78. परीक्षण से मिले सबक

"मनुष्य की दशा और अपने प्रति मनुष्य का व्यवहार देखकर परमेश्वर ने नया कार्य किया है, जिससे मनुष्य उसके विषय में ज्ञान और उसके प्रति आज्ञाकारिता दोनों से युक्त हो सकता है, और प्रेम और गवाही दोनों रख सकता है। इसलिए मनुष्य को परमेश्वर के शुद्धिकरण, और साथ ही उसके न्याय, व्यवहार और काट-छाँट का अनुभव अवश्य करना चाहिए, जिसके बिना मनुष्य कभी परमेश्वर को नहीं जानेगा, और कभी वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करने और उसकी गवाही देने में समर्थ नहीं होगा। परमेश्वर द्वारा मनुष्य का शुद्धिकरण केवल एकतरफा प्रभाव के लिए नहीं होता, बल्कि बहुआयामी प्रभाव के लिए होता है। केवल इसी तरह से परमेश्वर उन लोगों में शुद्धिकरण का कार्य करता है, जो सत्य को खोजने के लिए तैयार रहते हैं, ताकि उनका संकल्प और प्रेम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाए। जो लोग सत्य को खोजने के लिए तैयार रहते हैं और जो परमेश्वर को पाने की लालसा करते हैं, उनके लिए ऐसे शुद्धिकरण से अधिक अर्थपूर्ण या अधिक सहायक कुछ नहीं है" (मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ)। ईसाई बनने के बाद, मुझे सीसीपी सरकार ने कई बार गिरफ्तार किया, मगर मैंने कभी प्रभु को धोखा नहीं दिया। कुछ साल पहले ही, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार किया था, धूप हो या बारिश, मैं हमेशा पूरे उत्साह से सुसमाचार का प्रचार करता और अपना कर्तव्य निभाता। मुझे लगता था कि मैं हमेशा परमेश्वर के प्रति वफ़ादार रहूँगा, चाहे मुझे कितनी भी पीड़ा सहनी पड़े, कभी लगा नहीं कि इसे साबित करने के लिए मुझे किसी परीक्षण या शुद्धिकरण की ज़रूरत है। एक बार, एक बीमारी के परीक्षण से गुजरने की वजह से मुझे मौत का सामना करना पड़ा, तब जाकर मैंने परमेश्वर के परीक्षण और शुद्धिकरण के कार्य का अर्थ जाना, और समझा कि कैसे परमेश्वर हमें शुद्ध करने और बचाने के लिए इसका इस्तेमाल करता है, चाहे वो किसी भी रूप में हो!

अक्टूबर 2014 में, एक दिन मैं एक सहभागिता से वापस आ रहा था, तो मेरे पैर में कमज़ोरी महसूस हुई और मैं गिरते-गिरते बचा। मुझे लगा ये सिर्फ़ ठंडी हवा के कारण है और मुझे कुछ दवाइयाँ लेनी चाहिए। मैंने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। लेकिन कुछ समय बाद, मेरे कान, उँगलियाँ और पैर के अँगूठे काले पड़ने लगे, और मैं ज़्यादा से ज़्यादा कमज़ोर होता चला गया। मुझे लगने लगा, ये कोई मामूली बात नहीं है, मगर मैंने सोचा, इतने सालों तक अपने कर्तव्य में लगातार जी-जान से मेहनत करने के कारण परमेश्वर मेरी रक्षा करेगा। मेरे साथ कुछ बुरा नहीं होगा। मुझे यकीन था कि मैं अपने आप ही ठीक हो जाऊँगा। मगर, ताज्जुब की बात है कि दवाइयाँ लेने के बाद भी मैं बेहतर महसूस नहीं कर रहा था। मेरी पत्नी और बेटियाँ जाँच के लिए मुझे अस्पताल लेकर गयीं, नतीजों से पता चला कि मुझमें एनीमिया और हेपेटाइटिस बी दोनों के गंभीर लक्षण थे। उन्होंने कहा, हालात और बिगड़ने पर इसे ठीक करना नामुमकिन हो जाएगा। ये सुनते ही मेरा पूरा शरीर ढीला पड़ गया। मुझे यकीन नहीं हो रहा था। मैंने सोचा, "सालों से मैंने इतने त्याग किये हैं। अपना कर्तव्य निभाने के लिए काफ़ी कुछ सहा है। मुझे सीसीपी सरकार ने गिरफ्तार करके धमकाया, मगर मैंने कभी परमेश्वर को धोखा नहीं दिया, कैद से छूटने के बाद फिर अपना कर्तव्य निभाने वापस चला गया। मैं इतना बीमार कैसे हो सकता हूँ? परमेश्वर ने मेरी रक्षा क्यों नहीं की? अगर मैं ठीक नहीं हो सका, तो मेरे इतने सारे त्याग का क्या फ़ायदा? मैंने परमेश्वर के आशीष के बिना इतने सालों तक उसमें विश्वास किया, मगर अब मेरा शरीर बीमार हो गया है। शायद अब मुझे अपना कर्तव्य निभाने की ज़्यादा कोशिश नहीं करनी चाहिए, चाहे मैं कितनी भी तकलीफ़ सहूँ, इसका कोई फ़ायदा नहीं होगा।"

इस दौरान, मैं अपना कर्तव्य निभाता रहा। मगर मुझमें कोई उत्साह नहीं था। सभाओं के दौरान, मैंने भाई-बहनों से उनकी समस्याओं के बारे में भी नहीं पूछा। मैं परमेश्वर के वचन पढ़ता था, मगर सहभागिता नहीं करना चाहता था। कुछ समय बाद, मेरी हालत बिगड़ती चली गयी। मैं ठीक से खड़ा भी नहीं हो पाता था, दिन भर मेरा सिर चकराता रहता। मेरे अगुआ ने मुझे कुछ समय की छुट्टी दे दी, ताकि थोड़ा आराम करके मेरी हालत में सुधार आये। मैंने अपने भाई-बहनों को ख़ुशी और उत्साह के साथ अपना कर्तव्य निभाते देखा। मगर मैं? मैं तो इतना बीमार पड़ गया कि अपना कर्तव्य तक नहीं निभा सकता था। मुझे लगा जैसे परमेश्वर ने मुझे नहीं बचाने का फ़ैसला कर लिया है। मैं जितना इस बारे में सोचता, उतना ही दुख और दर्द महसूस होता। मैं परमेश्वर के सामने जाकर प्रार्थना करने लगा: "परमेश्वर! मैं इन बीमारियों की चपेट में आ गया हूँ, मुझे बहुत कमजोरी और पीड़ा महसूस हो रही है। मैं जानता हूँ कि तुम्हें दोष देना ठीक नहीं, मगर मैं इसके पीछे छिपी तुम्हारी इच्छा को भी नहीं समझ पा रहा। कृपा करके इसे समझने में मेरा मार्गदर्शन करो।" प्रार्थना के बाद, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा: "उस समस्त कार्य के, जो परमेश्वर मनुष्य में करता है, अपने लक्ष्य और अपना अर्थ होता है; परमेश्वर निरर्थक कार्य नहीं करता, और न ही वह ऐसा कार्य करता है, जो मनुष्य के लिए लाभदायक न हो। शुद्धिकरण का अर्थ लोगों को परमेश्वर के सामने से हटा देना नहीं है, और न ही इसका अर्थ उन्हें नरक में नष्ट कर देना है। बल्कि इसका अर्थ है शुद्धिकरण के दौरान मनुष्य के स्वभाव को बदलना, उसके इरादों को बदलना, उसके पुराने विचारों को बदलना, परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम को बदलना, और उसके पूरे जीवन को बदलना। शुद्धिकरण मनुष्य की वास्तविक परीक्षा और वास्तविक प्रशिक्षण का एक रूप है, और केवल शुद्धिकरण के दौरान ही उसका प्रेम अपने अंतर्निहित कार्य को पूरा कर सकता है" (वचन देह में प्रकट होता है)। परमेश्वर के वचनों पर अच्छी तरह गौर करने पर, मुझे उसकी इच्छा का पता चला। परमेश्वर हमें दंड देने के लिए नहीं बल्कि हमें शुद्ध करके बदलने के लिए हमारी परीक्षा लेता है। मेरी बीमारी के ज़रिये मुझे शुद्ध किया जा रहा था। परमेश्वर मुझे हटाना नहीं चाहता था, बल्कि मेरी आस्था के पीछे छिपी अशुद्ध मंशा को सामने लाना चाहता था, वह अनुसरण के प्रति मेरी गलत सोच को बदलना चाहता था, ताकि मैं सच में परमेश्वर से प्रेम करके उसका आज्ञा पालन कर सकूँ। परमेश्वर मुझे शुद्ध करना और बचाना चाहता था। इसका एहसास होने पर, मुझे बुरा लगा और शर्मिंदगी महसूस हुई। परीक्षण का सामना होने पर, मैंने परमेश्वर की इच्छा जानने की कोशिश नहीं की। मैंने उसे गलत समझा और दोष दिया। मैं कितना विवेकहीन था! मैं निराशा और दर्द में नहीं जी सका। मुझे परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना, सत्य की खोज करना और आत्मचिंतन करके खुद को जानना था।

फिर, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा: "लोग अनुग्रह की प्राप्ति और शांति के आनंद को केवल विश्वास का प्रतीक मानते हैं, और आशीष की तलाश को परमेश्वर में अपने विश्वास का आधार समझते हैं। बहुत कम लोग परमेश्वर को जानना चाहते हैं या अपने स्वभाव में बदलाव की कोशिश करते हैं। अपने विश्वास में लोग परमेश्वर को उन्हें एक उपयुक्त मंज़िल और जितना वे चाहते हैं, उतना अनुग्रह देने, उसे अपना सेवक बनाने, उसे अपने साथ एक शांतिपूर्ण, मैत्रीपूर्ण संबंध, फिर वह चाहे कभी भी हो, बनाए रखने के लिए बाध्य करना चाहते हैं, ताकि उनके बीच कभी कोई संघर्ष न हो। अर्थात् परमेश्वर में उनका विश्वास यह माँग करता है कि वह उनकी सभी आवश्यकताएँ पूरी करने का वादा करे और उनके द्वारा बाइबल में पढ़े गए इन वचनों को ध्यान में रखते हुए कि, 'मैं तुम लोगों की प्रार्थनाएँ सुनूँगा,' उन्हें वह सब प्रदान करे, जिसके लिए वे प्रार्थना करें। वे परमेश्वर से किसी का न्याय या निपटारा न करने की अपेक्षा करते हैं, क्योंकि वह हमेशा दयालु उद्धारकर्ता यीशु रहा है, जो हर समय और सभी जगहों पर लोगों के साथ एक अच्छा संबंध रखता है। लोग परमेश्वर में कुछ इस तरह विश्वास करते हैं : वे बस बेशर्मी से परमेश्वर से माँग माँगें करते हैं, यह मानते हैं कि चाहे वे विद्रोही हों या आज्ञाकारी, वह बस आँख मूँदकर उन्हें सब-कुछ प्रदान करेगा। वे बस परमेश्वर से लगातार 'ऋण वसूली' करते हैं, यह विश्वास करते हुए कि उसे उन्हें बिना किसी प्रतिरोध के 'चुकाना' चाहिए और इतना ही नहीं, दोगुना भुगतान करना चाहिए; वे सोचते हैं कि परमेश्वर ने उनसे कुछ लिया हो या नहीं, वे उसके साथ चालाकी कर सकते हैं, वह लोगों के साथ मनमानी नहीं कर सकता, और लोगों के सामने जब वह चाहे और बिना उनकी अनुमति के अपनी बुद्धि और धार्मिक स्वभाव तो बिलकुल भी प्रकट नहीं कर सकता, जो कई वर्षों से छिपाए हुए हैं। वे बस परमेश्वर के सामने अपने पाप स्वीकार करते हैं, और यह मानते हैं कि परमेश्वर उन्हें दोषमुक्त कर देगा, वह ऐसा करने से नाराज़ नहीं होगा, और यह हमेशा के लिए चलता रहेगा। वे परमेश्वर को आदेश दे देते हैं, और यह मानकर चलते हैं कि वह उनका पालन करेगा, क्योंकि यह बाइबल में दर्ज है कि परमेश्वर मनुष्यों से सेवा करवाने के लिए नहीं आया, बल्कि उनकी सेवा करने के लिए आया है, वह यहाँ उनका सेवक है। क्या तुम लोग अब तक यही मानते नहीं आए हो? जब भी तुम परमेश्वर से कुछ पाने में असमर्थ होते हो, तुम भाग जाना चाहते हो; जब तुम्हें कुछ समझ में नहीं आता, तो तुम बहुत क्रोधित हो जाते हो, और इस हद तक चले जाते हो कि उसे तरह-तरह की गालियाँ देने लगते हो। तुम लोग स्वयं परमेश्वर को पूरी तरह से अपनी बुद्धि और चमत्कार भी व्यक्त नहीं करने दोगे, तुम लोग तो बस अस्थायी आराम और सुविधा का आनंद लेना चाहते हो। परमेश्वर में आस्था को लेकर अब तक तो तुम्हारा वही पुराना दृष्टिकोण रहा है। यदि परमेश्वर तुम लोगों को थोड़ा-सा प्रताप दिखा दे, तो तुम लोग दुखी हो जाते हो। क्या तुम लोग देख रहे हो कि तुम्हारा आध्यात्मिक कद कितना कितनी महान है? यह न समझो कि तुम सभी परमेश्वर के प्रति वफ़ादार हो, जबकि वास्तव में तुम लोगों के पुराने विचार नहीं बदले हैं। जब तक तुम पर कोई मुसीबत नहीं आ पड़ती, तुम्हें लगता है कि सब-कुछ सुचारु रूप से चल रहा है, और परमेश्वर के प्रति तुम्हारा प्रेम एक ऊँचे मुकाम पर पहुँच जाता है। अगर तुम्हारे साथ कुछ मामूली-सा भी घट जाए, तो तुम रसातल में जा गिरते हो। क्या यही परमेश्वर के प्रति तुम्हारा निष्ठावान होना है?" (वचन देह में प्रकट होता है)। परमेश्वर के वचनों ने मेरे सामने मेरी वास्तविक स्थिति का खुलासा किया। मैं सत्य को पाने या परमेश्वर को जानने के लिए त्याग नहीं कर रहा था। बल्कि मैं तो परमेश्वर का अनुग्रह और आशीष पाने के लिए त्याग कर रहा था। मैं परमेश्वर के साथ धोखेबाजी और सौदा कर रहा था। जब सब कुछ अच्छा चल रहा था, और मुझे परमेश्वर का अनुग्रह मिल रहा था, तब तो मैंने पूरे मन से अपना कर्तव्य निभाया। मेरे भाई-बहन चाहे कितने भी दूर हों, मेरे पास कितना भी काम हो या चाहे जैसा भी मौसम हो, मुझे उनके साथ सहभागिता करने और उनकी मदद करने में हमेशा ख़ुशी होती थी। मगर अब बीमार होने और अनुग्रह नहीं मिलने के कारण, मुझे तकलीफ हुई और मैंने परमेश्वर से शिकायत की, उसे दोषी ठहराया। मैंने उसका विरोध और उसके साथ कुतर्क किया। खासकर इसलिए, क्योंकि अब मेरी हालात हर दिन बद से बदतर होती जा रही थी, मैंने परमेश्वर में अपनी आस्था खो दी और अपने कर्तव्य को लेकर लापरवाह हो गया। मैंने सत्य या जीवन की खोज के लिए परमेश्वर पर विश्वास नही किया। मैं तो लगातार आशीष पाने की अपनी इच्छा को पूरा करने के लिए परमेश्वर का इस्तेमाल कर रहा था। मैंने ये सब सिर्फ अपने फ़ायदे के लिए किया। उसके प्रति मेरी आस्था झूठी थी। मैं बहुत ही लालची और नीच था! परमेश्वर में इस तरह विश्वास करके, अगर मुझे उसका आशीष मिल भी गया, और मैं अपने जीवन स्वभाव को नहीं बदल सका, तो परमेश्वर बेशक मुझे हटा देगा। फिर, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा: "शुद्धिकरण वह सर्वोत्तम साधन है, जिसके द्वारा परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है, केवल शुद्धिकरण और कड़वे परीक्षण ही लोगों के हृदय में परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम उत्पन्न कर सकते हैं। कठिनाई के बिना लोगों में परमेश्वर के लिए सच्चे प्रेम की कमी रहती है; यदि भीतर से उनको परखा नहीं जाता, और यदि वे सच में शुद्धिकरण के भागी नहीं बनाए जाते, तो उनके हृदय बाहर ही भटकते रहेंगे। एक निश्चित बिंदु तक शुद्धिकरण किए जाने के बाद तुम अपनी स्वयं की निर्बलताएँ और कठिनाइयाँ देखोगे, तुम देखोगे कि तुममें कितनी कमी है और कि तुम उन अनेक समस्याओं पर काबू पाने में असमर्थ हो, जिनका तुम सामना करते हो, और तुम देखोगे कि तुम्हारी अवज्ञा कितनी बड़ी है। केवल परीक्षणों के दौरान ही लोग अपनी सच्ची अवस्थाओं को सचमुच जान पाते हैं; और परीक्षण लोगों को पूर्ण किए जाने के लिए अधिक योग्य बनाते हैं" (वचन देह में प्रकट होता है)। परमेश्वर के वचनों से मुझे इंसानों को बचाने की उसकी इच्छा की स्पष्ट तस्वीर मिली। परमेश्वर के पास लोगों को बदलने और पूर्ण करने के कई तरीके हैं। मेरा बीमार होना, मेरी परीक्षा लेने और मुझे शुद्ध करने का परमेश्वर का तरीका था। जब मुझे जेल हुई थी तो मैंने परमेश्वर को धोखा नहीं दिया था। कोई मुसीबत के आने पर, मैंने कभी परमेश्वर को दोष नहीं दिया। मैंने सोचा, मैं परमेश्वर के प्रति वफ़ादार था और मेरी उस पर अटूट आस्था थी। अगर ये बीमारी नहीं होती, तो मुझे कभी अपने भ्रष्ट स्वभाव का पता ही नहीं चलता, न ही कभी आशीष पाने की अपनी अशुद्ध मंशा को जान पाता। मैं तो कभी परमेश्वर की इन बातों का अर्थ भी नहीं समझ पाता: "केवल परीक्षणों के दौरान ही लोग अपनी सच्ची अवस्थाओं को सचमुच जान पाते हैं; और परीक्षण लोगों को पूर्ण किए जाने के लिए अधिक योग्य बनाते हैं।" अब मैं समझ गया हूँ कि इस बीमारी का होना, मुझे बचाने और पूर्ण करने का परमेश्वर का तरीका था। ये मेरे लिए परमेश्वर का प्रेम ही था!

यह एहसास होने पर, मैंने परमेश्वर को फ़िर कभी दोषी नहीं ठहराया और न ही उसे गलत समझा। चाहे मेरी हालत कितनी भी खराब हो, मैं परमेश्वर के आयोजनों का पालन करूँगा और आशीष पाने की अपनी मंशा को त्याग दूँगा। इसके बाद, मैंने अपनी दवाई ली और खुद को परमेश्वर के हवाले कर दिया। मैं बस उसका मार्गदर्शन पाना चाहता था। हर रोज़, मैं अपना कर्तव्य निभाने की बेहतर से बेहतर कोशिश करने लगा। मुझे ताज्जुब हुआ कि मुझे पता चलने से पहले ही मेरी बीमारी ठीक हो गयी! मैं पूरे दिल से परमेश्वर को धन्यवाद देता रहा!

मई 2015 में, मुझे सिंचन की जिम्मेदारी मिली। ये काम मुझे बहुत पसंद था। मैं अपना समय परमेश्वर के वचनों पर गौर करने में बिताता, जब भी मेरे भाई-बहनों को कोई समस्या होती, मैं उनके बारे में सोचता, परमेश्वर के वचनों के कुछ ऐसे अंश ढूँढता जिनसे उन्हें मदद मिल सके। कुछ समय बाद, कलीसिया जीवन में सुधार आया। मेरे भाई-बहन अपना कर्तव्य निभाने के लिए ज़्यादा उत्साहित रहने लगे, उनमें अपने परीक्षण का सामना करते हुए गवाही देने का हौसला आ गया। मुझे बहुत गर्व महसूस हुआ। लगा कि अपने कर्तव्य में पहले से ज़्यादा काबिल बनाकर, परमेश्वर ने मुझे आशीष दिया है, जिसका मतलब है कि वो मेरी कड़ी मेहनत से खुश है। मगर उसी साल, पाँच जून को, जब मैं एक सभा में जाने के लिए तैयार हो रहा था, तभी अचानक मुझे चक्कर आने लगे। ऐसा लगा जैसे धरती घूम रही है। मेरा चेहरा और कपड़े कुछ ही देर में पसीने से भीग गए, मेरे सिर में तेज़ दर्द होने लगा। ये लक्षण ठीक वैसे ही थे जो मुझमें तब दिखे थे जब मैं पहली बार बीमार हुआ था, मगर इस बार हालत ज़्यादा बुरी थी। मुझे लगा मैं मर रहा हूँ। मैंने मन ही मन सोचा: "ये बीमारी वापस कैसे आ गयी? मैं हर रोज़ कड़ी मेहनत करके अपना कर्तव्य निभाता हूँ—आखिर परमेश्वर मेरी रक्षा क्यों नहीं कर रहा? क्या मैं अब भी परमेश्वर के प्रति वफ़ादार नहीं हूँ?" मेरी पत्नी ने मेरी हालत देखी, तो तुरंत बेटियों के साथ मुझे अस्पताल ले गयी। नतीजे आने पर, डॉक्टर मेरे बजाय मेरी बेटियों से बात करने लगे। उस वक्त, मैं जानता था कि अगर मुझे कैंसर नहीं है, तो फ़िर मुझे कोई और बुरी बीमारी होगी। मैं उदास होने लगा, मगर फ़िर मैंने सोचा, "पिछली बार भी ऐसे ही लक्षण दिखे थे, मगर वो आखिर में ठीक हो गये! आज भी, ये सिर्फ परमेश्वर के हाथों में है। मैं अब भी अपना कर्तव्य निभा रहा हूँ, तो फिर इतना बुरा क्या हो सकता है?" ये सोचकर, मेरा मन शांत होने लगा। कुछ समय बाद, मेरी दोनों बेटियाँ रोते हुए अंदर आयीं और मेरी पत्नी से कहा: "डॉक्टर ने कहा है कि डैड को लीवर का कैंसर है ..." ये सुनकर उसे जोर का झटका लगा। तीनों एक दूसरे के गले लगकर बुरी तरह रोने लगीं। मेरा मन बहुत बेचैन हो गया और मुझे काफ़ी दर्द महसूस होने लगा। मुझे लीवर का कैंसर कैसे हो सकता है? इसका इलाज लगभग नामुमकिन है और मैं कभी भी मर सकता हूँ। अगर मैं मर गया, तो मेरी पत्नी और बेटियों क्या क्या होगा? क्या ये नतीजा है मेरे इतने सालों की कड़ी मेहनत और त्याग का? क्या मुझे स्वर्ग के राज्य का आशीष नहीं मिलने वाला था? उस वक्त, मुझे बहुत दुख और निराशा महसूस होने लगी। मेरी पत्नी ने रोते हुए मुझसे कहा: "तुम्हें ये बीमारी इसलिए है क्योंकि परमेश्वर ऐसा चाहता है। परमेश्वर धार्मिक है। हमें उसे दोषी ठहराना या गलत समझना नहीं चाहिए। हमें उसकी इच्छा को समझने की कोशिश करनी चाहिए।" मेरी पत्नी के शब्दों ने मुझे याद दिलाया, हाँ, परमेश्वर वाकई धार्मिक है। मुझे बिना शिकायत किये उसकी इच्छा का पता लगाना होगा। अपनी पत्नी का दर्द देखकर, मेरी भी आँखें भर आयीं। आँखों में आँसू लिए, मैंने मन ही मन परमेश्वर से प्रार्थना की: "परमेश्वर! तुम्हारे हर कार्य के पीछे कोई न कोई मतलब होता है। कृपा करके, अपनी इच्छा समझने के लिए मेरा मार्गदर्शन करो।" प्रार्थना के बाद, मेरे मन को काफी सुकून मिला। मैं जानता था कि मेरी बीमारी का कोई इलाज नहीं, मैं अपने परिवार पर पैसों का बोझ भी नहीं डालना चाहता था, इसलिए मैंने घर जाकर आराम करने की इजाज़त माँगी।

दो दिनों बाद, मेरे भाई-बहन मुझसे मिलने और मेरा हाल-चाल पूछने के लिए आये। उन्हें देखकर, और अपनी हालत की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए, मैं रोने लगा और कहा: "तुम सभी का मेरे साथ होना, मेरी परवाह करना, परमेश्वर का प्रेम है। मगर ऐसी बीमारी के साथ, मैं ज़्यादा दिनों तक जिंदा नहीं रह पाऊँगा। मैं अब पहले की तरह अपना कर्तव्य नहीं निभा पाऊँगा, न ही मैं परमेश्वर के राज्य को साकार होते देख पाऊँगा।" एक बहन ने मुझे दिलासा दिया, और सब्र के साथ मुझसे कहा: "भाई, ये बीमारी परमेश्वर के परीक्षणों में से ही एक है। तुम्हें और अधिक प्रार्थना करके सत्य की खोज करनी चाहिए, परमेश्वर की इच्छा को जानना चाहिए और अपनी बीमारी में भी मजबूत गवाही देनी चाहिए!" फिर उसने मुझे परमेश्वर द्वारा इंसानों के परीक्षण के बारे में बताने वाले उसके वचनों के कुछ अंश दिए। उनमें से एक अंश का मुझ पर काफ़ी प्रभाव पड़ा: "परमेश्वर में अपने विश्वास में लोग, भविष्य के लिए आशीर्वाद पाने की खोज करते हैं; यह उनकी आस्‍था में उनका लक्ष्‍य होता है। सभी लोगों की यही अभिलाषा और आशा होती है, लेकिन, उनकी प्रकृति के भीतर के भ्रष्टाचार का हल परीक्षण के माध्यम से किया जाना चाहिए। जिन-जिन पहलुओं में तुम शुद्ध नहीं किए गए हो, इन पहलुओं में तुम्हें परिष्कृत किया जाना चाहिए—यह परमेश्वर की व्यवस्था है। परमेश्वर तुम्हारे लिए एक वातावरण बनाता है, परिष्कृत होने के लिए बाध्य करता है जिससे तुम अपने खुद के भ्रष्टाचार को जान जाओ। अंततः तुम उस बिंदु पर पहुंच जाते हो जहां तुम मर जाना और अपनी योजनाओं और इच्छाओं को छोड़ देना और परमेश्वर की सार्वभौमिकता और व्यवस्था के प्रति समर्पण करना अधिक पसंद करते हो। इसलिए अगर लोगों को कई वर्षों का शुद्धिकरण नहीं मिलता है, अगर वे एक हद तक पीड़ा नहीं सहते हैं, तो वे, अपनी सोच और हृदय में देह के भ्रष्टाचार के बंधन से बचने में सक्षम नहीं होंगे। जिन भी पहलुओं में तुम अभी भी शैतान के बंधन के अधीन हो, जिन भी पहलुओं में तुम अभी भी अपनी इच्छाएं रखते हो, जिनमें तुम्हारी अपनी मांगें हैं, यही वे पहलू हैं जिनमें तुम्हें कष्ट उठाना होगा। केवल दुख से ही सबक सीखा जा सकता है, जिसका अर्थ है सत्य पाने और परमेश्वर के इरादे को समझने में समर्थ होना। वास्तव में, कई सत्यों को कष्टदायक परीक्षणों के अनुभव से समझा जाता है। कोई भी व्यक्ति एक आरामदायक और सहज परिवेश में या अनुकूल परिस्थिति में परमेश्वर की इच्छा नहीं समझ सकता है, परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि को नहीं पहचान सकता है, परमेश्वर के धर्मी स्वभाव की सराहना नहीं कर सकता है। यह असंभव होगा!" (मसीह की बातचीत के अभिलेख)। इसे पढने के बाद, मैंने आत्मचिंतन किया। पिछली बार, जब मैंने बीमारी के परीक्षण का अनुभव किया, तो मुझे लगा था कि मैं अपने विश्वास पर अटल रहा, और आशीष पाने की इच्छा को त्याग दिया। मगर अब मेरी बीमारी पहले से बदतर बनकर वापस आ गई है, मुझे फिर से उजागर किया गया है। मैंने जाना कि आशीष पाने की मेरी इच्छा की जड़ें गहराई तक समायी हैं और मैं परमेश्वर की परीक्षा में सफ़ल नहीं हो पाया। अगर बार-बार मेरा परीक्षण और शुद्धिकरण नहीं किया गया होता, तो आशीष पाने की मेरी इस गहरी इच्छा और मेरी बेतुकी चाहतों को समझ पाना मुश्किल था, शुद्ध होना और बदलना तो मुमकिन ही नहीं था। साथ ही, मैंने परमेश्वर के पवित्र और धार्मिक स्वभाव को जाना। वो इंसान के मन की परीक्षा लेता है, इसलिए उसे मेरी कमियों और भ्रष्टता के बारे में पता है। उसने मेरी बीमारी का इस्तेमाल मुझे शुद्ध करने के लिए किया, मुझे खुद को जानने, सत्य की खोज करने और अपने भ्रष्ट स्वभाव को ठीक करने के लिए मजबूर किया। परीक्षण और शुद्धिकरण परमेश्वर के प्रेम के दो पहलू हैं!

फिर मैंने अपने बर्ताव पर विचार किया, आखिर क्यों बीमारी के वक्त, मैंने परमेश्वर को गलत समझा और उसे दोषी ठहराया। क्या मैं अब भी परमेश्वर के साथ सौदेबाजी नहीं कर रहा था? क्या मैं हमेशा परमेश्वर की योजनाओं को ठुकराकर, सिर्फ उससे आशीष पाना नहीं चाहता था? मैंने हमेशा परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने की कोशिश की, मगर इसकी वजह क्या थी? थोड़ी देर बाद, मैंने परमेश्वर के कुछ वचन पढ़े: "सभी लोग स्वयं के लिए जीते हैं। मैं तो बस अपने लिए सोचूँगा, बाकियों को शैतान ले जाए—यह मानव प्रकृति का निचोड़ है। लोग अपनी ख़ातिर परमेश्वर पर विश्वास करते हैं; वे चीजों को त्यागते हैं, परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाते हैं और परमेश्वर के प्रति वफादार रहते हैं—लेकिन फिर भी वे ये सब स्वयं के लिए करते हैं। संक्षेप में, यह सब स्वयं के लिए आशीर्वाद प्राप्त करने के उद्देश्य से किया जाता है। दुनिया में, सब कुछ निजी लाभ के लिए होता है। परमेश्वर पर विश्वास करना आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए है, और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए ही कोई व्यक्ति सब कुछ छोड़ देता है, और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए कोई व्यक्ति बहुत दुःख का भी सामना कर सकता है। यह सब मनुष्य की भ्रष्ट प्रकृति का प्रयोगसिद्ध प्रमाण है।" "किसी भी समस्या का समाधान करना परमेश्वर से लोगों की अपेक्षाओं के समाधान से अधिक मुश्किल नहीं है। अगर परमेश्वर का कोई भी कार्य तुम्हारी सोच के अनुरूप नहीं है और अगर वह तुम्हारी सोच के अनुसार कार्य नहीं करता ह, तो तुम उसका विरोध कर सकते हो—इससे पता चलता है कि अपनी प्रकृति में मनुष्य परमेश्वर विरोधी है। इस समस्या को जानने और इसका समाधान करने के लिये आपको सत्य के अनुसरण का रास्ता अपनाना चाहिये। जो लोग सत्य से रहित हैं वे परमेश्वर से बहुत अधिक अपेक्षाएं रखते हैं, जबकि जो सचमुच सत्य को समझते हैं वे कोई मांग नहीं करते; वे सिर्फ़ यह महसूस करते हैं कि उन्होंने परमेश्वर को अधिक संतुष्ट नहीं किया है, वे उतने आज्ञाकारी नहीं हैं जितने कि होने चाहिये। जब लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वे हमेशा उससे कुछ न कुछ मांगते हैं, जो उनके भ्रष्ट स्वभाव को दर्शाता है। अगर तुम इसे गंभीर समस्या नहीं मानते, अगर तुम इसे ज़रूरी नहीं मानते, तो तुम्हारे मार्ग में जोखिम और छिपे हुए खतरे होंगे। तुम ज़्यादातर चीज़ों का समाधान कर सकते हो, लेकिन जब इसमें तुम्हारा भाग्य, संभावनाएं और मंज़िल शामिल होते हैं, तो तुम इनका समाधान नहीं कर सकते। उस समय, अगर तुम सत्य से रहित हो, तो फिर से अपने पुराने तरीकों को चुन लोगे और इस तरह नष्ट किए जाने वालों में शामिल हो जाओगे" (मसीह की बातचीत के अभिलेख)। परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन से मुझे ये समझने में मदद मिली कि परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने की इन कोशिशों की असली वजह ये शैतानी विष थे, जैसे कि "हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाये," और "फ़ायदा न हो तो उंगली भी मत उठाओ"। मेरे हर काम में, मेरा ध्यान हमेशा अपना फायदा सोचने और आशीष पाने पर रहता था। अपना कर्तव्य निभाते हुए भी हमेशा मेरी मंशाएं और बुरे इरादे होते थे। मैं परमेश्वर के साथ पूरी तरह वफ़ादार नहीं रहा। मैं जिस मार्ग पर चलता आया हूँ उसके बारे में सोचा जाए, तो मैंने हमेशा ही परमेश्वर के कार्य के लिए मामूली त्याग किये हैं, दरअसल मैं तो इन मामूली त्यागों के बदले में महान आशीष पाना चाहता था। परमेश्वर का आशीष पाने के लिए, कोई भी पीड़ा सार्थक लगती थी। मगर जब मेरी चाहतें पूरी नहीं हो पायीं और मैं बार-बार बीमार होने लगा, इस हद तक बीमार कि मैं मरने वाला था, तब परमेश्वर को लेकर मेरी सारी ग़लतफ़हमियों, उस पर दोष लगाने, उसका विरोध करने और धोखा देने वाले बर्ताव का खुलासा हुआ। मैंने अपनी मंज़िल पाने के लिए अपना कर्तव्य निभाया। मैं परमेश्वर का इस्तेमाल कर रहा था, उसे धोखा दे रहा था। मैंने अपना विवेक और अपनी समझ खो दी। मैं बुरा और नीच बन गया! अगर परमेश्वर के आयोजनों ने बार-बार मुझे उजागर नहीं किया होता, तो फ़िर मैं अपने स्वार्थ और झूठ को कभी नहीं जान पाता। मैंने आशीष पाने की अपनी कोशिश को सही समझा और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पीछे छोड़ दिया। मैंने जो भी काम किये, जितने भी त्याग किये, उनका कोई मोल नहीं था—परमेश्वर कभी इसकी प्रशंसा नहीं करेगा। अगर मैंने सत्य की खोज नहीं की, अगर मेरी मंशा अब भी अपने लिए आशीष पाने की ही रही, तो परमेश्वर मुझसे नफ़रत करेगा और मुझे दंड देगा। मैं परमेश्वर के वचनों का आभारी हूँ जिसने मुझे प्रबुद्ध किया, इस बीमारी के ज़रिये खुद को जानने दिया और अपनी बेतुकी चाहतों को त्यागने में मेरी मदद की। ये मेरे लिये परमेश्वर का उद्धार है! मैंने इस बारे में जितना सोचा, परमेश्वर का प्रेम मुझे उतना ही ज़्यादा महान लगने लगा। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की: "परमेश्वर! मुझे कैंसर हुआ, इसके पीछे तुम्हारी नेक इच्छा है। मेरी ज़िंदगी और मौत तुम्हारे हाथों में है। मैं तुम्हारी आज्ञा का पालन करूँगा, तुम्हें संतुष्ट करने के लिए गवाही भी दूँगा।"

प्रार्थना के बाद, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा: "तुम अय्यूब के परीक्षणों से गुजरते हो और इसी समय तुम पतरस के परीक्षणों से भी गुज़रते हो। जब अय्यूब की परीक्षा ली गई, तो उसने गवाही दी, और अंत में उसके सामने यहोवा प्रकट हुआ था। उसके गवाही देने के बाद ही वह परमेश्वर का चेहरा देखने के योग्य हुआ था। यह क्यों कहा जाता है : 'मैं गंद की भूमि से छिपता हूँ, लेकिन खुद को पवित्र राज्य को दिखाता हूँ?' इसका मतलब यह है कि जब तुम पवित्र होते हो और गवाही देते हो केवल तभी तुम परमेश्वर का चेहरा देखने का गौरव प्राप्त कर सकते हो। यदि तुम उसके लिए गवाह नहीं बन सकते हो, तो तुम्हारे पास उसके चेहरे को देखने का गौरव नहीं है। यदि तुम शुद्धिकरण का सामना करने में पीछे हट जाते हो या परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत करते हो, इस प्रकार परमेश्वर के लिए गवाह बनने में विफल हो जाते हो और शैतान की हँसी का पात्र बन जाते हो, तो तुम्हें परमेश्वर का प्रकटन प्राप्त नहीं होगा। यदि तुम अय्यूब की तरह हो, जिसने परीक्षणों के बीच अपनी स्वयं की देह को धिक्कारा था और परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत नहीं की थी, और अपने शब्दों के माध्यम से, शिकायत या पाप किए बिना अपनी स्वयं की देह का तिरस्कार करने में समर्थ था, तो यह गवाह बनना है। जब तुम किसी निश्चित अंश तक शुद्धिकरणों से गुज़रते हो और फिर भी अय्यूब की तरह हो सकते हो, परमेश्वर के सामने सर्वथा आज्ञाकारी और उससे किसी अन्य अपेक्षा या तुम्हारी धारणाओं के बिना, तब परमेश्वर तुम्हें दिखाई देगा" (वचन देह में प्रकट होता है)। परमेश्वर के वचनों से मुझे उसके पवित्र और धार्मिक सार का पता चला। परमेश्वर सिर्फ़ उसी की सुनता है जो परीक्षण और शुद्धिकरण का सामना करते हुए भी मजबूत गवाही देता है। जब परमेश्वर ने अय्यूब की परीक्षा ली, तो शैतान ने याकूब की संपत्ति, उसके बच्चे, उसकी सेहत और ख़ुशी, सब कुछ छीन ली, उसका शरीर घावों से भर गया। फ़िर भी उसने परमेश्वर से शिकायत नहीं की या उसे दोष नहीं दिया। उसने सिर्फ़ खुद से नफ़रत की और खुद को शाप दिया। इस महान परीक्षण का सामना करते हुए भी, वो एक सृजित प्राणी के रूप में परमेश्वर की प्रभुता का पालन करने और उसके नाम का गुणगान करने में सक्षम रहा। उसने ये भी कहा: "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया" (अय्यूब 1:21)। ये वचन शैतान के सामने परमेश्वर के लिए एक खूबसूरत और ज़बरदस्त गवाही जैसे थे, आखिर में, परमेश्वर ने अय्यूब की सुनी। अय्यूब की ज़िंदगी की यही एहमियत थी। मुझे इस परीक्षण का सामना करना पड़ा, क्योंकि परमेश्वर मुझ पर ख़ास दया दिखा रहा था। मुझे याकूब की तरह परमेश्वर के आयोजनों का पालन करना था। मुझे अपने कैंसर के डर से पीछे हटने के बजाय अपनी ज़िंदगी परमेश्वर के हवाले कर देनी चाहिए, ताकि मैं शैतान के सामने परमेश्वर के लिए मजबूत और ज़बरदस्त गवाही दे सकूँ, जिससे उसके दिल को सुकून मिले। सिर्फ़ यही असली वफ़ादारी और सच्चा आज्ञापालन है! मैंने अपनी सभी चिंताओं को छोड़ परमेश्वर की प्रभुता के आगे खुद को समर्पित कर दिया, जल्द ही मेरी हालत में सुधार आने लगा। मुझे भूख भी अच्छी लगने लगी, मैं आराम से चलने-फिरने लगा, अपना कर्तव्य भी अच्छे से निभाने लगा। बाद में, मेरी बेटियाँ चेकअप के लिए मुझे अस्पताल ले गयीं। डॉक्टर को इस चमत्कार पर विश्वास नहीं हो रहा था। उसने कहा कि मेरे जैसे मरीज़ बहुत कम होते हैं, बिना किसी इलाज के मेरा ठीक हो जाना वाकई किसी चमत्कार से कम नहीं था। तब मैं समझ गया कि परमेश्वर ने मेरी रक्षा की है। मुझे एहसास हुआ कि मेरी जिंदगी परमेश्वर के हाथों में है, मैंने सभी चीज़ों पर परमेश्वर की प्रभुता का अनुभव किया।

कुछ समय बाद, मेरी बीमारी फिर से वापस आ गयी। मेरी पत्नी और बेटियाँ मुझे अस्पताल ले गयीं, वहाँ मुख्य चिकित्सक ने मेरी गंभीर हालत को देखकर, मेरी जाँच करने के लिए एक विशेषज्ञ को बुलाया। लैब की जाँच के नतीजे आने पर, विशेषज्ञ ने कहा कि उनके पास मेरी बीमारी के इलाज के लिए ज़रूरी सारे उपकरण नहीं हैं, उसने सलाह दी कि हम 2,00,000 युआन चुका दें ताकि मामले को प्रांतीय अस्पताल में भेजा जा सके, जहाँ शायद मेरा इलाज मुमकिन हो। मेरी बेटी ने रोते हुए मेरी पत्नी से कहा: "आपने सुना, उन्होंने क्या कहा? डैड का इलाज यहाँ मुमकिन नहीं है। पिछले कुछ सालों में हमारे गाँव में कैंसर से 30 से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है ..." मेरी पत्नी का चेहरा आँसुओं से भीग गया। मुझे एक निकम्मे इंसान की तरह महसूस होने लगा। एक बार फ़िर, मुझे अपनी मौत करीब आती दिखने लगी और मैं फिर से शिकायत करने लगा। ये बीमारी इतनी गंभीर होकर वापस कैसे आ सकती है? मगर इस बार, मैंने खुद को दोषी ठहराया। मुझे परमेश्वर की अवज्ञा करने का अफ़सोस हुआ। मैंने अपनी मौत से सामना होने के सभी मौकों के बारे में सोचा, तब कैसे परमेश्वर ने मेरी रक्षा करते हुए हर बार मुझे ज़िंदा रखा। मैंने परमेश्वर की प्रभुता को अच्छी तरह समझ लिया था, तो फिर मैं परमेश्वर को क्यों नहीं समझ सका? ज़िंदगी और मौत पर परमेश्वर का अधिकार है, ना कि इन डॉक्टरों का! इसलिए, मैं परमेश्वर के सामने जाकर प्रार्थना करने लगा। मैंने कहा: "हे परमेश्वर, एक बार फ़िर, मैं अपनी मौत का सामना करना कर रहा हूँ। मुझे पता है इसके पीछे तुम्हारी नेक इच्छा है। मेरी ज़िंदगी और मौत तुम्हारे हाथों में है। मैं तुम्हारी आज्ञा का पालन करूँगा और तुम्हारे लिए गवाही दूँगा!" प्रार्थना के बाद, मैंने परमेश्वर के कुछ वचन पढ़े: "सर्वशक्तिमान की नज़रों में सम्पूर्ण मनुष्यजाति में से किसकी देखभाल नहीं की जाती है? कौन सर्वशक्तिमान द्वारा पूर्वनियति के बीच नहीं रहता है? क्या मनुष्य का जीवन और मरण उसकी अपनी पसंद से होता है? क्या मनुष्य अपने भाग्य को खुद नियंत्रित करता है? बहुत से लोग मृत्यु की कामना करते हैं, फिर भी वह उनसे काफी दूर रहती है; बहुत से लोग ऐसे होना चाहते हैं जो जीवन में मज़बूत हैं और मृत्यु से डरते हैं, फिर भी उनकी जानकारी के बिना, उन्हें मृत्यु की खाई में डुबाते हुए, उनकी मृत्यु का दिन निकट आ जाता है; बहुत से लोग आसमान की ओर देखते हैं और गहरी आह भरते हैं; बहुत से लोग अत्यधिक रोते हैं, क्रन्दन करते हुए सिसकते हैं; बहुत से लोग परीक्षणों के बीच गिर जाते हैं; बहुत से लोग प्रलोभन के बंदी बन जाते हैं। यद्यपि मैं मनुष्य को मुझे स्पष्ट रूप से देखने की अनुमति देने के लिए व्यक्तिगत रूप से प्रकट नहीं होता हूँ, तब भी बहुत से लोग मेरे चेहरे को देख कर भयभीत हो जाते हैं, गहराई तक डरते हैं कि मैं उन्हें मार गिराऊँगा, कि मैं उन्हें नष्ट कर दूँगा। क्या मनुष्य वास्तव में मुझे जानता है या नहीं? कोई भी निश्चित रूप से नहीं कह सकता है। क्या यह ऐसा नहीं है?" (वचन देह में प्रकट होता है)। परमेश्वर के वचनों में सामर्थ्य और अधिकार था, जिससे मुझे हिम्मत मिली। परमेश्वर सृजनकर्ता है, सभी चीज़ों पर उसका नियंत्रण है। एक सृजित प्राणी के रूप में, मैं जानता था कि मुझे सृजनकर्ता की प्रभुता का पालन करना होगा। अगर मैं अपने जीवन को मूल्यवान समझकर परमेश्वर को दोषी ठहराने लगा, तो इसका मतलब उसका विरोध करना और उसे धोखा देना होगा, मैं उससे नज़रें नहीं मिला सकूँगा, फिर मेरी ज़िंदगी का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। ये सब समझने के बाद, अब मैंने अपनी बीमारी या मौत से बेबस महसूस नहीं किया। मैंने अपनी पत्नी और बेटियों से कहा: "उदास मत हो। भले ही डॉक्टर ने मेरी मौत घोषित कर दी हो, मुझे यकीन है कि मेरी ज़िंदगी और मौत परमेश्वर के हाथों में है। परमेश्वर के सभी कार्य धार्मिक होते हैं। मैं अपनी आख़री सांस तक परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए दृढ़ता से गवाही दूँगा!"

फिर, मैं आराम करने के लिए घर वापस आ गया। हर रोज़ परमेश्वर के सामने जाकर प्रार्थना करने लगा और परमेश्वर के वचन पढ़ने लगा। मुझे सुकून और शांति का एहसास हुआ। डॉक्टरों ने इंजेक्शन के लिए मुझे सीरम के दो डब्बे दिए, जिनकी कीमत दस युआन से भी कम थी। मैं एक महीने तक उन्हें लगाता रहा, जल्द ही मेरी उँगलियों की रंगत बदलने लगी, मुझे भूख भी ठीक से लगने लगी। धीरे-धीरे, मेरी हिम्मत और ताकत वापस आने लगी, मैं बीमार होने से पहले की स्थिति में वापस आ गया। जब मैं चेकअप के लिए फिर से अस्पताल गया, डॉक्टर ने कहा कि मेरा इतनी जल्दी ठीक होना एक चमत्कार था। परमेश्वर का धन्यवाद! मैं जानता था ये सब परमेश्वर की ही मेहरबानी है, उसके अलावा मुझे और कोई नहीं बचा पाता। जैसा कि परमेश्वर कहता है: "स्पष्ट रूप से, न तो मानवजाति, न ही इस प्राकृतिक संसार में कोई प्राणी, जीवन और मृत्यु की सामर्थ्य रखता है, परन्तु केवल सृजनकर्ता ही सामर्थ्य रखता है, जिसका अधिकार अद्वितीय है। मनुष्य का जीवन और उसकी मृत्यु प्राकृतिक संसार के कुछ नियमों का परिणाम नहीं है, बल्कि सृजनकर्ता के अधिकार की संप्रभुता का एक परिणाम है" (वचन देह में प्रकट होता है)। मैंने परमेश्वर की प्रभुता, अधिकार और उसके चमत्कारी कर्मों को अनुभव किया। मैंने उसके प्रेम और उद्धार को देखा। मैंने दिल की गहराई से परमेश्वर का धन्यवाद और उसका गुणगान किया। मेरे गाँव के सभी लोग मुझे देखकर हैरान रह गए। उनका मानना था कि मेरा बचना नामुमकिन था, उन्होंने मुझे दोबारा इतना स्वस्थ देखने की उम्मीद ही छोड़ दी थी, इस बीमारी से बाल-बाल बचना मेरी खुशकिस्मती थी! मगर मेरा दिल जानता था: इसका मेरी किस्मत से कोई लेना-देना नहीं था। ये परमेश्वर के सामर्थ्य और अधिकार से मुमकिन हुआ। परमेश्वर ने मुझे बचाया! जल्द ही, मैं कलीसिया में फ़िर से अपना कर्तव्य निभाने लगा। पाँच साल बीत गए, मगर वो बीमारी मुझे फ़िर कभी नहीं हुई। ये मेरी उम्मीद से कहीं ज़्यादा था। मेरे साथ जो भी हुआ, उसके लिए मैंने परमेश्वर का धन्यवाद किया।

बीमारी के इन परीक्षणों से, परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन से, और सच्चाई का सामना करके, मैं अपनी आस्था और भ्रष्ट स्वभाव के पीछे की अपनी गलत सोच को कुछ समझ पाया, मैंने परमेश्वर की प्रभुता, उसके धार्मिक स्वभाव और ख़ूबसूरत सार को समझा। मैंने आशीष पाने की अपनी इच्छा को त्यागकर, एक सार्थक और मूल्यवान जीवन जीने का तरीका सीखा। मैं परमेश्वर की दया का बहुत आभारी हूँ!

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