1. भाग्यशाली हूँ जो परमेश्वर के लिए सेवा करता हूँ

गेंसुई, दक्षिण कोरिया

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "परमेश्वर द्वारा मनुष्य की पूर्णता किन साधनों से संपन्न होती है? यह उसके धार्मिक स्वभाव द्वारा पूरी होती है। परमेश्वर के स्वभाव में मुख्यतः धार्मिकता, क्रोध, भव्यता, न्याय और शाप शामिल हैं, और वह मनुष्य को प्राथमिक रूप से न्याय द्वारा पूर्ण बनाता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो')। "सेवाकर्ताओं के समय से पहले मनुष्य जीवन के अनुसरण, परमेश्वर में विश्वास करने के अर्थ, या परमेश्वर के कार्य की बुद्धि के बारे में कुछ नहीं समझता था, और न ही उसने यह समझा कि परमेश्वर का कार्य मनुष्य को परख सकता है। सेवाकर्ताओं के समय से लेकर आज तक, मनुष्य देखता है कि परमेश्वर का कार्य कितना अद्भुत है—यह मनुष्य के लिए अथाह है। अपने दिमाग में वह यह कल्पना करने में असमर्थ है कि परमेश्वर कैसे कार्य करता है, और वह यह भी देखता है कि उसका आध्यात्मिक कद कितना छोटा है और वह बहुत हद तक अवज्ञाकारी है। जब परमेश्वर ने मनुष्य को शापित किया, तो वह एक प्रभाव को प्राप्त करने के लिए था, और उसने मनुष्य को मार नहीं डाला। यद्यपि उसने मनुष्य को शापित किया, उसने ऐसा वचनों के द्वारा किया, और उसके शाप वास्तव में मनुष्य पर नहीं पड़े, क्योंकि जिसे परमेश्वर ने शापित किया वह मनुष्य की अवज्ञा थी, इसलिए उसके शापों के वचन भी मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए थे। चाहे परमेश्वर मनुष्य का न्याय करे या उसे शाप दे, ये दोनों ही मनुष्य को पूर्ण बनाते हैं : दोनों का उपयोग मनुष्य के भीतर की विकृतियों के परिष्कार के लिए किया जाता है। इस माध्यम से मनुष्य का शोधन किया जाता है, और मनुष्य में जिस चीज़ की कमी होती है उसे परमेश्वर के वचनों और कार्य के द्वारा पूर्ण किया जाता है। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक कदम—चाहे यह कठोर शब्द हों, न्याय हो या ताड़ना हो—मनुष्य को पूर्ण बनाता है और बिलकुल उचित होता है। युगों-युगों में कभी परमेश्वर ने ऐसा कार्य नहीं किया है; आज वह तुम लोगों के भीतर कार्य करता है ताकि तुम उसकी बुद्धि को सराहो। यद्यपि तुम लोगों ने अपने भीतर कुछ कष्ट सहा है, फिर भी तुम्हारे हृदय स्थिर और शांत महसूस करते हैं; यह तुम्हारे लिए आशीष है कि तुम परमेश्वर के कार्य के इस चरण का आनंद ले सकते हो। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम भविष्य में क्या प्राप्त कर सकते हो, आज अपने भीतर परमेश्वर के जिस कार्य को तुम देखते हो, वह प्रेम है। यदि मनुष्य परमेश्वर के न्याय और उसके शोधन का अनुभव नहीं करता, तो उसके कार्यकलाप और उसका उत्साह सदैव सतही रहेंगे, और उसका स्वभाव सदैव अपरिवर्तित रहेगा। क्या इसे परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया गया माना जा सकता है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो')। परमेश्वर के ये वचन वाकई मुझे प्रेरणा देते हैं। मैं अनुभव करता हूँ कि परमेश्वर का न्याय और ताड़ना का कार्य पूरी तरह से इंसान को शुध्द करने और उसे बचाने के लिए है। परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार करने के बाद, मैं पहले जिस परीक्षण से गुज़रा, वह सेवाकर्मियों की परीक्षा थी, मैं यह विचार किए बिना नहीं रह पाता।

फरवरी 1991 में एक दिन हमेशा की तरह मैं एक सभा में भाग ले रहा था, तब एक भाई ने खुशी से कहा, "पवित्र आत्मा ने वचन बोले हैं!" भाई-बहनों ने तब पढ़ना शुरू किया: "स्तुति सिय्योन तक आ गई है और परमेश्वर का निवास स्थान-प्रकट हो गया है। सभी लोगों द्वारा प्रशंसित, महिमामंडित पवित्र नाम फैल रहा है। आह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर! ब्रह्मांड का मुखिया, अंत के दिनों का मसीह—वह जगमगाता सूर्य है, जो पूरे ब्रह्मांड में प्रताप और वैभव में ऊँचे पर्वत सिय्योन पर उदित हुआ है ..." "तूने विजेताओं का एक समूह बनाया है और परमेश्वर की प्रबंधन-योजना पूरी की है। सभी लोग इस पर्वत की ओर बढ़ेंगे। सभी लोग सिंहासन के सामने घुटने टेकेंगे! तू एकमेव सच्चा परमेश्वर है और तू ही महिमा और सम्मान के योग्य है। समस्त महिमा, स्तुति और अधिकार सिंहासन का हो!" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 1')। उस वक्त इसे सुन कर भले ही मैं पूरा नहीं समझ पाया, फिर भी मुझे लगा कि यह बहुत ख़ास है, बड़ा प्रेरक है और कोई भी इंसान ऐसे वचन नहीं बोल सकता। मुझे विश्वास था कि ये वचन परमेश्वर के हैं और ये पवित्र आत्मा के कथन हैं। उसके बाद, पवित्र आत्मा के वचनों के अध्याय पर अध्याय हमारी कलीसिया को लगातार भेजे जा रहे थे, वे वचन जो आस्था के सत्य और बाइबल के अनेक रहस्यों को प्रकाशित कर रहे थे, हमारे लिए सत्य का अभ्यास करने और जीवन में प्रवेश करने का रास्ता खोल रहे थे। उस दौरान पवित्र आत्मा के वचनों को पढ़ने के लिए लगभग हर रोज़ हम सभाएं करते थे। इससे मेरे दिल का अच्छा पालन-पोषण हो रहा था। सभी लोग आनंद और उल्लास में डूबे हुए थे और बहुत धन्य महसूस कर रहे थे। हम सबने सोचा था कि हम परमेश्वर के सामने उठाये गए पहले लोगों में से हैं, हम वो विजेता हैं जिन्हें परमेश्वर बनायेंगे, हमें स्वर्गिक राज्य में अवश्य हिस्सा मिलेगा, हम परमेश्वर के वायदे और आशीष प्राप्त करने योग्य होंगे। संपूर्ण रूप से आस्थावान, हम सबने परमेश्वर के लिए खुद को खपाया। कुछ भाई-बहन पवित्र आत्मा के वचनों की बड़ी तेज़ी से नक़ल कर रहे थे, तो कुछ उन्हें संगीत से सजा कर उनका स्तुति-गान बना रहे थे। उस समय के हमारे हालात सचमुच बड़े मुश्किल थे, बहुत-से भाई-बहनों को सभाओं से गिरफ़्तार किया जा रहा था। मैं दब्बू या भयभीत नहीं था, और उत्साह से परमेश्वर के लिए खुद को खपा रहा था।

इधर मुझमें आशीष पाने और स्वर्गिक राज्य में प्रवेश करने की उम्मीदें भरी हुई थीं, उधर परमेश्वर नये वचन बोल कर हमें सेवाकर्मियों की परीक्षा में ले गये। अक्टूबर में एक दिन मुझे 25 मील दूर कलीसिया की एक सभा में जाकर पवित्र आत्मा द्वारा बोले गये नये वचन इकट्ठा करने के लिए कहा गया। मुझे लगा कोई शानदार समाचार होगा, इसलिए मैं उत्साह से अपनी बाइक पर सवार होकर, एक धुन गुनगुनाते हुए पूरे जोश के साथ सभा स्थल पर पहुँच गया, वहां पहुँचने के बाद मुझे यह देख कर हैरत हुई कि मेरे भाई-बहन बेचैन थे और सबके सिर लटके हुए हैं। एक भाई ने मुझसे कहा, "पवित्र आत्मा ने वचन बोले हैं। परमेश्वर कहता है कि हम सभी सेवाकर्मी हैं।" आँखों में आंसू लिये एक बहन ने कहा, "हम सभी सेवाकर्मी हैं। चीनी लोग सेवा करने के लिए हैं और हमें कोई भी आशीष नहीं मिलने वाला।" मैं बिल्कुल भी यकीन नहीं कर पा रहा था कि यह सब सच है। मैं जल्दी से पवित्र आत्मा के वचन पढ़ने के लिए बढ़ा, और परमेश्वर का यह वचन पढ़ा : "चीन में, मेरे ज्येष्ठ पुत्रों और मेरे लोगों के अलावा, अन्य सभी बड़े लाल अजगर की संतान हैं और उन्हें त्याग दिया जाना चाहिए। तुम लोगों को समझना चाहिए कि आखिरकार चीन मेरे द्वारा शापित राष्ट्र है और वहाँ मेरे कुछ लोग हैं जो भविष्य के मेरे कार्य के लिए सेवा प्रदान करने वालों से अधिक कुछ नहीं हैं। इसे दूसरे ढंग से कहें तो, वहाँ मेरे ज्येष्ठ पुत्रों के अलावा और कोई नहीं है—बाकी सब नष्ट होने के लिए हैं। यह मत सोचो कि मैं अपने कर्मों में बहुत अति करता हूँ—यह मेरा प्रशासनिक आदेश है। जो मेरे शाप से पीड़ित होते हैं वे मेरी नफ़रत की वस्तुएँ हैं और यह पत्थर की लकीर है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 95')। इसे पढ़ कर मैं चौंक गया। पवित्र आत्मा के वचनों में सेवाकर्मियों का जिक्र कई बार किया गया था, और मुझे हमेशा लगता था कि इसका अर्थ अविश्वासियों से है। लेकिन पता चला कि यह हमारे बारे में है। उसमें कहा गया था कि चीनी लोग सेवाकर्मी हैं जिन्हें परमेश्वर शापित करेंगे। जब वे अपनी सेवा पूरी करेंगे, उन्हें बहुत गहरे गड्ढे में फेंक दिया जाएगा। मुझे लगा मेरा पूरा शरीर कमज़ोर पड़ गया है। मैंने कभी कल्पना नहीं की थी कि मैं एक सेवाकर्मी हूँ। क्या आस्था में बिताये ये सभी वर्ष व्यर्थ थे? न केवल मुझे स्वर्गिक राज्य में आशीष नहीं मिलेगा, बल्कि मैं बहुत गहरे गड्ढे में फेंक दिया जाऊंगा! लगा मानो मुझे रसातल में धकेल दिया गया हो। मैं बहुत दुखी था, और तब शिकायतें उभरने लगीं। मैंने याद किया कि किस तरह मैंने प्रभु के अनुसरण के लिए अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी, किस तरह दुनिया के लोगों ने मेरा मज़ाक उड़ाया था, किस तरह मेरे दोस्त और रिश्तेदार मुझे नहीं समझ पाये थे, सीसीपी का उत्पीड़न कैसा था और किस तरह कई बार मैं गिरफ़्तारी से बाल-बाल बच गया था। लेकिन मैंने कभी पीठ नहीं दिखायी, बल्कि खुद को खपाता रहा और त्याग करता चला गया। मैंने बहुत पीड़ा सही थी, मुझे लगता था मैं स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर आशीषों का आनंद लूंगा, मगर अब मैं एक निचले दर्जे का सेवाकर्मी हूँ। मुझे इस बात का सिर-पैर नहीं समझ आ रहा था। मैं वहां थोड़ी देर बैठा रहा और मायूसी से आहें भरता रहा। दूसरे भाई-बहन सिर लटकाये बैठे थे, कुछ आंसू बहा रहे थे, कुछ अपना मुंह ढँक कर ज़ोर से रो रहे थे, और कुछ भाई तो चीख-चीख कर रो रहे थे।

सभा से वापस घर लौटते वक्त, मुझमें बाइक चलाने की ताकत ही नहीं बची थी। मैं पूरे रास्ते सोचता रहा, "मैं सेवाकर्मी कैसे हो सकता हूँ?" मैंने इस बारे में जितना सोचा, लगा मेरे साथ उतना ही ग़लत हुआ है, और मेरे आंसू बहते ही रहे। घर पहुँचने के बाद कुछ भी करने में मेरी दिलचस्पी नहीं रही, बस सिर लटकाये चलता रहता, किसी से बात करने को तैयार नहीं था। यहाँ तक कि सांस लेना भी दूभर हो रहा था। मैं खुद के एक सेवाकर्मी होने की बात मान नहीं पा रहा था, जिसे अंत में कोई आशीष नहीं मिलेगा।

परमेश्वर के वचनों के अध्याय पर अध्याय आते जा रहे थे, और मैं प्रत्येक को उत्सुकता से पढ़ता था, इस लालसा में कि उसके वचनों में कहीं तो आशा की किरण होगी और मेरा परिणाम बदल सकेगा। लेकिन मेरी आशा के आशीष तो कहीं नज़र नहीं आये, बल्कि यह पूरा-का-पूरा कठोर न्याय था। परमेश्वर के वचनों में कुछ ख़ास थे, जिनमें कहा गया था : "जो सेवा प्रदान करते हैं और जो शैतान से संबंधित हैं, वे आत्माहीन मृत हैं, और उन सबको मिटाना और शून्य बना दिया जाना चाहिए। यह मेरी प्रबंधन योजना का एक रहस्य है, और मेरी प्रबंधन योजना का एक भाग है जिसे मानवजाति समझ नहीं सकती; लेकिन, साथ ही साथ, मैंने इसे हर एक के लिए सार्वजनिक कर दिया है। जो मेरे नहीं हैं, वे मेरे विरुद्ध हैं; जो मेरे हैं, वे वो लोग हैं जो मेरे अनुरूप हैं। यह पूरी तरह अकाट्य है, और शैतान के मेरे न्याय के पीछे यही सिद्धांत है। यह सिद्धांत सभी को ज्ञात होना चाहिए ताकि वे मेरी धार्मिकता और न्यायता देख सकें। हर कोई जो शैतान से आता है, उसका न्याय किया जाएगा, वो जलाया, और राख में बदल दिया जाएगा। यह भी मेरा कोप है, और इससे मेरा स्वभाव और अधिक स्पष्ट कर दिया गया है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 108')। "आज मेरे लिए सेवा करने के बाद, उन सभी को चले जाना चाहिए! मेरे घर में मटरगश्ती मत करो; बेशर्म और मुफ़्तखोर मत बनो। शैतान से संबंधित सभी लोग शैतान के पुत्र हैं, वे लोग सदा के लिए नष्ट हो जाएँगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 109')। परमेश्वर को सेवाकर्मियों का न्याय कर उन्हें शापित करते देख, मेरी सारी उम्मीद जाती रहीं और मुझे वाकई लगा कि मैं सीधे एक बहुत गहरे गड्ढे में गिर गया हूँ। मुझे यह भी नहीं पता कि दुख की उस भावना को शब्दों में कैसे बाँधूं। मैंने याद किया कि मैं किस तरह अभी-अभी परमेश्वर के आलिंगन में था, उसके प्रेम में दमकता हुआ, लेकिन अब मुझे बाहर फेंक दिया गया है, परमेश्वर द्वारा बेकार मान कर, शापित कर, बहुत गहरे गड्ढे में डाल दिया गया है। मैं दुख के शुद्धिकरण में डूब गया और बहुत नकारात्मक हो गया। मुझमें प्रार्थना करने, स्तुति-गान सुनने या परमेश्वर के वचन पढ़ने की शक्ति नहीं थी। अब तक की अपनी सारी मेहनत और त्याग पर मुझे पछतावा होने लगा। यदि मुझे पता होता कि ऐसा होने वाला है, तो मैं बाहर ही रहा होता, मगर अब मेरे पास कुछ भी नहीं बचा है। अगर मेरे अविश्वासी दोस्तों और परिवार के लोगों को पता चल गया कि मैं सेवाकर्मी बनूंगा और खाली हाथ रहूँगा, तो वे मेरा ज़बरदस्त मज़ाक नहीं उड़ायेंगे? मैं उन्हें अपना चेहरा कैसे दिखाऊंगा? मैं क्या करूं? यह सोच कर मुझे सच में तिरस्कृत महसूस हुआ। वर्षों की अपनी आस्था के बारे में सोच कर, लगा कि हालांकि मैंने बहुत कष्ट सहे थे, मगर मैंने परमेश्वर के अनुग्रह और आशीषों का आनंद भी बहुत लिया था। आज परमेश्वर ने मुझे उसके नये वचन सुनने के लिए उन्नत किया है, और मैंने बहुत-से रहस्यों और सत्य के बारे में जाना है। कुछ भी हो, मैं परमेश्वर से दूर नहीं जा सकता।

जब हम पीड़ा में जी रहे थे, तो हमने सभा में परमेश्वर के ये वचन पढ़े : "मेरी केवल यही कामना है कि तुम लोग अपने संपूर्ण हृदय और मन के साथ और अपनी सर्वोत्तम क्षमता के साथ अपनी समस्त शक्ति मुझे अर्पित कर दो। चाहे आज या कल, चाहे तुम लोग मुझे सेवा प्रदान करने वाले हो या आशीष प्राप्त करने वाले, तुम सभी लोगों को अपनी शक्ति का परिमाण मेरे राज्य के लिए लगाना चाहिए। यह दायित्व सभी सृजित लोगों को लेना चाहिए, और इसे इसी तरह से संपन्न और कार्यान्वित किया जाना चाहिए। मैं सभी चीज़ों को अपने राज्य की सुंदरता सदैव नई बनाए रखने और अपना घर सामंजस्यपूर्ण और एकजुट रखने हेतु सेवा प्रदान करने के लिए जुटाऊँगा। किसी को भी मेरी अवज्ञा करने की अनुमति नहीं है, और जो कोई ऐसा करता है, उसे न्याय भुगतना और शापित होना पड़ेगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 100')। उस वक्त कलीसिया के अगुआ ने भी इस बारे में कुछ संगति साझा की। "बहुत से लोग सोचते हैं कि सेवाकर्मी होना शर्म की बात है, लेकिन यह बिल्कुल गलत है। आज हमारा परमेश्वर की सेवा करना उसके द्वारा पूर्वनियत कर दिया गया था, और इसके अलावा, ऐसा करने के लिए परमेश्वर ने हमें चुना था। दरअसल, सर्वोच्च और सर्वशक्तिमान परमेश्वर की सेवा करना गौरव की बात है! हम इंसान हैं जिन्हें शैतान ने बुरी तरह से भ्रष्ट कर दिया है और परमेश्वर के सामने, हम लोग तो बस तुच्छ प्राणी हैं। परमेश्वर की सेवा करने के उपयुक्त कौन है? पूरी मानवजाति में से परमेश्वर ने अपनी सेवा के लिए हमें चुना है। हमने बहुत कुछ प्राप्त किया है और ये सचमुच हमारे लिए परमेश्वर का महान उत्कर्ष है। यह एकदम न्यायोचित कथन है और अगर तुम इसे न समझ पाओ, तो तुम लोग हद दर्जे के अहंकारी हो। मैं ईमानदारी से एक बात कहता हूँ : परमेश्वर ने पूरी तरह से मानवीयता से रहित हम इंसानों को अपनी सेवा की अनुमति दी है। लेकिन क्या तुम्हें पता है कि उसने कितना अपमान झेला है? उसे हर दिन हम जैसे भ्रष्ट लोगों का सामना करना पड़ता है, फिर भी हम में से ऐसे कितने लोग हैं जिन्होंने उसके इस भयंकर अपमान की ओर ज़रा-सा भी ध्यान दिया हो? हम लोग हमेशा उससे विद्रोह करते हैं, उसकी उपेक्षा करते हैं, हम अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार उसका आकलन करते हैं। हमने उसका दिल तोड़ा है। उसने कितनी पीड़ा सही है? सच कहूँ तो, हम लोग भ्रष्ट स्वभाव से भरे हुए हैं, और जब हम उसकी सेवा करते हैं, तो हम उसकी अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरते। ऐसे बर्ताव के बाद, हम लोग परमेश्वर की सेवा करने लायक भी नहीं हैं। हम लोग परमेश्वर-जन बनने लायक कैसे हो सकते हैं?" इसे सुन कर मुझमें जागृति आयी। परमेश्वर सृष्टिकर्ता है, और वही सर्वोच्च है। मैं नीच और मामूली हूँ, इसलिए उसके लिए सेवा कर पाने का अर्थ परमेश्वर द्वारा उन्नयन और अनुकंपा है। लेकिन मुझे अपनी पहचान या रुतबे की जानकारी नहीं थी, मेरा यह मानना था कि सेवाकर्मी निचले दर्जे का होता है और परमेश्वर के लिए मैं यह करने को तैयार नहीं था। मैं बहुत घमंडी और अविवेकी था। मुझे याद है कि हालांकि मैंने त्याग करते हुए, खुद को खपाते हुए, उत्साह से अनुसरण किया था, मगर यह सब आशीष पाने के लिए था, स्वर्ग के राज्य के आशीषों का आनंद लेने के लिए था। इंसान के लिए परमेश्वर के वायदों और आशीषों के वचन पढ़ने के बाद मैं वाकई प्रेरित हुआ था, और सीसीपी के उत्पीड़न के बावज़ूद मैं आगे बढ़ रहा था। लेकिन जब मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े कि हम सेवाकर्मी हैं जिन्हें बहुत गहरे गड्ढे में फेंक दिया जाएगा, तो मैंने शिकायत करना और परमेश्वर को दोष देना शुरू कर दिया, यहाँ तक कि परमेश्वर को धोखा देने और त्यागने की सोचने लगा। मैं किसी भी प्रकार से सच्चा विश्वासी कहाँ था? मैंने जो भी दिया, जो भी त्यागा और खपाया, उन सब पर मेरी गलत मंशाओं और अशुद्धियों की कालिख पुती हुई थी। यह आशीष पाने के लिए था, यह परमेश्वर को धोखा देना था, परमेश्वर से सौदा करना था। मैं बेहद स्वार्थी और घिनौना था। मैंने परमेश्वर के अनुग्रह और आशीष, उसके वचनों के पोषण और सिंचन का इतना आनंद लिया था, लेकिन जैसे ही मुझे उसमें अपने लिए आशीष नहीं दिखाई पड़े, मैंने उसे धोखा देना चाहा। मुझमें अंतरात्मा और विवेक का पूरा अभाव था। इस विचार से मैं पूरी तरह से पछतावे और खुद को कोसने की भावना से भर गया। मैं बड़े लाल अजगर की संतान था। मैं शैतान का था, परमेश्वर के घर का नहीं, यहाँ तक कि मेरी आस्था भी आशीष पाने से प्रेरित थी। परमेश्वर पवित्र और धार्मिक है और उसका स्वभाव कोई अपमान सहन नहीं करता। परमेश्वर के प्रति अपने व्यवहार और रवैये को देखते हुए, मैं तो एक सेवाकर्मी बनने के भी योग्य नहीं था। परमेश्वर को मुझे बहुत पहले ही शापित कर नरक में भेज देना चाहिए था। परमेश्वर मुझे दंड नहीं दे रहा था, बल्कि इसी सांस के साथ जीने दे रहा था, ताकि मुझे उसके वचन सुनने, जीवन के लिए उसके पोषण को स्वीकार करने, और सर्वोच्च परमेश्वर की सेवा करने का का एक मौक़ा मिले। यह एक असाधारण उत्कर्ष था, मुझे परमेश्वर को धन्यवाद देना चाहिए। मुझे शिकायत करने का हक़ कहाँ है? मैं जान गया था कि मुझे परमेश्वर के लिए अच्छे ढंग से सेवा करनी है!

नवंबर में के आखिर में, हमें परमेश्वर के कुछ और नये वचन मिले। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "मेरे सिय्योन लौटने के बाद, पृथ्वी के लोग उसी तरह मेरी स्तुति करते रहेंगे, जैसा कि वे अतीत में करते थे। वे वफ़ादार सेवाकर्मी मुझे सेवा प्रदान करने के लिए हमेशा की तरह प्रतीक्षा करेंगे, किंतु उनका कार्य समाप्त हो गया होगा। सर्वोत्तम चीज़ जो वे कर सकते हैं, वह है पृथ्वी पर मेरी उपस्थिति की परिस्थितियों पर चिंतन करना। उस समय मैं उन लोगों पर आपदा लाना शुरू कर दूँगा, जो विपदा से पीड़ित होंगे; फिर भी हर कोई विश्वास करता है कि मैं एक धार्मिक परमेश्वर हूँ। मैं निश्चित रूप से उन वफ़ादार सेवा-कर्मियों को दंडित नहीं करूँगा, बल्कि उन्हें केवल अपना अनुग्रह प्राप्त करने दूँगा। क्योंकि मैंने कहा है कि मैं सभी दुष्कर्मियों को दंड दूँगा, और कि अच्छे कर्म करने वालों को मेरे द्वारा प्रदान किए जाने वाले भौतिक आनंद मिलेंगे, जो यह प्रदर्शित करता है कि मैं स्वयं धार्मिकता और ईमानदारी का परमेश्वर हूँ" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 120')। मैंने देखा कि परमेश्वर ने हमारा बिल्कुल भी त्याग नहीं किया था, और वह हमें इसलिए दंड नहीं दे रहा था, क्योंकि हम बड़े लाल अजगर की संतान थे। परमेश्वर हमें अभी भी उसके निष्ठावान सेवाकर्मी होने और धरती पर उसका गुणगान करने दे रहा था। इससे मुझमें एक जोश पैदा हुआ और मैं वाकई उत्साहित हो गया। मुझे सच में लगा कि परमेश्वर की सेवा करने में समर्थ होना उसका उत्कर्ष पाना है और यह एक आशीष है। उस दौरान, हमने हर सभा में "परमेश्वर को सेवा प्रदान करना हमारा सौभाग्य है" स्तुति-गान गाया। "परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन और न्याय से ही हम जानते हैं कि हम कितनी गहराई से भ्रष्ट हो चुके हैं। हम आशीष पाने के इरादे और चाह से भरे, परमेश्वर के सामने रहें जीने के योग्य कैसे? स्वर्ग के राज्य में प्रवेश के लायक हम नहीं; उसका दिया उत्कर्ष है सेवा परमेश्वर की। आह! हम करें सेवा परमेश्वर के अनुग्रह से, हमारा बड़ा सौभाग्य है उसकी सेवा कर पाना। मुझे आशीष मिले या मैं दुर्गति सहूँ, अंत तक उसकी सेवा को मैं खड़ा तैयार हूँ। आज हम परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं, लेकिन हम अपने आपको इस लायक बिल्कुल नहीं समझते। हमारी भविष्य की संभावनाएँ, नियति और परिणाम कुछ भी हों, लेकिन हम अंत तक परमेश्वर का अनुसरण करेंगे। परमेश्वर हमें शुद्ध करने, हमारी अंतरात्मा और विवेक को पुन: जगाने के लिए अपने वचनों का इस्तेमाल करता है। ओह! हम लोग परमेश्वर के लिए बैल की तरह मेहनत करने और उसके आयोजनों एवं व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होने को तैयार हैं। हम आजीवन पूरे दिल से परमेश्वर के लिए सेवा करेंगे और परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की सदा स्तुति करेंगे" (मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ)।

पहले हम सेवाकर्मी बनने में खुशी महसूस करते थे और परमेश्वर की सेवा करने को तैयार रहते थे, सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने नये वचन बोले। यह 20 फरवरी 1992 का दिन था। उसने राज्य के लोगों के रूप में हमें उन्नत किया और सेवाकर्मियों की परीक्षा को ख़त्म किया। परमेश्वर के वचन कहते है, "स्थिति अब वह नहीं है, जो कभी थी, और मेरा कार्य एक नए आरंभ-बिंदु में प्रवेश कर चुका है। ऐसा होने के कारण एक नया दृष्टिकोण होगा : वे सब, जो मेरा वचन देखते हैं और उसे ठीक अपने जीवन के रूप में स्वीकार करते हैं, वे लोग मेरे राज्य में हैं, और मेंरे राज्य में होने के कारण वे मेरे राज्य में परमेश्वर के लोग हैं। चूँकि वे मेरे वचनों का मार्गदर्शन स्वीकार करते हैं, अत: भले ही उन्हें परमेश्वर के लोग कहा जाता है, यह उपाधि मेरे 'पुत्र' कहे जाने से किसी भी रूप में कम नहीं है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 1')। यह देख कर कि परमेश्वर ने सेवाकर्मियों को राज्य के युग के अपने लोगों में बदल दिया है, मुझे पछतावे और खेद के साथ खुशी महसूस हुई। मुझे पछतावा हुआ कि मैं नकारात्मक, कमज़ोर, और सेवाकर्मियों की परीक्षा के दौरान आशाहीन था, परमेश्वर को ग़लत समझ कर, दोष देकर उससे शिकायत भी की थी। मैं उसका सेवाकर्मी बनाने को तैयार नहीं था। मुझमें परमेश्वर के प्रति निष्ठा और आज्ञाकारिता बिल्कुल भी नहीं थी। इससे मैंने सच में पछतावा और परमेश्वर के ऋणी जैसा महसूस किया। मैं खुश था कि बड़े लाल अजगर की संतान के रूप में, बहुत विद्रोही और भ्रष्ट होकर भी, परीक्षण से न भागने के कारण, परमेश्वर ने हमें राज्य के लोगों, उसके घर के सदस्यों के रूप में उन्नत किया है। मैं हम सबके लिए परमेश्वर का महान प्रेम महसूस कर रहा था, मेरे दिल में परमेश्वर के प्रति आभार और गुणगान की भावना उफन रही थी।

उस परीक्षण से गुज़रने के बाद, मुझे परमेश्वर के कार्य में असाधारण बुद्धिमत्ता दिखाई दी। वह अपने वचनों से लोगों का न्याय करता है, ताड़ना देता है और उन्हें शाप भी देता है, हालांकि ये वचन रूखे होते हैं, हमें पीड़ित और संतप्त कर देते हैं, फिर भी ये सब हमें शुद्ध करने और परिवर्तित करने के लिए होते हैं। हालांकि परमेश्वर के वचनों से मेरा शुद्धिकरण हुआ है, मगर मैंने उसका धार्मिक स्वभाव देखा है। वह हमारी गलत मंशाओं और अशुद्धियों से नफ़रत करता है, वह आशीषों से प्रेरित आस्था से नफ़रत करता है। इस अनुभव के बाद, आस्था के बारे में मेरा रवैया थोड़ा बदल गया। मैंने आशीषों और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश के अनुसरण पर एकतरफ़ा सोच रखना छोड़ दिया, बल्कि महसूस किया कि सृष्टिकर्ता के लिए सेवा करने वाला सेवाकर्मी होना परमेश्वर से उत्कर्ष प्राप्त करना है, और मेरे लिए यही आशीष है। यह मुझे गर्व और सम्मान का अनुभव कराता है!

अगला: 2. मौत के परीक्षण के दौरान

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