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प्रश्न 4: अगर हम अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के कार्य को स्‍वीकार करते हैं, तो हम कैसे अनन्‍त जीवन का मार्ग पाने की चाहत कर सकते हैं?

उत्तर: सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर अंत के दिनों में उस सत्‍य की समग्रता को व्‍यक्‍त करते हैं जो मानव जाति को पूरी तरह शुद्ध कर सकती है और बचा सकती है, ये सत्‍य हमारे भ्रष्‍ट सार और हमारी कमियों के अनुसार व्‍यक्‍त किये जाते हैं, इसका अर्थ यह है कि ये सत्य की वे सच्चाइयां हैं, जो मनुष्यों में होनी चाहिए। परमेश्‍वर चाहते हैं कि हम इन सत्यों को अनन्‍त जीवन के रूप में पाएं। यह सत्‍य अनन्‍त जीवन का वह मार्ग है जो परमेश्‍वर ने हमें दिया है। तो किस प्रकार हम अनन्‍त जीवन की कामना और प्राप्‍ति करें? सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर ने हमारे लिए पहले से ही एक व्‍यावहारिक मार्ग बना रखा है। आइए, सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों के कुछ और अंशों को पढ़ें:

"अंत के दिनों का कार्य, सभी को उनके स्वभाव के आधार पर पृथक करना, परमेश्वर की प्रबंधन योजना का समापन करना है, क्योंकि समय निकट है और परमेश्वर का दिन आ गया है। परमेश्वर उन सभी को जिन्होंने उसके राज्य में प्रवेश कर लिया है अर्थात्, वे सभी लोग जो अंत तक उसके वफादार रहे हैं, स्वयं परमेश्वर के युग में ले जाता है। हालाँकि, जब तक स्वयं परमेश्वर का युग नहीं आ जाता है तब तक परमेश्वर जो कार्य करेगा वह मनुष्य के कर्मों को देखना या मनुष्य जीवन के बारे में पूछताछ करना नहीं, बल्कि उनके विद्रोह का न्याय करना है, क्योंकि परमेश्वर उन सभी को शुद्ध करेगा जो उसके सिंहासन के सामने आते हैं। वे सभी जिन्होंने आज के दिन तक परमेश्वर के पदचिन्हों का अनुसरण किया है वे हैं जो परमेश्वर के सिंहासन के सामने आ गए हैं, इसलिए, हर एकेला व्यक्ति जो परमेश्वर के कार्य को इसके अंतिम चरण में स्वीकार करता है वह परमेश्वर द्वारा शुद्ध किए जाने की वस्तु है। दूसरे शब्दों में, हर कोई जो परमेश्वर के कार्य को इसके अंतिम चरण में स्वीकार करता है वही परमेश्वर के न्याय की वस्तु है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है")।

"आज का विजय कार्य उस सम्पूर्ण साक्ष्य और उस सम्पूर्ण प्रताप को पुनः प्राप्त करने, और सभी मनुष्यों से परमेश्वर की आराधना करवाने के लिए है, जिससे सृष्ट वस्तुओं में साक्ष्य हो। कार्य के इस पड़ाव में यही किए जाने की आवश्यकता है। मनुष्यजाति को किस प्रकार जीता जाए? मनुष्य को सम्पूर्ण रीति से कायल करने के लिए यह वचनों के इस कार्य का प्रयोग कया जायेगा; उसे पूर्णत: अधीन बनाने के लिए, न्याय, ताड़ना, निर्दयी श्राप और प्रकटीकरण का प्रयोग किया जायेगा; और मनुष्य के विद्रोहीपन को ज़ाहिर करने और उसके विरोध का न्याय करने के द्वारा किया जाएगा; जिससे वह मानवता की अधार्मिकता और अशुद्धता को जान सके, जिसका प्रयोग परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की विशिष्टता दर्शाने के लिए किया जाएगा। मुख्यतः, यह इन वचनों का प्रयोग होगा, जो मनुष्य को जीतते और उसे पूर्णत: कायल करते हैं। शब्द मनुष्यजाति को अन्तिम रूप से जीत लेने के साधन हैं, और वे सभी जो इस जीत लिए जाने को स्वीकार करते हैं, उन्हें इन वचनों के प्रहार और न्याय को भी स्वीकार करना आवश्यक है। बोलने की वर्तमान प्रक्रिया, जीतने की प्रक्रिया है। लोगों को किस प्रकार उपयुक्त सहयोग देना चाहिए? इन वचनों को प्रभावशाली रीति से खाने और पीने से और उन्हें समझने के द्वारा। लोगों को उन्हीं के द्वारा जीता नहीं जा सकता। उन्हें, इन वचनों को खाने और पीने के द्वारा, अपनी भ्रष्टता और अशुद्धता, अपने विद्रोहीपन और अधार्मिकता को जानना है, और परमेश्वर के समक्ष दण्डवत हो जाना है। यदि तुम परमेश्वर की इच्छा को समझ सकते हो और इसे अभ्यास में ला सकते हो, और आगे, दर्शन प्राप्त कर सकते हो, और यदि तुम इन वचनों का पूरी तरह से पालन कर सकते और अपनी ओर से कोई चुनाव नहीं करते हो, तब तुम्हें जीत लिया जाएगा। और ये वह शब्द होंगे, जिन्होंने तुम्हें जीता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (1)")।

"इस युग में परमेश्वर सब मनुष्यों को नियंत्रित करने के लिए मुख्य रूप से वचन का उपयोग करता है। परमेश्वर के वचन के द्वारा मनुष्य परखा, और पूर्ण बनाया जाता है, और तब अंत में राज्य में ले जाया जाता है। केवल परमेश्वर का वचन मनुष्यों को जीवन दे सकता है, और केवल परमेश्वर का वचन ही मनुष्यों को ज्योति और अमल करने का मार्ग दे सकता है विशेषकर राज्य के युग में। जब तब तुम परमेश्वर के वचन को खाते-पीते हो, और परमेश्वर के वचन की वास्तविकता को नहीं छोड़ते, परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाने का कार्य कर पाएगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "राज्य का युग वचन का युग है")।

"अब कुंजी है जीवन पर ध्यान केंद्रित करना, मेरे वचनों को अधिक खाना-पीना, मेरे वचनों का अनुभव करना, मेरे वचनों को जानना, मेरे वचनों को असल में अपना जीवन बनाना—यही मुख्य बात है। क्या किसी ऐसे व्यक्ति का जीवन परिपक्व हो सकता है जो परमेश्वर के वचनों के अनुसार नहीं जी सकता है? नहीं, यह नहीं हो सकता है। तुम्हें हर समय मेरे वचनों के अनुसार जीना चाहिए। जीवन में, मेरे वचन तुम्हारी आचार-संहिता अवश्य बनने चाहिए। वे तुम्हें यह महसूस कराएँगे कि एक निश्चित तरीके से चीज़ों को करने से ही परमेश्वर आनंदित होता है, और अन्य तरीके से करने से परमेश्वर नफ़रत करता है; धीर-धीरे तुम सही मार्ग पर चलने लगोगे" (आरंभ में मसीह के कथन और गवाहियाँ)।

"यदि कोई सचमुच परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मामलों और वचनों से परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर सकता है, तो वह परमेश्वर द्वारा सिद्ध किया गया एक व्यक्ति होगा। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर का कार्य और उसके वचन इस व्यक्ति के लिए पूरी तरह से प्रभावी हैं, कि परमेश्वर के वचन उसका जीवन बन जाते हैं, वह सच्चाई को प्राप्त करता है, और वह परमेश्वर के वचनों के अनुसार जी सकता है। इसके बाद, उसके देह की प्रकृति, अर्थात, उसके मूल अस्तित्व की नींव, हिलकर ढह जाएगी। जब परमेश्वर के वचन किसी का जीवन बन जाते हैं, तो उसके बाद वह एक नया व्यक्ति बन जाता है। परमेश्वर के वचन उसका जीवन बन जाते हैं; परमेश्वर के कार्य का दर्शन, मनुष्य से उसकी अपेक्षाएँ, मनुष्य का उसका प्रकाशन, और एक सच्चे जीवन के वे मानक जो परमेश्वर अपेक्षा करता है कि मनुष्य प्राप्त करे, उसका जीवन बन जाते हैं—वह इन वचनों और सच्चाइयों के अनुसार जीता है, और यह व्यक्ति परमेश्वर के वचनों द्वारा सिद्ध बन जाता है। परमेश्वर के वचनों के माध्यम से वह पुनर्जन्म का अनुभव करता है और एक नया इंसान बन जाता है" (मसीह की बातचीतों के अभिलेख)।

सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों से हम देख सकते हैं कि अंत के दिनों में परमेश्‍वर का कार्य, वचन का कार्य है। परमेश्‍वर मनुष्‍य का न्याय करने, उसे शुद्ध करने और पूर्ण बनाने के लिए वचन का इस्‍तेमाल करते हैं। अगर हम अनन्‍त जीवन का मार्ग पाने के इच्‍छुक हैं, तो हमें निश्चित रूप से मसीह के आसन के सामने अंत के दिनों के न्याय और ताड़ना को स्‍वीकारना और उसका पालन करना होगा। परमेश्‍वर के वचनों को आत्मसात करते हुए, और उनके वचनों के न्याय और ताड़ना को स्‍वीकार करते हुए, हम सत्‍य को समझते हैं, हमें परमेश्‍वर के धार्मिक स्वभाव को जानने का मौका मिलता है और दिल में परमेश्‍वर के प्रति सच्‍चा भय पैदा होता है, फिर सत्य को समझने के लिए परमेश्‍वर के वचनों का अनुभव करना और उन वचनों की वास्‍तविकता के अनुसार जीना ही अनन्‍त जीवन को पाने का एकमात्र मार्ग है। अब हम सब जानते हैं कि सिर्फ़ अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर द्वारा व्‍यक्‍त वचन ही मनुष्‍य को शुद्ध कर सकते हैं, बचा सकते हैं और उसे पूर्ण बना सकते हैं। अगर हम अनन्‍त जीवन के मार्ग को पाना चाहते हैं, तो हमें सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों को आत्मसात करने और उन्हें महसूस करने की ज़रूरत है, क्‍योंकि हमारे अंदर शैतान का भ्रष्‍टाचार काफी गहरी पैठ बनाये हुए है। हम पाप में जीते हैं, अपने भविष्‍य और तकदीर को सुरक्षित करने के लिए आँखें मूंदकर काम करते हैं। हम अच्‍छाई और बुराई का अंतर नहीं जानते, हमें अपनी प्रकृति का सार और अपने भ्रष्‍टाचार की सच्चाई भी नहीं मालूम। हम परमेश्‍वर की इच्‍छा को समझ नहीं पाते और हमें परमेश्‍वर का कोई ज्ञान नहीं है, न ही हम यह समझते हैं कि परमेश्‍वर को क्‍या पसंद और क्‍या नासपंद है। हम शैतान के दुष्ट सार को भी नहीं समझ पाते हैं। हम अपनी शैतानी प्रकृति के अनुसार जीते हैं, हम शोहरत और दौलत की कामना करते हैं, साज़िशें रचते हैं, ताकत और दुष्‍टता की तारीफ़ करते हैं, हम स्‍याह को सफ़ेद करते हैं, अपने लालच और लालसा में लिप्‍त रहते हैं, वगैरह वगैरह। हम वास्‍तविक मानवीय गुणों के बगैर, शैतान की राक्षसी छवियों में जीवन यापन करते हैं। सिर्फ़ परमेश्‍वर ही सत्‍य, मार्ग और जीवन हैं। परमेश्‍वर के द्वारा व्‍यक्‍त किये गए सत्य परमेश्‍वर के स्वभाव और उनके अस्तित्‍व का प्रकटीकरण हैं। मानव के लिए न्याय, ताड़ना, परीक्षण और शुद्धिकरण ही सत्य है। परमेश्‍वर के वचनों से पहले, हम परमेश्‍वर के धार्मिक स्वभाव के आगमन की अनुभूति कर सकते हैं। ठीक उसी तरह जैसे हम जब परमेश्‍वर का प्रकटन देखते हैं तो हमारा हृदय परमेश्‍वर के भय से भर जाता है। हम महसूस करते हैं कि हम निम्‍न, गंदे और छोटे हैं। हम शैतान के द्वारा हमें भ्रष्‍ट किए जाने के सत्य को देखते हैं और यह जानते हैं कि परमेश्‍वर की की अपेक्षाओं पर खरा उतरने से हम कितनी दूर हैं। फिर जब हम व्‍यवहार के ज़रिये और ज्‍़यादा सत्‍य को समझने के नज़दीक आते हैं, तब हम परमेश्‍वर के हृदय के प्रतिकूल अपने कृत्‍यों के लिए शर्म और धिक्कार महसूस करते हैं। सत्‍य एक परीक्षा की तरह कार्य करता है, हम जो काम करते हैं और जिन रास्‍तों पर हम चलते हैं, उनमें सत्‍य एक मार्गदर्शक का काम करता है जो हमारे बोलने और कार्य करने का सिद्धांत बन जाता है। जब ऐसा होता है तो सत्य हमारा जीवन बन जाता है। हम देख सकते हैं कि सत्‍य लोगों को बदल सकता है। यह उनके स्वभाव में परिवर्तन लाकर उन्हें पूर्ण करता है। सत्य मनुष्‍य के अस्तित्‍व के लिए काफ़ी मूल्यवान और महत्वपूर्ण होता है। इसलिए अगर हम अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के द्वारा व्‍यक्‍त किये गए सत्‍य को जीवन की तरह स्‍वीकार करते हैं, तो हम अपने जीवन स्वभाव में परिवर्तन ला सकते हैं, फिर हम मानवता और सत्‍य के साथ रहने वाले लोगों जैसा बन सकते हैं। इस तरह, हम वे लोग हैं जिन्‍हें परमेश्‍वर ने पूर्ण किया और जिन्होंने सत्य को पाया है, हम वे लोग हैं जो शैतान के अंधकारमय असर से बच निकले हैं और परमेश्‍वर की शरण में पहुंच गये हैं, हम वे लोग हैं जो परमेश्‍वर का आज्ञा पालन करते हैं, उनसे प्रेम करते हैं और परमेश्‍वर की इच्‍छा का पालन करते हुए हम उनके अनुरूप हो गए हैं। और हम वे लोग हैं जो अनन्‍त जीवन का मार्ग पा चुके हैं।

"सिंहासन से बहता है जीवन जल" फ़िल्म की स्क्रिप्ट से लिया गया अंश

पिछला:प्रश्न 3: आप कहते हैं कि सिर्फ़ परमेश्‍वर की इच्छा का पालन करने वाले अनन्‍त जीवन का मार्ग पाते हैं। जब हमने प्रभु में विश्वास करना शुरू किया था, तो हमने प्रभु का सुसमाचार फैलाने के लिए काफी कष्ट सहा और इसकी कीमत चुकाई। हम प्रभु के झुंड के चरवाहे बने, क्रूस उठाया और प्रभु का अनुसरण किया, हमने नम्रता, धैर्य और सहिष्णुता का पालन किया। क्या आप ये कह रहे हैं कि हम परमेश्‍वर की इच्छा का पालन नहीं कर रहे हैं? हम जानते हैं कि अगर हम इसे जारी रखते हैं, तो हम पवित्र हो जायेंगे और स्वर्ग के राज्य में स्वर्गारोहित किये जायेंगे। क्या आपका मतलब है कि प्रभु के वचनों को इस तरह समझना और उनको अमल में लाना गलत है?

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