प्रश्न 6: तुम्हारा कहना है कि अगर लोग पाप-मुक्त और निर्मल होना चाहते हैं, तो उन्हें सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के न्याय के कार्य को स्वीकार करना होगा। वैसे, परमेश्वर अंत के दिनों में लोगों का न्याय और उन्हें निर्मल कैसे करते हैं? इतने सालों से मैं परमेश्वर में विश्वास करता आ रहा हूं, तो मैं सोच रहा था कि कितना अच्छा हो, अगर कभी ऐसा समय आए जब लोग पाप करना ही छोड़ दें। तब मुझे लगा जीवन परेशानियों से मुक्त होगा!

उत्तर: जहां तक इस बात का सवाल है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर अंत के दिनों में किस तरह लोगों का न्याय करते हैं और उन्हें निर्मल करते हैं, तो आइये, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कुछ वचनों को पढ़ते हैं! सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "निस्संदेह इस समय जब परमेश्वर देहधारी हुआ है, तो उसका कार्य, प्राथमिक रूप में ताड़ना और न्याय के द्वारा, अपने स्वभाव को व्यक्त करना है। इसे नींव के रूप में उपयोग करके वह मनुष्य तक अधिक सत्य को पहुँचाता है, अभ्यास करने के और अधिक मार्ग दिखाता है, और इस प्रकार मनुष्य को जीतने और मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से बचाने के अपने उद्देश्य को प्राप्त करता है। राज्य के युग में परमेश्वर के कार्य के पीछे यही निहित है" ("वचन देह में प्रकट होता है" के लिए प्रस्तावना)।

"अंत के दिनों में, मसीह मनुष्य को सिखाने के लिए विभिन्न प्रकार की सच्चाइयों का उपयोग करता है, मनुष्य के सार को उजागर करता है, और उसके वचनों और कर्मों का विश्लेषण करता है। इन वचनों में विभिन्न सच्चाइयों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहिए, हर व्यक्ति जो परमेश्वर के कार्य को मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मानवता से, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धि और उसके स्वभाव इत्यादि को जीना चाहिए। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर निर्देशित हैं। खासतौर पर, वे वचन जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार से परमेश्वर का तिरस्कार करता है इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार से मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरूद्ध दुश्मन की शक्ति है। अपने न्याय का कार्य करने में, परमेश्वर केवल कुछ वचनों से ही मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता है; वह लम्बे समय तक इसे उजागर करता है, इससे निपटता है, और इसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने की इन विधियों, निपटने, और काट-छाँट को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसे मनुष्य बिल्कुल भी धारण नहीं करता है। केवल इस तरीके की विधियाँ ही न्याय समझी जाती हैं; केवल इसी तरह के न्याय के माध्यम से ही मनुष्य को वश में किया जा सकता है और परमेश्वर के प्रति समर्पण में पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इसके अलावा मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य जिस चीज़ को उत्पन्न करता है वह है परमेश्वर के असली चेहरे और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता के सत्य के बारे में मनुष्य में समझ। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा की, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य की, और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त करने देता है जो उसके लिए अबोधगम्य हैं। यह मनुष्य को उसके भ्रष्ट सार तथा उसकी भ्रष्टता के मूल को पहचानने और जानने, साथ ही मनुष्य की कुरूपता को खोजने देता है। ये सभी प्रभाव न्याय के कार्य के द्वारा निष्पादित होते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है जिनका उस पर विश्वास है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया गया न्याय का कार्य है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है")।

"न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से, मनुष्य अपने भीतर के गन्दे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह से जान जाएगा, और वह पूरी तरह से बदलने और स्वच्छ होने में समर्थ हो जाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने वापस लौटने में समर्थ हो सकता है। वह सब कार्य जिसे आज किया गया है वह इसलिए है ताकि मनुष्य को स्वच्छ और परिवर्तित किया जा सके; वचन के द्वारा न्याय और ताड़ना के और साथ ही शुद्धिकरण के माध्यम से, मनुष्य अपनी भ्रष्टता को दूर फेंक सकता है और उसे शुद्ध किया जा सकता है। इस चरण के कार्य को उद्धार का कार्य मानने के बजाए, कहना कहीं अधिक उचित होगा कि यह शुद्ध करने का कार्य है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "देहधारण का रहस्य (4)")।

"परमेश्वर न्याय और ताड़ना का कार्य करता है ताकि मनुष्य उसे जाने, और उसकी गवाही को जाने। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव पर परमेश्वर के न्याय के बिना, मनुष्य परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को नहीं जानेगा जो कोई भी अपराध की अनुमति नहीं देता है, और परमेश्वर के बारे में अपनी पुरानी जानकारी को नई जानकारी में बदल नहीं सकता है। परमेश्वर की गवाही के लिए, और परमेश्वर के प्रबंधन की ख़ातिर, परमेश्वर अपनी सम्पूर्णता को सार्वजनिक बनाता है, इस प्रकार से मनुष्य को परमेश्वर का ज्ञान हासिल करने, अपने स्वभाव को बदलने, और परमेश्वर के सार्वजनिक प्रकटन के माध्यम से परमेश्वर की गवाही देने में सक्षम बनाता है। मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन परमेश्वर के विभिन्न कार्यों के द्वारा प्राप्त होता है; मनुष्य के स्वभाव में इस प्रकार के परिवर्तन के बिना, मनुष्य परमेश्वर की गवाही देने में असमर्थ होगा, और परमेश्वर के हृदय के अनुसार नहीं बन सकता है। मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन दर्शाता है कि मनुष्य ने स्वयं को शैतान के बंधनों से मुक्त करा लिया है, अंधकार के प्रभाव से मुक्त कर लिया है और परमेश्वर के कार्य के लिए वास्तव में एक मॉडल और नमूना बन गया है, सचमुच परमेश्वर के लिए गवाह बन गया है और परमेश्वर के हृदय के अनुसार व्यक्ति बन गया है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "केवल वही जो परमेश्वर को जानते हैं, उसकी गवाही दे सकते हैं")।

परमेश्वर अंत के दिनों में व्यक्त सत्‍य, दूषित लोगों का न्याय करने और उन्हें ताड़ना देने के लिये प्रयोग करते हैं। उनके न्याय के हर वचन में उनका धर्मी स्वभाव व्यक्त होता है और जो वे हैं और जो उनके पास है; वो सारे वचन इंसान का जीवन हो सकते हैं। इसलिये वो सच्चाई हैं। सत्‍य के ये वचन दूषित इंसान के लिये न्याय हैं। वे उनके लिये ताड़ना, तिरस्कार, निगरानी और शुद्धिकरण हैं। परमेश्वर अपने सच्चे वचनों का प्रयोग दूषित इंसान के शैतानी स्वभाव को निर्मल बनाने के लिये करते हैं, और उनकी प्रकृति और सार की समस्या को: यानी परमेश्वर के विरोध को दूर करने के लिये करते हैं। इंसान को निर्मल करने, बचाने और पूर्ण बनाने के लिये परमेश्‍वर के अपने न्याय कार्य के प्रयोग का यही महत्व है। अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने अपने न्याय के कार्य में, जो वचन कहे, वे उनके 6,000 साल की प्रबंधन योजना के रहस्यों को उजागर करते हैं। वे साफ़ तौर पर परमेश्वर के उद्धार कार्य के तीन चरणों के मकसद और हर चरण के सार को प्रकट करते हैं, खासतौर से उस पथ को जिस पर चलकर विश्वासीजन अपने स्वभाव को बदल सकें और निर्मल हो सकें। साथ ही, सर्वशक्तिमान परमेश्वर शैतान द्वारा दूषित किये गए इंसान के स्वभाव को, उसके भ्रष्ट सत्य को और उसके पापों की जड़ को उजागर करते हैं। इसके कारण लोग खुद को देखकर ये अहसास कर सकते हैं कि उनका पूरा स्वभाव शैतानी है। वे देखते हैं कि वे पूरी तरह एक राक्षसी, शैतानी जीवन जीते हैं। इससे वे सच्चे मन से पश्चाताप कर पाते हैं, वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर की ताड़ना, न्याय, परीक्षण और शुद्धिकरण को स्वीकार करने को तैयार हो जाते हैं। और फिर वे परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन में सत्‍य का पालन करते हैं और अपने स्वभाव में बदलाव लाते हैं। धीरे-धीरे, वे खुद को अपने दूषित शैतानी स्वभाव के नियंत्रण और पाबंदियों से आज़ाद कर पाते हैं। आगे चलकर, वे शैतान से विद्रोह कर पाते हैं, बुराई को छोड़कर परमेश्वर के पास लौट पाते हैं। इसके कारण लोग अपने पापी स्वभाव को जड़ से समाप्त कर पाते हैं।

इसके अलावा, परमेश्वर के वचनों के अनुभव और अभ्यास से, अनजाने में ही उन्हें बहुत-सी सच्चाइयाँ समझ में आने लगती हैं। मिसाल के तौर पर: बचाए जाने का क्या मतलब है? सम्पूर्ण उद्धार क्या है? परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने का क्या मतलब है? अपनी इच्छाओं के मुताबिक चलने का क्या मतलब है? परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने का क्या मतलब है? इंसानों की आज्ञा का पालन करने का क्या मतलब है? फरीसी कौन हैं? परमेश्वर किन्हें बचाते हैं और किन्हें त्यागते हैं? लोगों के लिये सबसे ज़्यादा अहम बात है कि वे वास्तव में परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना में उनकी धार्मिकता और उनके अलंघनीय स्वभाव का अनुभव लें। परमेश्वर को जानकर, ये लोग धीरे-धीरे उनकी आराधना करते हैं और बुराई से दूर रहते हैं। वे परमेश्वर के वचनों के अनुसार अपना जीवन जीते हैं। जैसे-जैसे वे सत्‍य को समझने लगते हैं, उन्हें परमेश्वर का गहरा ज्ञान होने लगता है। वे परमेश्वर की आज्ञा मानने लगते हैं, और सत्‍य पर ज़्यादा से ज़्यादा अमल करते हैं। और अनजाने में ही वे पापों से मुक्त और पवित्र होने लगते हैं। जो इंसान अनुग्रह के युग में परमेश्वर पर विश्वास करता है, लेकिन परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार नहीं करता है, वो इस अंतिम परिणाम को हासिल नहीं कर सकता। इसलिये, केवल वे ही लोग जो अंत के दिनों में वचनों से सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्याय और ताडना को स्वीकार करते हैं, वे सत्‍य को और परमेश्वर को समझ पाएंगे और पूरी तरह से शैतानी प्रभाव और दूषित स्वभाव से आज़ाद हो पाएंगे। वो सच्चाई और परमेश्वर के वचनों के अनुसार जी पाएंगे। सम्पूर्ण उद्धार का यही मतलब है।

"मर्मभेदी यादें" फ़िल्म की स्क्रिप्ट से लिया गया अंश

पिछला: प्रश्न 4: लोग पापी होते हैं लेकिन प्रभु यीशु को अपने पाप अर्पित करना हमेशा कारगर सिद्ध होता है। अगर हम प्रभु यीशु के सामने अपने पाप स्वीकार कर लें तो वो हमें क्षमा कर देंगे। हम प्रभु की नज़रों में पापरहित हैं, इसलिये हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश पा सकते हैं!

अगला: प्रश्न 7: अगर हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्याय के कार्य को स्वीकार न करें, तो क्या हम वाकई स्वर्ग के पिता की इच्छा को पूरा कर सकते हैं? क्या हम वाकई स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं?

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