66. मैंने अपना असली भविष्य खोज लिया

लिन छिंग, चीन

मेरा जन्म एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। मेरे माता-पिता अशिक्षित थे और केवल शारीरिक श्रम करके ही हमारे परिवार का भरण-पोषण कर सकते थे। हम बहुत तंगी में थे। जब मैं पैदा हुई, तब मेरे माता-पिता चालीस की उम्र के पड़ाव में थे, और उन्होंने अपनी सारी उम्मीदें मुझ पर लगा दी थीं। मेरे माता-पिता हमेशा यह कहकर मेरा मार्गदर्शन करते थे, “हम ज़्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं, और हमारा जीवन खेतों में हाड़-तोड़ मेहनत करने में ही बीत जाता है। हम जीवन भर संघर्ष करते आए हैं, पर हमारा कतई कोई भविष्य नहीं है। तुम्हें मन लगाकर पढ़ना होगा और भविष्य में एक अच्छी नौकरी ढूँढ़नी होगी, ताकि तुम एक दफ़्तर में बैठ सको, तुम्हें न धूप सहनी पड़े न हवा और खाने-पहनने की कोई चिंता न हो। इससे हमें भी तुम्हारी कामयाबी का सुख मिल जाएगा।” शिक्षक भी हमें अक्सर सिखाते थे कि “ज्ञान तुम्हारा भाग्य बदल सकता है” और “सबसे महान इंसान बनने के लिए व्यक्ति को सबसे बड़ी कठिनाइयाँ सहनी होंगी।” मैं इन्हीं बातों के शिक्षा के प्रभावों के बीच बड़ी हुई। खास तौर पर, जब मैं पढ़ाई-लिखाई में सफल और प्रसिद्ध लोगों को देखती थी, जिनकी हर जगह तारीफ होती थी, और जिन्हें बहुत सम्मान मिलता था, तो मेरा यह विश्वास और भी पक्का हो गया कि ज्ञान से एक अच्छा भविष्य मिलेगा जहाँ मैं एक बेहतर भौतिक जीवन जी सकूँगी और सराही जाऊँगी। मैंने मन ही मन ठान लिया कि मैं भविष्य में ज़रूर एक अच्छे विश्वविद्यालय में दाखिला लूँगी और एक सम्मानजनक नौकरी पाऊँगी। इस तरह, मैं एक अच्छा जीवन जीने में अपने माता-पिता की मदद करूँगी और अपने परिवार को रिश्तेदारों और पड़ोसियों से एक नई नज़र से दिखवाऊँगी।

जब मैं स्कूल में थी, तो मैंने अपना सारा समय और ऊर्जा पढ़ाई में लगा दिया : जब दूसरे छुट्टियों में मौज-मस्ती करते थे, तो मैं किताबें पढ़ती और होमवर्क करती थी। हाई स्कूल का आखिरी साल मेरे लिए सबसे व्यस्त समय था, और मैंने अपनी सारी ऊर्जा विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा की तैयारी में लगा दी। लेकिन, विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में मेरे नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं थे और मैं बहुत निराश हो गई। मैं अपने जीवन को शुरू होते ही ढलान पर नहीं जाने दे सकती थी। मेरे परिवार के पास न तो पैसा था और न ही कोई पहुँच, इसलिए अगर मैं भविष्य में एक अच्छा जीवन जीना और सम्मान पाना चाहती थी, तो मेरे पास एकमात्र रास्ता एक अच्छे विश्वविद्यालय में दाखिला लेना था। इसलिए, मैंने दोबारा तैयारी करने का फैसला किया। उसके बाद, मैं पहले से भी ज़्यादा मेहनत से पढ़ाई करने लगी। हालाँकि मैं अपने प्रतिभाशाली सहपाठियों जितनी होशियार नहीं थी, पर मुझे उनसे अधिक दृढ़ संकल्पयुक्त होना था। मैं खुद को प्रेरित करने के लिए बार-बार इन कहावतों का उपयोग करती थी : “धीमे उड़ने वाली चिड़िया को पहले उड़ना पड़ता है” और “मेहनत का फल ज़रूर मिलता है।” समय बचाने के लिए, मैं सप्ताहांत पर घर नहीं जाती थी, और पढ़ाई के लिए स्कूल में ही रुकती थी। जब भी मेरे पास समय होता, मैं कठिन अभ्यास-प्रश्न हल करती थी। कभी-कभी, अगर मैं उन्हें दिन में पूरा नहीं कर पाती थी, तो मैं उन्हें छात्रावास वापस ले जाती और कंबल के नीचे टॉर्च की रोशनी में उन्हें हल करना जारी रखती थी। भले ही मेरी दूर की नज़र और खराब हो गई, पर मैंने परवाह नहीं की। मेरा दिल हर दिन एक कसी हुई कमानी की तरह रहता था, मैं इस बात से डरी रहती थी कि कहीं मैं परीक्षा में अच्छा न कर पाऊँ और अपनी किस्मत बदलने का मौका न गँवा दूँ। 2014 में, मुझे विश्वविद्यालय में दाखिला मिल गया और मैं अपनी पसंद का मुख्य विषय चुन सकी। उस पल, मैं अपने भविष्य के लिए आशा से भर गई थी, और मुझे लगा कि इस बार मेरी मेहनत बेकार नहीं गई। अगर मैं मेहनत से पढ़ाई करती रही और स्नातक के बाद एक सम्मानजनक नौकरी पा लेती हूँ तो मेरे बड़े-बुज़ुर्ग निश्चित रूप से एक अच्छे भविष्य के लिए मेरी प्रशंसा करेंगे।

जिस साल मैंने विश्वविद्यालय में पढ़ना शुरू किया, मेरी बुआ ने मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का सुसमाचार सुनाया और मैंने कलीसियाई जीवन जीना शुरू कर दिया। सभाओं के माध्यम से मैं समझ गई कि स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ें परमेश्वर के द्वारा बनाई हुई हैं और परमेश्वर ही हर चीज़ पर प्रभुता रखता है और उसे नियंत्रित करता है। शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद, लोग और भी ज़्यादा दुष्ट और पतित हो गए, और मानवजाति को बचाने के लिए, परमेश्वर कार्य के तीन चरण करता आ रहा है। अंत के दिनों में, लोगों का न्याय करने और उन्हें शुद्ध करने के वास्ते वचन व्यक्त के लिए वह व्यक्तिगत रूप से देहधारी भी हुआ है, लोगों को पाप के बंधन से बचा रहा है और उन्हें एक अद्भुत मंज़िल तक ला रहा है। मैंने सोचा कि किस तरह लाखों लोगों में से मैं उन कुछ भाग्यशाली लोगों में एक थी जिन्हें परमेश्वर की वाणी सुनने और उसका उद्धार पाने का मौका मिला है। मैं बहुत सम्मानित और उत्साहित महसूस कर रही थी। यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा आशीष था! सभाओं में, मैं अपनी बहनों को विश्वविद्यालय में मेरे साथ होने वाली बातें बताती थी, और वे मेरी समस्याओं को लेकर मेरे साथ परमेश्वर के वचनों पर संगति करती थीं। कभी-कभी, वे मुझे नए लोगों को सींचने के लिए भी ले जाती थीं। जब मैं भाई-बहनों के साथ संगति करती थी तो मैं खास तौर पर मुक्त और स्वतंत्र महसूस करती थी और मेरा दिल बहुत सहज महसूस करता था।

बाद में, मैंने सुना कि बहन मूचन ने विश्वविद्यालय से स्नातक होने के बाद पूर्णकालिक रूप से कर्तव्य निभाना शुरू कर दिया है। उस समय मैं चौंक गई, और मन ही मन सोचने लगी, “हालाँकि बहन कम उम्र की है, लेकिन परमेश्वर के लिए खुद को खपाने का उसका संकल्प बहुत बड़ा है। मुझमें ऐसा संकल्प नहीं है। अगर मैं पूर्णकालिक रूप से अपना कर्तव्य निभाती हूँ और भविष्य में मेरे पास अच्छी नौकरी न हो तो क्या मेरे रिश्तेदार और दोस्त कहेंगे कि मैंने कुछ भी हासिल नहीं किया? मुझे परमेश्वर में विश्वास भी करना चाहिए और साथ ही विश्वविद्यालय भी जाना चाहिए। इससे न केवल मुझे एक अच्छी नौकरी मिल पाएगी, बल्कि मैं परमेश्वर के आशीष भी पा सकूँगी। मुझे दोनों जहाँ की नेमतें मिल जाएंगी।” लेकिन, फिर मैंने देखा कि बहन को परमेश्वर में विश्वास करते हुए ज़्यादा समय नहीं हुआ था, पर वह बहुत तेज़ी से प्रगति कर रही थी, और वह हमारी किसी भी मुश्किल को लेकर हमारे साथ संगति और हमारी मदद कर पाती थी। खास तौर पर, जब मैंने उसे यह बताते सुना कि कैसे एक सभा के दौरान जब पुलिस उसे गिरफ्तार करने दरवाज़े पर आई, तब वह परमेश्वर पर निर्भर रही और उसने उसकी अद्भुत सुरक्षा देखी, तो मैंने तहेदिल से सराहना और प्रशंसा महसूस की। मैं चिंतन करने लगी, यह सोचने लगी, “बहन हर दिन कलीसिया में अपने कर्तव्य निभाती है और बहुत सारे सत्यों को समझती है। उसकी जीवन प्रगति इतनी तेज है! मैं पढ़ाई भी कर रही हूँ और सभाओं में भी जा रही हूँ, और मैं किसी भी अनुभव के बारे में बात नहीं कर सकती हूँ। ऐसा लगता है कि अगर मैं जीवन में प्रगति करना चाहती हूँ तो मुझे और अधिक कर्तव्य निभाने की जरूरत है। लेकिन, अगर मैं बहन की तरह पूर्णकालिक रूप से कर्तव्य निभाऊँ तो मेरे पास पढ़ाई करने की ऊर्जा नहीं होगी। मैंने इतने सालों तक सिर्फ इसलिए इतनी मेहनत से पढ़ाई की है ताकि स्नातक होने के बाद मुझे एक अच्छी नौकरी मिल सके, खाने-पहनने की कोई चिंता न हो, मैं भविष्य में एक अच्छा जीवन जीने में अपने माता-पिता की मदद कर सकूँ और अपने रिश्तेदारों की नज़रों में सम्मानजनक और प्रतिष्ठित भी दिखूँ। अगर मैं अपना सारा समय अपना कर्तव्य निभाने में लगाने का विकल्प चुनती हूँ तो जब मेरे सब सहपाठी स्नातक होने पर अच्छी नौकरियाँ पा लेंगे, तब सिर्फ मैं ही साधारण रह जाऊँगी, बिना किसी सम्मानजनक नौकरी के। मेरे रिश्तेदार और दोस्त मेरे बारे में क्या सोचेंगे?” जब मैंने यह सोचा तो मैं अब अपना कर्तव्य पूर्णकालिक रूप से निभाना नहीं चाहती थी।

छुट्टी से एक महीने पहले, एक बहन ने मुझसे पूछा, “छुट्टियाँ जल्द ही आने वाली हैं। आगे तुम्हारी क्या योजनाएँ हैं? क्या तुम प्रशिक्षण लेने और अपना कर्तव्य निभाने के लिए तैयार हो?” पहले तो यह सुनकर मैं बहुत उत्साहित हुई। मैं बहुत कम सत्य समझती थी, इसलिए कर्तव्य निभाने में प्रशिक्षण पाने और सत्य प्राप्त करने का यह एक उत्तम अवसर था। लेकिन, फिर मैंने सोचा, “अगर मैं एक बार अपना कर्तव्य निभाना शुरू कर देती हूँ और इसे विश्वविद्यालय के फिर से शुरू होने पर छोड़ देती हूँ तो यह परमेश्वर के इरादे के अनुसार नहीं होगा। लेकिन अगर स्कूल शुरू होने के बाद भी मैं अपना कर्तव्य करती रही, तो मेरी पढ़ाई पर निश्चित रूप से असर पड़ेगा। अगर मेरी रूममेट्स को पता चल गया कि मैं परमेश्वर में विश्वास करती हूँ और उन्होंने शिक्षक को बता दिया, तो शायद मुझे निकाल दिया जाएगा, और तब मेरा सच में कोई भविष्य नहीं रहेगा। तब मैं अपने माता-पिता का प्रतिफल कैसे चुका पाऊँगी? अगर मैं दूसरों जितना अच्छा नहीं कर पाई, तो मेरे रिश्तेदार मेरे बारे में क्या सोचेंगे? मुझे कैसे चुनना चाहिए?” वापसी के रास्ते में, मेरे दिल में उथल-पुथल मची हुई थी। एक तरफ विश्वविद्यालय जाने का मेरा सपना था जिसका मैं इतने सालों से इतनी मेहनत से पीछा कर रही थी; दूसरी तरफ, एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाना था। मैं दोनों में से किसी को भी खोना नहीं चाहती थी। उस दौरान मेरा मन बहुत भारी रहता था, और मैं नहीं जानती थी कि कैसे चुनूँ। यह एहसास होने पर कि मेरी दशा गलत है, मैंने चुपचाप परमेश्वर से प्रार्थना की, “प्रिय परमेश्वर, मैं जानती हूँ कि अपना कर्तव्य निभाना सार्थक है, और मैं अपना कर्तव्य निभाना चाहती हूँ। लेकिन मेरा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, और मुझे चिंता है कि अगर मैं अपना कर्तव्य निभाती हूँ तो मेरी पढ़ाई प्रभावित हो जाएगी। मैं अंदर से कमज़ोर महसूस कर रही हूँ, लेकिन मैं यह मौका खोना नहीं चाहती। प्रिय परमेश्वर, तुम अपना इरादा समझने में मेरा मार्गदर्शन करो।”

उस रात, मैं बिस्तर पर करवटें बदलती रही, सो नहीं पाई। मैंने अपना फोन चालू किया और परमेश्वर के वचनों का एक भजन सुना जिसका शीर्षक है : “परमेश्वर के लिए तुम्हारा विश्वास हो सबसे ऊँचा” :

1  अगर तुम परमेश्वर में विश्वास करना चाहते हो और अगर तुम परमेश्वर को प्राप्त करना चाहते हो और उसकी संतुष्टि हासिल करना चाहते हो, तो जब तक तुम एक निश्चित मात्रा में कष्ट सहन नहीं करते और एक निश्चित मात्रा में प्रयास नहीं करते, तब तक तुम ये चीजें प्राप्त करने में समर्थ नहीं होगे। तुम लोगों ने बहुत उपदेश सुना है, लेकिन सिर्फ उसे सुनने का यह मतलब नहीं कि वह उपदेश तुम्हारा है; तुम्हें उसे आत्मसात करना चाहिए और ऐसी वस्तु में रूपांतरित करना चाहिए, जो तुम्हारी हो। तुम्हें उसे अपने जीवन में आत्मसात करना होगा, और अपने अस्तित्व में लाना होगा, तुम्हें इन वचनों और उपदेश को अपनी जीवन-शैली का मार्गदर्शन करने देना होगा, और अपने जीवन में अस्तित्वगत मूल्य और अर्थ लाने देना होगा। जब ऐसा होगा, तब तुम्हारा इन वचनों को सुनना सार्थक हो जाएगा।

2  अगर मेरे द्वारा बोले गए वचन तुम्हारे जीवन में कोई सुधार नहीं लाते या तुम्हारे अस्तित्व में कोई मूल्य नहीं जोड़ते, तो तुम्हारा इन्हें सुनना कोई अर्थ नहीं रखता। तुम्हें परमेश्वर में अपनी आस्था को भोजन, कपड़ों या किसी भी चीज से ज्यादा महत्व की चीज की तरह, जीवन के सबसे महत्वपूर्ण मामले के रूप में लेना चाहिए, इसी तरह से तुम्हें परिणाम मिलेंगे। अगर तुम केवल तभी विश्वास करते हो जब तुम्हारे पास समय होता है, और अपनी आस्था के प्रति अपना पूरा ध्यान समर्पित करने में असमर्थ रहते हो, और अगर तुम हमेशा अपनी आस्था में भ्रमित रहते हो, तो तुम्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होगा।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X

परमेश्वर के वचनों का भजन सुनते हुए, मैं इतनी भावुक हो गई कि अपने आँसू रोक न सकी। मुझे लगा जैसे परमेश्वर ठीक मेरी बगल में है, मेरी प्रार्थनाएँ सुन रहा है, और मुझे मार्गदर्शन देने और प्रेरित करने के लिए अपने वचनों का उपयोग कर रहा है। मैं समझ गई कि परमेश्वर में विश्वास करना जीवन में सबसे महत्वपूर्ण बात है, भोजन, वस्त्र और आनंद से भी अधिक महत्वपूर्ण है और मेरी किसी भी संभावित प्रसिद्धि, लाभ या भविष्य से अधिक महत्वपूर्ण है। देह की हर चीज़ अस्थायी है। सत्य का अनुसरण करके और स्वभाव में बदलाव लाकर ही व्यक्ति बचाया जा सकता है और बचा रह सकता है। अपना कर्तव्य निभाना ही हमारे लिए सत्य पाने और सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने का मार्ग है। अपने कर्तव्य निभाने में, हम तरह-तरह की मुश्किलों और समस्याओं का सामना करेंगे, और विभिन्न भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करेंगे। लेकिन यह हमें अपनी भ्रष्टता का समाधान करने के लिए सत्य को और अधिक खोजने को भी प्रेरित करता है। अगर मैं सिर्फ़ अपने खाली समय में सभाओं में भाग लूँ, और कोई कर्तव्य न करूँ, और अपना ज़्यादातर समय पढ़ाई में बिताऊँ, तो मुझे कम चीज़ों का अनुभव होगा और मैं अपनी समस्याओं को हल करने के लिए सत्य को भी कम खोजूँगी। मैं सिर्फ़ कुछ सतही शब्दों और धर्म-सिद्धांतों को ही समझूँगी, और वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर पाऊँगी। यह बचाए जाने को बहुत मुश्किल बना देता है। मैं और मूचन एक दूसरे से बिल्कुल उलट थीं। मूचन को परमेश्वर में विश्वास करते हुए ज़्यादा समय नहीं हुआ था, लेकिन वह अपना कर्तव्य निभाने में बहुत-सी चीजों का अनुभव कर चुकी थी और सत्य अधिक खोज चुकी थी। सभाओं में परमेश्वर के वचनों पर संगति करते समय, वह अपने अनुभवों को शामिल कर पाती थी, और व्यावहारिक तरीके से बात करती थी। अपने अनुभवों के माध्यम से उसने परमेश्वर के कर्मों को देखा, परमेश्वर में उसकी आस्था बढ़ गई और वह अपना कर्तव्य निभाने में और अधिक प्रेरित हो गई। दूसरी ओर, मैं परमेश्वर में विश्वास के साथ अपनी फुर्सत के शौक के रूप में पेश आती थी ताकि मेरी पढ़ाई में कोई दखल न हो। मैं सभाओं में भाग लेकर संतुष्ट थी और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने के बारे में नहीं सोचती थी। अगर मैंने इसी तरह भ्रमित ढंग से विश्वास करना जारी रखा और सत्य का अनुसरण करने का अहम समय गँवा दिया, मैं अंततः सत्य प्राप्त करने में असफल रही तो क्या मुझे हटा नहीं दिया जाएगा? आख़िरकार मैं छुट्टी पर थी। मैं अपना कर्तव्य निभाने और सत्य प्राप्त करने के इस अवसर को हाथ से जाने नहीं दे सकती थी, इसलिए मैंने बहन से कहा कि मैं कर्तव्य निभाने का प्रशिक्षण लेने को तैयार हूँ।

छुट्टियों के दौरान हमने मिलकर समूह सभाएँ आयोजित कीं। जब हम एक साथ संगति करते थे तो हर कोई भले मन से खुलकर बात और संवाद करता था और मैं अपने दिल में खास तौर पर मुक्त और स्वतंत्र महसूस करती थी। मैंने विश्वविद्यालय में अपने सहपाठियों के बारे में सोचा जो दिन भर खाते-पीते और मौज-मस्ती करते थे, सेलफोन गेम, डेटिंग के आदी थे, और एक पतित और पतनशील जीवन जी रहे थे। मैं भी उन्हीं की तरह हुआ करती थी। जब भी मेरे पास खाली समय होता, मैं अपने फोन से खेलती या कोई टीवी सीरीज़ देखती, मेरे मन में कोई सही बात नहीं होती थी। अब, सभाओं के माध्यम से, और परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने से, मुझे यह एहसास हो चुका था कि ये बुरी प्रवृत्तियाँ मेरे दिल पर काबिज ही हो जाएंगी और इसे परमेश्वर से बहुत दूर ले जाएंगी और ये मेरे जीवन के लिए बिल्कुल भी किसी फायदे की नहीं थीं। धीरे-धीरे, मैंने इन बुरी प्रवृत्तियों से दूर रहने का संकल्प विकसित किया और मैं परमेश्वर के सामने अपने दिल को शांत करने में सक्षम रही, उसके वचन खा और पी रही थी और अपना कर्तव्य निभा रही थी। मैं अब अपने दिन निरर्थक रूप से बर्बाद नहीं करती थी। मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर में विश्वास करके, सत्य का अनुसरण करके और अपना कर्तव्य निभाकर ही मैं इन बुरी प्रवृत्तियों से दूर रह सकती हूँ और एक मूल्यवान और सार्थक जीवन जी सकती हूँ।

जैसे-जैसे सेमेस्टर शुरू होने का समय नज़दीक आ रहा था, मैं थोड़ी हिचकिचा रही थी। क्या मुझे अपनी पढ़ाई छोड़ देनी चाहिए और पूर्णकालिक रूप से अपने कर्तव्य निभाने चाहिए? मैंने यह कहते हुए मूचन से मार्गदर्शन माँगा, “इस दौरान, मुझे लगता है कि मैं अपना कर्तव्य निभाकर अधिक सत्य प्राप्त करती हूँ। मैं भी चाहती हूँ कि परमेश्वर के वचनों को और अधिक खाऊँ और पिऊँ और अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से निभाऊँ। लेकिन जब मैं यह सोचती हूँ कि भविष्य में मेरे पास एक अच्छी नौकरी नहीं होगी और मेरी कोई सराहना नहीं करेगा, और मैं अपने माता-पिता का प्रतिफल बेहतर तरीके से नहीं चुका पाऊँगी तो मैं अपनी पढ़ाई छोड़ने का संकल्प खो देती हूँ।” मेरी बहन ने मेरे साथ अपने अनुभव पर संगति की और मेरी मदद के लिए परमेश्वर के प्रासंगिक वचन ढूँढ़े। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “मनुष्य के ज्ञान अर्जित करने की प्रक्रिया के दौरान शैतान सभी प्रकार के तरीके इस्तेमाल कर सकता है, चाहे वह कहानियाँ सुनाना हो, उसे अलग से कोई ज्ञान देना हो या अपनी इच्छाएँ या महत्वाकांक्षाएँ पूरी करने देना हो। शैतान उसे किस मार्ग पर ले जाना चाहता है? लोगों को लगता है कि ज्ञान अर्जित करने में कुछ भी गलत नहीं है, यह पूरी तरह स्वाभाविक है। इसे आकर्षक ढंग से प्रस्‍तुत करें तो ऊँची आकांक्षाएँ रखने या महत्वाकांक्षाएँ होने का मतलब दृढ-संकल्प होना है और यही जीवन में सही मार्ग होना चाहिए। अगर लोग अपनी आकांक्षाएँ पूरी कर सकें या सफलतापूर्वक करियर बना सकें, तो क्या यह जीने का और भी अधिक गौरवशाली तरीका नहीं है? ये चीजें करने से व्यक्ति न केवल अपने पूर्वजों का सम्मान कर सकता है, बल्कि इतिहास पर अपनी छाप छोड़ने का मौका भी पा सकता है—क्या यह अच्छी बात नहीं है? सांसारिक लोगों की दृष्टि में यह एक अच्छी बात है, और उनकी निगाह में यह उचित और सकारात्मक होनी चाहिए। लेकिन क्या शैतान, अपने भयानक इरादों के साथ, लोगों को इस प्रकार के मार्ग पर ले जाता है, और बस इतना ही होता है? बिल्कुल नहीं। वास्तव में, मनुष्य की आकांक्षाएँ चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, उसकी इच्छाएँ चाहे कितनी भी यथार्थपरक क्यों न हों या वे कितनी भी उचित क्यों न हों, वह सब जो मनुष्य हासिल करना चाहता है और वह सब जो मनुष्य खोजता है, वह अटूट रूप से दो शब्दों से जुड़ा है। ये दो शब्द हर व्यक्ति के लिए उसके संपूर्ण जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, और ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें शैतान मनुष्य के भीतर बैठाना चाहता है। वे दो शब्द कौन-से हैं? वे हैं ‘प्रसिद्धि’ और ‘लाभ।’ शैतान एक बहुत ही सौम्य तरीका चुनता है, एक ऐसा तरीका जो मनुष्य की धारणाओं के बहुत ही अनुरूप है और जो बहुत आक्रामक नहीं है, ताकि वह लोगों से अनजाने में ही जीवित रहने के अपने साधन और नियम स्वीकार करवा ले, जीवन लक्ष्य और जीवन की दिशाएँ विकसित करवा ले और जीवन की आकांक्षाएँ रखवाने लगे। अपने जीवन की आकांक्षाओं के बारे में लोगों के वर्णन कितने ही आडंबरपूर्ण क्यों न लगते हों, ये आकांक्षाएँ हमेशा ‘प्रसिद्धि’ और ‘लाभ’ के इर्द-गिर्द घूमती हैं। कोई भी महान या प्रसिद्ध व्यक्ति—या वास्तव में कोई भी व्यक्ति—जीवन भर जिन सारी चीजों का पीछा करता है वे केवल इन दो शब्दों से जुड़ी होती हैं : ‘प्रसिद्धि’ और ‘लाभ’। लोग सोचते हैं कि एक बार उनके पास प्रसिद्धि और लाभ आ जाए तो उनके ऊँचे रुतबे और अपार धन-संपत्ति का आनंद लेने और जीवन का आनंद लेने के लिए पूँजी होती है। उन्हें लगता है कि एक बार उनके पास प्रसिद्धि और लाभ आ जाए तो उनके पास वह पूँजी होती है जिसका इस्तेमाल वे सुख खोजने और देह के उच्छृंखल आनंद में लिप्त रहने के लिए कर सकते हैं। लोग जिस प्रसिद्धि और लाभ की कामना करते हैं उनकी खातिर वे खुशी से और अनजाने में, अपने शरीर, दिल और यहाँ तक कि अपनी संभावनाओं और नियतियों समेत वह सब जो उनके पास है, शैतान को सौंप देते हैं। वे ऐसा बिना किसी हिचकिचाहट के, बिना एक पल के संदेह के करते हैं और बिना कभी यह जाने करते हैं कि वे वह सब कुछ वापस पा सकते हैं जो कभी उनके पास था। लोग जब इस प्रकार खुद को शैतान को सौंप देते हैं और उसके प्रति वफादार हो जाते हैं तो क्या वे खुद पर कोई नियंत्रण बनाए रख सकते हैं? कदापि नहीं। वे पूरी तरह से और बुरी तरह शैतान से नियंत्रित होते हैं। वे पूरी तरह से और सर्वथा इस दलदल में धँस जाते हैं और अपने आप को मुक्त कराने में असमर्थ रहते हैं। जब कोई प्रसिद्धि और लाभ की दलदल में फँस जाता है तो फिर वह कभी उसे नहीं खोजता जो उजला है, जो न्यायोचित है या वे चीजें नहीं खोजता जो खूबसूरत और अच्छी हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोगों के लिए प्रसिद्धि और लाभ का प्रलोभन बहुत बड़ा होता है और ये ऐसी चीजें हैं जिनका अनुसरण लोग अंतहीन ढंग से अपने पूरे जीवन भर और यहाँ तक कि अनंत काल तक कर सकते हैं। क्या यह असली स्थिति नहीं है?(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI)। परमेश्वर के वचनों से मैंने एहसास किया कि शैतान प्रसिद्धि और लाभ का इस्तेमाल लोगों से कड़ी मेहनत करवाने के लिए चारे के रूप में करता है ताकि वे ज्ञान सीखने और भीड़ में अलग दिखने का अनुसरण करें, प्रसिद्धि और लाभ को अपने जीवन का लक्ष्य मानें, परमेश्वर की संप्रभुता को नकार दें और अनजाने में सृष्टिकर्ता की देखभाल और सुरक्षा से भटक जाएँ जिससे वे शैतान के फंदे में जिएँ और अंततः उसके द्वारा निगल लिए जाएँ। मुझे शैतान ने बहुत गहरी चोट पहुँचाई थी। छोटी उम्र से ही, मुझे घर और स्कूल में सिखाया गया था कि “ज्ञान तुम्हारा भाग्य बदल सकता है” और “सबसे महान इंसान बनने के लिए व्यक्ति को सबसे बड़ी कठिनाइयाँ सहनी होंगी।” मेरा मानना था कि अकादमिक उपलब्धि परिवार को सम्मान दिला सकती है, व्यक्ति को भीड़ में अलग दिखा सकती है और उसकी दूसरों से सराहना करवा सकती है। मैंने देखा कि मेरे माता-पिता कैसे अशिक्षित थे और केवल कड़ी शारीरिक मेहनत से ही परिवार का पेट पाल सकते थे। यह न केवल थकाकर चूर कर देने वाला था, कोई उनका आदर भी नहीं करता था। मुझे लगता था कि अपना जीवन इस तरह जीने में कोई मूल्य नहीं है और अकादमिक ज्ञान हासिल करके और भविष्य में एक सम्मानजनक नौकरी पाकर ही मैं अपना जीवन बदल पाऊँगी और अपने रिश्तेदारों और दोस्तों से सराही जाऊँगी। अपनी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए, मैंने दिन-रात पढ़ाई की, और जब विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में मेरा पहला प्रयास उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा, तो मैंने दोबारा तैयारी करने का फैसला किया और पहले से भी ज़्यादा मेहनत की। यहाँ तक कि जब छात्रावास में बत्तियाँ बंद हो जाती थीं, तब भी मैं लिहाफ के अंदर अध्ययन सामग्री पढ़ने के लिए टॉर्च की रोशनी का उपयोग करती थी। भले ही मेरी दूर की नज़र और खराब हो गई, मैंने परवाह नहीं की। अच्छे अंकों वाले कागज़ के एक टुकड़े के लिए, मैं लगातार चिंतित और बेचैन रहती थी। जैसे-जैसे विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा नज़दीक आई, मैं लगातार एक कसी हुई कमानी की तरह तनाव में रहती थी, परीक्षा में असफल होने और अपनी एकमात्र “जीवनरेखा” खोने के डर से सहमी रहती थी। मुझे उलझन और पीड़ा भी महसूस हुई, लेकिन मैं इनसे बचने में असमर्थ थी। मैं बस इन प्रवृत्तियों के साथ बह सकती थी। अब मैं समझ गई कि शैतान लोगों को गुमराह करने के लिए प्रसिद्धि और लाभ का इस्तेमाल करता है, जिससे उनके दिल परमेश्वर से दूर और दूर होते जाते हैं। मुझे याद आया कि कैसे मेरे रिश्तेदार ने मुझे विश्वविद्यालय में दाखिला मिलने के बाद सुसमाचार सुनाया था। मैं इतनी भाग्यशाली थी कि मुझे परमेश्वर का उद्धार मिला और उसकी वाणी सुनने को मिली, लेकिन मैंने इस अवसर को संजोया नहीं। मैं एक अच्छे भविष्य के पीछे भागने को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता मानती थी और बस अपने खाली समय में परमेश्वर में विश्वास करना चाहती थी, बशर्ते इससे मेरी पढ़ाई पर कोई असर न पड़े। मुझे एहसास हो गया कि प्रसिद्धि और लाभ मेरे लिए सत्य का अभ्यास करने और अपना कर्तव्य निभाने में सबसे बड़ी बाधाएँ थे। अब मैंने परमेश्वर की वाणी सुन ली थी, लेकिन मैं सत्य का अनुसरण नहीं कर सकी और अपना कर्तव्य नहीं निभा सकी, बल्कि जीवित रहने के शैतानी नियमों के अनुसार जी रही थी और प्रसिद्धि और लाभ को सत्य और जीवन से अधिक महत्व दे रही थी। मैं सच में सही और गलत में फर्क नहीं कर पा रही थी! भले ही मैं डिप्लोमा के साथ स्नातक हो जाती और एक अच्छी नौकरी पा लेती, अगर मुझे सत्य और जीवन नहीं मिला, तो अंततः परमेश्वर द्वारा मुझे हटा दिया जाएगा। अतीत में, मैं हमेशा यही सोचती थी कि विश्वविद्यालय जाने के साथ ही परमेश्वर में विश्वास करने से मुझे प्रसिद्धि और लाभ के साथ-साथ परमेश्वर के आशीष भी मिल सकते हैं। यह सिर्फ़ मेरी मनगढ़ंत सोच थी और यह बिल्कुल भी सत्य के अनुरूप नहीं थी। परमेश्वर कहता है : “अगर तुम केवल तभी विश्वास करते हो जब तुम्हारे पास समय होता है, और अपनी आस्था के प्रति अपना पूरा ध्यान समर्पित करने में असमर्थ रहते हो, और अगर तुम हमेशा अपनी आस्था में भ्रमित रहते हो, तो तुम्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होगा(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X)। प्रभु यीशु ने यह भी कहा था : “तुम में से जो कोई अपना सब कुछ त्याग न दे, वह मेरा चेला नहीं हो सकता(लूका 14:33)। मैं समझ गई कि परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए तुम्हारे पास एक समर्पित हृदय होना चाहिए, और तुम्हें परिवार, देह, धन, प्रसिद्धि या लाभ से बाधित या बँधा हुआ नहीं होना चाहिए। तुम्हें अपना पूरा दिल और दिमाग अपने कर्तव्य में लगाना चाहिए, सत्य का अनुसरण और अभ्यास करने पर ध्यान देना चाहिए और अंततः स्वभाव में बदलाव और परमेश्वर द्वारा बचा लिए जाने को हासिल करना चाहिए। अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु के शिष्यों की बात करें तो, उनमें से कुछ ने प्रभु यीशु का पूरे दिल से अनुसरण करने के लिए पद और धन त्याग दिया और कुछ ने अपने परिवार त्याग दिए, वे सुसमाचार का प्रचार करने और प्रभु की गवाही देने के लिए हर जगह यात्रा करते रहे। ये सार्थक जीवन थे, अनुकरण के योग्य। इसके अलावा, मैं सोचा करती थी कि अकादमिक ज्ञान हासिल करने से एक अच्छी नौकरी मिलेगी, जिससे मैं खाने-पीने की चिंता से मुक्त जीवन जी सकूँगी और अपने रिश्तेदारों और दोस्तों से सराही जाऊँगी; मैं सोचती थी कि केवल प्रसिद्धि और लाभ ही खुशी ला सकते हैं। लेकिन इस बारे में सोचती हूँ तो भले ही बहुत-से बुद्धिजीवी और धन और शक्ति से संपन्न लोग सतह पर आकर्षक और सुंदर दिखते हैं, और वे जहाँ भी जाते हैं प्रतिष्ठा का आनंद लेते हैं, लेकिन वे परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं और सत्य को नहीं समझते हैं। वे शैतान के फंदे में रहते हैं, प्रसिद्धि और लाभ के लिए होड़ करते हैं, और खुलेआम और गुपचुप दोनों ही ढंग से लड़ते हैं। रुतबा और प्रतिष्ठा पाने के लिए वे अपनी सेहत से समझौता करते हैं और अपनी ही सत्यनिष्ठा और गरिमा को बेच देते हैं। उनका जीवन सुखी नहीं है। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा खो देता है, और परमेश्वर के आशीष या उद्धार के बिना है तो किस खुशी की बात की जा सकती है? चाहे उनके पास कितना भी ज्ञान हो, उन्हें दूसरों से कितनी भी प्रशंसा मिले, या उनके भौतिक सुख कितने भी भव्य क्यों न हों, अंत में वे महाविनाश में गिरेंगे, नरक का दुख भोगेंगे और नष्ट हो जाएंगे। यह वास्तविक भविष्य नहीं है। अब, अंत के दिन हैं। परमेश्वर इस युग का अंत करने जा रहा है और भले को पुरस्कृत और बुरे को दंडित करने का अपना कार्य करने जा रहा है। सत्य का अनुसरण करके और स्वभाव में बदलाव लाकर ही तुम बचाए जा सकते हो और जीवित रह सकते हो, और परमेश्वर द्वारा अगले युग में ले जाए जा सकते हो। यही वास्तविक भविष्य है।

बाद में, मैंने पतरस के अनुभव के बारे में पढ़ा, जिसने मुझे कुछ प्रेरणा और प्रोत्साहन दिया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “पतरस भाग्यशाली था कि उसका जन्म ऐसी अनुकूल सामाजिक परिस्थितियों में हुआ था। समझ से चतुर और बुद्धिमान होने के कारण वह नए विचारों को आसानी से आत्मसात कर लेता था। अपनी पढ़ाई शुरू करने के बाद पाठ ग्रहण को दौरान वह आसानी से एक ही सूचना से कई निष्कर्षो निकाल लेने में सक्षम था। उसके माता-पिता को ऐसा तीव्रबुद्धि पुत्र पाने पर गर्व था, इसलिए उन्होंने इस आशा के साथ उसे विद्यालय भेजने का हर प्रयास किया कि वह आगे बढ़ सके और समाज में किसी प्रकार का कोई आधिकारिक पद प्राप्त करने योग्य हो जाए। अनजाने में पतरस को परमेश्वर में रुचि हो गई, जिसका नतीजा यह हुआ कि चौदह वर्ष की उम्र में जब वह हाई स्कूल में था, तो जिस प्राचीन यूनानी संस्कृति के पाठ्यक्रम का वह अध्ययन कर रहा था, उसके प्रति उसे अरुचि हो गई, खासकर प्राचीन यूनानी इतिहास के काल्पनिक लोगों और मनगढ़ंत घटनाओं से। तब से पतरस ने—जिसने अपनी युवावस्था के बसंत में प्रवेश किया ही था—मानव-जीवन और व्यापक दुनिया के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त करनी शुरू कर दी। उसके विवेक ने उसे अपने माता-पिता द्वारा उठाई गई तकलीफों का बदला चुकाने के लिए मजबूर नहीं किया, क्योंकि उसने स्पष्ट रूप से देख लिया था कि समस्त लोग आत्म-वंचना की स्थिति में निरर्थक जीवन जी रहे हैं, धन तथा मान्यता के लिए संघर्ष करते हुए अपना जीवन बरबाद कर रहे हैं। उसकी इस अंतर्दृष्टि का मुख्य कारण वह सामाजिक वातावरण था, जिसमें वह रह रहा था। लोगों के पास जितना अधिक ज्ञान होता है, उनके आपसी संबंध उतने ही जटिल होते हैं, उनकी भीतरी दुनिया उतनी ही पेचीदा होती है, इस कारण वे रिक्तता में जीते हैं। इन परिस्थितियों में पतरस ने अपना खाली समय व्यापक मुलाकातों में बिताया, जिनमें से अधिकांश धार्मिक हस्तियों से मिलने के लिए थीं। उसके हृदय में एक अस्पष्ट-सी भावना मौजूद लगती थी कि धर्म मानव-संसार की सभी गूढ़ बातों का समाधान कर सकता है, इसलिए वह अकसर धार्मिक सभाओं में भाग लेने के लिए नजदीकी उपासनागृह में जाता था। उसके माता-पिता इस बात से अनजान थे, और जल्दी ही पतरस, जो हमेशा से अच्छे चरित्र वाला था और बेहतरीन विद्वत्ता युक्त था, विद्यालय जाने से नफरत करने लगा। अपने माता-पिता की देखरेख में उसने बड़ी कठिनाई से हाई स्कूल पास किया। वह ज्ञान के सागर से तैरकर तट पर आ गया, एक गहरी साँस ली, और तब से उसे किसी ने शिक्षा नहीं दी और न ही उसे रोका(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, “संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों” के रहस्यों के खुलासे, पतरस के जीवन पर)। पतरस के अनुभव से, मैंने देखा कि पतरस का दिल मासूम था, और वह सकारात्मक चीज़ों से प्यार करता था; उसने छोटी उम्र में ही जीवन के बारे में सोचना शुरू कर दिया था। समाज के साथ अपने आचरण के माध्यम से उसने यह एहसास कर लिया कि लोग अपना जीवन प्रसिद्धि और लाभ के लिए जीते हैं और कोई व्यक्ति जितना ज़्यादा ज्ञान हासिल करता है, उसका मन उतना ही ज़्यादा जटिल और भ्रष्ट हो जाता है। उसने समाज के अंधकार और दुष्टता को भी स्पष्ट रूप से देखा और यह पहचाना कि प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे का अनुसरण करना व्यर्थ है। उसने भीड़ से अलग दिखने की कोशिश करने की अपने माता-पिता की इच्छा का अनुसरण नहीं किया और समाज में किसी प्रकार का आधिकारिक पद हासिल नहीं किया। इसके बजाय, उसने दृढ़ता से अपनी पढ़ाई छोड़ दी और परमेश्वर में आस्था के मार्ग पर चला और बाद में प्रभु यीशु का अनुसरण किया। उसने अपना जीवन परमेश्वर को समझने की कोशिश में बिताया, हर चीज़ में परमेश्वर का इरादा खोजा, और परमेश्वर के वचनों के माध्यम से अपनी कमियों और खामियों को समझा। अंततः वह मृत्यु की कगार तक परमेश्वर के प्रति समर्पण और उससे अत्यंत प्रेम करने में कामयाब रहा, उसने परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त किया। इसके विपरीत, मैं चीज़ों की असलियत नहीं देख सकी, और प्रसिद्धि और लाभ के अपने अनुसरण कारण मैं एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने की इच्छुक नहीं थी, सिर्फ़ अपने खाली समय में विश्वास करके ही संतुष्ट थी। अगर मैं अंत तक इसी तरह विश्वास करती रही, तो यह सब व्यर्थ हो जाएगा! मुझे पतरस के उदाहरण का अनुसरण करना था और अपने व्यक्तिगत भविष्य को त्यागना था और सकारात्मक चीज़ों का अनुसरण करने की पहल करनी थी। विश्वविद्यालय में अपने समय के दौरान, मैंने देखा कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के शासन के तहत विश्वविद्यालय नास्तिक शिक्षा के अड्डे हैं। हर कोई मिथ्याभिमान का अनुसरण करता है और बुराई के लिए लालायित रहता है और छात्रों के खाने-पीने, मौज-मस्ती करने या लड़ने-झगड़ने की कोई परवाह नहीं करता। लेकिन जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं और सही मार्ग पर चलते हैं उनका उत्पीड़न किया जाता है। विश्वविद्यालय परमेश्वर की निंदा और बदनामी करने के लिए निराधार अफवाहें भी फैलाते हैं, लोगों को उससे दूर कर देते हैं और उसके साथ विश्वासघात कराते हैं। अगर मैं विश्वविद्यालय जाती रही, तो मैं बुरी प्रवृत्तियों से बहक ही जाऊँगी और परमेश्वर से अधिकाधिक दूर होती जाऊँगी। अंततः, मैं महाविनाश में गिरूँगी और नष्ट हो जाऊँगी। केवल परमेश्वर ही लोगों को सही मार्ग दिखा सकता है, और सत्य को समझकर ही कोई मानव के समान अधिक जी सकता है। मैं अपना कर्तव्य निभाने और परमेश्वर को संतुष्ट करने का विकल्प चुनने को तैयार थी।

लेकिन जब मैं वाकई अपनी पढ़ाई त्यागने का फैसला करने वाली थी तो मेरे मन में अभी भी कुछ शंकाएँ थीं। एक बार मैंने अपना सारा समय अपने कर्तव्यों में लगाने का फैसला कर लिया तो मैं अपने माता-पिता का ख्याल रखने के लिए पैसे नहीं कमा पाऊँगी। मेरे माता-पिता ने मुझे पाल-पोसकर बड़ा करने और मेरी शिक्षा का खर्च उठाने के लिए इतनी मेहनत की थी और अब वे बूढ़े हो गए थे, उनका स्वास्थ्य पहले जैसा अच्छा नहीं था। अगर वे भविष्य में बीमार पड़ गए, तो मेरी परिस्थितियाँ मुझे उनकी देखभाल करने की इजाज़त नहीं देंगी। मुझे हमेशा ऐसा लगेगा कि मैं उनकी ऋणी हूँ। जब बहन को मेरी दशा के बारे में पता चला तो उसने मेरे लिए परमेश्वर के कुछ वचन ढूँढ़े। मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : “मैं हमेशा उन सभी को आराम पहुँचाऊँगा जो मेरे इरादे समझेंगे, और मैं उन्हें पीड़ा सहने या कोई नुकसान पहुँचने नहीं दूँगा। अब महत्वपूर्ण बात मेरे इरादों के अनुसार कार्य करने में सक्षम बनना है। जो लोग ऐसा करेंगे, वे निश्चित रूप से मेरे आशीष प्राप्त करेंगे और मेरी सुरक्षा में आ जाएँगे। कौन वास्तव में पूरी तरह से मेरे लिए खप पाता है और मेरी खातिर अपना सब-कुछ अर्पित कर पाता है? तुम सभी अधमने हो; तुम्हारे विचार इधर-उधर घूमते हैं, तुम परिवार के बारे में, बाहरी दुनिया के बारे में, भोजन और कपड़ों के बारे में सोचते रहते हो। इस तथ्य के बावजूद कि तुम यहाँ मेरे सामने हो, मेरे लिए चीजें कर रहे हो, अपने दिल में तुम अभी भी घर पर मौजूद अपनी पत्नी, बच्चों और माता-पिता के बारे में सोच रहे हो। क्या वे तुम्हारी संपत्ति हैं? तुम उन्हें मेरे हाथों में क्यों नहीं सौंप देते? क्या तुम मुझ पर भरोसा नहीं करते? या ऐसा है कि तुम डरते हो कि मैं तुम्हारे लिए अनुचित व्यवस्थाएँ करूँगा?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 59)। जो लोग सच्चे दिल से खुद को परमेश्वर के लिए खपाते हैं उनमें उसके प्रति वफादारी और समर्पण होता है; वे व्यक्तिगत लाभ और हानि पर विचार किए बिना अपना कर्तव्य निभाते हैं, और परमेश्वर का आदेश पूरा करने के लिए अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाते हैं। हालाँकि, जब मैं किसी चुनाव का सामना करती थी, तो मैं हमेशा अपने भविष्य, अपने परिवार और अपने माता-पिता के बारे में सोचती थी। मैं सच में अपना सब कुछ परमेश्वर के हाथों में नहीं सौंप सकी। असल में, हमारे माता-पिता की नियति परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है : वे कितनी पीड़ा सहेंगे और कितनी खुशी का आनंद लेंगे, यह परमेश्वर द्वारा बहुत पहले ही पूर्वनियत किया जा चुका है। अगर वे बीमारी से घिर जाते हैं, तो बच्चे होने के नाते, भले ही हम अपने माता-पिता के साथ रहें या उनके इलाज के लिए पैसे दें, हम उनकी जगह पीड़ा नहीं सह सकते हैं और कुछ भी नहीं बदल सकते हैं। मेरे चाचा को ही लीजिए, जिनके बहुत सारे बच्चे हैं। मेरे चचेरे भाई-बहनों के परिवार अपेक्षाकृत संपन्न हैं, और वे मेरे चाचा के प्रति काफी कर्तव्यनिष्ठ हैं। जब मेरे चाचा को फेफड़ों का कैंसर हुआ, तो उन सभी ने उनकी सर्जरी के लिए पैसे दिए और बारी-बारी से उनकी देखभाल की। उन्होंने सोचा था कि सर्जरी के बाद वह ठीक हो जाएँगे, लेकिन, अप्रत्याशित रूप से, कुछ ही महीनों में उनका निधन हो गया। मेरा परिवार संपन्न नहीं है, और मेरे माता-पिता ज़्यादातर शारीरिक श्रम करते हैं। लेकिन उनकी सेहत अभी भी अच्छी है और वे पूरे साल शायद ही कभी बीमार पड़ते हैं। मैं परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं समझती थी और परमेश्वर में मेरी आस्था बहुत कम थी। तब से, मैं सृष्टिकर्ता के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने को तैयार थी, और अपने माता-पिता से जुड़ी हर बात परमेश्वर को सौंपने को तैयार थी।

फिर मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और मुझे मानवजाति को बचाने के परमेश्वर के उत्कट इरादे का एहसास हुआ। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर उन लोगों की खोज कर रहा है जो उसके प्रकट होने की लालसा करते हैं। वह उन लोगों की खोज कर रहा है जो उसके वचनों को सुनते हैं, जो उसके आदेश को नहीं भूलते और अपना तन-मन उसे समर्पित करते हैं। वह उनकी खोज कर रहा है जो उसके सामने शिशुओं के समान समर्पित और प्रतिरोध न करने वाले हों। यदि तुम किसी भी बल से बाधित हुए बिना खुद को परमेश्वर के प्रति समर्पित करते हो, तो परमेश्वर तुम्हारे ऊपर अनुग्रह की दृष्टि डालेगा और तुम्हें अपने आशीष प्रदान करेगा। यदि तुम्हारे पास ऊँचा रुतबा है, अत्यधिक प्रतिष्ठा है, प्रचुर ज्ञान है, असंख्य संपत्तियाँ हैं और बहुत से लोगों का सहारा है, लेकिन तुम इन बातों से अप्रभावित रहते हो और परमेश्वर के पुकार और आदेश को स्वीकार करने और परमेश्वर तुमसे जो कुछ कहता है वह करने के लिए अभी भी उसके सम्मुख आते हो तो फिर तुम जो कुछ भी करोगे वह सब पृथ्वी पर सर्वाधिक सार्थक ध्येय होगा और मनुष्य का सर्वाधिक न्यायसंगत उपक्रम होगा(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 2 : परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य पर संप्रभु है)। परमेश्वर के वचनों से मैंने देखा कि परमेश्वर उन लोगों की खोज कर रहा है जो उसके वचन सुन सकते हैं और उसके प्रति समर्पण कर सकते हैं और वह उन लोगों को बचाना चाहता है जो उसके प्रकटन के लिए लालायित रहते हैं। अगर लोग अपनी प्रतिष्ठा, रुतबा, धन और हित त्याग सकते हैं और अपना कर्तव्य निभाने के लिए परमेश्वर के सामने आ सकते हैं, तो यह उसके द्वारा अनुमोदित है, और यह एक सार्थक बात भी है। मैंने इस बारे में सोचा कि कैसे पतरस ने परमेश्वर की पुकार का पालन किया और अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से निभाया और अंततः परमेश्वर के दिल को दिलासा देने के लिए एक सुंदर और गुंजायमान गवाही दी। मुझे भी एक सृजित प्राणी की ज़िम्मेदारियाँ अच्छी तरह निभानी चाहिए और अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से निभाना चाहिए; तभी मुझमें अंतरात्मा और मानवता हो सकती है। मैं इतनी भाग्यशाली थी कि कलीसिया में कर्तव्य निभा पा रही थी, यह मुझ पर परमेश्वर का अनुग्रह था और मैं अपना कर्तव्य निभाने के लिए अपनी पढ़ाई छोड़ने को तैयार थी।

बाद में, मैंने अपने पिता को अपनी पसंद के बारे में बताया और उन्होंने मेरा समर्थन किया। उन्होंने यहाँ तक कहा, “परमेश्वर में विश्वास जीवन का उचित मार्ग है। तुम अब एक वयस्क हो, और चूँकि तुमने यह मार्ग चुना है, तो तुम्हें आगे बढ़ते रहने का संकल्प और दृढ़ता रखनी होगी। चाहे तुम्हें जिन भी झटकों या कठिनाइयों का सामना करना पड़े, हतोत्साहित मत होना। बस लगन से अनुसरण करना!” मैं अपने पिता के समर्थन से थोड़ी-सी हैरान थी। मैं जानती थी कि उनके विचार और ख्याल परमेश्वर के हाथ में थे और मैं अपने दिल में परमेश्वर के प्रति बहुत कृतज्ञ थी। परमेश्वर का अनुसरण करने में मेरी आस्था और भी प्रबल हो गई। नया सेमेस्टर शुरू होने के बाद मैंने पढ़ाई छोड़ने के लिए अपने शिक्षक को अर्जी दी। मेरे शिक्षक को समझ नहीं आया कि मैं एक अच्छे विश्वविद्यालय को क्यों छोड़ रही हूँ, और वह यह कहते हुए मुझे मनाने की कोशिश करते रहे, “तुम्हें इसके बारे में ध्यान से सोचना होगा। तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हें विश्वविद्यालय भेजने के लिए बहुत मेहनत की है और तुम्हारे लिए दाखिला पाना आसान नहीं था। अगर तुम अब छोड़ दोगी, तो भविष्य में तुम्हारे पास कभी भी एक स्थिर नौकरी नहीं होगी। तुम्हें दूरदर्शी होना होगा, और अदूरदर्शी नहीं बनना चाहिए!” जब मैंने शिक्षक को यह कहते सुना कि मुझे दूरदर्शी होना चाहिए, तो मेरा दिल धक से रह गया। मैंने सोचा, “हाँ। एक बार जब मैं यह निर्णय ले लूँगी, तो मेरे पास कभी भी एक सम्मानजनक नौकरी नहीं होगी। तब, मुझे न तो दूसरों से सराहना मिलेगी और न ही मुझे देह के सुख मिलेंगे।” मैंने महसूस किया कि मेरी मानसिकता सही नहीं थी, इसलिए मैंने तुरंत अपने दिल में परमेश्वर से प्रार्थना की। इस पल, मुझे परमेश्वर के वचन स्पष्ट रूप से याद आए : “मेरे लोगों को शैतान के कुटिल कुचक्रों से हर समय सावधान रहना चाहिए...(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 3)। मैं जानती थी कि यह परमेश्वर का मुझे याद दिलाना था। बाहर से, ऐसा लग रहा था कि मैं सिर्फ़ अपने शिक्षक के साथ बातचीत कर रही हूँ, लेकिन असल में, इसके पीछे शैतान की साजिश छिपी हुई थी। शैतान ने शिक्षक का इस्तेमाल कुछ ऐसी बातें कहने के लिए किया जो मेरे हित में लग रही थीं, मुझे परमेश्वर से दूर जाने और अपना कर्तव्य छोड़ने के लिए ललचाया। शैतान सच में कितना नीच है! मैंने यह भी सोचा, “शिक्षक ने कहा कि मुझे अदूरदर्शी नहीं बल्कि दूरदर्शी होना चाहिए; अदूरदर्शी होना और दूरदर्शी होना वास्तव में क्या है? अगर मैं एक उच्च-स्तरीय डिग्री, एक अच्छी नौकरी और दूसरों से सराहना के पीछे भागती हूँ, लेकिन न अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से निभा सकती हूँ, न ही सत्य प्राप्त कर सकती हूँ तो जब परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाएगा, मुझे कुछ भी हासिल नहीं होगा। इसी को अदूरदर्शी होना कहते हैं। परमेश्वर का अनुसरण करना और एक सृजित प्राणी के कर्तव्यों को अच्छे ढंग से निभाना, और स्वभाव में बदलाव लाने और परमेश्वर द्वारा बचाए जाने के लिए सत्य का अनुसरण करना—यही सबसे सही विकल्प है और यही सच्ची दूरदर्शिता है।” फिर, मैंने दृढ़ता से उत्तर दिया, “विश्वविद्यालय छोड़ने का मेरा निर्णय पल भर का आवेग नहीं था। मैंने इस पर लंबे समय तक विचार किया है और मुझे इसका पछतावा नहीं होगा!” शिक्षक ने देखा कि वह मुझे मना नहीं सका और उसने असहाय होकर अपना सिर हिलाया। उसने विश्वविद्यालय से मेरा नाम काटने की प्रक्रिया पूरी की। जिस क्षण मैंने परिसर से बाहर कदम रखा, मुझे बेहद खुशी महसूस हुई, क्योंकि अब मुझे सभाओं में भाग लेने या अपना कर्तव्य निभाने के लिए अपने शिक्षकों या सहपाठियों से बाधित नहीं होना पड़ेगा! ऐसा लगा जैसे मेरे कंधों से एक भारी बोझ उतर गया हो। मुझे लगा जैसे मैं एक पिंजरे से निकली चिड़िया हूँ, नीले आसमान के आगोश में लौट रही हूँ।

उसके बाद मैंने अपना सारा समय खुद को अपने कर्तव्यों में झोंकने में लगा दिया। मैं भाई-बहनों के साथ हर दिन सभाओं में भाग लेती थी और अपना कर्तव्य निभाती थी, बहुत ही सहज और शांत महसूस करती थी। अपना कर्तव्य निभाने की प्रक्रिया में मैंने बहुत-से भ्रष्ट स्वभाव प्रकट किए। उदाहरण के लिए, अपना कर्तव्य निभाने में मैं त्वरित लाभों के लिए व्यग्र रहती थी, अनमनी रहती थी और दैहिक सुखों में लिप्त रहती थी; मैंने कुछ काट-छाँट, झटके और अनुशासन का भी अनुभव किया। मैंने अपने भ्रष्ट स्वभावों की कुछ समझ प्राप्त की और कुछ बदलाव भी हासिल किए। ये लाभ ऐसे नहीं थे जो मैं विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान हासिल कर सकती थी। मैं परमेश्वर को धन्यवाद देती हूँ कि वह मुझे प्रसिद्धि और लाभ के अनुसरण के दलदल से खींचकर बाहर ले आया और मुझे जीवन के उचित मार्ग पर ले गया!

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