22. अब मैं अपनी कमजोर काबिलियत के कारण खुद से हार नहीं मानती

सू यान, चीन

नवंबर 2023 में, मैंने धर्मोपदेशों का मूल्यांकन और चयन करने का कर्तव्य निभाना शुरू किया। यह सोचकर कि जब मैं अगुआ हुआ करती थी तो कैसे मुझे कमजोर काबिलियत होने और वास्तविक कार्य न कर पाने के कारण बरखास्त कर दिया गया था, मैं जानती थी कि मेरे लिए यह पाठ-आधारित कर्तव्य निभा पाना परमेश्वर द्वारा मेरा उन्नयन और मुझ पर अनुग्रह था। अपनी कमजोर काबिलियत के बावजूद मैं सहयोग के लिए भरसक प्रयास करने को तैयार थी, इसलिए बाद में, मैंने सक्रिय रूप से सिद्धांतों का अध्ययन किया। मैंने देखा कि दूसरे सारे भाई-बहन सीखे हुए सिद्धांतों को अपने कर्तव्यों में लागू कर सकते थे और कुछ समय बाद उन सबने प्रगति की। मैंने वाकई उन्हें सराहा। लेकिन फिर मैंने खुद को देखा : सिद्धांतों का अध्ययन करते समय मैं इन्हें समझ तो जाती थी, लेकिन जब इन्हें असल में लागू करने की बात आती थी तो मैं न कड़ियों को जोड़ पाती थी, न ही सिद्धांतों को लचीले ढंग से लागू कर पाती थी। मेरे चुने हुए धर्मोपदेशों में हमेशा विचलन और समस्याएँ होती थीं। मैंने मन में सोचा, “मेरी काबिलियत बहुत ही कमजोर है। ऐसा लगता है कि केवल अच्छी काबिलियत वाले और बातों को जल्दी समझने वाले ही इस कर्तव्य को अच्छी तरह से निभा सकते हैं। अतीत में, एक अगुआ के रूप में मैं कार्य के कई पहलुओं के लिए जिम्मेदार थी, लेकिन अपनी कमजोर काबिलियत और कार्यक्षमता की कमी के कारण मुझे अपने कर्तव्य में नतीजे नहीं मिले। अब, मैंने सिर्फ धर्मोपदेशों के मूल्यांकन के इस एक काम का अध्ययन किया है, और अब भी कोई नतीजा हासिल नहीं हुआ है। अगर मैं इस कर्तव्य को भी अच्छी तरह से नहीं कर सकी, तो मुझे डर है कि मैं उद्धार पाने का मौका खो दूँगी।” जैसे ही मैंने यह सोचा, मैंने अध्ययन करने की सारी प्रेरणा खो दी। मुझे लगा कि मेरी कमजोर काबिलियत को देखते हुए अध्ययन करना बेकार है। उसके बाद, मैं बस अपने कर्तव्य में खानापूर्ति करने लगी, और अब सिद्धांतों में मेहनत नहीं करना चाहती थी; मेरे चुने हुए धर्मोपदेशों में भी अक्सर समस्याएँ होती थीं। बाद में, अगुआ ने मेरी मदद के लिए बहन झाओ यिंग की व्यवस्था की। मैं उससे गंभीरतापूर्वक सीखना चाहती थी और जल्द से जल्द सिद्धांतों में महारत हासिल करना चाहती थी ताकि अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाऊँ। लेकिन जब मैंने देखा कि झाओ यिंग की काबिलियत कितनी अच्छी है, और वह बातों को कितनी जल्दी समझ जाती है, सिद्धांतों को अभ्यास में लाने में सक्षम है, और अपने कर्तव्य में अच्छे नतीजे पा रही है, और फिर मैंने खुद को देखा—कमजोर काबिलियत, बातों को देर से समझने वाली, और अपने कर्तव्य में खराब नतीजे पाने वाली— मैंने मन में सोचा, “अपनी जैसी काबिलियत के होते हुए क्या मैं यह कर्तव्य वास्तव में अच्छी तरह से निभा सकती हूँ? अगर मैं ऐसा नहीं कर सकती हूँ और मुझे हटा दिया जाता है तो क्या मैं उद्धार पाने का मौका नहीं खो दूँगी?” इस विचार पर, मैं मन ही मन कुड़कुड़ाने लगी, “परमेश्वर, तुमने हम सभी को बनाया है। तुमने दूसरों को इतनी अच्छी काबिलियत और मुझे इतनी कमजोर काबिलियत क्यों दी?” मैंने जितना इस तरह सोचा, मेरा दिल उतना ही अधिक अंधकारमय होता गया। यह एहसास होने पर कि मैं परमेश्वर के बारे में शिकायत कर रही हूँ, मैंने इस बारे में और आगे सोचने की हिम्मत नहीं की और परमेश्वर से अपने दिल की रक्षा करने की विनती की। बाद में, झाओ यिंग ने मेरे धर्मोपदेश मूल्यांकन में हुए विचलनों के बारे में मेरे साथ संगति की। जब उसने एक-एक करके मेरी कमियाँ बताईं, तो मैं और भी हताश हो गई। मुझे लगा कि मैं कई महीनों से यह कर्तव्य कर रही थी लेकिन अब भी इसमें इतनी सारी समस्याएँ थीं। मेरी काबिलियत सचमुच मानक स्तर की नहीं थी। जब हम सिद्धांतों का अध्ययन कर रहे थे, तो झाओ यिंग ने मुझे संगति करने के लिए कहा, लेकिन मैंने सोचा कि अपनी काबिलियत के साथ, अगर मैंने संगति की भी तो बाद में उसे लागू नहीं कर पाऊँगी, इसलिए मैंने बस अनमने ढंग से कुछ शब्द कह दिए। नतीजतन, मुझे दो दिनों के अध्ययन से कुछ भी हासिल नहीं हुआ। मुझे एहसास हुआ कि मेरी दशा गलत है, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, मुझे हमेशा लगता है कि मेरी काबिलियत कमजोर है, और अगर मैं यह कर्तव्य अच्छी तरह से न निभा सकी, तो मुझे बरखास्त कर दिया जाएगा और हटा दिया जाएगा। मैं इन नकारात्मक भावनाओं में फँसी हुई हूँ और बाहर नहीं निकल सकती हूँ। प्रिय परमेश्वर, मैं विनती करती हूँ कि तुम मुझे प्रबुद्ध करो और मार्गदर्शन दो।” बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा : “अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाने की क्षमता केवल व्यक्ति की काबिलियत पर निर्भर नहीं करती, बल्कि मुख्य रूप से अपने कर्तव्य के प्रति उसके रवैये, उसके चरित्र, उसकी मानवता अच्छी है या बुरी, और क्या वे सत्य स्वीकारने में सक्षम हैं, इस पर निर्भर करती है। ये मूल मुद्दे हैं(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, कर्तव्य के उचित निर्वहन के लिए सामंजस्यपूर्ण सहयोग आवश्यक है)। परमेश्वर कहता है कि कोई अपना कर्तव्य अच्छी तरह से कर सकता है या नहीं, यह पूरी तरह से उसकी काबिलियत पर निर्भर नहीं करता, बल्कि मुख्य रूप से अपने कर्तव्य के प्रति उसके रवैये पर और इस बात पर निर्भर करता है कि क्या वह सत्य स्वीकार कर सकता है। किसी व्यक्ति की काबिलियत कैसी है यह परमेश्वर द्वारा पूर्व-नियत है। अगर वह अपने कर्तव्य में भरसक कोशिश करता है और सिद्धांतों के अनुसार कार्य करता है तो वह परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होगा। लेकिन फिर मैंने अपने कर्तव्य के प्रति अपना ही रवैया देखा : जब मेरे धर्मोपदेश के मूल्यांकनों में बहुत सारे विचलन होते थे, तो मैं मुश्किलों से पार पाने के तरीकों के लिए अपना दिमाग नहीं खपाती थी। इसके बजाय, मैं नकारात्मक हो जाती थी और खुद के बारे में फैसला सुना देती थी। मुझे लगता था कि जो मुझे सीखना चाहिए था वह मैं पहले ही सीख चुकी हूँ, अपनी काबिलियत के चलते मैं सिद्धांतों में कभी महारत हासिल नहीं कर पाऊँगी या अपना कर्तव्य अच्छी तरह से नहीं कर पाऊँगी, फिर चाहे मैं कितनी भी कोशिश कर लूँ। इसलिए, मैंने प्रयास करने की इच्छा छोड़ दी। इस बारे में सोचती हूँ तो ये किसी ऐसे व्यक्ति की अभिव्यक्तियाँ नहीं थीं जो सत्य को स्वीकार करता है। अगर मैंने प्रयास न किया तो पवित्र आत्मा मेरा मार्गदर्शन करने के लिए कार्य नहीं कर सकता था और मैं निश्चित रूप से अपना कर्तव्य अच्छी तरह से नहीं कर पाती।

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और अपनी समस्या के बारे में कुछ और समझ हासिल की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “कुछ लोगों को लगता है कि उनमें बहुत कम काबिलियत है और उनमें समझने की क्षमता नहीं है, इसलिए वे अपने बारे में फैसला सुना देते हैं, उन्हें लगता है कि वे चाहे कितना भी सत्य का अनुसरण कर लें, परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर सकते। वे सोचते हैं कि चाहे वे कितनी भी कोशिश कर लें, सब बेकार है, और इसमें बस इतना ही है, इसलिए वे हमेशा नकारात्मक होते हैं, परिणामस्वरूप, बरसों परमेश्वर में विश्वास रखकर भी, उन्हें सत्य प्राप्त नहीं होता। सत्य का अनुसरण करने के लिए कड़ी मेहनत किए बिना, तुम कहते हो कि तुम्हारी काबिलियत बहुत खराब है, तुम हार मान लेते हो और हमेशा एक नकारात्मक स्थिति में रहते हो। नतीजतन उस सत्य को नहीं समझते जिसे तुम्हें समझना चाहिए या जिस सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हो, उसका अभ्यास नहीं करते—क्या तुम अपने लिए बाधा नहीं बन रहे हो? यदि तुम हमेशा यही कहते रहो कि तुममें पर्याप्त काबिलियत नहीं है, क्या यह अपनी जिम्मेदारी से बचना और जी चुराना नहीं है? यदि तुम कष्ट उठा सकते हो, कीमत चुका सकते हो और पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकते हो, तो तुम निश्चित ही कुछ सत्य समझकर कुछ वास्तविकताओं में प्रवेश कर पाओगे। यदि तुम परमेश्वर की ओर नहीं देखते, उस पर निर्भर नहीं रहते और बिना कोई प्रयास किए या कीमत चुकाए बस हार मान लेते हो और समर्पण कर देते हो, तो तुम किसी काम के नहीं हो, तुममें अंतरात्मा और विवेक का जरा-सा भी अंश नहीं है। चाहे तुम्हारी काबिलियत खराब हो या अत्युत्तम हो, यदि तुम्हारे पास थोड़ा-सा भी जमीर और विवेक है, तो तुम्हें वह ठीक से पूरा करना चाहिए, जो तुम्हें करना है और जो तुम्हारा मिशन है; कर्तव्य छोड़कर भागना एक भयानक बात है और परमेश्वर के साथ विश्वासघात है। इसे सही नहीं किया जा सकता। सत्य का अनुसरण करने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है, और जो लोग बहुत अधिक नकारात्मक या कमजोर होते हैं, वे कुछ भी संपन्न नहीं करेंगे। वे अंत तक परमेश्वर में विश्वास नहीं कर पाएँगे, और, यदि वे सत्य को प्राप्त करना चाहते हैं और स्वभावगत बदलाव हासिल करना चाहते हैं, तो उनके लिए अभी भी उम्मीद कम है। केवल वे, जो दृढ़-संकल्प वाले हैं और सत्य का अनुसरण करते हैं, ही उसे प्राप्त कर सकते हैं और परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जा सकते हैं(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर ने जो उजागर किया वही बिल्कुल मेरी दशा थी। मैं भाई-बहनों को अपने कर्तव्यों में अपने सीखे हुए सिद्धांत लागू करते और अच्छे नतीजे हासिल करते देखती थी। लेकिन मेरे अध्ययन करने के बाद, न केवल मैंने सुधार नहीं किया, बल्कि मुझमें लगातार विचलन और समस्याएँ भी होती रहीं। नतीजतन, मैंने अपने बारे में यह फैसला दे दिया कि मैं कमजोर काबिलियत वाली हूँ और बातों को देर से समझती हूँ, मैं नकारात्मक भावनाओं के बीच जीती रही और सिद्धांतों पर मेहनत करने की अनिच्छुक थी। अगुआ ने मेरा मार्गदर्शन करने के लिए झाओ यिंग की व्यवस्था की थी, जो मेरे लिए भी फायदेमंद था और कार्य के लिए भी। लेकिन जब मैंने देखा कि उसकी काबिलियत अच्छी है, वह सिद्धांतों को जल्दी समझ लेती है, और अपने कर्तव्य में नतीजे हासिल करती है, तो मैंने अपनी कमियों की भरपाई करने के लिए उसकी खूबियों से नहीं सीखा। इसके बजाय, मैंने परमेश्वर को दोष दिया कि उसने मुझे अच्छी काबिलियत नहीं दी है और अपने बारे में यह फैसला दिया कि अपनी कमजोर काबिलियत के कारण मैं कुछ भी अच्छी तरह से करने में अक्षम हूँ। मैं अपने कर्तव्य के लिए प्रेरणा खो बैठी और अब सिद्धांतों पर विचार करने में मेहनत करने को तैयार नहीं थी। मैंने देखा कि मैं बहुत नाजुक थी और मुझमें दृढ़ता की कमी थी—मैं एक बेकार की डरपोक थी। अच्छी मानवता वाले लोग परमेश्वर के इरादों का ध्यान रखते हैं और अपने कर्तव्य के प्रति जिम्मेदारी की भावना रखते हैं। मुश्किलों का सामना करने पर भी, वे नकारात्मक नहीं होते, ढिलाई नहीं बरतते, या खुद से हार नहीं मानते। वे अपनी कुंठाएँ अपने कर्तव्य पर नहीं उतारते हैं, परमेश्वर से बहस करने और उसे गलत समझने की तो बात ही दूर है। लेकिन मैंने अपने बारे में ही फैसला दे दिया, यह मान लिया कि मैं चाहे कितनी भी कोशिश कर लूँ, अपनी कमजोर काबिलियत के चलते मैं अपना कर्तव्य कभी भी अच्छी तरह से नहीं निभा सकती हूँ। मैं सिद्धांतों का अध्ययन करने के लिए भी अनिच्छुक थी और अपना कर्तव्य अनमने ढंग से निभाती थी, बस खानापूर्ति कर रही थी। इस कारण मेरे धर्मोपदेश के मूल्यांकन में बहुत सारे विचलन हुए और समस्याएँ आईं, जिससे कार्य में देरी हुई। परमेश्वर ने मुझे इतना सत्य प्रदान किया और मेरी मदद के लिए भाई-बहनों की व्यवस्था की, लेकिन अपने कर्तव्य में मैं अधूरा दिल लगाती थी और गैर-जिम्मेदारी दिखाती थी। जब मुझे मुश्किलें आती थीं, तो मैं एक भगोड़े की तरह पेश आती थी। मैं सचमुच परमेश्वर के वचनों को खाने, पीने और उनका आनंद लेने के अयोग्य थी। अगर मैं ऐसे ही चलती रहती, तो मुझे सचमुच निकाल दिया जाता। इस बारे में सोचते हुए, मुझे एहसास हुआ कि मैं अब अपने कर्तव्य के साथ इतने नकारात्मक और निष्क्रिय ढंग से पेश नहीं आ सकती हूँ : मुझे इसे उचित रूप से निभाने के लिए भरसक कोशिश करनी थी। धीरे-धीरे, मुझे अपने कर्तव्य में थोड़ी-सी राह मिलने लगी और मैं कुछ नतीजे हासिल करने में कामयाब रही।

एक दिन, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और परमेश्वर के इरादों के बारे में कुछ समझ हासिल की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “‘भले ही मेरी योग्यता खराब है, लेकिन मेरे पास एक ईमानदार दिल है।’ ये शब्द काफी सच्चे लगते हैं और इनमें वह अपेक्षा शामिल है जो परमेश्वर लोगों से करता है। कैसी अपेक्षा? यही कि खराब योग्यता का होना कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन व्यक्ति के पास ईमानदार हृदय होना चाहिए और यदि उसके पास यह है, तो वह परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करने में सक्षम होगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारी स्थिति या पृष्ठभूमि क्या है, तुम्हें एक ईमानदार व्यक्ति होना चाहिए, ईमानदारी से बोलना चाहिए, ईमानदारी से कार्य करना चाहिए, पूरे हृदय और मस्तिष्क से अपना कर्तव्य निभाने में सक्षम होना चाहिए, अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित होना चाहिए, धूर्तता नहीं करनी चाहिए, चालाक या कपटी व्यक्ति नहीं बनना चाहिए, न झूठ बोलना, न धोखा देना चाहिए और घुमा-फिरा कर बात नहीं करनी चाहिए। तुम्हें सत्य के अनुसार कार्य करना चाहिए और ऐसा व्यक्ति बनना चाहिए जो सत्य का अनुसरण करे। बहुत-से लोगों को लगता है कि उनमें कम योग्यता है और वे अपना कर्तव्य अच्छी तरह से या मानक के अनुरूप नहीं करते हैं। वे जो करते हैं उसमें अपना दिल और ताकत लगा देते हैं, लेकिन वे सिद्धांतों को कभी भी समझ नहीं पाते हैं, और अभी बहुत अच्छे परिणाम नहीं दे पाते हैं। अंततः वे केवल यह शिकायत कर पाते हैं कि उनकी योग्यता बहुत खराब है और वे नकारात्मक हो जाते हैं। तो, क्या जब किसी व्यक्ति की योग्यता कम हो तो आगे बढ़ने का कोई रास्ता नहीं है? कम योग्यता होना कोई घातक बीमारी नहीं है, और परमेश्वर ने कभी नहीं कहा कि वह कम योग्यता वाले लोगों को नहीं बचाता। परमेश्वर ने पहले कहा था कि उसे उन लोगों के लिए दुख होता है जो ईमानदार लेकिन अज्ञानी हैं। अज्ञानी होने का क्या मतलब है? कई मामलों में अज्ञानता कम योग्यता के कारण आती है। ऐसे लोगों में योग्यता कम होती है और उन्हें सत्य की सतही समझ होती है; यह विशिष्ट या पर्याप्त व्यावहारिक नहीं होती और अक्सर सतही स्तर की या शब्दों, धर्म-सिद्धांतों और विनियमों की समझ बनी रहती है। इसीलिए वे कई समस्याओं को स्पष्ट रूप से देख नहीं पाते हैं, और अपने कर्तव्य निभाते समय कभी भी सिद्धांतों को नहीं समझ पाते हैं या अपने कर्तव्य अच्छी तरह नहीं निभा पाते हैं। तो क्या परमेश्वर कम योग्यता वाले लोगों को नहीं चाहता? (वह चाहता है।) परमेश्वर लोगों को कैसा मार्ग और दिशा दिखाता है? (एक ईमानदार व्यक्ति बनने का।) क्या ऐसा कहने मात्र से तुम एक ईमानदार व्यक्ति बन सकते हो? (नहीं, हममें एक ईमानदार व्यक्ति की अभिव्यक्तियाँ होनी चाहिए।) एक ईमानदार व्यक्ति की अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? सबसे पहले, परमेश्वर के वचनों के बारे में कोई संदेह नहीं होना। यह ईमानदार व्यक्ति की अभिव्यक्तियों में से एक है। इसके अलावा, सबसे महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति है सभी मामलों में सत्य की खोज और उसका अभ्यास करना—यह सबसे महत्वपूर्ण है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचनों से, मैं समझ गई कि कमजोर काबिलियत होना कोई घातक कमी नहीं है। परमेश्वर ने कभी नहीं कहा कि कमजोर काबिलियत वाले लोग उद्धार नहीं पा सकते। परमेश्वर की लोगों से उनकी अलग-अलग काबिलियत के आधार पर अलग-अलग माँगें होती हैं। जब तक कोई व्यक्ति अपने कर्तव्य के साथ ईमानदार दिल से पेश आ सकता है, जितने सत्य को समझता है उतने का अभ्यास कर सकता है और अपने कर्तव्य में भरसक प्रयास कर सकता है, परमेश्वर उसे नहीं निकालेगा। यह एक तथ्य है कि मेरी काबिलियत कमजोर है, कि जब सिद्धांतों की बात आती है तो मैं एक बात से दूसरी बात नहीं समझ पाती, और यह कि मेरी समझने की क्षमता मेरी बहन जितनी अच्छी नहीं है। लेकिन ऐसा नहीं है कि मैं कतई किसी सिद्धांत को नहीं समझ सकती हूँ; मैं बस थोड़ी धीमी हूँ। इसलिए, मुझे परमेश्वर से और प्रार्थना करनी चाहिए और उसके वचनों पर विचार करने में और अधिक मेहनत करनी चाहिए। जब बहनें मेरे धर्मोपदेश मूल्यांकन में समस्याएँ इंगित करती हैं, तो मुझे उन मसलों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और अपनी कमियों की भरपाई के लिए सिद्धांतों का अध्ययन करना चाहिए। तेजी से प्रगति करने का यही तरीका है। यह परमेश्वर का प्रेम है, सिर्फ मेरे लिए एक खास कृपा! परमेश्वर के इरादों को समझने के बाद, मैं अब नकारात्मक नहीं रही, और मैंने अपने भविष्य के लिए योजना बनाना बंद कर दिया। मैं भाई-बहनों के अभ्यास के अच्छे तरीकों को अपनाने, व्यावहारिक रूप से सिद्धांतों का अध्ययन करने, चालाक न बनने या कुछ भी अपने दिल में न रखने और अपना कर्तव्य उचित रूप से निभाने के लिए भरसक प्रयास करने के लिए तैयार हो गई।

बाद में, मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े और अपनी नकारात्मकता की जड़ के बारे में कुछ समझ हासिल की। परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर में मानवजाति के विश्वास के बारे में सबसे दुःखद बात यह है कि परमेश्वर के कार्य के बीच मनुष्य अपने खुद के उद्यम में जुटा रहता है, जबकि परमेश्वर के प्रबंधन पर कोई ध्यान नहीं देता। मनुष्य की सबसे बड़ी असफलता यह है कि जब वह परमेश्वर के प्रति समर्पित होने और उसकी आराधना करने का अनुसरण करता है, उसी समय वह एक महत्वाकांक्षी मंजिल के अपने सपने का निर्माण कर रहा होता है और इस बात की साजिश रचता है कि सबसे बड़ा आशीष और सर्वोत्तम मंजिल कैसे प्राप्त किए जाएँ। भले ही लोग समझते हैं कि वे कितने दीन-हीन, घृणास्पद और दयनीय हैं, फिर भी ऐसे कितने लोग अपनी महत्वाकांक्षाओं और आशाओं को आसानी से छोड़ सकते हैं? और कौन अपने कदमों को रोकने और अपनी ओर से योजनाएँ बनाना बंद कर सकने में सक्षम है? परमेश्वर को उन लोगों की ज़रूरत है, जो उसके प्रबंधन को पूरा करने के लिए उसके साथ निकटता से सहयोग करेंगे। उसे उन लोगों की जरूरत है जो उसके प्रति समर्पण कर सकें करने की खातिर अपने पूरे तन-मन को उसके प्रबंधन के कार्य के प्रति समर्पित करेंगे। उसे ऐसे लोगों की जरूरत नहीं है जो हर दिन उससे भीख माँगने के लिए अपने हाथ फैलाए रहते हैं और उनकी तो बिल्कुल भी जरूरत नहीं है जो उसके लिए खुद को थोड़ा-सा खपाते हैं और फिर उससे भुगतान अदायगी की माँग करने का इंतजार करते हैं। परमेश्वर उन लोगों से नफरत करता है जो तुच्छ योगदान करते हैं और फिर अपनी उपलब्धियों से संतुष्ट हो जाते हैं। वह उन निष्ठुर लोगों से नफरत करता है जो उसके प्रबंधन-कार्य के प्रति विरोधी होते हैं और केवल स्वर्ग जाने और आशीष प्राप्त करने के बारे में बात करना चाहते हैं। वह उन लोगों से और भी अधिक नफरत करता है जो उसके उद्धार के कार्य से प्राप्त अवसर का लाभ अपने फायदे के लिए उठाते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि इन लोगों ने कभी इस बात की परवाह नहीं की है कि परमेश्वर अपने प्रबंधन के कार्य के माध्यम से क्या हासिल और प्राप्त करना चाहता है। उनकी रुचि केवल इस बात में होती है कि किस प्रकार वे परमेश्वर के कार्य द्वारा प्रदान किए गए अवसर का उपयोग आशीष प्राप्त करने के लिए कर सकते हैं। वे परमेश्वर के हृदय के प्रति बिल्कुल भी विचारशील नहीं हैं और पूरी तरह से अपने भविष्य और भाग्य में तल्लीन रहते हैं। जो लोग परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के प्रति विमुख होते हैं और जो इस बात में जरा-सी भी रुचि नहीं रखते कि परमेश्वर मानवजाति को कैसे बचाता है और उसके इरादे क्या हैं, वे सभी वही चीजें कर रहे हैं जिन्हें वे परमेश्वर के प्रबंधन कार्य के दायरे से बाहर करना चाहते हैं। उनके क्रियाकलापों को परमेश्वर द्वारा न तो याद किया जाता है और न ही अनुमोदित किया जाता है, परमेश्वर द्वारा उसे कीमती माना जाना तो दूर की बात है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 3 : मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है)। “मसीह-विरोधी आशीष प्राप्ति को स्वर्ग से भी अधिक बड़ा, जीवन से भी बड़ा, सत्य के अनुसरण, स्वभावगत परिवर्तन या व्यक्तिगत उद्धार से भी अधिक महत्वपूर्ण, और अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाने और मानक के अनुरूप सृजित प्राणी होने से अधिक महत्वपूर्ण मानता है। वह सोचता है कि मानक के अनुरूप एक सृजित प्राणी होना, अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करना और बचाया जाना सब तुच्छ चीजें हैं, जो मुश्किल से ही उल्लेखनीय हैं या टिप्पणी के योग्य हैं, जबकि आशीष प्राप्त करना उनके पूरे जीवन में एकमात्र ऐसी चीज होती है, जिसे कभी नहीं भुलाया जा सकता। उनके सामने चाहे जो भी आए, चाहे वह कितना भी बड़ा या छोटा क्यों न हो, वे इसे आशीष प्राप्ति होने से जोड़ते हैं और अत्यधिक सतर्क और चौकस होते हैं, और वे हमेशा अपने बच निकलने का मार्ग रखते हैं(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद बारह : जब उनके पास कोई रुतबा नहीं होता या आशीष पाने की आशा नहीं होती तो वे पीछे हटना चाहते हैं)। परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन से मैंने देखा कि मसीह-विरोधी अपने लिए आशीष और लाभ पाने के लिए परमेश्वर में विश्वास करते हैं। वे स्वभाव में बदलाव लाने के लिए सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं और परमेश्वर को संतुष्ट नहीं करते हैं; बल्कि, वे अपने कर्तव्यों में अपनी कोशिशों और खपाई के बदले परमेश्वर के आशीष पाने की कोशिश करते हैं। वे परमेश्वर का इस्तेमाल कर रहे हैं और उसके साथ मोल-भाव करने की कोशिश कर रहे हैं। वे सत्य का अनुसरण करने या स्वभाव में बदलाव लाने से ज्यादा महत्वपूर्ण आशीष पाने को समझते हैं। मैंने देखा कि मेरी अपनी अभिव्यक्तियाँ बिल्कुल एक मसीह-विरोधी जैसी थीं। जब से मैंने परमेश्वर में विश्वास करना शुरू किया, मैं हमेशा सहयोग करने के लिए कष्ट सहने और कीमत चुकाने को तैयार थी, चाहे कलीसिया ने मुझे नए लोगों को सींचने की या अगुआ या कार्यकर्ता बनने की व्यवस्था की हो। ऐसा इसलिए था क्योंकि मैं जानती थी कि ज्यादा कर्तव्य निभाकर और ज्यादा अच्छे कर्म तैयार करके, मैं उद्धार पा सकती थी और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकती थी। लेकिन जब मैंने देखा कि मेरी कमजोर काबिलियत मुझे अगुवाई का कर्तव्य करने से रोकती है, और मैं धर्मोपदेशों का मूल्यांकन करते समय सिद्धांतों को लागू नहीं कर सकती, तो मुझे चिंता हुई कि मैं कोई भी कर्तव्य अच्छी तरह से नहीं कर पाऊँगी और मुझे निकाल दिया जाएगा, और उद्धार पाने की मेरी आशा खत्म हो जाएगी। जब मुझे लगा कि आशीष पाने की मेरी इच्छा चकनाचूर हो गई है, तो मैं नकारात्मक हो गई, मैंने अपने बारे में फैसला दिया और खुद से हार मान ली; अपने कर्तव्य में मैं बस खानापूर्ति करती रही और अनमनी रही। मैंने देखा कि परमेश्वर में अपने विश्वास और अपने कर्तव्य में, मैं बस परमेश्वर के साथ मोल-भाव करने की कोशिश कर रही थी। मैं परमेश्वर को धोखा दे रही थी और उसका इस्तेमाल कर रही थी : मैं एक नीच इंसान थी जिसके लिए लाभ पहले आता था। मैं अपना कर्तव्य मोल-भाव करने के इरादे से निभा रही थी, न कि अपने स्वभाव में बदलाव का अनुसरण करने के लिए। अगर यह जारी रहता, तो न केवल मैं उद्धार नहीं पा सकती, बल्कि मुझे परमेश्वर द्वारा निकाल दिया जाता और दंडित भी किया जाता। जब मैंने अपने सोच-विचार से यह एहसास किया, तो मुझे बहुत ग्लानि हुई, इसलिए मैंने घुटने टेके और प्रार्थना की, “प्रिय परमेश्वर, तुमने कर्तव्य निभाने का यह मौका देकर मुझ पर अनुग्रह किया है, फिर भी मैं हमेशा आशीष पाने की अपनी इच्छा से चिपकी रहती हूँ। मैं इतनी स्वार्थी और नीच हूँ! हे परमेश्वर, मैं पश्चात्ताप करने को तैयार हूँ।”

बाद में, परमेश्वर के वचनों के माध्यम से, मैं परमेश्वर के इरादों और माँगों को और अधिक स्पष्ट रूप से समझने लगी। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “प्रत्येक व्यक्ति के लिए परमेश्वर की इच्छा है कि उसे पूर्ण बनाया जाए, अंततः उसके द्वारा उसे प्राप्त किया जाए, उसके द्वारा उसे पूरी तरह से शुद्ध किया जाए, और वह ऐसा इंसान बने जिससे वह प्रेम करता है। चाहे मैं तुम लोगों को पिछड़ा हुआ कहता हूँ या निम्न क्षमता वाला—यह सब तथ्य है। मेरा ऐसा कहना यह प्रमाणित नहीं करता कि मेरा तुम्हें छोड़ने का इरादा है, कि मैंने तुम लोगों में आशा खो दी है, और यह तो बिल्कुल नहीं कि मैं तुम लोगों को बचाना नहीं चाहता। आज मैं तुम लोगों के उद्धार का कार्य करने के लिए आया हूँ, जिसका तात्पर्य है कि जो कार्य मैं करता हूँ, वह उद्धार के कार्य की निरंतरता है। प्रत्येक व्यक्ति के पास पूर्ण बनाए जाने का अवसर होता है : बशर्ते तुम तैयार हो, बशर्ते तुम प्रयास करते हो, अंत में तुम इस परिणाम को प्राप्त करने में समर्थ होगे और तुममें से किसी एक को भी छोड़ नहीं दिया जाएगा। यदि तुम कम काबिलियत के हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी कम काबिलियत के अनुसार होंगी; यदि तुम उच्च काबिलियत के हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी उच्च काबिलियत के अनुसार होंगी; यदि तुम अज्ञानी और निरक्षर हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ इसी अनुसार होंगी; यदि तुम साक्षर हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारे साक्षर होने के अनुसार होंगी; यदि तुम उम्रदराज हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी उम्र के अनुसार होंगी; यदि तुम मेजबानी का कर्तव्य निभाने में सक्षम हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ इसी अनुसार होंगी; यदि तुम कहते हो कि तुम मेजबानी का कर्तव्य नहीं निभा सकते हो और केवल कोई निश्चित कार्य ही कर सकते हो, चाहे वह सुसमाचार प्रचार का कार्य हो या कलीसिया की देखरेख करने का कार्य या अन्य सामान्य मामलों को करने का कार्य, तो मेरे द्वारा तुम्हारी पूर्णता भी उस कार्य के अनुसार होगी जो तुम करते हो। वफादार होना, बिल्कुल अंत तक समर्पण करना और परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च प्रेम रखने का प्रयास करना—ये चीजें तुम्हें अवश्य करनी चाहिए, बस ये तीन चीजें और यही सर्वोत्तम अभ्यास हैं। अंततः, लोगों से यह माँग की जाती है कि वे इन तीन चीजों को प्राप्त करे और जो इन्हें प्राप्त कर सकते हैं वे पूर्ण बनाए जाएंगे। किंतु, इन सबसे ऊपर, तुम्हें सच में अनुसरण करना होगा, तुम्हें सक्रियता से आगे और ऊपर की ओर बढ़ते जाना होगा और इस संबंध में निष्क्रिय नहीं होना होगा। मैं कह चुका हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति के पास पूर्ण बनाए जाने का अवसर है और प्रत्येक व्यक्ति पूर्ण बनाए जाने में सक्षम है, और यह सच है, किंतु तुम ऊपर की ओर बढ़ने का प्रयास नहीं करते हो। जो इन तीन मापदंडों को प्राप्त नहीं करते हैं वे अंततः अभी भी हटा दिए जाएंगे(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना)। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गई कि वह लोगों को अलग-अलग काबिलियत देता है और उनसे उसकी माँगें भी अलग-अलग होती हैं। जिनके पास अच्छी काबिलियत होती है उनसे माँगें उनके अनुरूप होती हैं; और इसी प्रकार जिनकी काबिलियत कमजोर होती है उनसे माँगें उनके अनुरूप होती हैं। चाहे तुम्हारी काबिलियत ऊँची हो या नीची, जब तक तुम अपनी निष्ठा अर्पित कर सको, सत्य का अभ्यास कर सको, और परमेश्वर को संतुष्ट कर सको, तुम्हें उद्धार पाने का मौका मिलेगा। लेकिन मैं मानवजाति को बचाने के परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादों को नहीं समझती थी। मुझे लगता था कि अपनी कमजोर काबिलियत के चलते मैं बचाई नहीं जा सकती हूँ और केवल अच्छी काबिलियत वालों और बातों को जल्दी समझने वालों के पास ही कोई उम्मीद होती है। मेरा दृष्टिकोण इतना विकृत था! कोई व्यक्ति उद्धार पा सकता है या नहीं, यह इस पर आधारित है कि वह सत्य का अनुसरण करता है या नहीं, उसके स्वभाव में बदलाव आता है या नहीं, और वह अपने कर्तव्य में निष्ठा और समर्पण दिखाता है या नहीं। मैंने अपनी जान-पहचान की एक जिला अगुआ के बारे में सोचा जिसमें कुछ बुद्धि और काबिलियत थी। सभी भाई-बहन उसे बहुत सम्मान देते थे। लेकिन जब वह अपना कर्तव्य निभाती थी, तो वह दूसरों के साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग नहीं कर पाती थी। वह तानाशाही से कार्य करती थी, कलीसिया के कार्य में गड़बड़ी और बाधा डालती थी। जब भाई-बहन उसके साथ संगति करते थे तो वह इसे स्वीकार नहीं करती थी और पश्चात्ताप करने से हठपूर्वक इनकार कर देती थी। अंत में, उसे निष्कासित कर दिया गया। दूसरी ओर, एक और बहन की काबिलियत थोड़ी कमजोर थी, लेकिन वह काफी सच्ची थी। जब वह अपने कर्तव्य में मुश्किलों का सामना करती थी तो वह परमेश्वर से प्रार्थना करती थी और अपनी भ्रष्टता का समाधान करने के लिए सत्य खोजने पर ध्यान केंद्रित करती थी और वह अपने कर्तव्य में कुछ नतीजे हासिल करने में कामयाब रहती थी। इन तथ्यों से, मैं समझ गई कि भले ही किसी की काबिलियत अच्छी हो और वह बातों को जल्दी समझता हो, अगर वह सत्य का अनुसरण नहीं करता है और उसके स्वभाव में बदलाव नहीं होता है तो वह उद्धार नहीं पा सकता है। भले ही मेरी काबिलियत कमजोर है, मुझे अब भी उन सभी सत्य सिद्धांतों का अभ्यास करना चाहिए जिन्हें मैं समझ पाती हूँ और अपने कर्तव्य को करने में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए। इस तरह, अगर किसी दिन मैं सचमुच खरी नहीं उतरती हूँ और मुझे बरखास्त कर दिया जाता है, तो भी मुझे कोई पछतावा नहीं होगा। मुझे यह एहसास भी हुआ कि परमेश्वर द्वारा मुझे अच्छी काबिलियत और खूबियाँ न देने के पीछे उसका इरादा है। मुझमें घमंडी स्वभाव है। मैं स्पष्ट रूप से कुछ भी नहीं हूँ, फिर भी जब मैं अपने कर्तव्यों में भाई-बहनों के साथ सहयोग करती थी तो मैं तब भी घमंडी और आत्मतुष्ट होती थी और उनके साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग नहीं कर पाती थी। अब, अपनी कमजोर काबिलियत के कारण, मैं अपने कर्तव्य में नाकामियों का सामना करती रहती हूँ, इसलिए मैं अब और घमंडी नहीं हो सकती हूँ। मैं बस विनम्रता से अपना कर्तव्य निभा पाती हूँ। जब कुछ ऐसा होता है जिसे मैं जानती या समझती नहीं हूँ, तो मैं खोज सकती हूँ, और मैं भाई-बहनों के सुझावों को स्वीकार कर सकती हूँ। यह मुझे अपने भ्रष्ट स्वभाव के चलते गड़बड़ी और बाधाएँ पैदा करने से भी रोकता है। मेरी कमजोर काबिलियत मेरी रक्षा कर रही है!

उसके बाद, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और सिद्धांतों और परमेश्वर के वचनों पर विचार करने में अधिक समय बिताया। कुछ समय बाद, मैंने अपने कर्तव्य में कुछ प्रगति की और उसमें कुछ नतीजे हासिल किए। एक दिन, मैं एक बहन के साथ अपने अनुभवों के बारे में संगति कर रही थी, और उसने कहा, “तुमने हाल ही में पहले की तुलना में सचमुच कुछ प्रगति की है। कमजोर काबिलियत होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। जब तक हम सत्य का अभ्यास करने को तैयार हैं और पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकते हैं, परमेश्वर कमजोर काबिलियत होने की भरपाई कर देगा।” मैं वास्तव में इससे सहमत थी और मैंने वह अनुभव किया जो परमेश्वर कहता है : “शायद परमेश्वर के वचनों को समझने की तुम्हारी क्षमता थोड़ी कच्ची है, लेकिन तुम लोगों के उसके वचनों का अभ्यास करने के जरिए वह इस दोष को दूर कर सकता है...(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सत्य को समझने के बाद, तुम्हें उस पर अमल करना चाहिए)। मैं समझ गई कि परमेश्वर किसी व्यक्ति की काबिलियत को नहीं देखता, बल्कि यह देखता है कि क्या वह सत्य को समझने के बाद इसका अभ्यास कर सकता है। जब कोई व्यक्ति सत्य का अभ्यास करता है, परमेश्वर उसकी अंतर्निहित काबिलियत के आधार पर उसे प्रबुद्ध करता है और मार्गदर्शन देता है, उसे अपने कर्तव्य में एक राह खोजने में सक्षम बनाता है। परमेश्वर का धन्यवाद!

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