प्रश्न 5: आपने गवाही दी कि परमेश्‍वर मनुष्य के पुत्र के रूप में पुनः देहधारी हुए हैं और परमेश्‍वर के आवास से आरंभ करते हुए अपना न्याय कार्य करते हैं। यह बाइबल की भविष्यवाणी से पूरी तरह मेल खाता है। पर मुझे एक बात समझ नहीं आई: क्या परमेश्‍वर के आवास से शुरू होने वाला न्याय वही है जो प्रकाशितवाक्‍य की पुस्तक में महान श्वेत सिंहासन के न्याय के रूप में बताया गया है? हमें यह लगता है कि महान श्वेत सिंहासन का न्याय उन अविश्वासियों पर लक्षित है जो दुष्ट शैतान से संबंध रखते हैं। जब प्रभु आएंगे, तब विश्वासियों को स्वर्ग को ले जाया जायेगा। और तब वे अविश्वासियों को नष्ट करने के लिए आपदाएं भेजेंगे। यही महान श्वेत सिंहासन के समक्ष का न्याय है। आप अंत के दिनों में परमेश्‍वर के न्याय की शुरूआत की गवाही देते हैं, पर हमने परमेश्‍वर को अविश्वासियों को नष्ट करने के लिए आपदाएं भेजते नहीं देखा है। तो यह महान श्वेत सिंहासन का न्याय कैसे हो सकता है? अंत के दिनों में परमेश्‍वर का न्याय आखिर है क्या? कृपया हमें यह बात और साफ़ तरीके से बताएं।

उत्तर: बाइबल को सच में समझने वाले सभी लोग जानते हैं, कि प्रकाशितवाक्‍य की पुस्तक में महान श्वेत सिंहासन के न्याय की जो भविष्यवाणी की गई है वह अंत के दिनों के परमेश्‍वर के न्याय के कार्य का दर्शन है। देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर सत्य व्यक्त करने और अंत के दिनों में अपना न्याय कार्य करने के लिए और, भ्रष्ट मानवजाति को स्वच्छ करने एवं बचाने के लिए आए। इसका अर्थ है कि महान श्वेत सिंहासन का न्याय पहले ही आरंभ हो चुका है। न्याय परमेश्‍वर के आवास से ही आरंभ होना चाहिए। परमेश्‍वर आपदा से पहले सर्वप्रथम विजेताओं का एक समूह बनाएंगे। उसके बाद, परमेश्‍वर विशाल आपदाएं लाएंगे और जब तक यह शैतानी युग ख़त्म न हो जाए, अच्छों को पुरस्कृत और दुष्टों को दंडित करेंगे। तब जाकर अंत के दिनों का परमेश्‍वर का महान श्वेत सिंहासन का न्याय पूरी तरह से पूर्ण हो जाएगा। तब परमेश्‍वर एक नए युग के आरंभ के लिए खुल कर प्रकट होंगे। हम सभी अब इसे बेहद साफ़ तरीके से देख सकते हैं। विशाल आपदाओं के लक्षण - लगातार चार रक्तिमचंद्रमा - पहले ही दिख चुके हैं। विशाल आपदाएं निकट हैं। जब विशाल आपदाएं आएंगी, तो कोई भी जो परमेश्‍वर का प्रतिरोध, उनका आकलन या विरोध करता हो, और दुष्ट शैतान का समूह, आपदा में नष्ट हो जाएंगे। क्या यही ठीक-ठीक महान श्वेत सिंहासन का न्याय नहीं है? हम बाइबल की भविष्यवाणियों से देख सकते हैं कि प्रभु की वापसी दो चरणों में विभक्त है, गुप्त आगमन एवं प्रकट आगमन। सबसे पहले, प्रभु किसी चोर की तरह आते हैं, यानी देहधारी परमेश्‍वर सत्य व्यक्त करने एवं अंत के दिनों में अपना न्याय कार्य करने के लिए गुप्त रूप से आते हैं। जिसका मुख्य उद्देश्य विजेताओं के एक समूह को पूर्ण करना है। इससे "परमेश्‍वर के आवास से न्याय का आरंभ होता है" की भविष्यवाणी पूरी होती है। अंत के दिनों में परमेश्‍वर का न्याय कार्य तभी आरंभ हो गया था जब देहधारी परमेश्‍वर सत्य व्यक्त करने और संपूर्ण मानवजाति का न्याय करने के लिए गुप्त रूप से आये थे। कार्य का पहला भाग परमेश्‍वर के आवास से न्याय आरंभ करना है। इससे, जो उनकी वाणी सुनते हैं और उनके सामने लाए जाते हैं, परमेश्‍वर उन्हें शुद्ध करते और बचाते हैं, और वे उन्हें विजेता बनाते हैं। इसके बाद परमेश्‍वर का महान कार्य पूर्ण होता है और विशाल आपदाएं आरंभ हो जाती हैं। इस पुराने विश्व को दंडित और नष्ट करने के लिए परमेश्‍वर आपदाओं का उपयोग करेंगे। और इस प्रकार अंत के दिनों में परमेश्‍वर का न्याय कार्य अपने चरम पर पहुँचता है। जब परमेश्‍वर ख़ुले तौर पर बादलों पर प्रकट होंगे, तो उनका न्याय कार्य पूरी तरह से पूर्ण हो जाएगा। उसके बाद परमेश्‍वर का राज्य प्रकट होगा। इस प्रकार नए यरुशलेम के स्वर्ग से उतरने की भविष्यवाणी पूरी होगी। जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर कहते हैं: "परमेश्वर के कार्य का एक पहलू समस्त मानवजाति पर विजय प्राप्त करना और चुने हुए लोगों को अपने वचनों के माध्यम से प्राप्त करना है। एक अन्य पहलू है विभिन्न आपदाओं के माध्यम से विद्रोह के सभी पुत्रों को जीतना। यह परमेश्वर के बड़े-पैमाने के कार्य का एक हिस्सा है। केवल इसी तरीके से पृथ्वी पर वह राज्य जिसे परमेश्वर चाहता है, पूरी तरह से प्राप्त किया जा सकता है, और यह परमेश्वर के कार्य का हिस्सा है जो कि शुद्ध सोने की तरह है" ("वचन देह में प्रकट होता है में सम्पुर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या के "अध्याय 17" से)। सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचन अंत के दिनों के उसके न्याय के कार्य का सटीकता से खुलासा करते हैं। हम उसे बहुत आसानी से समझ सकते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर का अंत के दिनों का न्याय प्रकाशितवाक्य की पुस्तक की जिसकी भविष्‍यवाणी की गई थी वह महान श्वेत सिंहासन का न्याय है। सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के अंत के दिनों के न्याय कार्य के अनुसार, मृतक के न्याय के लिए पुस्तकों को खोलने और जीवन की पुस्तक खोलने के बारे में प्रकाशित भविष्‍यवाणी क्या है, हम यह भी समझ सकते हैं। वस्तुतः, मृतक के न्याय के लिए पुस्तकों को खोला जाना परमेश्‍वर द्वारा उन सभी का न्याय है जो उनका इनकार और विरोध करते हैं। यह न्याय उनकी निंदा, उनका दंड, उनका विनाश है। और जीवन की पुस्तक का खोला जाना उस न्याय को दर्शाता है जो परमेश्‍वर के आवास से आरंभ होता है, यानी, अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर, उन सभी का न्याय करने और उन्हें शुद्ध करने के लिए सत्य व्यक्त करते हैं जो उनके सिंहासन के समक्ष लाए जाते हैं। परमेश्‍वर के ये सभी चुने हुए लोग जो सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के न्याय को स्वीकार करते हैं और उनके समक्ष लाए जाते हैं सभी परमेश्‍वर के न्याय, शुद्धि व उद्धार की विषय हैं। परमेश्‍वर के आवास पर जो न्याय आरंभ होता है वह लोगों के इस समूह को विपत्ति से पहले पूर्ण करने के लिए है। सिर्फ इसी समूह के लोग बुद्धिमान कुंवारियां हैं, ऐसे लोग हैं जिनके नाम जीवन की पुस्तक में दर्ज हैं, वे 144,000 विजेता जिनके बारे में प्रकाशितवाक्‍य की पुस्‍तक में भविष्‍यवाणी की गई थी, वे ऐसे लोग हैं जो अंततः शाश्वत जीवन का उत्तराधिकारी बनने के लिए स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेंगे। इससे प्रकाशितवाक्य 14:1-5 का भविष्यत्कथन पूर्ण होता हैः "फिर मैं ने दृष्‍टि की, और देखो, वह मेम्ना सिय्योन पहाड़ पर खड़ा है, और उसके साथ एक लाख चौवालीस हज़ार जन हैं, जिनके माथे पर उसका और उसके पिता का नाम लिखा हुआ है। और स्वर्ग से मुझे एक ऐसा शब्द सुनाई दिया जो जल की बहुत धाराओं और बड़े गर्जन का सा शब्द था, और जो शब्द मैं ने सुना वह ऐसा था मानो वीणा बजानेवाले वीणा बजा रहे हों। वे सिंहासन के सामने और चारों प्राणियों और प्राचीनों के सामने एक नया गीत गा रहे थे। उन एक लाख चौवालीस हज़ार जनों को छोड़, जो पृथ्वी पर से मोल लिये गए थे, कोई वह गीत न सीख सकता था। ये वे हैं जो स्त्रियों के साथ अशुद्ध नहीं हुए, पर कुँवारे हैं; ये वे ही हैं कि जहाँ कहीं मेम्ना जाता है, वे उसके पीछे हो लेते हैं; ये तो परमेश्‍वर के निमित्त पहले फल होने के लिये मनुष्यों में से मोल लिए गए हैं। उनके मुँह से कभी झूठ न निकला था, वे निर्दोष हैं।"

सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के अंत के दिनों का न्याय कार्य प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में भविष्यत्कथन किए गए महान श्वेत सिंहासन के न्याय के दर्शन को पूरी तरह से पूर्ण करता है। महान श्वेत सिंहासन परमेश्‍वर की पवित्रता और साथ ही उनके अधिकार का प्रतीक है। तो फिर हम किस तरह से परमेश्‍वर के अधिकार को जान सकते हैं? यह हम सब जानते हैं। परमेश्‍वर ने स्वर्ग व पृथ्वी व समस्त वस्तुओं की अपने वचन से रचना की। वे मनुष्यजाति का मार्गदर्शन करने, उसे शुद्ध करने और बचाने, सब कुछ सम्पादित करने के लिए, अपने वचन का उपयोग करते हैं। परमात्मा का वचन उसके अधिकार का प्रतिनिधित्व करता है। जो परमेश्‍वर कहेंगे वह हो जाएगा, वे जो आदेश करेंगे वह स्थिर रहेगा। परमेश्‍वर अपने वचन जैसे ही अच्‍छे हैं, और उनके वचन सम्पादित होंगे, तथा जो सम्पादित होता है वह सदा रहता है। सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के अंत के दिनों का कार्य, वचन का कार्य है। परमेश्‍वर संपूर्ण विश्व को नियंत्रित करने, समस्त मानवजाति को नियंत्रित करने के लिए अपने वचन का उपयोग करते हैं। वे मनुष्य जाति का मार्गदर्शन करने, आपूर्ति करने के लिए अपने वचनों का उपयोग करते हैं, और अब मनुष्यजाति का न्याय करने तथा उसे शुद्ध करने के लिए अपने वचनों का उपयोग कर रहे हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "मेरी इच्छा है कि मैं पूरी दुनिया से लोगों को कनान की धरती पर लेकर आऊं, अत: मैं पूरे विश्व को नियंत्रित करने के लिए कनान में कथन जारी करता रहता हूं। इस समय, कनान को छोड़कर, पूरी धरती पर रोशनी नहीं है, और सभी लोग भूख और शीत से संकट में हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "सात गर्जनाएँ—भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य के सुसमाचार पूरे ब्रह्माण्ड में फैल जाएंगे" से)। "और इसलिए, अंत में दिनों में जब परमेश्वर देहधारी होता है, तो सब कुछ सम्पन्न करने, और सब कुछ स्पष्ट करने के लिए वह मुख्य रूप से वचन का उपयोग करता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है" से)। "परमेश्वर के मुँह के वचनों से सभी दुष्ट लोगों को ताड़ित किया जाएगा, और सभी धर्मी लोग उसके मुँह के वचनों से धन्य हो जाएँगे, और उसके मुँह के वचनों द्वारा स्थापित और पूर्ण किए जाएँगे। ना ही वह कोई चिह्न या चमत्कार दिखाएगा; सब कुछ उसके वचनों के द्वारा पूर्ण हो जाएगा, और उसके वचन तथ्यों को उत्पन्न करेंगे। पृथ्वी पर हर कोई परमेश्वर के वचनों का उत्सव मनाएगा, चाहे वे वयस्क हों या बच्चे, पुरुष, स्त्री, वृद्ध या युवा हों, सभी लोग परमेश्वर के वचनों के नीचे झुक जाएँगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "सहस्राब्दि राज्य आ चुका है" से)। सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचन की अभिव्यक्ति उस चमकती बिजली की तरह है जो पूर्व से सीधे पश्चिम को जाती है। यह उन सभी को शुद्ध और पूर्ण करती है जो परमेश्‍वर के सिंहासन के सम्मुख वापस आते हैं, व उन पाखंडी फरीसियों को उजागर करती है जो सत्य से घृणा करते हैं। और साथ ही उन सभी दुष्ट लोगों को भी जो परमेश्‍वर का इनकार और विरोध करते हैं। साथ ही, यह सभी अवज्ञाकारी पुत्रों को नष्ट कर देती है। अंत के दिनों में पृथ्वी पर सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर का न्याय कार्य दर्शाता है कि परमेश्‍वर पहले से अपने सिंहासन पर बैठ कर शासन कर रहे हैं। हालांकि बुराई व अंधकार की यह पुरानी दुनिया फिलहाल अभी भी अस्तित्व में है, किन्तु ऐसी बड़ी विपत्तियाँ शीघ्र ही पड़ेंगी जो दुनिया को नष्ट कर देंगी। पृथ्वी पर ऐसी कोई भी शक्ति नहीं है जो परमेश्‍वर के राज्य को नष्ट कर सके, और ऐसी कोई भी शक्ति नहीं है जो परमेश्‍वर के कार्य को मिटा सके या उनके कार्य को आगे बढ़ने से रोक सके। परमेश्‍वर द्वारा पृथ्वी पर अपने न्याय का कार्य करने के लिए अपने अधिकार का उपयोग करना स्वर्ग में अपने सिंहासन के लिए उपयोग करने जैसा ही हैः यह ऐसा कुछ है जिसे कोई हिला नहीं सकता और कोई बदल नहीं सकता। यह एक तथ्य है। जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर कहते हैं, "परमेश्वर का राज्य मानवता के मध्य विस्तार पा रहा है, यह मानवता के मध्य बन रहा है, यह मानवता के मध्य खड़ा हो रहा है; ऐसी कोई भी शक्ति नहीं है जो मेरे राज्य को नष्ट कर सके" (संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन "वचन देह में प्रकट होता है" के "अध्याय 19" से)। यही परमेश्‍वर के वचन द्वारा प्रदर्शित अधिकार और शक्ति है। परमेश्‍वर के वचन का पृथ्वी पर अधिकार का उपयोग करना मसीह द्वारा पृथ्वी पर शासन करना है। यह परमेश्‍वर का पृथ्वी के अपने सिंहासन पर पहले से ही शासन करना है। यह इस बात को दर्शाने के लिए काफ़ी है कि परमेश्‍वर का राज्य पहले ही पृथ्वी पर अवतरित हो चुका है। यह ऐसा तथ्य है जिसे कोई इनकार नहीं कर सकता है। हम देखते हैं कि परमेश्‍वर की इच्छा उसी तरह पूरी तरह से पृथ्वी पर पहले ही हो जाती है जैसी यह स्वर्ग में होती है। प्रभु यीशु ने कहा था, "तेरा राज्य आए। तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो" (मत्ती 6:10)। प्रकाशितवाक्य भी ये भविष्यत्कथन हैः "जब सातवें दूत ने तुरही फूँकी, तो स्वर्ग में इस विषय के बड़े बड़े शब्द होने लगे: 'जगत का राज्य हमारे प्रभु का और उसके मसीह का हो गया, और वह युगानुयुग राज्य करेगा।' तब चौबीसों प्राचीन जो परमेश्‍वर के सामने अपने अपने सिंहासन पर बैठे थे, मुँह के बल गिरकर परमेश्‍वर को दण्डवत् करके यह कहने लगे, 'हे सर्वशक्‍तिमान प्रभु परमेश्‍वर, जो है और जो था, हम तेरा धन्यवाद करते हैं कि तू ने अपनी बड़ी सामर्थ्य को काम में लाकर राज्य किया है'" (प्रकाशितवाक्य 11:15-17)। ये वचन पहले ही वास्तविकता बन चुके हैं। ये सब सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के अंत के दिनों के न्याय के कार्य के द्वारा सम्पादित सत्य हैं।

"विजय गान" फ़िल्म की स्क्रिप्ट से लिया गया अंश

पिछला: प्रश्न 4: तब आपने कहा था कि बाइबल में सबसे ज़्यादा भविष्यवाणी जिस बात की की गई है वह अंत के दिनों में परमेश्‍वर के न्याय कार्य है। बाइबल में कम-से-कम 200 स्थानों पर यह कहा गया है कि परमेश्‍वर न्याय करने आएंगे। यह पूरी तरह सच है। यह 1 पतरस 4:17 में और भी साफ तरीके से कहा गया था: "क्योंकि वह समय आ पहुँचा है कि पहले परमेश्‍वर के लोगों का न्याय किया जाए;" ऐसा लगता है कि अंत के दिनों में परमेश्‍वर के न्याय कार्य एक निश्चितता है। लेकिन आपने जो देखा वह अंत के दिनों के परमेश्‍वर हैं जो अपना न्याय कार्य करने के लिए देहधारी हुए हैं। यह उससे अलग है जिसे हम स्वीकार करते हैं। हम मानते हैं कि अंत के दिनों में प्रभु यीशु पुनरूत्‍थान के बाद के अपने अध्यात्मिक शरीर के रूप में मानवजाति के समक्ष प्रकट होंगे और कार्य करेंगे। धार्मिक मंडलियों में अधिकांश लोगों का भी यही विचार है। लौटकर आए प्रभु के इंसानों के सामने प्रकट होने की अवधारणा और देह रूप में कार्य करने वाली बात हमें पूरी होती हुई नज़र नहीं आ रही है, इसलिए हमें इसके बारे में और बताइये।

अगला: प्रश्न 7: कई भाई-बहनों को यह लगता है कि प्रभु यीशु में हमारे विश्वास के कारण हमारे पापों को पहले ही क्षमा कर दिया गया है, और यह कि हम प्रभु की बहुत अधिक कृपा का आनंद ले चुके हैं और सभी ने प्रभु की करुणा और दया का अनुभव किया है। प्रभु यीशु पहले से ही हमें पापियों के रूप में नहीं देखते, इसलिए हमें सीधे स्वर्ग के राज्य में लाया जाना चाहिए। तो फिर ऐसा क्‍यों कि प्रभु को अभी भी अंत के दिनों के अपना न्याय कार्य करने की आवश्‍यकता है? क्‍यों वे जब आए थे तभी हमें स्वर्ग के राज्य में नहीं ले गए? परमेश्‍वर के अंत के दिनों के न्याय के कार्य मानव जाति को शुद्ध करने और बचाने के लिए हैं या दंडित और नष्ट करने के लिए? बहुत से लोग इसे समझ पाने में असमर्थ हैं। इस विषय पर कृपया खास तौर से हमारे साथ सहभागिता करें।

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