34. ईसाई आध्यात्मिक जागृति

लिंग वू, जापान

मैं अस्सी के दशक का हूँ, और मैं एक साधारण से किसान परिवार में जन्मा था। मेरा बड़ा भाई बचपन से ही हमेशा अस्वस्थ और बीमार रहता था। जब मैं 10 वर्ष का था तब मेरे पिता एक दुर्घटना में घायल हो गए थे; उसके दो वर्ष बाद उन्हें पूरी तरह लकवा मार गया। पहले से ही हमारा परिवार गरीब था और पिता के उपचार के कारण हम बुरी तरह से कर्जे में डूब गए। हमारे मित्र और रिश्तेदार डरते थे कि हम कभी भी कर्ज़ चुका नहीं पायेंगे, इस कारण वे हमें पैसे देने के लिए तैयार नहीं थे। लाचार होकर मुझे घर से दूर काम करने ढूँढने के लिए 16 वर्ष की आयु में स्कूल छोड़ना पड़ा। देर रात तक मैं अक्सर सोचता था : जब हम सब छोटे थे, मेरे बराबर की आयु वाले बच्चे, स्कूल के बाद मस्त होकर खेलते थे, जबकि मुझे खेतों में जाकर खेती का काम करना पड़ता था। अब हम सब बड़े हो गए हैं, वे अभी भी स्कूल में हैं, वे अपने माता-पिता के साथ बिगड़ैल बच्चों की तरह हरकते करते हैं, परंतु मुझे अपने परिवार की सहायता करने के लिए कम उम्र में ही काम करना पड़ रहा है और सभी प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ रहा है। उस समय मैं अपने माता-पिता को दोष देता था कि उन्होंने मुझे जन्म दिया। मैं सोचता था कि ऐसा क्यों है कि मैं इस संसार में बस कष्ट उठाने और कड़ी मेहनत करने के लिए आया हूँ। परंतु उसके बारे में मैं कुछ नहीं कर सकता था और मैं तो बस इस सच्चाई को स्वीकार कर सकता था। उस समय मेरी सबसे बड़ी इच्छा थी मेहनत करना, पैसे कमाना, अपने माता-पिता को आराम की जिंदगी देना और दूसरों की नज़रों में ऊपर उठना।

सबसे पहले मैंने एक निजी एल्यूमीनियम मिश्र धातु कारखाने में काम शुरू किया। चूंकि मैं एक बाल मज़दूर था, बॉस हमेशा मेरे भोजन और रहने के बारे में अच्छे से ध्यान रखते थे। एक वर्ष के बाद मुझे महसूस हुआ कि मेरा वेतन बहुत कम था, इसलिए मैंने एक फर्नीचर फैक्ट्री में लैकर स्प्रे का काम करने का फैसला किया जो अन्य लोग नहीं करना चाहते थे। उस समय, मैं कानून के दायरे में रहकर ऐसा कोई भी काम करने के लिए तैयार था जिससे मैं ज्यादा पैसा कमा सकूँ। ऐसा इसलिए था क्योंकि मेरा एकमात्र लक्ष्य पैसे वाला व्यक्ति बनना था, ताकि मैं दोबारा मुझे गरीबी का जीवन जीना न पड़े। उसके बाद, मेरे रिश्तेदारों ने मुझे एक ऐसी कंपनी में लगवा दिया जहाँ काम के लिए देश से बाहर जाने के अवसर मिल सकते थे। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ जब कुछ वर्षों बाद मैं वाकई विदेश आ गया।

2012 के वसंत में, अपनी आशा के अनुरूप मैं जापान आया और अपना नया जीवन शुरू किया। मैं जलपोत बनाने के उद्योग में था, मैंने कंपनी के साथ तीन वर्षों का करार तय किया। जब मैंने काम शुरू किया, चूंकि मुझे खाना पकाना नहीं आता था, तो मैंने एक महीने तक इंस्टेंट नूडल खाये, जब तक कि मुझे ऐसा नहीं लगने लगा कि मैं अब इन्हें और नहीं खा सकता वरना उल्टी हो जाएगी, मजबूर होकर मुझे जबरदस्ती भोजन पकाना सीखना पड़ा। मुझे कुछ याद नहीं कि कितने दिनों तक मैंने अधपके चावल खाये। जापान में हम विदेशी थे, इसलिए कंपनी के स्थानीय कर्मचारियों का व्यवहार हमारे प्रति अनुचित होना ही था। वे हमसे बहुत से गंदे, थका देने वाले और खतरनाक काम कराते थे। जब मैं लैकर स्प्रे कर रहा होता था, मुझे बहुत डर लगता था, क्योंकि अगर गैस आग के संपर्क में आ गयी तो वह जल उठेगी, अगर एक क्षण के लिए मेरा ध्यान भटका तो मेरा जीवन ख़तरे में पड़ जाएगा। मैं नहीं जानता कि अपने जीवन के कष्ट के कारण या अपने काम के ख़तरे के कारण, लेकिन जब भी मैं अपने परिवार के पास अधिक पैसे भेजने के लिए धन कमाने, साथ ही घर लौटने पर खुद के लिए एक कार और घर खरीद पाने, दूसरों पर रौब जमाने और गरीबी के जीवन से मुक्ति पाने और नीची दृष्टि से न देखे जाने के बारे में सोचता, तो मुझे लगता कि उस समय के मेरे कष्ट वास्तव में उतने बुरे नहीं हैं। पलक झपकते ही मेरे जीवन के तीन साल वहाँ काम करते बीत गए। जब मेरे वीजे की समयावधि लगभग समाप्त होने ही वाली थी, मुझे पता चला कि कंपनी में करारों के नवीनीकरण की नीति भी है, इसलिए और अधिक धन कमाने के वास्ते मैंने अपने करार का नवीनीकरण करा कर जापान में काम करने को जारी रखने का निर्णय लिया। मुझे इस बात से सुखद आश्चर्य मिला कि मेरे द्वारा करार के नवीनीकरण के कुछ दिनों बाद ही, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार सुना।

सितंबर 2015 में, जापान में मिले मेरे एक मित्र ने मुझे, अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्यों के बारे में बताया। जब वह पहलेपहल मुझे परमेश्वर में विश्वास से जुड़ी चीज़ों के बारे में बता रही थी, तो यह मुझे ज़रा भी रोचक नहीं लगा, मुझे लगा कि यह बस किसी प्रकार की आस्था है। मुझे लगा कि परमेश्वर में विश्वास करने से मेरा भाग्य नहीं बदलेगा। उसके शीघ्र बाद, मैंने अपने मित्र को अपने दृष्टिकोण के बारे में बताया, और मैंने उससे पूछा "क्या परमेश्वर में विश्वास करने से मेरा भाग्य बदल सकता है? मैं तो बस एक बदकिस्मत व्यक्ति हूँ, बचपन से ही मैंने बहुत कष्ट उठाए हैं। अगर मेरे पास पैसा होगा तो मुझे इतने कष्ट नहीं उठाने पड़ेंगे। मुझे लगता है अभी मेरे लिए सबसे वास्तविक चीज़ है और अधिक धन कमाना। मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर में विश्वास करना कुछ दूर की बात है।" जवाब में मेरी मित्र ने मुझे परमेश्वर के वचनों का एक भाग पढ़ कर सुनाया: "तुम प्रतिदिन कहाँ जाओगे, क्या करोगे, किस व्यक्ति या चीज़ का सामना करोगे, क्या कहोगे, तुम्हारे साथ क्या होगा—क्या इनमें से किसी के बारे में भी भविष्यवाणी की जा सकती है? लोग इन सभी घटनाओं का पूर्वानुमान नहीं लगा सकते, और वे स्थितियां क्या रूप लेंगी, उस पर तो उनका बिलकुल भी नियन्त्रण नहीं है। जीवन में, ऐसी अप्रत्याशित घटनाएँ हर समय घटती हैं, और ऐसा प्रतिदिन होता है। ये रोज़ होने वाले उतार-चढ़ाव, और जिस तरीके से वे प्रकट होते हैं, या जिस ढंग से वे सामने आते हैं, मनुष्य को निरन्तर याद दिलाते हैं कि कुछ भी एकाएक नहीं होता, प्रत्येक घटना के घटने की प्रक्रिया, प्रत्येक घटना की अनिवार्यता का स्वरूप, मनुष्य की इच्छा से बदला नहीं जा सकता। हर घटना सृजनकर्ता की ओर से मनुष्यजाति को दी गई एक चेतावनी होती है, और वह यह सन्देश भी देती है कि मनुष्य अपने भाग्य को नियन्त्रित नहीं कर सकता। प्रत्येक घटना मानवजाति की अनियन्त्रित, व्यर्थ महत्वाकांक्षा और अपने भाग्य को अपने हाथों में लेने की इच्छा का खण्डन है। ... इन दैनिक उतार-चढ़ावों से लेकर, समस्त मानव-जीवन के भाग्य तक, ऐसा कुछ भी नहीं है जो सृजनकर्ता की योजना और उसकी संप्रभुता को प्रकट नहीं करता हो; ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह सन्देश नहीं देता हो कि 'सृजनकर्ता के अधिकार से परे नहीं जाया जा सकता,' जो इस शाश्वत सत्य को व्यक्त न करता हो कि 'सृजनकर्ता का अधिकार ही सर्वोच्च है'" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III')। ये वचन मुझे बड़े अर्थपूर्ण लगे। मैं यह सोचने से खुद को रोक नहीं पाया कि अपने करार का नवीनीकरण कर पाना भी ऐसा लगता था मानो स्वर्ग ने ही इसकी व्यवस्था की हो। मैंने, जिस घर मेरा जन्म हुआ, मेरे परिवार के साथ मेरे जीवन और मेरे चारों ओर हो रही चीज़ों के बारे में भी सोचा; ये सभी चीज़ें मेरे नियंत्रण के बाहर थीं, मुझे इनका पहले से कोई आभास नहीं हो सकता था। मुझे ऐसा महसूस हो रहा था कि कहीं किसी जगह सभी चीज़ों पर नियंत्रण करता एक सार्वभौम शासक है।

मेरी मित्र ने मुझसे "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" से परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़वाया, जो उन छह मोड़ों के बारे में बात करता है जिसमें से किसी व्यक्ति को जीवन में गुजरना होगा। पहला मोड़ है जन्म; दूसरा मोड़ है बड़ा होना; तीसरा मोड़ है स्वतंत्रता; चौथा मोड़ है विवाह; पाँचवाँ मोड़ है बच्चे; छठा मोड़ है मृत्यु। जब मैंने परमेश्वर के वचनों को पढ़ा, मैं आश्चर्यचकित हो गया। मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि परमेश्वर ने इंसान के उसके पूरे जीवन के भाग्य के बारे में इतनी स्पष्टता से बात की है। तथ्य बिल्कुल वैसे ही हैं जैसा उसने वर्णन किया है। एक व्यक्ति जिस परिवार में जन्म लेता है वह उसे चुन नहीं सकता, और वह इसे भी नहीं चुन सकता कि उसे किस प्रकार के माता-पिता मिलें। जब वे बड़े हो जाते हैं, किस प्रकार का पति या पत्नी उन्हें मिलते हैं, यह भी उनके हाथ में नहीं है। इनके बारे में मैंने जितना अधिक सोचा, उतना अधिक मैंने पाया कि ये वचन बहुत ही व्यावहारिक हैं। तब मैं, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की काही इस बात को कि किस्मत कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो किसी व्यक्ति के द्वारा स्वयं बदली जा सके, अपने दिल से मानने लगा। तभी से, आस्था में मेरी रुचि और अधिक बढ़ती गयी। मैं मानता था कि परमेश्वर मौजूद है और किसी व्यक्ति की किस्मत उसके खुद के नियंत्रण में नहीं होती है। परंतु क्योंकि मुझे परमेश्वर के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी, मुझे महसूस होता था कि परमेश्वर मुझसे बहुत दूर है। लेकिन, इसके कुछ समय बाद, एक अनुभव से मुझे सच में लगा कि परमेश्वर मेरे साथ है और वह मेरी निगरानी और मेरा बचाव कर रहा है।

उस दिन बारिश हो रही थी, और मैं रोज़ की तरह समय से काम पर पहुँच गया। सुबह के 10:00 बजे के कुछ ही समय बाद, कार्य स्थल पर काम करते हुए अचानक मैंने एक धमाके की आवाज़ सुनी। मुझे मालूम नहीं था कि वह क्या वस्तु थी जो जमीन पर आकर गिरी थी। उससे मैं दहशत के मारे कांप उठा था। जब मैंने मुड़कर देखा, मैं हक्का-बक्का रह गया। मैंने देखा कि एक 40 सेंटीमीटर मोटा और 4 मीटर लंबा लोहे का पाइप, जिसका वजन लगभग आधा टन था, वह क्रेन से गिर पड़ा था। मैं जमीन पर जहाँ खड़ा था, वहाँ से आधे मीटर से भी कम की दूरी पर यह गिरा था। मैं उस क्षण इतना डर गया था कि मैं स्तब्ध हो गया था, और मुझे उस झटके से वापस अपना होश संभालने में कुछ पल का समय लग गया। अपने मन में मैं लगातार पुकार रहा था : "परमेश्वर तेरा धन्यवाद! परमेश्वर तेरा धन्यवाद! अगर तू मेरी निगरानी न करता, मुझे न बचाता, तो वह लोहे का पाइप सीधे ही मुझ पर आ गिरता और मेरा तुच्छ जीवन समाप्त हो चुका होता।"

काम समाप्त करने के बाद जब मैं भाई-बहनों के साथ उस दिन की घटना के बारे में वार्तालाप कर रहा था, उन्होंने संगति करते हुए बताया कि वह परमेश्वर के द्वारा किया गया बचाव था। उन्होंने मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़कर भी सुनाया: "अपने लम्बे मानवीय जीवन में, लगभग प्रत्येक व्यक्ति ने अनेक ख़तरनाक परिस्थितियों और वह अनेक प्रलोभनों का सामना किया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि शैतान तुम्हारे बगल में खड़ा है, उसकी आँखें लगातार तुम्हारे ऊपर जमी हैं। जब तुम पर आपदा आती है, शैतान इसमें आनंद मनाता है; जब तुम पर विपदाएँ पड़ती हैं, जब तुम्हारे लिए कुछ भी सही नहीं होता है, जब तुम शैतान के जाल में फँस जाते हो, इन बातों से शैतान को बड़ा मज़ा आता है। जहाँ तक परमेश्वर क्या कर रहा है इसकी बात है, वह हर बीतते क्षण के साथ तुम्हारी सुरक्षा कर रहा है, एक के बाद एक दुर्भाग्य से और एक के बाद एक आपदा से तुम्हें बचा रहा है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि जो कुछ मनुष्य के पास है—शान्ति और आनन्द, आशीषें एवं व्यक्तिगत सुरक्षा—सब-कुछ वास्तव में परमेश्वर के नियंत्रण के अधीन है; वह हर प्राणी के भाग्य का मार्गदर्शन एवं निर्धारण करता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI')। परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, मैं समझ गया कि लोग प्रतिदिन शैतान के जाल में जीते हैं। वे किसी भी पल शैतान की क्रूरतापूर्वक हानि का समाना कर सकते हैं। वे दुर्घटनाओं, आपदाओं और ऐसी बातों का सामना कर सकते हैं जो उनकी इच्छा के विपरीत हो। अगर परमेश्वर उनकी निगरानी न करे और वह उनकी रक्षा न करे, तो बहुत समय पहले ही शैतान लोगों को निगल चुका होता। काम के समय मैंने जिस संकट का सामना किया, जब आधे टन का लोहे का पाइप मुझसे आधे मीटर जितनी दूरी पर आ गिरा, तो यह बस मेरी खुशनसीबी नहीं थी, बल्कि यह परमेश्वर था जो मेरी निगरानी कर रहा था, रक्षा कर रहा था जिसके कारण मैं इस विपदा से बच पाया। इतने वर्षों में, मुझे मालूम नहीं कि कितनी बार मैंने परमेश्वर की निगरानी और रक्षा का आनंद उठाया है, लेकिन फिर भी मैंने कभी परमेश्वर को नहीं समझा या उसकी आराधना नहीं की; सच मेरा कोई अन्तःकरण नहीं था। उस क्षण से, मुझे परमेश्वर के उद्धार के आशीर्वाद की बेहतर समझ मिली। मैं अब तक जीवित हूँ यह मेरी रक्षा करने वाले परमेश्वर के प्रीतिपूर्ण हाथ के कारण है। मैंने दिल से परमेश्वर को धन्यवाद दिया। मैंने यह भी निर्णय लिया कि भविष्य में परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए जो भी बन पड़े मैं करूँगा। आने वाले दिनों में, मैं अक्सर भाई-बहनों के साथ बैठकों में शामिल हुआ, परमेश्वर के वचनों को पढ़ा, भाई-बहनों के साथ परमेश्वर की स्तुति में गीत गाये। मैं अपने दिल में मुक्त और स्वतंत्र महसूस करने लगा। हम भाई-बहन एक दूसरे की सहायता करते थे और आध्यात्मिक जीवन में एक दूसरे की मदद करते थे। कोई भी मुझे निम्न नहीं समझता था, न ही किसी के मन में निर्धन के लिए घृणा थी, न कोई अमीरों की चापलूसी करता था। मुझे महसूस हुआ कि मैं स्वाभिमान के साथ जीवन जी सकता हूँ। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलिसिया के इतने बड़े, स्नेहपूर्ण, और खुशहाल घर में रहने से मेरे जीवन में धीरे-धीरे बदलाव आया। मुझे अब घबराहट और पीड़ा महसूस नहीं होती थी और खोखले दिन अब बीत चुके थे। मुझे पहले की तुलना में बहुत खुशी हुई और संतोष मिला।

एक दिन, हमारी कंपनी के एक लंबे समय से रहे व्यक्ति के साथ कुछ बुरा हो गया। वह जापानी था और कंपनी में दस वर्ष से अधिक समय से कार्यरत था। वह सुरक्षा जागरूकता हो व टेक्निकल क्षेत्रों में बड़ा ही पक्का था। उस दिन, जब वह काम पर था, वह एक लिफ्टिंग ट्रक चला रहा था और हवा में 20 मीटर ऊपर कुछ काम कर रहा था। उसके संचालन के दौरान, ध्यान न देने के कारण उसके ऊपर ट्रक की गैस लीक होनी शुरू हो गयी। उसी समय उसके ऊपर एक दूसरा कर्मी हवा में लटका कुछ वैल्डिंग का काम कर रहा था, अचानक एक चिंगारी नीचे उसके कपड़ों पर गिरी, लीक हुई गैस उस चिंगारी के संपर्क में आई और तेज़ी से आग की लपटों में बदल गयी। हम सभी बस वहाँ खड़े-खड़े उस पुराने सहकर्मी को आग में जलते देखते रहे, हम कुछ भी कर पाने में असमर्थ थे। उसे बचाने के लिए कोई जाये इसके लिए समय नहीं था, और कुछ ही मिनटों में वह ज़िंदा जल गया। बहुत से लोगों ने जिन्होंने दुर्घटना होते हुए देखी, उन्हें उसके लिए अफसोस हुआ, और जीवन के बारे में यह समझ आया : आखिरकार यह क्या है, जिसके लिए लोग जीते हैं? चूंकि मेरे निकट ही इस प्रकार की घटना हुई, मैंने सच में यह महसूस किया कि अगर कोई व्यक्ति परमेश्वर से खुद को अलग कर लेता है और उस पर परमेश्वर की नज़र नहीं होती और वह उसका बचाव नहीं कर रहा होता है, तो उनका जीवन हर समय असुरक्षित होता है। किसी भी आपदा के सामने मानव जीवन बहुत दुर्बल होता है, ज़रा भी मार नहीं सह सकता। मुझे यह भी गहराई से महसूस हुआ कि कोई व्यक्ति कितना भी निपुण क्यों न हो या उसके पास कितना भी अधिक धन क्यों ना हो, वे अपनी किस्मत पर काबू नहीं कर सकते, वे स्वयं को आपदा और मृत्यु से बचा पाने में विशेषकर असमर्थ हैं।

इसके कुछ ही समय बाद, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक यह अंश पढ़ा: "सृजनकर्ता की संप्रभुता और उसके द्वारा पूर्वनियति के कारण, एक एकाकी आत्मा को, जिसने शून्य से जीवन आरंभ किया था, माता-पिता और परिवार मिलता है, मानव जाति का एक सदस्य बनने का अवसर मिलता है, मानव जीवन का अनुभव करने और दुनिया को देखने का अवसर मिलता है। इस आत्मा को सृजनकर्ता की संप्रभुता का अनुभव करने, सृजनकर्ता के सृजन की अद्भुतता को जानने, और सबसे बढ़कर, सृजनकर्ता के अधिकार को जानने और उसके अधीन होने का अवसर भी मिलता है। फिर भी, अधिकांश लोग वास्तव में इस दुर्लभ और क्षण में गुज़र जाने वाले अवसर को नहीं पकड़ते हैं। व्यक्ति भाग्य के विरुद्ध लड़ते हुए अपने पूरे जीवन भर की ऊर्जा को खत्म कर देता है, अपने परिवार का भरण-पोषण करने की कोशिश में दौड़-भाग करते हुए और धन-सम्पत्ति और हैसियत के बीच भागते हुए अपना सारा समय बिता देता है। जिन चीज़ों को लोग सँजो कर रखते हैं, वे हैं परिवार, पैसा और प्रसिद्धि; वे इन्हें जीवन में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ों के रूप में देखते हैं। सभी लोग अपने भाग्य के बारे में शिकायत करते हैं, फिर भी वे अपने दिमाग में उन प्रश्नों को पीछे धकेल देते हैं जिनके बारे में जानना और समझना बहुत ज़रूरी है : मनुष्य जीवित क्यों है, मनुष्य को कैसे जीना चाहिए, जीवन का मूल्य और अर्थ क्या है। जब तक कि उनकी युवावस्था उनका साथ नहीं छोड़ देती, उनके बाल सफेद नहीं हो जाते और उनकी त्वचा पर झुर्रियाँ नहीं पड़ जातीं, वे अपना सारा जीवन शोहरत और दौलत के पीछे भागने में ही लगा देते हैं। वे इस तरह तब तक जीते रहते हैं जब तक वे यह नहीं देख लेते कि प्रसिद्धि व सौभाग्य किसी का बुढ़ापा आने से रोक नहीं सकते हैं, धन हृदय के खालीपन को नहीं भर सकता है; जब तक वे यह नहीं समझ लेते हैं कि कोई भी व्यक्ति जन्म, उम्र के बढ़ने, बीमारी और मृत्यु के नियम से बच नहीं सकता है, और नियति ने उनके लिए जो तय किया है, कोई भी उससे बच कर भाग नहीं सकता है। केवल जब उन्हें जीवन के अंतिम मोड़ का सामना करने को बाध्य होना पड़ता है, तभी सही मायने में उन्हें समझ आता है कि चाहे किसी के पास करोड़ों रुपयों की संपत्ति हो, उसके पास विशाल संपदा हो, भले ही उसे विशेषाधिकार प्राप्त हों और वह ऊँचे पद पर हो, फिर भी वह मृत्यु से नहीं बच सकता है, और उसे अपनी मूल स्थिति में वापस लौटना ही पड़ेगा : एक एकाकी आत्मा, जिसके पास अपना कुछ भी नहीं है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III')। परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, मैं पूरी तरह से प्रेरित हो गया : लोगों की आत्माएं परमेश्वर से आती हैं, और परमेश्वर के पूर्वनिर्धारण के कारण वे संसार में आती हैं। परंतु लोग फिर भी परमेश्वर में विश्वास रखना और उसकी आराधना करना नहीं चाहते, और वे परमेश्वर के अधिकार को अनुभव करने के इस अवसर को संजोए रखना नहीं चाहते, बस वे तो केवल धन, प्रसिद्धि और प्रेम भावों के लिए जीना जानते हैं। वे सभी उससे बचने के लिए जो पहले ही उनके लिए व्यवस्थित किया जा चुका है, इधर-उधर भागते रहते हैं, पर लोगों को इन चीज़ों के पीछे भागकर क्या मिलेगा? जब मृत्यु सिर पर हो तो इनमें से कौन सी चीज़—रिश्ते, प्रसिद्धि, या धन—उन्हें बचा सकती हैं? मेरे सहकर्मी की मृत्यु क्या इस तथ्य का उत्तम उदाहरण नहीं है? जब मैंने उन चीज़ों के बारे में सोचा जिन्हें मैंने पहले चाहा था, क्या वे भी वैसी ही चीज़ें नहीं थीं? जब मैं विदेश में काम करने आया, मैं अधिक पैसे कमाने के लिए कोई भी गंदा, थकाने वाला, या खतरनाक काम करने को तैयार था, जिससे लोग मुझे सम्मान से देखें, और मैं गरीबी की जिल्लत से बाहर निकाल पाऊँ। मैं सभी प्रकार के कष्टों से गुजरने के बाद भी मैंने कभी भी अपने जीवन जीने के तरीके को बदलने के बारे में नहीं सोचा। मैंने बस उसी रास्ते पर चलता रहा। मेरे दिल में, मुझे नहीं मालूम था कि परमेश्वर है या नहीं, न ही मुझे पता था कि इंसान की किस्मत परमेश्वर के हाथों में होती है। अपने भाग्य को बदलने के लिए मैं खुद पर भरोसा करता था। मैंने परमेश्वर के आयोजन और व्यवस्था से बचने के लिए संघर्ष किया। जिस मैं तबाही के मार्ग पर नहीं चल रहा था? अगर परमेश्वर का उद्धार नहीं होता, परमेश्वर कि निगरानी और रक्षा नहीं होती, तो मुझे डर है कि मेरा छोटा सा जीवन बहुत समय पहले ही शैतान द्वारा छीन लिया गया होता। तो मेरा जीवन अब जैसा खुशहाल और सार्थक कैसे बनता? उस पल, मैंनें अंततः देखा कि जीवन का अर्थ धन या प्रसिद्धि कमाना नहीं था, इसका अर्थ दूसरों से आगे निकलना भी नहीं था ताकि वे लोग हमें बड़ा माने, बल्कि इसका अर्थ परमेश्वर की मौजूदगी में आना और उसका उद्धार स्वीकारना है। केवल परमेश्वर की आराधना करने और उसके प्रति खुद को समर्पित करके ही हम शैतान के नुकसान से बच सकते हैं और शांति और खुशी में जी सकते हैं। मैं जितना अधिक इस प्रकार से सोचता हूँ, मैं उतना अधिक प्रभावित होता हूँ। मैं देखता हूँ कि मैं परमेश्वर में विश्वास रख पाने की मेरी योग्यता परमेश्वर का मुझ पर विशेष अनुग्रह है। मुझे बचाने के लिए मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर को धन्यवाद देता हूँ!

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