37. आवारा पुत्र की वापसी

लेखिका: रूथ, अमेरिका

मैं दक्षिणी चीन के एक छोटे-से शहर में पैदा हुई। मेरी मॉम की तरफ के खानदान में पड़नानी के ज़माने से परमेश्वर में विश्वास रखने की परंपरा चली आ रही है। बाइबल की कहानियाँ, स्तुति-गीत और पवित्र संगीत मेरे बचपन के खुशनुमा दिनों के साथी थे। बढ़ती उम्र के साथ पढ़ाई-लिखाई का दबाव भी बढ़ता गया और धीरे-धीरे मेरा दिल प्रभु से दूर होता चला गया। लेकिन प्रभु ने मुझे कभी नहीं छोड़ा; मैंने जब भी उसे पुकारा, उसने मेरी मदद की। प्रभु का अनुग्रह और पवित्र नाम मेरे दिल की गहराइयों में बसा हुआ था। मुझे वो साल याद है जब मैं कॉलेज में प्रवेश की परीक्षा दे रही थी, किसी को भरोसा नहीं था कि मुझे किसी अच्छे कॉलेज में दाखिला मिल जाएगा, मेरे शिक्षकों को भी नहीं। एक के बाद एक झटके लगते रहे, मैंने सारी उम्मीदें छोड़ दीं। मुझे लगा कि मैं जो कॉलेज चाहती हूँ, उसमें मुझे कभी दाखिला नहीं मिलेगा। लेकिन तभी मेरे दिमाग में एक बात आयी—जब मैं छोटी थी तो मैंने कलीसिया में एक कहावत सुनी थी: "जहाँ इंसान के प्रयास खत्म हो जाते हैं, वहाँ से परमेश्वर का काम शुरू होता है," मुझे एक पल में लगा कि मुझे प्रबोधन मिल गया है। मैं जानती थी कि यह बात सही है: जहाँ मेरी कोशिशें खत्म होती हैं, वहाँ से परमेश्वर की शुरु होती हैं। परमेश्वर की सीमाएँ अनंत हैं, और मुझे विश्वास था कि अगर मेरा झुकाव सच्चे दिल से प्रभु की ओर होगा, तो वह यकीनन मेरी मदद करेगा। इस तरह, मैं अक्सर प्रभु से प्रार्थना करने लगी: "हे प्रभु, प्लीज़ मेरी मदद कर। अगर मुझे बिना किसी रुकावट के अपना मनपसंद कॉलेज मिल गया, तो मैं वादा करती हूँ कि मैं तुझसे कभी दूर नहीं हूँगी, और मैं तुझे इस जीवन में अपना एक-मात्र उद्धारक मान लूँगी।" ऐसा करते समय, मैं एक ऐसी कीमत भी अदा कर रही थी जिसके बारे में अधिकतर लोग सोच भी नहीं सकते; सीनियर हाई स्कूल के पूरे साल, खाने और सोने के समय को छोड़कर, मैं 10 से 12 घंटे हर रोज़ पियानो का अभ्यास किया करती थी। पता नहीं मेरे अंदर इतनी शक्ति कहाँ से आ रही थी जो मुझे संभाले हुए थी। मुझे लगा, प्रभु मेरी प्रार्थानाएँ सुनकर, चुपके-चुपके मेरी मदद कर रहा है। मैं अपने आपको प्रभु के प्रति और भी ज़्यादा आभारी महसूस कर रही थी। आखिरकार, मेरी चिर-प्रतीक्षित मुराद पूरी हो गयी; मुझे देश की बेहतरीन संगीत अकादमी में दाखिला मिल गया, और इस तरह मेरी आस्था और भी दृढ़ हो गयी कि प्रभु यीशु ही मेरा एक-मात्र उद्धारक है। कॉलेज के आखिरी साल में, मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि कॉलेज के बाद मैं किस रास्ते पर आगे बढूँ। मैंने प्रभु यीशु को ही पुकारा और कहा कि वो मुझे राह दिखाए, मेरे लिए कोई रास्ता खोले। 2004 में, अमेरिका में हुए 9/11 के आतंकवादी हमले के कुछ समय बाद ही, लगभग पूरी तरह से प्रवेश के लिए वीज़ा पर पाबंदी लगा दी गयी थी, लेकिन मुझे आश्चर्य हुआ कि पेशेवर तरीके से रिकॉर्ड की गयी मेरी सीडी के आधार पर, मुझे अमेरिका के एक विश्वविद्यालय में पूरी पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप मिल गयी। मुझे अमेरिका जा कर पढ़ाई करने के लिए बिना किसी परेशानी के विद्यार्थी वीज़ा मिल गया। कॉलेज में दाखिले और विदेश जाने के इन दो अनुभवों से, मैं समझ गयी कि प्रभु ने मेरे सपनों को साकार करने में मेरी मदद की है जिन्हें मैं अपने दम पर कभी पूरा नहीं कर पाती। मैं और भी आश्वस्त हो गयी कि प्रभु यीशु सच्चा परमेश्वर है, वही मेरा उद्धारक है, मुझे प्रभु में अपनी आस्था का सही ढंग से अभ्यास करना चाहिए और उसका अनुसरण करना चाहिए।

मैं अक्सर चीन में अपनी मॉम से बातचीत करती रहती थी। एक दिन 2007 में, मैंने अपनी मॉम को कॉल किया। वे तपाक से बोल पड़ीं: "तुम्हें पता है प्रभु यीशु मसीह लौट आया है?" उनकी इस बात को सुनकर मुझे सुखद आश्चर्य हुआ। लेकिन फिर तुरंत ही मुझे बाइबल में लिखी हुई बात याद आई कि अंत के दिनों में झूठे मसीह प्रकट होंगे, इसलिए मुझे पता नहीं था कि प्रभु के लौटकर आने वाली बात सच थी या झूठ। मैं जानती थी कि इस मामले में मुझे सतर्क रहना होगा। आजकल इंटरनेट बहुत ही तेज़ और सुविधाजनक है, इसलिए इस बात की जाँच के लिए ऑनलाइन जा कर देखना सही रहेगा। मैंने फोन रखा और इंटरनेट देखने लगी। इस सूचना का कोई विश्वसनीय स्रोत ढूँढ़ने के लिए मैं बेहद उत्तेजित थी। लेकिन जब मैंने प्रभु यीशु, यानी सर्वशक्तिमान परमेश्वर के बारे में हर जगह उसकी निंदा और तिरस्कार करने वाली बातें पढ़ीं, तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मैं कुछ समझ नहीं पायी कि ये सब सच है या झूठ है। मेरे मन में डर और बेचैनी व्याप्त हो गयी, मैं भयभीत हो गयी कि मॉम को सही या गलत की कोई पहचान नहीं है, ऐसा न हो कि वे किसी गलत मार्ग को अपना लें। मैंने उनको ऑनलाइन पर उपलब्ध वो तमाम गंदी बातें बताने के लिए तुरंत फोन किया जो मैंने पढ़ी थीं। लेकिन मॉम शांत थीं और उन्होंने मुझे तसल्ली देते हुए कहा, "बेटा, तूने अभी सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन नहीं पढ़े हैं, इसलिए तुझे पता नहीं, और ये बातें तुझे समझाने में मुझे समय लगेगा, लेकिन तू चिंता मत कर, मैं किसी गलत रास्ते पर नहीं जा रही। सच तो यह है कि मैं मेमने के पदचिह्नों पर चल रही हूँ। खैर, ये बातें हम लोग फोन पर नहीं करेंगे।" मैं जानती थी कि चीन में नास्तिक लोगों की तानाशाही है, और सीसीपी सरकार ईसाइयों को यातना देती है और उन्हें गिरफ्तार करती है, इसलिए आस्था से जुड़ी बातें फोन पर करना ठीक नहीं हैं। मेरी हिम्मत नहीं हुई कि मैं इस बारे में मॉम से ज़्यादा कुछ कहूँ, इसलिए मैंने इस सिलसिले में मदद के लिए चीन में अपने परिचित पादरी को फोन लगाया और उनसे विनती की कि वे जा कर मेरी मॉम को "छुड़ाएँ"। बाद में जब पादरी ने मुझे बताया कि वो मेरी मॉम को वापस पुरानी आस्था में लाने में नाकाम रहे, तो मैं गुस्से से पागल हो गयी। मॉम को सर्वशक्तिमान परमेश्वर में आस्था रखने से अलग करने के लिए मैंने यहाँ तक कह दिया वे मुझमें और सर्वशक्तिमान परमेश्वर में से एक को चुन लें। यह बात कहने के बाद, मुझे तीन दिनों तक एक ही सपना आता रहा कि भयंकरतम अंधेरी रात है, मूसलाधार बारिश हो रही है, मैं काले रंग की छतरी लिए, किसी पुराने परिचित समंदर के किनारे चली जा रही हूँ। आसपास कोई नहीं है, तभी अचानक एक तेज़ कौंधती हुई बिजली मेरी छतरी पर गिरती है...। मुझे जब भी यह सपना आता, डर के मारे मेरी आँख खुल जाती और मैं ठंडे पसीने में भीग जाती, लेकिन मैं इतनी गैर-संवेदनशील, अज्ञानी और अड़ियल थी कि मुझे महसूस ही नहीं हुआ कि मैं खोज करने या प्रार्थना करने की ज़रा कोशिश तो करूँ, या यह पता करने का प्रयास तो करूँ कि मुझे इस तरह का सपना क्यों आ रहा है: क्या यह मेरे लिए प्रभु की कोई चेतावनी थी जो मुझे कह रही थी कि मैं परमेश्वर का विरोध करने से बाज़ आऊँ, और परमेश्वर की शरण में लौट आऊँ? उसके बाद मैंने देखा कि मॉम को मनाने की मेरी तमाम कोशिशें बेकार साबित हुईं। इसके अलावा, मैं दूर एक विदेशी धरती पर व्यस्त जीवन जी रही थी, इसलिए मैंने उनके साथ ज़ोर-ज़बर्दस्ती करनी बंद कर दी।

2007 में, जब मैं चीन वापस गयी तो मॉम ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर में आस्था वाली बात का ज़िक्र किया। मुझे लगा कि जो बात मैं सोच रही हूँ, वो मॉम जानती है, उन्होंने मुझसे बेबाकी से पूछ लिया, "पता है मैं कई सालों से सर्वशक्तिमान परमेश्वर में आस्था रखती आ रही हूँ, तो क्या तुम्हें लगता है कि जो बात वो लोग ऑनलाइन कह रहे हैं, वैसी कोई अजीब बात तुम्हें मेरे अंदर दिखायी देती है?" मॉम के इस सवाल से मैं चकरा गयी और मुझे तुरंत कोई जवाब नहीं सूझा। जब मैंने इस बात पर गंभीरतापूर्वक सोचा, तो मुझे एहसास हुआ कि मैं जिन बातों को ऑनलाइन पढ़कर काँप गयी थी, उनमें से मॉम में तो कोई भी बात दिखायी नहीं दे रही; वे एकदम सामान्य थीं, और मेरे सामने ने हानिरहित खड़ी थीं। जबकि सच तो यह है कि प्रभु यीशु में आस्था रखने की तुलना में सर्वशक्तिमान परमेश्वर में आस्था रखने के बाद से उनमें ज़्यादा बदलाव आया। न केवल वे बातचीत और कामों में ज़्यादा विवेकशील हुई थीं, बल्कि वे समस्याओं को भी बेहतर ढंग से समझने लगी थीं। यह सब देखकर, मैंने सोचा: शायद ऑनलाइन अफवाहें सच नहीं हैं, क्योंकि सच्चाई की आवाज़ ज़्यादा ऊँची सुनाई देती है। उसके बाद मॉम बोलीं, "तुम ऑनलाइन अफवाहों पर विश्वास करने के बजाय अपनी मॉम पर विश्वास क्यों नहीं करती, और तथ्यों पर नज़र क्यों नहीं डालती? तुमने उन बकवास बातों की जाँच-पड़ताल की है, सबूत देखे हैं?" मैंने लजाते हुए उत्तर दिया, "नहीं।" वे बोलती रहीं, "तुमने उन बातों की जाँच करके पता ही नहीं लगाया कि वे सब सुनी-सुनायी बातें हैं और उन ऑनलाइन अफवाहों पर विश्वास कर लिया और फौरन निष्कर्ष निकाल लिया। धिक्कार है जो इतनी पढ़-लिखकर भी तुम में विवेक की कमी है। तुम्हें चारों सुसमाचारों को ध्यान से देखना चाहिए था कि जब प्रभु यीशु अपना कार्य कर रहा था, तो यहूदी याजकों, धर्मशास्त्रियों और फ़रीसियों ने हर तरह की अफवाहें गढ़ीं और झूठी गवाही दी। उनका कहना था कि प्रभु यीशु पापियों का साथी है, वो खाने-पीने और मदिरा-सेवन में लिप्त रहता है, उन्होंने उस पर झूठा आरोप लगाया कि वो लोगों को भड़काता है कि राजा (सीज़र) को कर देना बंद कर दो। उन्होंने सैनिकों को रिश्वत देकर झूठी गवाही दिलवायी, उनसे यह कहलवाया कि कि प्रभु यीशु का पुनरुत्थान नहीं हुआ था, उसके शरीर को उसके अनुयायी चुराकर ले गये थे। ये सारी बातें तो तुम्हें पता ही होंगी? चार सुसमाचार तो उस कार्य का महज़ एक छोटा-सा हिस्सा हैं, जो यीशु ने किया था, उनमें बहुत सारी अफवाहें तो ऐसी लिखी हैं जो यहूदी अगुवाओं ने प्रभु यीशु के बारे में फैलायी थीं। क्या तुमने पहले कभी उनके बारे में सोचा है? अगर उस ज़माने में इंटरनेट होता, तो यहूदी याजकों, धर्मशास्त्रियों और फ़रीसियों ने यकीनन प्रभु यीशु के बारे में ऑनलाइन अफवाहें फैलायीं होती, झूठी गवाहियाँ दी होतीं, और पूरे इंटरनेट पर उसी तरह उसे गालियाँ दी होतीं, ईश-निंदा की होती, उसे फँसाया होता और उसका तिरस्कार किया होता जिस तरह आज धार्मिक जगत सर्वशक्तिमान परमेश्वर की निंदा कर रहा है। इसका मतलब जानती हो? प्रभु यीशु ने कहा था: 'इस युग के लोग बुरे हैं' (लूका 11:29)। 'और दण्ड की आज्ञा का कारण यह है कि ज्योति जगत में आई है, और मनुष्यों ने अन्धकार को ज्योति से अधिक प्रिय जाना क्योंकि उनके काम बुरे थे। क्योंकि जो कोई बुराई करता है, वह ज्योति से बैर रखता है, और ज्योति के निकट नहीं आता, ऐसा न हो कि उसके कामों पर दोष लगाया जाए' (यूहन्ना 3:19-20)। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने कहा था: 'शैतान के द्वारा भ्रष्ट किए जाने पर मनुष्य ने, परमेश्वर की अवज्ञा करने वाले शत्रु बनते हुए, अपना धर्मभीरू हृदय गँवा दिया है और उस कार्य को गँवा दिया जो परमेश्वर के सृजित प्राणियों में से एक के पास होना चाहिए। मनुष्य शैतान के अधिकार क्षेत्र के अधीन रहा और उसने उसके आदेशों का पालन किया' ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे")। 'परमेश्वर का विश्व का सृजन हजारों वर्षों पहले से चल रहा है, वह पृथ्वी पर एक असीमित मात्रा में कार्य करने के लिए आया है, और उसने मानव दुनिया के अस्वीकरण और अपयश का पूरी तरह से अनुभव किया है। कोई भी परमेश्वर के आगमन का स्वागत नहीं करता है; हर कोई मात्र एक भावशून्य नज़र से उसका सम्मान करता है। इन हजारों वर्षों की कठिनाइयों के दौरान, मनुष्य के व्यवहार ने बहुत पहले से ही परमेश्वर के हृदय को चूर-चूर कर दिया है' ("वचन देह में प्रकट होता है" में "कार्य और प्रवेश (4)")। परमेश्वर के वचनों ने भ्रष्ट इंसान की परमेश्वर का विरोध करने वाली प्रकृति और सार को साफ तौर पर प्रकट किया है और यह किस तरह परमेश्वर को अपना शत्रु मानती है। शैतान ने इंसान को बुरी तरह से भ्रष्ट कर दिया है, और हर इंसान परमेश्वर का शत्रु बन गया है, किसी को सत्य से प्रेम नहीं है, कोई परमेश्वर के आगमन का स्वागत नहीं करता। जब प्रभु यीशु यहूदा में कार्य कर रहा था और सत्य व्यक्त कर रहा था, तो उसने बहुत से चमत्कार किए, बहुत से सामान्य लोग उसकी ओर आकर्षित होकर उसका अनुसरण करने लगे। इससे यहूदी अगुवाओं को चिंता सताने लगी कि हर आम आदमी प्रभु यीशु का अनुसरण करने लगेगा और उन्हें छोड़ देगा। तो, उन्होंने अफवाहें गढ़ीं और प्रभु यीशु की झूठी गवाहियाँ दीं, पागलों की तरह उसका विरोध किया और उसकी निंदा की, और आखिरकार उसे सूली पर चढ़ा दिया। यह सत्य से घृणा करने वाले और परमेश्वर को शत्रु के रूप में देखने वाले भ्रष्ट इंसान का अकाट्य प्रमाण है। आज परमेश्वर ने फिर से देहधारण किया है, और उसे फिर से भ्रष्ट इंसान के उसी पागलपन के विरोध और निंदा का सामना करना पड़ रहा है। सीसीपी को यही डर है कि लोग सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करेंगे और सीसीपी के दुष्ट सार को पहचान कर उसे नकार देंगे और उसके हाथ से सत्ता चली जाएगी। धामिक जगत के अगुवाओं को भी यही डर है कि विश्वासी सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करने लगेंगे, और फिर उनके साथ से ओहदा और रोज़ी-रोटी चली जाएगी। इसलिए, उस ज़माने के रोमन शासन और यहूदी अगुवाओं की तरह, ये लोग घृणित और विद्वेषपूर्ण हथकंडे अपना रहे हैं, हर तरह की अफवाहें गढ़ रहे हैं और सर्वशक्तिमान परमेश्वर की ढेरों झूठी गवाहियाँ दे रहे हैं, इस तरह सर्वशक्तिमान परमेश्वर को गालियाँ दे रहे हैं और उसकी निंदा कर रहे हैं और सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को अपमानित कर रहे हैं। उनका लक्ष्य है कि लोग खड़े हों और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों और कार्य की निंदा करें, उसे नकारें और उन लोगों के रास्ते में रुकावट डालें जो परमेश्वर का उद्धार प्राप्त कर रहे हैं। हमें शैतान की चालों को पहचानना होगा! सीसीपी सरकार नास्तिक है, उसकी सत्ता शैतानी है जो परमेश्वर को हमेशा अपना शत्रु मानती है। जब यह पहली बार सत्ता में आयी, तो इसने पवित्र बाइबल की प्रतियाँ जला दीं, कलीसियाओं को ध्वस्त कर दिया, ईसाइयों का नरसंहार किया, यहाँ तक कि पूरी दुनिया में मान्यता-प्राप्त पवित्र बाइबल को एक कुपंथी साहित्य के रूप में देखा, प्रोटैस्टेंट और कैथलिकों को महज़ दबाने और यातना देने के लिए दुष्ट कुपंथ का सदस्य करार दिया। यह भयंकर दुष्कर्म करती है, तो ऐसी कौन-सी अफवाह है जिसे ये लोग नहीं गढ़ेंगे? तथ्यों से ज़ाहिर है कि सीसीपी सरकार और धार्मिक जगत के अगुवा शैतानी दुष्टात्माएँ हैं जो सत्य से घृणा करते हैं और परमेश्वर के शत्रु हैं। इस बात को साफ तौर पर समझ लेना चाहिए। हम लोग आस्थावान हैं—हमें परमेश्वर के वचनों में और सत्य में विश्वास होना चाहिए। हमें सीसीपी सरकार और धार्मिक जगत के अगुवाओं की अफवाहों और झूठ पर विश्वास नहीं करना चाहिए। अगर हम सीसीपी सरकार और धार्मिक जगत के अगुवाओं द्वारा फैलायी गयी अफवाहों को नहीं पहचानेंगे, अगर हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों और कार्य की खोज और जाँच-पड़ताल नहीं करेंगे, तो अंत में हम लोग भी मसीह को त्यागने और सच्चे मार्ग को नकारने वाले आम यहूदियों की तरह ही होंगे क्योंकि हमने सुनी-सुनायी अफवाहों को सच मान लिया। इस तरह, हम न केवल परमेश्वर के उद्धार से वंचित रह जाएँगे, बल्कि अंत में परमेश्वर का विरोध करने के कारण उसके धार्मिक दंड के भागी भी बनेंगे!"

मॉम की बातें सुनकर, मुझे लगा जैसे मैं सपने से जाग गयी हूँ और मुझे उन पर चिंतन करना होगा: "वे सही कह रही हैं। मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़े बिना या उनकी जाँच-पड़ताल किए बिना, ऑनलाइन नकारात्मक बकवास बातों पर आँख मूँदकर भरोसा क्यों कर लिया? इस जगत को शैतान ने इतना भ्रष्ट कर दिया है कि यह झूठ और कपट से भरा हुआ है; हर जगह इतना ज़्यादा छल-कपट है कि हम वाकई उससे अपने आपको बचा नहीं सकते। मैंने ऑनलाइन सूचना की कोई जाँच नहीं की, सिर्फ आँख मूँदकर भरोसा क्यों कर लिया। मैं भी दूसरों की बातों को ही रटती रही और मनमाना निष्कर्ष निकाल लिया। क्या यह मेरी हद दर्जे की लापरवाही और अज्ञान नहीं था? क्या दुष्टों की बातों का अनुसरण करना और मनमाना आकलन करना नहीं था?" मॉम ने जब यह देखा कि मैं कुछ बोल नहीं रही हूँ, तो उन्होंने वचन देह में प्रकट होता है की एक प्रति थमाते हुए शांति से कहा: "इस पुस्तक में परमेश्वर द्वारा अंत के दिनों में बोले गए वचन हैं। मुझे उम्मीद है कि तुम अपनी धारणाओं को दरकिनार करके इन्हें ध्यान से पढ़ोगी। अगर कोई सवाल हो तो बताना, हम दोनों मिलकर उन पर सहभागिता करेंगे।" मैंने पुस्तक लेकर बिना कुछ कहे पढ़नी शुरू कर दी। लेकिन सच तो यह है कि मैं उसे सत्य की खोज करने वाले नज़रिए से नहीं पढ़ रही थी। बल्कि, मेरी मानसिकता एक ऐसे खोजी की थी जो अपने व्यक्तिगत ज्ञान के अनुसार परमेश्वर के वचनों को आँकना और उन्हें सत्यापित करना चाहता था, बल्कि मैं तो उनका खंडन करना चाहती थी। चूँकि परमेश्वर के वचनों के प्रति मेरी श्रद्धा नहीं थी, इसलिए मुझे पवित्र आत्मा का प्रबोधन और प्रकाशन नहीं मिल पाया, यहाँ तक कि उस पूरे समय में मैं सचमुच सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों से परिचित नहीं हो पायी। उसके बावजूद, मैं अपनी गलत धारणाओं से चिपकी रही, मैं परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं करना चाहती थी। मैंने इस बारे में मॉम से बात की, "मॉम, पहले मैंने ऑनलाइन अफवाहों पर भरोसा करके, सर्वशक्तिमान परमेश्वर में आपकी आस्था में रुकावट डालने की कोशिश की, लेकिन सच तो यह है कि अंधी और अज्ञानी तो मैं थी। अब से, मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर में आपकी आस्था का विरोध नहीं करूँगी, लेकिन मैं किसी भी सूरत में आपके साथ सर्वशक्तिमान परमेश्वर की आराधना नहीं कर सकती, क्योंकि मैंने अपने मनचाहे कॉलेज में दाखिले के लिए प्रभु यीशु से प्रार्थना की थी और मुझे विदेश में अपनी पूरी पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप मिल गयी। मुझ पर इतना अनुग्रह हुआ है, तो मैं प्रभु यीशु को कैसे छोड़ सकती हूँ? क्या यह कृतघ्नता और कपट नहीं होगा?" मॉम ने मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ने के लिए दिया जो मेरी इसी धारणा को लेकर था: "यहोवा के कार्य से ले कर यीशु के कार्य तक, और यीशु के कार्य से लेकर इस वर्तमान चरण तक, ये तीन चरण परमेश्वर के प्रबंधन की पूर्ण परिसीमा को एक सतत सूत्र में आवृत करते हैं, और यह समस्त एक ही पवित्रात्मा का कार्य है। दुनिया के सृजन के बाद से, परमेश्वर हमेशा मनुष्यजाति का प्रबंधन करता आ रहा है। वही आरंभ और अंत है, वही प्रथम और अंतिम है, और वही एक है जो युग का आरंभ करता है और वही एक है जो युग का अंत करता है। कार्य के तीन चरण, विभिन्न युगों और विभिन्न स्थानों में, निश्चय ही एक ही पवित्रात्मा का कार्य हैं। वे सभी जो इन तीन चरणों को पृथक करते हैं, परमेश्वर के विरोध में खड़े हैं। अब, तुम्हारे लिए यह समझना उचित है कि प्रथम चरण से ले कर आज तक का समस्त कार्य एक परमेश्वर का कार्य, एक पवित्रात्मा का कार्य है। इस बारे में कोई संदेह नहीं हो सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)")। फिर उन्होंने मेरे साथ सहभागिता साझा की: "तुम्हें लगता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम को स्वीकारने का मतलब प्रभु यीशु को धोखा देना है, लेकिन यह तुम्हारी अपनी धारणा और कल्पना है। दरअसल, यहोवा परमेश्वर, प्रभु यीशु और सर्वशक्तिमान परमेश्वर एक ही परमेश्वर के नाम हैं। व्यवस्था के युग में परमेश्वर को यहोवा कहा जाता था; वह धरती पर इंसान के जीवन को मार्गदर्शन देने के लिए नियम जारी करता था, इंसान पर शासन करने के लिए, और उस पर नियंत्रण रखने, उसे मार्गदर्शन देने के लिए इंसान से अपने नियमों और आदेशों का पालन करवाता था। व्यवस्था के युग के अंत में, इंसान शैतान के हाथों इतना ज़्यादा भ्रष्ट हो गया था कि वह नियमों का पालन नहीं कर पाता था, लोग अपने जीवन में नियमों के तिरस्कार और अभिशाप के अधीन जी रहे थे। परमेश्वर ने अनुग्रह के युग का काम करने के लिए यीशु नाम का इस्तेमाल करके देहधारण किया, वह इंसान को छुटकारा दिलाने के लिए, इंसान की खातिर शाश्वत पाप-बलि के रूप में सूली पर चढ़ गया। तब से लेकर, अगर हम लोग परमेश्वर के आगे अपने पापों को स्वीकार करके प्रायश्चित कर लें, तो हमें पाप-मुक्त कर दिया जाएगा और फिर हम लोग नियमों द्वारा तिरस्कृत और अभिशप्त नहीं होंगे। इसके अलावा, हमें प्रभु के अनंत आशीष और करुणा भी प्राप्त होती है। हालाँकि, हमारे पापों को क्षमा किया जा सकता है और हम प्रभु यीशु के असीम अनुग्रह का आनंद उठा सकते हैं, लेकिन हमारी भ्रष्ट प्रकृति और स्वभाव दूर नहीं हुए हैं। हम लोग अभी भी पाप करने और फिर उसे स्वीकार करने के दुष्चक्र में फँसकर, अपने आपको मुक्त करने में असमर्थ हैं। अंत के दिनों में, परमेश्वर ने सत्य व्यक्त करके इंसान का न्याय करने और उसे शुद्ध करने के लिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर के रूप में एक बार फिर देहधारण किया है; इससे इंसान परमेश्वर के न्याय के ज़रिए सत्य को समझकर उसे हासिल करता है, अपने शैतानी, भ्रष्ट स्वभावों को दूर करता है, परमेश्वर द्वारा शुद्धिकरण प्राप्त करता है, और एक सच्चे इंसान की तरह जीवन जीता है। इस तरह, अंत में इंसान परमेश्वर की प्रतिज्ञा के उत्तराधिकार के उपयुक्त बन सकता है और उसे परमेश्वर के राज्य में लाया जा सकता है। इसलिए, प्रभु यीशु और सर्वशक्तिमान परमेश्वर दोनों ही परमेश्वर के देहधारण हैं, और वे एक ही परमेश्वर हैं।"

मॉम की सहभागिता तर्कपूर्ण थी और उसमें ऐसा कुछ नहीं था जिसका मैं खंडन कर पाती, लेकिन मेरी धारणाएँ कई तरह की थीं, इसलिए मैंने तुरंत कहा: "चूँकि सर्वशक्तिमान परमेश्वर लौटकर आया प्रभु यीशु है, तो फिर मैं चाहे उसे प्रभु यीशु के नाम से पुकारूँ या सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम से, एक ही बात है। दोनों तरह से वह अनुग्रह करने वाला परमेश्वर है।" मॉम ने कहा, "यहोवा परमेश्वर, प्रभु यीशु और सर्वशक्तिमान परमेश्वर तीनों एक ही हैं, इस बात में कोई शक नहीं, लेकिन परमेश्वर हर युग में अलग नाम धारण करता है। इसलिए हमारा उद्धार तभी होगा, जब हम उसके नए नाम को स्वीकार करेंगे। जैसे व्यवस्था के युग में परमेश्वर ने यहोवा नाम से कार्य किया, लोगों ने उसकी आराधना यहोवा नाम से ही की, और परमेश्वर ने इंसान की प्रार्थना को सुनकर उसे आशीर्वाद दिया। फिर, अनुग्रह के युग में उसने कार्य करने के लिए अपना नाम प्रभु यीशु रखा, तब लोगों को यीशु के नाम से उसकी आराधना करनी थी, वरना उनके पापों को क्षमा नहीं किया जाता, न ही उन लोगों को उसका अनुग्रह और आशीष प्राप्त होते। यह ऐसा ही है जैसे जिन इस्राएलियों ने मंदिर में यहोवा परमेश्वर को पुकारा तो वहाँ परमेश्वर की उपस्थिति नहीं थी और उन्हें प्रभु यीशु का उद्धार प्राप्त नहीं हुआ क्योंकि उन्होंने प्रभु यीशु के नाम को स्वीकार नहीं किया। आज राज्य का युग है और परमेश्वर अपना नया कार्य करने के लिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर नाम का प्रयोग कर रहा है। तुम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम से आराधना करके ही पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त कर सकते हो और परमेश्वर का उद्धार प्राप्त कर सकते हो। अगर तुम यीशु के नाम से ही चिपके रहे और तुमने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम को स्वीकार नहीं किया, तो इसका मतलब हुआ कि वास्तव में तुम परमेश्वर के पुराने कार्य में ही विश्वास करते हो और परमेश्वर के वर्तमान कार्य का विरोध करते हो, जिसका सार यह निकलता है कि तुम परमेश्वर का विरोध कर रहे हो और उसे धोखा दे रहे हो। पवित्र बाइबल कहती है: 'तू जीवित तो कहलाता है, पर है मरा हुआ' (प्रकाशितवाक्य 3:1)। परमेश्वर के नए नाम को स्वीकार करके और उसके वर्तमान वचनों और कार्य के प्रति समर्पित होकर ही हम परमेश्वर में सच्ची आस्था रख पाएँगे। मैं जो कह रही हूँ, क्या तुम उसे समझ रही हो?"

मॉम जो कुछ कह रही थी, वह विवेकपूर्ण भी था और व्यवहारिक भी, लेकिन मैं फिर भी अपने दिल से यीशु के नाम को नहीं निकाल पा रही थी, क्योंकि प्रभु ने मुझ पर इतना बड़ा अनुग्रह किया था। मेरे पास आज जो कुछ भी है, वह सब मुझे प्रभु यीशु से ही मिला है, और मैं अपनी इस पुरानी प्रतिज्ञा को छोड़ नहीं सकती: मैं प्रभु में अपनी आस्था का अभ्यास करूँगी और प्रभु का अनुसरण करूँगी। और परिणाम स्वरूप, मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर के सुसमाचार को नकारती रही।

गर्मी की छुट्टियाँ खत्म होने के बाद, मैं वापस अमेरिका आ गयी, मेरी व्यस्त पढ़ाई और भागती-दौड़ती ज़िंदगी मुझे तुरंत "वास्तविक" दुनिया में ले आयी। जब कभी मैं कलीसिया की सेवाओं के लिए गयी, तो मुझे पता लगा कि उन प्रवचनों में नया कुछ नहीं होता, इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता था कि वो चीनी कलीसिया का पादरी बोल रहा है या वो अंग्रेज़ी बोलने वालों की कलीसिया है। हर बार वही पुराने नाच-गाने। कलीसियाई जीवन बड़ा ही उबाऊ था और मुझे ऐसा नहीं लग रहा था कि मुझे जीवन में कोई पोषण मिल रहा है। अपने झुंड को पकड़कर रखने की कोशिश में, कलीसिया के सहकर्मी हम लोगों के लिए अक्सर यात्राएँ, बाहर घूमना-फिरना, पार्टी और दूसरी गतिविधियों का आयोजन करते रहते थे। कलीसिया में हर तरह के लोग थे, उनमें ऐसे भी लोग थे जो वास्तव में पक्के खोजी नहीं थे, बल्कि ऐसे किस्म के लोग थे जिन्हें किसी बॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड, रूममेट, सहयात्री, किसी साथ में खाने-पीने वाले व्यक्ति आदि की ज़रूरत होती थी, और मुझे यह बात समझ में आ गयी कि कलीसिया अब ऐसी जगह नहीं रह गयी है जहाँ मुझे मन की शांति मिल पाए। मेरा मन पीड़ा और उदासी से भर गया। उसके बाद मैंने सामूहिक सेवाओं में जाना बंद कर दिया, लेकिन मेरी बेचैनी लगातार बनी रही। मेरी स्थिति ऐसी हो गयी थी जैसे कोई मायूस बच्चा रास्ता भटक गया हो और वह हक्का-बक्का-सा जीवन गुज़ार रहा हो।

2014 में मैंने एक पुत्र को जन्म दिया, उसके बाद मेरे और मेरे पति के बीच विवाद काफी बढ गए क्योंकि अपने बच्चे को पिलाने लायक मेरे स्तनों में दूध नहीं उतरता था। रोज़ काम से घर आते ही मेरे पति का पहला सवाल होता था: "तुम्हारे स्तनों में दूध क्यों नहीं उतरता? बिना स्तनपान के मेरे बेटे के अंदर रोगों से लड़ने की ताकत कहाँ से आएगी?" पहली बार मेरे अंदर अयोग्य होने की भावना आयी थी—मुझे ऐसा लगा जैसे मैं माँ बनने के काबिल ही नहीं हूँ। मैं पश्चिमी और चीनी दोनों तरह के डॉक्टरों से मिली, ऑनलाइन घरेलु इलाज भी किए, लेकिन मेरे स्तनों में दूध नहीं उतरा। मैं आहत हुई, उदास और नाराज़ हुई, मानो मैं मानसिक अवसाद (नर्वस ब्रेकडाउन) के कगार पर आ गयी, और अगर ऐसा ही चलता रहा, तो मैं सचमुच पागल हो जाऊँगी। बच्चे के जन्म के बाद, पूरे स्वास्थ्य-लाभ के दौरान, मैं लगातार आँसुओं में डूबी रहती, मेरी तमाम कोशिशों के बावजूद, मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है। मैं जिस पीड़ा से गुज़र रही थी, उसे बयाँ नहीं कर सकती। "माँ का दूध" और "स्तनपान" जैसे शब्द सुनते ही मैं अपने आपको रोक नहीं पायी और ज़ोर-ज़ोर से सुबकने लगती थी।

जब मेरी मॉम को मेरे इन मुश्किल हालात का पता चला, तो वे मेरी देखभाल के लिए अमेरिका चली आयीं। मुझे दुखी देखकर उन्होंने कहा, "कभी तुमने सोचा है कि तुम्हारी ज़िंदगी में अंधेरे ही अंधेरे क्यों है, उसमें दुख ही दुख क्यों भरे पड़े हैं? क्योंकि तुम परमेश्वर में आस्था तो रखती हो लेकिन सत्य की खोज नहीं करती। प्रभु लौट आया है, फिर भी तुम खोज या जाँच-पड़ताल नहीं करती। बल्कि, आँख मूँदकर अपनी धारणाओं और कल्पनाओं से चिपकी हुई हो, दूसरे लोग जो बातें कह रहे हैं उसी पर चल रही हो और मनमाने ढंग से परमेश्वर के नए कार्य का आकलन कर रही हो। यह परमेश्वर का विरोध करना है! तुम परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं कर रही, यही वजह है कि तुमने परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा गँवा दी। तुम शैतान के कब्ज़े में हो, इसके कारण तुम परेशान रहोगी, उसके हाथों का खिलौना बनी रहोगी, और जीवन में और अधिक दुख उठाती रहोगी।" मॉम की ये बातें सुनकर मैं सोच-विचार में डूब गयी। उसके बाद, मॉम जब भी बच्चे को सुलाती, तो वे मेरे लिए परमेश्वर के वचनों के भजन लगा देतीं। एक कमाल की बात हुई—भजनों के संगीत ने धीरे-धीरे मेरे मन को शांत करना शुरू कर दिया। एक बार मैंने यह भजन सुना: "... कि मनुष्य का हृदय और आत्मा परमेश्वर से बहुत दूर हैं, इस हद तक कि मनुष्य जिस समय परमेश्वर का अनुसरण कर रहा होता है उसी समय शैतान की सेवा में भी बना रहता है—और उसे इसके बारे में पता भी नहीं चलता है। कोई भी सक्रिय रूप से परमेश्वर के पदचिह्नों को या उस प्रकटन को नहीं खोजता है जिसे परमेश्वर अभिव्यक्त करता है, और कोई भी परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा में रहने के लिए तैयार नहीं है। इसके बजाय, वे इस दुनिया के और अस्तित्व के उन नियमों के प्रति अनुकूल होने के लिए जिनका दुष्ट मनुष्यजाति अनुसरण करती है, उस दुष्ट, शैतान के क्षय पर भरोसा करने के लिए तैयार हैं। इस बिंदु पर, मनुष्य के हृदय और आत्मा को शैतान को श्रद्धांजलि के रूप में अर्पित किया जाता है और वे शैतान का जीवनाधार बन जाते हैं। इससे भी अधिक, मानव हृदय और आत्मा एक ऐसा स्थान बन गये हैं जिसमें शैतान निवास कर सकता है और शैतान का खेल का अनुकूल मैदान बन गया है। इस तरह, मनुष्य अनजाने में मानव होने के सिद्धांतों और मानव अस्तित्व के मूल्य और अर्थ के बारे में अपनी समझ को खो देता है। परमेश्वर के नियम और परमेश्वर और मनुष्य के बीच की वाचा धीरे-धीरे मनुष्य के हृदय में धुँधली होती जाती है, और वह परमेश्वर की तलाश करना या उस पर ध्यान देना बंद कर देता है। समय बीतने के साथ, मनुष्य की समझ चली जाती है कि परमेश्वर ने उसे क्यों बनाया है, न ही वह उन वचनों को जो परमेश्वर के मुख से आते हैं और वह सब जो परमेश्वर से आता है, उसे समझता है। मनुष्य फिर परमेश्वर के नियमों और आदेशों का विरोध करने लगता है, और उसका हृदय और आत्मा शिथिल हो जाते हैं...। परमेश्वर उस मनुष्य को खो देता है जिसे उसने मूल रूप से बनाया था, और मनुष्य अपनी शुरुआत का मूल खो देता है: यही इस मानव जाति का दुःख है" ("मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना" में "भ्रष्ट मानवता की त्रासदी")। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों की हर आखिरी पँक्ति ने मेरे दिल को छू लिया। मैंने महसूस किया कि मैं ठीक उसी स्थिति में हूँ जिसका ज़िक्र परमेश्वर के वचनों में किया गया है, मैंने अपने शब्दों से तो परमेश्वर को जान लिया था, लेकिन हकीकत में मेरा दिल पूरी तरह से शैतान के कब्ज़े में था। मेरे सारे विचार और भावनाएँ देह-सुख से जुड़ी हुई थीं, मैं देह-सुख के पीछे ही भाग रही थी, मैं पंथ-निरपेक्ष मार्ग पर चल रही थी। पवित्र बाइबल में कहा गया है: "शरीर पर मन लगाना तो मृत्यु है, परन्तु आत्मा पर मन लगाना जीवन और शान्ति है" (रोमियों 8:6)। "क्या तुम नहीं जानतीं कि संसार से मित्रता करनी परमेश्‍वर से बैर करना है? अत: जो कोई संसार का मित्र होना चाहता है, वह अपने आप को परमेश्‍वर का बैरी बनाता है" (याकूब 4:4)। मैंने विचार किया तो देखा कि मेरा कोई भी काम परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप नहीं है, बल्कि पूरी तरह परमेश्वर के खिलाफ है। मैंने परमेश्वर के सामने आ कर कहा: "हे परमेश्वर, आज मैं इस स्थिति में हूँ क्योंकि मुझे अपनी डिग्री, अपनी पहचान, अपनी शादी और दुनिया की तमाम चीज़ें प्यारी हैं। मुझे लगता है कि इन चीज़ों का होना ही काफी है। मैंने सत्य की कभी खोज ही नहीं की, न ही कभी परमेश्वर को जानने की कोशिश की, इस हद तक कि हर बार तूने मेरे दिल के दरवाज़े पर दस्तक दी, मेरे सामने परमेश्वर के वचनों को रखा और सत्य को ठीक मेरी आँखों के सामने प्रस्तुत कर दिया, लेकिन मैं उसे संजोने में नाकाम रही। जब मैंने सुना कि तू नया कार्य करने के लिए आया है, तो मैं ज़िद्दी बनकर अपनी ही राय पर अड़ी रही और आधारहीन आकलन करती रही। मैं अच्छी तरह जानती थी कि मेरी मॉम की सहभागिता तर्कपूर्ण है, फिर भी मैं सत्य मार्ग की जाँच-पड़ताल किए बगैर ज़िद करके अपनी धारणाओं पर कायम रही। हे परमेश्वर, मैं तेरा अनुग्रह तो चाहती थी लेकिन सत्य को नकारती रही—मैं वाकई बेहद ज़िद्दी और विरोधी थी! अगर तू अब भी मुझे अवसर दे, तो मैं अपनी पूरी योग्यता से तेरे कार्य की जाँच-पड़ताल करूँगी।" उस समय मैं नहीं जानती थी कि परमेश्वर इस तरह की प्रार्थना सुनता है या नहीं, मगर मैं फिर भी परमेश्वर को इसी तरह से पुकारती रही।

अप्रैल 2015 में, स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के कारण मैं अपनी मॉम के साथ फिर से चीन गयी। इससे मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया से संपर्क करने का अवसर मिला। मैंने विचार किया कि मैं बिना कोई खुशी हासिल किए इस दुनिया में किस तरह संघर्ष और मेहनत करती रही, किस तरह मैं धर्म में भी सत्य को पाने में नाकाम रही जो मेरे दिल के अंधेरे और खालीपन को दूर कर पाता। मेरे दिल में प्रबल भाव था कि जिस सर्वशक्तिमान परमेश्वर को मैं लगातार नकारती रही हूँ, वही वह उद्धारक यीशु है जिसने कॉलेज में दाखिला दिलवाने में मेरी मदद की और जो मुझे अमेरिका लेकर आया। जब यह बात मेरे दिमाग में आयी, तो मैंने मॉम से कहा कि मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की गतिविधियों में भाग लेना चाहती हूँ। तुरंत ही सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के भाई-बहन मुझसे मिलने आए, मैंने देखा कि जब वे लोग इकट्ठे हुए, तो वे जो कुछ पढ़ रहे थे, वे परमेश्वर के ही वचन थे, वे लोग सत्य पर ही सहभागिता कर रहे थे और सत्य का ही अभ्यास कर रहे थे। वे लोग जो कुछ भी कर रहे थे, उसमें परमेश्वर के वचन उनका मानक थे और सत्य उनका सिद्धांत था। वे लोग देह के अनुसार व्यवहार नहीं कर रहे थे, न ही उनके बीच किसी तरह की कोई पंथ-निरपेक्ष सौदे-बाज़ी हो रही थी। मैंने देखा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया कनान की नेक धरती है जहाँ सत्य की ही सत्ता है। उस स्थान पर मेरी आत्मा प्रसन्न हो गयी, मुझे पोषण प्राप्त हुआ, अब मेरे हृदय में खालीपन नहीं था—मेरे अंदर पूर्ण संतुष्टि का भाव था।

एक दिन भाई-बहनों के साथ किसी अन्य सभा में, बहन वांग ने परमेश्वर के वचनों से एक अंश पढ़ा: "वे जो बुरी तरह से दुख में हैं सर्वशक्तिमान उन पर करुणा दिखाता है। साथ ही, वह उन लोगों से ऊब चुका है जो होश में नहीं है, क्योंकि उसे उनसे प्रत्युत्तर पाने में लंबा इंतजार करना पड़ा है। वह खोजने की इच्छा करता है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारी आत्मा को खोजना चाहता है। वह तुम्हें भोजन-पानी देना चाहता है, जगाना चाहता है, ताकि तुम फिर और भूखे और प्यासे न रहो। जब तुम थके हो और इस संसार में खुद को तन्हा महसूस करने लगो तो, व्याकुल मत होना, रोना मत। सर्वशक्तिमान परमेश्वर, रखवाला, किसी भी समय तुम्हारे आगमन को गले लगा लेगा। वह तुम्हारे ऊपर नज़र रखे हुए है, वह तुम्हारे लौटने की प्रतीक्षा में बैठा है। वह उस दिन की प्रतीक्षा में है जब तुम्हारी याददाश्त एकाएक लौट आयेगी: और इस सत्य को पहचान लेगी कि तुम परमेश्वर से ही आए हो, किसको पता किस तरह और किस जगह बिछड़ गए थे, किसको पता किस मोड़ पर सड़क के किनारे बेहोश पड़े थे, और फिर अनजाने में किस मोड़ पर 'पिता' मिल जाए। और फिर तुम्हें यह भी एहसास है कि सर्वशक्तिमान निरंतर साथ रहा है, लगातार नज़र रखता रहा है, तुम्हारे लौटकर आने की प्रतीक्षा करता रहा है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "सर्वशक्तिमान का आह भरना")। परमेश्वर के वचनों के उस अंश ने मुझे अंदर तक द्रवित कर दिया। मुझे महसूस हुआ कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ऐसी ममतामयी माँ की तरह है जो अपने गुम हुए बच्चे को पुकारती है और उम्मीद लगाए रहती है कि जल्दी ही किसी दिन उसका बच्चा उसके पास वापस आ जाएगा। मैं सुन सकती थी कि यही प्रभु की वाणी है। मुझे एहसास हुआ कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही वह प्रभु यीशु है जिसने एक के बाद एक परेशानियों में बार-बार मेरी मदद की है, और उसने कभी भी मेरा साथ नहीं छोड़ा, बल्कि लगातार मेरे वापस आने का इंतज़ार किया है। मैंने विचार किया कि किस तरह मैं परमेश्वर में आस्था तो रखती थी लेकिन फिर भी न तो मैंने सत्य की खोज की न ही परमेश्वर के वचनों में विश्वास रखा, बल्कि ऑनलाइन अफवाहों और पादरियों की बातों पर भरोसा किया। जो परमेश्वर दिन-रात मेरी देखभाल कर रहा था, उसे अपमानित करने और उस पर हमला करने के लिए, मैंने अपनी सारी निष्ठा शत्रुओं को समर्पित कर दी, और सीसीपी सरकार, पादरियों और धार्मिक समुदायों के साथ मिल गयी। मैंने परमेश्वर के उद्धार को नकार दिया। मैं सचमुच बहुत अंधी और अज्ञानी थी। मेरी आस्था तब भी अपनी धारणाओं और कल्पनाओं पर आधारित थी; मैं मानती थी कि प्रभु यीशु ने ही मुझे कॉलेज में प्रवेश दिलाया था और अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए बिना झिझक विदेश जाने में मेरा मार्गदर्शन किया था, इसलिए मुझे हमेशा प्रभु यीशु के नाम के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, और मात्र इतना ही प्रभु के प्रति समर्पण है। किसी भी चीज़ के प्रति नज़रिया बनाने में मैंने अपनी धारणाओं और कल्पनाओं पर भरोसा किया। परमेश्वर ने जब नए युग का कार्य शुरू किया और नया नाम धारण किया, तो मैंने परमेश्वर के कार्य को पहचाना नहीं और बार-बार अपने लिए परमेश्वर के उद्धार को नकारा। उसे परमेश्वर में आस्था का होना कैसे कहा जा सकता है? परमेश्वर ने मुझे प्रेम दिया, फिर भी मैंने बार-बार परमेश्वर को आहत किया। मैं जानती थी कि मैं परमेश्वर की बहुत ऋणी हूँ ...

मैंने पूरी तरह से घुटने टेक कर और रोते हुए परमेश्वर को पुकारा: "हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर! मैं अंधी और अज्ञानी बनी रही। मैंने सीसीपी सरकार और धार्मिक जगत की अफवाओं पर भरोसा किया; मैंने तुझे त्याग दिया और तेरी निंदा की, तुझे परिसीमित करने के लिए अपनी धारणाओं और कल्पनाओं पर भरोसा किया। मैंने तेरे अंत के दिनों के सुसमाचार को नकारा—मैं आज की फ़रीसी हूँ। अपने बर्ताव और कर्मों के मुताबिक मुझे भी शैतान के साथ नष्ट कर दिया जाना चाहिए, लेकिन तूने मेरे लिए अपने प्यार के कारण, मुझे बार-बार प्रायश्चित करने का अवसर दिया है। हे परमेश्वर, मैं नीनवे के लोगों की तरह, सचमुच प्रायश्चित करने के लिए अपने पापों को स्वीकार करने, और तेरी करुणा की भीख माँगने की खातिर, पूरी 'विनम्रता और समर्पण' के साथ तेरे सामने आने को तैयार हूँ। मैं तेरे साथ सहयोग करने, तेरे हाथों शुद्धिकरण पाने और बचाए जाने के लिए तैयार हूँ।"

उसके बाद, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के भाई-बहन हफ्ते में तीन बार आकर मुझसे मिलने लगे; यह सिलसिला बेरोक-टोक चार महीने से ऊपर चला। इस दौरान, मैंने लगभग हर दिन परमेश्वर के वचनों के बहुत से अंश पढ़े, जैसे-जैसे मुझे अधिकाधिक सत्य समझ में आता गया, परमेश्वर के साथ मेरे संबंध बेहतर होते गए और मेरी मूल आस्था बहाल हो गयी। मैंने अपने दिल में सुकून का एहसास किया, अब न मैं बेचैन थी और न ही एकाकीपन महसूस करती थी। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़ने और सत्य पर सभाओं में सहभागिता करने से मुझे परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य पर और इस बात पर पूरा यकीन हो गया कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर प्रभु यीशु ही है जिसकी वापसी के लिए मैं तरस रही थी। मैंने संकल्प किया कि मैं आखिरी साँस तक सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करूँगी और सत्य की राह पर चलकर परमेश्वर के प्रेम का प्रतिदान दूँगी।

मैं 2016 में वापस अमेरिका चली गयी। वहाँ मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की वेबसाइट के ज़रिए उनके भाई-बहनों के संपर्क में आयी और उनकी कलीसिया की गतिविधियों में भाग लेने लगी। परमेश्वर का धन्यवाद! आज मैं जहाँ हूँ, वहाँ तक पहुँचने के रास्ते में हर कदम पर परमेश्वर ने मेरा मार्गदर्शन किया है। परमेश्वर के प्रेम का प्रतिदान देने के लिए, मैं अपनी सारी शक्ति परमेश्वर के सुसमाचार प्रचार-प्रसार के कार्य में लगा देना चाहती हूँ, ताकि जो लोग सत्य के लिए और उसकी खोज की खातिर प्यासे हैं, वे जान सकें कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही लौटकर आया प्रभु यीशु है। मैं उन्हें यह भी बताऊँगी कि अगर वे लोग मेरे पदचिह्नों पर चलेंगे—शैतान की अफवाहों पर भरोसा करके शैतान के साथ परमेश्वर का विरोध करेंगे, तो अंत में उन्हीं का नुक्सान होगा।

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