2. मौत के परीक्षण के दौरान

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "भ्रष्ट मानवता को बचाने के लिए परमेश्वर पृथ्वी पर कार्य करने आया है—इसमें कोई झूठ नहीं है; यदि नहीं, तो वह अपना कार्य करने के लिए व्यक्तिगत रूप से निश्चित रूप से नहीं आता। अतीत में, उद्धार का उसका साधन परम प्रेम और करुणा दिखाना रहा था, इतनी कि उसने संपूर्ण मानवजाति के बदले में अपना सर्वस्व शैतान को दे दिया। आज अतीत के जैसा कुछ नहीं है: आज, तुम लोगों का उद्धार, स्वभाव के अनुसार प्रत्येक के वर्गीकरण के दौरान, अंतिम दिनों के समय में होता है; तुम लोगों के उद्धार का साधन प्रेम या करुणा नहीं है, बल्कि ताड़ना और न्याय है ताकि मनुष्य को अधिक अच्छी तरह बचाया जा सके। इस प्रकार, तुम लोगों को जो भी प्राप्त होता है वह ताड़ना, न्याय और निष्ठुर मार है, लेकिन जान लें कि इस निर्दय मार में थोड़ा सा भी दण्ड नहीं है, जान लें कि इस बात की परवाह किए बिना कि मेरे वचन कितने कठोर हैं, तुम लोगों पर जो पड़ता है वह कुछ वचन ही है जो तुम लोगों को अत्यंत निर्दय प्रतीत होता है, और जान लें, कि इस बात की परवाह किए बिना कि मेरा क्रोध कितना अधिक है, तुम लोगों पर जो पड़ता है वे फिर भी शिक्षण के वचन हैं, और तुम लोगों को नुकसान पहुँचाना, या तुम लोगों को मार डालना मेरा आशय नहीं है। क्या यह सब सत्य नहीं है? जान लें कि आज, चाहे वह धर्मी न्याय हो या निष्ठुर शुद्धिकरण, सभी उद्धार के लिए है। इस बात की परवाह किए बिना कि चाहे आज स्वभाव के अनुसार प्रत्येक का वर्गीकरण है, या मनुष्य की श्रेणियाँ सामने लायी गई हैं, परमेश्वर के सभी कथन और कार्य उन लोगों को बचाने के लिए हैं जो परमेश्वर से प्यार करते हैं। धर्मी न्याय मनुष्य को शुद्ध करने के उद्देश्य से है, निर्दय शुद्धिकरण मनुष्य का परिमार्जन करने के उद्देश्य से है, कठोर वचन या ताड़ना सब शुद्ध करने के उद्देश्य से और उद्धार के लिए हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के उद्धार के लिए तुम्हें सामाजिक प्रतिष्ठा के आशीष से दूर रहकर परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए')। परमेश्वर के वचन मुझे बहुत प्रेरित करते हैं, मुझे याद आता है 20 साल पहले का वो कभी न भूलने वाला अनुभव जब मैं मौत के परीक्षण से गुज़रा था। मैं सच में सराहना करने लगा कि परमेश्वर का न्याय और ताड़ना मनुष्य के लिए उसका प्रेम और उद्धार है। परमेश्वर के वचन जितने भी कठोर या परेशान करने वाले हों, वे केवल हमें शुद्ध करने और बदलने के लिए हैं।

फरवरी 1992 की बात है। सेवाकर्ताओं के परीक्षण के बाद, परमेश्वर ने हमें राज्य के युग का हिस्सा बनाकर हमारा उत्थान किया और हमें अपनी अपेक्षाएं बताईं: उसके वचनों को पढ़ने और उन्हें अभ्यास में लाने पर ध्यान दो, परमेश्वर को जानने की कोशिश करो, परीक्षणों के ज़रिए परमेश्वर की गवाही दो और जल्द से जल्द राज्य के लोगों के मानक को हासिल करो। उस वक्त, परमेश्वर के वचनों में अक्सर इन बातों का उल्लेख होता था : "मेरे घराने के सदस्य" और "मेरे राज्य के जन" इन वचनों से हमेशा मुझे ऐसा महसूस होता है कि परमेश्वर ने हमें अपना परिवार माना है। मैं गर्मजोशी और प्रोत्साहन से भरपूर था, इसलिए मैंने परमेश्वर के लोगों में से एक होने के मानकों का पालन करना शुरू कर दिया। मैं परमेश्वर के वचनों को प्रार्थना में पढ़ता और उसकी इच्छा को उसके वचनों में तलाश करता था। मुझसे जितना बन पड़ा मैंने उतना अच्छा काम किया, और जीवन भर परमेश्वर का अनुसरण करने का संकल्प लिया। मेरी उम्र 22 साल थी। मेरी उम्र के ज़्यादातर लोग शादीशुदा थे और उनके बच्चे भी हो चुके थे। मेरा अविश्वासी परिवार मेरे लिए एक पत्नी खोजने की कोशिश करता रहा, लेकिन मैंने उन सबको ठुकरा दिया।

मुझे "राज्य गान" गाना बहुत पसंद था, ख़ासतौर पर ये हिस्सा: "देखो, जैसे ही परमेश्वर के राज्य की सलामी गूंजती है, शैतान का राज्य ढहने लगता है, रौंदा जाता है, फिर कभी न उठने के लिये, डूब जाता है यश-गान के तले। किसमें है साहस जो धरती पर विरोध करे? जब परमेश्वर धरती पर आता है, वह ज्वलन और रोष लाता है, और सब प्रकार की विपदाएँ लाता है। जगत परमेश्वर का राज्य बन चुका है" (मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ)। मैं सोचता कि पृथ्वी पर परमेश्वर का राज्य किस तरह प्रकट होगा, और परमेश्वर का कार्य ख़त्म होने के बाद, महान आपदाएं आएंगी और जो कोई भी परमेश्वर का विरोध करेगा, उसे नष्ट कर दिया जाएगा। हालांकि, परमेश्वर का अनुसरण करने वाले हम लोग जीवित रहेंगे और परमेश्वर हमें अनंत आशीष का आनंद देने के लिए अपने राज्य में ले जाएगा। यह सब सोचकर बहुत अच्छा लगता था। उस वक़्त, मैं सोचता था कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम को स्वीकार करने और राज्य के लोगों में शामिल होने के लिए बढ़ाये जाने का मतलब है इस जीवन में परमेश्वर का राज्य ज़रूर हासिल होगा और ये मुझसे कोई नहीं छीन सकता। मैं बहुत ज़्यादा रोमांचित था। हमारी आत्माएँ पुनर्जीवित हो उठी थीं और हम आनंद से भर गए थे। हमने अथक मेहनत करके परमेश्वर के लिए खुद को खपाया।

लेकिन परमेश्वर धार्मिक और पवित्र है, वह हमारे दिल के भीतर झांक सकता है, वह हमारी धारणाओं, कल्पनाओं और अनियंत्रित इच्छाओं को जानता है। कि अप्रैल के अंत में, परमेश्वर ने नए वचन कहे, जिससे हम सभी मौत के परीक्षण में पहुंच गए।

एक दिन, कलीसिया के अगुआ ने एक सभा आयोजित की और परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा: "जब लोग सपने देख रहे होते हैं, मैं दुनिया के देशों में विचरता हूँ और लोगों के बीच मेरे हाथों की 'मौत की गंध' छिड़कता हूँ। सभी लोग तुरंत जीवन शक्ति पीछे छोड़ देते हैं और मानव जीवन के अगले दर्जे में प्रवेश करते हैं। मानव जाति में अब कोई जीवित चीज नहीं देखी जा सकती है, लाशें हर जगह बिखरी पड़ी हैं, जीवनशक्ति से भरी चीजें तुरंत और बिना किसी निशान के गायब हो जाती हैं, और मृतकों की दम घोंटने वाली गंध मुल्क में फैलती है। ... आज, यहाँ तो, सभी लोगों की लाशें अव्यवस्था में बिखरी पड़ी हैं। लोगों के जाने बिना, मैं मेरे हाथों से महामारी को छोड़ देता हूँ, और मनुष्य के शरीर का क्षय होने लगता है, सिर से पैर तक मांस का नामोनिशान नहीं रहता, और मैं मनुष्यों से बहुत दूर चला जाता हूँ। फिर कभी मैं मनुष्य के साथ नहीं मिलूँगा, मैं फिर कभी मनुष्य के बीच नहीं आऊंगा, क्योंकि मेरे पूरे प्रबंधन का अंतिम चरण पूरा हो गया है, और मैं फिर से मानव जाति नहीं बनाऊंगा, फिर से मनुष्य की ओर कोई ध्यान नहीं दूँगा। मेरे मुंह से निकले वचनों को पढ़ने के बाद, सभी लोग आशा खो देते हैं, क्योंकि वे मरना नहीं चाहते—लेकिन 'जीवित हो उठने' के लिए कौन 'मरता' नहीं है? जब मैं लोगों से कहता हूँ कि उन्हें जीवित करने के लिए मेरे पास कोई जादू नहीं है, तो वे दर्द में रोने-चिल्लाने लगते हैं; वास्तव में, हालांकि मैं सृष्टिकर्ता हूँ, मेरे पास केवल लोगों को मारने की शक्ति है, उन्हें जीवित बनाने की क्षमता नहीं है। इस बात में, मैं मनुष्य से माफी चाहता हूँ। इस प्रकार, मैंने पहले ही मनुष्य से कहा था कि 'मुझ पर उसका एक ऐसा ऋण है जिसको मैं चुका नहीं सकता'—फिर भी उसने सोचा कि मैं नम्रतावश ऐसा कह रहा हूँ। आज, तथ्यों के आगमन के साथ, मैं अभी भी यह कहता हूँ। जब मैं बोलता हूँ तब मैं तथ्यों के साथ धोखा नहीं करूँगा। लोगों की धारणाओं में, उनका मानना है कि मैं कई माध्यमों के द्वारा बोलता हूँ, और इसलिए वे हमेशा उन शब्दों को पकड़ लेते हैं जो मैं उन्हें देता हूँ, कुछ और की उम्मीद करते हुए। क्या ये मनुष्य की गलत प्रेरणाएँ नहीं हैं? यह इन परिस्थितियों में है कि मैं 'साहसपूर्वक' यह कहने की हिम्मत करता हूँ कि मनुष्य मुझे सचमुच प्यार नहीं करता है। मैं विवेक को मेरी पीठ नहीं दिखाऊंगा और तथ्यों का तोड़ना-मरोड़ना नहीं करूँगा, क्योंकि मैं लोगों को उनके आदर्श देश में नहीं ले जाऊंगा; अंत में, जब मेरा कार्य खत्म हो जाता है, मैं उन्हें मौत के देश में ले जाऊंगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 40')। जब मैंने पढ़ा "हालांकि मैं सृष्टिकर्ता हूँ, मेरे पास केवल लोगों को मारने की शक्ति है, उन्हें जीवित बनाने की क्षमता नहीं है।" मुझे समझ नहीं आ रहा था। मैंने सोचा, "परमेश्वर ऐसा क्यों कहेगा? इंसान की ज़िंदगी और मौत परमेश्वर के हाथों में है। ऐसा क्यों कहते हैं कि उसके पास इंसान को ज़िंदा करने की 'काबिलियत' की कमी है? क्या हम विश्वासियों को अब भी अंत में मरना होगा? यह नहीं हो सकता! हम राज्य के लोग हैं, तो हम कैसे मर सकते हैं? लेकिन परमेश्वर हमारे साथ ऐसा मज़ाक नहीं करेगा। उसके वचन साफ़ तौर पर कहते हैं, 'जब मेरा कार्य खत्म हो जाता है, मैं उन्हें मौत के देश में ले जाऊंगा।' क्या इसका मतलब यह नहीं है कि हम मौत का सामना करेंगे? यह सब किस बारे में है?" मुझे समझ नहीं आ रहा था कि परमेश्वर ऐसा क्यों कहेगा। ऐसा लगा कि मेरे आसपास के दूसरे भाई-बहनों को भी समझ नहीं आ रहा था। कलीसिया के अगुआ ने फिर हमारे साथ सहभागिता की: "हमारी देह को शैतान ने बहुत गहराई से भ्रष्ट कर दिया है। यह अहंकार, छल, स्वार्थ और लालच जैसे शैतानी स्वभावों से भरा है, हम अभी भी हर समय झूठ बोलते और धोखा देते हैं। हम परमेश्वर में विश्वास करके उसके लिए खुद को खपा सकते हैं, लेकिन उसके वचनों को अभ्यास में नहीं ला सकते। जब परीक्षण और कष्ट आते हैं, तो हम अभी भी उसकी आलोचना करते और उसे दोष देते हैं। इससे पता चलता है कि हमारी देह शैतान की है और परमेश्वर की विरोधी है। परमेश्वर का स्वभाव धार्मिक, पवित्र और अपमानित न हो सकने वाला है। वह शैतान के लोगों को अपने राज्य में कैसे प्रवेश करने दे सकता है। इसलिए जब उसका कार्य ख़त्म हो जाएगा, तो बड़ी आपदाएँ आएंगी, अगर हम विश्वासियों ने सत्य को हासिल नहीं किया, अगर हमारे जीवन स्वभाव नहीं बदले, तो हम फिर भी मर जाएंगे।"

अगुवा की इस सहभागिता को सुनकर, मैं भावनाओं से भर गया, समझ नहीं आ रहा था कि मुझे कैसा महसूस करना चाहिए। मुझे लगा जैसे स्वर्ग अचानक नीचे गिरकर बिखर गया है—मैं सदमे में था। उलझन और आक्रोश मेरे मन में भर गए, और मैं सोचने लगा, "अंतिम पीढ़ी होने के नाते, क्या हम सबसे अधिक धन्य नहीं हैं? परमेश्वर ने हमें राज्य के युग के लोगों के रूप में बढ़ाया है। हम परमेश्वर के राज्य के स्तंभ हैं। हम अंत में कैसे मर सकते हैं? परमेश्वर के रास्ते पर चलने के लिए मैंने अपनी युवावस्था को त्याग दिया और शादी की उम्मीदों को छोड़ दिया। मैं इधर-उधर भागता रहा, परमेश्वर के लिये खुद को खपाया और बहुत कुछ झेला है। सीसीपी ने मुझे गिरफ़्तार करके बहुत सताया, अविश्वासियों ने मेरा मज़ाक उड़ाया और मुझे बदनाम किया। मुझे फिर भी अंत में क्यों मरना चाहिए? क्या मेरी सारी पीड़ा व्यर्थ हो गई है?" यह सोचकर बहुत दुख हुआ। मुझे लगा कि मेरे ऊपर बहुत भारी बोझ रखा है, मैं ठीक से सांस भी नहीं ले पा रहा था। मैंने देखा कि मेरे आसपास हर कोई वैसा ही महसूस कर रहा था। कुछ चुपचाप रो रहे थे, जबकि बाकी अपने चेहरे को अपने हाथों में छुपा कर सिसक रहे थे। सभा के बाद, मेरी माँ ने आह भरते हुए कहा, "मैं 60 साल से ज़्यादा की हूँ, और मैंने मौत को स्वीकार कर लिया है। लेकिन तुम इतने छोटे हो, तुम्हारा जीवन अभी शुरू हुआ है...।" उनकी यह बात सुनकर मैं और परेशान हो गया और अपने आँसुओं को नहीं रोक पाया। मेरी वो रात बिस्तर पर करवटें बदलते हुई गुज़री और मैं बिल्कुल भी नहीं सो पाया। मैं समझ नहीं पा रहा था। मैंने परमेश्वर के लिए इतनी दृढ़ता से खुद को खपाया और उसकी राह पर चलने के लिए सब कुछ छोड़ दिया, तो मुझे बड़ी आपदाओं में क्यों मरना होगा? मैं सच में इसे स्वीकार नहीं कर पा रहा था, इसलिए मैंने परमेश्वर के वचन पढ़ने शुरू कर दिए इस उम्मीद में कि मुझे कोई सुराग मिल जाएगा, और क्या हमारे अंत को बदला जा सकता है। लेकिन मुझे वो जवाब नहीं मिले जो मैं चाहता था। निशब्द, मैं सोचने लगा, "लगता है जैसे परमेश्वर ने सच में हमें सज़ा दी है और हमारी मौत निश्चित है। इसे कोई बदल नहीं सकता। यह स्वर्ग का फ़ैसला है।"

अगले कुछ दिन मैं बहुत उदास रहा। बोलते समय मेरी आवाज़ बहुत मुश्किल से सुनाई देती थी और मैं कुछ भी नहीं करना चाहता था। मैं हमेशा लंबे समय तक काम करता था, और परमेश्वर के वचनों को लिखते-लिखते मेरे हाथ दर्द करने लग जाते थे, लेकिन इससे मुझे कभी परेशानी नहीं हुई। मैं बस चाहता था कि भाई-बहन जल्द से जल्द परमेश्‍वर की नई-नई बातें पढ़ें, लेकिन ज़िम्मेदारी का एहसास अब दूर हो चुका था। मेरा ज़बरदस्त उत्साह अचानक ठंडा पड़ गया था। अब जब मैं परमेश्वर के वचनों को लिखता, तो मुझे लगता था, "मैं अभी भी कम उम्र का हूं, मैंने अभी तक स्वर्ग के राज्य के आशीष का आनंद नहीं उठाया है। मैं सच में इस तरह मरना नहीं चाहता!" यह सब सोचकर मैं रोने लगा। उस दौरान मेरा दिल भारी और दुखी था, मानो किसी ने उसमें एक चाकू घोंप दिया हो। मेरे लिए दुनिया का स्वाद ख़त्म हो गया था। मुझे लगा जैसे किसी भी समय बड़ी आपदाएं आ सकती हैं, और मुझे नहीं पता था कि मैं कब मरने वाला हूं। मुझे लगा जैसे दुनिया ख़त्म हो गई है।

मैंने परमेश्वर के वचनों को पढ़ा और कुछ आत्म-ज्ञान प्राप्त किया, फिर धीरे-धीरे, समय के साथ, मैं आज़ाद महसूस करने लगा। मैंने परमेश्वर के वचनों में यह पढ़ा: "आज, राज्य के द्वार की ओर बढ़ते समय, सभी लोग आगे बढ़ना शुरू कर देते हैं—किन्तु जब वे द्वार के सामने पहुँचते हैं, तो मैं द्वार बंद कर देता हूँ, मैं लोगों को बाहर रोक देता हूँ और माँग करता हूँ कि वे अपने प्रवश पत्र दिखाएँ। इस प्रकार का एक अजीब कदम कुछ उस जैसा नहीं है जिसकी लोग अपेक्षा कर रहे थे, और वे सब चकित हैं। क्यों वह द्वार—जो हमेशा पूरा खुला रहता है—आज अचानक कस कर बंद कर दिया गया है? लोग अपने पैरों को पटकते हैं और धीरे-धीरे इधर-उधर चले जाते हैं। वे सोचते हैं कि वे चालाकी से अपना प्रवेश पा सकते हैं, किन्तु जब वे मुझे अपने झूठे प्रवेश पत्र सौंपते हैं, तो मैं उन्हें तभी के तभी आग के गड्ढे में डाल देता हूँ—और अपने स्वयं के 'परिश्रमी प्रयासों' को जलता हुआ देखकर, वे आशा खो देते हैं। वे अपना सिर पकड़ लेते हैं, रो रहे होते हैं, राज्य के भीतर सुंदर दृश्य देख रहे होते हैं किन्तु प्रवेश करने में असमर्थ होते हैं। फिर भी मैं उन्हें उनकी दयनीय अवस्था की वजह से उन्हें अंदर नहीं आने देता हूँ—कौन मेरी योजना को जैसा वह चाहे गड़बड़ा सकता है? क्या भविष्य के आशीष लोगों के उत्साह के बदले में दिए जाते हैं? क्या मानव अस्तित्व का अर्थ मेरे राज्य में जैसे कोई चाहे वैसे प्रवेश करने पर निहित है? ... मैं लंबे समय से मनुष्य पर विश्वास खो चुका हूँ, मैं लंबे समय से लोगों में आशा खो चुका हूँ, क्योंकि उनमें महत्वाकांक्षा का अभाव है, वे मुझे कभी भी ऐसा हृदय नहीं दे पा रहे हैं जो परमेश्वर से प्यार करता हो, और इसके बजाय वे मुझे सदैव अपनी प्रेरणाएँ देते हैं। मैंने मनुष्य को बहुत कुछ कहा है, और क्योंकि लोग आज भी मेरी सलाह की अनदेखी करते हैं, इसलिए मैं भविष्य में मेरे हृदय को गलत समझने से उन्हें रोकने के लिए उन्हें अपना दृष्टिकोण बताता हूँ; आने वाले समयों में चाहे वे जीवित रहते हैं या मरते हैं यह उनका मामला है, इस पर मेरा कोई नियंत्रण नहीं है। मुझे आशा है कि वे जीवित रहने के लिए अपना मार्ग खोज लेंगे, और मैं इसमें सामर्थ्यहीन हूँ" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 46')। "जब लोग अपने जीवन का त्याग करने के लिए तैयार होते हैं, तो सब कुछ तुच्छ हो जाता है, और कोई भी उनका लाभ नहीं उठा सकता। जीवन से अधिक महत्वपूर्ण क्या हो सकता है? इस प्रकार, शैतान लोगों में अधिक कार्य करने में असमर्थ हो जाता है, वह मनुष्य के साथ कुछ भी नहीं कर सकता। हालांकि, 'देह' की परिभाषा में यह कहा जाता है कि देह शैतान द्वारा दूषित है, अगर लोग वास्तव में स्वयं को अर्पित कर देते हैं, और शैतान से प्रेरित नहीं रहते हैं, तो कोई भी उनसे लाभ नहीं प्राप्त कर सकता—और इस समय, देह अपने दूसरे कार्य का प्रदर्शन करेगा, और आधिकारिक तौर पर परमेश्वर के आत्मा द्वारा दिशा प्राप्त करना शुरू कर देगा। यह एक आवश्यक प्रक्रिया है, जिसे चरण-दर-चरण होना चाहिए; यदि नहीं, तो परमेश्वर के पास ज़िद्दी देह में कार्य करने का कोई अर्थ नहीं होगा। ऐसा है परमेश्वर का ज्ञान" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 36')। परमेश्वर के वचनों पर विचार करके मैं बहुत दुखी था। क्या मैं इतनी निराशा और दर्द इसलिए नहीं महसूस कर रहा था क्योंकि मुझे मौत और इच्छित आशीषों का डर था? शुरुआती दिनों में, मैं आशीष हासिल करने और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश पाने के लिए परमेश्वर पर विश्वास करता था। हालाँकि मैं सेवा करने वालों के परीक्षण से गुज़र चुका था, और कुछ हद तक आशीष पाने की अपनी इच्छा को कम करके परमेश्वर के लिए सेवा करने का संकल्प लिया था, मगर मेरी कपटी और दुष्ट शैतानी प्रकृति की जड़ें काफ़ी गहरी थीं। जब परमेश्वर ने हमें अपने लोग बना लिया, तो मेरा दिल एक बार फिर उम्मीद से ख़ुश हो उठा। मुझे लगा कि इस बार मैं स्वर्ग के राज्य में ज़रूर प्रवेश करूँगा। मुझे लगा कि परमेश्वर के नाम को स्वीकार करके, परमेश्वर द्वारा राज्य के लोगों में से एक होने के लिए बढ़ाये जाने के बाद, सब कुछ त्याग कर और ख़ुद को खपा कर, मैं ज़रूर स्वर्ग के राज्य में पहुंच जाऊँगा। यह बिल्कुल पक्का था। जब परमेश्वर के कार्य ने मेरी धारणाओं को तोड़ दिया, मेरी संभावनाओं और मंज़िल को छीन लिया, तो मैं कमज़ोर और निराश होकर परमेश्वर से शिकायत करने लगा। अतीत में किए गए त्याग पर भी पछतावा हुआ। मैंने जाना कि मेरी सारी कोशिशें बदले में स्वर्ग के राज्य का आशीष पाने के लिए थीं। क्या मैं परमेश्वर के साथ सौदा नहीं कर रहा था, उसे धोखा देकर उसका इस्तेमाल नहीं कर रहा था? मैंने हर परीक्षण में बगावत और शिकायतों के अलावा कुछ भी प्रकट नहीं किया। मैं उसका आज्ञापालन करना चाहता था मगर नहीं कर पाया, मैं उन सत्यों का अभ्यास नहीं कर पाया जिन्हें मैं अच्छी तरह जानता था। मुझे एहसास हुआ कि मैं प्रकृति से परमेश्वर का प्रतिरोधी था, मैं शैतान का था। शैतानी स्वभाव से भरे मेरे जैसे व्यक्ति को मर जाना चाहिए, नष्ट हो जाना चाहिए। मैं परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने के लिए पूरी तरह से अयोग्य था। यह उसके धार्मिक स्वभाव द्वारा निर्धारित किया गया था। परमेश्वर का अनुसरण करने और उसके धार्मिक स्वभाव को जानने का मौका मिलने का मतलब था कि मेरा जीवन बर्बाद नहीं हुआ था! फिर मैंने परमेश्वर से एक प्रार्थना की: "मैं अब अपने देह-सुख के लिए नहीं जीना चाहता, बल्कि तुम्हारे शासन और व्यवस्था के आगे झुकना चाहता हूं। चाहे मेरा अंत कुछ भी हो, भले ही मैं मर जाऊं, फिर भी मैं तुम्हारी धार्मिकता की प्रशंसा करूंगा।" जब मैंने अपने अंत और मंज़िल के बारे में सोचना बंद कर दिया और अपनी ज़िंदगी की कीमत चुकाकर भी परमेश्वर की व्यवस्था का पालन करने का इरादा किया, तो मुझे शांति का एक अद्भुत अहसास हुआ।

लेकिन उस समय, हालांकि हम अपने नतीजों की परवाह किए बिना परमेश्वर की आज्ञा मान पाते थे और उसका अनुसरण कर पाते थे, मगर हमारे पास कोई लक्ष्य नहीं था। लेकिन मई 1992 में, परमेश्‍वर ने और वचन व्यक्त करते हुए कहा कि हमें अपने जीवन में परमेश्‍वर से प्रेम करना चाहिए और सार्थक जीवन जीना चाहिए। परमेश्‍वर ने हमें उससे प्रेम करने के दौर में पहुँचा दिया है और मौत का परीक्षण ख़त्म हो चुका है। परमेश्वर के वचनों को पढ़कर, सभाएं करके और सहभागिता के ज़रिए, मुझे एहसास हुआ कि भले ही इंसान का भाग्य परमेश्वर के हाथों में है और कोई भी मौत से बच नहीं सकता, परमेश्वर की इच्छा यह नहीं है कि हम निराश होकर मौत का सामना करें। वह चाहता है कि हम जीवित रहते हुए उससे प्रेम करें, सत्य का अभ्यास कर पाएं, अपने भ्रष्ट स्वभावों को दूर करें और पूरी तरह से बचाए जा सकें। तभी हम उसके राज्य में प्रवेश करने के लायक होंगे। मैं आख़िर समझ पाया कि हमें मौत के परीक्षण से गुजार कर, परमेश्वर हमें मौत की तरफ़ नहीं ले जा रहा था, बल्कि अपने धार्मिक स्वभाव को हमारे सामने प्रकट कर रहा था। उसने ऐसा किया ताकि हम समझ सकें कि वह किसको बचाता है, किसे नष्ट करता है और कौन उसके राज्य में प्रवेश करने के लायक है। मैंने यह भी देखा कि शैतान ने मुझे कितना भ्रष्ट कर दिया है और मैं अपनी धारणाओं, कल्पनाओं और आशीष की अपनी इच्छा का त्याग कर पाया। मैं परमेश्वर के शासन और व्यवस्थाओं को स्वीकार कर पाया और सच में सत्य का अनुसरण करना शुरू कर दिया। ये मेरे लिए परमेश्वर का उद्धार था! मुझे साफ़ तौर पर समझ आया कि परमेश्वर लोगों को न्याय और ताड़ना इसलिए नहीं देता है कि वह हमसे नफ़रत करता है या हमें तकलीफ़ देना चाहता है, बल्कि वह हमें सत्य का अनुसरण करने और बचाये जाने के सही मार्ग पर ले जाना चाहता है! परमेश्वर जो कुछ भी हम में करता है वह तथ्यों को जानने से नहीं होता है। वह बस न्याय, ताड़ना, परीक्षण और शुद्धिकरण करने वाले वचनों को व्यक्त करके नतीजे हासिल करता है। परमेश्वर का कार्य बहुत बुद्धिमान है, मनुष्य के लिए उसका प्रेम और उद्धार बिल्कुल असली है!

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