24. एक भारतीय लड़की की आस्था की कठिन राह

लिडिया, भारत

मेरा जन्म एक मसीही परिवार में हुआ था। मेरे पिता पादरी हैं और मेरी माँ भी कलीसिया में सेवा करती हैं। मैं बचपन से ही उनके साथ प्रभु में विश्वास करती थी। मेरे माता-पिता प्रभु के बहुत धर्मनिष्ठ विश्वासी थे और दूसरों के प्रति बहुत मिलनसार भी थे। हमारा परिवार बहुत समरस था। मेरे बचपन के सारे दोस्त इस बात के लिए मेरी सराहना करते थे कि मेरा एक सुखी परिवार है और मैं भी खुद को काफी भाग्यशाली मानती थी। जैसे-जैसे मैं बड़ी हुई, मैंने देखा कि मेरे आस-पास के लोग अक्सर पाप करते हैं, और मैं भी पाप के बंधन में जी रही थी। अपने हितों की रक्षा के लिए मैं झूठ बोलती थी और आवेग में काम करती थी, और मैं दूसरों से ईर्ष्या और नफरत भी करती थी। मैं बहुत परेशान थी। मैं खुद को ही इस रूप में पसंद नहीं करती थी, तो परमेश्वर मुझे कैसे पसंद कर सकता था? मैं अक्सर रोती थी और परमेश्वर के सामने अपने पाप कबूल करती थी, लेकिन बाद में न चाहते हुए भी मैं पाप कर बैठती थी। मैं बहुत चिंतित थी—अगर मैं पश्चात्ताप किए और बदले बिना इसी तरह चलती रही, तो क्या अंत में मैं स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर पाऊँगी? इसलिए मैंने अपने पिता से पूछा, “मैं इतनी बार-बार पाप करती हूँ—क्या प्रभु मुझे माफ कर देगा? सच्चा पश्चात्ताप हासिल करने के लिए मैं क्या कर सकती हूँ?” मेरे पिता ने कहा, “चिंता मत करो। जब तक हम प्रभु के सामने स्वीकार करते हैं और पश्चात्ताप करते हैं, वह हमारे पाप माफ कर देगा। प्रभु हमें नहीं छोड़ेगा।” मेरे पिता का जवाब मेरी उलझन बिल्कुल भी दूर नहीं कर सका।

मार्च 2020 में, महामारी और भी गंभीर हो गई और सभी संस्थानों को बंद करने का आदेश दे दिया गया। उस समय, मैं नर्सिंग में स्नातक की पढ़ाई कर रही थी, और मेरा स्कूल बंद होने के कारण मैं भी घर चली गई। अप्रैल में, मुझे फेसबुक पर अपनी दोस्त एला से सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की ऑनलाइन सभा में शामिल होने का निमंत्रण मिला। कुछ समय तक जाँच करने के बाद मैं परमेश्वर के देहधारण के सत्य को समझ गई और मुझे पता चला कि परमेश्वर ने मानवजाति को बचाने के लिए कार्य के तीन चरण पूरे किए हैं, और यह कि अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय का कार्य लोगों के शैतानी स्वभावों को शुद्ध और परिवर्तित करना है, उन्हें पाप के बंधन से मुक्त करना और पूरी तरह से बचाना है। यह पाप से मुक्त होने का बिल्कुल वही रास्ता था जिसकी मुझे तलाश थी। सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त वचनों ने उस उलझन को दूर कर दिया जो मुझे सालों से परेशान कर रही थी, और मैंने अपने दिल से यह निर्धारित कर लिया कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही लौटा हुआ प्रभु यीशु है। उसके बाद, मैं अक्सर सभाओं में जाने लगी। मैं हर सभा से कुछ सत्य समझ पाती थी और मेरे दिल को वास्तव में पोषण मिलता था। बाद में, मैंने फेसबुक पर सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के परमेश्वर के वचनों के भजन साझा किए, और एक पादरी ने उन्हें देख लिया। फिर उसने मेरे पिता को सर्वशक्तिमान परमेश्वर में मेरे विश्वास के बारे में बता दिया। मेरे पिता ने मुझसे सवाल किए, “क्या तुम सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की ऑनलाइन सभाओं में शामिल हो रही हो? किसी ने मुझे बताया कि तुमने किसी पाखंड पर विश्वास कर लिया है। क्या तुम यह जानती हो? सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया द्वारा प्रचारित मार्ग बाइबल के अनुरूप नहीं है। तुम्हें इसमें आइंदा विश्वास करने की अनुमति नहीं है! मेरी बेटी कैसे मेरी अवहेलना कर सकती है और किसी दूसरे मार्ग पर विश्वास कर सकती है?” मेरे पिता अपना मान-सम्मान बचाने को लेकर बहुत सरोकार रखते थे और उन्होंने यहाँ तक कहा, “मेरी अपनी बेटी मेरी शिक्षाओं को सुनने के लिए तैयार नहीं है। मैं दूसरों को सिखाना कैसे जारी रख सकता हूँ?” मैंने कहा, “पिताजी, आप भी जानते हैं कि हम सब पाप में जीते हैं और अक्सर न चाहते हुए भी पाप करते हैं और हम चाहकर भी इससे मुक्त नहीं हो सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि हमारे भीतर की पापी प्रकृति का समाधान नहीं हुआ है। अंत के दिनों में, सर्वशक्तिमान परमेश्वर ठीक इसीलिए सत्य व्यक्त करता है और न्याय का कार्य करता है ताकि वह हमारी पापी प्रकृति का समाधान कर सके, हमें शुद्ध कर सके और पाप से बचा सके।” यह सुनकर मेरे पिता ने बहुत गुस्से में कहा, “परमेश्वर के लिए नया कार्य करना असंभव है! भले ही हम अभी तक शुद्ध नहीं हुए हैं, अगर हम प्रभु के सामने प्रार्थना और कबूल करें तो वह हमें माफ कर देगा। न्याय और शुद्धिकरण के किसी भी कार्य की कोई आवश्यकता नहीं है।” मैंने अपने पिता से कहा, “धर्मशास्त्रों में कई भविष्यवाणियाँ बताती हैं कि जब प्रभु लौटेगा तो वह कार्य का एक और चरण करेगा। प्रभु यीशु ने कहा था : ‘मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा(यूहन्ना 16:12-13)। ‘सत्य के द्वारा उन्हें पवित्र कर : तेरा वचन सत्य है(यूहन्ना 17:17)। यह हमें बताता है कि परमेश्वर अंत के दिनों में सत्य व्यक्त करने और लोगों को उनके पापों से शुद्ध करने के लिए आता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य इन भविष्यवाणियों को पूरी तरह से पूरा करता है। प्रभु पवित्र है। ‘पवित्रता के बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा(इब्रानियों 12:14)। हम सभी अब पाप में जीते हैं : हम स्वार्थी, लालची, अहंकारी और आत्मतुष्ट हैं और अक्सर खुद का दिखावा करते हैं; हम झूठ बोलते हैं, धोखा देते हैं, प्रसिद्धि और लाभ के लिए होड़ करते हैं, और इसी तरह। इन पापों को त्यागे बिना, हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य ही नहीं हैं!” लेकिन मेरे पिता ने मेरी बात बिल्कुल नहीं सुनी। मुझसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर को अस्वीकार करवाने के लिए मेरे पिता ने मुझे वे सारी निराधार अफवाहें बताईं जिनका इस्तेमाल सीसीपी सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को बदनाम करने के लिए करती है, और उदास चेहरे के साथ कहा, “यह सब मेरी गलती है। मैंने तुम्हारी अच्छी तरह से देखभाल नहीं की और तुम उनके द्वारा गुमराह हो गईं।” ये बातें सुनकर मैं बहुत दुखी हुई और मुझ पर थोड़ा असर भी पड़ा। मैंने अपने दिल में चुपचाप परमेश्वर से प्रार्थना की, उससे विनती की कि वह मेरा मार्गदर्शन करे। मैंने सोचा कि कैसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करते हुए मुझे दो महीने हो गए थे, मैंने परमेश्वर के बहुत से वचन पढ़े थे और देखा था कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के सभी वचन सत्य हैं। वे मेरे भ्रष्ट स्वभाव को त्यागने और सामान्य मानवता को जीने में मेरा मार्गदर्शन कर रहे थे। उन्होंने मुझे परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का कुछ ज्ञान भी दिया। मैं अपने दिल में परमेश्वर के वचनों के लिए वास्तव में तरसती थी, और हर बार जब मैं परमेश्वर के वचनों को खाती और पीती थी, तो मैं पवित्र आत्मा की उपस्थिति का आनंद ले पाती थी। मेरे दिल को पोषण मिला और उसमें शांति और खुशी थी। यह वह था जो मैंने व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया था। मैं स्पष्ट रूप से जानती थी कि केवल सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्य ही मेरे भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध कर सकते हैं, और मुझे पाप के बंधन से बचा सकते हैं। मेरे पिता चाहे कुछ भी कहते हों, मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करने पर डटे रहना था। मैं अपने पिता को फोन पर सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन दिखाना चाहती थी, लेकिन उन्होंने मुझे इसे बाहर निकालने नहीं दिया और वह मुझ पर चिल्लाए, “अगर तुम कुछ जानना चाहती हो, तो बाइबल पढ़ो। अगर समझ में न आए, तो आकर मुझसे पूछो। इतना बिना सोचे-समझे दूसरी शिक्षाओं को मत सुनो!” मैं बहुत उदास थी कि मेरे पिता बाइबल के अक्षरशः वचनों से चिपके हुए थे और सत्य को स्वीकार नहीं कर रहे थे। उस समय मेरे पिता ने मेरा फोन ले लिया और मैं नहीं जानती थी कि वह मुझे से वापस देंगे कि नहीं देंगे या मैं ऑनलाइन सभाओं में शामिल होना जारी रख सकती हूँ या नहीं। मैं जानती थी कि अपने परिवार द्वारा उत्पीड़ित किया जाना अनुभव करने की कोई आसान चीज नहीं थी और मुझे चिंता थी कि अपने छोटे आध्यात्मिक कद के कारण मैं अडिग नहीं रह पाऊँगी। मैंने अपने दिल में चुपचाप परमेश्वर से प्रार्थना की, उससे विनती की कि वह मुझे मार्गदर्शन दे और मेरी रक्षा करे।

थोड़ी देर बाद मेरे पिता ने फिर से मुझसे कहा कि मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को छोड़ दूँ। मेरी खामोशी देखकर वह बहुत क्रोधित हो गए और उन्होंने मुझसे पूछा, “क्या तुम मेरी शिक्षाओं का पालन करोगी, या उन चीनी लोगों का अनुसरण करोगी जो प्रभु यीशु की वापसी का प्रचार करते हैं?” मैंने जवाब दिया, “मैं परमेश्वर का अनुसरण करूँगी।” मेरे यह कहते ही मेरे पिता ने मेरे मुँह पर एक थप्पड़ मारा। उन्होंने मुझसे दो बार और पूछा और दोनों बार मेरा जवाब वही रहा। हर बार जब मैंने जवाब दिया, उन्होंने मुझे थप्पड़ मारा। मेरे छोटे भाई ने कहा, “दीदी, तुम इतनी जिद्दी क्यों हो? बस पिताजी की बात मान लो और हमारे परिवार को पहले की तरह ही सामंजस्यपूर्ण रखो।” मैंने कुछ नहीं कहा और मेरे पिता गुस्से में दूसरे कमरे में चले गए। मुझे याद आया कि प्रभु यीशु ने कहा था : “यह न समझो कि मैं पृथ्वी पर मिलाप कराने आया हूँ; मैं मिलाप कराने नहीं, पर तलवार चलवाने आया हूँ। मैं तो आया हूँ कि : ‘मनुष्य को उसके पिता से, और बेटी को उसकी माँ से, और बहू को उसकी सास से अलग कर दूँ’(मत्ती 10:34-35)। मैं जानती थी कि प्रभु लौट आया है और कुछ लोग उसकी आवाज पहचान सकते हैं और उसका अनुसरण कर सकते हैं, जबकि दूसरे जो उसे नहीं पहचानते, उसका प्रतिरोध करेंगे। भले ही हम एक परिवार थे, हम इसी वजह से बँट जाएँगे। यह कुछ ऐसा था जिसका मुझे सामना करना था। दो या तीन मिनट बाद मेरे पिता ने मुझे दूसरे कमरे में बुलाया। एक लंबी, मोटी छड़ी पकड़े हुए उन्होंने मुझसे पूछताछ की, कहा, “मुझे बताओ! तुम किसकी बात सुनने वाली हो?” मैंने कहा, “परमेश्वर की!” मेरे पिता आग बबूला हो गए, उन्होंने छड़ी की नोक से मेरे कंधे को कोंचा जिससे मेरे कंधे पर चोट लग गई। मेरा भाई भी एक तरफ से चिल्लाया, उसने मुझसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास न करने के लिए कहा। मेरे पिता ने कहा, “अभी, मैं शैतान हूँ! अगर तुम मेरी नहीं सुनोगी तो मैं तुम्हें मार डालूँगा!” उस पल, मैं बहुत हैरान थी। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरे पिता, जिन पर मैं कभी भरोसा करती थी और जिनका सम्मान करती थी, एक ऐसे व्यक्ति जो प्रभु में अपनी आस्था में इतने मिलनसार और विनम्र लगते थे, ऐसी बातें कह सकते हैं। वह बहुत सारे वर्षों से विश्वासी थे और एक बड़े पादरी थे जिन्होंने सभी तरह की जगहों पर उपदेश दिए थे। वह परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य में पूरी तरह बेनकाब हो चुके थे। जब उन्होंने प्रभु यीशु की वापसी का समाचार सुना तो उनमें खोजने का कतई कोई दिल नहीं था। वास्तव में वह एक छद्म-विश्वासी थे! शुरुआत में मुझे लगा कि मेरे पिता मुझे परमेश्वर की गवाही देते हुए सुनेंगे, लेकिन उस पल, मैंने जाना कि भले ही वह एक पादरी थे, लेकिन उनके पास परमेश्वर का भय मानने वाला कतई कोई दिल नहीं था। वह एक झूठे चरवाहा थे जो परमेश्वर की सेवा करता था, फिर भी उसका प्रतिरोध करता था। उन्हें सत्य से प्रेम नहीं था; उन्हें जिस चीज की परवाह थी वह थी अपनी प्रतिष्ठा। वह केवल ऊपरी तौर पर धर्मनिष्ठ दिखते थे, लेकिन भीतर ही भीतर वह सत्य से घृणा करते थे। मैंने अपने पिता से कहा, “मैं सच्चा मार्ग नहीं छोड़ूँगी।” मेरे पिता बहुत गुस्से में थे और उन्होंने मुझे आदेश दिया कि मैं अपने फोन से सभी भाई-बहनों की संपर्क सूचना मिटा दूँ। उन्होंने मुझे धमकाना जारी रखा और मेरे चेहरे पर प्रहार करना शुरू कर दिया। अपने पिता को इस तरह देखकर मैंने बहुत भयभीत महसूस किया और थोड़ी-सी कमजोरी भी महसूस की। मैंने कभी नहीं सोचा था कि परमेश्वर में विश्वास करने के लिए मैं ऐसा उत्पीड़न सहूँगी। मैं नहीं जानती थी कि मैं और क्या सामना करूँगी। अगर मुझे भविष्य में और अधिक दर्द सहना पड़ा या मौत का सामना करना पड़ा, तो क्या मैं तब भी अपनी गवाही में अडिग रह पाऊँगी? उस समय मैंने चीन के उन भाई-बहनों की अनुभवजन्य गवाहियों के बारे में सोचा जो सीसीपी द्वारा उत्पीड़न सहते थे। वे हर तरह की यातना के बीच परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग रहने में सक्षम थे। मैं यह जो जरा सा उत्पीड़न सह रही थी, यह क्या मायने रखता था? परमेश्वर ने मुझे अपने सामने लाकर और मुझे सत्य प्रदान करके मुझ पर अनुग्रह किया है। मुझे अपनी गवाही में अडिग रहना चाहिए। मैं बस कायरता वश सच्चा मार्ग नहीं छोड़ सकती थी। मेरा अडिग रवैया देखकर मेरे पिता ने अचानक मेरे सिर पर जोर से छड़ी मारी। इस डर से कि मेरा सिर फट जाएगा, मेरा भाई मेरे पिता को रोकने के लिए आगे बढ़ा और मुझ पर चिल्लाया, “क्या तुम पिताजी के हाथों मरना चाहती हो? तुम इतनी जिद्दी क्यों हो? तुम बस यह क्यों नहीं मान लेती कि तुम गलत हो?” मेरे पिता ने मेरे बाल पकड़े और मुझे धक्का दे दिया, वह छड़ी की नोक मेरे कंधे पर चुभाते रहे। वह तब तक नहीं रुके जब तक मेरा कंधा चोटों से नीला नहीं पड़ गया। अपने पिता को इस तरह देखकर मुझे अपने दिल में थोड़ी-सी कमजोरी महसूस हुई।

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा जिसने मुझे आस्था और शक्ति दी। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “तुम्हें ऐसे स्थान पर पहुँचना होगा जहाँ तुम्हारा सामना चाहे किसी भी परिस्थिति से हो, तुम्हारा संकल्प न बदलने पाए। तभी तुम ऐसे व्यक्ति बनोगे जो सचमुच सत्य से प्रेम करता है और सत्य का अनुसरण करता है। अगर अपने साथ कोई चीज घटित होने या किसी कठिनाई का सामना होने पर तुम पीछे हट जाते हो, नकारात्मक और खिन्न हो जाते हो और अपना संकल्प छोड़ देते हो तो यह नहीं चलेगा। तुममें ऐसा संकल्प होना चाहिए कि तुम अपनी जान खतरे में डाल सको और यह कहो, ‘चाहे कुछ भी हो जाए—भले ही इसका मतलब यह हो कि मैं मर जाऊँगा तो भी सत्य का या सत्य के अनुसरण के अपने लक्ष्य का त्याग नहीं करूँगा।’ फिर तुम्हें कोई भी कठिनाई रोक नहीं पाएगी। अगर सचमुच तुम्हारा कठिनाइयों से सामना होता है और तुम असहाय हो जाते हो तो परमेश्वर अपना कार्य करेगा। इसके अलावा, तुम्हें यह समझ होनी चाहिए : ‘मेरा सामना चाहे किसी भी चीज से हो, ये सब वो सबक हैं जो मुझे सत्य के अनुसरण में सीखने चाहिए—इनकी व्यवस्था परमेश्वर ने की है। मैं कमजोर हो सकता हूँ, मगर निराश नहीं हूँ और मैं ये सबक सीखने का मौका देने के लिए परमेश्वर का आभारी हूँ। मैं परमेश्वर का आभारी हूँ कि उसने मेरे लिए यह स्थिति पैदा की। मैं परमेश्वर का अनुसरण करने और सत्य प्राप्त करने का अपना संकल्प त्याग नहीं सकता। अगर मुझे इसे त्यागना पड़ा तो यह शैतान से हार मानने जैसा होगा, खुद को बर्बाद करना और परमेश्वर को धोखा देना होगा।’ तुम्हें ऐसा संकल्प रखना होगा। जिन भी छोटे-छोटे मामलों से तुम्हारा सामना होता है, ये सब तुम्हारे जीवन के विकास के क्रम में छोटे-छोटे किस्से हैं। इन्हें तुम्हारी तरक्की की दिशा अवरुद्ध करने का अवसर नहीं देना चाहिए। कठिनाइयाँ आने पर तुम तलाश और प्रतीक्षा कर सकते हो, मगर तुम्हारी तरक्की की दिशा नहीं बदलनी चाहिए, क्या यह सही नहीं है? (सही है।) दूसरे जो भी कहें, या तुमसे जैसे भी पेश आएँ, और परमेश्वर तुमसे जैसे भी पेश आए, तुम्हारा संकल्प नहीं बदलना चाहिए(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अक्सर परमेश्वर के सामने जीने से ही उसके साथ एक सामान्य संबंध बनाया जा सकता है)। मैं परमेश्वर के वचनों से समझ गई कि परमेश्वर यह आशा करता है कि मैं उसका अनुसरण करने में डटी रह सकती हूँ। भले ही कोई मेरा साथ न दे और हर कोई मुझे ठुकरा दे, तो भी मैं परमेश्वर को धोखा नहीं दे सकती थी। मुझे अपनी गवाही में अडिग रहना था। पहले, जब मैंने भाई-बहनों को संगति करते सुना कि प्रतिकूलताएँ और परीक्षण परमेश्वर का आशीष होते हैं तो मैं समझ नहीं पाई कि इसका क्या मतलब है। लेकिन इस अनुभव के माध्यम से मुझे कुछ समझ मिली। अपने परिवार के हाथों उत्पीड़न के माध्यम से मैंने शैतान की कुरूपता और दुष्टता देखी। परमेश्वर को धोखा देने और उद्धार पाने का मौका गँवाने को मुझे मजबूर करने के लिए शैतान मेरे परिवार का उपयोग करना चाहता था, लेकिन परमेश्वर ने हमेशा मेरी रक्षा की और मुझे आस्था दी और एक के बाद एक कठिनाई पर विजय पाने के लिए मेरा मार्गदर्शन किया। परमेश्वर ने मुझे पूर्ण करने के लिए मेरे परिवार के उत्पीड़न को मुझ पर आने दिया, ताकि मैं सत्य को समझ सकूँ और विवेकशीलता प्राप्त कर सकूँ। मैंने महसूस किया कि लोगों से सर्वाधिक प्रेम केवल परमेश्वर करता है। मैंने मन में निश्चय किया, “चाहे मेरी देह कितनी भी कमजोर क्यों न हो, मैं सत्य का अनुसरण करना कभी नहीं छोडूँगी।” बाद में, मैं अपना फोन वापस पाने में सक्षम हुई क्योंकि मुझे ऑनलाइन नर्सिंग परीक्षा देनी थी। लेकिन मेरे माता-पिता ने, इस चिंता में कि मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की ऑनलाइन सभाओं में शामिल होना जारी रखूँगी, मुझ पर कड़ी नजर रखी। मुझे अक्सर डांटा जाता था, और मेरा परिवार मुझसे रूखेपन और कठोरता से बात करता था। मैं बहुत पीड़ा और कमजोरी महसूस करती थी और बार-बार परमेश्वर से प्रार्थना करती थी कि वह मुझे आस्था दे और मेरे दिल को मजबूत बनाए।

नवंबर 2020 में एक दिन, मैं एक ऑनलाइन सभा में भाग ले रही थी और अचानक मेरी माँ अचानक अंदर आ गई और बोली, “कोई जानता है तुम सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करती हो और वह इस बारे में तुम्हारे पिता से पूछ रहा है।” मेरे पिता ने फिर मुझे रसोईघर में बुलाया और पूछा कि क्या मैं अभी भी सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की सभाओं में भाग ले रही हूँ। मैंने जवाब दिया, “हाँ।” मेरे पिता ने नम्र लहजे में कहा, “मेरी प्यारी बेटी, तुम अभी भी सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की सभाओं में क्यों शामिल हो रही हो? मैं तुम्हें पहले चेतावनी दे चुका हूँ कि वह सच्चा मार्ग नहीं है। मैंने अपने सहकर्मियों को बताया कि तुमने सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया छोड़ दी है, लेकिन तुम अभी भी उनकी सभाओं में भाग ले रही हो। तुम मुझे बहुत निराश कर रही हो!” मैंने समझाने की कोशिश की, लेकिन मेरे पिता ने मेरे चेहरे पर थूक दिया और मेरी आँख पर मुक्का मार दिया। मेरी माँ उन्हें रोकने आगे बढ़ी और मेरे पिता ने मेरे बाल खींचने की कोशिश की, कहा कि अगर मैंने कलीसिया में प्रभु में विश्वास करने में उनका अनुसरण नहीं किया, तो वह मुझे मार डालेंगे। उस पल मैं बहुत भयभीत हो गई और मैंने अपने दिल में चुपचाप परमेश्वर से प्रार्थना की। यह देखकर कि मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर को नहीं नकार रही हूँ, मेरे पिता ने दूसरी चाल चली। उन्होंने कहा, “मैंने इतने सालों तक प्रचार किया है और कभी किसी ने नहीं कहा कि मेरे उपदेशों में कोई समस्या है, लेकिन अब मेरी अपनी बेटी मेरा विरोध कर रही है। चूँकि तुम मेरे उपदेश नहीं सुनोगी और सोचती हो कि दूसरों के उपदेश सही हैं, मैं पादरी के पद से इस्तीफा दे दूँगा। अपना सामान बाँध लो, हम आज रात अपने गृहनगर वापस जा रहे हैं!” मेरी माँ और मेरे भाई सब रोए, मुझसे विनती करने लगे कि मैं अपना मन बदल लूँ। मेरे पिता आग बबूला थे, न केवल मुझे चेतावनी दे रहे थे और पीटने की कोशिश कर रहे थे, बल्कि गुस्से में दीवार पर भी मुक्के भी मार रहे थे। उन्होंने कहा कि वह उसी रात अपनी जान देने के लिए गाड़ी चलाकर बाहर निकल जाएंगे। मैं भयाक्रांत थी। अगर मेरे पिता को सच में कुछ हो गया तो मुझे लगेगा कि मैंने बुरी तरह निराश कर दिया है। यूँ तो मुझे एहसास था कि यह माहौल मेरे लिए एक परीक्षा था, फिर भी मैं बहुत भयभीत थी। मेरी माँ ने मुझे मजबूर किया कि मैं जाकर अपने पिता से माफी माँगूँ, कहा कि अगर उन्हें कुछ हो गया तो इसकी पूरी जिम्मेदार मैं होऊँगी और वह मुझे माफ नहीं करेंगी, और न ही मेरे भाई-बहन मुझे माफ करेंगे। उसने यह भी कहा कि मैं बहुत अड़ियल हूँ और उनकी भावनाओं पर विचार नहीं करती हूँ। अपने परिवार को इतना दुखी और परेशान देखकर मैं बहुत कमजोर महसूस कर रही थी। तभी मुझे परमेश्वर के वचन याद आए जो शैतान द्वारा लोगों को भ्रष्ट करने के तरीकों का वर्णन करते हैं : “पहला है नियंत्रण और जोर-जबरदस्ती। अर्थात्, तुम्हारे हृदय को नियंत्रित करने के लिए शैतान हर संभव कार्य करता है। ‘जोर-जबरदस्ती’ का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है अपनी बात मनवाने के लिए धमकी और बल की युक्तियों का इस्तेमाल करना, और बात न मानने के परिणामों के बारे में विचार करने पर मजबूर करना। तुम डर जाते हो और उसकी अवहेलना करने की हिम्मत नहीं करते, इसलिए तुम हार मान लेते हो(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI)। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गई कि इस सबके पीछे शैतान की चालबाजी थी। लोगों को नियंत्रित और मजबूर करने के लिए शैतान विभिन्न तरीके और साधन इस्तेमाल करता है, ताकि वे परमेश्वर को धोखा दें। मेरे जीवन में, मेरा परिवार मेरे लिए बहुत अनमोल है। अगर मेरी वजह से उनके साथ कुछ भी बुरा हुआ, तो मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊँगी। जब मेरे पिता ने कहा कि वह अपनी जान देने के लिए गाड़ी लेकर निकल जाएंगे और मेरी माँ ने कहा कि वह मुझे माफ नहीं करेगी, तो मुझे लगा कि अगर मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करने पर अड़ी रही, तो मेरा सारा परिवार मुझे कोसेगा और मुझे घर से बाहर निकाल देगा। इसने मुझे कमजोर महसूस कराया। लेकिन परमेश्वर के वचनों ने मुझे एहसास कराया कि परमेश्वर के साथ विश्वासघात कराने के प्रयास में मुझे धमकाने के लिए शैतान पारिवारिक स्नेह का इस्तेमाल कर रहा था। एक बार जब मैं अपने पिता की आज्ञा मान लेती और परमेश्वर को धोखा दे देती तो मेरे पास कोई गवाही नहीं होती। मैंने निश्चय कर लिया कि मुझे हर हाल में सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करना है और मैं उनकी आज्ञा नहीं मान सकती।

उस रात मेरे पिता ने फिर से मेरा फोन ले लिया और मेरी माँ मुझ पर नजर रखने के लिए मेरे साथ सोई। उन्होंने यह भी कहा कि वे मुझे जल्द से जल्द कॉलेज वापस भेज देंगे, क्योंकि वहाँ मुझे फोन इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं होगी और बाहर निकलने की लगभग इजाजत नहीं होगी, इसलिए मेरे लिए सभाओं में भाग लेना या भाई-बहनों से मिलना बहुत मुश्किल होगा। बिस्तर पर लेटे हुए, मैं रोना बंद नहीं कर पा रही थी। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, उससे विनती की कि वह मुझे शक्ति और साहस दे। मैं जानती थी कि अगर मैं परमेश्वर में विश्वास करना और अपना कर्तव्य निभाना जारी रखना चाहती हूँ तो मेरे पास घर छोड़ने के अलावा कोई चारा नहीं था। वरना, वे परमेश्वर में मेरे विश्वास को रोकने के लिए मुझे निश्चित रूप से वापस स्कूल भेज देंगे। लेकिन मैं सिर्फ एक लड़की थी; मैं कहाँ जा सकती थी? मेरे पास पैसे नहीं थे, तो मैं भविष्य में कैसे जियूँगी? लेकिन अगर मैं घर पर रही, तो वे मुझे परमेश्वर का अनुसरण नहीं करने देंगे। मुझे क्या करना चाहिए? उन कुछ दिनों के दौरान, मैं सो नहीं सकी, और मेरे दिल में उथल-पुथल मची हुई थी। कभी-कभी मुझे लगता था कि सबसे बड़ी बेटी होने के नाते मुझे अपने छोटे भाई-बहनों की देखभाल में माता-पिता की मदद करने के प्रति जिम्मेदार होना चाहिए था। मैं स्कूल में व्यावसायिक प्रशिक्षण ले रही थी और स्नातक होने के बाद मुझे नौकरी मिल सकती थी। मेरे माता-पिता ने मुझ पर इतनी उम्मीदें लगा रखी थीं। मैं अपनी पढ़ाई कैसे छोड़ सकती थी? लेकिन एक सृजित प्राणी के रूप में मुझे परमेश्वर ने अपने घर में कर्तव्य निभाने का अवसर देकर अनुग्रह किया था। यह परमेश्वर का मुझे ऊँचा उठाना था, और इससे भी बढ़कर यह वह जिम्मेदारी थी जो मुझे पूरी करनी चाहिए थी। मैं अपनी पढ़ाई और अपनी आस्था के बीच कैसे चुनाव करूँ? इस पर बार-बार सोचते हुए, मुझे बहुत उलझन और पीड़ा महसूस हुई। उस समय मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया : “जागो, भाइयो! जागो, बहनो! मेरे दिन में देरी नहीं होगी; समय जीवन है और समय को वापस लेना जीवन बचाना है! समय बहुत दूर नहीं है! यदि तुम लोग महाविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में असफल होते हो तो तुम इसके लिए बार-बार पढ़ाई कर सकते हो। लेकिन मेरे दिन में अब और देरी नहीं होगी। याद रखो! याद रखो! मेरे ये प्रोत्साहन के दयालु वचन हैं। दुनिया का अंत खुद तुम्हारी आँखों के सामने प्रकट हो चुका है और महा प्रलय जल्द ही आएगी। अधिक महत्वपूर्ण क्या है : तुम लोगों का जीवन या तुम्हारा सोना, तुम्हारा खाना-पीना और पहनना-ओढ़ना? समय आ गया है कि तुम इन चीजों को तोलो। अब और संशय मत करो! तुम इतने अधिक डरे हुए हो कि इन चीजों को गंभीरता से नहीं ले सकते, है ना?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 30)। मैं परमेश्वर के वचनों से जानती थी कि आपदाएँ शुरू हो चुकी हैं। 2016 में जहाँ मैं रहती थी वहाँ 6.7 तीव्रता का भूकंप आया था और 2020 में वैश्विक कोविड-19 महामारी फैल गई। आपदाएँ अधिकाधिक बड़ी होती जा रही हैं। मानवता को बचाने का कार्य करने के लिए परमेश्वर का गुप्त आगमन समाप्त होने वाला है और अब समय अत्यंत सीमित है। अगर मैं अपनी पढ़ाई पूरी करना जारी रखती हूँ तो यह मेरे सत्य के अनुसरण और मेरी जीवन संवृद्धि में देरी करेगा, इसलिए मैं अपनी पढ़ाई जारी नहीं रखना चाहती थी। मैं जानती थी कि मैं भविष्य में बहुत सारी कठिनाइयों का सामना करूँगी, लेकिन मुझे विश्वास था कि परमेश्वर मेरे लिए रास्ता खोलेगा।

उस दौरान, मैं कभी-कभी संदेश देखने के लिए अपने फेसबुक अकाउंट में लॉग इन करने हेतु अपनी छोटी बहन के फोन का उपयोग करती थी। भाई-बहन मेरी मदद करने के लिए अक्सर मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन भेजते थे। मैंने परमेश्वर के वचन देखे : “जिन लोगों का उल्लेख परमेश्वर ‘विजेताओं’ के रूप में करता है, वे लोग वे होते हैं, जो तब भी गवाही में दृढ़ बने रहने और परमेश्वर के प्रति अपना मूल आत्मविश्वास और भक्ति बनाए रखने में सक्षम होते हैं, जब वे शैतान के प्रभाव और उसकी घेरेबंदी में होते हैं, अर्थात् जब वे स्वयं को अंधकार की शक्तियों के बीच पाते हैं। यदि तुम, चाहे कुछ भी हो जाए, फिर भी परमेश्वर के समक्ष पवित्र दिल और उसके लिए अपना वास्तविक प्यार बनाए रखने में सक्षम रहते हो, तो तुम परमेश्वर के सामने गवाही में दृढ़ रहते हो, और इसी को परमेश्वर ‘विजेता’ होने के रूप में संदर्भित करता है। यदि परमेश्वर द्वारा तुम्हें आशीष दिए जाने पर तुम्हारा अनुसरण उत्कृष्ट होता है, लेकिन उसके आशीष न मिलने पर तुम पीछे हट जाते हो, तो क्या यह पवित्रता है? चूँकि तुम निश्चित हो कि यह मार्ग सच्चा है, इसलिए तुम्हें अंत तक इसका अनुसरण करना चाहिए; तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी वफादारी कायम रखनी चाहिए। चूँकि तुमने देखा है कि तुम्हें पूर्ण बनाने के लिए परमेश्वर स्वयं पृथ्वी पर आया है, इसलिए तुम्हें अपना हृदय पूरी तरह से उसे दे देना चाहिए। परमेश्वर चाहे कुछ भी करे, भले ही वह अंत में तुम्हारे लिए एक प्रतिकूल परिणाम निर्धारित कर दे, यदि तुम तब भी उसका अनुसरण कर सकते हो तो यही परमेश्वर के सामने अपनी पवित्रता बनाए रखना है। परमेश्वर को एक पवित्र आध्यात्मिक शरीर और एक शुद्ध कुँवारी अर्पित करने का अर्थ है परमेश्वर के सामने एक ईमानदार हृदय रखना। मानवजाति के लिए, ईमानदारी ही पवित्रता है, और परमेश्वर के प्रति ईमानदार होने की क्षमता ही पवित्रता बनाए रखना है। यही वह चीज है, जिसे तुम्हें अभ्यास में लाना चाहिए(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी वफादारी कायम रखनी चाहिए)। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गई कि परमेश्वर जिन्हें विजेता बनाने का इरादा रखता है वे ऐसे लोग होते हैं जो परीक्षणों के दौरान अपना सच्चा दिल परमेश्वर को दे सकते हैं। ये लोग जितने बड़े परीक्षणों का अनुभव करते हैं, उनका परमेश्वर-प्रेमी दिल उतना ही मजबूत होता जाता है। मैंने देखा कि परमेश्वर लोगों को पूर्ण करने के लिए परीक्षणों का उपयोग करता है। इस बारे में सोचती हूँ तो यह वास्तव में सच है। हर बार जब भी मैंने उत्पीड़न का अनुभव किया, परमेश्वर में मेरी आस्था थोड़ा-सी और अडिग हो गई। बार-बार का यह उत्पीड़न परमेश्वर द्वारा मेरे आध्यात्मिक कद के अनुसार व्यावहारिक रूप से माहौल का इंतजाम करना था ताकि वह मेरी आस्था को पूर्ण कर सके और मेरे आध्यात्मिक कद का संवर्धन कर सके। मैंने दिल से परमेश्वर का धन्यवाद किया। परमेश्वर के वचनों ने मुझे यह आस्था और हिम्मत दी कि मैं सच्चे मार्ग पर कायम रह सकूँ। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, परमेश्वर से मदद माँगी कि वह मुझे परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और उसके लिए अपनी गवाही में अडिग रहने और परमेश्वर के बारे में शिकायत न करने में सक्षम बनाए, फिर चाहे भविष्य में मुझे किसी भी पीड़ा का सामना करना हो। एक शाम, मुझे पतरस के अनुभव याद आए, जिसके बारे में हमने पहले एक सभा में संगति की थी। जब पतरस 18 साल का था तो उसने परमेश्वर में विश्वास के मार्ग पर चलने के लिए अपने माता-पिता, परिवार और सांसारिक संभावनाओं को त्याग दिया था। बाद में जब उसने प्रभु की पुकार सुनी तो दूसरी किसी भी चीज की परवाह किए बिना प्रभु का अनुसरण किया। इसने मुझे बहुत ही ज्यादा सोच-विचार में डाल दिया। मैं जानती थी कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर सच्चा परमेश्वर है, लौटकर आया हुआ प्रभु यीशु है, लेकिन मैंने परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए कोई कीमत नहीं चुकाई थी। फिर भी मैं एकचित्त होकर परमेश्वर का अनुसरण नहीं कर पाई। मुझे बहुत शर्म महसूस हुई। यह सोचकर मेरा दिल रोशन हो गया और मुझे महसूस हुआ कि विकल्प चुनने में परमेश्वर मेरा मार्गदर्शन कर रहा है। मुझे परमेश्वर का अनुसरण करने और अपना कर्तव्य निभाने में दृढ़ रहना था। इसलिए, मैंने भाई-बहनों से संपर्क करने के लिए अपनी बहन के फोन का उपयोग किया, उन्हें बताया कि मैं अपनी पढ़ाई छोड़ना चाहती हूँ और परमेश्वर का अनुसरण करना चाहती हूँ, और अगर मेरे माता-पिता ने मुझे फिर से रोकने की कोशिश की, तो मैं घर से भाग जाऊँगी। एक बहन ने मेरे साथ संगति की, कहा, “तुम एक लड़की हो, और अगर तुम इस तरह भाग गई तो तुम्हारे परिवार को चिंता होगी। हमारा परमेश्वर का अनुसरण करना बिल्कुल स्वाभाविक और उचित है। तुम अपने माता-पिता को चीजें स्पष्ट रूप से समझा सकती हो, उन्हें बता सकती हो कि तुम परमेश्वर का अनुसरण करना चुन रही हो। अगर वे फिर भी तुम्हें रोकने की कोशिश करते हैं, तब तुम्हें जीवन में वह मार्ग चुनना होगा जिस पर तुम्हें चलना चाहिए।” मुझे लगा कि बहन ने जो कहा वह उचित था और मैं इस बारे में सोचने लगी कि अपने पिता के सामने अपनी स्थिति कैसे व्यक्ति करूँ।

अप्रत्याशित रूप से, अगले कुछ दिनों में, मेरे प्रति मेरे माता-पिता का रवैया अचानक बहुत अच्छा हो गया। उन्होंने मुझे बताया कि मेरे पैदा होने के बाद से ही उन्होंने मेरी देखभाल करने के लिए कितनी कड़ी मेहनत की थी। मेरे पिताअक्सर कहते थे, “मेरी प्यारी बेटी, क्या तुम जानती हो कि हम तुमसे कितना प्यार करते हैं? तुम्हें बचपन में अस्थमा था, और रात में, तुम्हें साँस लेने में तकलीफ होती थी। मैं और तुम्हारी माँ तुम्हें अपनी गोद में रखते थे और दवा खिलाते थे। रात में हम बारी-बारी से तुम्हें गोद में रखते थे, तुम्हारी सोने की स्थिति बदलने में मदद करते थे। अगर हमने उस तरह तुम्हारी देखभाल नहीं की होती, तो तुम ठीक कैसे होतीं? हमने तुम्हें सबसे अच्छी शिक्षा देने के लिए पेट काट-काट कर बचत की ताकि तुम भविष्य में बाकियों से अलग दिख सको। हमारा सारा पैसा तुम पर खर्च हो गया। तुम हमारी दयालुता को नहीं भूल सकती हो!” अपने माता-पिता की बातें सुनकर मेरे दिल में एक शूल उठा और मैंने महसूस किया कि मैं उनकी ऋणी हूँ। बाद में, एक सभा में, मैंने अपनी दशा के बारे में संगति में खुलकर बात की। एक बहन ने मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़कर सुनाया : “हमारा जीवन और हमारे प्राण परमेश्वर ने रचे हैं, ये हमें उसी से मिले हैं—वे हमारे माता-पिता से नहीं आते, प्रकृति से तो बिल्कुल भी नहीं, ये चीजें हमें परमेश्वर ने दी थीं; बात बस इतनी है कि हमारी देह हमारे माता-पिता से पैदा हुई है और हमारे बच्चे हमसे पैदा हुए हैं, लेकिन उनकी किस्मत पूरी तरह परमेश्वर के हाथों में है। हम परमेश्वर पर विश्वास कर सकते हैं, यह भी परमेश्वर का दिया हुआ अवसर है; यह उसने नियत किया है और उसका अनुग्रह है। इसलिए, तुम्हें किसी और के प्रति अपने दायित्व या जिम्मेदारी को पूरा करने की कोई आवश्यकता नहीं है; तुम्हें केवल एक सृजित प्राणी के रूप में परमेश्वर के प्रति अपने कर्तव्य को पूरा करना चाहिए। लोगों को किसी भी अन्य चीज से बढ़कर यही करना चाहिए और यह सबसे प्रमुख मामला है जिसे लोगों को अपने जीवन में सबसे पहले पूरा करना चाहिए। यदि तुम अपना कर्तव्य अच्छी तरह से नहीं करते हो, तो तुम मानक पर खरा उतरने वाले एक सृजित प्राणी नहीं हो। दूसरों की नजर में, तुम एक नेक पत्नी और प्यारी माँ, एक सक्षम गृहिणी, एक संतानोचित संतान और समाज की एक अच्छी सदस्य हो सकती हो, लेकिन परमेश्वर के सामने तुम एक ऐसी इंसान हो जो उसके खिलाफ विद्रोह करती है, जो परमेश्वर में विश्वास तो करती है लेकिन एक सृजित प्राणी के कर्तव्य और दायित्व को पूरा नहीं करती, जो परमेश्वर में विश्वास तो करती है लेकिन सत्य का अनुसरण नहीं करती, सच्चे मन से परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं करती और उसे उजागर किया जाएगा और हटा दिया जाएगा। क्या ऐसी इंसान परमेश्वर की स्वीकृति पा सकती है? ऐसे लोग व्यर्थ होते हैं(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने गलत विचारों को जानकर ही खुद को सचमुच बदला जा सकता है)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मुझे एहसास हुआ कि मेरा यह मानना गलत था कि मेरे माता-पिता ने मेरे लिए इतना अधिक त्याग किया है और वे ही मेरी सबसे ज्यादा परवाह करते हैं और परमेश्वर का अनुसरण करने का विकल्प चुनने का मतलब यह होगा कि मैं उनकी ऋणी हूँ। वास्तव में, यह परमेश्वर है जिसने मुझे यह सब प्रदान किया है। मेरा जीवन और मुझे संवर्धन के लिए जो कुछ भी चाहिए वह सब मुझे परमेश्वर द्वारा प्रदान किया गया था। मेरे माता-पिता ने मेरा पालन-पोषण किया, यह भी परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के कारण था। वह परमेश्वर है जिसकी मैं ऋणी हूँ, न कि अपने माता-पिता की। मैंने सोचा कि कैसे मेरे माता-पिता ने कहा कि उन्होंने मुझे आनंद लेने के लिए सभी अच्छी चीजें और अच्छी शिक्षा दी है, और वे मुझसे बहुत प्यार करते हैं। वास्तव में, वे केवल ऊपरी तौर पर मेरे साथ अच्छे थे। जब प्रभु की वापसी के महान मामले का सामना करना पड़ा, तो उन्होंने हमेशा मुझे सच्चा मार्ग स्वीकार करने से रोकने की कोशिश की। यह कैसे प्यार था? उन्होंने मुझे परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने के लिए लुभाने के वास्ते ऐसी बातें कहीं! मैंने शैतान की साजिशों की असलियत देखने देने के लिए परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन का धन्यवाद किया। बाद में, मैंने पूरी रात अपने पिता को पत्र लिखने में बिताई, जिसमें मैंने एक बार फिर उन्हें सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य के बारे में गवाही दी। मैंने यह भी लिखा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन न पढ़ पाने पर मैं कैसा महसूस करती हूँ और सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करने के अपने दृढ़ संकल्प को व्यक्त किया। पत्र के अंत में मैंने लिखा, “प्रभु की वापसी की भविष्यवाणियाँ पूरी हो चुकी हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही लौटकर आया हुआ प्रभु यीशु है। मैंने आपके साथ बहुत संगति की है, लेकिन आप सुनने से इनकार करते हैं और यहाँ तक कि मुझे सताते और रोकते भी हैं। अब मैं विनती करती हूँ कि आप मुझे विश्वास की स्वतंत्रता दें और मुझे सभाओं में भाग लेने दें। अगर आप मुझे रोकते रहे तो एक दिन मैं घर छोड़ दूँगी। हम एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं, फिर भी आपने मुझसे विश्वास की स्वतंत्रता का अधिकार छीन लिया है। मैं हमेशा सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए दृढ़ हूँ; आप मुझे नहीं रोक सकते।” इसके बाद मैंने वह पत्र अपने पिता को दिखाया। इसे पढ़ने के बाद मेरे पिता ने मुझसे कहा, “मैं तुम्हें सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करने से मना करता हूँ। मैंने तुम्हें तीन बार चेतावनी दी है। तुम अभी भी विश्वास करने पर क्यों अड़ी हुई हो? तुम बार-बार यह बात क्यों उठा रही हो? तुम अभी भी उनकी कलीसिया में क्यों शामिल होना चाहती हो?” मैंने अपने पिता से कहा, “जो कहने की जरूरत थी वह मैं आपको पहले ही बता चुकी हूँ। चाहे कुछ भी हो जाए, मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करना नहीं छोड़ूँगी!” मेरे पिता एक पल के लिए चुप रहे, फिर बोले, “मैंने तुम्हें पढ़ने-लिखने इसलिए भेजा था ताकि तुम विभिन्न तरीकों से मेरी मदद कर सको, लेकिन अब तुम्हारा ज्ञान मुझसे अधिक हो गया है, और तुम न केवल मेरी मदद नहीं करती हो, बल्कि यहाँ तक कहती हो कि मेरी शिक्षाएँ गलत हैं। मैं अब दूसरों को कैसे उपदेश दे सकता हूँ? मैं पादरी कैसे हो सकता हूँ? अगर तुम पिता से प्यार करती हो तो जैसा मैं कहता हूँ वैसा करो। बाइबल कहती है कि बच्चों को अपने माता-पिता की आज्ञा माननी चाहिए। केवल मेरी आज्ञा मानकर ही तुम यह साबित कर सकती हो कि जिस मार्ग पर तुम विश्वास करती हो वह सही है।” मैं जानती थी कि मेरे पिता को यह डर था कि मेरे सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करने से एक पादरी के रूप में उनकी स्थिति पर असर पड़ेगा और विश्वासियों के बीच उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान होगा। मैंने कहा, “मैं बहुत भाग्यशाली हूँ कि मेरा जन्म एक मसीही परिवार में हुआ और मैं बचपन से ही जानती आई हूँ कि परमेश्वर है। लेकिन आपकी सभी शिक्षाएँ सही नहीं हैं। आप जो सही कहते हैं, मैं उसका पालन करूँगी, लेकिन आप जो गलत कहते हैं, मैं उसका पालन नहीं कर सकती। मैंने अंत के दिनों का परमेश्वर का कार्य स्वीकार कर लिया है और प्रभु यीशु की वापसी का स्वागत किया है। मुझे रोककर आप मुझे परमेश्वर की वाणी सुनने और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने से रोकते हैं। मैं आपकी कैसे सुन सकती हूँ?” यह देखकर कि मैं समझौता नहीं करूँगी, मेरे पिता ने आगे कहा, “मैं तुम्हें मजबूर नहीं करूँगा। तुम अपना मार्ग चुन सकती हो। लेकिन तुम्हें पता होना चाहिए कि अगर तुम मेरी बात मानोगी, तो हम एक साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से जी सकते हैं। अगर तुम सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करना चुनती हो, तो हमारा परिवार टूट जाएगा, क्योंकि हम अलग-अलग रास्तों पर चलते हैं। इसका मतलब है कि अब से हमें अपने अलग-अलग रास्ते पर चलना होगा!” मैं थोड़ी भयभीत हो गई और मैंने सोचा, “अगर मैं अपने परिवार से अलग हो गई, तो मैं कहाँ जाऊँगी? मैं अपने दम पर कैसे जियूँगी?” लेकिन मैं जानती थी कि अगर मैं सब कुछ खो भी दूँ, तो भी मैं परमेश्वर के साथ विश्वासघात नहीं कर सकती। इसलिए मैंने एक बार फिर अपने पिता से दृढ़तापूर्वक कहा, “मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करना और सही मार्ग पर चलना चाहती हूँ!”

इसके बाद मैं एक दूसरे इलाके में एक दोस्त के घर रहने चली गई। यूँ तो मेरी दोस्त परमेश्वर में विश्वास नहीं करती थी, लेकिन जब उसने मेरे उत्पीड़न का अनुभव सुना तो वह मुझे समझ सकी थी। बाद में, मैंने एक मानवाधिकार संगठन से मदद माँगी। मेरा बयान सुनने के बाद कर्मचारियों ने मुझे बताया कि अगर मेरे परिवार ने मेरी विश्वास की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप किया, तो वे मुकदमा दायर कर सकते हैं और मेरे माता-पिता को चेतावनी जारी कर सकते हैं। फिर, वे मुझे एक आश्रय स्थल में ले गए। यहाँ, मेरे पास जीवित रहने के लिए जो चाहिए था वह था, लेकिन मैं कलीसियाई जीवन नहीं जी सकती थी या परमेश्वर के वचन नहीं पढ़ सकती थी, और मेरा दिल अभी भी बहुत पीड़ा में था। बाद में, मैंने भाई-बहनों से संपर्क करने के लिए किसी और के फोन का उपयोग किया। बहन सिल्विया ने मुझे बताया कि मेरे माता-पिता ने मुझे खोजने के लिए पुलिस के साथ मिलीभगत की थी, जिसने मेरे संपर्क में रहे तीन भाई-बहनों को गिरफ्तार कर लिया था। मुझे धक्का लगा। मैंने कभी नहीं सोचा था कि पुलिस ऐसा कुछ करेगी। इसलिए मैं मदद के लिए मानवाधिकार संगठन के पास गई। अप्रत्याशित रूप से, उस दोपहर बाद मेरे माता-पिता बहुत सारे पुलिस अधिकारियों को मानवाधिकार संगठन के स्थान पर ले आए। मेरी माँ रोई और उसने मुझसे घर आने की मिन्नतें कीं, मुझसे कह रही थी कि वे मेरी आस्था में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। फिर हम एक समझौते पर पहुँचे, और मानवाधिकार संगठन ने मेरी माँ से समझौते पर हस्ताक्षर करवाए। पुलिस ने मुझे झाँसा दिया, कहा कि वह भाई-बहनों को पहले ही रिहा कर चुकी है। लेकिन जब मैं पुलिस स्टेशन पहुँची, तो भाई-बहन अभी भी हिरासत केंद्र में बंद थे, और उन्हें बेरहमी से पीटा गया था। एक बहन को तो पीट-पीटकर बेहोश कर दिया गया था। मैंने पुलिस को बताया कि मैंने घर क्यों छोड़ा, और मेरे परिवार ने कैसे मेरा उत्पीड़न किया था और मैंने समझा दिया कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहाँ विश्वास की स्वतंत्रता को कानून के द्वारा रक्षा मिली हुई है, और यह कि मेरे माता-पिता द्वारा मुझे अपनी आस्था छोड़ने के लिए मजबूर करने के बार-बार के प्रयास भारतीय कानून के अनुरूप नहीं थे। एक पुलिस अधिकारी मुझ पर जोर से चिल्लाया, “कैसी आस्था? यह सब बंद करो! तुमने अपनी आस्था के लिए अपने माता-पिता के साथ विश्वासघात किया। चाहे कुछ भी हो जाए, तुम्हें अपने माता-पिता की आज्ञा माननी होगी!” मैं पुलिस अधिकारी के चिल्लाने से बहुत डर गई थी। पहले, मैं केवल यह जानती थी कि सीसीपी सरकार परमेश्वर का प्रतिरोध करती है। अब मैंने देखा कि यहाँ भी बहुत सारे पुलिस अधिकारी परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और उससे नफरत करते हैं। अंत में, पुलिस प्रमुख ने कहा, “हमें एक समझौते पर पहुँचने की जरूरत है। तुम घर लौट जाओगी और अपने माता-पिता के साथ रहोगी, और तुम्हारे माता-पिता अब और तुम्हारा उत्पीड़न नहीं सकते हैं और न ही तुम्हें परमेश्वर में विश्वास करने से रोक सकते हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25-28 के अनुसार, भारतीयों को धार्मिक विश्वास की स्वतंत्रता है। तुम सभी को यह याद रखना होगा।” मेरी माँ सहमत हो गईं।

पुलिस स्टेशन से लौटने के तीसरे दिन, मेरे चचेरे भाइयों ने मेरे माता-पिता के साथ मिलीभगत कर मुझे अपने गृहनगर लौटने और वहाँ एक कलीसिया में जाने का झाँसा दे दिया। उन्होंने वहाँ के पादरी से मेरे तथाकथित “दानवों” को भगाने के लिए मेरे लिए प्रार्थना करवाई। मैंने वहाँ जाने से रोकने की कोशिश की, लेकिन मैं उनके मुकाबले कहीं नहीं ठहरती थी। इसलिए, मैंने ध्यान से देखा कि वे क्या करने जा रहे हैं। वे मिलकर गा रहे थे, ऐसा लग रहा था जैसे वे बहुत दुखी हों, आँखें बंद किए हुए थे, अपने हाथ उठा रहे थे और आँसू बहा रहे थे। एक लड़की बेहोश हो गई, और वे उसे बेंच पर ले गए, कह रहे थे कि वह गुजर चुकी है लेकिन जाग जाएगी। उन्हें विश्वास था कि लड़की स्वर्ग से कोई समाचार लाएगी। फिर वे बकवास करने लगे, कह रहे थे कि मुझे गुमराह किया गया है। उनके क्रियाकलापों से मैंने देखा कि कैसे ये तथाकथित धार्मिक लोग दूसरों को मूर्ख बनाते हैं, और यह भी समझा कि परमेश्वर ने मुझे इन चीजों का अनुभव करने दिया ताकि मैं विवेकशीलता में बढ़ सकूँ, शैतान की दुष्टता को स्पष्ट रूप से देख सकूँ, और स्पष्ट रूप से देख सकूँ कि कैसे ये धार्मिक लोग दूसरों को छलते और गुमराह करते हैं। बस कुछ ही घंटों में वे वहाँ मौजूद बहुत सारे लोगों को धोखा दे चुके थे। मैंने मन ही मन खुद से कहा, “चाहे वे कुछ भी कहें, चाहे कुछ भी हो जाए, मुझे अपनी स्थिति में अडिग रहना चाहिए।” अंत में, भले ही वे सब मेरे खिलाफ एकजुट हो गए, लेकिन मुझ पर कोई असर नहीं हुआ। यह देखकर कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर में मेरी आस्था अभी भी दृढ़ है, मेरे परिवार ने कुछ और भी अधिक अविश्वसनीय किया। अगली सुबह, मेरे चचेरे भाई और माता-पिता जबरदस्ती मुझे एक ऐसी जगह ले गए जहाँ जादू-टोना किया जाता था। यह कुछ ऐसा था जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी—मेरे माता-पिता, और कोई नहीं, जो इतने सालों से प्रभु यीशु में विश्वास करते थे, ऐसा काम कर रहे थे! मैंने पहले सुना था कि जब कोई तांत्रिक किसी पर मंत्र फूँकता है, तो वह व्यक्ति पागल हो सकता है। मैं अपने दिल में थोड़ी डरी हुई थी। लेकिन तभी मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की वेबसाइट पर “यातनाओं से गुज़रने के बाद एक नया जीवन” नाम की एक फिल्म याद आई। फिल्म में, पुलिस ने एक बहन से परमेश्वर के साथ जबरन विश्वासघात कराने के लिए नशीली दवाएँ दीं, उसे मानसिक रूप से विक्षिप्त बनाने की कोशिश की। लेकिन पुलिस के कहर और यातना पर विजय पाने के लिए बहन परमेश्वर के वचनों पर निर्भर रही और अंततः अपनी गवाही में अडिग रही, उसने शैतान को शर्मिंदा किया। यह सोचकर, मुझे कुछ साहस मिला। मैंने बहन सिल्विया को फोन पर संदेश भेजा, उसे वह सब बताया जो हुआ था। उसने मुझसे परमेश्वर पर निर्भर रहने के लिए कहा और मुझे परमेश्वर के कुछ वचन भी भेजे। परमेश्वर के वचनों के एक अंश ने मुझे शक्ति दी, और मुझे आने वाली स्थितियों का सामना करने के लिए और अधिक आस्था दी। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “जब परमेश्वर किसी व्यक्ति को चुनता है और उसे शैतान की सत्ता से निकालकर अपने घर में ले जाता है, तो क्या शैतान परमेश्वर के लिए कोई शर्तें रखने की हिम्मत करता है? वह कोई भी शर्त रखने की हिम्मत नहीं करता, न ही कुछ कहने का साहस करता है। यदि परमेश्वर कहता है, ‘यह व्यक्ति मेरा है, तुम्हें अब इसे छूने की अनुमति नहीं है’ तो शैतान आज्ञाकारी बनकर उस व्यक्ति को सौंप देता है। इस व्यक्ति के खान-पान, कपड़े-लत्ते, रहन-सहन, आने-जाने और हर गतिविधि पर परमेश्वर की देखरेख और नजर होती है, और परमेश्वर की अनुमति के बिना शैतान उस व्यक्ति को दोबारा छूने की हिम्मत नहीं करेगा। इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ यह है कि व्यक्ति पूरी तरह से परमेश्वर की देखरेख और सुरक्षा के अधीन रहता है, जिसमें बाहरी ताकतों का कोई हस्तक्षेप या अतिक्रमण नहीं होता है, उसके दिन-प्रतिदिन के सुख, दुख और दर्द, सभी परमेश्वर की नजरों में जाँच-पड़ताल के अधीन और उसकी देखरेख और सुरक्षा के अधीन होते हैं(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सृजित प्राणी का कर्तव्य उचित ढंग से निभाने में ही जीने का मूल्य है)। मैं परमेश्वर के वचनों से समझ गई कि शैतान भी परमेश्वर के हाथों में है और परमेश्वर की अनुमति के बिना, शैतान कुछ भी करने की हिम्मत नहीं करता। मैं अब ऐसे किसी भी तरीके को लेकर भयभीत नहीं थी जिससे मेरा परिवार मुझे डराने की कोशिश कर सकता था या ऐसी किसी भी रणनीति को लेकर भयभीत नहीं थी जिसे वे मुझे जबरन परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने के लिए इस्तेमाल कर सकते थे। यह देखकर कि वे, ईसाई होने के नाते, जाकर दुष्ट आत्माओं की आराधना कर सकते हैं और इतने सालों तक प्रभु में विश्वास करने के बाद, वे ऐसे काम कर सकते हैं जो परमेश्वर को धोखा देते हैं और शर्मिंदा करते हैं, मुझे उनसे विशेष रूप से निराशा हुई। सिर्फ इसलिए कि मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार कर लिया था, उन्होंने मुझे परेशान करने और मुझे सच्चे मार्ग के साथ विश्वासघात करने के लिए मजबूर करने के वास्ते इन तरीकों का सहारा लिया। वे सत्य से इतनी नफरत करते थे! मैंने अपनी माँ से कहा, “तुम ऐसा क्यों कर रही हो? क्या तुम नहीं जानतीं कि यह जादू-टोना है, कि यह शैतान और दुष्ट आत्माएँ हैं? तुम लोग प्रभु के विश्वासी हो, फिर भी, मुझे परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करने से रोकने के लिए, तुमने वास्तव में शैतान और दुष्ट आत्माओं का रुख किया है!” मेरी माँ ने कहा, “हम यह तुम्हारी भलाई के लिए कर रहे हैं। परमेश्वर से हमारी प्रार्थनाएँ तुम्हें नहीं बदल सकीं, लेकिन शैतान इसमें मदद कर सकता है। हम यहाँ उनकी आराधना करने नहीं आए हैं।” उनके असली रंग देखकर मैं बहुत उदास हो गई। वे छद्म-विश्वासियों से अलग नहीं थे। जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी वह यह था कि तांत्रिक ने, मुझे वहाँ लाने के मेरे परिवार के उद्देश्य को जानते हुए, मुझसे कहा, “मेरी प्रिय, तुम जिस परमेश्वर पर विश्वास करती हो, उससे प्रार्थना करो। परमेश्वर केवल एक है और जिस परमेश्वर में तुम विश्वास करती हो वही सही है।” मैं बहुत खुश थी, और मैंने सचमुच परमेश्वर की सुरक्षा देखी। परमेश्वर हर चीज पर शासन करता है। अपनी तमाम कोशिशों के बाद, मेरे माता-पिता ने देखा कि वे मेरे साथ कुछ नहीं कर सकते, इसलिए वे सभाओं में मेरी उपस्थिति को प्रतिबंधित न करने, मेरी आस्था में हस्तक्षेप करना बंद करने और इस बात की परवाह करना बंद करने के लिए सहमत हो गए कि मैं स्कूल जाती हूँ या नहीं। 12 जनवरी 2021 को मैं आखिरकार घर पर खुलेआम ऑनलाइन सभाओं में भाग लेने में सक्षम हो गई। यूँ तो मेरे माता-पिता जब मुझे सभाओं में भाग लेते देखते थे तो कभी-कभी अब भी मुझे डाँट देते थे और अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए वापस स्कूल जाने के लिए मनाने की कोशिश करते थे, लेकिन मुझ पर अब कोई असर नहीं होता था। बाद में मैंने घर छोड़ दिया और कलीसिया में पूर्णकालिक रूप से अपना कर्तव्य निभाने लगी।

इस अनुभव से गुजरने के बाद मैंने वास्तव में महसूस किया कि सब कुछ परमेश्वर के हाथों में है। परमेश्वर ने इन कठिन परिस्थितियों का उपयोग मेरी आस्था को पूर्ण बनाने और अपने परिवार और धर्मावलंबी लोगों के भेद की पहचान बढ़ाने देने के लिए भी किया। मेरा परिवार पीढ़ियों से प्रभु में विश्वास करता आया है और इसमें बहुत से पादरी हैं। मुझे लगता था कि वे सच्चे दिल से परमेश्वर की सेवा करते हैं और परमेश्वर से प्रेम करते हैं, लेकिन अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य ने उन सभी को प्रकट कर दिया। अब मैं सत्य से घृणा करने के उनके सार को स्पष्ट रूप से देखती हूँ। वे परमेश्वर में सच्चे दिल से विश्वास बिल्कुल भी नहीं करते। वे परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। यह परमेश्वर के वचनों की अगुआई और मार्गदर्शन ही है जिसने मुझे अपने परिवार के चहुँओर के हमलों के बीच अडिग रहने में सक्षम बनाया है। परमेश्वर का धन्यवाद! मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करने में कभी पछतावा नहीं करूँगी।

पिछला: 23. मैंने अपनी ईर्ष्या का समाधान कैसे किया

अगला: 25. जब मुझे पता चला कि माँ को बाहर निकाला जाने वाला है

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

संबंधित सामग्री

8. सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने मुझे शुद्धिकरण प्राप्त करने का मार्ग दिखाया

लेखक: गांगकियांग, अमेरिकामैं रोज़ी-रोटी कमाने के इरादे से 2007 में अपने दम पर सिंगापुर आया। सिंगापुर का मौसम साल-भर गर्म रहता है। ड्यूटी के...

38. परमेश्वर मेरे साथ है

गुओज़ी, संयुक्त राज्य अमेरिकामेरा जन्म एक ईसाई परिवार में हुआ था, और जब मैं एक वर्ष की थी, तो मेरी माँ ने लौटे हुए प्रभु यीशु—सर्वशक्तिमान...

12. त्रित्व की पहेली का निराकरण

जिन्ग्मो, मलेशियामैं भाग्यशाली थी कि 1997 में मैंने प्रभु यीशु के सुसमाचार को स्वीकार किया और, जब मैंने बपतिस्मा लिया, तो पादरी ने...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें