17. कम कार्यक्षमता का बहाना बनाना ठीक नहीं

झुईक्यू, चीन

पहले, अपने कर्तव्य का निर्वाह करते समय जब भी मेरे सामने मुश्किलें आती थीं या मुझसे कोई काम बिगड़ जाता था, तो मैं सोचती थी कि उसकी वजह मेरी कम कार्यक्षमता है। इसकी वजह से, मैं अक्सर नकारात्मक और निष्क्रिय अवस्था में रहती थी। जो काम मुझे मुश्किल लगते थे, उन्हें अक्सर दूसरों के मत्थे मढ़ने के लिए मैं अपनी कम कार्यक्षमता का बहाना बनाती थी। मुझे इसमें कुछ भी गलत नहीं लगता था। मुझे लगता था कि अगर मैं अपनी कम कार्यक्षमता की वजह से किसी से कुछ करने के लिए कह रही हूँ, तो मैं कलीसिया के काम के लिए ही तो ऐसा कर रही हूँ, क्योंकि मैं इस काम को अच्छे ढंग से नहीं कर पाती। लेकिन जब मैंने परमेश्वर के वचनों को पढ़ा, तो मेरे ये गलत विचार बदल गए। मुझे एहसास हुआ कि मैं चीजों को अपनी अवधारणाओं और कल्पनाओं के चश्मे से देख रही हूँ। कुछ बातें मैंने अपने भ्रष्ट स्वभाव के बारे में भी जानीं।

एक दिन, हमारे अगुआ ने एक बहन को सहारा देने के लिए हमें एक पत्र लिखने को कहा। मैं जिस बहन के साथ संयुक्त रूप से काम कर रही थी, वह किसी और काम में व्यस्त थी, इसलिए उसने कहा कि इस काम को मैं ही देख लूँ। मैंने फौरन बहाने बनाने शुरू कर दिए : "मेरी कार्यक्षमता बहुत कम है। मैं लेखन और संपादन में अच्छी नहीं हूँ। अगर इस काम को तुम्हीं करो तो अच्छा रहेगा।" इस तरह अगर मुझे कोई काम मुश्किल लगता, तो मैं उसे अपनी साथी पर डाल देती थी। बाद में, वह मुझसे बोली, "जबसे हम लोग मिले हैं, तुम एक ही बात कहती रहती हो कि तुम्हारी कार्यक्षमता कम है। लेकिन तुम्हारे साथ कुछ दिन रहकर, मैंने एक बात पर गौर किया है कि तुम काम में कोई न कोई समस्या ढूँढ़ लेती हो। मुझे नहीं लगता कि तुम्हारी कार्यक्षमता उतनी कम है, लेकिन जब कभी तुम्हें काम करने में मुश्किल आती है, तो तुम यही कहना शुरू कर देती हो कि तुम्हारी कार्यक्षमता बहुत कम है। कभी-कभी तो तुम अपना काम दूसरे के सिर पर डाल देती हो। मुझे समझ में नहीं आता कि किस मंशा से तुम हमेशा अपनी कम कार्यक्षमता का ढिंढोरा पीटती रहती हो—मुझे तो लगता है कि तुम सिर्फ ढोंग कर रही हो!" यह सुनकर मैं अवाक रह गई, पर मेरे मन में एक खीज-सी पैदा हो गई : "जब मैं कहती हूँ कि मेरी कार्यक्षमता कम है, तो मैं सच बोल रही होती हूँ। तुम्हें तथ्यों का पता नहीं है, तुमने मुझे गलत समझा है।" बाद में, मैंने इस बात पर गहराई से सोचा कि बहन ने ऐसा क्यों कहा। मैं झूठ नहीं कह रही थी कि मेरी कार्यक्षमता कम है—तो वह मेरी मंशा पर सवाल कैसे उठा सकती है? मैं इस बात को समझ नहीं पा रही थी।

एक बार, अपने सहकर्मियों के साथ सभा के दौरान, मैंने दूसरे भाई-बहनों से अपनी इस दुविधा पर चर्चा की। मैंने एक-एक करके उन्हें वे सारे कारण बताए जिनकी वजह से मुझे लगता था कि मेरी कार्यक्षमता कम है : मिसाल के तौर पर, मेरी टाइपिंग धीमी थी, मेरा लिखने का तरीका इतना अच्छा नहीं था। जब मैं अपने साथी के साथ काम करती थी, तो टाइपिंग और संपादन का ज्यादातर काम वही करती थी, और जब कलीसिया के कामों की बात आती थी, तो कोई गलती तुरंत उसकी पकड़ में आ जाती थी, जबकि मेरी गति बहुत धीमी थी, वगैरह। मेरी बात सुनकर, हमारे अगुआ भाई लीऊ बोले, "बहन, क्या इन बातों के आधार पर हम तय करते हैं कि किसी की कार्यक्षमता अच्छी है या खराब? क्या यह सत्य के अनुरूप है? क्या यह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है? हम सब जानते हैं कि दुनिया में लोग प्रतिभा और बुद्धि की बहुत कद्र करते हैं। जो हाज़िरजवाब होते हैं, अच्छा बोलते हैं, दुनियादारी के मामलों में कुशल होते हैं, वे अच्छी कार्यक्षमता वाले होते हैं, और जो लोग बोलने में अटपटे होते हैं, अज्ञानी और कम पढ़े-लिखे होते हैं, उन्हें कम कार्यक्षमता वाला समझा जाता है; अविश्वासी इस चीज को इसी तरह से देखते हैं। हम परमेश्वर में विश्वास रखने वालों को चीजों को परमेश्वर के वचनों के आधार पर देखना चाहिए। क्या इस मामले में हमने परमेश्वर की इच्छा को जानने का प्रयास किया है? परमेश्वर किस आधार पर तय करता है कि किसी की कार्यक्षमता अच्छी है या कम है? और यह अच्छी और ख़राब कार्यक्षमता क्या होती है?" मैं अपना सिर हिलाती रही। भाई लीऊ ने सहभागिता जारी रखते हुए कहा : "आइए परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ें : 'हम लोगों की क्षमता का मूल्यांकन कैसे करेंगे? उनकी क्षमता को मापने का सबसे सटीक तरीका इस बात पर आधारित है कि वे किस हद तक सत्य को समझते हैं। कुछ लोग बहुत जल्दी कोई विशेषज्ञता हासिल कर लेते हैं, लेकिन जब वे सत्य सुनते हैं, तो उलझ-से जाते हैं और ऊँघने लगते हैं, वे घबरा जाते हैं, वे जो कुछ भी सुनते हैं उसे समझ नहीं पाते, और न ही वे यह समझ पाते हैं कि वे क्या सुन रहे हैं—यही तुच्छ क्षमता होती है। कुछ लोगों को यदि तुम बताओ कि वे तुच्छ क्षमता के हैं तो वे असहमत होते हैं। उन्हें लगता है कि उनके पास उच्च शिक्षा और जानकारी होने का मतलब है कि वे अच्छी क्षमता के हैं। क्या एक अच्छी शिक्षा उच्च क्षमता को प्रदर्शित करती है? ऐसा नहीं होता। लोगों की क्षमता को इस आधार पर मापा जाता है कि वे परमेश्वर के वचनों और सत्य को किस हद तक समझते हैं। यह इसे जानने का सबसे अधिक मानक, सबसे सटीक तरीका है। किसी अन्य माध्यम से किसी की क्षमता को मापने की कोशिश करने से कोई फ़ायदा नहीं है। कुछ लोग वाक्-चतुर और हाज़िरजवाब होते हैं, और वे वास्तव में दूसरों के साथ मेल-मिलाप करने में अच्छे होते हैं—लेकिन जब वे परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं और उपदेश सुनते हैं, तो वे कुछ भी नहीं समझ पाते। जब वे अपने अनुभवों और गवाही की बातें करते हैं, तो वे अनाड़ी साबित होते हैं, और सभी को समझ में आ जाता है कि उनमें कोई आध्यात्मिक समझ नहीं है। ये लोग अच्छी क्षमता वाले नहीं हैं' ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्‍य को उचित ढंग से पूरा करने के लिए सत्‍य की समझ अत्‍यन्‍त महत्त्वपूर्ण है')। परमेश्वर के इन वचनों से हम इस बात को समझ सकते हैं कि किसी की कार्यक्षमता अच्छी है या कम है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि परमेश्वर के वचनों को समझने की उसकी योग्यता कितनी है। जब अविश्वासी लोग किसी को प्रतिभाशाली या स्मार्ट कहते हैं तो उनका यह मतलब नहीं होता। अच्छी कार्यक्षमता वाले लोग परमेश्वर के वचनों को पढ़कर परमेश्वर की इच्छा को समझ सकते हैं, वे लोग अभ्यास का मार्ग ढूँढ़कर सत्य में प्रवेश कर सकते हैं, और परमेश्वर की अपेक्षानुसार अभ्यास कर सकते हैं। जबकि दूसरी ओर, ऐसे लोग भी हैं जो स्मार्ट दिखते हैं, और दुनियादारी के मामलों में भी कुशल होते हैं—लेकिन परमेश्वर के वचनों के सत्य का सामना करते ही वे चकरा जाते हैं। ऐसे लोगों को अच्छी कार्यक्षमता वाला नहीं कहा जा सकता। यह बिल्कुल वैसे ही है जैसे कोई जानकार और शिक्षित व्यक्ति देखने में तो बड़ा प्रतिभाशाली और अक्लमंद लगता है, लेकिन वह परमेश्वर के वचनों के सत्य को समझने में सक्षम नहीं होता। ऐसी बातों में कुछ लोगों का नजरिया तो बहुत ही बेतुका होता है। इसलिए, ऊँची शिक्षा पा लेना, हाज़िरजवाब और सक्षम होना अच्छी कार्यक्षमता होने का परिचायक नहीं है, न ही ये वे मानक हैं जिनसे किसी की कार्यक्षमता को मापा जाता है। मुख्य बात यह है कि क्या लोग आत्मा को समझते हैं, क्या लोग सत्य को समझने में सक्षम हैं। किसी की कार्यक्षमता अच्छी है या कम है, इसे मापने के लिए हम अपनी अवधारणाओं और कल्पनाओं का सहारा नहीं ले सकते!" इतना सुनकर, मुझे अचानक रोशनी दिखाई दी : इन बातों से ज़ाहिर था कि मेरे विचार महज मेरी खुद की अवधारणाएँ और कल्पनाएँ थीं—ये सत्य के अनुरूप नहीं थीं।

फिर, एक बहन ने परमेश्वर के वचनों के दो अंश खोजकर मुझे उन्हें पढ़ने के लिए कहा। परमेश्वर के वचन कहते हैं : "परमेश्वर लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है, यह इस बात पर निर्भर नहीं करता कि उनकी उम्र कितनी है, वे किस तरह के वातावरण में पैदा हुए हैं या वे कितने प्रतिभाशाली हैं। बल्कि वह सत्य के प्रति लोगों के रवैये के आधार पर उनसे व्यवहार करता है और यह रवैया उनके स्वभाव से जुड़ा होता है। यदि सत्य के प्रति तुम्हारा रवैया सही है, स्वीकृति और विनम्रता का है, तो भले ही तुम्हारी क्षमता कम हो, परमेश्वर फिर भी तुम्हें प्रबुद्ध करेंगे और तुम्हें कुछ न कुछ हासिल करने देंगे। अगर तुम्हारे पास अच्छी क्षमता है लेकिन तुम हमेशा अभिमानी बने रहते हो, निरंतर यह सोचते हो कि तुम ही सही हो और हमेशा दूसरों की कही किसी भी बात को स्वीकार करने के लिए अनिच्छुक रहते हो, और हमेशा प्रतिरोध करते हो, तो परमेश्वर तुम्हारे अंदर काम नहीं करेगा। परमेश्वर यही कहेगा कि तुम्हारा स्वभाव बुरा है और तुम कुछ भी पाने के लायक नहीं हो। परमेश्वर उस चीज़ को भी ले लेगा जो कभी तुम्हारे पास था। इसे ही उजागर किया जाना कहते है" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य का अभ्यास करके ही कोई सामान्य मानवता से युक्त हो सकता है')। "जब कोई व्यक्ति गंभीर, जिम्मेदार, समर्पित, और कड़ी मेहनत करने वाला होता है, तो काम सही तरीके से पूरा किया जाएगा। कभी-कभी तुम्हारा मन ऐसा नहीं होता और तुम साफ-साफ नज़र आने वाली गलती को भी ढूँढ या पकड़ नहीं पाते। अगर किसी का ऐसा मन हो तो पवित्र आत्मा की प्रेरणा और मार्गदर्शन से वह समस्या को पहचानने में सक्षम हो जाएगा। किंतु अगर पवित्र आत्मा तुम्हारा मार्गदर्शन करे और तुम्हें ऐसी जागरूकता दे, तुम्हें यह बोध कराए कि कुछ गलत है, पर फिर भी तुम्हारा मन ऐसा न हो, तो भी तुम समस्या को पहचान नहीं हो पाओगे। तो इससे क्या पता चलता है? लोगों का सहयोग बहुत ही महत्वपूर्ण है, उनके दिल बहुत ही महत्वपूर्ण हैं, और वे अपने सोच और विचार को किस दिशा में ले जाते हैं, वह भी बहुत महत्वपूर्ण है। जहां तक लोगों के इरादों और कर्तव्यों के निर्वहन में उनके द्वारा किये जाने वाले प्रयासों की बात है, परमेश्वर इसकी जाँच करता है और इसे देख सकता है। यह महत्वपूर्ण है कि अपने कार्य करते समय लोग उसमें अपने पूरे दिल और पूरी शक्ति का प्रयोग करें। उनका सहयोग भी काफी महत्वपूर्ण है। किसी व्यक्ति ने जिन कर्तव्यों को पूरा किया है उस पर और अपने पिछले कार्यों पर कोई पछतावा न हो, इसके लिए प्रयास करना और उस स्थिति तक पहुंचना, जहां उस पर परमेश्वर का कोई ऋण बाकी न रहे—अपना पूरा दिल और अपनी पूरी शक्ति लगाने का यही अर्थ है" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपना कर्तव्‍य करते हुए गैरज़िम्‍मेदार और असावधान होने की समस्‍या का समाधान कैसे करें')। जब मैंने परमेश्वर के वचन पढ़ लिए तो बहन ने कहा, "परमेश्वर के वचन बताते हैं कि अपने कर्तव्य का निर्वाह करते समय हमारा रवैया बहुत महत्वपूर्ण होता है—यह बहुत मायने रखता है। अगर हमारी मानसिकता सही है, अगर हम अपने कर्तव्य पालन में अपना पूरा दिल, पूरी ऊर्जा लगा सकते हैं, तो परमेश्वर हमें कर्तव्य पालन के प्रति हमारे रवैये के अनुसार देखेगा, और उसी के मुताबिक हमसे पेश आएगा। अगर हमारी कार्यक्षमता कम भी है, तो भी परमेश्वर हमें प्रबुद्ध करेगा और हमारा मार्गदर्शन करेगा। अगर हमारी कार्यक्षमता अच्छी है, लेकिन हमारी मानसिकता सही नहीं है, और हम कोई कीमत चुकाने और परमेश्वर का साथ देने को तैयार नहीं हैं, या अगर हम घमंडी और अड़ियल हैं या केवल दौलत और शोहरत कमाने के लिए काम करते हैं, तो हम न केवल अपने कर्तव्य के पालन में कोताही करेंगे, बल्कि परमेश्वर भी हमें नकार देगा। यही परमेश्वर की धार्मिकता है। अगर हम अपने आसपास के भाई-बहनों को परमेश्वर के वचनों के जरिए देखें, तो हम पाएँगे कि कुछ की कार्यक्षमता तो साधारण है लेकिन अपने कर्तव्य के प्रति उनमें सही अभिप्रेरणा है; मुश्किलों में वे सत्य को खोजने का दायित्व अपने ऊपर लेते हैं, सिद्धांतों में प्रवेश पर ध्यान देते हैं, और अपने कर्तव्य पालन में निरंतर और ज्यादा प्रभावी होते जाते हैं। जबकि दूसरी ओर ऐसे भाई-बहन भी होते हैं, जो हमें विशेष रूप से अच्छी कार्यक्षमता वाले दिखते हैं, जिनमें परमेश्वर के वचनों की शुद्ध समझ होती है, लेकिन वे दम्भी और आत्मसंतुष्ट होते हैं, वे दूसरों की सलाह को नहीं मानते, जब कभी उन्हें अपने काम में छोटी-मोटी सफलता मिलती है, तो वे परमेश्वर की महिमा को अपनी महिमा मान लेते हैं। हर मौके पर वे खुद का दिखावा करते हैं, लाभ और शोहरत के लिए संघर्ष करते हैं। कुछ लोग कलीसिया के कार्य को बाधित करते हैं, और ऐसे लोगों को कर्तव्य निभाने की पात्रता से ही वंचित कर दिया जाता है। कुछ लोग कई बुरे कर्मों को करने के बाद मसीह-विरोधी हो जाते हैं और उन्हें कलीसिया से निष्कासित कर दिया जाता है। इन तथ्यों से साफ जाहिर है कि किसी व्यक्ति की अच्छी या कम कार्यक्षमता से यह तय नहीं होता कि उसे परमेश्वर की सराहना प्राप्त होगी या नहीं; महत्वपूर्ण यह है कि वह सत्य का अनुसरण और पूरे दिलोदिमाग से अपने कर्तव्य का पालन करता है या नहीं।"

फिर, भाई-बहन अपने-आपको अपनी अवधारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार परिभाषित करने के ख़तरों और नतीजों पर चर्चा करते हुए अपने-अपने अनुभव बताने लगे। तब मुझे एहसास हुआ कि सत्य को न समझना कितनी बड़ी बेवकूफ़ी थी; मैं सत्य की खोज करने के बजाय, अपनी अवधारणाओं और कल्पनाओं में रहते हुए, खुद को इस हद तक कम कार्यक्षमता वाली बताती रही कि अक्सर अपने मुश्किल काम दूसरों के मत्थे मढ़ती रही। मैंने न तो खुद को सुधारा, न परमेश्वर पर भरोसा किया, और न ही इन बाधाओं को पार करने के लिए कोई मेहनत की। इसका नतीजा यह हुआ कि मैं जिन कामों को करने के काबिल थी, उन कामों को भी नहीं कर पाई। मैं न केवल वास्तविक प्रशिक्षण या सत्य और जीवन में विकास के अयोग्य हो गई, बल्कि इसका सीधा असर मेरे कर्तव्य पालन की प्रभावशीलता पर भी पड़ रहा था। मुझे याद आया कि मैं जिस बहन के साथ काम कर रही थी, वह कितनी जल्दी समस्या का पता लगा लेती थी। हालाँकि यह उसकी सहज कार्यक्षमता का हिस्सा था, लेकिन बड़ी बात यह थी कि अपने कर्तव्यनिष्ठ और ज़िम्मेदार रवैये के कारण, वह परमेश्वर पर भरोसा रखकर आने वाली मुश्किलों का सामने से मुकाबला कर पाती थी। तब जाकर उसे पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और प्रकाशन प्राप्त हुआ था। जबकि मैं आने वाली समस्याओं से बचने की कोशिश करती थी, और उस फंदे से निकलने के लिए कम कार्यक्षमता का बहाना बनाती थी। मैंने परमेश्वर पर भरोसा नहीं किया और प्रासंगिक सत्य की खोज के द्वारा समस्या को सुलझाने का प्रयास नहीं किया। इसका अर्थ यह था कि मैं पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त नहीं कर पाई थी। इससे मुझे समझ में आया कि परमेश्वर सबके प्रति न्यायसंगत और धार्मिक है। सहभागिता के द्वारा, मैंने यह भी जाना कि परमेश्वर हमसे वही अपेक्षा रखता है, जिसके हम काबिल हैं। वह "सुई का काम तलवार से" नहीं लेता। मुझे अपनी तरफ से सही ढंग से काम करना चाहिए, अपनी कार्यक्षमता पर ध्यान देने की बजाय मुझे अपनी सारी ऊर्जा को अपने काम में लगा देना चाहिए। मुझे सत्य के सिद्धांतों की खोज और उन पर विचार करना चाहिए, दूसरों के गुणों से सीखना चाहिए, दूसरों की राय लेनी चाहिए, और अपने वास्तविक अभ्यास में उसे शामिल करना चाहिए—इससे समय के साथ, मुझे अवश्य इसका लाभ मिलेगा और मेरा विकास होगा।

इसके बाद, मेरे कानों में बहन द्वारा की गई मेरी आलोचना गूँजती रही : "मुझे समझ में नहीं आता कि किस मंशा से तुम हमेशा अपनी कम कार्यक्षमता का ढिंढोरा पीटती रहती हो।" वह सही कह रही थी—मैं तुरंत कह देती थी कि मेरी कार्यक्षमता कम है। वे कौनसी मंशाएं थीं और वह कौनसा भ्रष्ट स्वभाव था जो मुझे गुप्त रूप से नियंत्रित कर रहे थे?

एक दिन, मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : "यह देखने के लिए कि तुम एक सही व्यक्ति हो या नहीं, तुम्हें सावधानीपूर्वक स्वयं की जाँच करनी चाहिए। क्या तुम्हारे लक्ष्य और इरादे मुझे ध्यान में रखकर बनाए गए हैं? क्या तुम्हारे शब्द और कार्य मेरी उपस्थिति में कहे और किए गए हैं? मैं तुम्हारी सभी सोच और विचारों की जाँच करता हूँ। क्या तुम दोषी महसूस नहीं करते? तुम दूसरों को झूठा चेहरा दिखाते हो और शांति से आत्म-धार्मिकता का दिखावा करते हो; तुम यह अपने बचाव के लिए करते हो। तुम यह अपनी बुराई छुपाने के लिए करते हो, और किसी दूसरे पर उस बुराई को थोपने के तरीके भी सोचते हो। तुम्हारे दिल में कितना विश्वासघात भरा हुआ है!" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 13')। परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, मैं खुद पर विचार करने लगी : जब कोई ऐसा काम आता था, जो मैंने पहले कभी नहीं किया होता था, तो मैं पहला काम यह करती थी कि मैं भाई-बहनों को अपनी कम कार्यक्षमता के बारे में बता देती थी, क्योंकि मुझे डर रहता था कि अगर मैंने काम को अच्छे ढंग से नहीं किया तो मैं उनकी नजरों में गिर जाऊँगी। मैं ऐसा अपने मान-सम्मान और पद-प्रतिष्ठा के लिए करती थी। इसका आशय यह होता था कि अगर मुझसे कोई काम ठीक से नहीं हुआ, तो इसमें मेरी कोई गलती नहीं है; ऐसा नहीं है कि इस काम में मैंने अपनी सारी ऊर्जा नहीं लगाई, बल्कि यह काम मेरी कार्यक्षमता से परे है। जब कभी मुझे अपने काम में कोई मुश्किल आती थी, तो मैं उसका सामना करने के लिए कोई तकलीफ उठाने या मेहनत करने के लिए तैयार नहीं होती थी। मैं जिम्मेदारी लेने से भी डरती थी। इसलिए मैं काम को किसी और के सिर मढ़ने के लिए अपनी कम कार्यक्षमता का बहाना बना देती थी, ताकि लोगों को लगे कि मैं तर्कपूर्ण हूँ और खुद को जानती हूँ। करीब-करीब हर बार जब भी कोई परेशानी आती और कोई कीमत चुकानी होती, या जिम्मेदारी लेनी होती, तो मैं पीछे हट जाती थी। दरअसल, मैं आपसी संबंधों के इस शैतानी फलसफे के अनुसार जीती थी कि "ज्ञानी लोग आत्म-रक्षा में अच्छे होते हैं वे बस गलतियाँ करने से बचते हैं।" यह बात मुझे काफी होशियारी भरी लगती थी—जिम्मेदारी से बचने के लिए अनुचित तरीकों का इस्तेमाल करना—जबकि सच्चाई यह थी कि इस चक्कर में मैंने सत्य को खोजने और समझने के बहुत-से अवसर गँवा दिए थे। दरअसल, परमेश्वर हर इंसान को जो कार्यक्षमता देता है, वह संबंधित उद्देश्य के लिए उपयुक्त होती है; फिर भी पवित्र आत्मा के कार्य को हासिल करने और अपना कर्तव्य ठीक से निभाने के लिए, मैं जो कुछ करने के काबिल थी, उसके अनुसार मैंने अपनी पूरी शक्ति नहीं लगाई; बल्कि, हमेशा सत्य के अभ्यास से बचने, और परमेश्वर को भ्रम में रखने और धोखा देने के लिए मैं अपनी कम कार्यक्षमता का बहाना बनाती रही। क्या यह चालाकी और दुष्टता नहीं है? इस तरह से मुझे परमेश्वर का मार्गदर्शन कैसे मिल सकता था?

परमेश्वर के वचन कहते हैं, "'भले ही मेरी क्षमता कम है, मेरे पास एक ईमानदार हृदय है।' जब ज़्यादातर लोग इस पंक्ति को सुनते हैं, तो वे अच्छा महसूस करते हैं, है ना? इस बात में लोगों से परमेश्वर की अपेक्षाएं शामिल हैं। कौन सी अपेक्षाएं? अगर लोगों में क्षमता की कमी है, तो दुनिया यहीं खत्म नहीं हो जाती, लेकिन उनके पास एक ईमानदार हृदय होना चाहिये, और इस तरह, वे परमेश्वर की प्रशंसा पाने में सक्षम होंगे। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारी स्थिति कैसी है, तुम्हें एक ईमानदार व्यक्ति होना चाहिये, ईमानदारी से बोलना चाहिए, ईमानदारी से काम करना चाहिये, अपने पूरे दिलो-दिमाग से अपना कर्तव्य पूरा करने में सक्षम होना चाहिये, और भरोसेमंद होना चाहिए, तुम्हें अपने काम से जी नहीं चुराना चाहिये, कपटी या धोखेबाज नहीं होना चाहिये, मक्कार नहीं होना चाहिये, दूसरों को चकमा देने की कोशिश नहीं करनी चाहिये, या घुमा-घुमा कर बात नहीं करनी चाहिये; तुम्हें सत्य से प्रेम करने वाला और उसकी खोज करने वाला व्यक्ति बनना चाहिये। ... तुम कहते हो, 'मेरी क्षमता कम है, लेकिन दिल से ईमानदार हूँ।' लेकिन, जब तुम्हें कोई कर्तव्य पूरा करने के लिए दिया जाता है, तो तुम पीड़ा सहने से या इस बात से डरते हो कि अगर तुमने इसे अच्छी तरह से पूरा नहीं किया तो तुम्हें इसकी ज़िम्मेदारी लेनी होगी, इसलिये तुम इससे बचने के लिये बहाने बनाते हो और उसे पूरा करवाने के लिए दूसरों के नाम सुझाते हो। क्या यह एक ईमानदार व्यक्ति की अभिव्यक्ति है? बिल्कुल भी ऐसा नहीं है। तो फिर, एक ईमानदार व्यक्ति को कैसे व्यवहार करना चाहिये? उन्हें अपने कर्तव्यों को स्वीकार करना चाहिये और उसका पालन करना चाहिये, और फिर अपनी सर्वोत्तम क्षमता के अनुसार उसे पूरा करने में पूरी तरह से समर्पित होना चाहिये, परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने का प्रयास करना चाहिये। यह कई तरीकों से व्यक्त क्या जाता है। एक तरीका यह है कि तुम्हें अपने कर्तव्य को ईमानदारी से स्वीकार करना चाहिये, तुम्हें किसी और चीज़ के बारे में नहीं सोचना चाहिये, और अधूरे मन से इसके लिए तैयार नहीं होना चाहिये। अपने खुद लाभ के लिये जाल न बिछाओ। यह ईमानदारी की अभिव्यक्ति है। दूसरा तरीका है इसमें पूरी जी-जान लगा देना। तुम कहते हो, 'यह वो सब कुछ है जो मैं कर सकता हूँ; मैं सब लगा दूंगा, और सब पूरी तरह से परमेश्वर को समर्पित कर दूंगा।' क्या यह ईमानदारी की अभिव्यक्ति नहीं है? तुम अपना सब कुछ और जो कुछ भी तुम कर सकते हो, उसे समर्पित कर देते हो—यह ईमानदारी की एक अभिव्यक्ति है" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल ईमानदार व्यक्ति बनकर ही कोई वास्तव में ख़ुश हो सकता है')। परमेश्वर के वचनों ने मुझे अभ्यास का मार्ग दिखाया : परमेश्वर लोगों की अच्छी या कम कार्यक्षमता की परवाह नहीं करता; मुख्य बात यह है कि उनका दिल ईमानदार है या नहीं, वे सत्य को स्वीकार करके उसे अभ्यास में ला सकते हैं या नहीं। हालाँकि मेरी कार्यक्षमता कम है, और मैं सत्य को थोड़ी धीमी गति से समझती हूँ, और कभी-कभी मैं धर्म-सिद्धांत का अनुसरण करती हूँ; पर अगर मेरा हृदय ईमानदार है, और अगर अपनी भ्रष्टता को दूर करने के लिए मैं निरंतर सत्य का अनुसरण करती हूँ, और अगर अपने कर्तव्य के निर्वहन के दौरान मैं परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार काम करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा सकती हूँ, तो मुझे परमेश्वर का मार्गदर्शन और आशीष प्राप्त होंगे, और फिर धीरे-धीरे मैं सत्य को समझ पाऊँगी। सत्य में प्रवेश करते हुए, मैं अपनी कम कार्यक्षमता से जुड़ी कमियों को दूर कर पाऊँगी, और इस तरह मैं चीजों को और बेहतर ढंग से समझने और देखने लगूँगी। परमेश्वर की इच्छा को समझने के बाद, और बेहतर ढंग से काम करने के लिए मैं परमेश्वर पर भरोसा करने लगी। अब जिन चीजों को मैं समझती नहीं थी, उन्हें दूसरों पर डालने के बजाय, मैं खुद ही जानने-समझने का भरसक प्रयास करने लगी। परमेश्वर का धन्यवाद! परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अभ्यास करने पर, अब मैं भी अपने कर्तव्य में आनी वाली समस्याओं को समझने लगी—हालाँकि ऐसे अवसर भी आते थे, जब कुछ मसले थोड़े ज्यादा जटिल होते थे और मुझे समझ में नहीं आते थे, लेकिन भाई-बहनों के साथ सत्य के सिद्धांतों की खोज करके, मुझे वे भी धीरे-धीरे समझ में आने लगते थे। अपने कर्तव्य का निर्वाह करते समय, अब मैं ज्यादा मुक्त और हल्का महसूस करती थी।

परमेश्वर ने मेरे लिए जिस परिवेश को बनाया था, उसके ज़रिए मुझे अपनी भ्रष्टता और कमियों का कुछ एहसास हुआ, और मैं इस बात के प्रति जागरुक हुई कि अपनी कार्यक्षमता के साथ समस्याओं का सामना किस ढंग से करना है। पहले, कर्तव्य का निर्वाह करते समय मैं सत्य की खोज पर ध्यान नहीं देती थी, न ही मैं अपने भ्रष्ट स्वभाव को दूर करने की कोशिश करती थी। मैं हर बात को केवल अपनी अवधारणाओं और कल्पनाओं के चश्मे से ही देखती थी, इसका परिणाम यह हुआ कि मैं चीजों से कटने लगी, और मैंने यह कहकर दायित्वों से बचना शुरू कर दिया कि यह काम मेरी कार्यक्षमता से बाहर है। मेरा कर्तव्य-निर्वहन पूरी तरह से लापरवाही से भरा था। मैं कलीसिया के काम को अटकाने लगी और इसका नुकसान मुझे अपने जीवन में भी उठाना पड़ा। अब मैं समझ गई हूँ कि परमेश्वर ने हर इंसान की कार्यक्षमता को पहले से निर्धारित कर दिया है और यह परमेश्वर के महिमामयी इरादों का एक हिस्सा है। मेरी कार्यक्षमता भले ही अच्छी हो या कम हो, यह मेरे लिए कोई बाधा नहीं बननी चाहिए। भविष्य में, मैं हर चीज में सत्य की खोज करूँगी, सिद्धांतों के अनुसार आचरण करूँगी, और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए एक ईमानदार इंसान बनूँगी।

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