79. परीक्षणों के बीच जागना

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार करने के बाद, मैंने खुद को हर दिन परमेश्वर के वचन पढ़ने, सुसमाचार का प्रचार करने और अपना कर्तव्य निभाने में ढाल लिया। हालात चाहे जैसे भी रहे हों, मैंने कभी छुट्टी नहीं ली। कुछ समय बाद पता चला कि मुझे थायरॉइड की बीमारी है और डॉक्टर ने मुझे आराम करने की सलाह दी। मगर मैंने सोचा, "प्रभु की वापसी का स्वागत करना आसान नहीं है, मैं इस छोटी सी बीमारी को अपने कर्तव्य के बीच नहीं आने दे सकती। अगर मैं अपना कर्तव्य निभाती रहूँगी, परमेश्वर मेरी रक्षा करेगा।"

करीब एक साल बाद मेरी बीमारी बद से बदतर हो गयी। खाना-पीना तक मुश्किल हो गया, मैं जाँच के लिए अस्पताल गयी। डॉक्टर ने बताया कि मेरी हालत बहुत ख़राब है और जल्द से जल्द मेरा ऑपरेशन करना होगा। नहीं तो मेरी बीमारी जानलेवा बन जायेगी। मैं हैरान रह गयी। कुछ समझ नहीं आ रहा था। मैंने कभी सोचा नहीं था कि मेरी बीमारी इतनी गंभीर हो जायेगी। मैं उस वक्त अपने जीवन के तीसरे दशक में ही थी, "मैं अभी जवान हूँ। अगर मेरी बीमारी का इलाज नहीं हो सका तो क्या होगा? जब से मैंने परमेश्वर में विश्वास करना शुरू किया है, मैं उत्साह के साथ अपना कर्तव्य निभाती आयी हूँ। मैंने अपनी नौकरी भी छोड़ दी। परमेश्वर मेरी रक्षा क्यों नहीं कर रहा? मेरी बीमारी इतनी गंभीर कैसे हो गयी?" मेरे ऑपरेशन के एक दिन पहले की दोपहर, मैं अस्पताल के एक और वार्ड से गुज़री। उसमें एक मरीज़ की मौत हो गयी थी और उसके परिवार वाले रो रहे थे। ये देखकर मैं काफ़ी डर गयी। ऐसा लगने लगा जैसे मौत मेरे भी करीब आ रही हो, अगली सुबह ही मेरा ऑपरेशन होने वाला था। डॉक्टर ने बताया था कि इसमें बहुत ख़तरा है, और सर्जरी के नतीज़े का अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता। "अगर ऑपरेशन कामयाब नहीं रहा तो क्या होगा? मैंने अपनी आस्था में इतने त्याग किये हैं— क्या उनका कोई फायदा नहीं?" मैं अपने वार्ड में जाकर लेट गयी, मैं जितना इस बारे में सोचती, ये बात मुझे उतना ही पागल करने लगी। मैं परमेश्वर से मेरी रक्षा करने, अपने सामने मुझे शांत रखने, और इन हालातों से खुद को बेबस महसूस करने से रोकने के लिए प्रार्थना करती रही। प्रार्थना के बाद, मैंने परमेश्वर के वचनों के इस अंश को याद किया: "सर्वशक्तिमान की नज़रों में सम्पूर्ण मनुष्यजाति में से किसकी देखभाल नहीं की जाती है? कौन सर्वशक्तिमान द्वारा पूर्वनियति के बीच नहीं रहता है? क्या मनुष्य का जीवन और मरण उसकी अपनी पसंद से होता है? क्या मनुष्य अपने भाग्य को खुद नियंत्रित करता है? बहुत से लोग मृत्यु की कामना करते हैं, फिर भी वह उनसे काफी दूर रहती है; बहुत से लोग ऐसे होना चाहते हैं जो जीवन में मज़बूत हैं और मृत्यु से डरते हैं, फिर भी उनकी जानकारी के बिना, उन्हें मृत्यु की खाई में डुबाते हुए, उनकी मृत्यु का दिन निकट आ जाता है; बहुत से लोग आसमान की ओर देखते हैं और गहरी आह भरते हैं; बहुत से लोग अत्यधिक रोते हैं, क्रन्दन करते हुए सिसकते हैं; बहुत से लोग परीक्षणों के बीच गिर जाते हैं; बहुत से लोग प्रलोभन के बंदी बन जाते हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 11')। परमेश्वर के वचनों ने मुझे विश्वास दिया। सभी इंसानों की किस्मत परमेश्वर के हाथों में है, हम खुद से अपनी किस्मत नहीं चुन सकते। ऑपरेशन का कामयाब होना या न होना, मेरी जिंदगी और मौत, सब परमेश्वर के हाथों में है। परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन से, अब मुझे डर नहीं लग रहा था। मैं अपने ऑपरेशन को लेकर परमेश्वर पर विश्वास रखने और उसकी सत्ता के प्रति समर्पित होने को तैयार थी।

उस दिन शाम को वार्ड के सभी मरीज़ सो रहे थे, मगर मैं एक झपकी तक नहीं ले सकी, बस लेटी हुई थी। यही सोचती रही कि मुझे ये बीमारी होने देने के पीछे परमेश्वर की क्या इच्छा है और आखिर वो मुझे क्या सीख देना चाहता है। फ़िर परमेश्वर के वचनों का ये अंश मुझे याद आया: "बहुत-से लोग केवल इसलिए मुझ पर विश्वास करते हैं कि मैं उनको चंगा कर सकता हूँ। बहुत-से लोग सिर्फ इसलिए मुझ पर विश्वास करते हैं कि मैं उनके शरीर से अशुद्ध आत्माओं को निकालने के लिए अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करूँगा, और बहुत-से लोग मुझसे बस शांति और आनंद प्राप्त करने के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं। बहुत-से लोग मुझसे सिर्फ और अधिक भौतिक संपदा माँगने के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं। बहुत-से लोग मुझसे सिर्फ इस जीवन को शांति से गुज़ारने और आने वाले संसार में सुरक्षित और स्वस्थ रहने के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं। बहुत-से लोग केवल नरक की पीड़ा से बचने के लिए और स्वर्ग के आशीष प्राप्त करने के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं। बहुत-से लोग केवल अस्थायी आराम के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं और आने वाले संसार में कुछ हासिल करने की कोशिश नहीं करते। जब मैंने अपना क्रोध नीचे मनुष्यों पर उतारा और उसका सारा आनंद और शांति छीन ली, तो मनुष्य संदिग्ध हो गया। जब मैंने मनुष्य को नरक का कष्ट दिया और स्वर्ग के आशीष वापस ले लिए, तो मनुष्य की लज्जा क्रोध में बदल गई। जब मनुष्य ने मुझसे खुद को चंगा करने के लिए कहा, तो मैंने उस पर ध्यान नहीं दिया और उसके प्रति घृणा महसूस की; तो मनुष्य मुझे छोड़कर चला गया और बुरी दवाइयों तथा जादू-टोने का मार्ग खोजने लगा। जब मैंने मनुष्य द्वारा मुझसे माँगा गया सब-कुछ वापस ले लिया, तो हर कोई बिना कोई निशान छोड़े गायब हो गया। इसलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य मुझ पर इसलिए विश्वास करता है, क्योंकि मैं बहुत अनुग्रह देता हूँ, और प्राप्त करने के लिए और भी बहुत-कुछ है" ("मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ" में 'परमेश्वर में विश्वास करने के पीछे मनुष्य के घृणास्पद इरादे')।

परमेश्वर के वचन मेरे हालात को साफ़ तौर पर बयाँ कर रहे थे। मैं बस बदले में आशीष और अनुग्रह पाने के लिए परमेश्वर पर विश्वास करती थी; मैंने सिर्फ़ अपने फ़ायदे के लिए परमेश्वर में आस्था रखी। मुझे एहसास हुआ कि जब से डॉक्टर ने बताया कि मेरी बीमारी पहले से गंभीर हो गयी है, मैं मन-ही-मन परमेश्वर से लड़ रही थी, ये सोचकर कि अगर मैंने परमेश्वर के लिए सब कुछ त्याग दिया और खुद को खपाती रही, तो मुझे ये गंभीर बीमारी किसी भी हालत में नहीं होनी चाहिए थी, उसे मेरी रक्षा करनी चाहिए। मुझे परमेश्वर को लेकर बहुत सी ग़लतफ़हमियाँ और शिकायतें थीं। फ़िर जब मैंने वार्ड में उस मरे हुए मरीज़ को देखा तो मैं और भी ज़्यादा घबरा गयी कि मेरा ऑपरेशन भी कामयाब नहीं होगा। मुझे लगा कि अपनी आस्था में मैंने जो भी त्याग किया और खुद को खपाया, वो मुझे बचा नहीं सकता और न ही मुझे परमेश्वर के राज्य में प्रवेश दिला सकता है, और मुझे कुछ भी हासिल नहीं हुआ। परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन को तथ्यों के सामने रखकर देखने से मुझे पता चला कि अपना कर्तव्य निभाने के पीछे मेरा इरादा सिर्फ़ फ़ायदे और आशीष पाना था। जब परमेश्वर ने मुझे शारीरिक सुख और खुशी नहीं दी, तो मैं उसे गलत समझकर उसे दोषी ठहराने लगी। ये परमेश्वर में आस्था रखना नहीं है! मैं तो बस परमेश्वर के साथ सौदेबाजी कर रही थी। मैं कितनी स्वार्थी और नीच थी! ऐसी आस्था परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप कैसे हो सकती है? हमें शैतान के चंगुल से हमेशा के लिए बचाने के इरादे से, परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए देहधारी हुआ, मनुष्य को शुद्ध करके बचाने के लिए उसने सत्य व्यक्त किये, ताकि हम शैतान के प्रभाव से मुक्त हो सकें और हमारे जीवन स्वभाव को बदलकर हमें बचाया जा सके। मैं परमेश्वर के वचनों के पोषण और सिंचन से बहुत खुश थी। मगर जब मुझे परीक्षण का सामना करना पड़ा, तब न मैंने परमेश्वर की इच्छा समझी और न ही परीक्षणों के दौरान परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए गवाही देने के बारे में सोचा, और अब मुझे परमेश्वर का अनुग्रह और आशीष चाहिए। बीमार पड़ते ही मैं परमेश्वर से शिकायत करने लगी। मैं बहुत ही विद्रोही थी, मुझमें समझ या विवेक नाम की कोई चीज़ नहीं थी। मैं परमेश्वर के सामने रहने के काबिल नहीं थी। इसके बावजूद परमेश्वर ने मुझे छोड़ा नहीं, बल्कि उसने मुझे प्रबुद्ध करने और मार्ग दिखाने के लिए अपने वचनों का इस्तेमाल किया ताकि मैं उसकी इच्छा को समझ सकूँ, अपनी भ्रष्टता और कमियों को पहचान सकूँ। मैंने अपने लिए परमेश्वर के प्रेम को महसूस किया और मुझे इससे हौसला मिला। मैंने मन-ही-मन परमेश्वर से प्रार्थना करते हुए कहा कि मैं अगले दिन एक आज्ञाकारी मन के साथ अपने ऑपरेशन का सामना करना चाहती हूँ। अगली सुबह, ऑपरेशन रूप में ले जाते समय मेरा मन बहुत शांत था। ऑपरेशन में करीब 9 घंटे लगे। जब मुझे होश आया, तो डॉक्टर ने मुझे बताया कि ऑपरेशन कामयाब रहा। मैंने मन-ही-मन परमेश्वर को धन्यवाद दिया; मैं जानती थी कि इस पूरे समय परमेश्वर मेरे साथ रहकर मेरी रक्षा कर रहा था। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद मैं बहुत जल्दी ठीक हो गयी, जल्द ही, मैं कलीसिया में अपना कर्तव्य भी संभालने लगी।

दो साल बीत गये, फिर मुझे ऐसा महसूस होने लगा जैसे थोड़ी सी मेहनत करते ही मेरे दिल की धड़कन तेज हो जाती है, तो मैं जाँच के लिए फिर से अस्पताल गयी। डॉक्टर ने बताया कि मेरी थायरॉइड की बीमारी वापस आ गयी है और हमें ध्यान से इसका इलाज करना होगा, नहीं तो इसे काबू करना नामुमकिन हो जाएगा। मैंने मन-ही-मन सोचा, "मेरा परीक्षण और शुद्धिकरण हो चुका है। अब मैं सिर्फ़ आशीष पाने के लिए खुद को परमेश्वर पर विश्वास करने नहीं दे सकती। इस बीमारी का नतीज़ा चाहे कुछ भी हो, मैं परमेश्वर को दोष नहीं दूँगी।" उस दौरान, मैंने दवा लेते हुए अपना कर्तव्य निभाना जारी रखा। हालांकि, साल-दर-साल मेरी बीमारी बद से बदतर होती जा रही थी। मेरी ताकत ख़तम हो गयी, मेरे पैर सूजकर सुन्न पड़ गये, और मेरी पीठ इतनी दुखने लगी कि सीधे खड़ी रहना भी मुश्किल हो गया। कुछ सीढ़ियाँ चढ़ने में ही मेरी साँस फूलने लगती, दिल इतनी ज़ोर से धड़कने लगता मानो यह छाती से बाहर निकल आयेगा। मुझे लगा मैं कभी भी चक्कर खाकर गिर सकती हूँ। मुझे चिंता होने लगी: "अगर मेरी बीमारी और भी ज़्यादा बिगड़ गयी, तो अपना कर्तव्य कैसे निभाऊँगी? अगर मैं अपना कर्तव्य नहीं निभा सकी, तो क्या तब भी परमेश्वर मेरी सराहना करेगा, मेरा अंत और मेरी मंजिल अच्छी होगी? क्या मेरी सारी आस्था बेकार हो गयी?" मगर फ़िर मैंने सोचा, "मुझे बस परमेश्वर के लिये खुद को खपाते रहना है, मेरी देखभाल और रक्षा वो ही करेगा। मैं आखिरी साँस तक अपना कर्तव्य निभाते हुए अच्छे कर्म करती रहूँगी। इससे मुझे अच्छी मंज़िल मिलेगी।" फिर मैं इस बीमारी का दर्द सहते हुए अपना कर्तव्य निभाती रही।

एक दिन, मैंने अपना नाश्ता खत्म किया ही था कि अचानक मेरे मसूड़ों से खून निकलने लगा। खून निकलना शाम तक भी बंद नहीं हुआ, तो मैं जाँच के लिए अस्पताल भागी। डॉक्टर ने बताया कि मुझे सिस्टेमेटिक लूपस एरिथीमेटोसस और लूपस नेफ्रैटिस हो गया है। फिर कहा कि इनका इलाज बहुत मुश्किल है और इनका मृत्यु दर भी काफी ज़्यादा है। उन्होंने ये भी बताया कि मेडिकल कम्युनिटी के पास इसके इलाज का कोई तरीका नहीं है, मेरी हालत बहुत गंभीर थी, और शायद मेरे पास एक महीने का भी समय न हो। ये सुनकर मैं एकदम हैरान रह गयी। मैंने सोचा, "मैं बीमार होने के बावजूद अपना कर्तव्य निभाती रही और मैंने अपने कर्तव्य में प्रगति भी की। मुझे ऐसी बीमारी कैसे हो गयी जिसका इलाज इतना मुश्किल है, इसका मतलब है कि मैं एक महीने भी जिंदा नहीं रह पाऊँगी? मैं इतने सालों से परमेश्वर में विश्वास करती आयी हूँ। मैंने परमेश्वर के लिए खुद को खपाने के लिए अपना परिवार और नौकरी तक छोड़ दी। क्या मैंने ये सब परमेश्वर से सराहना पाने, उसके राज्य में प्रवेश करने और आशीष पाने के लिए नहीं किया था? फिर भी, न तो मुझे परमेश्वर से आशीष मिला, और अब तो मैं जल्दी ही मरने भी वाली हूँ। मैं इस वक्त बहुत दुखी हूँ।"

उस शाम, मैं सो नहीं सकी, सिर्फ़ करवटें बदलती रही। मैं यही सोचती रही कि कैसे मैं एक महीने भी ज़िंदा नहीं रह सकूँगी। मैं अब भी जवान थी मगर मेरी ज़िंदगी खत्म होने वाली थी। मैं कभी सोच भी नहीं सकती थी कि इतने सालों तक परमेश्वर में विश्वास करने के बाद भी, उसके राज्य की ख़ूबसूरती देखे बिना ही मर जाऊँगी। ये सच स्वीकार करना मुश्किल था। मेरे आँसू रुक ही नहीं रहे थे; मैं बहुत दुखी थी और कमज़ोर महसूस कर रही थी। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की: "प्रिय परमेश्वर, जिस परीक्षण का मैं सामना कर रही हूँ उसके पीछे तुम्हारी ही इच्छा है, और मुझे तुम्हें संतुष्ट करने के लिए गवाही देनी चाहिए। मगर अब मैं कमज़ोर महसूस कर रही हूँ, इस सच को स्वीकार कर इसके प्रति समर्पित नहीं हो पा रही हूँ। मुझे राह दिखाओ ताकि मैं तुम्हारी इच्छा समझ सकूँ।"

प्रार्थना के बाद, मैंने परमेश्वर के वचनों में ये पढ़ा: "परमेश्वर में अपने विश्वास में लोग, भविष्य के लिए आशीर्वाद पाने की खोज करते हैं; यह उनकी आस्‍था में उनका लक्ष्‍य होता है। सभी लोगों की यही अभिलाषा और आशा होती है, लेकिन, उनकी प्रकृति के भीतर के भ्रष्टाचार का हल परीक्षण के माध्यम से किया जाना चाहिए। जिन-जिन पहलुओं में तुम शुद्ध नहीं किए गए हो, इन पहलुओं में तुम्हें परिष्कृत किया जाना चाहिए—यह परमेश्वर की व्यवस्था है। परमेश्वर तुम्हारे लिए एक वातावरण बनाता है, परिष्कृत होने के लिए बाध्य करता है जिससे तुम अपने खुद के भ्रष्टाचार को जान जाओ। अंततः तुम उस बिंदु पर पहुंच जाते हो जहां तुम मर जाना और अपनी योजनाओं और इच्छाओं को छोड़ देना और परमेश्वर की सार्वभौमिकता और व्यवस्था के प्रति समर्पण करना अधिक पसंद करते हो। इसलिए अगर लोगों को कई वर्षों का शुद्धिकरण नहीं मिलता है, अगर वे एक हद तक पीड़ा नहीं सहते हैं, तो वे, अपनी सोच और हृदय में देह के भ्रष्टाचार के बंधन से बचने में सक्षम नहीं होंगे। जिन भी पहलुओं में तुम अभी भी शैतान के बंधन के अधीन हो, जिन भी पहलुओं में तुम अभी भी अपनी इच्छाएं रखते हो, जिनमें तुम्हारी अपनी मांगें हैं, यही वे पहलू हैं जिनमें तुम्हें कष्ट उठाना होगा। केवल दुख से ही सबक सीखा जा सकता है, जिसका अर्थ है सत्य पाने और परमेश्वर के इरादे को समझने में समर्थ होना। वास्तव में, कई सत्यों को कष्टदायक परीक्षणों के अनुभव से समझा जाता है। कोई भी व्यक्ति एक आरामदायक और सहज परिवेश में या अनुकूल परिस्थिति में परमेश्वर की इच्छा नहीं समझ सकता है, परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि को नहीं पहचान सकता है, परमेश्वर के धर्मी स्वभाव की सराहना नहीं कर सकता है। यह असंभव होगा!" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परीक्षणों के बीच परमेश्वर को कैसे संतुष्ट करें')। "इससे पहले लोग किस आधार पर रहते थे? सभी लोग स्वयं के लिए जीते हैं। मैं तो बस अपने लिए सोचूँगा, बाकियों को शैतान ले जाए—यह मानव प्रकृति का निचोड़ है। लोग अपनी ख़ातिर परमेश्वर पर विश्वास करते हैं; वे चीजों को त्यागते हैं, परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाते हैं और परमेश्वर के प्रति वफादार रहते हैं—लेकिन फिर भी वे ये सब स्वयं के लिए करते हैं। संक्षेप में, यह सब स्वयं के लिए आशीर्वाद प्राप्त करने के उद्देश्य से किया जाता है। दुनिया में, सब कुछ निजी लाभ के लिए होता है। परमेश्वर पर विश्वास करना आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए है, और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए ही कोई व्यक्ति सब कुछ छोड़ देता है, और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए कोई व्यक्ति बहुत दुःख का भी सामना कर सकता है। यह सब मनुष्य की भ्रष्ट प्रकृति का प्रयोगसिद्ध प्रमाण है" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'बाहरी परिवर्तन और स्वभाव में परिवर्तन के बीच अंतर')। परमेश्वर के वचन पढ़कर, मुझे एहसास हुआ कि शैतान ने हमें इतनी गहराई तक भ्रष्ट कर दिया है कि हमारी आस्था का लक्ष्य सिर्फ़ आशीष पाना रह गया है। परमेश्वर सत्य के प्रति हमारी गलत सोच को बदलने के लिए बार-बार हमारा परीक्षण और शुद्धिकरण करता है ताकि हम अपने जीवन स्वभाव को बदलकर सच में परमेश्वर के प्रति समर्पित हो सकें। जब मैंने पहली बार परमेश्वर में विश्वास करना शुरू किया था, तो मैंने उसे इच्छाओं को पूरा करने वाला एक अक्षय पात्र समझ लिया था। मुझे लगा कि अगर मैं परमेश्वर के लिए त्याग करते हुए खुद को खपाती रही, तो बीमार पड़ने पर वो मेरी देखभाल और रक्षा करेगा। जब मुझे पता चला कि मुझे लूपस है और मैं एक महीने से ज़्यादा नहीं जी पाऊँगी, तो आशीष पाने की मेरी चाह चकनाचूर हो गयी, मैं परमेश्वर से लड़ने लगी और मेरे साथ अन्याय करने के लिए उसे दोषी ठहराने लगी। हालांकि, एक परीक्षण से गुज़रने के बाद मैं जान गयी थी कि मुझे सिर्फ़ आशीष पाने की चाह से परमेश्वर में आस्था नहीं रखनी चाहिए, मगर जब मेरी किस्मत और भविष्य दांव पर लग गये, तो मैं फिर से परमेश्वर को दोषी ठहराने और गलत समझने लगी। आशीष पाने की मेरी इच्छा इतनी प्रबल थी। मैं शैतान के इस जहर के अनुसार जी रही थी कि "हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाये"। मैंने हर काम सिर्फ़ अपने फ़ायदे के लिये किया, मैंने तो अपने कर्तव्य में परमेश्वर के साथ सौदा करके अपने फ़ायदे के लिए उसका इस्तेमाल भी करना चाहा। इसे कर्तव्य निभाना कैसे माना जाएगा? क्या मैं परमेश्वर के खिलाफ़ विद्रोह करके उसका विरोध नहीं कर रही थी? मुझे याद आया कि कैसे पौलुस ने प्रभु के लिए काम किया, कैसे उसने खुद को खपाया और इतना कुछ सहा। मगर कुछ समय काम करने के बाद, वो अपने काम का फ़ायदा उठाने के बारे में सोचने लगा, ताकि परमेश्वर उसे इनाम के तौर पर धार्मिकता का ताज पहना दे। उसने तो बेशर्मी से यह दावा भी किया, "मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्‍वास की रखवाली की है। भविष्य में मेरे लिये धर्म का वह मुकुट रखा हुआ है" (2 तीमुथियुस 4:7-8)। पौलुस ने सत्य का अनुसरण करने के बजाय सिर्फ़ आशीष पाना चाहा; जिस मार्ग पर वो चल रहा था, वह परमेश्वर के विरोध का मार्ग था, और अंत में परमेश्वर ने उसे दंड दिया। मैंने इतने सालों तक सिर्फ़ अनुग्रह और आशीष पाने के लिए परमेश्वर में विश्वास किया था। जब एक परीक्षण और शुद्धिकरण के कारण मेरी ज़िंदगी दांव पर लग गयी, तो मैं बेशर्मों की तरह हंगामा और परमेश्वर का विरोध करने लगी— मुझमें और पौलुस में क्या अंतर रह गया था? परमेश्वर का सार धार्मिक और पवित्र है, उसके राज्य में किसी भी अशुद्ध इंसान का प्रवेश बरदाश्त नहीं किया जायेगा। मेरे जैसी भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से भरी किसी इंसान को परमेश्वर के राज्य में प्रवेश कैसे मिल सकता है? मैं जानती थी कि अगर मैं इस मार्ग पर चलती रही, तो अंत में मुझे भी पौलुस की तरह ही दंड मिलेगा! फ़िर मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा: "मनुष्य की दशा और अपने प्रति मनुष्य का व्यवहार देखकर परमेश्वर ने नया कार्य किया है, जिससे मनुष्य उसके विषय में ज्ञान और उसके प्रति आज्ञाकारिता दोनों से युक्त हो सकता है, और प्रेम और गवाही दोनों रख सकता है। इसलिए मनुष्य को परमेश्वर के शुद्धिकरण, और साथ ही उसके न्याय, व्यवहार और काट-छाँट का अनुभव अवश्य करना चाहिए, जिसके बिना मनुष्य कभी परमेश्वर को नहीं जानेगा, और कभी वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करने और उसकी गवाही देने में समर्थ नहीं होगा। परमेश्वर द्वारा मनुष्य का शुद्धिकरण केवल एकतरफा प्रभाव के लिए नहीं होता, बल्कि बहुआयामी प्रभाव के लिए होता है। केवल इसी तरह से परमेश्वर उन लोगों में शुद्धिकरण का कार्य करता है, जो सत्य को खोजने के लिए तैयार रहते हैं, ताकि उनका संकल्प और प्रेम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाए। जो लोग सत्य को खोजने के लिए तैयार रहते हैं और जो परमेश्वर को पाने की लालसा करते हैं, उनके लिए ऐसे शुद्धिकरण से अधिक अर्थपूर्ण या अधिक सहायक कुछ नहीं है। परमेश्वर का स्वभाव मनुष्य द्वारा सरलता से जाना या समझा नहीं जाता, क्योंकि परमेश्वर आखिरकार परमेश्वर है। अंततः, परमेश्वर के लिए मनुष्य के समान स्वभाव रखना असंभव है, और इसलिए मनुष्य के लिए परमेश्वर के स्वभाव को जानना सरल नहीं है। सत्य मनुष्य द्वारा अंतर्निहित रूप में धारण नहीं किया जाता, और वह उनके द्वारा सरलता से नहीं समझा जाता, जो शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए हैं; मनुष्य सत्य से और सत्य को अभ्यास में लाने के संकल्प से रहित है, और यदि वह पीड़ित नहीं होता और उसका शुद्धिकरण या न्याय नहीं किया जाता, तो उसका संकल्प कभी पूर्ण नहीं किया जाएगा। सभी लोगों के लिए शुद्धिकरण कष्टदायी होता है, और उसे स्वीकार करना बहुत कठिन होता है—परंतु शुद्धिकरण के दौरान ही परमेश्वर मनुष्य के समक्ष अपना धर्मी स्वभाव स्पष्ट करता है और मनुष्य से अपनी अपेक्षाएँ सार्वजनिक करता है, और अधिक प्रबुद्धता, अधिक वास्तविक काट-छाँट और व्यवहार प्रदान करता है; तथ्यों और सत्य के बीच की तुलना के माध्यम से वह मनुष्य को अपने और सत्य के बारे में बृहत्तर ज्ञान देता है, और उसे परमेश्वर की इच्छा की और अधिक समझ प्रदान करता है, और इस प्रकार उसे परमेश्वर के प्रति सच्चा और शुद्ध प्रेम प्राप्त करने देता है। शुद्धिकरण का कार्य करने में परमेश्वर के ये लक्ष्य हैं। उस समस्त कार्य के, जो परमेश्वर मनुष्य में करता है, अपने लक्ष्य और अपना अर्थ होता है; परमेश्वर निरर्थक कार्य नहीं करता, और न ही वह ऐसा कार्य करता है, जो मनुष्य के लिए लाभदायक न हो। शुद्धिकरण का अर्थ लोगों को परमेश्वर के सामने से हटा देना नहीं है, और न ही इसका अर्थ उन्हें नरक में नष्ट कर देना है। बल्कि इसका अर्थ है शुद्धिकरण के दौरान मनुष्य के स्वभाव को बदलना, उसके इरादों को बदलना, उसके पुराने विचारों को बदलना, परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम को बदलना, और उसके पूरे जीवन को बदलना। शुद्धिकरण मनुष्य की वास्तविक परीक्षा और वास्तविक प्रशिक्षण का एक रूप है, और केवल शुद्धिकरण के दौरान ही उसका प्रेम अपने अंतर्निहित कार्य को पूरा कर सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल शुद्धिकरण का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है')। परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचने पर, मुझे समझ आया कि परमेश्वर द्वारा किये गये शुद्धिकरण के कार्य के पीछे हमेशा कोई अभिप्राय होता है। परमेश्वर हमें शुद्ध करने और बदलने के लिए परीक्षणों का इस्तेमाल करता है, ताकि हम अपने भ्रष्ट स्वभाव को बेहतर ढंग से समझ सकें और परमेश्वर के प्रति ईमानदारी से समर्पित हो सकें, इस तरह हम परमेश्वर द्वारा प्राप्त करके पूर्ण बनाये जाएंगे। अब मैं दोबारा गंभीर रूप से बीमार पड़ गयी और मेरी ज़िंदगी खतरे में पड़ गयी है, परमेश्वर इस बीमारी के ज़रिये मुझे शुद्ध कर रहा है, ताकि सत्य के अनुसरण के प्रति मेरे गलत विचारों को बदला जा सके, मेरे भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध करके बदला जा सके, और मैं ईमानदारी से खुद को परमेश्वर के प्रति समर्पित कर सकूँ उससे सच्चा प्रेम कर सकूँ। परमेश्वर ने मेरे साथ जो कुछ भी किया, वो सिर्फ़ उसका प्रेम और उद्धार था, इसके पीछे उसकी सारी कड़ी मेहनत लगी थी। यह सोचकर मुझे काफ़ी हौसला मिला, मुझे अपने विद्रोही स्वभाव की वजह से अफ़सोस और पछतावा होने लगा। मैंने मन-ही-मन पश्चाताप करते हुए परमेश्वर से प्रार्थना की और कहा कि मैं खुद को पूरी तरह उसके हवाले करने को तैयार हूँ। चाहे मैं जियूँ या मरूँ, मैं परमेश्वर के शासन और व्यवस्थाओं के प्रति खुद को समर्पित करना चाहती थी।

एक सुबह मैंने परमेश्वर के वचनों का ये अंश पढ़ा: "शुद्धिकरण के दौरान मनुष्य को परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए? उसके शुद्धिकरण को स्वीकार करने के लिए उससे प्रेम करने के संकल्प का प्रयोग करके : शुद्धिकरण के दौरान तुम्हें भीतर से यातना दी जाती है, जैसे कोई चाकू तुम्हारे हृदय में घुमाया जा रहा हो, फिर भी तुम अपने उस हृदय का प्रयोग करके परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए तैयार हो, जो उससे प्रेम करता है, और तुम देह की चिंता करने को तैयार नहीं हो। परमेश्वर से प्रेम का अभ्यास करने का यही अर्थ है। तुम भीतर से आहत हो, और तुम्हारी पीड़ा एक ख़ास बिंदु तक पहुँच गई है, फिर भी तुम यह कहते हुए परमेश्वर के समक्ष आने और प्रार्थना करने को तैयार हो : 'हे परमेश्वर! मैं तुझे नहीं छोड़ सकता। यद्यपि मेरे भीतर अंधकार है, फिर भी मैं तुझे संतुष्ट करना चाहता हूँ; तू मेरे हृदय को जानता है, और मैं चाहता हूँ कि तू अपना और अधिक प्रेम मेरे भीतर निवेश कर।' यह शुद्धिकरण के समय का अभ्यास है। यदि तुम परमेश्वर से प्रेम का नींव के रूप में प्रयोग करो, तो शुद्धिकरण तुम्हें परमेश्वर के और निकट ला सकता है और तुम्हें परमेश्वर के साथ और अधिक घनिष्ठ बना सकता है। चूँकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें अपने हृदय को परमेश्वर के समक्ष सौंप देना चाहिए। यदि तुम अपने हृदय को परमेश्वर पर चढ़ा दो और उसे उसके सामने रख दो, तो शुद्धिकरण के दौरान तुम्हारे लिए परमेश्वर को नकारना या त्यागना असंभव होगा। इस तरह से परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध पहले से अधिक घनिष्ठ और पहले से अधिक सामान्य हो जाएगा, और परमेश्वर के साथ तुम्हारा समागम पहले से अधिक नियमित हो जाएगा। यदि तुम सदैव ऐसे ही अभ्यास करोगे, तो तुम परमेश्वर के प्रकाश में और अधिक समय बिताओगे, और उसके वचनों के मार्गदर्शन में और अधिक समय व्यतीत करोगे, तुम्हारे स्वभाव में भी अधिक से अधिक बदलाव आएँगे, और तुम्हारा ज्ञान दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाएगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल शुद्धिकरण का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है')। परमेश्वर के वचनों ने मुझे अभ्यास का मार्ग दिखाया। भले ही हमारे शरीर को परीक्षणों का सामना करना पड़े, अगर हम अपना देह-सुख छोड़कर परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होते हैं, उसकी इच्छा समझने के लिए प्रार्थना करते हैं, तो हमें उसका मार्गदर्शन मिल सकेगा और हम सत्य को समझ पाएंगे, फिर हमारा भ्रष्ट शैतानी स्वभाव धीरे-धीरे बदल जाएगा, और हम परमेश्वर को जान पायेंगे। मैंने पतरस के शुद्धिकरण के दौरान परमेश्वर से की गयी उसकी प्रार्थना को याद किया: "यदि मैं तुझे जानने के बाद मर भी जाऊँ, तो भी मैं उसके लिए सहर्ष और प्रसन्नता से तैयार रहूँगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 6')। मैंने सोचा, "भले ही मेरा आध्यात्मिक कद पतरस जैसा न हो, मगर मैं उसका अनुसरण तो कर ही सकती हूँ। परीक्षणों और शुद्धिकरण से गुज़रते वक्त मैं परमेश्वर और सत्य को जानने की कोशिश कर सकती हूँ, खुद को पूरी तरह परमेश्वर और उसके शासन और व्यवस्थाओं के हवाले कर सकती हूँ।" ऐसे ख़याल मन में आने के बाद, अब मैंने अपनी बीमारी और मौत से बेबस महसूस नहीं किया। मैंने रोज़ परमेश्वर से प्रार्थना की और उसके वचन पढ़े, और हर दिन अपने दिल को परमेश्वर के करीब पाया। मुझे बहुत ज़्यादा शांती मिल रही थी। करीब दो हफ़्तों के बाद, मेरी हालत काबू में आ गयी और धीरे-धीरे मेरी सेहत बेहतर होने लगी। मेरे रंग-रूप भी पहले से बेहतर दिखने लगा। फ़िर मैं कलीसिया में अपना कर्तव्य निभाने लगी, और मेरा मन भी शांत रहने लगा।

करीब छह महीने बाद, मैं जाँच के लिए अस्पताल गयी तो नतीजों से पता चला कि मेरी बीमारी के सभी लक्षण वापस सामान्य हो गए हैं। मेरे डॉक्टर ने हैरान होकर कहा, "मैंने कभी नहीं सोचा था कि इतना अधिक बीमार पड़ने के बाद भी, आप छह महीनों के अंदर इतनी जल्दी ठीक हो जायेंगी! आप अब बीमार नहीं लगती। यकीन ही नहीं होता!" डॉक्टर के ऐसा कहने पर, मैंने परमेश्वर को दिल से धन्यवाद दिया और उसकी प्रशंसा की; मैं जानती थी ये परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और प्रभुता है, मैं अपने लिए उसके स्नेह और उद्धार को महसूस कर पा रही थी!

जब मैंने बीमारी के इस परीक्षण के बारे में सोचा, भले ही मैंने बहुत पीड़ा और कमज़ोरी का अनुभव किया हो, मगर परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन से, मैं परमेश्वर के परीक्षण और शुद्धिकरण के कार्य के पीछे का अभिप्राय समझ पायी। मैंने मनुष्य को बचाने की परमेश्वर की इच्छा को भी समझा, इससे मेरी आस्था के पीछे की गलत सोच मंशाएं और सोच भी बदल गई। अपने दिल की गहराई से मुझे ये महसूस हुआ कि ऐसे परीक्षणों और शुद्धिकरण से गुज़रना कितना शानदार है! मुझे जीवन का ये अनमोल खजाना देने के लिये मैंने परमेश्वर का धन्यवाद किया!

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