33. सौभाग्य और दुर्भाग्य

लेखिका दुजुआन, जापान

मेरा जन्म चीन के ग्रामीण इलाके में गाँव के एक गरीब परिवार में हुआ था। मेरे परिवार की आर्थिक परेशानियों के कारण, कभी-कभी मुझे बिना कुछ खाये ही रहना पड़ता था, कहने का मतलब कि मुझे नाश्ते और खिलौने भी नसीब नहीं होते थे। इतना ही नहीं, मेरे सभी कपड़े भी मेरी बड़ी बहन के छोड़े हुए होते थे। चूंकि उनके कपड़े आम तौर पर मुझे काफ़ी बड़े होते थे, तो मेरे सहपाठी मुझ पर हँसते और मेरे साथ खेलने से मना कर देते। अपने बचपन में मुझे काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। तभी से, मैंने अपने मन में यह संकल्प लिया: जब मैं बड़ी हो जाऊंगी, तब काफ़ी पैसे कमाऊंगी और अपने साथियों से आगे बढ़ जाऊंगी। मैं दूसरों को कभी मुझे नीचा दिखाने का मौक़ा नहीं दूंगी। चूंकि मेरे परिवार के पास पैसे नहीं थे, मुझे जूनियर हाई स्कूल से ग्रेजुएट होने से पहले ही पढ़ाई छोड़ देनी पड़ी और मैं काउंटी टाउन में एक दवा के कारखाने में काम करने लगी। ज़्यादा पैसे कमाने के लिये, मैं अक्सर रात के 9 या 10 बजे तक ओवरटाइम काम करती थी, लेकिन मेरी सभी कोशिशों के बावजूद मैं बस थोड़े से पैसे ही कमा पाती थी। इसी दौरान मैंने सुना कि मेरी बहन सब्जियां बेचकर पांच दिनों में ही उतना कमा लेती थी जितना मैं एक महीने में कमाती थी, इसलिये मैंने दवा के कारखाने का काम छोड़ दिया और सब्जियां बेचने लगी। कुछ समय के बाद मैंने पाया कि फल बेचकर मैं और भी ज़्यादा पैसे कमा सकती थी, इसलिये मैंने फलों का कारोबार शुरू करने का फैसला किया। मेरे पति से शादी होने के बाद, हमने अपना रेस्टोरेंट खोला। मैंने सोचा कि अब जबकि मेरे पास एक रेस्टोरेंट है, मैं और भी ज़्यादा पैसे कमा पाऊँगी। जब मैं काफ़ी पैसे कमाने लगूंगी तो स्वाभाविक रूप से मेरे साथी मेरी प्रशंसा करेंगे और मेरा सम्मान भी करेंगे। साथ ही, मैं एक संभ्रांत जीवनशैली भी जी सकूंगी। हालांकि, कुछ समय तक कारोबार चलाने के बाद मैंने पाया कि हम उतने पैसे नहीं कमा पाते थे। मैं चिंतित और परेशान रहने लगी। कब मैं ऐसा जीवन जीने के काबिल बन पाऊँगी जिसकी दूसरे लोग प्रशंसा करें?

साल 2008 में, संयोगवश एक अवसर हाथ आया। मेरी एक दोस्त ने बताया कि जापान में एक दिन का पारिश्रमिक मोटे तौर पर चीन में दस दिनों के पारिश्रमिक के बराबर है। जब मैंने यह सुना तो मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। मैंने सोचा कि मुझे अंततः पैसे कमाने का एक अच्छा अवसर मिल गया है। हालांकि जापान जाने के लिये एजेंट की फ़ीस बहुत अधिक थी, मैंने मन ही मन सोचा: "बिना कुछ लगाये कुछ भी नहीं मिलता। चाहे एजेंट की फ़ीस कितनी भी ज़्यादा क्यों न हो, जब हमें जापान में काम मिल जाएगा तो हम जल्द ही इस खर्च की भरपाई कर लेंगे।" एक बेहतर जीवन जीने के हमारे सपनों को पूरा करने के लिये, मेरे पति और मैंने तत्काल जापान जाने का फैसला किया। हर दिन, मेरे पति और मैं दस घंटे से ज़्यादा काम करते थे। काम का तनाव बहुत अधिक था और मैं दिन भर पूरी तरह से थकी हुई महसूस करती। काम के बाद, मैं बस बिस्तर पर लेटकर आराम करना चाहती थी—खाने-पीने का भी मन नहीं होता था। ऐसी तेज़ रफ़्तार वाली जीवनशैली को सहन करना मुश्किल लग रहा था। हालांकि, जब मैंने कुछ सालों के संघर्ष के बाद जमा होने वाले पैसों के बारे में सोचा, तो यह सोचकर अपना हौसला बढ़ाया: "अभी काम करना मुश्किल भले हो, लेकिन भविष्य में तुम एक शानदार जिंदगी जी सकोगी। इसलिये, ऐसे ही चलने दो और हिम्मत मत हारो।" इस तरह, मैं हर दिन कड़ी मेहनत से काम करती, पैसे कमाने की मशीन की तरह बिना थके पिसती रहती। 2015 में, काम के भारी बोझ के कारण मेरी तबीयत खराब हो गई। मैं जांच के लिये अस्पताल पहुँची, तो डॉक्टर ने मुझे बताया कि मुझे स्लिप डिस्क की समस्या हो गई थी और इसकी वजह से मेरी एक नस पर दबाव पड़ रहा था। अगर मैं लगातार इसी तरह से काम करती रही, तो अंततः बिस्तर पकड़ लूंगी और खुद की देखभाल भी नहीं कर पाऊँगी। इस खबर से मेरे होश उड़ गये। एकदम से, मैं बहुत कमज़ोर हो गई थी। मेरी जिंदगी में अभी सुधार होना शुरू ही हुआ था और मैं अपने सपनों को पूरा करने के अधिक से अधिक करीब पहुँच रही थी। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं बीमार पड़ जाऊंगी। मैंने हिम्मत नहीं हारी। मैंने सोचा: "मैं अभी भी जवान हूँ। मैं हर संभव कोशिश करके इस मुसीबत से बाहर निकल सकती हूँ। अगर मैं अभी ज़्यादा पैसे नहीं कमाती हूँ और थोड़े से पैसों के साथ चीन वापस लौटती हूँ, तो क्या मेरी अधिक बदनामी नहीं हो जाएगी?" इसलिये, मैं अपने बीमार शरीर को घिसटते हुए हर दिन काम पर जाने लगी, ताकि ज़्यादा पैसे कमा सकूं। हालांकि, कुछ दिनों के बाद मैं इतनी बीमार हो गई कि बिस्तर से उठने के काबिल भी नहीं रही।

अस्पताल में बिस्तर पर लेटे हुए मैंने अपने आपको पूरी तरह से असहाय महसूस किया, जहां मेरी देखभाल करने वाला कोई भी नहीं था। "मैं इस परिस्थिति तक कैसे पहुँची? क्या मैं सचमुच बिस्तर पर पड़ी रहूँगी?" उस समय मुझे यही उम्मीद थी कोई आकर मेरे करीब बैठे और मुझे दिलासा दे। बदकिस्मती से, मेरे पति काम पर थे और मेरी बेटा स्कूल में था। मेरे बॉस और सहकर्मी सिर्फ़ अपने निजी फ़ायदे की सोचते थे; उनमें से किसी ने भी मेरी ज़रा सी भी ख़बर नहीं ली। जब मैंने मरीजों के वार्ड में अपने आस-पास के सभी मरीजों को देखा, तो हर कोई अपनी पीड़ा से दुखी था, मैंने एक तरह की अकथनीय उदासी का अनुभव किया और यह सोचने से खुद को नहीं रोक सकी: जीवन का उद्देश्य क्या है? कोई व्यक्ति कैसे एक सार्थक जीवन जी सकता है? क्या पैसा सचमुच खुशहाली खरीद सकता है? मैंने सोचा कि 30 सालों के संघर्ष में मुझे क्या हासिल हुआ है। मैंने एक दवा के कारखाने में काम किया, फल बेचे, रेस्टोरेंट चलाया और फिर काम ढूँढने के लिए जापान आ गई। इन सालों में दरअसल मैंने अच्छे-खासे पैसे भी कमाये, लेकिन यह सब मेरी अपनी खुशी की कीमत पर आया। अब ऐसा कोई भी नहीं है जिसके साथ मैं अपना दुःख बाँट सकूं। पहले मैंने सोचा था कि जब मैं जापान पहुँच जाऊंगी तो बहुत जल्दी अपने सपनों को पूरा कर पाऊँगी। जापान में कुछ साल बिताने के बाद, जब मैं चीन लौटूंगी तो दौलत और शोहरत के साथ नये सिरे से खुशहाल जिंदगी बिता पाऊँगी और अपने साथियों की ईर्ष्या का कारण बनूंगी। हालांकि, अब मैं यहाँ अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी हूँ और ऐसा लग रहा है कि शायद अपनी जिंदगी का दूसरा हिस्सा मुझे व्हीलचेयर पर बैठकर निरंतर पीड़ा में गुजारना पड़ेगा... ऐसा सोचते हुए, मैं इस बात पर पछताने लगी कि मैंने सिर्फ़ पैसे कमाने और जीवन में आगे बढ़ने के लिये अपनी जिंदगी खतरे में डाल दी। मैं इस बारे में जितनी अधिक सोचती, उतने ही ज़्यादा आंसू मेरे चेहरे पर ढलकने लगते। इस पीड़ा में, मेरे दिल से यही आवाज़ निकली: "हे परमेश्वर, मुझे बचा लो! ये जिंदगी इतनी निष्ठुर क्यों है?"

जब मैं सबसे अधिक पीड़ा में डूबी हुई थी और असहाय महसूस कर रही थी, तभी परमेश्वर का उद्धार मेरे पास आया और मेरी बीमारी मेरे लिये आशीष बन गई। संयोगवश, मेरा परिचय सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की तीन बहनों से हुआ। उनके साथ मिलकर परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हुए, मैं यह समाझ गई कि धरती और स्वर्ग में सभी चीज़ें स्वाभाविक प्रक्रियाओं से उत्पन्न नहीं होती हैं, बल्कि परमेश्वर द्वारा बनाई जाती हैं, परमेश्वर पूरे ब्रह्मांड का मालिक है, मनुष्य का भाग्य भी परमेश्वर के हाथों में है, परमेश्वर ने मानवजाति को लगातार मार्गदर्शन और पोषण दिया है, वह निरंतर मानवजाति की देखभाल और सुरक्षा करता है। मैंने महसूस किया कि परमेश्वर मनुष्य से कितना अधिक प्रेम करता है। लेकिन अभी भी कुछ ऐसा था जिसे मैं समझ नहीं पाई थी: परमेश्वर हमारे भाग्यों पर शासन और नियंत्रण करता है, हमें खुशी और आनंद में होना चाहिए, तो फिर हम अभी भी बीमारी और पीड़ा क्यों सहन करते हैं? जीवन इतना मुश्किल क्यों है? जीवन की पीड़ा वास्तव में कहाँ से आती है? एक दिन, मैंने अपनी उलझन के बारे में बहनों को बताया। तब एक बहन ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के इन वचनों को मुझे पढ़कर सुनाया: "मनुष्य के पूरे जीवन में मौजूद जन्म, मृत्यु, बीमारी और वृद्धावस्था की पीड़ा कहाँ से आई? सबसे पहले किस वजह से लोगों को ये चीज़े हुईं? क्या जब मनुष्य को पहली बार सृजित किया गया था तब उसमें ये चीजें थीं? वे नहीं थीं, है ना? तो ये चीज़ें कहाँ से आईं? जैसे कि देह की पीड़ा, देह की परेशानियाँ और खोखलापन और दुनिया की चरम दुर्दशा। शैतान ने मनुष्य को भ्रष्ट करने के बाद उसे यंत्रणा देनी आरम्भ कर दी। तब मनुष्य अधिकाधिक अपभ्रष्ट हो गया, मनुष्य की बीमारियाँ गहरी हो गईं, और उसका कष्ट अधिकाधिक गंभीर हो गया। मनुष्य दुनिया में अधिकाधिक खोखलापन, त्रासदी और जीवित रहने में असमर्थता महसूस करने लगा, और दुनिया के लिए कम से कमतर आशा महसूस करने लगा। इस प्रकार यह दुःख मनुष्य पर शैतान द्वारा लाया गया था, और यह केवल तब आया जब मनुष्य शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया था और मनुष्य का देह अपभ्रष्ट हो गया था" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "परमेश्वर के अनुभव करने के मायने")। बहन ने मेरे साथ सहभागिता करते हुए कहा, "प्रारंभ में जब परमेश्वर ने मनुष्य को बनाया, तब वह उसके साथ था, उसने मनुष्य की देखभाल और सुरक्षा की। उस समय जन्म, बुढ़ापा, बीमारी या मृत्यु, कुछ भी नहीं था और कोई दुःख या नाराज़गी नहीं थी। मनुष्य चिंता और देखभाल से मुक्त होकर अदन के बाग़ में रहता था, वह परमेश्वर द्वारा दी गई सभी चीज़ों का आनंद उठाता था। मनुष्य परमेश्वर के मार्गदर्शन में खुशी और आनंद के साथ जीवन जीता था। लेकिन शैतान ने मनुष्य को लालच देकर भ्रष्ट कर दिया, तब उसने परमेश्वर को धोखा दिया और परमेश्वर के वचनों के बजाय शैतान के वचनों पर ध्यान दिया। इसी कारण से मनुष्य ने परमेश्वर की देखभाल, सुरक्षा और आशीष को गँवा दिया और वह शैतान के अधिकार क्षेत्र में आ गया। हज़ारों सालों से, शैतान ने लोगों को धोखा देने और नुकसान पहुंचाने के लिये लगातार भौतिकतावाद, नास्तिकता और विकासवाद जैसे पाखंडों और कुतर्कों का इस्तेमाल किया है, उसने महान लोगों और हस्तियों द्वारा प्रचारित बेतुकी बातों और झूठों का सहारा लिया है, जैसे कि: 'परमेश्वर बिल्कुल भी नहीं है,' 'यहाँ कभी भी कोई उद्धारकर्ता नहीं हुआ है,' 'किसी व्यक्‍ति की नियति उसी के ही हाथ में होती है,' 'अपने आप में विभेद करना और अपने पूर्वजों को सम्मान देना,' 'स्वर्ग उन लोगों को नष्ट कर देता है जो स्वयं के लिए नहीं हैं,' 'एक व्यक्‍ति पैसों के लिए मर जाता है; एक पक्षी भोजन के लिए मर जाता है,' 'दुनिया पैसों के इशारों पर नाचती है,' 'पैसा पहले है,' आदि, आदि। जब मनुष्य ने इन बेतुकी बातों और पाखंडों को स्वीकार कर लिया, तब उसने परमेश्वर के अस्तित्व को नकार दिया, उसकी संप्रभुता को अस्वीकार कर दिया और उसे धोखा दिया। लोग एक खुशहाल जीवन पाने के लिए अपने दो हाथों पर भरोसा करना चाहते थे। मनुष्य का स्वभाव भी अधिक से अधिक अहंकारी और दंभी हो गया। लोग पहले से अधिक आत्म-तुष्ट, स्वार्थी, कपटी और दुष्ट बन गये। अपने रुतबे, धन और निजी लाभ के संघर्ष में लोगों के बीच सभी तरह की साँठ-गाँठ, साजिश और प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई। अधिक से अधिक चिंतित और परेशान होने के कारण, वे एक दूसरे से लड़ने लगे और एक दूसरे को धोखा देने लगे। अंततः, इसके कारण लोग बीमार पड़ गये, पीड़ा और तकलीफ़ का अनुभव करने लगे और आध्यात्मिक रूप से खाली हो गये। इन पीड़ाओं और चिंताओं ने हमें यह महसूस कराया कि इस दुनिया में मनुष्य का जीवन बहुत अधिक संघर्षमय, बहुत बोझिल और पीड़ा से भरा हुआ है। यह सब शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट किये जाने के बाद हुआ है, वह शैतान ही था जो हमें नुकसान पहुंचा रहा था। साथ ही, यह मनुष्य द्वारा परमेश्वर को अस्वीकार किये जाने, खुद को परमेश्वर से दूर कर लेने और परमेश्वर को धोखा देने का दुष्परिणाम भी था।"

बहन ने मेरे साथ अपनी सहभागिता यह कहते हुए जारी रखी: "परमेश्वर शैतान के द्वारा मनुष्य को लगातार भ्रष्ट किये जाते और नुकसान पहुंचाये जाते नहीं देख सकता। इसलिये, उसने हम भ्रष्ट मनुष्यों को छुटकारा दिलाने और बचाने के लिये दो बार देहधारण किया है। खास तौर पर अंत के दिनों में, देहधारी मसीह ने लाखों वचन बोले हैं; वे सभी वचन सत्य हैं जो लोगों को शैतान की भ्रष्टता के चंगुल से निकालने और शुद्ध करके पूरी तरह से बचाये जाने में मदद करते हैं। अगर हम परमेश्वर के वचनों को सुनते और उसके वचनों के अंदर के सत्य को समझते हैं, तो हम उन सभी साधनों और तरीकों को देख और समझ पाएंगे जिनसे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है। हम शैतान के भ्रष्ट सार को समझ पाएंगे और हमारे पास शैतान का त्याग करने, शैतान के नुकसानों से मुक्त होने, परमेश्वर के समक्ष वापस लौटने, परमेश्वर का उद्धार पाने और अंत में परमेश्वर द्वारा एक शानदार आख़िरी मंजिल तक पहुंचाये जाने की क्षमता होगी।" जब मैंने यह सुना कि परमेश्वर स्वयं मनुष्य को बचाने के लिये आये हैं, तो मैं बहुत भावुक हो गई। मैं वाकई ऐसा नहीं चाहती थी कि शैतान मुझे लगातार नुकसान पहुंचाता रहे, इसलिये मैंने बहनों को अपनी पीड़ा और उलझन के बारे में बताया: "एक बात मुझे बिलकुल भी समझ नहीं आती। एक कहावत है, 'आदमी ऊपर की ओर के लिये संघर्ष करता है; पानी नीचे की ओर बहता है।' मैंने अपने पैरों पर खड़ी होने और एक आरामदायक जीवन जीने के लिए काफ़ी परिश्रम किया, सामाजिक मानकों के अनुसार इसे आदर्शवादी और महत्वाकांक्षी होने के रूप में देखा जाएगा। क्या इस तरह का जीवन जीना भी शैतान द्वारा हमें नुकसान पहुंचाये जाने का तरीका हो सकता है?"

बहन ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों के अन्य दो अंश भी मुझे पढ़कर सुनाये: "मनुष्य के द्वारा ज्ञान सीखने की प्रक्रिया के दौरान, शैतान किसी भी तरीके का उपयोग कर सकता है, चाहे यह कहानियों की व्याख्या करना हो, ज्ञान का मात्र एक अंश देना हो, या उन्हें अपनी इच्छाओं को संतुष्ट करने देना हो या अपने आदर्शों को संतुष्ट करने देना हो। शैतान तुम्हें किस मार्ग पर ले जाना चाहता है? लोग सोचते हैं कि ज्ञान को सीखने में कुछ भी ग़लत नहीं है, कि यह तो स्वाभाविक बात है। इसे हल्के ढंग से कहें तो, ऊँचे विचारों को बढ़ावा देना और महत्वाकांक्षाओं का होना आकांक्षाओं को रखना है, और यह जीवन में सही मार्ग होना चाहिए। यदि लोग अपने स्वयं के आदर्शों को साकार कर सकें, या अपने जीवन में कोई जीवनवृत्ति बना सकें—तो क्या उस तरह से जीवन बिताना और भी अधिक गौरवशाली नहीं है? उस प्रकार से न केवल किसी व्यक्ति के पूर्वजों का सम्मान करना बल्कि संभवतः इतिहास पर अपनी छाप छोड़ देना—क्या यह एक अच्छी बात नहीं है? यह सांसारिक लोगों की दृष्टि में एक अच्छी बात है, और उनके लिए यह उचित और सकारात्मक होनी चाहिए। हालाँकि, क्या शैतान अपनी भयावह मंशाओं के साथ, लोगों को बस इस प्रकार के मार्ग पर ले चलता है और तब निर्णय लेता है कि यह पूरा हो गया है? कदापि नहीं। वास्तव में, मनुष्य के आदर्श चाहे कितने ही ऊँचे क्यों न हों, चाहे मनुष्य की इच्छाएँ कितनी ही वास्तविक क्यों न हों या वे कितनी ही उचित क्यों न हों, वह सब जो मनुष्य हासिल करना चाहता है, और वह सब जिसे मनुष्य खोजता है वह जटिल रूप से दो शब्दों से जुड़ा हुआ है। ये दो शब्द हर व्यक्ति के जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, और ये ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें शैतान मनुष्य के भीतर बिठाने का इरादा करता है। ये दो शब्द कौन से हैं? वे हैं 'प्रसिद्धि' और 'लाभ'। शैतान बहुत ही धूर्त किस्म का मार्ग चुनता है, ऐसा मार्ग जो मनुष्य की धारणाओं से बहुत अधिक मिलता जुलता है; यह किसी प्रकार का अतिवादी मार्ग नहीं है। अनभिज्ञता के मध्य, लोग शैतान के जीवन जीने के तरीके, जीवन जीने के उसके नियमों को स्वीकार करने लगते हैं, जीवन के लक्ष्यों और जीवन में अपनी दिशा को स्थापित करते हैं, और ऐसा करने से वे अनजाने में ही जीवन में आदर्शों को प्राप्त करने लगते हैं। चाहे जीवन में ये आदर्श कितने ही ऊँचे प्रतीत क्यों न होते हों, ये केवल एक बहाना है जो प्रसिद्धि और लाभ से जटिलता से जुड़ा हुआ है। कोई भी महान या प्रसिद्ध व्यक्ति, वास्तव में सभी लोग, वे जीवन में जिस किसी चीज़ का अनुसरण करते हैं वह केवल इन दो शब्दों से ही जुड़ा होता हैः 'प्रसिद्धि' एवं 'लाभ'। लोग सोचते हैं कि जब एक बार उनके पास प्रसिद्धि एवं लाभ आ जाए, तो वे ऊँचे रुतबे एवं अपार धन-सम्पत्ति का आनन्द लेने के लिए, और जीवन का आनन्द लेने के लिए उनका लाभ उठा सकते हैं। जब एक बार उनके पास प्रसिद्धि एवं लाभ आ जाता है, तो वे देह के सुख विलास की अपनी खोज में और अनैतिक आनन्द में उनका लाभ उठा सकते हैं। लोग स्वेच्छा से, यद्यपि अनजाने में, अपने शरीरों, मनों, वह सब जो उनके पास है, अपने भविष्य एवं अपनी नियतियों को ले जा कर शैतान के हाथों में सौंप देते हैं ताकि उस प्रसिद्धि एवं लाभ को अर्जित कर सकें जिनकी उन्हें लालसा है। लोग वास्तव में इसे एक पल की हिचकिचाहट के बगैर सदैव करते हैं, और इस सब कुछ को पुनः प्राप्त करने की आवश्यकता के प्रति सदैव अनजान होकर ऐसा करते हैं। क्या लोगों के पास तब भी स्वयं पर कोई नियन्त्रण हो सकता है जब एक बार वे शैतान की शरण ले लेते हैं और उसके प्रति इस प्रकार से वफादार हो जाते हैं? कदापि नहीं। उन्हें पूरी तरह से और सर्वथा शैतान के द्वारा नियन्त्रित किया जाता है। साथ ही वे पूरी तरह से और सर्वथा दलदल में धंस गए हैं और अपने आप को मुक्त कराने में असमर्थ हैं। एक बार जब कोई प्रसिद्धि एवं लाभ के दलदल में पड़ जाता है, तो वह आगे से उसकी खोज नहीं करता है जो उजला है, जो धार्मिक है या उन चीज़ों को नहीं खोजता है जो खूबसूरत एवं अच्छी हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रसिद्धि एवं लाभ की जो मोहक शक्ति लोगों के ऊपर है वह बहुत बड़ी है, और वे लोगों के लिए उनके पूरे जीवन भर और यहाँ तक कि पूरे अनंतकाल तक अनवरत अनुसरण करने की चीज़ें बन जाती हैं। क्या यह सत्य नहीं है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI")। "तो शैतान मनुष्य के विचारों को नियन्त्रित करने के लिए प्रसिद्धि एवं लाभ का तब तक उपयोग करता है जब तक वे जो भी सोच सकते हैं वह प्रसिद्धि एवं लाभ न हो। वे प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए संघर्ष करते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए कठिनाईयों को सहते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए अपमान सहते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए जो कुछ उनके पास है उसका बलिदान करते हैं, और प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए वे किसी भी प्रकार का मूल्यांकन करेंगे या निर्णय लेंगे। इस तरह से, शैतान मनुष्य को अदृश्य बेड़ियों से बाँध देता है। ये बेड़ियों लोगों के ऊपर जन्‍मजात, और उनके पास इन्हें उतार फेंकने की न तो सामर्थ्‍य होती है न ही साहस होता है। अतः लोग अनजाने में ही इन बेड़ियों को ढोते हैं और बड़ी कठिनाई से पाँव घसीटते हुए आगे बढ़ते हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI")।

परमेश्वर के वचनों का पाठ पूरा करने के बाद, बहन ने मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिये शैतान द्वारा शोहरत और पैसे की लालच का इस्तेमाल किये जाने की सच्चाई और वास्तविकता के बारे में मेरे साथ सहभागिता की। तब जाकर मैं यह समझ पाई कि इस दुनिया में जिन लोगों के पास ताकत है और जो मानवजाति को नियंत्रित करते हैं, वे सभी शैतान की दुष्ट शक्तियां हैं, मशहूर और सम्मानित लोग शैतानों के सम्राट हैं जो मानवजाति को भ्रष्ट करते हैं, मार्क्स के नास्तिकतावाद और डार्विन द्वारा प्रतिपादित विकासवाद के सिद्धांत ने मानवजाति को बुरी तरह से छला और भ्रष्ट किया है, इसने मानवजाति को परमेश्वर का त्याग करने और उसे धोखा देने के लिये उकसाया है। इसके बाद ही मुझे यह एहसास हुआ कि अतीत में मैंने जो किताबें पढ़ी थीं वे सभी शैतान के जहर, शैतान के दर्शन और शैतान के कुतर्क से भरी हुई थीं। अगर परमेश्वर के वचन नहीं होते, जिसने मुझे यह खुलासा किया कि कैसे दुष्ट शैतान ने मानवजाति को भ्रष्ट किया है, मैं अभी भी शैतान के धोखे और नियंत्रण में रहती, अँधेरे में कठिन संघर्ष करती रहती। वैसे मनुष्य के पास आदर्श और महत्वाकांक्षाएं होने में कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन मनुष्य द्वारा अपने आदर्शों की खोज की प्रक्रिया में, शैतान अपने अस्तित्व में बने रहने के तरीकों और सिद्धांतों से मनुष्य के दिलों को वश में करने के लिये सभी तरीकों का इस्तेमाल करता है, वह मनुष्य को सिर्फ़ शोहरत और लाभ के लिये जीने का लालच देता है। जब मनुष्य शोहरत और लाभ के लिये अथक प्रयास करता है और खुद को खपाता है, तो वह इसकी खोज नहीं करता है कि रोशनी क्या है और एक सार्थक जीवन कैसे जिया जाये, क्योंकि शोहरत और लाभ का लालच हमारे लिये बहुत बड़ा हो जाता है, हम इसके लिये इतने पागल हो जाते हैं कि हमारे पास इससे निकलने का कोई रास्ता नहीं बचता। ये ऐसी बेड़ियां हैं जिनसे शैतान हमारे शरीरों को बाँध देता है, ये ऐसी कपटी साजिशें हैं जिनसे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है। अपने साथियों से आगे निकलने और दूसरों की प्रशंसा पाने के लिये पैसे कमाने की कोशिश में, मैंने अपना विवेक खो दिया था, मैं आत्मा से रहित, पैसे कमाने की मशीन बन गई थी और यहाँ तक कि शोहरत और लाभ पाने के लिये मैंने ज़रा सा भी संदेह किये बिना अपनी सेहत तक का बलिदान कर दिया था। मैं सचमुच पैसा, शोहरत और लाभ की गुलाम बन गई थी। क्योंकि मैं जीवन के बारे में एक गलत दृष्टिकोण के नियंत्रण में थी, जैसी कि कहावत है "अपने आप में विभेद करना और पूर्वजों को सम्मान देना", मैंने हमेशा बेहतर जीवन पाने की चाह में काफ़ी संघर्ष किया। मैं कभी भी संतुष्ट नहीं रहती थी। मैं तब जाकर रुकी जब काम करते-करते मेरा शरीर नाकाम होने के कगार पर पहुँच गया और मेरे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा। शोहरत और लाभ पाने की कोशिश ने वाकई मेरा जीवन बहुत मुश्किल और बोझिल बना दिया था! अगर सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों के प्रकटन नहीं होते, तो मुझे कभी यह पता नहीं चल पाता कि धन, शोहरत और लाभ पाने की मेरी कोशिश गलत थी और यह शैतान का एक ऐसा तरीका था जिससे वह लोगों को भारी नुकसान पहुंचाता है। मैं उन कपटी उद्देश्यों और धूर्त साजिशों को भी नहीं समझ पाते जिनसे शैतान लोगों को भ्रष्ट करता है। इसके बाद, बहन ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों के कई अंश मुझे पढ़कर सुनाये, परमेश्वर के वचनों के बारे में उनकी सहभागिता के माध्यम से और उन विभिन्न तरीकों और साधनों के ज़रिये, जिनसे शैतान मानवजाति को भ्रष्ट करता है, मैं यह समझ गई कि इतने सालों में लगातार शोहरत और लाभ पाने की कोशिश में, मुझे काफ़ी पीड़ा मिली थी और अंत में बीमार पड़ गई। यह सारी पीड़ा परमेश्वर में विश्वास नहीं करने और सत्य को नहीं जानने की वजह से थी—शैतान ने मुझे भ्रष्ट करके काफ़ी नुकसान पहुंचाया था!

इसके बाद, बहनें अक्सर मेरे साथ परमेश्वर के वचनों के बारे में सहभागिता करने के लिये आने लगीं। धीरे-धीरे, मैं अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को अधिक से अधिक समझने लगी। मुझे उन तरीकों की कुछ समझ आ गई जिनका इस्तेमाल करके शैतान मनुष्य को नुकसान पहुंचाता है। मैंने यह समझ गई कि सबसे महत्वपूर्ण है परमेश्वर में विश्वास करना, परमेश्वर के वचनों को पढ़ना, सत्य का अनुसरण करना और परमेश्वर के नियमों एवं व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होना। सिर्फ़ इस तरीके से जीवन जीने से ही मुझे परमेश्वर की प्रशंसा मिलेगी और मैं सबसे अधिक संभव सार्थक एवं खुशहाल जीवन जी सकूंगी! जल्द ही, मुझे पता चला कि मेरी एक महिला सहकर्मी भी काम ढूँढने और पैसे कमाने के लिए अपने पति के साथ जापान आई थी, लेकिन कुछ पैसे कमाने के बावजूद उसके पति को कुछ शारीरिक परेशानी महसूस होने लगी और बाद में उसके पास इलाज के लिये घर वापस लौटने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा। घर वापस लौटने पर, जाँच में पता चला कि उसके पति का कैंसर अगले चरण पर पहुँच गया था। बीमारी का पता चलने के बाद, वे फिर से पैसे कमाने के लिये जापान नहीं आना चाहते थे। पूरा परिवार भय और उदासी में जी रहा था। मेरी सहकर्मी के दुर्भाग्य ने मुझे मनुष्य के जीवन के क्षणभंगुर और बेशकीमती होने की गहरी समझ दी। अगर हमारा जीवन ही नहीं रहेगा, तो ज़्यादा पैसे कमाने का क्या मतलब है? क्या पैसा जीवन खरीद सकता है? एक दिन, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा: "लोग धन-दौलत और प्रसिद्धि का पीछा करते हुए अपनी ज़िन्दगियाँ बिता देते हैं; वे इन तिनकों को मज़बूती से पकड़े रहते हैं, यह सोचते रहते हैं कि केवल ये ही उनका सहारा हैं, मानों कि उन्हें प्राप्त करके वे निरन्तर जीवित रह सकते हैं, और अपने आपको मृत्यु से बचा सकते हैं। परन्तु जब वे मरने के करीब होते हैं केवल तभी उनकी समझ में आता है कि ये चीज़ें उनसे कितनी दूर हैं, मृत्यु के सामने वे कितने कमज़ोर हैं, वे कितनी आसानी से चकनाचूर हो जाते हैं, वे कितने एकाकी और असहाय हैं, और कहीं नहीं भाग सकते हैं। उनकी समझ में आता है कि जीवन को धन-दौलत और प्रसिद्धि से नहीं खरीदा जा सकता है, कोई व्यक्ति कितना ही धनी क्यों न हो, उसका पद कितना ही ऊँचा क्यों न हो, मृत्यु का सामना होने पर सभी लोग समान रूप से कंगाल और महत्वहीन होते हैं। उनकी समझ में आता है कि धन-दौलत से जीवन को नहीं खरीदा जा सकता है, प्रसिद्धि मृत्यु को नहीं मिटा सकती है, यह कि न तो धन-दौलत और न ही प्रसिद्धि किसी व्यक्ति के जीवन को एक मिनट, या एक पल के लिए भी बढ़ा सकती है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III")। परमेश्वर के वचनों से मुझे और स्पष्ट रूप से यह समझने में मदद मिली कि शैतान मनुष्य को बेड़ियों में जकड़ने, नुकसान पहुंचाने और कई लोगों के जीवन को नष्ट करने के लिए पैसे और शोहरत का इस्तेमाल करता है। लेकिन चूंकि हम शैतान की साजिशों को नहीं देख पाते हैं और यह समझने में नाकाम रहते हैं कि पैसा और शोहरत वे साधन हैं जिनका इस्तेमाल शैतान मनुष्य को पीड़ा देने के लिये करता है, हम इस भंवरजाल में उलझते चले जाते हैं। हमारी कोशिशों के बावजूद शैतान हमें धोखा देकर नुकसान पहुंचाता है। उस समय, मुझे यह एहसास हुआ कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को पाने में सक्षम होकर मैं कितनी खुशकिस्मत थी। अगर मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को नहीं पढ़ा होता, तो मैं शैतान द्वारा लोगों को नुकसान पहुंचाने के लिये इस्तेमाल किये जाने वाले शोहरत और पैसे के साधन की सच्चाई को नहीं समझ पाती। फिर कभी न कभी, मैं भी शैतान के द्वारा निगल ली गई होती।

जब मैं बीमार थी, तब कलीसिया की बहनें अक्सर मुझे कॉल किया करती थीं। चूंकि मैं करवट नहीं बदल सकती थी, इसलिये बहनें मेरी मालिश और कपिंग भी दिया करती थीं। एक बहन जो चिकित्सकीय रूप से प्रशिक्षित थीं, मुझे बताया कि इस समस्या में राहत पाने के लिए कौन से एक्यूपंक्चर पॉइंट को दबाना चाहिये। उन्होंने मेरी घरेलू ज़रूरतों में भी सक्रिय रूप से मेरी मदद की, उन्होंने इस तरह से मेरी देखभाल की जैसे कि वे परिवार की सदस्य हों। एक दूसरे देश में प्रवासी के तौर पर रहते हुए, मेरे करीब ऐसा कोई भी नहीं था जिस पर मैं वाकई भरोसा कर सकती थी। इसलिये, इस बात से सचमुच मेरा दिल भर आया कि इन बहनों ने इतने बेहतर तरीके से मेरी देखभाल की थी कि मेरे सगे रिश्तेदार भी ऐसा नहीं करते। मैंने उन्हें बार-बार धन्यवाद दिया। हालांकि, मेरी बहनों ने मुझसे कहा, "हज़ारों साल पहले, परमेश्वर ने हमें चुनकर हमारी नियति तय कर दी थी। अब, उन्होंने अंत के दिनों में हमारे जन्म लेने की व्यवस्था की है और अब तक हमने इस मार्ग पर एक साथ चलने के लिये अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को स्वीकार किया है। यह परमेश्वर का नियम है। हम सब वास्तव में काफ़ी समय से एक ही परिवार का हिस्सा हैं। हम बस अलग-अलग हो गये थे और अब फिर से एक साथ हो गए हैं।" जब मेरे बहनों ने ऐसा कहा, तो मैं अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख सकी और मैंने उन्हें गले से लगा लिया, मेरी आँखों के आंसू मेरे चेहरे पर ढलकने लगे। उस समय, मैंने अपनी बहनों के साथ ऐसा अपनापन महसूस किया जिसे मैं बयां नहीं कर सकती। मेरा हृदय सर्वशक्तिमान परमेश्वर का और अधिक आभारी हो गया।

धीरे-धीरे और अलक्षित रूप से मेरी बीमारी में सुधार होने लगा। इस बीमारी की पीड़ा का अनुभव करने के बाद, मैंने इस बात पर विचार किया कि कैसे मैं जीवन के प्रति शैतान के दर्शन के नियंत्रण में थी। प्रारंभ से ही, मैंने अपने साथियों के बीच अपनी पहचान बनाने की कोशिश की। इस बात पर मेरा पक्का विश्वास था कि ऐसा करके मैं एक खुशहाल जीवन जी पाउंगी, अपने आसपास के लोगों की प्रशंसा पाऊँगी और उनकी ईर्ष्या का कारण बनूंगी। हालांकि, मैंने ऐसा कभी नहीं सोचा था कि इसके बजाय मुझे पीड़ा और उदासी मिलेगी, मुझे ज़रा सी भी शांति और खुशी नहीं मिलेगी। अब जबकि मैंने परमेश्वर के वचनों को पढ़ लिया है और उनकी इच्छा को समझ लिया है, मैं नियति के विरुद्ध लड़ना नहीं चाहती, मैं शोहरत और लाभ भी नहीं पाना चाहती। मैं ऐसा जीवन नहीं जीना चाहती। अब, काम पर जाने के अलावा, मैं अक्सर सभाओं में हिस्सा लेती हूँ, परमेश्वर के वचनों को पढ़ती हूँ और अपने भाई-बहनों के साथ अपने अनुभवों और समझ को साझा करती हूँ। मैंने भजन गाना भी सीख लिया है। मैं एक खुशहाल जीवन जी रही हूँ। मुझे एक तरह का भरोसा और शांति मिल गई है जो मैं पहले कभी महसूस नहीं करती थी।

एक दिन, अपनी आराधना के दौरान मैंने परमेश्वर के इन वचनों को देखा: "जब कोई व्यक्ति पीछे मुड़कर उस मार्ग को देखता है जिस पर वह चला था, जब कोई व्यक्ति अपनी यात्रा के हर एक चरण का स्मरण करता है, तो वह देखता है कि हर एक कदम पर, चाहे उसका मार्ग कठिन रहा था या सरल रहा हो, परमेश्वर उसके पथ का मार्गदर्शन कर रहा था, और उसकी योजना बना रहा था। ये परमेश्वर की कुशल व्यवस्थाएँ थी, और उसकी सतर्क योजना थी, जिन्होंने आज तक, अनजाने में, व्यक्ति की अगुवाई की है। सृजनकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करने, उसके उद्धार को प्राप्त करने में समर्थ होना—कितना बड़ा सौभाग्य है! ... यदि मनुष्य के भाग्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति किसी व्यक्ति की प्रवृत्ति सक्रिय है, तो जब वह अपनी यात्रा को पीछे मुड़कर देखता है, जब सचमुच में परमेश्वर की संप्रभुता उसकी समझ में आने लगती है, तो वह और भी अधिक ईमानदारी से हर उस चीज़ के प्रति समर्पण करना चाहेगा जिनकी परमेश्वर ने व्यवस्था की है, उसके पास परमेश्वर को उसके भाग्य का आयोजन करने देने, और परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह रोकने के लिए और अधिक दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास होगा। क्योंकि वह देखता है कि जब वह भाग्य को नहीं बूझता है, जब वह परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं समझता है, जब वह जानबूझकर अँधेरे में टटोलते हुए आगे बढ़ता है, कोहरे के बीच लड़खड़ाता और डगमगाता है, तो यात्रा बहुत ही कठिन, और बहुत ही मर्मभेदी होती है। इसलिए जब लोग मनुष्य के भाग्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता को पहचान जाते हैं, तो चतुर मनुष्य, स्वयं के तरीके से भाग्य के विरुद्ध लगातार संघर्ष करने और जीवन के अपने तथाकथित लक्ष्यों की खोज करने के बजाय, इसे जानना और स्वीकार करना, उन दर्द भरे दिनों को अलविदा कहना चुनते हैं जब उन्होंने अपने दोनों हाथों से एक अच्छे जीवन का निर्माण करने का प्रयास किया था। जब किसी व्यक्ति का कोई परमेश्वर नहीं होता है, जब वह उसे नहीं देख सकता है, जब वह स्पष्ट रूप से परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं देख सकता है, तो हर एक दिन निरर्थक, बेकार, और दयनीय है। कोई व्यक्ति जहाँ कहीं भी हो, उसका कार्य जो कुछ भी हो, उसके जीवन जीने का अर्थ और उसके लक्ष्यों की खोज उसके लिए अंतहीन मर्मभेदी दुःख और असहनीय पीड़ा के सिवाय और कुछ लेकर नहीं आती है, कुछ इस तरह कि वह पीछे मुड़कर देखना बर्दाश्त नहीं कर सकता है। जब वह सृजनकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करेगा, उसके आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करेगा, और सच्चे मानव जीवन की खोज करेगा, केवल तभी वह धीरे-धीरे सभी मर्मभेदी दुःख और पीड़ा से छूटकर आज़ाद होगा, और जीवन के सम्पूर्ण खालीपन से छुटकारा पाएगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III")। परमेश्वर सृष्टिकर्ता है और मनुष्य उसके द्वारा सृजित प्राणी है। हर व्यक्ति का जीवन परमेश्वर के हाथों में, उसके आयोजन और उसकी व्यवस्था में है। मनुष्य जीवन में जो भी हासिल करता है वह परमेश्वर के नियंत्रण में है और यह परमेश्वर द्वारा पहले से निर्धारित है। मनुष्य का इधर-उधर भागना निश्चित रूप से कोई निर्णायक कारक नहीं है। हालांकि, मनुष्य जितना हासिल कर सकता है, परमेश्वर ने उसे उतना ही दिया है। अगर परमेश्वर ने कोई चीज़ मनुष्य को नहीं दी है, तो वह चाहे कितना भी परिश्रम करे, उसके प्रयास व्यर्थ हो जाएंगे। यह इन कहावतों की तरह है, "मनुष्य बीज बोता है, लेकिन फसल स्वर्ग तय करता है," और "परमेश्वर की इच्छा के आगे मनुष्य दुर्बल है।" इसलिये, अपने जीवन में हमें सृष्टिकर्ता की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होना चाहिये। यह जीवन में खुशहाली लाने का रहस्य है और एक वास्तविक जीवन में यही होता है! साथ ही, मैंने यह भी समझ लिया कि किसी व्यक्ति के पास चाहे कितना ही धन क्यों न हो या उसका रुतबा कितना ही ऊंचा क्यों न हो, ये सब सिर्फ़ सांसारिक चीज़ें हैं। जब उसका जन्म हुआ था, वह इन्हें अपने साथ लेकर नहीं आया था और मृत्यु होने पर वह इन्हें अपने साथ नहीं ले जा सकता। शोहरत और लाभ पाने की खोज में अपने आपको झोंक देने पर अंत में उसे बस खालीपन और पीड़ा मिलती है, अंतिम परिणाम यह है कि शैतान ने उसे निगल लिया है। जब मैंने यह समझ हासिल की, तब जीवन का अलग मार्ग चुनने और नये सिरे से शुरुआत करने का संकल्प लिया। मैंने सिर्फ़ परमेश्वर के आयोजन और व्यवस्थाओं का पालन करने और अपने जीवन के उत्तरार्द्ध को परमेश्वर के हाथों में सौंप देने की शपथ ली। अब मैं दूसरों की प्रशंसा पाने के लिये दौलत और रुतबे के पीछे नहीं भागती हूँ, इसके बजाय मैं ऐसी इंसान बनने की कोशिश करती हूँ जो परमेश्वर का आज्ञापालन करता हो, मैं सचमुच परमेश्वर के लिये जीती हूँ और परमेश्वर के प्रेम का मूल्य चुकाने के लिये जीती हूँ। अब, मैं हर दिन तीन से चार घंटे काम करती हूँ। मेरी बॉस जापानी हैं। हालांकि हमारे बीच भाषा की परेशानियां हैं, लेकिन मेरी बॉस मेरा अच्छा ख्याल रखती हैं। वे जब कभी भी मुझे कुछ करने के लिये कहती हैं, तो हमेशा ऐसे सरल शब्दों का इस्तेमाल करती हैं जिन्हें मैं समझ सकती हूँ, वे मेरे ऊपर कभी कोई दबाव नहीं डालती हैं। मैं जानती हूँ कि यह मुझ पर परमेश्वर की दया और उनकी आशीष है। मैं उनकी बहुत आभारी हूँ। साथ ही साथ, मैं इस बात को और भी बेहतर तरीके से समझ गई हूँ कि जब मनुष्य परमेश्वर के वचनों को सुनता है और परमेश्वर के आयोजनों एवं व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होता है, तभी वह एक खुशहाल और सुकून भरा जीवन जी सकेगा।

जब भी मैं अकेली होती हूँ, तो अक्सर उस मार्ग के बारे में सोचती हूँ जो मैंने परमेश्वर के समक्ष आने से पहले चुना था। अगर मुझे यह बीमारी नहीं हुई होती, तो मैंने पैसे और शोहरत पाने के पीछे भागना नहीं छोड़ा होता और मैं अभी भी इस दुनिया में पूरी तरह से पैसा कमाने वाली मशीन बनी रहती, जब तक शैतान मुझे क्रूरतापूर्वक मार नहीं देता। मैं कभी भी पश्चाताप करने या अपने मार्ग को बदलने के बारे में नहीं सोचती। शैतान ने मुझे नुकसान पहुँचाने के लिए शोहरत और लाभ के साधन का इस्तेमाल किया, जिसके कारण मैं बीमार हो गई, लेकिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने अपने समक्ष लाने के लिये मेरी बीमारी का इस्तेमाल किया, जिससे मैं परमेश्वर के इन वचनों को अच्छी तरह से समझ पाई कि मनुष्य की भ्रष्टता में शैतान ही मुख्य अपराधी है। साथ ही, मैं मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए पैसे और शोहरत का इस्तेमाल करने की शैतान की साजिश की असली प्रकृति को भी समझ गई, जिससे मैं इस नीरस दुनिया के कुछ पहलुओं को जान पाई। मैं यह जान गई कि मनुष्य कहाँ से आया था और वह कहाँ जा रहा है। मैं मनुष्य के पाप और दुराचार के स्रोत को भी जान गई। मैंने यह समझ लिया कि मनुष्य को एक सार्थक जीवन कैसे जीना चाहिये। परमेश्वर के वचन कहते हैं, "जब कुछ लोगों ने परमेश्वर पर विश्वास करना अभी आरंभ किया हो और यह किसी बीमारी के कारण हो। यह बीमारी तुम्हारे लिए परमेश्वर का अनुग्रह है; इसके बिना तुम परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते, और यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते तो तुम यहाँ तक नहीं पहुँच पाते—और इस प्रकार यह अनुग्रह भी परमेश्वर का प्रेम है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल पीड़ादायक परीक्षाओं का अनुभव करने के द्वारा ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो")। परमेश्वर के वचन सचमुच व्यावहारिक हैं। सिर्फ़ आपदा के माध्यम से ही मैंने आशीषें हासिल की हैं! आजकल, परमेश्वर के वचनों के पोषण और मार्गदर्शन से, मैंने शैतान के बंधनों को तोड़कर फेंक दिया है और जीवन के प्रति सही दृष्टिकोण अपनाया है। मैं जीवन के सही मार्ग पर चल पड़ी हूँ और मेरी आत्मा काफ़ी हद तक मुक्त हो गई है। परमेश्वर सचमुच बहुत बुद्धिमान और सर्वव्यापी है! मुझसे प्रेम करने और मुझे बचाने के लिये, मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर का धन्यवाद करती हूँ!

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