उसका है; परन्तु जो पुत्र की नहीं मानता, वह जीवन को नहीं देखेगा …" (यूहन्ना 3:36)। पुत्र में विश्वास करने का मतलब है परमेश्‍वर ने जिसे भेजा है उस पर और देहधारी मसीह पर विश्वास करना। प्रभु यीशु मसीह मनुष्य के पुत्र थे। छुटकारे का कार्य ख़त्‍म करके वे स्वर्ग लौट गए। प्रभु यीशु ने हमसे वादा किया था कि वे फ़िर से आएंगे, इसलिए अंत के दिनों में लौटे हुए मसीह को स्वीकार करना बहुत ज़रूरी है। जो भी अंत के दिनों में लौटे मसीह को अपनाता है वह अनन्‍त जीवन का मार्ग पाएगा। अगर हम सिर्फ़ प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं, और प्रभु यीशु के दूसरे आगमन को स्वीकार नहीं करते हैं, तो हम जीवन के सजीव जल के स्रोत के साथ अपना रिश्‍ता तोड़ रहे हैं! क्या प्रभु यीशु अभी भी हमें स्वीकार करेंगे? क्या हम अभी भी अनन्‍त जीवन को पा सकते हैं? प्रभु में विश्वास करते वक्‍त, हमें प्रभु यीशु के दूसरे आगमन को भी स्वीकार करना चाहिए, यही सच्‍चा "पुत्र में विश्वास" करना हुआ। सिर्फ़ वे लोग जो अंत के दिनों के मसीह का अनुसरण करते हैं, अनन्‍त जीवन को पाएंगे। अगर हम सिर्फ़ प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं, और प्रभु यीशु की वापसी को नकारते हैं, तो हमारा विश्वास एक बेकार कोशिश है, बीच में आधा-अधूरा छोड़ा गया विश्‍वास, और इससे हम प्रभु यीशु की स्‍वीकृति कभी नहीं पाएंगे।

क्योंकि जो प्रभु यीशु ने अनुग्रह के युग में किया, वो छुटकारे का कार्य है। उन्होंने सिर्फ़ मनुष्य के छुटकारे के बारे में सत्‍य व्यक्त किए, जो सिर्फ़ लोगों को उनके पापों को कबूल करने और पश्चाताप करने और परमेश्‍वर की ओर मुड़ने में मदद कर सकते हैं। लेकिन, चूंकि इंसानों की पापी प्रकृति और भ्रष्ट स्वभाव नहीं बदले हैं, भले ही उनके पापों को क्षमा कर दिया गया हो, वे अभी भी अक्सर परमेश्‍वर के ख़िलाफ़ पाप और बगावत करते हैं और परमेश्‍वर का विरोध करते हैं, यह एक तथ्य है। यह सबूत है कि जो भी प्रभु यीशु ने किया वह छुटकारे का कार्य था। अंत के दिनों में लौट आए प्रभु यीशु द्वारा किए गए न्याय का कार्य ही मानव जाति को पूरी तरह से बचा कर, उसे पाप और शैतान के प्रभाव से मुक्त होने, स्वाभावगत परिवर्तन पाने और परमेश्‍वर को प्राप्‍त होने दे सकता है। इसलिए, अंत के दिनों में लौटे प्रभु यीशु द्वारा किया गया न्याय का कार्य मानव जाति के उद्धार के लिए महत्वपूर्ण है। अगर हम सिर्फ़ प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य को स्वीकार करते हैं, और अंत के दिनों में लौट आए प्रभु यीशु के न्याय के कार्य को स्वीकार किए बिना, स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना चाहते हैं, तो हम ख़याली पुलाव पका रहे हैं। दरअसल, प्रभु यीशु ने बहुत पहले कहा था: "मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा" (यूहन्ना 16:12-13)। उस समय, कोई भी प्रभु यीशु के वचनों को नहीं समझा, क्योंकि मानवता बस परमेश्‍वर के सामने आई ही थी, और उसका आध्यात्मिक कद बहुत छोटा था। अगर प्रभु यीशु ने अंत के दिनों के न्याय के वचनों को व्यक्त किया होता, तो मनुष्य इसे सहन नहीं कर पाता। उस पूरे सत्‍य को अभिव्यक्त करने के लिए, जो मनुष्य को पवित्र करता, बचाता और उसे पूर्ण करता है, अंत के दिनों में उन्हें सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के आगमन का इंतज़ार करना पड़ा। जब हम सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों को देखते हैं, तो हम अचानक ही जागरूक होकर आखिरकार परमेश्‍वर की इच्छा को समझने लगते हैं। अनुग्रह के युग में परमेश्‍वर ने सीधे अंत के दिनों का न्याय का कार्य क्यों नहीं किया? ऐसा इसलिए है क्योंकि मानव जाति को बचाने की परमेश्‍वर की प्रबंधन योजना में कार्य के तीन चरण हैं। परमेश्‍वर अंत के दिनों में न्याय कार्य करते हैं, जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर कहते हैं: "यद्यपि यीशु ने मनुष्यों के बीच अधिक कार्य किया है, उसने केवल समस्त मानवजाति के छुटकारे के कार्य को पूरा किया और वह मनुष्य की पाप-बलि बना, मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा नहीं दिलाया। शैतान के प्रभाव से मनुष्य को पूरी तरह बचाने के लिये यीशु को न केवल पाप-बलि के रूप में मनुष्यों के पापों को लेना आवश्यक था, बल्कि मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से पूरी तरह मुक्त करने के लिए परमेश्वर को और भी बड़े कार्य करने की आवश्यकता थी जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया था। और इसलिए, मनुष्य को उसके पापों के लिए क्षमा कर दिए जाने के बाद, एक नये युग में मनुष्य की अगुवाई करने के लिए परमेश्वर वापस देह में लौटा, और उसने ताड़ना एवं न्याय के कार्य को आरंभ किया, और इस कार्य ने मनुष्य को एक उच्चतर क्षेत्र में पहुँचा दिया। वे सब जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़ी आशीषें प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में ज्योति में निवास करेंगे, और सत्य, मार्ग और जीवन को प्राप्त करेंगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" के लिए प्रस्तावना)। प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य ने अंत के दिनों में मनुष्य के न्याय और शुद्धिकरण के कार्य का मार्ग प्रशस्त किया। वह सत्य जो मनुष्य को बचाता है, परिवर्तन लाता है, और उसे पूर्ण करता है, उसे पूरी तरह से लौटे हुए प्रभु यीशु द्वारा व्यक्त किया जाएगा। यह सत्‍य अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर द्वारा मनुष्य को अनन्‍त जीवन प्रदान करने का मार्ग है। इसलिए, अगर हम अनन्‍त जीवन का मार्ग पाना चाहते हैं, तो उसकी कुंजी प्रभु यीशु की वापसी को स्वीकार करना है। प्रभु यीशु ने कहा था: "देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ" (प्रकाशितवाक्य 3:20)। "…क्योंकि मेम्ने का विवाह आ पहुँचा है, और उसकी दुल्हिन ने अपने आप को तैयार कर लिया है। …धन्य वे हैं, जो मेम्ने के विवाह के भोज में बुलाए गए हैं" (प्रकाशितवाक्य 19:7-9)। जो लोग मसीह के दूसरे आगमन को स्वीकार करते हैं, वे बुद्धिमान कुंवारियां हैं। परमेश्‍वर की वाणी सुनने के बाद, वे मेमने के साथ भोज के लिए जाती हैं। ऐसे मनुष्यों को आशीष मिलता है, और उन्होंने मेमने के पदचिन्हों का अनुसरण किया होता है। वे अंत के दिनों में परमेश्‍वर के न्याय से शुद्ध किए गए पहले फल और परमेश्‍वर द्वारा बनाए गए विजेता हैं। इसलिए, सिर्फ़ वे लोग जो मसीह के दूसरे आगमन को स्वीकार करते हैं, वे ही अनन्‍त जीवन का मार्ग पाते हैं।

"सिंहासन से बहता है जीवन जल" फ़िल्म की स्क्रिप्ट से लिया गया अंश

पिछला: प्रश्न 5: मैं सोचा करती थी कि सीसीपी के दिन अब सीमित हैं और शीघ्र ही उसका पतन हो जाएगा, अगर विश्वास करने से पूर्व मैं उसके पतन की प्रतीक्षा करूं, तो क्या ढेरों मुश्किलों से मेरा बचाव नहीं हो जाएगा? लेकिन मैं अब देख रही हूं कि हमें प्रताड़ित और गिरफ़्तार करने में सीसीपी का उद्देश्य हमें नरक में भेजना है! अगर हम सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर में विश्वास करने के पूर्व सीसीपी के नष्ट होने की प्रतीक्षा करते हैं, तो भी क्या हम अंत के दिनों में परमेश्‍वर के राज्य में प्रवेश कर परमेश्‍वर का उद्धार पा सकेंगे? क्या हम उद्धार का हमारा अवसर खो देंगे?

अगला: प्रश्न 2: प्रभु यीशु और सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर एक ही परमेश्‍वर हैं, लेकिन विभिन्न युगों में अलग-अलग कार्य करते हैं। प्रभु यीशु ने छुटकारे का कार्य किया और पश्चाताप का मार्ग बताया। अंत के दिनों में, सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर मानवजाति के न्याय और शुद्धिकरण का कार्य करते हैं और उन्हें अनन्‍त जीवन का मार्ग देते हैं। मेरे पास अभी भी एक सवाल है, पश्चाताप के मार्ग और अनन्‍त जीवन के मार्ग के बीच क्या अंतर है?

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