32. एक महत्वपूर्ण खोज

लेखिका: फांगफांग, चीन

मेरे परिवार के सब लोग प्रभु यीशु में विश्वास रखते हैं। मैं कलीसिया में एक साधारण विश्वासी थी और मेरे डैड कलीसिया में सहकर्मी थे। फरवरी 2004 में, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार कर लिया और मैं जल्दी ही अपनी सबसे छोटी बहन को राज्य का सुसमाचार सुनाने लगी। पहले मेरी योजना यह थी कि मैं अपने आपको परमेश्वर के थोड़े-बहुत वचनों और सत्यों से तैयार करके अपने डैड के सामने परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य की गवाही दूँ। लेकिन जब मेरे डैड ने सुना कि मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार कर लिया है और वे गुस्से से पागल हो गए, तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने मेरी आस्था पर पाबंदी लगाने और रोकने की कोशिश की।

एक शाम, मेरे डैड झुँझलाते हुए घर में घुसे और नाराज़ होते हुए मुझसे बोले, "मैं कभी सोच भी नहीं सकता था कि तुम मेरी और कलीसिया के अगुवा की सलाह को नज़रंदाज़ करते हुए चमकती पूर्वी बिजली में विश्वास रखना शुरू कर दोगी! अच्छा यही होगा कि तुम फौरन अगुवा के घर जाकर प्रायश्चित कर लो, और प्रभु से अपने पापों के लिए क्षमा माँग लो!" मैंने कहा, "डैड, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के बहुत सारे वचनों को पढ़ा है, मुझे सचमुच यकीन है कि वे परमेश्वर की वाणी हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर लौटकर आया प्रभु यीशु है, मुझे अपनी आस्था पर भरोसा है। अनुग्रह का युग समाप्त हो चुका है, और अब हम लोग राज्य के युग में हैं। परमेश्वर नया कार्य करने और हमें मेमने के विवाह-भोज में ले जाने के लिए आया है। क्या बाइबल में ऐसा नहीं कहा गया है, 'ये वे ही हैं कि जहाँ कहीं मेम्ना जाता है, वे उसके पीछे हो लेते हैं' (प्रकाशितवाक्य 14:4)? मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास रखने के लिए, मेमने के पदचिह्नों का अनुसरण कर रही हूँ...।" लेकिन मेरे डैड मेरी किसी भी बात को सुनने के लिए तैयार नहीं थे, और मुझे कलीसिया के अगुवा के पास ले जाने की ज़िद पर अड़े रहे। मेरा पति भी उनके साथ मिलकर मुझ पर दबाव डालने लगा। मेरे डैड के चेहरे के हाव-भाव बता रहे थे कि वे मुझे किसी भी सूरत में मेरी पुरानी कलीसिया में लाने पर अड़े हुए थे। मुझे एहसास हुआ कि मामला बहुत गर्म हो गया है और वे लोग मुझ पर कुछ ज़्यादा ही दबाव डाल रहे हैं, तो मैं थोड़ी नर्वस हो गयी। मैंने मन ही मन परमेश्वर से प्रार्थना की और कहा कि वह मेरी रक्षा करे और मुझे राह दिखाए। लेकिन मेरे डैड ने मेरी एक नहीं सुनी, और मेरे पति की मदद से मुझे गाड़ी में बैठाया और मुझे मेरी पुरानी कलीसिया की ओर ले चले। जैसे ही मैं कमरे में पहुँची तो मैंने देखा कि वहाँ 60-70 लोग इंतज़ार कर रहे हैं, उनमें मेरी सबसे छोटी बहन भी थी। उसे उसकी सास वहाँ लेकर आयी थी। मुझे लगा कि यह बैठक पहले से ही तय थी और ये सब लोग हम दोनों के खिलाफ एकजुट हो गए थे। सब लोग मुझे और मेरी बहन को अजीब-सी नज़रों से देख रहे थे। कुछ लोग तो हमारी तरह इशारा करके काना-फूसी भी कर रहे थे। हमारे वरिष्ठ अगुवा हम पर टूट पड़े और तुरंत हमसे आग्रह करने लगे कि हम लोग सर्वशक्तिमान परमेश्वर में आस्था रखनी बंद कर दें। और फिर वे बेलगाम होकर परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य का तिरस्कार और निंदा करने लगे। यहाँ तक कि उन्होंने इस तरह के झूठ का पुलिंदा भी खोल दिया, "जो लोग चमकती पूर्वी बिजली में एक बार चले जाते हैं, वे फिर उसे कभी नहीं छोड़ सकते, और अगर किसी ने वहाँ से भागने की कोशिश की,तो उसकी नाक काट दी जाती है,उसकी आँखें निकाल ली जाती हैं...।" इस तरह की झूठ से वहाँ इकट्ठे हुए लोगों को उत्तेजित करके, अगुवा ने मेरे डैड और मेरी बहन की सास को और भी क्रोधित और बेचैन कर दिया। उन्होंने हमारी आँखें बंद करवायीं और अगुवा से हमारे लिए प्रार्थना करने को कहा। हालाँकि वे लोग जो कुछ कर रहे थे, उससे मुझे चिढ़ हो गयी, और जब अगुवा हमारे लिए प्रार्थना कर रहे थे तो हमने कुछ नहीं कहा, लेकिन अगुवा ने जिस तरह के झूठ बोले थे, उससे मेरे मन पर एक गहरा असर पड़ा।

घर आकर भी, मेरे कानों में वही बेहूदा झूठ गूँजती रही और मेरी शांति भंग करती रही। मैं परमेश्वर के वचनों पर भी ध्यान नहीं लगा सकी। मैंने विचार किया कि मैं किस तरह पहले से ही सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की बहन झांग के संपर्क में हूँ और किस तरह वह बातचीत और व्यवहार में शालीन और सच्ची है। बहन झांग ने सहभागिता में हमेशा हमें भरपूर प्यार दिया। उसका व्यवहार वैसा बिल्कुल नहीं था जैसा कलीसिया के अगुवा बता रहे थे। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण यह है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन सत्य हैं, उनमें अधिकार और सामर्थ्य है। कोई भी इंसान ऐसे वचन व्यक्त नहीं कर सकता और मुझे लगा कि ये यकीनन परमेश्वर के वचन ही हैं। तो फिर सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को लेकर भयभीत करने वाली इतनी सारी अफवाहें क्यों फैली हुई हैं? इन बातों को लेकर, मैं रात भर करवटें बदलती रही और मैं सो नहीं पायी। मेरे विचार बार-बार कभी सकारात्मक होते, तो कभी नकारात्मक। अगले दिन मैं उनींदी-सी थी, मेरे अंदर उत्साह नहीं था—एक अजीब-सी बेचैनी थी जिसे बता पाना मुश्किल है—मेरा कुछ भी करने को मन नहीं कर रहा था। मेरी बहन मेरे पास आयी, मुझे फौरन समझ में आ गया कि वो अगुवा और अपनी सास की एकजुटता के आगे टिक नहीं पायी। सर्वशक्तिमान परमेश्वर में आस्था रखने को लेकर उसकी हिम्मत जवाब दे गयी थी और अब वो मुझसे आग्रह कर रही थी कि मैं भी सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास रखना छोड़ दूँ। मैंने व्यग्रता से कहा, "बहन, मैं तेरी चिंता से वाकिफ हूँ, मैं भी तेरी तरह बड़ी उलझन और परेशानी में हूँ। लेकिन मैंने इस समस्या पर बहुत सोचा है, और परमेश्वर से मार्गदर्शन की प्रार्थना भी की है, तो अगुवा और बाकी लोग कुछ भी कहें, लेकिन एक बात तो तय है, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन किसी इंसान द्वारा व्यक्त नहीं किए जा सकते। मुझे यकीन है कि ये वचन परमेश्वर की वाणी हैं। मैंने मेमने ने पुस्तक को खोला कई बार पढ़ी है। यह पुस्तक परमेश्वर की छह हज़ार वर्षीय प्रबंधन योजना के रहस्यों को उजागर करती है। पुस्तक पढ़ने से मैंने जाना कि इंसान को बचाने के लिए परमेश्वर के कार्य के तीन चरण हैं, और अंत के दिनों के वचनों से न्याय का कार्य ही वह कार्य है जो इंसान को हमेशा के लिए बचाएगा। न्याय का कार्य ही हमें इस योग्य बनाएगा कि हम अपनी पापी प्रकृति के बंधनों से सचमुच आज़ाद होकर शुद्ध हो सकें ताकि हम लोग स्वर्ग के राज्य में उठाए जा सकें। पुस्तक की सामग्री पूरी तरह से बाइबल की भविष्यवाणियों के अनुरूप है और उसमें ऐसे सत्य हैं जो बाइबल में नहीं मिलते। इन सत्यों और रहस्यों को केवल परमेश्वर ही जान सकता है। इसलिए मुझे पूरा यकीन है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन परमेश्वर की ही वाणी हैं और सर्वशक्तिमान परमेश्वर लौटकर आया प्रभु यीशु है जिसके लिए हम कब से तरसते रहे हैं! बहन, हमारी आस्था गलत नहीं है। तू कुछ भी कर, लेकिन सच्चे मार्ग को इतनी आसानी से मत छोड़!" छोटी बहन के जाने के बाद, मैं उदास हो गयी और सोचने लगी: "यह तो साफ है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही लौटकर आया प्रभु यीशु है। यह बात एकदम सच्ची और सही है। फिर कलीसिया के अगुवा और हमारे परिवार के लोग हमें उसमें आस्था क्यों नहीं रखने देते?" मैं यह बात सोच ही रही थी कि मेरे पति के फोन की घंटी बजी। मेरे डैड का फोन था, वो चाहते थे कि मैं फौरन उनके घर पहुँचूँ। मुझे पक्का पता था कि वे मुझे फिर से परेशान करने वाले हैं, इसलिए मैंने कह दिया कि मुझे नहीं जाना। लेकिन मेरे पति ने मुझे पकड़ा और घसीटकर कार तक ले गया। जब मैं डैड के घर पहुँची, तो देखा कि मेरी सबसे छोटी बहन और उसकी सास पहले से ही वहाँ मौजूद हैं। मुझे देखकर, मेरे डैड का चेहरा सख्त हो गया, वे बोले, "कल रात कलीसिया के अगुवा ने प्रभु यीशु के आगे तुम दोनों के प्रायश्चित के लिए प्रार्थना की थी। लेकिन तुम में से किसी ने भी अब तक न तो अपने पाप को स्वीकारा है और न ही प्रायश्चित किया है। मैंने तुम दोनों को यहाँ इसलिए बुलाया है ताकि तुम प्रभु के आगे सम्पूर्ण प्रायश्चित की प्रार्थना करो, और उसके बाद फिर कभी सर्वशक्तिमान परमेश्वर में आस्था न रखो...।" यह सब सुनकर, मैं बुरी तरह से उकता गयी। मैंने सोचा: "मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार कर, मेमने के पदचिह्नों पर चल रही हूँ और प्रभु की वापसी का स्वागत कर रही हूँ। उसमें पाप कहाँ है? मैं जान-बूझकर झूठ नहीं बोलूँगी और न ही कोई बकवास करूँगी।" यह देखकर कि मैं प्रायश्चित की प्रार्थना नहीं करूँगी, मेरे मॉम-डैड और मेरी बहन की सास मुझ पर टूट पड़े। उन लोगों ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर को बदनाम करना और उसकी निंदा करनी शुरू कर दी, मुझसे पाप स्वीकार करवाने और प्रायश्चित करवाने के लिए वही घटिया झूठ दोहराने शुरू कर दिए। मेरे सिर के इर्द-गिर्द मंडराते उनके झूठ से और घरवालों के लगातार मुझ पर टूट पड़ने से मेरा दम घुटने लगा, मुझे चक्कर आने लगे और मैं कमज़ोरी महसूस करने लगी। मैंने सोचा: "अगर ये लोग इसी तरह हर दिन मुझ पर दबाव बनाते रहे, तो मैं न तो अपने भाई-बहनों से संपर्क कर पाऊँगी और न ही परमेश्वर के वचनों को ठीक से पढ़ पाऊँगी। मुझे नहीं लगता कि मैं परमेश्वर में आस्था के इस मार्ग-विशेष पर चल पाऊँगी...।" उसी समय, मेरे मॉम-डैड और सास ने मुझे पकड़ा, फिर मुझे और मेरी बहन को ज़बर्दस्ती आँख बंद करके प्रायश्चित करने के लिए कहा। उनके इस आक्रामक बर्ताव को देखकर, मैं बेहद परेशान हो गयी, और मेरी आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे। मैंने रोते-रोते परमेश्वर से प्रार्थना की: "हे प्रभु यीशु, मैं जानती हूँ कि तू सर्वशक्तिमान परमेश्वर के रूप में लौटकर आया है, लेकिन इस समय मुझमें हिम्मत नहीं है कि मैं तुझमें आस्था रख सकूँ। मैं तुझसे याचना करती हूँ कि तू मुझे माफ़ कर दे और मेरे पापों को क्षमा कर दे।" प्रार्थना के इस मुकाम पर पहुँचकर, मैं इतनी ज़ोर-ज़ोर से सुबकने लगी कि मैं प्रार्थना भी पूरी नहीं कर पायी। उसके बाद, अचानक मैंने खुद को दुर्बल-मन का महसूस किया, मेरा सारा साहस चला गया, मुझे परमेश्वर की उपस्थिति का ज़रा भी एहसास नहीं हुआ। मुझे बेचैनी महसूस होने लगी, और मैंने अपनी सबसे छोटी बहन से कहा, "प्रायश्चित की प्रार्थना से पहले मुझे अपने अंदर शक्ति का एहसास हो रहा था, लेकिन उसके बाद मुझे लग रहा है जैसे मैं एकदम खाली हो गयी, जैसे पवित्र आत्मा मुझे छोड़कर चला गया। दरअसल, सर्वशक्तिमान परमेश्वर में आस्था रखने का अर्थ है प्रभु का अनुसरण करना, और हमने प्रायश्चित की प्रार्थना करके प्रभु से दगा किया है।"

घर आकर भी मेरे दिल में एक संघर्ष चलता रहा। मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के बहुत सारे वचन पढ़े थे और जान लिया था कि ये परमेश्वर के वचन हैं। मैं जानती थी कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर लौटकर आया प्रभु यीशु है, उसे स्वीकार न करने का मतलब है परमेश्वर से दगा करना,ऐसा करने पर मैं न केवल उद्धार से वंचित रह जाऊँगी, बल्कि परमेश्वर द्वारा तिरस्कृत भी की जाऊँगी। लेकिन अगर मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर में आस्था रखने पर अड़ी रही, तो कलीसिया के अगुवा और मेरे डैड मुझे यकीनन परेशान करते रहेंगे और फिर मुझे कभी एक दिन भी सुकून नहीं मिलेगा। मुझे वाकई लगा कि मेरे अंदर अपनी आस्था पर टिके रहने की हिम्मत नहीं है। मेरे मन में खलबली मची हुई थी, हर रास्ते पर मेरे सामने अड़चनें आ रही थीं,और मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ। मेरा सिर भन्ना रहा था, मुझे लग रहा था कि मैं नर्वस ब्रेकडाउन की शिकार हो जाऊँगी। मैं चाहती थी कि बहन झांग आ जाए ताकि मैं उसे परमेश्वर के वचनों की पुस्तक लौटा सकूँ, और इस कष्ट भरे जीवन से छुटकारा पा लूँ।

कुछ दिनों के बाद, बहन झांग मुझे समर्थन देने के लिए स्टोर में आयी। मैं बेहद नर्वस थी, मुझे डर था कि मेरा पति उसे देखेगा, तो मेरे डैड को बता देगा। मैंने एक ही साँस में उसे पिछले कुछ दिनों में घटी सारी बातें बता दी। फिर मैंने जल्दी-जल्दी सामान के बक्सों के नीचे छिपाकर रखी परमेश्वर के वचनों की पुस्तक निकालकर उसे दे दी। मैंने उससे कहा, "बहन, मेरे मॉम-डैड और पति मुझे परेशान कर रहे हैं, औरे मेरी पुरानी कलीसिया के अगुवा और भाई-बहन भी इतनी अड़चनें डाल रहे हैं कि मैं फिक्र कर-करके टूट चुकी हूँ। मुझसे और बर्दाश्त नहीं होता, इसलिए प्लीज़ इस पुस्तक को यहाँ से ले जाओ।" बहन झांग मेरी तरफ देखने लगी, और बड़ी सच्चाई से बोली, "बहन, हमने परमेश्वर के अंत के दिनों के नए कार्य को स्वीकार किया है, इसलिए धार्मिक अगुवाओं और परिवार की ओर से यह अड़चन और दबाव दरअसल आत्मिक जगत में लड़ी जा रही एक लड़ाई है! प्रभु यीशु ने कहा है: 'यह न समझो कि मैं पृथ्वी पर मिलाप कराने आया हूँ; मैं मिलाप कराने नहीं, पर तलवार चलवाने आया हूँ' (मत्ती 10:34)। 'मनुष्य के बैरी उसके घर ही के लोग होंगे' (मत्ती 10:36)। प्रभु के वचनों से हम जान सकते हैं कि उद्धार के लिए परमेश्वर के धरती पर आकर अपना कार्य करने का परिणाम अवश्य ही आत्मिक जगत में युद्ध होगा। क्योंकि जो लोग सचमुच परमेश्वर में विश्वास रखते हैं और सत्य से प्रेम करते हैं, जब वे परमेश्वर के वचनों को सुनेंगे, तो वे परमेश्वर का अनुसरण करेंगे। इसके कारण जो लोग सत्य से दुखी हैं, सत्य से घृणा करते हैं, और परमेश्वर का विरोध करते हैं, उनके अंदर विद्वेष पैदा होगा। नतीजतन, परमेश्वर में आस्था रखने वाले सकारात्मक लोग और शैतान का अनुसरण करने वाले नकारात्मक लोग, दोनों पक्ष उजागर होंगे और दोनों ही अपनी-अपनी किस्म के अनुसार अलग कर दिए जाएँगे। यही परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि है! जब प्रभु यीशु ने पहली बार अपना कार्य आरंभ किया, तो बहुत सारे साधारण यहूदी लोग प्रभु यीशु के वचन सुनकर और उसके असीम सामर्थ्य को देखकर, यह मानने लगे थे कि प्रभु यीशु वही मसीह है जिसके बारे में भविष्यवाणी की गयी थी, और वे उसका अनुसरण करने लगे। लेकिन जब सारे यहूदी याजकों, धर्मशास्त्रियों और फ़रीसियों ने देखा कि आम आदमी उन्हें छोड़कर प्रभु यीशु का अनुसरण कर रहा है, तो उन्होंने आम आदमी को धोखा देने के लिए उसके बारे में तरह-तरह की अफवाहें फैलानी शुरू कर दी। उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि प्रभु यीशु दुष्टात्माओं को भगाने के लिए शैतानों के सरदार पर भरोसा करता है, वह भक्षक है और मदिरापान करता है। और जब प्रभु यीशु का पुनरुत्थान हुआ, तो उन्होंने सैनिकों को रिश्वत के रूप में चाँदी देकर यह मनगढ़ंत अफवाह फैला दी कि प्रभु यीशु के शरीर को उसके अनुयायियों ने चुरा लिया था। इस तरह की अफवाहें फैलाकर उन्होंने लोगों को प्रभु यीशु के उद्धार को स्वीकार करने से रोकने का प्रयास किया। और आखिरकार उन यहूदी लोगों का क्या हुआ जो अपने धार्मिक अगुवाओं पर विश्वास करते थे और जिन्होंने प्रभु यीशु का अनुसरण करने का साहस नहीं दिखाया? उन्होंने प्रभु यीशु द्वारा उद्धार को भी गँवा दिया और परमेश्वर द्वारा दंडित और अभिशप्त भी हुए: इस्राएल 2,000 हज़ार वर्षों तक गुलाम रहा, और यहूदियों को पूरी दुनिया से निर्वासित कर दिया गया, उनमें बहुतों को यातना देकर मार दिया गया। प्रभु को सूली पर चढ़ाने और परमेश्वर के स्वभाव को अपमानित करने का उन्हें यह भयंकर परिणाम भुगतना पड़ा। आज, परमेश्वर ने अपना कार्य करने के लिए फिर से देहधारण किया है, और इतिहास अपने आपको फिर दोहरा रहा है। आज के धार्मिक अगुवा पुराने फ़रीसियों की तरह हैं: वे लोग साफ तौर पर देख रहे हैं कि परमेश्वर यहाँ आ कर वास्तविक रूप से अपना कार्य कर रहा है, सत्य व्यक्त कर रहा है और लोगों को बचा रहा है, लेकिन चूँकि उनमें सत्य के प्रति प्रेम नहीं है, वे लोग परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को नकारते हैं, उसकी निंदा करते हैं। वे अपने ओहदों और अपनी रोज़ी-रोटी को बचाए रखने की खातिर, परमेश्वर का विरोध करने और उसकी निंदा करने के लिए अफवाहें गढ़ते हैं और उनका इस्तेमाल लोगों को धोखा देने करते हैं। यहाँ तक कि वे लोग उन अनजान लोगों का इस्तेमाल करके, उन्हें उकसाकर ऐसे विश्वासियों पर दबाव डालते हैं जो सच्चे मार्ग को स्वीकार कर चुके हैं, वे लोग पागलों की तरह सर्वशक्तिमान परमेश्वर की ओर मुड़ चुके लोगों को बाधित करने और रोकने की कोशिश करते हैं, और लोगों के उद्धार के अंतिम अवसर को बर्बाद कर रहे हैं। बहन, हम लोगों को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि यह एक आध्यात्मिक लड़ाई है, हमें शैतान के धूर्त षडयंत्रों को पहचान लेना चाहिए।" बहन झांग की सहभागिता को सुनकर, अचानक सब-कुछ स्पष्ट हो गया: प्राचीन समय से ही, सच्चा मार्ग काँटों भरा रहा है और सच तो यह है कि मैं एक आध्यात्मिक लड़ाई लड़ रही थी! मेरी पुरानी कलीसिया के अगुवा अफवाहें गढ़ रहे थे और परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य की निंदा कर रहे थे, मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर में आस्था रखने से रोकने के लिए मुझे बार-बार प्रताड़ित और परेशान कर रहे थे, क्योंकि उन्हें सत्य से नफरत है और वे परमेश्वर के शत्रु हैं। बहन की सहभागिता से मुझे यह बात समझ में आ गयी कि मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है, लेकिन फिर भी मैं स्वयं को इतना कमज़ोर और भयभीत महसूस कर रही थी कि परमेश्वर के वचनों की पुस्तक रखने का साहस नहीं कर सकी। मुझे पता था कि अगर मैंने पुस्तक रख ली, तो मेरे डैड और बाकी लोग मेरे घर आ कर हंगामा खड़ा कर देंगे और मेरा पारिवारिक जीवन दूभर कर देंगे, इसलिए मैं परमेश्वर के वचनों की पुस्तक को रखने में झिझक रही थी। मुझे दुविधा में देख, बहन झांग ने मुझे अपना फोन नम्बर दिया और कहा, "बहन, ऐसा करते हैं, मैं परमेश्वर के वचनों की पुस्तक को तुम्हारे लिए अपने घर में सुरक्षित रख लेती हूँ। जब भी तुम्हारा पढ़ने का मन हो, तो मुझे फोन कर देना और मैं वो पुस्तक यहीं ले कर आ जाऊँगी।" मैं सहमत हो गयी और मैंने बहन झांग को विदा कर दिया। तभी, मेरा पति दौड़ता हुआ आया और बहन झांग की तरफ इशारा करके चिल्लाया, "इस पुस्तक को उठा और इसी वक्त निकल जा। और फिर कभी मत आना, वरना तेरी खैर नहीं!" मैं बहन झांग को दूर तक जाते हुए देखती रही, मैं इतनी परेशान और दुखी हो गयी कि बता नहीं सकती।

पहले तो, मैंने यह सोचा कि बहन झांग को परमेश्वर के वचनों की पुस्तक लौटा देने से डैड मुझे परेशान करना बंद कर देंगे और जीवन में फिर से शांति लौट आएगी। लेकिन हुआ इससे बिल्कुल उल्टा: शांति मिलना तो दूर, अंदर ही अंदर मुझे एक खालीपन महसूस होने लगा जिसे बयाँ नहीं किया जा सकता। मैं हर काम में बुझी-बुझी-सी रहने लगी, मेरे दिमाग में दिन-रात सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन और परमेश्वर के वचनों के भजन गूँजते रहते थे। मैं जानती थी कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर लौटकर आया प्रभु यीशु है, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन सत्य हैं; लेकिन मेरे मन में कलीसिया की कही बातें और डैड के मुझे परेशान करने और मुझ पर आक्रमण करने वाले दृश्य भी घूमते रहते थे। मैं बेहद दुखी थी, मुझे ऐसा लगता था जैसे मैं गहरे रसातल में चली गयी हूँ और अब वहाँ से निकल नहीं सकती। न तो मैं ढंग से खा पाती थी, न सो पाती थी, मैं इतनी थकी और टूटी हुई महसूस करती थी कि लगता था जैसे मेरा सिर ही फट जाएगा। इस पीड़ा को सहन करते हुए, मैंने परमेश्वर से याचना की: "हे परमेश्वर, स्वर्ग, धरती और हर जीवित चीज़ को बनाने वाले परमेश्वर! मैं बहुत कष्ट में हूँ, मुझे कोई रास्ता नहीं मिल रहा। मैं जानती हूँ कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर लौटकर आया प्रभु यीशु है, लेकिन मेरा आध्यात्मिक कद बहुत ही छोटा है, मैं जब अपने डैड द्वारा किए जाने वाले उत्पीड़न और आक्रमण के बारे में सोचती हूँ, तो तेरा अनुसरण करने से डर जाती हूँ। हे परमेश्वर, मैं एक ऐसे चौराहे पर खड़ी हूँ जहाँ से मेरे लिए यह तय करना मुश्किल हो रहा है कि कहाँ जाऊँ। समझ में नहीं आता कि क्या करूँ, इसलिए तू मेरा मार्गदर्शन कर और मुझे राह दिखा...।" प्रार्थना करते समय, अनजाने में ही मैं अचानक सर्वशक्तिमान परमेश्वर के इन वचनों के बारे में सोचने लगी: "आपको इससे या उससे भयभीत नहीं होना चाहिए। चाहे तुम कितनी भी मुसीबतों या खतरों का सामना करो, तुम मेरे सम्मुख स्थिर रहो; किसी भी चीज से बाधित ना हो, ताकि मेरी इच्छा पूरी हो सके। ... मत डरो; मेरी सहायता के कारण कौन तुम्हारे मार्ग में बाधा डाल सकता है? यह स्मरण रखो!" ("वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 10")। परमेश्वर के वचनों ने मेरे अंदर शक्ति भर दी जिसने मेरे दिल को मज़बूत बना दिया। मैं सोचने लगी, "हाँ! परमेश्वर के होते हुए, मुझे दुनिया में किसका डर? चूँकि मुझे पहले ही यकीन है कि यह सच्चा मार्ग है, तो मुझे कोई इंसान, घटना या वस्तु नहीं रोक सकती। मुझे अपने इरादे को अटल बनाकर, परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए अंधेरी ताकतों के बंधनों को तोड़ देना चाहिए। परमेश्वर के विश्वासी के नाते, अगर मैं शैतान की विरोधी ताकतों के आगे अपनी आस्था को स्वीकार न कर सकूँ, तो फिर मैं किस तरह की विश्वासी हूँ? क्या मैं शैतान के आगे हार मानकर परमेश्वर को धोखा नहीं दे रही हूँ?" मुझे बहन झांग की वो बात याद आयी जब उसने कहा था कि परिवार और कलीसिया के अगुवा की ओर से किया गया उत्पीड़न सब आध्यात्मिक लड़ाई का ही हिस्सा हैं, और अगर मैं उनके साथ खड़ी होती, तो एक तरह से शैतान की धूर्त चालों की ही शिकार हो जाती। इसका मतलब होता कि मैं बचाए जाने और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने का अवसर गँवा बैठती। मैंने उन आध्यात्मिक कष्टों के बारे में सोचा जो मैंने बहन झांग के परमेश्वर के वचनों की पुस्तक वापस ले जाने के साथ ही झेलने शुरू किए थे। मुझे लगा था कि मेरे जीवन में परमेश्वर की कोई जगह नहीं हो सकती। परमेश्वर को छोड़ना अपने परिवार और पुरानी कलीसिया को छोड़ने से ज़्यादा दुखदायी था। अंतत: मैंने फोन उठाया और बहन झांग को कॉल किया, और उससे मिलने का स्थान तय किया ताकि मैं उससे परमेश्वर के वचनों की पुस्तक वापस ले सकूँ।

उसके बाद, जब मेरा पति घर पर नहीं होता तहा, तो मैं परमेश्वर के वचनों की पुस्तक को बड़ी उत्सुकता से पढ़ती थी और भजन गाती थी। मैं इन वचनों को जितना ज़्यादा पढ़ती थी, मुझे उतना ही अधिक आनंद आता था, और भजनों को जितना अधिक गाती थी, मुझे उतना ही सुकून और शांति मिलती थी। मेरी पहले वाली आस्था बहाल हो गयी, मेरी पीड़ा और कष्ट किसी धुंध की तरह छँट गए। मुझे बड़े ही अपनेपन से महसूस होता था कि परमेश्वर के वचन मेरे जीवन को पोषण दे सकते हैं, मैं परमेश्वर के अलावा किसी भी चीज़ के बिना रह सकती हूँ। तीन महीनों के बाद, बहन झांग मुझे एक सभा में शामिल होने के लिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया लेकर गयी।

लेकिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की सभा में मेरे शामिल होने की भनक मेरे पति को लग गयी और उसने मेरे डैड को बता दिया। एक शाम, जब मैं ऊपर के कमरे थी, तो मुझे आँगन में शोर-शराबा सुनायी दिया। जब मैंने परदा हटाकर देखा, तो मुझे ठंडे पसीने आ गये। मेरे डैड और कलीसिया के उनके चार-पाँच सहकर्मी धड़धड़ाकर अंदर घुसे। उन्हें देखने से लग रहा था कि वो ज़रूर कोई मुसीबत खड़ी करने वाले हैं। मेरा दिल धड़कने लगा, मैंने फौरन घुटने टेककर परमेश्वर को पुकारा, "हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, मेरे डैड मुझे परेशान करने के लिए फिर से इन कलीसिया वालों को ले आए, मुझे सचमुच बहुत डर लग रहा है। हे परमेश्वर, तू तो जानता है कि मेरा आध्यात्मिक कद कितना छोटा है, इसलिए मुझे आस्था और हिम्मत दे...।" परमेश्वर के ये वचन अचानक मेरे सामने तैरने लगे: "तुम में हिम्मत और सिद्धांत होने चाहिए जब तुम उन रिश्तेदारों का सामना करो जो विश्वास नहीं करते। परन्तु मेरी वजह से तुम किसी भी अन्धकार की शक्ति के अधीन ना होओगे। पूर्ण मार्ग पर चलने के लिए मेरी बुद्धि पर भरोसा रखो; शैतान के षडयंत्रों को काबिज़ न होने दो। अपने हृदय को मेरे सम्मुख रखने हेतु पूरा प्रयास करो और मैं तुम्हें आराम और शान्ति दूंगा और तुम्हारे हृदय में आनंद दूंगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 10")। परमेश्वर के वचनों ने मुझे आस्था और शक्ति दी, और उसके बाद मेरी कायरता और डर समाप्त हो गया। मैंने सोचा: "ये लोग मुझे जितना चाहें सता लें, लेकिन मैं शैतान के जाल में फँसकर धोखा नहीं खाने वाली। मुझे परमेश्वर ने बनाया है। परमेश्वर में आस्था रखना और परमेश्वर का अनुसरण करना स्वर्ग और धरती के न बदलने वाले नियम हैं, इनमें दखलंदाज़ी करने का हक किसी को नहीं है, मेरे निकटतम लोगों को भी नहीं।" उसके बाद, मैं नीचे जा कर शांति से अपने डैड और उनके सहकर्मियों से मिली। उन्होंने जैसे ही मुझे देखा, सब लोग एक साथ बोलने लगे। एक महिला सहकर्मी ने मुझे बड़ी "प्यार भरी" नज़रों से देखते हुए कहा, "फांगफांग, तुम तो बहुत ही समझदार इंसान हो, तो फिर ऐसा कैसे है कि तुम हमारी भावनाओं को नहीं समझ पा रही हो? हम सब तुम्हारे भले की ही तो सोच रहे हैं। इतनी ज़िद्दी मत बनो। प्रभु के सामने आ कर प्रायश्चित कर लो, ठीक है?" मैंने बड़ी शांति से उत्तर दिया, "बहन, आप में से किसी ने भी न तो चमकती पूर्वी बिजली के प्रवचनों को सुना है, और न सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़ा है। मैं आप लोगों से गुज़ारिश करती हूँ कि आप सभी लोग ठीक से जाँच-पड़ताल करें, सिर्फ आँख मूँदकर सर्वशक्तिमान परमेश्वर की निंदा और विरोध न करें। आप लोगों को सिर्फ इतना करना है कि आप सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़ें, तब आपको पता चलेगा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर लौटकर आया प्रभु यीशु है या नहीं।" उसने कहा, "हम उस पुस्तक को पढ़ने का साहस नहीं रखते, क्योंकि उस पुस्तक की विषय-वस्तु बहुत ही जानदार है जो लोगों को अपनी ओर खींचती है। उसके झाँसे में आ जाना बहुत आसान है।" मैंने कहा, "वही तो, क्योंकि सर्वशक्तिमान परमेश्वर सब सत्य व्यक्त करता है, उसके वचन परमेश्वर की वाणी हैं जो इंसान को वश में करने का सामर्थ्य रखते हैं। परमेश्वर के वचनों की ओर लोगों के आकर्षित होने की वजह यह है कि जब वे लोग उन्हें पढ़ते हैं, तो वे सत्य को समझ पाते हैं और पढ़कर जीवन-पोषण हासिल कर पाते हैं। जीवन-जल के सोते को पा लेने के बाद, उसे कौन छोड़ेगा?" उनके पास इसका कोई जवाब नहीं था, बल्कि उन्होंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर की निंदा करने वाली ढेरों बातें कहीं और यह कहकर मुझे डराने की कोशिश की कि अगर मैंने प्रायश्चित नहीं किया तो नरक में मेरा न्याय किया जाएगा। लेकिन मैंने भी कठोर स्वर में कहा, "आपने यह कहकर सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की निंदा की है कि 'जो लोग चमकती पूर्वी बिजली में शामिल होते हैं, वे फिर उसे कभी नहीं छोड़ सकते, और ऐसा करते हैं तो उनकी नाक काट की जाती है और आँखें निकाल ली जाती हैं।' इस तरह के दावे का राई-रत्ती भी प्रमाण नहीं है। अगर आप इसका ठोस सबूत नहीं दे पाते हैं, तो इसका मतलब है कि आप लोग झूठ का ऐसा पुलिंदा हैं जो लोगों को ठगता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार पहले ही पूरे चीन में दूर-दूर तक फैल गया है, और अब तो सब लोगों ने इसके बारे में जान लिया है। आज सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया में कई लाख ईसाई हैं। इसमें कोई शक नहीं कि जब सुसमाचार का प्रचार किया जाता है, तो कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो सत्य से नफरत करते हैं और उसे स्वीकार नहीं करते। लेकिन आपने कभी किसी ऐसे व्यक्ति को देखा है जिसकी नाक कटी हुई हो और आँखें निकाल ली गयी हों? अगर ऐसा एक भी व्यक्ति होता, तो अब तक मीडिया में आ चुका होता और पूरे देश में सनसनी फैल गयी होती। जब तक कि मैंने और मेरी बहन ने अपनी आस्था से तौबा न कर ली, तब तक आप लोगों ने हमें जान-बूझकर परेशान किया। लेकिन हम लोग बिल्कुल ठीक दिखायी दे रहे हैं, है न? आप लोगों को धोखा देने के लिए झूठ बोल रहे हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर में आस्था रखकर, मैं परमेश्वर के पदचिह्नों का अनुसरण कर रही हूँ और सच्चे मार्ग को चुन रही हूँ। मैंने कोई गलत काम नहीं किया है, इसलिए मेरे पास प्रायश्चित करने का कोई कारण नहीं है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर में मेरी आस्था हमेशा अडिग रहेगी, इसलिए अगर आप आस्था न रखना चाहें, तो कोई बात नहीं, लेकिन कम से कम मुझे आस्था रखने से मत रोकिए। जहाँ तक मेरे अंत का सवाल है, यह किसी इंसान के हाथ में नहीं है, हर व्यक्ति की नियति परमेश्वर के हाथों में है। परमेश्वर के कार्य के साथ-साथ चलकर और परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार करके ही, इंसान अपनी आखिरी मंज़िल को अच्छा बना सकता है। इसलिए आज के बाद मुझे फिर परेशान करने न आएँ।" यह सुनते ही मेरे डैड अचानक तेज़ी से खड़े हो गए, और आक्रामक लहजे में मुझे धमकी देने लगे, "अगर तुमने सर्वशक्तिमान परमेश्वर में आस्था बनाए रखी, तो तुम आज से मेरी बेटी नहीं!"

अपने डैड के मुँह से रिश्ता खत्म करने वाली बात सुनकर, मैं काफी बेचैन हो गयी और सोचने लगी: "दरअसल सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्य ही वे बातें हैं जो पवित्र आत्मा कलीसियाओं से कहता है। इसलिए आप इन बातों को सुनते क्यों नहीं, इनके बजाय आप कलीसिया के अगुवाओं द्वारा फैलायी जा रही अफवाहों को सुनते हैं। मेरे सर्वशक्तिमान परमेश्वर में आस्था रखने की वजह से आप उन लोगों की तरह मुझसे नफरत कैसे कर सकते हैं?" सोच-सोचकर मैं उदास हो गयी, लेकिन फिर अचानक मुझे परमेश्वर के वचनों का अंश याद आ गया: "परमेश्वर ने इस संसार की रचना की और वह इसमें एक जीवित प्राणी, मनुष्य को लेकर आया जिसे उसने जीवन प्रदान किया। इसके बाद, मनुष्य के माता-पिता और परिजन हुए तथा अब वह अकेला नहीं था। जब से मनुष्य ने पहली बार इस भौतिक दुनिया पर नजरें डालीं, तब से वह परमेश्वर के विधान के भीतर विद्यमान रहने के लिए नियत था। यह परमेश्वर की दी हुई जीवन की साँस है जो हर एक प्राणी को उसकी वयस्कता के विकास में सहयोग देती है। इस प्रक्रिया के दौरान, किसी को भी ऐसा महसूस नहीं होता है कि मनुष्य परमेश्वर की देखरेख में बड़ा हो रहा है, बल्कि वे यह मानते हैं कि मनुष्य अपने माता-पिता की प्रेमपूर्ण देखभाल के तहत ऐसा कर रहा है, और यह कि यह जीवन की उसकी अपनी नैसर्गिक प्रवृत्ति है जो इस बढ़ने की प्रक्रिया को नियंत्रित करती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य नहीं जानता कि जीवन किसने प्रदान किया है या यह कहाँ से आया है, जिस तरह से जीवन की नैसर्गिक प्रवृत्ति चमत्कार करती है उसे तो इंसान बिल्कुल नहीं जानता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है")। परमेश्वर के वचनों से मुझे यह बात समझ में आयी कि भले ही मेरा भौतिक शरीर मुझे अपने मॉम-डैड से मिला हो, लेकिन मेरे जीवन का स्रोत परमेश्वर है। मैंने सोचा, "परमेश्वर के जीवन-उपहार के बिना, मेरा भौतिक शरीर केवल नश्वर माँस का टुकड़ा ही तो है, और अगर आज मैं जीवित हूँ, तो वह परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा की वजह से ही है, वरना तो शैतान मुझे कब का निगल गया होता। मेरे जीवन का स्रोत परमेश्वर है, न कि मेरे मॉम-डैड, मैं परमेश्वर के अलावा किसी से भी रिश्ता तोड़ सकती हूँ। प्रभु की वापसी की जाँच-पड़ताल करने में मेरे मॉम-डैड की कोई रुचि नहीं है, दूसरे, वे परमेश्वर के कार्य को बदनाम करने और उसकी निंदा करने में सौ प्रतिशत कलीसिया के अगुवाओं के साथ हैं और मुझे भी परमेश्वर के साथ धोखा करने के लिए मजबूर कर रहे हैं। इससे साबित होता है कि परमेश्वर का विरोध करना ही उनकी प्रकृति है और वे परमेश्वर से वैर रखते हैं, लेकिन मैं उनके द्वारा कलंकित होकर परमेश्वर का विरोध नहीं करूँगी। मैं परमेश्वर के पक्ष में खड़ी रहूँगी। अगर मेरे मॉम-डैड मुझे त्याग भी दें, तो भी मैं आखिरी साँस तक परमेश्वर का अनुसरण करूँगी, और मज़बूती से खड़ी रहकर उसकी गवाही दूँगी।" इसलिए मैंने डैड से कहा, "डैड, जब परमेश्वर में आस्था की बात आती है, तो मैं परमेश्वर का आज्ञापालन करती हूँ, किसी इंसान का नहीं, न ही मैं भावनाओं में बहूँगी। अगर आपकी बात परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होती, तो मैं आपकी बात सुनती। लेकिन अगर आप मुझे परमेश्वर से धोखा करने के लिए कहेंगे, तो मैं आपकी बात कभी नहीं मानूँगी!" जब उन लोगों ने देखा कि मैं झुकने को तैयार नहीं हूँ, तो वे सिर हिलाते हुए उठ खड़े हुए, और मायूस होकर चल दिए। उस समय, मुझे लगा कि मैंने एक जंग जीत ली है। मैंने परमेश्वर की स्तुति की और मन ही मन उसे धन्यवाद दिया: "हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, तू सर्वशक्तिमान है। तेरे वचनों से ही मुझे आस्था और हौसला मिला, और शैतान को अपमानजनक पराजय का मुँह देखना पड़ा।"

हालाँकि उसके बाद धार्मिक समुदाय के लोग मुझे परेशान करने नहीं आए, लेकिन कलीसिया के अगुवा अभी भी मुझे दुखी करने के लिए मेरे मॉम-डैड को उकसाते रहते थे। कुछ-कुछ दिनों के बाद, वे लोग मेरे घर पर आ जाते और मुझसे गुज़ारिश करते कि मैं अपना मन बदल लूँ। वे लोग इस बात का आग्रह करते कि मैं अगुवा के घर पर जा कर प्रायश्चित करूँ। एक दिन, मेरे घरवाले आए और मुझे धोखा देने के लिए डैड बाइबल से अपनी मर्ज़ी का अंश सुनाने की कोशिश करने लगे और मॉम एक तरफ खड़ी होकर रोते हुए मुझसे याचना करने लगी कि मैं अगुवा के घर जा कर प्रायश्चित करूँ। मॉम को इतना परेशान देखकर मैं दुखी हो गयी। मैं सोचने लगी कि तीन साल की उम्र में उन्होंने अपनी माँ को खो दिया था, उनकी सौतेली माँ ने उनके साथ बहुत बुरा बर्ताव किया था। उन्होंने ज़िंदगी में बहुत दुख उठाए थे और अब उनकी उम्र होती जा रही है, और मैं उनकी संतानोचित बेटी नहीं हूँ, खासतौर से अब मैं उन्हें जिस ढंग से चिंता में डाल रही थी। उसके बाद मैंने अपने डैड के झुर्रियाँ पड़ते चेहरे, सफेद होते बालों की ओर देखा, तो मेरा मन उदास हो गया, और मेरी आँखों में आँसू आ गये। जैसे ही मैं कमज़ोर पड़ने लगी, तो मुझे परमेश्वर के वचनों के ये अंश याद आए: "मनुष्य के भीतर परमेश्वर के द्वारा किए जाने वाले प्रत्येक कार्य के चरण में, बाहर से यह लोगों के मध्य अंतःक्रिया प्रतीत होता है, मानो कि यह मानव व्यवस्थाओं के द्वारा, या मानवीय हस्तक्षेप से उत्पन्न हुआ हो। किन्तु पर्दे के पीछे, कार्य का प्रत्येक चरण, और घटित होने वाला सब कुछ, शैतान के द्वारा परमेश्वर के सामने चली गई बाज़ी है, और लोगों से अपेक्षा करता है कि परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में वे अडिग बने रहें। उदाहरण के लिए, जब अय्यूब को आजमाया गया था: पर्दे के पीछे, शैतान परमेश्वर के साथ दाँव लगा रहा था, और अय्यूब के साथ जो हुआ वह मनुष्यों के कर्म थे, और मनुष्यों का हस्तक्षेप था। परमेश्वर द्वारा तुम लोगों में किए गए हर कदम के पीछे शैतान की परमेश्वर के साथ बाज़ी होती है—इस सब के पीछे एक संघर्ष होता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है")। परमेश्वर के वचनों से मुझे समझ में आया कि देखने में तो ऐसा लगता है कि मेरे मॉम-डैड मुझे परेशान कर रहे हैं, लेकिन आध्यात्मिक जगत में परमेश्वर के खिलाफ यह दाँव शैतान चल रहा था। यह बिल्कुल उसी तरह से है जब अय्यूब परमेश्वर के परीक्षणों से गुज़र रहा था, तो उसकी पत्नी ने, जो कि शैतान की एक अनुचर थी, अय्यूब से कहा, "क्या तू अब भी अपनी खराई पर बना है? परमेश्‍वर की निन्दा कर, और चाहे मर जाए तो मर जा" (अय्यूब 2:9)। लेकिन चूँकि अय्यूब परमेश्वर का भय मानता था और बुराई से दूर रहता था, तो उसने अपनी पत्नी को डाँटते हुए उसे एक अज्ञानी और ज़िद्दी औरत कहा था; उसने अपने शब्दों से पाप नहीं किया। उसने शैतान के सामने परमेश्वर की गवाही दी, वह यहोवा परमेश्वर की नज़रों में पूर्ण मनुष्य था। अब मेरे मॉम-डैड मुझे परेशान कर रहे थे, उन्होंने अगुवाओं की सफेद झूठ पर विश्वास कर लिया, और यह शैतान का एक प्रलोभन भी था। शैतान को पता था कि मैं अपने मॉम-डैड की बहुत परवाह करती हूँ और वो इसी बात का फायदा उठाकर मुझे वश में करना चाहता था। शैतान मेरे मॉम-डैड के प्रति मेरी हमदर्दी का इस्तेमाल करके चाहता था कि मैं परमेश्वर को नकार दूँ और उसे धोखा दूँ,लेकिन उसकी यह उम्मीद नाकाम साबित हुई। इससे यह ज़ाहिर होता है कि शैतान कितना धूर्त और कपटी है! लेकिन मैं शैतान को उसके षडयंत्रों को फलीभूत होते देखने की संतुष्टि देने वाली नहीं थी। मैं परमेश्वर को मायूस और उदास नहीं करने वाली थी, इसलिए मैंने संकल्प किया कि मैं परमेश्वर के पक्ष में खड़ी रहूँगी। उसके बाद, मेरे मॉम-डैड ने पूरा ज़ोर लगाया, लेकिन मेरा दिल ज़रा भी नहीं पिघला। मेरे अटल इरादों को देखकर,मेरे मॉम-डैड निराश होकर चले गए।

उसके कई दिनों के बाद, कलीसिया के अगुवा ने सारे सदस्यों के सामने मेरे डैड को खड़ा करके, यह ऐलान किया कि मुझे कलीसिया से बेदखल कर दिया गया है। अगुवा ने मेरे मॉम-डैड को मुझसे दूर रहने के लिए कहा। कलीसिया के अगुवा और मेरे मॉम-डैड द्वारा मुझे कष्ट दिए जाने के परिणाम स्वरूप, मेरे पति ने भी मुझे बुरी तरह से सताना शुरू कर दिया। मैं जब भी कलीसिया से अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने के बाद घर आती, तो वो मुझे मारता-पीटता, गालियाँ देता, और कभी-कभी तो मुझे घर से निकाल कर दरवाज़े बंद कर लेता, मेरा स्कूटर और साइकिल खराब कर देता। एक बार तो वो मुझे पुलिस स्टेशन ले गया। उसकी यातनाओं से मैं शरीरिक रूप से टूट गयी और सूखकर एकदम काँटा हो गयी। हमारे गाँव के पड़ोसी भी मेरा मज़ाक उड़ाने और निंदा करने लगे। इन हालात में, मेरी आत्मा कमज़ोर हो गयी और मुझे लगने लगा कि परमेश्वर मेरे लिए आस्था बनाए रखना बहुत मुश्किल है। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं आगे कैसे बढ़ूँ। मैं परमेश्वर के आगे घुटने टेककर प्रार्थना करते हुए रो पड़ी, मैंने परमेश्वर के आगे गिड़गिड़ाकर मुझे आस्था और शक्ति देने की याचना की: और फिर, एक अवसर पर, मैंने परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा: "जिन लोगों को परमेश्वर विजेताओं के रूप में संदर्भित करता है ये वे लोग हैं जो अभी भी गवाह बनने, और शैतान के प्रभाव में होने और शैतान की घेराबंदी में होने पर, अर्थात्, जब अंधकार की शक्तियों के भीतर हों, तो अपना आत्मविश्वास और परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति बनाए रखने में सक्षम हैं। यदि तुम अभी भी परमेश्वर के लिए पवित्र दिल और अपने वास्तविक प्यार को बनाए रखने में सक्षम हो, तो चाहे कुछ हो जाए, तुम परमेश्वर के सामने गवाह बनते हो, और यही वह है जिसे परमेश्वर एक विजेता होने के रूप में संदर्भित करता है। यदि परमेश्वर के तुम्हें आशीष देते समय तुम्हारा अनुसरण उत्कृष्ट है, लेकिन तुम उसके आशीर्वाद के बिना पीछे हट जाते हो, तो क्या यह पवित्रता है? चूँकि तुम निश्चित हो कि यह रास्ता सही है, इसलिए तुम्हें अंत तक इसका पालन अवश्य करना चाहिए; तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति अवश्य बनाए रखनी चाहिए। चूँकि तुम देख चुके हो कि परमेश्वर स्वयं तुम को पूर्ण बनाने के लिए पृथ्वी पर आया है, इसलिए तुम्हें पूरी तरह से अपना दिल उन्हें समर्पित कर देना चाहिए। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि वह क्या करता है, भले ही वह तुम्हारे लिए बिल्कुल अंत में एक प्रतिकूल परिणाम निर्धारित करता है, तुम तब भी उसका अनुसरण कर सकते हो। यह परमेश्वर के सामने अपनी पवित्रता बनाए रखना है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति अवश्य बनाए रखनी चाहिए")। परमेश्वर के वचनों से मुझे समझ में आया कि, अंत के दिनों में, परमेश्वर लोगों के एक समूह को विजेता बनाएगा। परमेश्वर शैतान को छूट देगा कि वह लोगों को लालच दे, चाहे सीसीपी सरकार द्वारा दमन हो, धार्मिक समुदाय की ओर से यातना हो,चाहे सगे-संबंधी छोड़ दें, या आम आदमी मज़ाक उड़ाए या अपमान करे, हम विश्वासियों को व्यवहारिक रूप से इन तमाम परीक्षणों से गुज़रना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर द्वारा बनाए गए वही विश्वासी विजेता बनेंगे जो हर स्थिति में परमेश्वर का आज्ञापालन कर सकते हैं, परमेश्वर के प्रति निष्ठावान रह सकते हैं और परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं। परमेश्वर ने मुझे पूर्ण बनाने के लिए इन मुश्किल हालात की व्यवस्था की थी, इसके ज़रिए वह यह देखना चाहता था कि क्या उसमें सचमुच मेरी आस्था है या नहीं, मैं वाकई उसमें सच्चा विश्वास रखती हूँ या नहीं, सचमुच उसका आज्ञापालन करती हूँ या नहीं, उसके प्रति सच्ची निष्ठा रखती हूँ या नहीं। परमेश्वर की इच्छा को समझने के बाद, मैंने परमेश्वर के सामने जा कर प्रतिज्ञा की: चाहे कितनी भी मुश्किलें आएँ या मेरा कितना भी दमन किया जाए, मैं हमेशा दृढ़ता से परमेश्वर का अनुसरण करूँगी,मैं परमेश्वर की संतुष्टि के लिए परमेश्वर के एक सृजित प्राणी की तरह हमेशा अपने कर्तव्यों का निर्वाह करूँगी, और शैतान के आगे परमेश्वर की विजयी गवाही दूँगी। उसके बाद, हालाँकि मेरे पति ने मुझे बुरी तरह से यातना देना, दुखी और परेशान करना जारी रखा, लेकिन मैं अभी भी अक्सर परमेश्वर से प्रार्थना करती थी, उसी पर निर्भर रहती थी, हर दिन परमेश्वर के वचनों का पाठ करती थी, अब मुझे अपने दिल में किसी भी तरह की कोई पीड़ा की अनुभूति नहीं होती थी। परमेश्वर ने मेरे लिए एक मार्ग भी खोल दिया था: मुझे पागलों की तरह सताने के कारण परमेश्वर ने कई बार मेरे पति को दंडित किया, उसके बाद उसकी हिम्मत नहीं हुई कि वो मुझे मारे या मेरी साइकिल के साथ फिर छेड़छाड़ करे। इन अनुभवों से मैंने परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता, संप्रभुता और चमत्कारी कर्मों को जाना। मैंने जाना कि ऐसी कोई भी अंधकारपूर्ण ताकत नहीं है जो परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य से श्रेष्ठ हो। मैंने व्यक्तिगत रूप से इस सच्चाई को अनुभव से किया कि अगर हम सच्चे मन से परमेश्वर पर भरोसा करें, तो परमेश्वर हमारे लिए आगे का रास्ता खोल देगा और शैतान के अंधकारपूर्ण प्रभाव पर विजय पाने में हमारा मार्गदर्शन करेगा। इन सारे उत्पीड़न और दुखों को सहने के बाद, हालाँकि मेरे भौतिक शरीर ने थोड़ा-बहुत कष्ट उठाया था, लेकिन फिर भी मुझे लगा कि मैंने काफी कुछ पाया है। परमेश्वर में मेरी आस्था लगातार बढ़ती गयी, और यह मुझ पर परमेश्वर का आशीष था। सर्वशक्तिमान परमेश्वर का धन्यवाद!

एक साल बाद, मैं बहन झांग के साथ अपनी सबसे छोटी बहन के कार्य-स्थल पर गयी और फिर से परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य की गवाही दी। मेरी बहन ने उसे स्वीकार कर लिया, और जब मैंने उसे परमेश्वर के वचनों की पुस्तक लेते देखा, तो मुझे बहुत गहराई से यह बात समझ में आयी कि किसी इंसान का परमेश्वर द्वारा बचाया जाना कितना मुश्किल है। इंसान को बचाने की परमेश्वर की इच्छा कितनी वास्तविक है! मेरी आँखों से कृतज्ञता के आँसू बह निकले, परमेश्वर के प्रति आभार और स्तुति के लिए मेरा दिल भर आया। 2006 में, मेरी सबसे छोटी बहन और मैंने मिलकर अपनी मझली बहन को राज्य का सुसमाचार सुनाया और, उसके बाद, हम लोग अपने कुछ सगे-संबंधियों को भी सर्वशक्तिमान परमेश्वर के सामने ले कर आए। इससे मुझे एक बात समझ में आयी कि धार्मिक अगुवा चाहे जितना झूठ गढ़ें, गड़बड़ी और और सच्चे विश्वासियों को कितना भी सताएँ, परमेश्वर का सुसमाचार फैल कर रहेगा, और उसे कोई रोक नहीं सकता। परमेश्वर के मेमने यकीनन उसकी वाणी को सुनकर उसके सिंहासन के सामने आएँगे। जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है: "राज्य मनुष्यों के मध्य विस्तार पा रहा है, यह मनुष्यों के मध्य बन रहा है, यह मनुष्यों के मध्य खड़ा हो रहा है; ऐसी कोई भी शक्ति नहीं है जो मेरे राज्य को नष्ट कर सके" ("वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 19")।

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