प्रश्न 6: चूंकि पौलुस ने कहा, "सम्पूर्ण पवित्र शास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है," यह गलत नहीं हो सकता। परमेश्वर मानवजाति को पौलुस की मार्फ़त बता रहे थे कि धर्मग्रंथ पूरी तरह से परमेश्वर से प्रेरित थे और पूरी तरह से परमेश्वर के वचन हैं। क्या आप इसे नकारने की हिम्मत करते हैं?

उत्तर: आपने ये जो मसला उठाया है, वह सभी के मन में है। आगे, आइए, हम संवाद करें कि पौलुस और दूसरे प्रेरितों के लिखे ये धर्मपत्र क्या वाकई परमेश्वर से प्रेरित थे और क्या ये परमेश्वर के वचन की नुमाइंदगी कर सकते हैं। उस तरह से हम जान पायेंगे कि प्रेरितों के इन धर्मपत्रों के साथ कैसे पेश आयें। हम अपना संवाद जारी रखें इससे पहले, हमें सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन के दो अंशों को पढ़ने की इजाज़त दें! सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "नए नियम में पौलुस के धर्मपत्र वे धर्मपत्र हैं, जिन्हें पौलुस ने कलीसियाओं के लिए लिखा था, और वे पवित्र आत्मा की अभिप्रेरणाएँ नहीं हैं, न ही वे पवित्र आत्मा के प्रत्यक्ष कथन हैं। वे महज प्रेरणा, सुविधा और प्रोत्साहन के वचन हैं, जिन्हें उसने अपने कार्य के दौरान कलीसियाओं के लिए लिखा था। इस प्रकार वे पौलुस के उस समय के अधिकांश कार्य के अभिलेख भी हैं। वे प्रभु में विश्वास करने वाले सभी भाई-बहनों के लिए लिखे गए थे, ताकि उस समय कलीसियाओं के भाई-बहन उसकी सलाह मानें और प्रभु यीशु द्वारा बताए गए पश्चात्ताप के मार्ग पर बने रहें। किसी भी तरह से पौलुस ने यह नहीं कहा कि, चाहे वे उस समय की कलीसियाएँ हों या भविष्य की, सभी को उसके द्वारा लिखी गई चीज़ों को खाना और पीना चाहिए, न ही उसने कहा कि उसके सभी वचन परमेश्वर से आए हैं। उस समय की कलीसियाओं की परिस्थितियों के अनुसार, उसने बस भाइयों एवं बहनों से संवाद किया था और उन्हें प्रोत्साहित किया था, और उन्हें उनके विश्वास में प्रेरित किया था, और उसने बस लोगों में प्रचार किया था या उन्हें स्मरण दिलाया था और उन्हें प्रोत्साहित किया था। उसके वचन उसके स्वयं के दायित्व पर आधारित थे, और उसने इन वचनों के जरिये लोगों को सहारा दिया था। ... यह सही है कि जो कुछ भी उसने कहा, वह लोगों के लिए शिक्षाप्रद और सकारात्मक था, किंतु वह पवित्र आत्मा के कथनों का प्रतिनिधित्व नहीं करता था, और वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था। यह एक बेहद गलत समझ और एक ज़बरदस्त ईश-निंदा है कि लोग एक मनुष्य के अनुभवों के अभिलेखों और धर्मपत्रों को पवित्र आत्मा द्वारा कलीसियाओं को बोले गए वचनों के रूप में लें! ... उसकी पहचान मात्र काम करने वाले एक प्रेरित की थी, और वह मात्र एक प्रेरित था जिसे परमेश्वर द्वारा भेजा गया था; वह नबी नहीं था, और न ही भविष्यवक्ता था। उसके लिए उसका कार्य और भाइयों एवं बहनों का जीवन अत्यधिक महत्वपूर्ण था। इस प्रकार, वह पवित्र आत्मा की ओर से नहीं बोल सकता था। उसके वचन पवित्र आत्मा के वचन नहीं थे, और उन्हें परमेश्वर के वचन तो बिलकुल भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि पौलुस परमेश्वर के एक प्राणी से बढ़कर कुछ नहीं था, और वह परमेश्वर का देहधारण तो निश्चित रूप से नहीं था। ... यदि लोग पौलुस जैसों के धर्मपत्रों या शब्दों को पवित्र आत्मा के कथनों के रूप में देखते हैं, और उनकी परमेश्वर के रूप में आराधना करते हैं, तो सिर्फ यह कहा जा सकता है कि वे बहुत ही अधिक अविवेकी हैं। और अधिक कड़े शब्दों में कहा जाए तो, क्या यह स्पष्ट रूप से ईश-निंदा नहीं है? कोई मनुष्य परमेश्वर की ओर से कैसे बात कर सकता है? और लोग उसके धर्मपत्रों के अभिलेखों और उसके द्वारा बोले गए वचनों के सामने इस तरह कैसे झुक सकते हैं, मानो वे कोई पवित्र पुस्तक या स्वर्गिक पुस्तक हों। क्या परमेश्वर के वचन किसी मनुष्य के द्वारा बस यों ही बोले जा सकते हैं? कोई मनुष्य परमेश्वर की ओर से कैसे बोल सकता है? तो, तुम क्या कहते हो—क्या वे धर्मपत्र, जिन्हें उसने कलीसियाओं के लिए लिखा था, उसके स्वयं के विचारों से दूषित नहीं हो सकते? वे मानवीय विचारों द्वारा दूषित कैसे नहीं हो सकते? ... यदि तुम कहते हो कि उसके धर्मपत्र पवित्र आत्मा के वचन हैं, तो तुम बेतुके हो, और तुम ईश-निंदा कर रहे हो! पौलुस के धर्मपत्र और नए नियम के अन्य धर्मपत्र बहुत हाल की आध्यात्मिक हस्तियों के संस्मरणों के बराबर हैं : वे वाचमैन नी की पुस्तकों या लॉरेंस आदि के अनुभवों के समतुल्य हैं। सीधी-सी बात है कि हाल ही की आध्यात्मिक हस्तियों की पुस्तकों को नए नियम में संकलित नहीं किया गया है, फिर भी इन लोगों का सार एकसमान था : वे पवित्र आत्मा द्वारा एक निश्चित अवधि के दौरान इस्तेमाल किए गए लोग थे, और वे सीधे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते थे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'बाइबल के विषय में (3)')।

हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन से समझ सकते हैं कि हालांकि प्रेरितों के धर्मपत्र काफी हद तक परमेश्वर के मकसदों के मुताबिक़ हैं, फिर भी परमेश्वर के मकसदों के मुताबिक़ होने और परमेश्वर के वचन होने में फर्क है। पतरस और पौलुस के धर्मपत्र प्रभु यीशु के फिर से जीवित होने और स्वर्ग में आरोहित होने के बाद एक-के-बाद-एक प्रकट हुए। जब इन पत्रों को कलीसियाओं में भेजा गया, तो कलीसियाओं के भाई-बहनों ने इनको किस रूप में लिया? उन्होंने कहा होगा, "ये ब्रदर पतरस के पत्र हैं, ये ब्रदर पौलुस के पत्र हैं।" उन्होंने इन पत्रों को परमेश्वर के वचनों के रूप में नहीं लिया होगा, क्योंकि इन प्रेरितों ने कभी नहीं कहा कि वे परमेश्वर हैं। उन्होंने सिर्फ यही माना कि वे शिष्य हैं, जो प्रभु यीशु का अनुसरण करते हैं। इसलिए, उस वक्त की कलीसियाओं के भाई-बहनों ने इन पत्रों और इन वचनों को अन्य भाइयों के वचनों की तरह लिया होगा। पतरस और पौलुस ने कभी नहीं कहा कि उनके वचन परमेश्वर से प्रेरित हैं या परमेश्वर के वचन हैं। यह उस वक्त का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य है। लेकिन आज, प्रेरितों के इन धर्मपत्रों और वचनों को हम परमेश्वर के वचन के रूप में लेते हैं और उन्हें परमेश्वर के वचन का दर्जा देते हैं। यह ऐतिहासिक तथ्य के विपरीत है! प्रेरितों के ये धर्मपत्र कलीसिया के प्रति उनकी जिम्मेदारियों के नतीजे थे। ये उस वक्त कलीसियाओं की मदद करने के लिए थे। उनके धर्मपत्र परमेश्वर के वचन की नुमाइंदगी नहीं कर सकते। परमेश्वर के वचन उनके अपने वचन हैं, मनुष्य के कथन उसके अपने कथन हैं। अगर हम फर्क नहीं कर सकते कि कौन-से वचन परमेश्वर के हैं और कौन-से वचन मनुष्य के, तो यह एक गंभीर समस्या है। दरअसल, बाइबल में परमेश्वर के वचन का सिर्फ एक भाग है। सिर्फ यहोवा परमेश्वर द्वारा खुद बोले गये वचन, यहोवा परमेश्वर द्वारा निर्देशित मूसा के वचन, यहोवा परमेश्वर के नबियों की मार्फ़त बताये गये वचन, और प्रभु यीशु द्वारा खुद बोले गये वचन ही वास्तव में परमेश्वर के वचन हैं। हम देख सकते हैं कि नबियों के सभी वचनों का एक ख़ास लेबल है। वे कहते हैं, "यहोवा यों कहता है।" यह इशारा है कि वे परमेश्वर के वचन बता रहे हैं और लोगों को साफ़ तौर पर यह दिखा रहे हैं कि वे परमेश्वर के मूल वचनों की नक़ल कर रहे हैं। इसलिए, नबियों द्वारा बताये गए परमेश्वर के वचन, यहोवा परमेश्वर द्वारा खुद बोले गये वचन जिन्हें दर्ज किया गया था, और प्रभु यीशु द्वारा खुद बोले गये वचन जिन्हें प्रेरितों ने दर्ज किया था, ही परमेश्वर के सच्चे वचन हैं। बाइबल में वचनों के ये भाग ही परमेश्वर के वचन हैं। इस भाग के अलावा, प्रेरितों द्वारा बोले गये बाकी सभी वचन और परमेश्वर के सेवकों द्वारा दर्ज की गयी चीज़ें, मनुष्य की गवाहियां और मनुष्य के कथन हैं।

सिर्फ एक प्रेरित के धर्मपत्र के एक वाक्य की बुनियाद पर यह कहना सही नहीं है कि बाइबल परमेश्वर की प्रेरणा से रची गयी थी, और इसमें सब परमेश्वर के वचन हैं। प्रेरितों के युग में, किसी ने भी पतरस और पौलुस के पत्रों को परमेश्वर के वचन की तरह से नहीं लिया होगा, और किसी ने भी इन प्रेरितों को मसीह नहीं समझा होगा। इन प्रेरितों ने भी कभी खुद को मसीह कहने की हिम्मत नहीं की थी। सिर्फ मसीह ही परमेश्वर और पवित्र आत्मा की नुमाइंदगी करते हैं इस तरह से, हमें इन प्रेरितों के कथनों को परमेश्वर के वचनों के रूप में नहीं लेना चाहिए। इन प्रेरितों के कथन परमेश्वर और पवित्र आत्मा की नुमाइंदगी नहीं करते। साथ ही, परमेश्वर ने कभी बाइबल की गवाही नहीं दी। प्रभु यीशु ने सिर्फ इतना कहा कि बाइबल परमेश्वर की गवाही है, लेकिन यह नहीं कहा कि बाइबल परमेश्वर की प्रेरणा से रची गयी है और इसमें पूरी तरह से परमेश्वर के वचन हैं। पवित्र आत्मा ने कभी किसी को बाइबल के बारे में ऐसी गवाही नहीं दी। सिर्फ पवित्र आत्मा और देहधारी परमेश्वर ही बाइबल की अंदरूनी कहानी के बारे में सबसे अच्छा जानते हैं। कोई भी इंसान बाइबल की अंदरूनी कहानी की थाह नहीं पा सकता। बाइबल परमेश्वर के कार्य और निजी अनुभवों और गवाहियों का दस्तावेज़ है जो परमेश्वर की सेवा करनेवाले लोगों ने लिखे थे। यह सिर्फ मनुष्य द्वारा परमेश्वर के वचनों का बताया जाना है या पवित्र आत्मा से प्रबुद्धता पाने के बाद मनुष्य द्वारा अपने खुद के अनुभवों के बयान से परमेश्वर के कार्य की गवाही है। इनमें से किसी को भी परमेश्वर ने नहीं लिखा। यह एक तथ्य है! हालांकि प्रेरितों के दस्तावेजों और धर्मपत्रों को पवित्र आत्मा ने प्रबुद्ध किया था, वे परमेश्वर के वचन की नुमाइंदगी नहीं कर सकते। इसलिए, "सम्पूर्ण पवित्र शास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है और पूरी तरह से परमेश्वर का वचन है" एक गलत नजरिया है। यह बिलकुल भी तथ्यों के मुताबिक़ नहीं है!

परमेश्वर का वचन सत्य है। अनुभवों का जीवन सिर्फ कुछ हिस्से का ही जीवन हो सकता है। परमेश्वर के बारे में मनुष्य जितना भी जान ले, वह परमेश्वर के वचन नहीं बोल सकता। मनुष्य की गवाही में चाहे जितना वजन हो, उसके कथनों की परमेश्वर के वचनों से बराबरी नहीं की जा सकती। ऐसा इसलिए क्योंकि परमेश्वर के सार और मनुष्य के सार में ज़मीन आसमान का अंतर है। मनुष्य कभी परमेश्वर के वचन व्यक्त नहीं कर सकता। नबी भी परमेश्वर के वचनों को सभी तक पहुंचा ही सकते थे। और-तो-और पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किये गए लोग भी परमेश्वर के वचनों को व्यक्त नहीं कर सकते हैं। वे सब सिर्फ अपने खुद के अनुभवों और गवाहियों की ही चर्चा कर सकते हैं। मसीह में एक दिव्य सार है, इसलिए वे जो व्यक्त करते हैं, वे स्वभावत: परमेश्वर के वचन होते हैं। मनुष्य का सार इंसानियत है, इसलिए वह जो व्यक्त करता है वह स्वभावत: मनुष्य के अनुभव और ज्ञान है। भले ही वह सत्य के मुताबिक़ हो, हम एक साथ परमेश्वर के वचनों से इसकी बराबरी नहीं कर सकते। आजकल के लोग ऐतिहासिक तथ्य के खिलाफ जाते हैं, और ज़ोर देकर कहते हैं कि बाइबल में मनुष्य के कथन परमेश्वर के वचन हैं। यह ऐसी बात है जो लोगों को पूरी तरह से धोखा देती है और परमेश्वर का विरोध करती है। इसे परमेश्वर का तिरस्कार माना जाता है।

"बाइबल के बारे में रहस्य का खुलासा" फ़िल्म की स्क्रिप्ट से लिया गया अंश

पिछला: प्रश्न 5: 2 तीमुथियुस 3:16 में पौलुस ने कहा था: "सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्‍वर की प्रेरणा से रचा गया है …" यह दर्शाता है कि बाइबल की हर चीज़ परमेश्वर का वचन है। लेकिन ऐसे लोग भी हैं जो कहते हैं कि बाइबल की हर चीज़ परमेश्वर का वचन नहीं है। क्या यह बाइबल को नकारना और लोगों को धोखा देना नहीं है?

अगला: प्रश्न 7: मैंने 20 साल से भी ज़्यादा बाइबल का अध्ययन किया है। मैंने पाया कि बाइबल अलग-अलग वक्त में 40 अलग-अलग लेखकों द्वारा लिखी गयी थी, लेकिन उनकी लिखी विषयवस्तु में एक भी गलती नहीं थी। इससे पता चलता है कि परमेश्वर ही बाइबल के सच्चे लेखक हैं और बाइबल पवित्र आत्मा से उपजी है।

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