23. मैंने अपनी ईर्ष्या का समाधान कैसे किया

वांग शेन, चीन

2019 में मुझे वीडियो टीम का अगुआ चुना गया। मैंने मन ही मन सोचा, “लगता है मैं काफी काबिल हूँ, नहीं तो वे मुझे नहीं चुनते।” उसी समय मैंने संकल्प लिया कि मैं अपना कर्तव्य अच्छी तरह करने में दिल लगाऊँगी। उस दौरान बहन शाओ या के 3D कौशल विशेष रूप से शानदार थे और हर कोई अपनी तकनीकी समस्याओं के लिए उसी के पास जाता था। हर किसी को लगातार शाओ या को लगातार घेरे हुए और सवाल पूछते देखकर मुझे दिल में थोड़ी जलन महसूस हुई, लेकिन मैंने इसे सही ढंग से सँभाल लिया। आखिर, मेरी विशेषज्ञता 2D एनिमेशन थी और मैं 3D तकनीक के बारे में ज्यादा नहीं जानती थी, इसलिए मदद के लिए लोगों का उसके पास जाना सामान्य बात थी। इसके अलावा, बहन सु जिए अक्सर मुझसे कुछ तकनीकी सवाल पूछती थीं, जिससे मुझे थोड़ी तसल्ली मिल जाती थी। लेकिन बाद में बहनें न केवल तकनीकी मुद्दों के लिए शाओ या के पास जाने लगीं, बल्कि अपने जीवन प्रवेश की समस्याओं और कठिनाइयों पर संगति करने के लिए भी उसके पास जाने लगीं। तभी मुझे सचमुच जलन होने लगी। “मैं टीम अगुआ हूँ, तो कोई मेरे पास क्यों नहीं आता? क्या उन्हें लगता है कि मैं शाओ या जितनी अच्छी नहीं हूँ? तो फिर उन्होंने मुझे अगुआ के रूप में चुना ही क्यों? क्या यह मुझे शर्मिंदा करने जैसा नहीं है?” जब भी मैं बहनों को एक साथ संगति करते देखती, तो मैं उसमें शामिल होना चाहती थी, लेकिन जब मैं उन सबको शाओ या के इर्द-गिर्द इकट्ठा देखती, तो मैं तुरंत अपना इरादा बदल देती। “तुम पहले ही आकर्षण का केंद्र बनी हुई हो। अगर मैं एक टीम अगुआ होने के नाते वहाँ जाती हूँ, तो क्या इससे तुम और ज्यादा नहीं चमकोगी और ज्यादा काबिल नहीं लगोगी, जबकि मैं और भी मामूली लगूँगी?” इसलिए मैं मुड़ जाती और अकेले अपनी आध्यात्मिक भक्ति करने के लिए दूसरे कमरे में चली जाती। बाहर से मुझे कभी-कभी शाओ या की हँसी सुनाई देती और यह मुझे खासकर चुभती हुई लगती थी, मानो वह जानबूझकर अपनी “प्रतिष्ठा” का दिखावा कर रही हो। उसके बाद, मैं उससे और ज्यादा असंतुष्ट होती गई। “साफ तौर पर मैं टीम अगुआ हूँ, फिर भी सब तुम्हारे आगे-पीछे घूमते हैं। मैं अपनी नाक कैसे बचाऊँ? तुम्हें मेरी भावनाओं का जरा भी खयाल नहीं है। तुम कम से कम मुझे अपने साथ शामिल होने के लिए बुला तो सकती थी, सिर्फ मेरी लाज रखने के लिए ही सही! मुझे दिख रहा है कि तुम्हारे मन में अपनी टीम अगुआ के रूप में मेरे लिए बिल्कुल भी सम्मान नहीं है।” बाद में मैं सोचने लगी कि अगर सभाओं के दौरान मेरी संगति में ज्यादा प्रकाश होता, तो क्या लोग अपनी समस्याओं पर संगति करने के लिए मेरे पास आने लगते? इस तरह मैं अपनी थोड़ी इज्जत वापस पा सकती थी। इसलिए सभाओं के दौरान मैं यह सोचने में खूब दिमाग खपाती कि अपनी संगति को सबसे अलग और शानदार कैसे बनाऊँ, लेकिन मैं जितनी ज्यादा कोशिश करती, मेरा दिमाग उतना ही खाली हो जाता। मेरी संगति फीकी और नीरस होकर रह गई और उसके बाद भी कोई मेरे पास संगति करने नहीं आता था। धीरे-धीरे दूसरी बहनों के लिए मेरे मन में नकारात्मक राय विकसित होने लगी। मैं उनसे बात नहीं करना चाहती थी और खासकर शाओ या को तो मैं पहचानना तक नहीं चाहती थी। मैं उससे तभी बेमन से बात करती जब काम पर चर्चा करना बहुत जरूरी होता और तब भी मैं पत्थर जैसा चेहरा बनाकर बहुत रूखे लहजे में बात करती। मुझे ऐसा देखकर शाओ या मुझसे बात करने की हिम्मत नहीं करती थी।

एक शाम हर कोई फिर से सवाल पूछने के लिए शाओ या के इर्द-गिर्द इकट्ठा हो गया और सु जिए भी उनमें शामिल हो गई। उन्हें चीजों पर चर्चा करते हुए और हँसते-बोलते देखकर मुझे अचानक लगा कि मुझे अलग-थलग कर दिया गया है और मैंने सोचा कि शाओ या मुझे उकसाने के लिए जानबूझकर ऐसा कर रही है। मैंने इस बारे में जितना सोचा, मुझे उतना ही गुस्सा आया। थोड़ी देर बाद शाओ या ने मुझसे एक सवाल पूछा। मेरा उसे जवाब देने का कोई इरादा नहीं था, इसलिए मैंने न सुनने का नाटक किया। उसने दोबारा पूछा और मैंने बहुत कठोरता से उसे झुंझलाकर जवाब दिया। शाओ या थोड़ी हक्की-बक्की रह गई और उसने पूछा, “क्या हुआ?” मैंने गुस्से में पलटकर कहा, “कुछ नहीं!” मुझे ऐसा देखकर शाओ या के पास अपनी सीट पर वापस बैठने के अलावा कोई चारा नहीं था। मुझे इतना पीड़ित और घुटन महसूस हुई कि मैं दूसरे कमरे में गई और रोने लगी। शाओ या यह देखने आई कि मैं कैसी हूँ लेकिन मैंने उसे नजरअंदाज कर दिया, मुझे महसूस हुआ कि मेरी सारी पीड़ा की वजह वही है। उसके बाद मैं मन ही मन चुपचाप उससे प्रतिद्वंद्विता करने लगी। हर सुबह हमारी आध्यात्मिक भक्ति के दौरान जब दूसरी बहनें अपनी संगति पूरी कर लेतीं तो मैं अपनी बात जोड़ती, लेकिन जब शाओ या अपनी बात पूरी करती, तो मैं पूरी तरह चुप रहती। मैंने मन ही मन सोचा, “मैं तुम्हें बस ऐसे ही लटकाए रखूँगी और एहसास कराऊँगी कि शर्मिंदगी वाली हालत में कैसा लगता है।” जब हम काम पर चर्चा करते, तो दूसरों के बोलने के बाद मैं जल्दी से अपनी राय देती, लेकिन जब शाओ या बात करना बंद करती, तो मैं ऐसे जाहिर करती जैसे मैंने कुछ सुना ही न हो और उसके साथ बहुत रूखा व्यवहार करती। शाओ या और दूसरी बहनों के प्रति मेरे रवैये में आए इस साफ अंतर की वजह से, दूसरी बहनें भी कुछ बेबस महसूस करने लगीं। वे काम की चर्चाओं के दौरान खुलकर अपने मन की बात कहने की हिम्मत नहीं करती थीं, जिससे हमारी सभाओं की कार्यकुशलता कम हो गई और नतीजे खराब हो गए। मैंने सोचा था कि ऐसा करने से शाओ या की अहमियत थोड़ी कम हो जाएगी, लेकिन पता चला कि उस पर वास्तव में इसका कोई असर नहीं पड़ा था। सबके साथ उसका रिश्ता अभी भी बहुत अच्छा था और वे अभी भी अपनी समस्याओं के लिए उसी के पास जाते थे। इससे मुझे बहुत गुस्सा आया। बाद में मैंने कर्तव्य से जुड़े मामलों पर चर्चा करने के लिए पहल करना बंद कर दिया। मैं शाओ या से बात नहीं करना चाहती थी और मैं दूसरी बहनों के साथ भी माथापच्ची नहीं करना चाहती थी। मैं हर दिन अपने तक ही सीमित रहती, अंदर से बेहद दमित और दुखी महसूस करती।

उसके बाद कुछ समय तक हर शाम खाने के बाद मेरा पेट फूलने लगता और यह बेहद तकलीफदेह होता था। मैंने हर तरह के नुस्खे आजमाए, लेकिन किसी से कोई फायदा नहीं हुआ। एक शाम शाओ या और मेजबान बहन दोनों ने मुझे याद दिलाया कि जब मेरा ऐसी बीमारी से सामना हो तो मुझे आत्म-चिंतन करना चाहिए और अपने सबक सीखने चाहिए। तभी मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और उससे मुझे प्रबुद्ध करने और खुद को जानने के लिए मेरा मार्गदर्शन करने को कहा। जैसे ही मैंने प्रार्थना की, शाओ या के प्रति मेरी जलन के दृश्य एक के बाद एक मेरी आँखों के सामने घूमने लगे और मुझे एहसास हुआ कि मुझे इस मुद्दे पर चिंतन करने की जरूरत है।

अपनी आध्यात्मिक भक्ति के दौरान मैंने परमेश्वर के कुछ वचन पढ़े और अपनी अवस्था के बारे में कुछ समझ हासिल की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “कुछ लोग हमेशा इस बात से डरे रहते हैं कि दूसरे लोग उनसे बेहतर और ऊपर हैं, अन्‍य लोगों को पहचान मिलेगी, जबकि उन्हें अनदेखा किया जाता है, और इसी वजह से वे दूसरों पर हमला करते हैं और उन्हें अलग कर देते हैं। क्या यह प्रतिभाशाली लोगों से ईर्ष्या करने का मामला नहीं है? क्या यह स्‍वार्थपूर्ण और निंदनीय नहीं है? यह कैसा स्वभाव है? यह एक क्रूर स्वभाव है। जो लोग दूसरों के बारे में सोचे बिना या परमेश्वर के घर के हितों को ध्‍यान में रखे बिना केवल अपने हितों के बारे में सोचते हैं, जो केवल अपनी स्‍वार्थपूर्ण इच्छाओं को संतुष्ट करते हैं, वे बुरे स्वभाव वाले होते हैं और परमेश्वर उन्हें पसंद नहीं करता। अगर तुम परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशीलता दिखाने में वाकई समर्थ हो तो तुम दूसरे लोगों से निष्पक्ष ढंग से पेश आने में सक्षम होगे। अगर तुम किसी अच्छे व्यक्ति की सिफारिश करते हो और उसे प्रशिक्षित होने और कोई कर्तव्य निर्वहन करने देते हो, और इस तरह एक प्रतिभाशाली व्यक्ति को परमेश्वर के घर में शामिल करते हो, तो क्या उससे तुम्‍हारा काम और आसान नहीं हो जाएगा? तब क्या तुम अपने कर्तव्‍य में समर्पित नहीं होगे? यह परमेश्वर के समक्ष एक अच्छा कर्म है; यह वह न्यूनतम अंतरात्मा और विवेक है जो अगुआ के रूप में कार्य करने वालों के पास होना चाहिए। जो लोग सत्य को अभ्‍यास में लाने में समर्थ हैं वे जो चीजें करते हैं उनमें परमेश्वर की जाँच-पड़ताल स्वीकार कर सकते हैं। परमेश्वर की जाँच-पड़ताल स्वीकार करते हो तो तुम्‍हारा हृदय सही हो जाएगा। यदि तुम हमेशा दूसरों को दिखाने के लिए ही चीजें करते हो और हमेशा दूसरों की प्रशंसा और सराहना प्राप्त करना चाहते हो और परमेश्वर की जाँच-पड़ताल स्वीकार नहीं करते हो तो क्या तब भी परमेश्वर तुम्‍हारे हृदय में है? ऐसे लोगों में परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय नहीं होता। हमेशा अपने लिए कार्य मत करो, हमेशा अपने हितों की मत सोचो, अपने गौरव, प्रतिष्ठा और रुतबे पर विचार मत करो और अपने निजी हितों पर विचार मत करो। तुम्‍हें सबसे पहले परमेश्वर के घर के हितों पर विचार करना चाहिए और उन्‍हें अपनी प्राथमिकता बनाना चाहिए। तुम्‍हें परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होना चाहिए और सबसे पहले यह चिंतन करना चाहिए कि तुम्‍हारे कर्तव्‍य निर्वहन में अशुद्धियाँ रही हैं या नहीं, तुम समर्पित रहे हो या नहीं, तुमने अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी की हैं या नहीं, और अपना सर्वस्व दिया है या नहीं, साथ ही तुम अपने कर्तव्य, और कलीसिया के कार्य के प्रति पूरे दिल से विचार करते रहे हो या नहीं। तुम्‍हें इन चीजों के बारे में अवश्‍य विचार करना चाहिए। अगर तुम इन पर बार-बार विचार करते हो और इन्हें समझ लेते हो, तो तुम्‍हारे लिए अपना कर्तव्‍य अच्‍छी तरह से निभाना आसान हो जाएगा(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्यागकर ही आजादी और मुक्ति पाई जा सकती है)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मैं जलन की अवस्था में जी रही थी। जब से शाओ या आई थी, जब मैंने देखा कि सब अपनी समस्याओं के लिए टीम अगुआ यानी मेरे बजाय उसके पास जाते हैं, तो मेरा मन बेचैन हो गया था। मुझे लगा कि उसने मुझसे सुर्खियाँ चुरा ली हैं और मैं उससे जलने लगी और नाराज रहने लगी। टीम अगुआ के रूप में अपनी तथाकथित गरिमा बचाने के लिए मैंने सभाओं के दौरान यह सोचने में खूब दिमाग खपाया, पता लगाने की कोशिश की कि अपनी संगति को कैसे समझदारी भरा बनाऊँ ताकि बहनें मेरा आदर करें। इस तरह वे संगति करने और अपने जीवन प्रवेश की किसी भी समस्या या कठिनाई को सुलझाने के लिए मेरे पास आएँगी। लेकिन मैंने जितनी ज्यादा कोशिश की, मैं उतनी ही कम संगति कर पाई। बाद में मैंने आत्म-चिंतन नहीं किया; इसके बजाय शाओ या के प्रति मेरी नाराजगी और भी बढ़ गई। चाहे सभाएँ हों या काम की चर्चाएँ, कोई और कुछ भी कहता तो मैं उत्साह से जवाब देती, लेकिन जब भी शाओ या बोलती, तो मैं उसके साथ रूखा व्यवहार करती और उसे शर्मिंदा करने के लिए जानबूझकर अजीब-सी चुप्पी साध लेती। यह उस पर हमला करने और उसे अलग-थलग करने का मेरा अप्रत्यक्ष तरीका था। लेकिन हैरानी की बात यह थी कि शाओ या के साथ सबके रिश्ते बहुत अच्छे बने रहे। मुझे इतना गुस्सा आया कि मैं किसी से बात नहीं करना चाहती थी और यहाँ तक कि मैंने अपनी सारी भड़ास अपने कर्तव्य पर निकाली। जो मुझसे ज्यादा काबिल थे, उनसे जलने की वजह से मैं तंगदिल और छोटी सोच वाली बन गई थी; मैं दूसरों को खुद से बेहतर देखकर बर्दाश्त नहीं कर पाती थी। जैसे ही मैं किसी को खुद से ज्यादा मजबूत देखती, तो मैं उस पर हमला करने और उसे अलग-थलग करने के लिए हर हथकंडा अपनाती। जब मेरी मर्जी नहीं चलती, तो मैं नकारात्मक हो जाती और कामचोरी करने लगती, अपने कर्तव्य की उपेक्षा करती। मैं अपने उचित कार्य की पूरी तरह उपेक्षा कर रही थी! असलियत में शाओ या के पास अच्छे पेशेवर कौशल थे और वह समस्याएँ सुलझाने के लिए सत्य पर संगति कर सकती थी। जब बहनें अपने मुद्दों के लिए उसके पास जाती थीं, तो यह हमारे कर्तव्य और उनके जीवन प्रवेश, दोनों के लिए फायदेमंद था। परमेश्वर ने मुझसे बेहतर लोगों को मेरे साथ रखा है ताकि हम अपनी कमियों को पूरा करने के लिए एक-दूसरे की खूबियों से सीख सकें, अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाने में एक-दूसरे की मदद कर सकें और साथ ही मैं भी आगे बढ़ती रहूँ। मुझे शाओ या के साथ सहयोग करना चाहिए, उससे जलना या उसे अलग-थलग नहीं करना चाहिए। उसके बाद मैंने सबके सामने खुलकर बात की और उस दौरान शाओ या के प्रति अपनी ईर्ष्या की अवस्था के बारे में संगति की। शाओ या ने न केवल मेरी बात का बुरा नहीं माना, बल्कि उसने मेरी मदद करने के लिए परमेश्वर के कुछ वचन भी ढूँढ़े। मुझे बहुत शर्मिंदगी और थोड़ा पछतावा महसूस हुआ और मैंने सोचा कि अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए मुझे उसके साथ अच्छी तरह सहयोग करना शुरू करना चाहिए। और हैरानी की बात यह है कि उसी दिन से मेरे पेट का फूलना बंद हो गया। उसके बाद जब मैं सबको सवाल पूछने के लिए शाओ या के इर्द-गिर्द इकट्ठा देखती थी, तो मुझे अब इतना बुरा नहीं लगता था और मैं अपनी बहनों के साथ सामंजस्य के साथ सहयोग करने में सक्षम थी।

चूँकि अपने भ्रष्ट स्वभाव के बारे में मेरी समझ बहुत उथली थी, इसलिए कुछ समय बाद मैं फिर से अपने पुराने ढर्रे पर लौट आई। जब मैंने देखा कि कुछ बहनें सवाल पूछने के लिए हमेशा शाओ या के आस-पास इकट्ठा रहती हैं, तो मेरी रुतबे की इच्छा फिर से सिर उठाने लगी। उस समय एन जिए के मन में कुछ मुद्दों को लेकर शाओ या के खिलाफ पूर्वाग्रह विकसित हो गया था। मुझे समस्या को सुलझाने और उनके बीच की दीवार को खत्म करने में मदद करनी चाहिए थी। लेकिन जब मैं एन जिए के साथ संगति करती हुई दिखती थी, तो असल में मैं अपनी संगति को जानबूझकर शाओ या की कमियाँ गिनाने के अवसर के रूप में इस्तेमाल करती थी। इससे शाओ या के खिलाफ एन जिए का पूर्वाग्रह और भी मजबूत हो गया और उसके बाद एन जिए ने अपनी समस्याओं के लिए शाओ या के पास जाना बंद कर दिया और इसके बजाय मेरे पास आने लगी। हालाँकि शाओ या के आस-पास हमेशा दो बहनें इकट्ठी रहती थीं, इसलिए तुलनात्मक रूप से मैं अभी भी नुकसान में थी। फिर मुझे एक युक्ति सूझी : “अगर मैं उसके सामने अपने अहंकार को दबाने का बस नाटक करूँ और हम ‘सुलह’ कर लें, तो वह मेरे काम का समर्थन करेगी। क्या तब टीम अगुआ के रूप में मेरा रुतबा सुरक्षित नहीं हो जाएगा?” इसलिए मैंने शाओ या से कहा, “देखो, भले ही मैं टीम अगुआ हूँ, लेकिन मैं कई मायनों में तुम्हारे जितनी अच्छी नहीं हूँ। तुम मूल रूप से टीम अगुआ जैसी ही हो, बस तुम्हारे पास पद नहीं है। चलो अब से टीम के काम को अच्छे से पूरा करने के लिए एक साथ सहयोग करते हैं।” उसके बाद मैंने शाओ या के साथ हमारे कर्तव्य से जुड़ी हर बात पर चर्चा करने के लिए पहल की। जब भी उसके पास हमारे कर्तव्य के बारे में कोई विचार या सुझाव होता, तो वह भी पहले मेरी राय माँगने में पहल करती और फिर मैं दूसरी बहनों के साथ बातचीत करती। शाओ या को हर बात पर अपनी ओर से मुझसे सलाह लेते देखकर मैं मन ही मन बहुत खुश हो रही थी। “आखिरकार मैंने अपनी प्रतिद्वंद्वी को अपना अधीनस्थ बना लिया है और सही ढँग से रुतबा जमा लिया है।” और बस इसी तरह हमने लंबे समय तक “सामंजस्यपूर्ण सहयोग” किया। बाद में मेरे कर्तव्य में बदलाव के कारण मैं शाओ या से अलग हो गई।

कुछ ही समय बाद मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा जिसमें यह उजागर किया गया था कि कैसे मसीह-विरोधी असहमत लोगों पर हमला करते हैं और उन्हें अलग-थलग करते हैं और इसने मुझे तुरंत याद दिला दिया कि मैंने पहले कैसा व्यवहार किया था। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “मसीह-विरोधी के पास विरोधियों पर आक्रमण करने और उन्हें अलग करने के लिए बहुत सी तरकीबें और तरीके होते हैं। सार्वजनिक रूप से टकराव और तिरस्कार करने के अलावा उनकी सबसे शक्तिशाली तरकीब में विरोधियों को आकर्षित कर उन्हें साथ मिलाना, अपनी बातें सुनने के लिए मजबूर करना शामिल होता है। अगर विरोधी उनकी बात नहीं सुनते तो मसीह-विरोधी उनका दमन करते हैं, उन्हें दबाते हैं और उन्हें बदनाम करते हैं, ठीक उसी तरह जैसे अविश्वासी अपने राजनीतिक विरोधियों से निपटते हैं। मसीह-विरोधी इतने दुष्ट और क्रूर होते हैं। लेकिन कभी-कभी मसीह-विरोधी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए नरम रुख भी अपनाते हैं। उदाहरण के लिए, अगर कोई ऐसा विरोधी है जिसकी राय उनके साथ मेल नहीं खाती, तो वे यह देखेंगे कि उस व्यक्ति की पसंद क्या है और उसकी कमजोरियाँ क्या हैं और फिर उन्हें झुकाने के लिए हर तरह के नीच तरीकों का उपयोग करेंगे। या फिर वे विनम्रता का दिखावा करेंगे और विरोधी के सामने अपनी गलतियाँ स्वीकार कर लेंगे या फिर वे विरोधी को लाभ पहुँचाने और उन्हें संतुष्ट करने के लिए किसी भी हद तक चले जाएँगे या शायद अपने करीबी दोस्तों के माध्यम से विरोधी को मनाने की कोशिश करेंगे; और फिर वे विरोधी के सामने इस बात का दिखावा करेंगे कि वे सत्य के बारे में संगति कर रहे हैं और कहेंगे : ‘कलीसिया के कार्य के लिए हमारी जोड़ी एकदम सही है; हम भविष्य में इस कलीसिया को आपस में बराबर-बराबर बाँट सकते हैं। भले ही अगुआ मैं हूँ, फिर भी मैं तुम्हारे सारे सुझाव सुनूँगा। बल्कि मैं खुद ही तुम्हारे साथ सहयोग करूँगा।’ यदि विरोधी सत्य नहीं समझता, तो फिर मसीह-विरोधी के लिए उसे अपने पक्ष में करना आसान होगा। जो लोग सत्य समझते हैं वे इसे ठीक से समझ जाएँगे और कहेंगे, ‘यह व्यक्ति तो कोई षड्यंत्रकारी है; वह खुले तौर पर आक्रमण नहीं कर रहा है, बल्कि चाल चल रहा है—किसी कठोर रणनीति के बजाय, प्यार से पेश आ रहा है।’ किसी मसीह-विरोधी के लिए, विरोधी उसके रुतबे और सत्ता के लिए खतरा होता है। कोई भी उनके रुतबे और सत्ता के लिए खतरा बनता है, चाहे कोई भी हो, तो मसीह-विरोधी उसे ‘ठिकाने लगाने’ के लिए किसी भी हद तक चले जाते हैं; अगर इन लोगों को नियंत्रित या भर्ती न किया जा सके, तो मसीह-विरोधी उन्हें सत्ता से गिरा देंगे या बाहर निकाल देंगे। अंततः, मसीह-विरोधी पूर्ण सत्ता पाने का अपना मकसद हासिल कर ही लेंगे और खुद ही कानून बन जाएँगे। ये ऐसी कुछ तरकीबें हैं जिन्हें मसीह-विरोधी अपना रुतबा और सामर्थ्य बनाए रखने के लिए आदतन उपयोग में लाते हैं—वे विरोधियों पर आक्रमण करते हैं और उन्हें अलग कर देते हैं(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद दो : वे विरोधियों पर आक्रमण करते हैं और उन्हें अलग कर देते हैं)। परमेश्वर के वचन पढ़कर मैं हैरान रह गई। क्या यह वही चाल नहीं है जो मैंने उस समय शाओ या पर आजमाई थी? मुझे एहसास हुआ कि जब मैंने उसके सामने अपने अहंकार को दबाने का नाटक किया, तो असल में मैं उसे अपनी तरफ मिलाने की कोशिश कर रही थी, जो कि असहमत लोगों पर हमला करने और उन्हें अलग-थलग करने का एक तरीका है। उस समय के बारे में सोचा तो मैंने देखा कि शाओ या के आस-पास हमेशा बहनें इकट्ठा रहती थीं और हर कोई, चाहे उसे काम की समस्याएँ हों या जीवन प्रवेश में कठिनाइयाँ, उसके पास जाना पसंद करता था। मुझे लगा कि मैं उससे कभी जीत नहीं सकती। इसलिए टीम अगुआ के रूप में अपना रुतबा सुरक्षित करने के लिए मैंने एक नरम तरीका अपनाया। मैंने जानबूझकर उसके सामने खुद को विनम्र दिखाने का नाटक किया और “मैं तुम्हारे जितनी अच्छी नहीं हूँ” और “तुम मूल रूप से एक टीम अगुआ जैसी ही हो” जैसी बातें कहीं। ऊपरी तौर पर मैं बहुत विनम्र दिखाई दी, लेकिन असलियत में मैं उसे अपनी तरफ खींचना चाहती थी, उसे अपनी सहायक बनाना चाहती थी और उससे अपने काम में सहयोग कराना चाहती थी। इस तरह हर कोई मेरे इर्द-गिर्द घूमता। ऊपरी तौर पर लग रहा था कि हममें “सामंजस्य” है, लेकिन इसके पीछे मेरे इरादे बहुत नीच और घिनौने थे और वे परमेश्वर के लिए घृणित हैं। मैंने अविश्वासी दुनिया के उन राजनेताओं के बारे में सोचा जो सत्ता के लिए अपने प्रतिद्वंद्वियों से मुकाबला करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं। वे या तो अपने विरोधियों को बदनाम करते हैं या अपने उपयोग के लिए उन्हें अपनी तरफ मिलाने की खातिर चालें चलते हैं। अपना खुद का रुतबा बचाने के लिए मैंने भी खूब दिमाग खपाया था और कोई भी नीच और घिनौना साधन अपनाने को तैयार थी। यह एक विश्वासी का व्यवहार कैसे हो सकता है? मैं एक छद्म-विश्वासी से अलग नहीं थी! मैं सचमुच बहुत घिनौनी थी!

मैं इस बात पर चिंतन करने लगी कि मुझे हमेशा शाओ या से मुकाबला क्यों करना पड़ता है। इसकी मुख्य वजह यह थी कि मुझे लगता था कि टीम अगुआ के तौर पर मुझे सब में अव्वल होना चाहिए और कोई भी टीम सदस्य मुझसे बेहतर नहीं हो सकता या मुझसे आगे नहीं निकल सकता। फिर मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश देखा : “तुम चाहे जो भी काम करो, यह महत्वपूर्ण हो या न हो, तुम्हें अपनी मदद करने के लिए हमेशा किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत पड़ेगी जो तुम्हें सुझाव और सलाह दे सके या तुम्हारे साथ सहयोग करते हुए काम कर सके। काम को ज्यादा सही ढंग से करने, कम गलतियाँ करने और कम भटकने का यही एकमात्र तरीका है—यह अच्छी बात है। विशेष रूप से परमेश्वर की सेवा करना बहुत बड़ी बात है और अपने भ्रष्ट स्वभाव का समाधान न करना तुम्हें खतरे में डाल सकता है! लोगों में शैतानी स्वभाव होता है और वे कभी भी और कहीं भी परमेश्वर के प्रति विद्रोह कर सकते हैं और उसका विरोध कर सकते हैं। शैतानी स्वभाव के मुताबिक जीने वाले लोग कभी भी परमेश्वर को नकार सकते हैं, उसका विरोध कर सकते हैं और उसे धोखा दे सकते हैं। मसीह-विरोधी बहुत मूर्ख होते हैं, उन्हें इस बात का एहसास नहीं होता और वे सोचते हैं, ‘मैंने बड़ी मुश्किल से सत्ता हथियाई है तो मैं इसे किसी और के साथ क्यों साझा करूँ? इसे दूसरों को सौंपने का मतलब है कि मेरे पास अपने लिए कुछ नहीं बचेगा, है न? बिना सत्ता के मैं अपनी प्रतिभाओं और क्षमताओं को कैसे दिखा पाऊँगा?’ वे नहीं जानते कि परमेश्वर ने लोगों को जो सौंपा है वह सत्ता या रुतबा नहीं बल्कि कर्तव्य है। मसीह-विरोधी केवल सत्ता और रुतबा स्वीकारते हैं, वे अपने कर्तव्यों को दरकिनार कर देते हैं और वास्तविक कार्य नहीं करते। बल्कि वे सिर्फ प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे के पीछे भागते हैं और सिर्फ सत्ता हथियाना चाहते हैं, परमेश्वर के चुने हुए लोगों को नियंत्रित करना चाहते हैं और रुतबे के फायदे उठाने में लगे रहना चाहते हैं। चीजें इस तरह से करना बहुत खतरनाक है—यह परमेश्वर का विरोध करना है! जो लोग अपना कर्तव्य ठीक से निभाने के बजाय सिर्फ प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे के पीछे भागते हैं वे आग से खेल रहे हैं और अपने जीवन से खेल रहे हैं। आग और जीवन से खेलने वाले लोग खुद को कभी भी बर्बाद कर सकते हैं। आज एक अगुआ या कर्मी के तौर पर तुम परमेश्वर की सेवा कर रहे हो, जो कोई सामान्य बात नहीं है। तुम किसी व्यक्ति के लिए काम नहीं कर रहे हो, अपने खर्चे उठाने और रोजी-रोटी कमाने का काम तो बिल्कुल भी नहीं कर रहे हो; बल्कि तुम कलीसिया में अपना कर्तव्य निभा रहे हो। खासकर यह कर्तव्य परमेश्वर के आदेश से मिला है। तो इसे निभाने का क्या अर्थ है? यही कि तुम्हें अपने कर्तव्य के लिए परमेश्वर के प्रति जवाबदेह होना होगा, फिर चाहे तुम इसे अच्छी तरह से निभाओ या न निभाओ; अंततः परमेश्वर को हिसाब देना ही होगा, एक परिणाम होना ही चाहिए। ऐसा इसलिए है कि तुमने जो चीज स्वीकार की है वह परमेश्वर का आदेश है, एक पवित्र जिम्मेदारी है और यह चाहे कितनी भी अहम या छोटी जिम्मेदारी क्यों न हो, यह एक गंभीर चीज है। यह कितनी गंभीर है? छोटे पैमाने पर देखें तो इसमें यह बात शामिल है कि तुम इस जीवन-काल में सत्य प्राप्त कर सकते हो या नहीं और यह भी शामिल है कि परमेश्वर तुम्हें किस तरह देखता है। बड़े पैमाने पर देखें तो यह सीधे तुम्हारी संभावनाओं और नियति से जुड़ी है, तुम्हारे परिणाम से जुड़ी है; यदि तुम दुष्टता करते हो और परमेश्वर का विरोध करते हो तो तुम्हें दोषी ठहराया और दंडित किया जाएगा। अपना कर्तव्य निभाते हुए तुम जो कुछ भी करते हो उसे परमेश्वर द्वारा दर्ज किया जाता है और इसकी गणना और मूल्यांकन करने के लिए परमेश्वर के अपने सिद्धांत और मानक हैं; परमेश्वर तुम्हारा परिणाम तुम्हारे कर्तव्य में तुम्हारे प्रदर्शन की समग्रता के आधार तय करता है। क्या यह कोई गंभीर मामला है? बिल्कुल है! इसलिए अगर तुम्हें कोई काम सौंपा जाता है तो क्या इसे सँभालना तुम्हारा अपना मामला है? (नहीं।) यह कार्य ऐसा नहीं है जो तुम अपने दम पर पूरा कर सको, लेकिन यह जरूरी है कि तुम इसकी जिम्मेदारी लो। यह जिम्मेदारी तुम्हारी है; यह आदेश तुम्हें पूरा करना है। इसका संबंध किस चीज से है? इसका संबंध सहयोग से है, इस बात से है कि सेवा में सहयोग कैसे करें, अपना कर्तव्य निभाने में सहयोग कैसे करें, मिला हुआ आदेश पूरा करने में सहयोग कैसे करें, किस तरह सहयोग करें कि परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चला जाए। इसका संबंध इन सब चीजों से है(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद आठ : वे दूसरों से केवल अपने प्रति समर्पण करवाएँगे, सत्य या परमेश्वर के प्रति नहीं (भाग एक))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैं समझ गई कि जब मेरे भाई-बहनों ने मुझे टीम अगुआ चुना, तो वे मुझे कोई रुतबा नहीं दे रहे थे, बल्कि एक जिम्मेदारी सौंप रहे थे। मुझे सबके साथ सामंजस्य के साथ सहयोग करना चाहिए था और चाहे किसी में भी खूबियाँ हों, मुझे उन्हें उन खूबियों का पूरा इस्तेमाल करने देना चाहिए था। केवल अपनी कमियों को पूरा करने के लिए एक-दूसरे की खूबियों से सीखकर ही हम अपना कर्तव्य पूरा कर सकते थे। उदाहरण के लिए, शाओ या तकनीकी रूप से कुशल थी और अपने जीवन प्रवेश को लेकर भी गंभीर थी। मुझे उसे उसकी खूबियों का और ज्यादा इस्तेमाल करने देना चाहिए था। यह न केवल कलीसिया के कार्य के लिए फायदेमंद होता, बल्कि इससे मुझे अपना कर्तव्य पूरा करने में भी मदद मिलती। लेकिन जब से मैं टीम अगुआ बनी थी, मैंने खुद को एक टीम अगुआ के रुतबे तक ऊँचा उठा लिया था। दिन भर मेरे विचार इस बारे में नहीं होते थे कि अपना कर्तव्य अच्छे से करने के लिए सबके साथ सामंजस्य के साथ सहयोग कैसे करूँ; इसके बजाय मैं अपने खुद के रुतबे और छवि को लेकर ही मगन रहती थी। मैं खुद से आगे निकलने वाले किसी भी व्यक्ति को प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखती और उन्हें दबाने की हर संभव कोशिश करती, यह विचार नहीं करती थी कि क्या मेरे कार्यों से उन्हें नुकसान होगा या हमारे काम की प्रगति प्रभावित होगी। यह अपना कर्तव्य निभाना कैसे हुआ? मैं साफ तौर पर कलीसिया के कार्य में बाधा डाल रही थी! मैंने सोचा कि कैसे बड़े लाल अजगर के देश के अधिकारी कभी अपने अधीनस्थों को खुद से आगे निकलने या अपनी चमक फीकी नहीं करने देते। जैसे ही उन्हें लगता है कि कोई उनके रुतबे के लिए खतरा है, वे उन्हें दबाते हैं और सताते हैं और जब तक उस व्यक्ति को नीचे नहीं गिरा देते, चैन से नहीं बैठते। और कलीसिया में ऐसे मसीह-विरोधी हैं जो रुतबे के लिए संघर्ष करते हैं। वे खुद से बेहतर किसी भी व्यक्ति को अपनी आँखों का काँटा मानते हैं, उन्हें दबाते हैं और अलग-थलग करते हैं, बिना किसी पश्चात्ताप के परमेश्वर के घर के कार्य में गंभीर रूप से बाधा डालते हैं और अंत में उन्हें कलीसिया से निष्कासित कर दिया जाता है। मैंने देखा कि रुतबे के पीछे भागने के अंजाम कितने भयानक थे! टीम अगुआ के रूप में अपने समय के दौरान मैं लगातार शोहरत और लाभ के लिए मुकाबला कर रही थी। भले ही मैंने टीम अगुआ के रूप में अपना रुतबा बनाए रखा, लेकिन मैंने अपना कर्तव्य पूरा नहीं किया। यहाँ तक कि मैंने उन लोगों पर हमला किया और उन्हें अलग-थलग किया जो मुझसे बेहतर थे और कलीसिया के कार्य में बाधा डाली। मेरे पास बस वे अपराध बचे थे जो परमेश्वर के लिए घृणित थे। मुझे इसका सचमुच पछतावा था। अगर समय को पीछे मोड़ा जा सकता, तो काश मैं अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए शाओ या और दूसरों के साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग कर पाती।

बाद में मैंने एक अनुभवजन्य गवाही का वीडियो देखा और उसमें उद्धृत परमेश्वर के वचनों का एक अंश मेरी अवस्था पर बिल्कुल सटीक बैठता था। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “शक्ति और रुतबा हासिल करने के लिए मसीह-विरोधी कलीसिया में सबसे पहले दूसरों का भरोसा और सम्मान जीतने की कोशिश करते हैं, ताकि वे ज्यादा लोगों को कायल कर सकें, उनमें से और ज्यादा लोगों से अपना आदर और अपनी आराधना करा सकें और इस तरह कलीसिया में अंतिम फैसला लेने और शक्ति पाने का अपना लक्ष्य हासिल कर लें। जब शक्ति हासिल करने की बात आती है, वे दूसरे लोगों से होड़ करने और लड़ने में माहिर होते हैं। जो सत्य का अनुसरण करते हैं, जिनके पास कलीसिया में प्रतिष्ठा है और जिनसे भाई-बहन प्रेम करते हैं वे उनके मुख्य विरोधी होते हैं। जो भी व्यक्ति उनके रुतबे के लिए खतरा उत्पन्न करता है वह उनका विरोधी है। वे अपने से शक्तिशाली लोगों से बेधड़क प्रतिस्पर्धा करते हैं; और अपने से कमजोर लोगों से भी बिना किसी दया भाव के प्रतिस्पर्धा करते हैं। उनके दिल होड़ करने और लड़ने के फलसफों से भरे हुए हैं। वे मानते हैं कि अगर लोग लड़ेंगे नहीं और होड़ नहीं करेंगे तो उन्हें कोई लाभ नहीं मिल पाएगा और वे केवल लड़कर और प्रतिस्पर्धा करके ही अपनी मनचाही चीजें हासिल कर सकते हैं। रुतबा हासिल करने और लोगों के समूह में एक प्रमुख स्थान पाने के लिए वे किसी से प्रतिस्पर्धा करने के लिए कुछ भी करते हैं और वे ऐसे किसी भी व्यक्ति को नहीं छोड़ते जो उनके रुतबे के लिए खतरा उत्पन्न करता हो। चाहे वे किसी से भी मिलते-जुलते हों, ये मिलन-जुलन प्रतिस्पर्धा और लड़ाई से भरे होते हैं और वे बूढ़े होने तक प्रतिस्पर्धा और लड़ाई करते रहते हैं। वे अक्सर कहते हैं : ‘अगर मैं उस व्यक्ति से लड़ूँ तो क्या उसे हरा सकूँगा?’ जो कोई भी वाक्पटु है और तर्कसंगत, संरचित और व्यवस्थित ढंग से बोल सकता है, वह उनकी ईर्ष्या और उनकी नकल का लक्ष्य बन जाता है। उससे भी अधिक, वह उनका विरोधी बन जाता है। जो कोई भी सत्य का अनुसरण करता है और आस्था रखता है, अक्सर भाई-बहनों की मदद कर पाता है और उन्हें सहारा दे पाता है और उन्हें नकारात्मकता और कमजोरी से निकलने में सक्षम बनाता है, वह भी उनका विरोधी बन जाता है, इसी तरह जो कोई किसी पेशे में पारंगत है और जिसका भाई-बहन थोड़ा-बहुत सम्मान करते हैं वह भी उनका विरोधी बन जाता है। जो कोई भी अपने काम में नतीजे प्राप्त करता है और ऊपरवाले की स्वीकृति प्राप्त करता है, स्वाभाविक रूप से उनके लिए और भी बड़ा विरोधी बन जाता है। ... यह जरूरी नहीं कि मसीह-विरोधी जहाँ भी हों, वहाँ सबसे ऊँचा स्थान पाना चाहते हों। जब भी वे किसी स्थान पर जाते हैं तो उनके पास एक स्वभाव और एक मानसिकता होती है जो उन्हें इस तरह काम करने के लिए मजबूर करती है। वह मानसिकता क्या है? वह यह है, ‘मुझे प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए! प्रतिस्पर्धा! प्रतिस्पर्धा!’ तीन ‘प्रतिस्पर्धाएँ’ क्यों, एक ही ‘प्रतिस्पर्धा’ क्यों नहीं? (प्रतियोगिता उनका जीवन बन गई है, वे इसी के सहारे जीते हैं।) यह उनका स्वभाव है। वे ऐसे स्वभाव के साथ पैदा हुए थे, जो बेतहाशा अहंकारी है और जिसे नियंत्रित करना मुश्किल है; यानी वे खुद को किसी से भी कम नहीं समझते और बेहद अहंकारी होते हैं। कोई भी उनका यह बेहद अहंकारी स्वभाव कम नहीं कर सकता; वे खुद भी इसे नियंत्रित नहीं कर सकते। इसलिए उनका जीवन लड़ने और प्रतिस्पर्धा करने वाला होता है। वे किसके लिए लड़ते और प्रतिस्पर्धा करते हैं? स्वाभाविक रूप से, वे शोहरत, लाभ, रुतबे, नाम और अपने हितों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। चाहे उन्हें जिन भी तरीकों का इस्तेमाल करना पड़े, अगर हर कोई उनके प्रति समर्पण करता है और अगर उन्हें अपने लिए लाभ और प्रतिष्ठा मिलती है तो उन्होंने अपना लक्ष्य हासिल कर लिया होता है। प्रतिस्पर्धा करने की उनकी इच्छा कोई अस्थायी मनोरंजन नहीं होता; यह एक प्रकार का स्वभाव है, जो शैतानी प्रकृति से आता है। यह बड़े लाल अजगर के स्वभाव जैसा है, जो स्वर्ग से लड़ता है, पृथ्वी से लड़ता है और लोगों से लड़ता है। अब, जब मसीह-विरोधी कलीसिया में दूसरों से लड़ते और प्रतिस्पर्धा करते हैं तो वे क्या चाहते हैं? निस्संदेह, वे प्रतिष्ठा और रुतबे के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। लेकिन अगर वे रुतबा हासिल कर लेते हैं तो इससे उन्हें क्या फायदा होता है? अगर दूसरे उनकी बात सुनते हैं, उनकी प्रशंसा और आराधना करते हैं तो इसमें उनकी क्या भलाई है? खुद मसीह-विरोधी भी इसे स्पष्ट नहीं कर सकते। वास्तव में उन्हें प्रतिष्ठा और रुतबे का आनंद लेना, हर एक का उन्हें देखकर मुस्कुराना और चापलूसी और खुशामद के साथ अपना स्वागत किया जाना पसंद है। इसलिए हर बार जब कोई मसीह-विरोधी कलीसिया जाता है तो वह एक काम करता है : दूसरों से लड़ना और प्रतिस्पर्धा करना। सत्ता और रुतबा प्राप्त करने के बाद भी उनका काम पूरा नहीं होता। अपने रुतबे की सुरक्षा करने और अपनी सत्ता सुरक्षित रखने के लिए वे दूसरों से लड़ते और प्रतिस्पर्धा करते रहते हैं। ऐसा वे मरते दम तक करते हैं। इसलिए मसीह-विरोधियों का फलसफा है, ‘जब तक तुम जीवित हो, लड़ना बंद मत करो।’ अगर इस तरह का कोई बुरा व्यक्ति कलीसिया के भीतर मौजूद है तो क्या इससे भाई-बहन परेशान होंगे? उदाहरण के लिए, मान लो कि हर कोई चुपचाप परमेश्वर के वचन खा-पी रहा है और सत्य पर संगति कर रहा है और माहौल शांतिपूर्ण और मनोदशा खुशनुमा है। ऐसे वक्त पर मसीह-विरोधी असंतोष से उबल रहा होगा। वह सत्य पर संगति करने वालों से ईर्ष्या और घृणा करेगा। वह उन पर आक्रमण करना और उनकी आलोचना करना शुरू कर देगा। क्या इससे शांतिपूर्ण माहौल बिगड़ेगा नहीं? वह एक बुरा व्यक्ति है, जो दूसरों को परेशान करने और उनसे घृणा करने आया है। मसीह-विरोधी ऐसे ही होते हैं। कभी-कभी मसीह-विरोधी उन लोगों को नष्ट या पराजित करने की कोशिश नहीं करते, जिनके साथ वे प्रतिस्पर्धा करते और जिन्हें दबाते हैं; अगर वे प्रतिष्ठा, रुतबा, अभिमान और गौरव हासिल कर लेते हैं और लोगों से अपनी प्रशंसा करवा लेते हैं तो उन्होंने अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया होता है। प्रतिस्पर्धा करते हुए वे एक प्रकार का स्पष्ट शैतानी स्वभाव दिखाते हैं। यह कैसा स्वभाव है? यही कि चाहे वे किसी भी कलीसिया में क्यों न हों, वे हमेशा दूसरे लोगों के साथ प्रतिस्पर्धा और लड़ाई करना चाहते हैं, वे हमेशा शोहरत, लाभ और रुतबे के लिए प्रतिस्पर्धा करना चाहते हैं और जब कलीसिया में अव्यवस्था और उथल-पुथल मच जाती है, जब वे रुतबा हासिल कर लेते हैं और हर कोई उनके आगे झुकता है, केवल तभी उन्हें लगता है कि उन्होंने अपना लक्ष्य हासिल कर लिया है। यह मसीह-विरोधियों की प्रकृति है यानी वे अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए प्रतिस्पर्धा और लड़ाई का रास्ता अपनाते हैं(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग तीन))। परमेश्वर के वचनों से मैंने समझा कि प्रतिष्ठा और रुतबे की खातिर दूसरों के साथ लगातार लड़ना और कलीसिया को घोर अव्यवस्था में डालना, मसीह-विरोधियों के रास्ते पर चलना है, जिन्हें परमेश्वर द्वारा दोषी ठहराया जाता है और हटा दिया जाता है। पीछे मुड़कर देखूँ, तो मैं हमेशा मानती थी कि टीम अगुआ के रूप में टीम में मेरा रुतबा सबसे ऊँचा होना चाहिए और सबको मेरे इर्द-गिर्द घूमना चाहिए। जब मैंने सबको सवाल पूछने के लिए शाओ या के इर्द-गिर्द इकट्ठा देखा, तो मुझे लगा कि उसने मेरा रुतबा चुरा लिया है। मैं “सिर्फ एक अल्फा पुरुष हो सकता है” वाले शैतानी जहर से नियंत्रित थी। मैंने हर मोड़ पर शाओ या को निशाना बनाया और यहाँ तक कि एन जिए और उसके बीच पीठ पीछे झगड़े भी करवा दिए। जब मुझे आखिरकार एहसास हुआ कि मैं जीत नहीं सकती, तो मैंने शाओ या को अपनी तरफ खींच लिया। ऊपरी तौर पर मैंने इसे सहयोग कहा, लेकिन असलियत में मैं चाहती थी कि वह मेरी बात सुने और मेरे इस्तेमाल में आए, ताकि हर कोई मेरे इर्द-गिर्द घूमे। इस तरह मैं टीम अगुआ के रूप में अपना पद सुरक्षित कर सकती थी। शोहरत और लाभ की अपनी लड़ाई में मैंने न केवल शाओ या को चोट पहुँचाई, बल्कि दूसरी बहनों को भी बेबस महसूस कराया जिससे वे काम पर चर्चा करते समय खुलकर नहीं बोल पाती थीं और इससे काम की प्रगति प्रभावित हुई। मुझे टीम अगुआ चुने जाने की पूरी वजह यह थी कि मैं अपना कर्तव्य पूरा करने में सबकी अगुआई करूँ, लेकिन इसके बजाय मैं पूरी तरह रुतबे के लिए मुकाबला करने में व्यस्त रही, जलन और विवाद भड़काती रही, पीठ पीछे दूसरों की आलोचना करती रही और अपनी बहनों के बीच फूट डालती रही। मैंने टीम को घोर अव्यवस्था में डाल दिया। क्या मैं बस शैतान के एक सेवक के रूप में काम नहीं कर रही थी? मैंने खुद को एक बदबूदार मक्खी के रूप में देखा जो लोगों के दिलों को परेशान करती है और हर किसी को तंग करती है। मैंने सत्य का अनुसरण करने और उद्धार पाने के लिए अपना कर्तव्य निभाने की खातिर अपना परिवार और करियर त्याग दिया था। फिर भी मैंने रुतबे के अनुसरण को सबसे महत्वपूर्ण माना और लगातार शोहरत और लाभ के लिए लड़ती रही। नतीजतन, मैंने कलीसिया के कार्य को बाधित और अस्त-व्यस्त किया और बिना रत्ती भर भी जानकारी के मसीह-विरोधी के रास्ते पर चल पड़ी। मैं जितना इस बारे में सोचा, मुझे उतना ही बुरा लगा। मैंने पौलुस के बारे में सोचा। उस समय जब उसने विश्वासियों के बीच पतरस की उच्च प्रतिष्ठा देखी, तो उसे जलन हुई। भले ही वह अच्छी तरह जानता था कि पतरस ही वह व्यक्ति है जिसे प्रभु यीशु ने कलीसिया की चरवाही करने के लिए नियुक्त किया था, फिर भी उसने पतरस को नीचा दिखाने और खुद के उत्कर्ष के लिए हर मुमकिन कोशिश की, यह कहा कि वह प्रेरितों का प्रधान है, ताकि हर कोई उसका आदर करे और उसकी सराहना करे। बाद में वह हठपूर्वक पश्चात्ताप न करने पर अड़ा रहा और यहाँ तक कि उसने रुतबे के लिए परमेश्वर से होड़ करने की कोशिश की, बेशर्मी से यह कहा कि उसके लिए जीवित रहना ही मसीह है। उसने परमेश्वर के स्वभाव का गंभीर अपमान किया और परमेश्वर द्वारा उसे दंडित किया गया। मैं पौलुस के ही रास्ते पर चल रही थी। अगर मैंने पश्चात्ताप नहीं किया, तो मुझे भी उसकी तरह परमेश्वर द्वारा घृणित माना जाएगा और निकाल दिया जाएगा।

बाद में मुझे परमेश्वर के वचनों में अभ्यास का एक मार्ग मिला। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “तुम्‍हें इन चीजों को त्यागना और छोड़ देना सीखना चाहिए, अच्छे अवसर आने पर दूसरों की अनुशंसा करना और उन्हें विशिष्ट बनने देना सीखना चाहिए। विशिष्‍ट बनने और चमकने के अवसर सामने आने पर उनके लिए होड़ या प्रतिस्पर्धा मत करो। तुम्‍हें अपने निजी हितों को त्याग देने में अवश्य ही सक्षम होना चाहिए, लेकिन तुम्‍हें अपने कर्तव्य के निर्वहन में देरी नहीं करनी चाहिए। ऐसा व्यक्ति बनो जो गुमनामी में काम करता है, दिखावा नहीं करता है और समर्पित होकर अपना कर्तव्य निभाता है। तुम अपने आत्मसम्मान और रुतबे को जितना अधिक त्याग दोगे, अपने हितों को जितना अधिक त्याग दोगे, उतनी ही अधिक शांति महसूस करोगे, तुम्‍हारे दिल में उतनी ही अधिक रोशनी होगी और तुम्‍हारी दशा बेहतर हो जाएगी। तुम जितना अधिक होड़ और प्रतिस्पर्धा करोगे, तुम्‍हारी दशा उतनी ही अधिक अंधकारमय होती जाएगी। अगर तुम्‍हें मुझ पर विश्वास नहीं है, तो इसे आजमाकर देखो! अगर तुम इस तरह की भ्रष्ट दशा को पूरी तरह बदलना चाहते हो और प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे से नियंत्रित होना नहीं चाहते तो तुम्‍हें अवश्य ही सत्य खोजना चाहिए, प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे के सार की असलियत देखनी चाहिए और फिर इन्हें छोड़ देना और त्याग देना चाहिए(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्यागकर ही आजादी और मुक्ति पाई जा सकती है)। “अपने आचरण के संबंध में तुम लोगों के क्‍या सिद्धांत हैं? तुम्हें अपने पद के अनुसार अपना आचरण करना चाहिए, अपना उचित स्‍थान खोजना चाहिए और जो कर्तव्य तुम्हें निभाना चाहिए उसे अच्छी तरह निभाओ; केवल इसी तरह से तुम एक विवेकशील व्यक्ति बनते हो। उदाहरण के तौर पर, अगर तुम कुछ पेशेवर कौशलों में निपुण हो और सिद्धांतों की अच्छी समझ रखते हो तो तुम्हें अपनी जिम्मेदारी लेनी चाहिए और उस क्षेत्र में समुचित जाँच करनी चाहिए; अगर तुम अपने विचार और अंतर्दृष्टियाँ प्रदान कर सकते हो, दूसरों को अपने कर्तव्य बेहतर तरीके से निभाने के लिए प्रेरित कर सकते हो तो तुम्हें विचार प्रदान करने चाहिए। यदि तुम अपने लिए सही स्थान खोज सकते हो और अपने भाई-बहनों के साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग कर सकते हो तो तुम अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभा रहे होगे—अपने पद के अनुसार आचरण करने का यही अर्थ है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, व्यक्ति के स्व-आचरण का मार्गदर्शन करने वाले सिद्धांत)। उसके वचन पढ़ने के बाद मैं समझ गई कि अगर मैं अपनी झूठी इज्जत और रुतबे की बाधाओं और बंधनों से मुक्त होना चाहती हूँ, तो मुझे इन चीजों को त्यागना और छोड़ना सीखना होगा और अपने कर्तव्य को सबसे पहले रखना होगा। चाहे किसी में भी खूबियाँ हों, मुझे उन्हें उन खूबियों का पूरा इस्तेमाल करने देना चाहिए, ताकि हम अपनी कमियों को पूरा करने के लिए एक-दूसरे से सीख सकें और अपना कर्तव्य पूरा कर सकें। यह कलीसिया के कार्य और भाई-बहनों के जीवन प्रवेश, दोनों के लिए फायदेमंद होगा और मैं भी अपनी कमियों को दूर करने के लिए दूसरों की खूबियों से सीख सकूँगी। यह समझकर मैंने खुद से कहा : अब से मैं चाहे कोई भी कर्तव्य करूँ, जब भी मेरा सामना ऐसे भाई-बहनों से होगा जो मुझसे बेहतर हैं, तो मुझे उनसे और सीखना होगा और उनके साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग करना होगा।

2025 में मैं पाठ-आधारित कर्तव्य पर ली बिंग और सु टिंग के साथ सहयोग कर रही थी। जब मैंने ली बिंग को अक्सर सु टिंग से लेखों की छँटाई के सिद्धांतों के बारे में पूछते देखा, तो मुझे थोड़ी बेचैनी महसूस हुई। “मैं भी वे सिद्धांत जानती हूँ। क्या ली बिंग को लगता है कि मैं सु टिंग जितनी अच्छी नहीं हूँ, इसलिए उसने मुझसे पूछने के बारे में सोचा तक नहीं?” मुझे एहसास हुआ कि मेरी जलन फिर से सिर उठा रही है और मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा : “हमेशा अपने लिए कार्य मत करो, हमेशा अपने हितों की मत सोचो, अपने गौरव, प्रतिष्ठा और रुतबे पर विचार मत करो और अपने निजी हितों पर विचार मत करो। तुम्‍हें सबसे पहले परमेश्वर के घर के हितों पर विचार करना चाहिए और उन्‍हें अपनी प्राथमिकता बनाना चाहिए। तुम्‍हें परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होना चाहिए और सबसे पहले यह चिंतन करना चाहिए कि तुम्‍हारे कर्तव्‍य निर्वहन में अशुद्धियाँ रही हैं या नहीं, तुम समर्पित रहे हो या नहीं, तुमने अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी की हैं या नहीं, और अपना सर्वस्व दिया है या नहीं, साथ ही तुम अपने कर्तव्य, और कलीसिया के कार्य के प्रति पूरे दिल से विचार करते रहे हो या नहीं। तुम्‍हें इन चीजों के बारे में अवश्‍य विचार करना चाहिए। अगर तुम इन पर बार-बार विचार करते हो और इन्हें समझ लेते हो, तो तुम्‍हारे लिए अपना कर्तव्‍य अच्‍छी तरह से निभाना आसान हो जाएगा(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्यागकर ही आजादी और मुक्ति पाई जा सकती है)। सु टिंग हम सब में सबसे लंबे समय से यह कर्तव्य कर रही थी और उसे सिद्धांतों पर बेहतर पकड़ थी। अगर उसने ज्यादा संगति की, तो हम सभी को ज्यादा लाभ मिल सकता था, जो अपना कर्तव्य अच्छी तरह करने में हमारे लिए फायदेमंद होता। इसके अलावा जब तक कि समस्या हल होती है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि मेरे भाई-बहन किससे पूछते हैं। उस बेकार के रुतबे के लिए मुकाबला करने की कोई जरूरत नहीं थी; मुझे अपने कर्तव्य को सबसे पहले रखना था। जब मैंने इस तरह सोचा, तो मुझे अब उतना बुरा नहीं लगा। बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करने पर ध्यान केंद्रित किया। जब भी मैं किसी भाई या बहन को किसी क्षेत्र में मुझसे बेहतर देखती, तो मैं उससे सीखने को अहमियत देती, ताकि हम एक-दूसरे की खूबियों का लाभ उठा सकें और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करने के लिए सहयोग कर सकें। धीरे-धीरे मुझे लगा कि मैं ज्यादा खुले विचारों वाली हो गई हूँ और अब मैं अपनी झूठी शान और रुतबे से उतनी बाधित नहीं थी। मेरी अवस्था बेहतर होती गई। मैंने गहराई से महसूस किया है कि शोहरत और लाभ के लिए मुकाबला करना अर्थहीन है और यह इंसान को सिर्फ दर्द और दमन में जीने पर मजबूर करता है। केवल सत्य का अनुसरण करने और अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाने का ही वास्तविक महत्व और अर्थ होता है।

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