90. निडर होकर कर्तव्य ग्रहण

सोंग वेन, चीन

पिछली मई के आखिर में उन कलीसियाओं को सीसीपी की गिरफ्तारियों का सामना करना पड़ा, जिनके लिए मैं जिम्मेदार थी और परमेश्वर के वचनों की किताबें जल्दी से जल्दी स्थानांतरित करनी थीं। जब उच्च अगुआओं को इस बारे में पता चला तो उन्होंने मुझे और बहन सोंग एन को तुरंत किताबों के स्थानांतरण में समन्वय करने का निर्देश दिया। लेकिन स्थानांतरण के दौरान हम पर पुलिस निगरानी रखे थी और पुलिस ने सभी किताबें जब्त कर लीं। जब मैंने खबर सुनी तो मुझे यकीन नहीं हुआ और लगा कि मैं निराशा के गर्त में गिर गई हूँ। एक कलीसिया अगुआ के रूप में मैं परमेश्वर के वचनों की किताबों को बचाने में नाकाम रही थी और इससे बहुत बड़ा नुकसान हो गया था। यह एक बहुत बड़ी आपदा थी। मैं अवाक रह गई थी। जहाँ मैं बरखास्त होने को लेकर चिंतित थी, वहीं मेरी ज्यादा चिंता यह भी थी कि कहीं मैं अपना कर्तव्य करने का मौका ही न गँवा बैठूँ और अगर ऐसा होता है तो क्या मैं उद्धार पाने का अपना मौका पूरी तरह से नहीं खो दूँगी? इसके बारे में सोचने मात्र से ही मेरा दिल चिंताग्रस्त हो गया। मैं अक्सर निराशा में आहें भरती थी और जब मैं सोचती कि मैंने कितना बड़ा अपराध किया है तो मैं वास्तव में निराश महसूस करती थी और सिर्फ अपने कर्तव्य पूरे करने के लिए खुद को मजबूर करती थी। एक दिन बहन सोंग एन के साथ बातचीत में हमने अगुआ के बतौर ये कियान के बारे में बात की जो अपने कर्तव्य की उपेक्षा कर रही थी, जिसके कारण परमेश्वर के वचनों की कई किताबें पुलिस द्वारा जब्त कर ली गई थीं और उसे बाहर निकाल दिया गया था। मैं और गहराई से विचार करने लगी, जब मैंने सोचा कि मैं एक कलीसिया अगुआ भी हूँ, जो किताबों के स्थानांतरण के लिए सीधे जिम्मेदार है और इसलिए निस्संदेह इस सब के लिए मेरी जिम्मेदारी सबसे ज्यादा है। यह निश्चित लग रहा था कि मुझे बरखास्त कर दिया जाएगा। अगर मुझे पता होता कि यह दिन आएगा तो मैं अगुआ बनना ही पसंद न करती ताकि मुझे इतनी भारी जिम्मेदारी न उठानी पड़े। उस दौरान जब भी मैं इस बारे में सोचती तो मुझे हताशा महसूस होती और मैं खुद को लगातार सूनेपन की भावना से भरा हुआ पाती थी। हालाँकि मैं हार मानने वाली नहीं थी लेकिन बरखास्त किए जाने की आशंका मात्र से मैं अपने कर्तव्यों के प्रति जिम्मेदारी का एहसास खो बैठी थी और बस औपचारिकताएँ पूरी करती रहती थी।

जुलाई के मध्य तक उच्च अगुआओं ने जब्त की गई किताबों के बारे में स्थिति की जाँच-पड़ताल की और कहा कि यह एक विशेष परिस्थिति थी जिसका हम अनुमान नहीं लगा पाए थे और इसकी वजह मानवीय भूल नहीं थी, तो उन्होंने हमें इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया और हमें बस अपने अनुभवों और सीखे गए सबकों को संक्षेप में बताने और आगे बढ़ते हुए अपने कर्तव्यों को पूरी लगन से करने की याद दिलाई गई। हालाँकि मुझे पता था कि मुझे अपने कर्तव्य को सँजोना चाहिए, फिर भी मैंने सोचा, “यह एक अप्रत्याशित घटना थी और उन्होंने मुझे जिम्मेदार नहीं ठहराया, लेकिन एक अगुआ के नाते बहुत काम करना पड़ता है और बहुत बड़ी जिम्मेदारियाँ होती हैं। अगर मैं भविष्य में मुद्दों को गलत तरीके से सँभालती हूँ और भारी नुकसान पहुँचाती हूँ तो मुझे कम से कम बरखास्त किया जा सकता है या सबसे बुरी स्थिति में मुझे बाहर कर दिया जाएगा। इसका मतलब होगा कि मैं उद्धार की सारी उम्मीद गँवा दूँगी।” इस बात को ध्यान में रखते हुए मैं एक ऐसा कर्तव्य चाहती थी जिसमें जिम्मेदारी कम हो और मैं अपनी अगुआई की भूमिका छोड़ दूँ। लेकिन मुझे पता था कि अपने कर्तव्य को त्यागकर मैं परमेश्वर के साथ विश्वासघात करूँगी और यह और भी बड़ी समस्या थी। तर्कसंगत रूप से सोचते हुए मैंने खुद को समर्पण करने और सहयोग करना जारी रखने के लिए मजबूर किया। अगस्त की शुरुआत में प्रचारकों के लिए कलीसिया के चुनाव के दौरान मैंने सुना कि कुछ भाई-बहन मुझे और बहन गु नान को नामांकित करना चाहते हैं और मेरा दिल अचानक बैठ गया और मेरी चिंताएँ उभर आईं, “मैं पहले से ही एक कलीसिया के लिए जिम्मेदार हूँ और इसमें बहुत सारी जिम्मेदारियाँ शामिल हैं। अगर मुझे प्रचारक के रूप में चुना जाता है और कई कलीसियाओं की देखरेख करने को कहा जाता है तो क्या उसमें और अधिक जिम्मेदारी और खतरा शामिल नहीं हो जाएगा? अगर मैं ठीक से काम न कर पाई और बहुत अधिक नुकसान पहुँचा तो क्या होगा? अगर मुझे इस वजह से बाहर कर दिया गया तो क्या मेरा कोई अच्छा परिणाम और मंजिल नहीं होगी?” इस बात का खयाल आते ही मैं चुने जाने से डर गई। मुझे एहसास हुआ कि अपनी दशा से न निपटना खतरनाक था और वह मेरे कर्तव्य के प्रदर्शन को प्रभावित कर रहा था, इसलिए मैंने परमेश्वर के वचनों में उत्तर ढूँढ़ना शुरू कर दिया।

एक दिन अपनी भक्ति के दौरान मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश मिला : “तुम अपना कर्तव्य निभाने आए हो। तुम चाहे जितनी भी मेहनत करो, या कितने भी कष्ट झेलो, या तुम्हारी कितनी भी काट-छाँट हो, तुम्हें परमेश्वर का धन्यवाद करना चाहिए। परमेश्वर ने तुम्हें यह अवसर दिया है ताकि तुम सभी तरह की अलग-अलग परिस्थितियों का अनुभव कर सको और तुम्हारे पास सभी तरह के व्यक्तिगत अनुभव हों और तुम तमाम स्थितियों का सामना करो। यह अच्छी बात है, और यह सब इसलिए किया गया है ताकि तुम सत्य समझ सको। तो, तुम लोग किस बात को लेकर चिंतित हो? तुम किससे सावधान रह रहे हो? ऐसा करने की कोई जरूरत नहीं है। बस सामान्य रूप से सत्य का अनुसरण करो, अपना सही स्थान खोजो, और अपना कर्तव्य और जो काम सामने आए उसे अच्छी तरह से करो, बस यही काफी है। यह तुम लोगों से बहुत बड़ी माँग नहीं है(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद सात : वे दुष्ट, धूर्त और कपटी हैं (भाग दो))। “छोड़ने के बारे में मत सोचते रहो, तुम्हें एकाग्रचित्त होकर यहाँ जड़ें जमानी होंगी और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाना होगा। तुम अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभा पाओ या नहीं, कम से कम उसमें अपना मन तो लगाओ और सुनिश्चित करो कि अंततः तुमने सभी दिए गए कार्य पूरे कर लिए हैं। भगोड़े न बनो। कुछ लोग कहते हैं, ‘मेरी काबिलियत कम है, मैं बहुत शिक्षित नहीं हूँ और मुझमें कोई प्रतिभा नहीं है। मेरे व्यक्तित्व में दोष हैं और मुझे अपने कर्तव्य में हमेशा कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अगर मैं अपना कर्तव्य अच्छी तरह से नहीं निभा पाया और मेरी जगह कोई और ले लिया गया तो मैं क्या करूँगा?’ तुम्हें किस बात का डर है? क्या यह काम तुम अकेले पूरा कर सकते हो? तुमने अभी-अभी एक भूमिका ली है, तुमसे पूरा काम अकेले करने के लिए नहीं कहा जा रहा है। बस वही काम करों जो तुम्हें करना चाहिए, बस इतना ही काफी है। क्या तब तुमने अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी नहीं कर ली होंगी? यह इतना आसान है; तुम हमेशा इतने चिंतित क्यों रहते हो? तुम्हें डर है कि गिरती हुई पत्तियाँ तुम्हारे सिर पर गिरेंगी और तुम्हारा सिर फाड़ देंगी, और तुम सबसे पहले अपनी खुद की आकस्मिक समय के लिए बनाई गई योजनाओं के बारे में सोचते हो—क्या यह बेकार नहीं है? यहाँ ‘बेकार’ का क्या मतलब है? इसका मतलब है प्रगति करने की कोशिश न करना, अपना सब कुछ देने के लिए तैयार न होना, हमेशा मुफ्तखोरी और अच्छी चीजों का आनंद लेने की चाहत रखना—इस तरह के लोग कूड़ा-कर्कट हैं। कुछ लोग बहुत ही संकीर्ण सोच वाले होते हैं। हम ऐसे लोगों की व्याख्या कैसे कर सकते हैं? (वे बेहद तुच्छ हैं।) एक बेहद तुच्छ व्यक्ति नीच होता है, और कोई भी नीच व्यक्ति अपने खुद के नीच मानकों से एक सज्जन व्यक्ति के चरित्र को माप सकता है और दूसरों को अपने जैसा ही स्वार्थी और नीच मान सकता है। ये लोग किसी काम के नहीं हैं, और भले ही वे परमेश्वर में विश्वास करते हों, उनके लिए सत्य को स्वीकार करना आसान नहीं होगा। किसी व्यक्ति में किस कारण से बहुत कम आस्था होती है? ऐसा उनके द्वारा सत्य न समझने के कारण होता है। यदि तुम बहुत कम सत्यों को समझते हो और उनके बारे में तुम्हारी समझ बहुत उथली है, तो परिणामस्वरूप तुम परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले कार्यों, परमेश्वर द्वारा की जाने वाली चीजों और परमेश्वर द्वारा तुमसे की जाने वाली अपेक्षाओं को नहीं समझ सकते, यदि तुम ऐसी समझ नहीं विकसित कर सकते, तो परमेश्वर के बारे में तुम्हारे मन में सभी प्रकार के संदेह, कल्पनाएँ, गलतफहमियाँ और धारणाएँ उत्पन्न होंगी। यदि तुम्हारा हृदय केवल इन्हीं चीजों से भरा है, तो क्या तुम परमेश्वर में सच्ची आस्था रख सकते हो? परमेश्वर में तुम्हारी सच्ची आस्था नहीं है, और इसीलिए तुम हमेशा बेचैन महसूस करते हो, और चिंता करते हो कि पता नहीं कब तुम्हें बदल दिया जाएगा। तुम डर महसूस करते हो और सोचते हो, ‘परमेश्वर कभी भी निरीक्षण करने के लिए यहाँ आ सकता है।’ सहज रहो! जब तक तुम लोग परमेश्वर के घर द्वारा सौंपे गए काम को अच्छी तरह से करते हो, तब भले ही तुम सत्य और जीवन प्रवेश के अनुसरण में कुछ कमजोर रहो, मैं इसे अनदेखा कर दूँगा(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद सात : वे दुष्ट, धूर्त और कपटी हैं (भाग दो))। परमेश्वर के वचन मुझे गहराई तक छू गए, मानो परमेश्वर सीधे मुझसे बात कर रहा हो। मुझे अपने भीतर तक द्रवित होने की भावना का एक अवर्णनीय एहसास हुआ। परमेश्वर मेरे हर विचार और खयाल की पड़ताल करता है और उसे पता है कि मैं लोगों से निपटने के कलीसिया के सिद्धांतों को नहीं समझती और हमेशा सतर्क और गलतफहमी में रहती हूँ, तो उसने मुझे प्रबुद्ध करने और मार्गदर्शन करने के लिए अपने वचनों का उपयोग किया, ईमानदारी से मुझे चिंता न करने या न डरने के लिए कहा और यह कि उसका घर लोगों को सिद्धांतों के साथ सँभालता है और अपने कर्तव्यों का पालन करने वाले किसी भी सच्चे विश्वासी को मनमाने ढंग से नहीं निकालेगा। परमेश्वर हमें जिम्मेदारियाँ लेने से न डरने और हर दिन की परिस्थितियों का शांति से सामना करने, उसके इरादे समझने के लिए सत्य की खोज करने को प्रोत्साहित करता है। मुझसे परमेश्वर की अपेक्षाएँ बहुत अधिक नहीं हैं। वह बस यही उम्मीद करता है कि मैं वो जिम्मेदारियाँ निभा सकूँ जो मुझे निभानी चाहिए और अपने कर्तव्य में निष्ठावान रहूँ और मानवता के साथ एक ईमानदार व्यक्ति बनूँ। परमेश्वर नहीं चाहता कि मैं डर और चिंता में रहूँ, परेशान महसूस करूँ। लेकिन मैं बहुत धोखेबाज थी और परमेश्वर के वचनों की किताबें जब्त होने की घटना के बाद मैं इस चिंता में रही कि मुझे बरखास्त कर दिया जाएगा या यहाँ तक कि मुझे बाहर निकाल दिया जाएगा और मैं एक अच्छे परिणाम और गंतव्य की अपनी उम्मीद गँवा दूँगी। बाद में जब परमेश्वर के घर ने मुझे जिम्मेदार नहीं ठहराया तो परमेश्वर की दया के लिए आभारी होने और उसके प्रेम का बदला चुकाने के लिए अपने कर्तव्य करने के बजाय मैं सतर्क हो गई और उसे गलत समझने लगी, अपनी अगुआई के कर्तव्य करने से और अधिक डरने लगी और चाहने लगी कि मुझे कोई ज्यादा “सुरक्षित” कर्तव्य मिल जाए। इसके अलावा प्रचारकों के लिए कलीसिया के चुनाव के दौरान चुने जाने से पहले ही मुझे चिंता सताने लगी कि पर्यवेक्षण के बड़े दायरे के साथ मेरी जिम्मेदारियाँ ज्यादा हो जाएँगी और मेरा ज्यादा तेजी से खुलासा होगा, इसलिए मैं चुनाव में भाग नहीं लेना चाहती थी। मैं उस पर संदेह कर उससे सावधान रहने लगी। मैं बहुत धोखेबाज थी!

बाद में मैंने अपनी समस्याएँ हल करने के लिए परमेश्वर के वचनों को पढ़ना जारी रखा। मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश मिला : “कुछ लोग अपना कर्तव्य निभाते हुए जिम्मेदारी उठाने से डरते हैं। यदि कलीसिया उन्हें कोई काम देती है, तो वे पहले इस बात पर विचार करेंगे कि इस कार्य के लिए उन्हें कहीं उत्तरदायित्व तो नहीं उठाना पड़ेगा, और यदि उठाना पड़ेगा, तो वे उस कार्य को स्वीकार नहीं करेंगे। किसी काम को करने के लिए उनकी शर्तें होती हैं, जैसे सबसे पहले, वह काम ऐसा होना चाहिए जिसमें मेहनत न हो; दूसरा, वह व्यस्त रखने या थका देने वाला न हो; और तीसरा, चाहे वे कुछ भी करें, उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं होगी। इन शर्तों के साथ वे कोई काम हाथ में लेते हैं। ऐसा व्यक्ति किस प्रकार का होता है? क्या ऐसा व्यक्ति धूर्त और कपटी नहीं होता? वह छोटी से छोटी जिम्मेदारी भी नहीं उठाना चाहता। उन्हें यहाँ तक डर लगता है कि पेड़ों से झड़ते हुए पत्ते कहीं उनकी खोपड़ी न तोड़ दें। ऐसा व्यक्ति क्या कर्तव्य कर सकता है? परमेश्वर के घर में उनका क्या उपयोग हो सकता है? परमेश्वर के घर का कार्य शैतान से युद्ध करने के कार्य के साथ-साथ राज्य के सुसमाचार फैलाने से भी जुड़ा होता है। ऐसा कौन-सा काम है जिसमें उत्तरदायित्व न हो? क्या तुम लोग कहोगे कि अगुआ होना जिम्मेदारी का काम है? क्या उनकी जिम्मेदारियाँ भी बड़ी नहीं होतीं, और क्या उन्हें और ज्यादा जिम्मेदारी नहीं उठानी चाहिए? चाहे तुम सुसमाचार फैलाते हो, गवाही देते हो, वीडियो बनाते हो, या कुछ और करते हो—इससे फर्क नहीं पड़ता कि तुम क्या करते हो—जब तक इसका संबंध सत्य सिद्धांतों से है, तब तक उसमें उत्तरदायित्व होंगे। यदि तुम्हारे कर्तव्य निर्वहन में कोई सिद्धांत नहीं हैं, तो उसका असर परमेश्वर के घर के कार्य पर पड़ेगा, और यदि तुम जिम्मेदारी उठाने से डरते हो, तो तुम कोई काम नहीं कर सकते। अगर किसी को कर्तव्य निर्वहन में जिम्मेदारी लेने से डर लगता है तो क्या वह कायर है या उसके स्वभाव में कोई समस्या है? तुम्हें अंतर बताने में समर्थ होना चाहिए। दरअसल, यह कायरता का मुद्दा नहीं है। यदि वह व्यक्ति धन के पीछे भाग रहा है, या वह अपने हित में कुछ कर रहा है, तो वह इतना बहादुर कैसे हो सकता है? वह कोई भी जोखिम उठा लेगा। लेकिन जब वह कलीसिया के लिए, परमेश्वर के घर के लिए काम करता है, तो वह कोई जोखिम नहीं उठाता। ऐसे लोग स्वार्थी, नीच और बेहद कपटी होते हैं। कर्तव्य निर्वहन में जिम्मेदारी न उठाने वाला व्यक्ति परमेश्वर के प्रति जरा भी ईमानदार नहीं होता, उसकी वफादारी की क्या बात करना। किस तरह का व्यक्ति जिम्मेदारी उठाने की हिम्मत करता है? किस प्रकार के इंसान में भारी बोझ वहन करने का साहस है? जो व्यक्ति अगुआई करते हुए परमेश्वर के घर के काम के सबसे महत्वपूर्ण पलों में बहादुरी से आगे बढ़ता है, जो अहम और अति महत्वपूर्ण कार्य देखकर बड़ी जिम्मेदारी उठाने और मुश्किलें सहने से नहीं डरता। ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के प्रति वफादार होता है, मसीह का अच्छा सैनिक होता है। क्या बात ऐसी है कि लोग कर्तव्य की जिम्मेदारी लेने से इसलिए डरते हैं, क्योंकि उन्हें सत्य की समझ नहीं होती? नहीं; समस्या उनकी मानवता में होती है। उनमें न्याय या जिम्मेदारी की भावना नहीं होती, वे स्वार्थी और नीच लोग होते हैं, वे परमेश्वर के सच्चे विश्वासी नहीं होते, और वे सत्य जरा भी नहीं स्वीकारते। इन कारणों से उन्हें बचाया नहीं जा सकता। ... अगर कोई समस्या आने पर तुम अपनी रक्षा करते हो और अपने लिए बचने का रास्ता रखते हो, पिछले दरवाजे से निकलना चाहते हो, तो क्या ऐसा करके तुम सत्य का अभ्यास कर रहे हो? यह सत्य का अभ्यास करना नहीं है—यह धूर्त होना है। अब तुम परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य निभा रहे हो। कोई कर्तव्य निभाने का पहला सिद्धांत क्या है? वह यह है कि पहले तुम्हें भरसक प्रयास करते हुए अपने पूरे दिल से वह कर्तव्य निभाना चाहिए, और परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करनी चाहिए। यह एक सत्य सिद्धांत है, जिसे तुम्हें अभ्यास में लाना चाहिए। अपने लिए बचाव का रास्ता छोड़ना, पिछला दरवाजा रखना, अविश्वासियों द्वारा अपनाए गए अभ्यास का सिद्धांत है, और उनका सबसे ऊँचा फलसफा है। सभी मामलों में सबसे पहले अपने बारे में सोचना और अपने हित बाकी सब चीजों से ऊपर रखना, दूसरों के बारे में न सोचना, परमेश्वर के घर के हितों और दूसरों के हितों के साथ कोई संबंध न रखना, अपने हितों के बारे में पहले सोचना और फिर बचाव के रास्ते के बारे में सोचना—क्या यह एक अविश्वासी नहीं है? एक अविश्वासी ठीक ऐसा ही होता है। इस तरह का व्यक्ति कोई कर्तव्य निभाने के योग्य नहीं है(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद आठ : वे दूसरों से केवल अपने प्रति समर्पण करवाएँगे, सत्य या परमेश्वर के प्रति नहीं (भाग एक))। परमेश्वर उजागर करता है कि मानव प्रकृति वास्तव में स्वार्थी, नीच, धोखेबाज और विश्वासघाती होती है, कि कर्तव्य की परवाह किए बिना लोग अपने हितों की पहले सोचते हैं और वे उन कार्यों के लिए जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार होते हैं जिनसे उन्हें लाभ होता है, लेकिन उन कार्यों को लेने के अनिच्छुक होते हैं जिनमें जिम्मेदारियाँ या जोखिम होते हैं। परमेश्वर के वचनों के प्रकाश में आत्म-चिंतन करते हुए मैंने देखा कि इस संबंध में मेरा व्यवहार विशेष रूप से स्पष्ट था। उदाहरण के लिए जब परमेश्वर के वचनों की किताबें जब्त की गईं तो मैंने यह नहीं सोचा कि परमेश्वर के घर के हितों को हुए नुकसान की भरपाई कैसे की जाए, बल्कि इसके बजाय मुझे पछतावा हुआ कि अगर मुझे पता होता कि मुझे इतनी बड़ी जिम्मेदारी मिलेगी तो मैंने अगुआई का कर्तव्य ही नहीं लिया होता। हालाँकि मैं अपने कर्तव्यों से भागती हुई नहीं दिख रही थी लेकिन मैं वास्तव में हताश महसूस कर रही थी। यह सिर्फ इसलिए था क्योंकि मैं परमेश्वर से विश्वासघात करने और कोई अच्छा परिणाम या गंतव्य न मिलने से डरती थी, इसलिए मैंने अपने कर्तव्य छोड़ने की हिम्मत नहीं की। मुझे एहसास हुआ कि मैं पूरी तरह से स्वार्थी और नीच व्यक्ति बन गई थी, मैं बिल्कुल भी ऐसी इंसान नहीं थी जो परमेश्वर से प्रेम करता हो या उसके प्रति वफादार हो। इसके अलावा यह जानने के बाद कि परमेश्वर का घर मुझे इन चीजों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहरा रहा था, न केवल मैंने अपने कर्तव्यों को सँजोना बंद कर दिया, बल्कि मैं परमेश्वर के प्रति और भी अधिक सतर्क हो गई और उसे गलत समझने लगी। मैं एक ऐसे चौकन्ने पक्षी की तरह थी जो अपने ऊपर कर्तव्यों के आने से पहले ही उनसे बचने के बारे में सोचने लगता है। मेरे मन में केवल मेरे अपने हित थे, मैंने इस बात पर बिल्कुल भी विचार नहीं किया कि मेरा व्यवहार सिद्धांतों के अनुरूप है या नहीं या कलीसिया के काम का क्या होगा। मैं बिल्कुल एक छद्म-विश्वासी की तरह व्यवहार कर रही थी। मैं इस तरह विश्वास करके बचाए जाने की उम्मीद कैसे कर सकती थी? मैं परमेश्वर के प्रति लगातार सतर्क थी और जिम्मेदारियाँ उठाने के लिए अनिच्छुक थी और बहुत पहले से ही खुद को परमेश्वर के घर से बाहर कर चुकी थी। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर मुझे निकालना चाहता था, बल्कि मैं खुद ही खुद को निकाल रही थी। इस बारे में सोचने पर मुझे एहसास हुआ कि मेरी समस्या कितनी गंभीर है, इसलिए मैंने मन ही मन परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, मैं लगातार अपने हितों के बारे में ही सोच रही हूँ और पैंतरेबाजी के लिए खुद को मौका देने कोशिश कर रही हूँ। मैं बहुत धोखेबाज रही हूँ। परमेश्वर, अब मुझे पता है कि मैं गलत थी और अब से चाहे मैं एक प्रचारक के रूप में चुनी जाऊँ या नहीं, मैं समर्पण करने को तैयार हूँ। आत्म-चिंतन करने और खुद को और गहराई से जानने के लिए मेरा मार्गदर्शन करो।”

बाद में एक अनुभवात्मक गवाही का वीडियो देखते समय मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश मिला, जिसने मुझे मेरी समस्याओं के बारे में और अधिक समझ दी। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “मसीह-विरोधी अपने मन में ऐसी चीजें पाले रहते हैं, जिनमें से सब परमेश्वर के विरुद्ध गलतफहमियाँ, विरोध, आलोचना और प्रतिरोध होता है। जो भी हो उन्हें परमेश्वर के कार्य का कोई ज्ञान नहीं है। परमेश्वर के वचनों की खोजबीन करते हुए परमेश्वर के स्वभाव, पहचान और सार की खोजबीन करते हुए वे ऐसे निष्कर्षों पर पहुँचते हैं। मसीह-विरोधी इन बातों को दिल में दबाकर खुद को चेताते हैं : ‘सावधानी ही सुरक्षा की जननी है; अपने को छिपाकर चलना ही सबसे अच्छा है; जो पक्षी अपनी गर्दन उठाता है गोली उसे ही लगती है; और ऊँचाई पर तुम अकेले ही होगे! चाहे जब भी हो, कभी भी अपना सिर बाहर निकालने वाले पक्षी की तरह मत बनो, कभी भी बहुत ऊपर मत चढ़ो; जितना अधिक ऊपर चढ़ोगे, उतनी ही जोर से गिरोगे।’ वे यह नहीं मानते कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, न वे ये मानते हैं कि उसका स्वभाव धार्मिक और पवित्र है। वे इन सबको मानवीय धारणाओं और कल्पनाओं से देखते हैं; और परमेश्वर के कार्य को मानवीय दृष्टिकोणों, मानवीय विचारों और मानवीय छल-कपट से देखते हैं, परमेश्वर के स्वभाव, पहचान और सार को निरूपित करने के लिए शैतान के तर्क और सोच का उपयोग करते हैं। जाहिर है, मसीह-विरोधी न केवल परमेश्वर के स्वभाव, पहचान और सार को स्वीकार नहीं करते या नहीं मानते; बल्कि इसके उलट वे परमेश्वर के प्रति धारणाओं, विरोध और विद्रोहीपन से भरे होते हैं और उसके बारे में उनके पास लेशमात्र भी वास्तविक ज्ञान नहीं होता। परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के स्वभाव और परमेश्वर के प्रेम की मसीह-विरोधियों की परिभाषा एक प्रश्नचिह्न है—संदिग्धता है, और वे उसके प्रति संदेह, इनकार और दोषारोपण की भावनाओं से भरे होते हैं; तो फिर परमेश्वर की पहचान का क्या? परमेश्वर का स्वभाव उसकी पहचान दर्शाता है; परमेश्वर के स्वभाव के प्रति उनके जैसा रुख, परमेश्वर की पहचान के बारे में उनका नजरिया स्वतः स्पष्ट है—प्रत्यक्ष इनकार। मसीह-विरोधियों का यही सार है(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद दस : वे सत्य से घृणा करते हैं, सिद्धांतों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाते हैं और परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं की उपेक्षा करते हैं (भाग छह))। परमेश्वर उजागर करता है कि मसीह-विरोधी परमेश्वर के सार को नकारते हैं और वे परमेश्वर के प्रति संदेह से भरे रहते हैं, उसे नकारते हैं और उसकी निंदा करते हैं। मसीह-विरोधी यह नहीं मानते कि परमेश्वर धार्मिक है, न ही यह कि परमेश्वर मानवता के लिए जो करता है वह प्रेम और उद्धार है। मेरा स्वभाव भी बेहद मसीह-विरोधी था। जैसे इस बार परमेश्वर के वचनों की किताबें जब्त होने के बाद मैं हमेशा निराशा और चिंता की स्थिति में रहती थी, इस डर से कि मुझे कलीसिया से निकाल दिया जाएगा और मेरा कोई अच्छा परिणाम या गंतव्य नहीं होगा। बाद में जब मैंने सुना कि ये कियान को कर्तव्यों की उपेक्षा करने और परमेश्वर के घर को काफी नुकसान पहुँचाने के कारण निकाला गया है तो मुझे लगा कि एक उपदेशक के कर्तव्य में बहुत बड़ी जिम्मेदारियाँ शामिल होती हैं और मैं हमेशा सतर्क और गलतफहमी में रही, उपदेशक के रूप में चुने जाने से डरती रही, कभी भी संदर्भ या सिद्धांतों की खोज नहीं की, जो लोगों से निपटते समय परमेश्वर का घर लागू करता है। जैसा कि मैंने देखा, परमेश्वर का घर बिलकुल अविश्वासियों की दुनिया की तरह था जिसमें निष्पक्षता और धार्मिकता की कमी थी और मैंने जितना बड़ा कर्तव्य किया, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी उठाई और इसलिए अगर मैंने परिस्थितियों को गलत तरीके से सँभाला तो मेरे लिए परिणाम भी उतने ही गंभीर होंगे मैं इस तरह की गलत धारणाओं के साथ जी रही थी जैसे, “ऊँचाई पर तुम अकेले ही होगे,” “जो जितना बड़ा होता है, उतनी ही जोर से गिरता है,” हर स्थिति में लगातार परमेश्वर के खिलाफ अनुमान लगा रही थी और सतर्क थी। इससे परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की समझ की कमी दिख रही थी और यह परमेश्वर के खिलाफ ईशनिंदा का एक रूप था। वास्तव में ये कियान को मुख्यत: इसलिए बाहर निकाला गया क्योंकि उसने अपने कर्तव्य की उपेक्षा की थी, क्योंकि इसके कारण परमेश्वर के वचनों की कई किताबें सीसीपी पुलिस ने जब्त कर ली थीं, जिसके परिणामस्वरूप परमेश्वर के घर को काफी नुकसान पहुँचा था। इस बार मेरा निपटान इसलिए नहीं हुआ क्योंकि कलीसिया ने माना कि नुकसान किसी के लापरवाह होने या गैर-जिम्मेदार होने के कारण नहीं हुआ था, इसलिए किसी को भी इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया गया। इसने दिखाया कि परमेश्वर का घर वास्तव में जिम्मेदारी सौंपते समय संदर्भ और नुकसान के पीछे के कारणों के आधार पर मामलों का आकलन करता है। लेकिन मैं सत्य सिद्धांतों को खोजने में विफल रही और जब मैंने देखा कि ये कियान को हटा दिया गया है तो मैंने परमेश्वर को गलत समझा, मानो अपने कर्तव्यों में गलती करने और नकारात्मक परिणाम लाने पर मुझे हटा दिया जाएगा और निकालकर बाहर कर दिया जाएगा। मेरे विचार परमेश्वर की धार्मिकता पर संदेह और इनकार से भरे हुए थे। भले ही मैं परमेश्वर से सतर्क रही और उसे गलत समझा, परमेश्वर ने मेरी कमियों और भ्रष्टता पर ध्यान नहीं दिया और फिर भी मुझे अपने कर्तव्य निभाने का मौका दिया, लोगों, घटनाओं और चीजों का उपयोग करके मुझे आत्म-चिंतन करने और खुद को जानने के लिए चेताया ताकि मैं जाग सकूँ और समय रहते बदल सकूँ, एक मसीह-विरोधी के मार्ग पर आगे बढ़ने से बच सकूँ। यह सोचकर मुझे वाकई अपराध-बोध हुआ और मैंने खुद को परमेश्वर का ऋणी महसूस किया। मैंने लोगों को बचाने के लिए परमेश्वर की ईमानदार इच्छा को महसूस किया और अपने स्वार्थ और धोखेबाजी से और अधिक घृणा हुई। मैं अब और सतर्क और गलतफहमी की स्थिति में नहीं रहना चाहती थी और अगर मुझे चुना गया तो मैं यह कर्तव्य स्वीकार करने के लिए तैयार थी। बाद में मुझे एक प्रचारक के रूप में चुना गया लेकिन मैं अभी भी कुछ चिंतित महसूस कर रही थी क्योंकि मुझे लगा कि मैं कई सिद्धांतों को नहीं समझ पाई हूँ और मेरा भ्रष्ट स्वभाव काफी गंभीर है और अब जब मैं कई कलीसियाओं के लिए जिम्मेदार थी तो मुझे लगा कि अगर मैंने कोई गलती की और कलीसिया के काम को नुकसान पहुँचाया तो मैं एक अच्छे परिणाम और गंतव्य के लिए अपना मौका खो दूँगी। लेकिन उस दौरान हुए अपने अनुभवों पर गौर करने पर मुझे एहसास हुआ कि अगर मैं सत्य स्वीकार कर सकूँ, भले ही मैंने अपराध किया हो, जब तक मैं ईमानदारी से पश्चात्ताप करती हूँ, तब तक परमेश्वर मेरे क्षणिक अपराध के कारण मेरी निंदा नहीं करेगा और मुझे नहीं हटाएगा। यह समझते हुए मैं खुद को अलग रखने और समर्पण करने और इस कर्तव्य को शांति से स्वीकार करने के लिए तैयार हो गई।

बाद में मैंने परमेश्वर के कुछ और वचन पढ़े : “मनुष्य द्वारा अपना कर्तव्य निभाना वास्तव में उस सबकी सिद्धि है, जो मनुष्य के भीतर अंतर्निहित है, अर्थात् जो मनुष्य के लिए संभव है। इसके बाद उसका कर्तव्य पूरा हो जाता है। मनुष्य की सेवा के दौरान उसके दोष उसके क्रमिक अनुभव और न्याय से गुज़रने की प्रक्रिया के माध्यम से धीरे-धीरे कम होते जाते हैं; वे मनुष्य के कर्तव्य में बाधा या विपरीत प्रभाव नहीं डालते। वे लोग, जो इस डर से सेवा करना बंद कर देते हैं या हार मानकर पीछे हट जाते हैं कि उनकी सेवा में कमियाँ हो सकती हैं, वे सबसे ज्यादा कायर होते हैं। ... मनुष्य के कर्तव्य और उसे आशीष प्राप्त होते हैं या दुर्भाग्य सहना पड़ता है, इन दोनों के बीच कोई सह-संबंध नहीं है। कर्तव्य वह है, जो मनुष्य के लिए पूरा करना आवश्यक है; यह उसकी स्वर्ग द्वारा प्रेषित वृत्ति है, जो प्रतिफल, स्थितियों या कारणों पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। केवल तभी कहा जा सकता है कि वह अपना कर्तव्य पूरा कर रहा है। आशीष प्राप्त होना उसे कहते हैं, जब कोई पूर्ण बनाया जाता है और न्याय का अनुभव करने के बाद वह परमेश्वर के आशीषों का आनंद लेता है। दुर्भाग्य सहना उसे कहते हैं, जब ताड़ना और न्याय का अनुभव करने के बाद भी लोगों का स्वभाव नहीं बदलता, जब उन्हें पूर्ण बनाए जाने का अनुभव नहीं होता, बल्कि उन्हें दंडित किया जाता है। लेकिन इस बात पर ध्यान दिए बिना कि उन्हें आशीष प्राप्त होते हैं या दुर्भाग्य सहना पड़ता है, सृजित प्राणियों को अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए; वह करते हुए, जो उन्हें करना ही चाहिए, और वह करते हुए, जिसे करने में वे सक्षम हैं। यह न्यूनतम है, जो व्यक्ति को करना चाहिए, ऐसे व्यक्ति को, जो परमेश्वर की खोज करता है। तुम्हें अपना कर्तव्य केवल आशीष प्राप्त करने के लिए नहीं करना चाहिए, और तुम्हें दुर्भाग्य सहने के भय से अपना कार्य करने से इनकार भी नहीं करना चाहिए। मैं तुम लोगों को यह बात बता दूँ : मनुष्य द्वारा अपने कर्तव्य का निर्वाह ऐसी चीज़ है, जो उसे करनी ही चाहिए, और यदि वह अपना कर्तव्य करने में अक्षम है, तो यह उसकी विद्रोहशीलता है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर)। परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मैं हमेशा जिम्मेदारियाँ लेने से डरती थी, जोखिम उठाने और हटा दिए जाने से डरती थी और यह मुख्य रूप से आशीष पाने की मेरी अत्यधिक इच्छा के कारण था और क्योंकि मैंने हमेशा अपने कर्तव्य को अपने परिणाम और गंतव्य से जोड़ा था। परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन से मुझे समझ आया कि मेरे कर्तव्य निभाने का आशीष पाने या पीड़ा भोगने से कोई लेना-देना नहीं है। कर्तव्य सृजित प्राणियों की जिम्मेदारियाँ हैं और ये वे जिम्मेदारियाँ और दायित्व हैं जिन्हें लोगों को पूरा करना चाहिए। अपने कर्तव्यों के दौरान हम खुद को और परमेश्वर को भी दोनों को जान जाते हैं और सत्य प्राप्त करते हैं। ठीक इसी अनुभव की तरह मुझे एहसास हुआ कि अगुआई का कर्तव्य अहम जिम्मेदारियों के साथ आता है और बाद के परिणाम को सँभालने के लिए सिर्फ तत्परता और गति से ज्यादा कुछ चाहिए होता है और इसके लिए व्यक्ति को सिद्धांतों के साथ काम करने, बुद्धि रखने और प्रार्थना करने और अधिक खोजने की भी जरूरत पड़ती है। इसके अतिरिक्त इस खुलासे से मुझे एहसास हुआ कि मैं वास्तव में स्वार्थी, नीच, धोखेबाज और विश्वासघाती रही थी और परिस्थितियों से सामना होने पर मैं हमेशा अपने हितों के बारे में सोचती थी, परमेश्वर का विरोध करने के मार्ग पर चलती थी। यह सब मेरे कर्तव्य करने के माध्यम से प्राप्त हुआ था। अगर मैं अपने कर्तव्य को आशीष पाने या दुख से जोड़ती हूँ तो समस्याओं का सामना करने पर मैं हिचकिचाऊँगी और अपना कर्तव्य छोड़ना चाहूँगी और इससे मैं सत्य प्राप्त करने के कई अवसर गँवा दूँगी। यह वास्तव में गला घुटने के डर से खाना न खाने जैसा होगा, जो कोई भी ऐसा करता है वह पूरी तरह से मूर्ख और कायर है। इसका एहसास होने पर मैंने अपनी कमियों के कारण अपने कर्तव्य को अस्वीकार नहीं किया बल्कि अपना कर्तव्य सच्चे दिल से स्वीकार किया। उसके बाद मैंने अपने कर्तव्यों में समस्याओं की पहचान करने और उन्हें हल करने के लिए सत्य की खोज करने पर ध्यान केंद्रित किया। हालाँकि सत्य के बारे में मेरी समझ उथली थी, लेकिन मैं सभी के साथ बात करके अपनी कमियाँ दूर करने में सक्षम थी। कभी-कभी जब मैं ऐसी चीजों का सामना करती जो समझ नहीं पाती थी तो मैं इन मुद्दों को सामने लाती थी और सभी के साथ मिलकर समाधान खोजती थी और जब मैं किसी चीज के बारे में अनिश्चित होती थी तो मैं उच्च अगुआओं से मार्गदर्शन माँगती थी। अगर हम में कोई विचलन होता तो हम उसे तुरंत ठीक कर लेते थे और अगर हम नाकाम रहते तो हम उन असफलताओं का सारांश देते। इस तरह से अपना कर्तव्य निभाते हुए मुझे बहुत अधिक दबाव महसूस नहीं होता था और मैं बहुत अधिक सहज महसूस करती थी। इस अनुभव से मुझे यह एहसास हुआ कि केवल सत्य की खोज पर ध्यान केंद्रित करने, परमेश्वर द्वारा आयोजित परिस्थितियों के प्रति समर्पित होने और इन चीजों से सबक सीखने से ही कोई व्यक्ति सच्ची स्वतंत्रता और मुक्ति प्राप्त कर सकता है।

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