प्रश्न 3: जो भी हो, सारे पादरी और एल्डर तो बाइबल के आधार पर ही उपदेश देते हैं। क्या बाइबल की व्याख्या करना और लोगों को उससे जोड़े रखना, प्रभु का गुणगान करना और उनकी गवाही देना नहीं है? क्या पादरियों और एल्डर्स का बाइबल की व्याख्या करना गलत है? आप ऐसा कैसे कह सकती हैं कि वे पाखंडी फरीसी हैं?

उत्तर: लोगों के लिए, बाइबल की व्याख्या करना गलत नहीं होना चाहिए, परंतु, बाइबल की व्याख्या करते हुए वे वास्तव में ऐसे काम करते हैं जिनसे परमेश्वर का विरोध होता है। ये किस तरह के लोग हैं? क्या वे पाखंडी फरीसी नहीं हैं? क्या वे परमेश्वर-विरोधी और मसीह-विरोधी नहीं हैं? बाइबल की व्याख्या करना परमेश्वर का विरोध करना कैसे हो सकता है? इससे परमेश्वर की निंदा कैसे होती है? ये मुझे बड़ा अजीब लग रहा है। इस तरह से समझाने के बावजूद ऐसे लोग हैं जो समझ नहीं पा रहे हैं और अभी भी सोचते हैं कि बाइबल की व्याख्या करना परमेश्वर का गुणगान करना और उनकी गवाही देना है। उस ज़माने के यहूदी मुख्य पादरी, लेखक और फरीसी सभी धर्मग्रंथों के विशेषज्ञ और विद्वान थे, जो लोगों के सामने अक्सर धर्मग्रंथों की व्याख्या किया करते थे। अगर बाइबल की व्याख्या करना, परमेश्वर का गुणगान करना और उनकी गवाही देना है, तो फिर जब प्रभु यीशु उपदेश देने और कार्य करने आये, तो उन लोगों ने क्यों प्रभु यीशु का घोर विरोध किया और उनकी निंदा की, और अंत में सरकार के साथ सांठ-गांठ करके प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ा दिया? आधुनिक ज़माने के सभी धार्मिक पादरी और एल्डर ऐसे लोग हैं, जो बरसों से बाइबल की व्याख्या करते रहे हैं। अगर बाइबल की व्याख्या करना परमेश्वर का गुणगान करना और उनकी गवाही देना है, तो जब सर्वशक्तिमान परमेश्वर सत्य व्यक्त करने और अपना न्याय कार्य करने आये तो फिर क्‍यों वे न केवल उनकी खोज और जाँच-पड़ताल करने में नाकाम रहे, बल्कि वे उनका विरोध और निंदा करते रहे? तो फिर समस्या क्या है? क्या यह एक गंभीर समस्या नहीं है जिस पर सभी विश्वासियों को गौर करना चाहिए? साथ ही, अगर धार्मिक अगुवाओं का बाइबल की व्याख्या करना, परमेश्वर का गुणगान करना और उनकी गवाही देने के समान है, तो अनुग्रह के युग में, प्रभु यीशु ने आने के बाद आराधना-स्थल में कार्य क्यों नहीं किया? ऐसा क्यों है कि अंत के दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर आने के बाद कलीसिया में कार्य नहीं करते? इसका कारण यह है कि धार्मिक अगुआ परमेश्वर का गुणगान नहीं करते और उनकी गवाही नहीं देते और वे सभी पाखंडी और घमंडी फरीसी हैं। वे सब मसीह-विरोधी हैं, जो धर्म पर नियंत्रण करते हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं! वे शायद परमेश्वर को अस्तित्व में नहीं रहने देना चाहते या धार्मिक दुनिया में ऐसी आवाजें नहीं चाहते जो परमेश्वर की गवाही देती हों?! अगर देहधारी मसीह धर्म में आ जाएं और कलीसिया में कार्य करते हुए उपदेश दें, तो यह तय है कि उन्हें गिरफ्तार कर सीसीपी के हवाले कर दिया जाएगा और सूली पर चढ़ा दिया जाएगा। अगर लोग धार्मिक कलीसियाओं में परमेश्वर की गवाही देने जाएँ, तो उन्हें अवश्य गिरफ्तार कर लिया जाएगा और उन पर अत्याचार किये जाएँगे। जैसा कि प्रभु यीशु ने कहा था, "देखो, मैं तुम्हें भेड़ों के समान भेड़ियों के बीच में भेजता हूँ …" (मत्ती 10:16)। क्या लोग अभी भी इस सच्चाई को साफ तौर पर नहीं देख सकते? धार्मिक फरीसियों द्वारा परमेश्वर के विरोध और निंदा से हमें समझने लायक बनना चाहिए कि बाइबल का गुणगान करना परमेश्वर की गवाही देना है या नहीं। क्या वे लोग जो वाकई परमेश्वर का गुणगान करते हैं और उनकी गवाही देते हैं, उनका विरोध कर सकते हैं? क्या वे परमेश्वर को अपना दुश्मन मान सकते हैं? इसके अलावा, हम सबको जानना चाहिए कि बाइबल में सिर्फ परमेश्वर के वचन नहीं बल्कि मनुष्य के भी बहुत-से कथन हैं। इसलिए, बाइबल का गुणगान करना और परमेश्वर का गुणगान करना एक ही बात नहीं हैं। बाइबल पर निष्ठा रखना और प्रभु के आदेशों को मानना, दोनों एक ही बात नहीं हैं। जब धार्मिक फरीसी बाइबल की व्याख्या करते हैं, तो वे सिर्फ़ बाइबल में मनुष्य के कथनों पर ध्यान देते हैं, वे बाइबल के ज्ञान और धर्मशास्त्र के सिद्धांत को समझाते हुए उपदेश देते हैं और मनुष्य के कथनों की गवाही देते हैं, लेकिन बाइबल में परमेश्वर के वचनों और सत्य का प्रचार नहीं करते, उनकी गवाही नहीं देते। क्या अभी भी इसे परमेश्वर का गुणगान करना और उनकी गवाही देना कहा जा सकता है? क्या यह परमेश्वर का विरोध करना और उनको धोखा देना नहीं है? इसलिए, वे सभी लोग जो यह सोचते हैं कि बाइबल की व्याख्या करना परमेश्वर का गुणगान करना और उनकी गवाही देना है, वे अध्यात्मिक बातों और समस्या के सार को नहीं समझते। वे सब उलझन में पड़े हैं, ऐसे लोग, जो आँख बंद करके धार्मिक अगुवाओं में विश्वास करते हैं, उनके पीछे चलते हैं और उनकी आराधना करते हैं। क्या ये सच नहीं है?

उस ज़माने में, वे यहूदी फरीसी सिर्फ बाइबल के ज्ञान और सिद्धांतों की व्याख्या करने, धार्मिक रीति-रिवाजों में लगे रहने, धार्मिक नियमों और इंसानी परंपराओं का पालन करने पर ही ध्यान देते थे, मगर उन्होंने परमेश्वर के आदेशों का त्याग कर दिया और परमेश्वर के रास्ते से दूर चले गये, इस हद तक कि जब प्रभु यीशु आये, तो न केवल उनका घोर विरोध किया बल्कि उनकी निंदा की और उन्हें सूली पर चढ़ा दिया। नतीजा ये हुआ कि परमेश्वर ने उनको श्राप और दंड दिया। हालांकि आजकल के धार्मिक पादरी और एल्डर अक्सर लोगों के सामने बाइबल की व्याख्या करते हैं और उसकी गवाही देते हैं, मगर वे परमेश्वर के वचन को फ़ैलाने और उसकी गवाही देने पर ध्यान नहीं देते, वे प्रभु यीशु की इच्छा और उनकी अपेक्षाओं से जुड़े उपदेश भी नहीं देते हैं, प्रभु यीशु के दिव्य सार और उनकी सुंदरता की गवाही तक देते। वे प्रभु के वचन पर अमल करने और उसका अनुभव करने के लिए लोगों का मार्गदर्शन नहीं करते, वे प्रभु के आदेशों पर चलने और परमेश्वर की इच्छा का पालन करने पर भी ध्यान नहीं देते। वे सिर्फ बाइबल में मनुष्य के कथनों की व्याख्या करने (और उनको गौरवान्वित करने) पर ध्यान देते हैं, वो चाहते हैं कि लोग बाइबल में मनुष्य के कथनों को परमेश्वर के वचन और सत्य मान कर उनपर अमल करें और उनका मान बनाये रखें। वे समस्याओं का हल भी बाइबल में परमेश्वर के वचनों के बजाय मनुष्य के कथनों के आधार पर ही निकालते हैं। वे परमेश्वर के वचनों का विरोध करने और उनको ठुकराने के लिए मनुष्य के कथनों का इस्तेमाल करते हैं। मिसाल के तौर पर, स्वर्ग के राज्य में प्रवेश की बात पर, प्रभु यीशु ने लोगों से साफ़ तौर पर कहा था: "जो मुझ से, 'हे प्रभु! हे प्रभु!' कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है" (मत्ती 7:21)। लेकिन इसके बजाय पादरी और एल्डर प्रभु यीशु के वचनों को अलग कर देते हैं और बाइबल में मनुष्य के वचनों को सत्य और स्वर्ग के राज्य में मनुष्य के प्रवेश के मानक के रूप में देखते हैं, वे बताते हैं कि स्वर्ग के राज्य में प्रवेश पाने का उपाय सिर्फ प्रभु के लिए मेहनत करना है। वे परमेश्वर के वचनों की जगह मनुष्य के कथनों को लेते हैं और परमेश्वर के वचनों को ठुकरा देते हैं, इस तरह वे लोगों को भटका देते हैं। यह धार्मिक पादरियों और एल्डर्स के परमेश्वर-विरोध का सबसे ज़्यादा विश्वासघाती और दुर्भावनापूर्ण पहलू है! वे संदर्भ से बाहर जाकर बाइबल की व्याख्या करते हैं, सर्वशक्तिमान परमेश्वर का विरोध करने के लिए बाइबल में मनुष्य के कथनों का इस्तेमाल करते हैं, वे विश्वासियों को धोखा देने, उनको काबू में करने, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य की खोजबीन करने और उसे स्वीकार करने से रोकने में कोई कसर नहीं छोड़ते, वे सभी को मजबूती से अपने काबू में कर लेते हैं। उसी तरह जैसे कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "हर पंथ और संप्रदाय के अगुवाओं को देखो। वे सभी अभिमानी और आत्म-तुष्ट हैं, और वे बाइबल की व्याख्या संदर्भ के बाहर और उनकी अपनी कल्पना के अनुसार करते हैं। वे सभी अपना काम करने के लिए प्रतिभा और पांडित्य पर भरोसा करते हैं। यदि वे कुछ भी उपदेश करने में असमर्थ होते, तो क्या वे लोग उनका अनुसरण करते? कुछ भी हो, उनके पास कुछ ज्ञान तो है ही, और वे सिद्धांत के बारे में थोड़ा-बहुत बोल सकते हैं, या वे जानते हैं कि दूसरों को कैसे जीता जाए, और कुछ चालाकियों का उपयोग कैसे करें, जिनके माध्यम से वे लोगों को अपने सामने ले आए हैं और उन्हें धोखा दे चुके हैं। नाम मात्र के लिए, वे लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन वास्तव में वे अपने अगुवाओं का अनुसरण करते हैं। अगर वे उन लोगों का सामना करते हैं जो सच्चे मार्ग का प्रचार करते हैं, तो उनमें से कुछ कहेंगे, 'हमें परमेश्वर में अपने विश्वास के बारे में हमारे अगुवा से परामर्श करना है।' देखिये, परमेश्वर में विश्वास करने के लिए कैसे उन्हें किसी की सहमति की आवश्यकता है; क्या यह एक समस्या नहीं है? तो फिर, वे सब अगुवा क्या बन गए हैं? क्या वे फरीसी, झूठे चरवाहे, मसीह-विरोधी, और लोगों के सही मार्ग को स्वीकार करने में अवरोध नहीं बन चुके हैं?" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य का अनुसरण करना ही परमेश्वर में सच्चे अर्थ में विश्वास करना है') । इन तथ्यों को जानकर हम कैसे कहें कि धार्मिक पादरियों और एल्डर्स का बाइबल की व्याख्या करना परमेश्वर का गुणगान करना और उनकी गवाही देना है? क्या वे बाइबल की गलत व्याख्या करके और संदर्भ से परे जाकर परमेश्वर का विरोध नहीं कर रहे? ये अरसे से लोगों के सच्चा मार्ग अपनाकर परमेश्वर के पास लौटने की राह में रोड़ा बने हैं, ये वही मसीह-विरोधी हैं, जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने अंत के दिनों के कार्य से बेनकाब हुए हैं। क्या लोग इस सच्चाई को अब भी नहीं समझ पा रहे हैं?

लोगों की धारणाओं के अनुसार, बाइबल की व्याख्या करना, परमेश्वर का गुणगान करने और उनकी गवाही देने जैसा ही है, लेकिन फरीसियों और धार्मिक अगुवाओं की बाइबल की व्याख्या से, हम समझ सकते हैं कि दरअसल ऐसा नहीं है। धार्मिक फरीसी जिसका गुणगान करते हुए गवाही दे रहे हैं, वह बाइबल है, परमेश्वर नहीं। उनके उपदेश खासकर बाइबल में मौजूद मनुष्य के कथनों की व्याख्या होते हैं, परमेश्वर के वचनों की नहीं। वे परमेश्वर के वचनों की जगह और उनके विरोध में बाइबल में मौजूद मनुष्य के कथनों का इस्तेमाल करते हैं, वे परमेश्वर का विरोध करने और उनके बारे में राय बनाने के लिए, बाइबल में मौजूद मनुष्य के कथनों को संदर्भ से बाहर ले जाते हैं। बाइबल की व्याख्या करने का उनका मकसद परमेश्वर का गुणगान करना और उनकी गवाही देना नहीं होता, बल्कि अपने नापाक इरादों के लिए लोगों को धोखा देकर काबू में करना होता है। बाइबल की ऐसी व्याख्या करना परमेश्वर का विरोध और बुरे काम करना है! इसी वजह से, जब परमेश्वर कार्य करने आते हैं, तो वे लोगों पर पकड़ बनाये रखने के लिए बाइबल का इस्तेमाल करते हैं, ताकि लोग आँखें बंद करके बाइबल में विश्वास करें और बाइबल से बंधे रहें, इस तरह वे लोगों को परमेश्वर-विरोध के रास्ते पर ले जाते हैं। फरीसियों और धार्मिक अगुवाओं की बाइबल की ऐसी व्याख्या परमेश्वर के विरोध का एक तरीका है। वे परमेश्वर का विरोध करने और अपना खुद का स्वतंत्र राज्य बनाने के लिए, बाइबल में मौजूद मनुष्य के कथनों को संदर्भ से बाहर ले जाते हैं। तो फिर परमेश्वर का गुणगान करने और उनकी गवाही देने के लिए बाइबल की व्याख्या कैसे की जानी चाहिए? बाइबल में जो दर्ज है, वह परमेश्वर का कार्य और उनकी गवाहियां हैं। बाइबल की व्याख्या करने का अर्थ बाइबल में परमेश्वर के वचनों और बाइबल में निहित सत्य के अनुसार बाइबल में परमेश्वर के वचनों और सत्य के अनुसार गवाही देना। यह बाइबल में परमेश्वर के वचनों को फैलाना और उनकी गवाही देना है। यह परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार और उनके वचनों के आधार पर उनकी अपेक्षाओं का संवाद करना है और परमेश्वर के वचनों में निहित सत्य को समझाना है। यह परमेश्वर के कार्य और उनके स्वभाव के साक्ष्यों को लोगों तक पहुंचाना है, यह परमेश्वर के सार और उनकी सुंदरता की गवाही देना है। यह परमेश्वर के वचनों पर अमल करने और उनका अनुभव करने में लोगों की अगुवाई करना है, ताकि वे परमेश्वर के वचनों की सच्चाई को समझ सकें। यह प्रभु यीशु का गुणगान करने और हर चीज़ में उनकी गवाही देने के लिए है। बाइबल की सिर्फ इस प्रकार से व्याख्या करके ही, और परमेश्वर के दिल के करीब आने की कोशिश करते हुए और परमेश्वर की सेवा करते हुए ही, परमेश्वर के दिल के करीब आना और उनकी सेवा करना संभव हो सकता है। बाइबल में मनुष्य के कथनों का उपयोग सिर्फ संदर्भ और पूरक के रूप में किया जा सकता है, और कभी भी इनकी तुलना परमेश्वर के वचनों से नहीं की जा सकती है। फिर भी धार्मिक पादरी और एल्डर्स सिर्फ़ बाइबल में मौजूद मनुष्य के कथनों की व्याख्या करते हैं। वे बाइबल में मनुष्य के कथनों को परमेश्वर के वचन और सत्य बताते हैं, इसे अपने आचरण का मार्गदर्शक मानते हैं और इसी आधार पर समस्याएं सुलझाते हैं। मगर वे कभी-कभार ही परमेश्वर के वचनों के बारे में बोलते हैं, वे बाइबल में मौजूद परमेश्वर के वचनों की जगह मनुष्य के कथनों का उपयोग करते हैं और परमेश्वर के वचनों को पीछे छोड़ देते हैं। क्या इस तरह से बाइबल की व्याख्या करना परमेश्वर की गवाही देना है? क्या यह मनुष्य का गुणगान करना और उसकी गवाही देना नहीं है? यही नहीं, बाइबल की व्याख्या करते समय वे सिर्फ़ दिखावे के लिए बाइबल के पात्रों, स्थानों और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बारे में बताते हैं, और सिर्फ धर्मशास्त्र के सिद्धांत को समझाने पर ध्यान देते हैं। क्या यह लोगों को धोखा देना और चंगुल में फंसाना नहीं है? क्या यह लोगों से अपनी खुद की आराधना करवाना नहीं है? उस ज़माने में, उन पाखंडी फरीसियों ने बाइबल को समझाने के मौके का फ़ायदा उठाकर बाइबल की गलत व्याख्या की, ताकि लोगों को धोखा देकर वश में किया जा सके और अंत में, वे विश्वासियों को मनुष्य के अनुसरण और परमेश्वर के विरोध के रास्ते पर ले गये, उन्होंने यहूदी धर्म को परमेश्वर-विरोधी स्वतंत्र राज्य में बदल दिया। अंत के दिनों में, धार्मिक पादरी और एल्डर भी बाइबल को समझाने के मौके का फ़ायदा उठा रहे हैं ताकि लोग आँखें बंद करके बाइबल में विश्वास करें और उसकी आराधना करें, वे लोगों के दिलों में बाइबल को परमेश्वर की जगह दिलाने में लगे हैं, वे अनजाने में विश्वासियों को प्रभु के वचन से धोखा करने और परमेश्वर के विरोध के रास्ते पर ले जा रहे हैं, वे धार्मिक दुनिया को परमेश्वर के कार्य के विरोध का किला बनाकर इसे एक परमेश्वर-विरोधी स्वतंत्र राज्य में बदल रहे हैं। उनकी तरह बाइबल की व्याख्या करना क्या परमेश्वर का विरोध नहीं है? क्या यह परमेश्वर का विरोध करने और अपना स्वतंत्र राज्य बनाने के लिए मसीह-विरोधी फरीसियों का छलावा नहीं है? इसे परमेश्वर का गुणगान करना या उनकी गवाही देना कैसे कहा जा सकता है? परमेश्वर का विरोध करने में धार्मिक फरीसियों की चालाकी उनके द्वारा बाइबल की गलत व्याख्या करने और लोगों को धोखा देकर वश में करने में है। बाइबल मूल रूप से परमेश्वर की गवाही थी। वे बाइबल की व्याख्या जैसे भी करें, मनुष्य की धारणाओं के आधार पर तो, वे हमेशा परमेश्वर की गवाही देते हैं, फिर भी पाखंडी फरीसी मनुष्य की इस धारणा का फायदा उठाते हैं, वे बाइबल का गुणगान करने और उसकी गवाही देने में कोई कसर नहीं छोड़ते। वे बाइबल का इस्तेमाल उसे परमेश्वर की जगह देने, परमेश्वर का विरोध करने और लोगों को धोखा देने के लिए करते हैं। इससे लोग आँखें मूँद कर बाइबल में विश्वास और आराधना करते हैं, उन जैसे बाइबल के जानकारों की बात मानकर उनकी आराधना करते हैं और परमेश्वर को धोखा देते हैं। यह परमेश्वर का विरोध करने और लोगों को धोखा देने की शैतान की सबसे घिनौनी चाल है, यह एक ऐसा पहलू है जिसे लोग समझ नहीं पाते हैं और बड़ी आसानी से धोखा खा जाते हैं।

आइए, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों पर नज़र डालें: "ऐसे भी लोग हैं जो बड़ी-बड़ी कलीसियाओं में दिन-भर बाइबल पढ़ते रहते हैं, फिर भी उनमें से एक भी ऐसा नहीं होता जो परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को समझता हो। उनमें से एक भी ऐसा नहीं होता जो परमेश्वर को जान पाता हो; उनमें से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप तो एक भी नहीं होता। वे सबके सब निकम्मे और अधम लोग हैं, जिनमें से प्रत्येक परमेश्वर को सिखाने के लिए ऊँचे पायदान पर खड़ा रहता है। वे लोग परमेश्वर के नाम का झंडा उठाकर, जानबूझकर उसका विरोध करते हैं। वे परमेश्वर में विश्वास रखने का दावा करते हैं, फिर भी मनुष्यों का माँस खाते और रक्त पीते हैं। ऐसे सभी मनुष्य शैतान हैं जो मनुष्यों की आत्माओं को निगल जाते हैं, ऐसे मुख्य राक्षस हैं जो जानबूझकर उन्हें विचलित करते हैं जो सही मार्ग पर कदम बढ़ाने का प्रयास करते हैं और ऐसी बाधाएँ हैं जो परमेश्वर को खोजने वालों के मार्ग में रुकावट पैदा करते हैं। वे 'मज़बूत देह' वाले दिख सकते हैं, किंतु उसके अनुयायियों को कैसे पता चलेगा कि वे मसीह-विरोधी हैं जो लोगों से परमेश्वर का विरोध करवाते हैं? अनुयायी कैसे जानेंगे कि वे जीवित शैतान हैं जो इंसानी आत्माओं को निगलने को तैयार बैठे है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को न जानने वाले सभी लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं')। "सबसे अधिक विद्रोही वे लोग होते हैं जो जानबूझकर परमेश्वर की अवहेलना और उसका विरोध करते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के शत्रु और मसीह विरोधी हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के नए कार्य के प्रति निरंतर शत्रुतापूर्ण रवैया रखते हैं, ऐसे व्यक्ति में कभी भी समर्पण का कोई भाव नहीं होता, न ही उसने कभी खुशी से समर्पण किया होता है या दीनता का भाव दिखाया है। ऐसे लोग दूसरों के सामने अपने आपको ऊँचा उठाते हैं और कभी किसी के आगे नहीं झुकते। परमेश्वर के सामने, ये लोग वचनों का उपदेश देने में स्वयं को सबसे ज़्यादा निपुण समझते हैं और दूसरों पर कार्य करने में अपने आपको सबसे अधिक कुशल समझते हैं। इनके कब्ज़े में जो 'खज़ाना' होता है, ये लोग उसे कभी नहीं छोड़ते, दूसरों को इसके बारे में उपदेश देने के लिए, अपने परिवार की पूजे जाने योग्य विरासत समझते हैं, और उन मूर्खों को उपदेश देने के लिए इनका उपयोग करते हैं जो उनकी पूजा करते हैं। कलीसिया में वास्तव में इस तरह के कुछ ऐसे लोग हैं। ये कहा जा सकता है कि वे 'अदम्य नायक' हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी परमेश्वर के घर में डेरा डाले हुए हैं। वे वचन (सिद्धांत) का उपदेश देना अपना सर्वोत्तम कर्तव्य समझते हैं। साल-दर-साल और पीढ़ी-दर-पीढ़ी वे अपने 'पवित्र और अलंघनीय' कर्तव्य को पूरी प्रबलता से लागू करते रहते हैं। कोई उन्हें छूने का साहस नहीं करता; एक भी व्यक्ति खुलकर उनकी निंदा करने की हिम्मत नहीं दिखाता। वे परमेश्वर के घर में 'राजा' बनकर युगों-युगों तक बेकाबू होकर दूसरों पर अत्याचार करते चले आ रहे हैं। दुष्टात्माओं का यह झुंड संगठित होकर काम करने और मेरे कार्य का विध्वंस करने की कोशिश करता है; मैं इन जीती-जागती दुष्ट आत्माओं को अपनी आँखों के सामने कैसे अस्तित्व में बने रहने दे सकता हूँ?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सच्चे हृदय से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा हासिल किए जाएँगे')। जाहिर है कि भले ही धार्मिक पादरी और एल्डर अक्सर बाइबल की व्याख्या करते हैं, मगर वे ऐसे लोग नहीं हैं जो सत्य को समझते हों और परमेश्वर को जानते हों। असल में ये लोग पाखंडी फरीसी हैं। वे झूठे अगुआ हैं जो लोगों को धोखा देकर काबू में करने, बंधनों में जकड़ने और नुकसान पहुंचाने में लगे रहते हैं। वे मसीह को नकारने और उनकी निंदा करने, यहाँ तक कि परमेश्वर का विरोध करने में लोगों की अगुवाई करते हैं, वे लोगों को शैतान के अपराधों में भागीदार बना देते हैं। जिस किसी की आँखें खुली हों, वो समझ सकता है कि बात ये है।

"तोड़ डालो अफ़वाहों की ज़ंजीरें" फ़िल्म की स्क्रिप्ट से लिया गया अंश

पिछला: प्रश्न 2: पादरी और एल्डर अक्सर धर्मग्रंथों को पढ़ते हैं और लोगों को उपदेश देते हैं, भाई-बहनों के लिए प्रार्थना करते हैं, विश्वासियों से प्यार करते हैं और लोगों से बाइबल से जुड़े रहने का आग्रह करते हैं। अगर हम उन्हें पाखंडी फरीसी कहेंगे, तो ज़्यादातर विश्वासी ये बात समझ नहीं पायेंगे। तो कृपया हमें और विस्तार से बताइए।

अगला: प्रश्न 4: धार्मिक पादरी और एल्डर्स प्रभु के वचनों को फैलाने या उनके इरादों की चर्चा करने के बजाय, अक्सर बाइबल में मनुष्य के कथनों और ख़ासकर पौलुस के कथनों को समझाते हैं। यही सच है। मैं एक बात नहीं समझ पायी, क्या पूरा बाइबल परमेश्वर से प्रेरित नहीं है? क्या बाइबल की हर बात परमेश्वर का वचन नहीं है? आप बाइबल में मनुष्य के वचनों और परमेश्वर के वचनों में इतना फ़र्क क्यों करते हैं? क्या बाइबल में मनुष्य का हर कथन परमेश्वर से प्रेरित नहीं है?

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1. प्रभु ने हमसे यह कहते हुए, एक वादा किया, "मैं तुम्हारे लिये जगह तैयार करने जाता हूँ। और यदि मैं जाकर तुम्हारे लिये जगह तैयार करूँ, तो फिर आकर तुम्हें अपने यहाँ ले जाऊँगा कि जहाँ मैं रहूँ वहाँ तुम भी रहो" (यूहन्ना 14:2-3)। प्रभु यीशु पुनर्जीवित हुआ और हमारे लिए एक जगह तैयार करने के लिए स्वर्ग में चढ़ा, और इसलिए यह स्थान स्वर्ग में होना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु लौट आया है और पृथ्वी पर ईश्वर का राज्य स्थापित कर चुका है। मुझे समझ में नहीं आता: स्वर्ग का राज्य स्वर्ग में है या पृथ्वी पर?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :"हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है; तेरा नाम पवित्र माना जाए। तेरा राज्य आए। तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी...

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