80. मैं क्यों अपनी राय व्यक्त करने से हमेशा डरती थी

शिन छुन, चीन

मार्च 2024 में, पर्यवेक्षक हमारे साथ समस्याओं का सारांश निकालने और कार्य के बारे में बात करने आई। जब हमने साथ मिलकर एक धर्मोपदेश पर चर्चा की तो अपनी राय व्यक्त करने वाली मैं पहली व्यक्ति थी, लेकिन मैंने जो राय व्यक्त की वह गलत थी और फिर मैंने लगातार दो और राय दीं और ये भी गलत थीं। इससे मुझे बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई। “पर्यवेक्षक के साथ पहले ही मेल-जोल में मैंने इतनी सारी गलतियाँ कर दी हैं। यह कितनी शर्म की बात है! मैं जिस बहन के साथ कार्य कर रही थी उसने अभी-अभी यह कर्तव्य निभाना शुरू किया था, फिर भी वह कुछ समस्याएँ खोजने में सक्षम रही, लेकिन मैं लंबे समय से प्रशिक्षण ले रही थी और फिर भी चीजों को गलत ढंग से देखती थी। क्या पर्यवेक्षक यह सोचेगी कि मैं नई आई बहन जितनी अच्छी नहीं हूँ? अगली बार मैं अपनी राय जाहिर करने में इतनी जल्दबाजी नहीं करूँगी। मैं सबके बोल चुकने तक इंतजार करूँगी और फिर बताऊँगी, यह ज्यादा सुरक्षित रहेगा।” अगले दिन, जब हम साथ मिलकर एक धर्मोपदेश पढ़ रहे थे, तो मैंने उस पर ध्यान से विचार किया और कुछ समस्याएँ देख लीं। लेकिन, मुझे यकीन नहीं था कि मैं उन्हें सटीक रूप से देख रही हूँ कि नहीं और मैंने मन में सोचा, “इस बार मुझे होशियार होने की जरूरत है। पहले मैं यह सुनूँगी कि दूसरे इसका आकलन कैसे करते हैं। फिर, जब मैं बताऊँगी तो सबके नजरियों को मिला दूँगी। ऐसा करना ज्यादा भरोसेमंद है, और इससे सब यह भी सोचेंगे कि मैं समस्याएँ पहचान सकती हूँ और मेरी काबिलियत उतनी खराब नहीं है।” लेकिन समय खिंचता गया और किसी ने कुछ भी नहीं कहा। मैंने कनखियों से देखा कि वे अभी भी गहरी सोच में डूबे हुए थे, और मैं सोचने लगी, “यूँ तो अब काफी समय हो चुका है, लेकिन मैं सबसे पहले बोलने वाली नहीं हो सकती हूँ। अगर मैंने फिर से कुछ गलत कह दिया तो बहुत शर्मिंदगी होगी।” इसलिए, मैंने समस्या के बारे में गंभीरता से सोचने का नाटक किया। काफी देर बाद ही कुछ बहनों ने बात करना शुरू किया। जब बाकी सबने अपनी राय बता दी, तो मैंने उनकी राय को अपनी राय के साथ मिलाया और उन पर एक साथ चर्चा की। बोलते समय मैं बहुत घबराई हुई थी, डर था कि कहीं मेरी राय गलत न हो और मुझे फिर से शर्मिंदा न होना पड़े। बाद में, पर्यवेक्षक का विश्लेषण मूल रूप से मेरी राय से मेल खाता था। मैं मन ही मन खुश थी और मुझे लगा कि मैंने अपना कुछ आत्मसम्मान बचा लिया है। लेकिन दो दिनों के बाद, पर्यवेक्षक ने देखा कि धर्मोपदेशों पर चर्चा करते समय हम अपनी राय जाहिर करने में सक्रिय नहीं थे; हम टालमटोल करते थे और समय बर्बाद करते थे। उसने हमारी समस्याएँ उजागर कर दीं। मैंने इस बारे में सोचा कि कैसे मैं यह कर्तव्य एक लंबे समय से निभाती आ रही थी और टीम की अगुआ थी। मुझे सक्रिय रूप से संगति करनी चाहिए थी और चर्चा में सबकी अगुआई करनी चाहिए थी, लेकिन मैं तब भी संगति नहीं करती थी जब मेरे पास राय होती थी। क्या मैं बस समय बर्बाद नहीं कर रही थी? बाद में, जब हमने फिर से धर्मोपदेशों पर चर्चा की, तो मैंने अपनी राय जाहिर करने की पहल की, मैंने जितनी भी समस्याएँ देखीं, उन सब पर चर्चा की। लेकिन, जब मैं कुछ समस्याओं को समझ नहीं पाई और मेरी टिप्पणियाँ एकतरफा और गलत थीं, तो मुझे सच में बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई। कुछ बार अपनी राय जाहिर करने के बाद, मैं फिर से निष्क्रिय हो गई, हमेशा सबसे आखिर में बोलने का इंतजार करती थी। मुझे धर्मोपदेशों पर चर्चा करने से भी अधिकाधिक डर लगने लगा, हमेशा यह डर रहता था कि मेरी कमियाँ उजागर हो जाएंगी। हर बार जब मैं अपनी राय व्यक्त करती थी तो मैं खुद को बड़े दबाव में महसूस करती थी और मेरे मन में यह कर्तव्य न निभाना चाहने के विचार भी आते थे।

एक दिन, जब हम धर्मोपदेशों में मौजूद समस्याओं पर चर्चा कर रहे थे, तो पर्यवेक्षक ने मेरा नाम लेकर मुझे पहले बोलने के लिए कहा। मैंने कुछ नहीं कहा। पर्यवेक्षक ने कहा, “तुम टीम की अगुआ हो। तुम क्यों संगति करने की पहल कभी नहीं करती हो? क्या तुम्हारी कोई राय नहीं है या तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव से बाधित हो रही हो?” इसके बाद पर्यवेक्षक ने परमेश्वर के वचनों का एक अंश ढूँढ़ा : “सौहार्दपूर्ण सहयोग, कर्तव्य के निर्वहन के अभ्यास का एक सिद्धांत है। जब तक तुम इसमें अपना पूरा दिल, अपनी पूरी ऊर्जा और अपनी पूरी भक्ति लगाते हो, और जो हो सके, वह अर्पित करते हो, तो तुम अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभा रहे हो। यदि तुम्हारे पास कोई खयाल या विचार है, तो उसे दूसरों को बताओ; इसे स्वयं तक न रखो या रोके मत रहो—यदि तुम्हारे पास सुझाव हैं, तो उन्हें पेश करो; जिसका भी विचार सत्य के अनुरूप हो, उसे स्वीकार किया जाना और उसका पालन किया जाना चाहिए। ऐसा करोगे तो तुम सद्भाव में सहयोग प्राप्त कर लोगे। अपने कर्तव्य का लगन से निर्वहन करने का यही अर्थ है। अपने कर्तव्य निभाने में, तुम लोगों को सब कुछ अपने ऊपर लेने की जरूरत नहीं है, न ही खुद को अत्यधिक थका देने की जरूरत है या ‘खिलने वाला एकमात्र फूल’ या ‘सबसे अलग सोचने वाला’ बनने की जरूरत नहीं है; इसके बजाय तुम्हें सीखना है कि दूसरों के साथ मिल-जुलकर कैसे सहयोग करना है, जो बन पड़े वो कैसे करना है, अपनी जिम्मेदारियाँ कैसे पूरी करनी हैं और अपनी सारी ऊर्जा कैसे लगानी है। अपने कर्तव्य के निर्वहन का यही अर्थ है। ... तुम कम सामर्थ्यवान हो सकते हो, लेकिन अगर तुम दूसरों के साथ सहयोग करने में सक्षम हो, और उपयुक्त सुझाव स्वीकार सकते हो, और अगर तुम्हारे पास सही प्रेरणाएँ हैं, और तुम परमेश्वर के घर के कार्य की रक्षा कर सकते हो, तो तुम एक सही व्यक्ति हो। कभी-कभी तुम एक ही वाक्य से किसी समस्या का समाधान कर सकते हो और सभी को लाभान्वित कर सकते हो; कभी-कभी सत्य के एक ही कथन पर तुम्हारी संगति के बाद हर किसी के पास अभ्यास करने का एक मार्ग होता है, वह मिलजुलकर सहयोग करने में सक्षम होता है, सभी एक समान लक्ष्य के लिए प्रयास करते हैं, समान विचार और राय रखते हैं और इसलिए काम विशेष रूप से प्रभावी होता है। हालाँकि यह भी हो सकता है कि किसी को याद ही न रहे कि यह भूमिका तुमने निभाई है, और शायद तुम्हें भी ऐसा महसूस न हो मानो तुमने कोई बहुत अधिक प्रयास किए हों, लेकिन परमेश्वर देखेगा कि तुम वह इंसान हो जो सत्य का अभ्यास करता है, जो सिद्धांतों के अनुसार कार्य करता है। तुम्हारे ऐसा करने पर परमेश्वर तुम्हें याद रखेगा। इसे समर्पित होकर अपना कर्तव्य करना कहते हैं(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, कर्तव्य के उचित निर्वहन के लिए सामंजस्यपूर्ण सहयोग आवश्यक है)। पर्यवेक्षक ने संगति करते हुए कहा, “परमेश्वर हमसे यह माँग करता है कि जब हम अपने कर्तव्य निभाएँ तो सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग करें, सही इरादे रखें और कलीसिया के कार्य की रक्षा करें। उदाहरण के लिए, जब हम साथ मिलकर धर्मोपदेशों पर चर्चा करते हैं, तो हमें जितनी भी समस्याएँ दिखें, उनके बारे में बोलने की पहल करनी चाहिए, साफ दिल से खुलकर बोलना चाहिए और अपनी कमजोरियों की भरपाई करने के लिए एक-दूसरे की खूबियों से सीखना चाहिए। भले ही हम उन पर उतने समग्र रूप से संगति न करें जितना दूसरे करते हैं लेकिन कम-से-कम हमारे इरादे तो सही हैं और इस प्रक्रिया में हम सत्य का अभ्यास कर रहे हैं। अगर हम अपने व्यक्तिगत हितों की रक्षा करते हुए, खुद पर लगातार पर्दा डालते हैं और छद्मवेश धारण करते हैं तो परमेश्वर ऐसा करने वाले लोगों को पसंद नहीं करता है। यही नहीं, अब सब काफी समय से एक साथ कार्य करते आ रहे हैं और हम सब एक-दूसरे को समझते हैं। अगर हम खुद पर बस पर्दा डालते रहे और छद्मवेश धारण करते रहे, यह सोचते रहे कि अगर हम चुप रहे तो दूसरों को हमारी कमियाँ पता नहीं चलेंगी तो यह बहुत मूर्खता है। न केवल हम सत्य सिद्धांतों पर कोई प्रगति नहीं कर पाएंगे, बल्कि हम अपने कर्तव्य निर्वहन में भी बाधा डालेंगे। अगर यह लंबे समय तक चलता रहा, तो हम पवित्र आत्मा का कार्य खो देंगे।” जब मैंने पर्यवेक्षक की संगति सुनी, तो मेरा चेहरा शर्म से जलने लगा, और मुझे लगा कि मेरा दिल बिंध गया है। मैं एक लंबे समय से इस टीम में अपना कर्तव्य निभाती आ रही थी और मैं चाहे कितनी भी समस्याएँ देख सकूँ, मुझे सरल-हृदय से उनके बारे में खुलना बताना चाहिए और बात करनी चाहिए, सबको एक सक्रिय चर्चा में शामिल करना चाहिए। यह कार्य के प्रति विचारशील होना है और सत्य का अभ्यास करने की एक अभिव्यक्ति है। लेकिन, मैं सिर्फ अपने आत्मसम्मान के बारे में सोचती थी और अपनी कमियों के साथ सही ढंग से पेश नहीं आ पाती थी। मुझे लगता था कि अपनी राय और विचार पहले व्यक्त करने से मेरी कमियाँ उजागर हो जाएंगी, जिससे ऐसा लगेगा कि मेरी काबिलियत खराब है। इसलिए, मैं तब तक इंतजार करती रही जब तक कि बाकी सब अपनी राय जाहिर न कर दें, ताकि मैं उसे अपनी समझ के साथ मिला सकूँ। इस तरह, मैं और अधिक समग्र और विशिष्ट हो सकती थी, ताकि लोग मेरी प्रशंसा करें और मैं अच्छी दिखूँ। टीम की अगुआ के रूप में मैं कार्य का ध्यान नहीं रखती थी और गलतियाँ करने पर शर्मिंदा महसूस करती थी, इसलिए मैंने उन पर पर्दा डालने और खुद छद्मवेश धारण करने का हर संभव तरीका आजमाया ताकि कोई भी मेरी असलियत न देखे। नतीजतन, समस्याओं पर चर्चा होने के दौरान मैं वहाँ बस निष्क्रिय होकर इंतजार करती थी, कार्य की प्रगति को धीमी कर रही थी। मैं अपना कर्तव्य बिल्कुल भी नहीं निभा रही थी। इसके बजाय, मैं धर्मोपदेशों पर चर्चा करने के मौके का इस्तेमाल खुद को दिखाने और दूसरों से अपनी प्रशंसा करवाने के लिए कर रही थी। मैं हमेशा अपनी राय जाहिर करने वाली आखिरी व्यक्ति होती थी। यूँ तो मैं जो राय व्यक्त करती थी वह ज्यादा समग्र होती थी और मैं अपनी इज्जत बचा लेती थी, लेकिन मैं अपनी ही कमियों को नहीं खोज पाती थी और मुझे यहाँ तक लगता था कि मैं समस्याएँ आँकने में अच्छी हूँ। असल में, सब जानते थे कि मेरी काबिलियत कैसी है, लेकिन मैं फिर भी एक मसखरे की तरह दिखावा कर रही थी और अपनी ही प्रस्तुति की सराहना कर रही थी। मैं सच में बहुत मूर्ख थी!

रात में, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “प्रिय परमेश्वर, इस दौरान मैं लगातार आत्मसम्मान और रुतबे के लिए जीती आ रही हूँ और अपनी राय व्यक्त करने से हमेशा डरती रही हूँ। लेकिन, मुझे अभी भी अपनी भ्रष्टता की कोई समझ नहीं है। मैं विनती करती हूँ कि तुम मेरी अगुआई करो ताकि मैं अपनी समस्याएँ जान लूँ।” प्रार्थना करने के बाद, मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया जो मैंने पहले पढ़ा था, और मैंने उस पर विचार करने के लिए उसे ढूँढ़ निकाला। परमेश्वर कहता है : “कुछ लोग खराब काबिलियत या साधारण-दिमागीपन, जटिल विचारों की कमी के कारण कम बोलते हैं, लेकिन जब मसीह-विरोधी कभी-कभार बोलते हैं तो ऐसा ठीक इस कारण से नहीं होता है; यह स्वभाव की समस्या होती है। वे दूसरों से मिलते समय शायद ही कभी बोलते हैं और वे उन चीजों के बारे में आसानी से अपने दृष्टिकोण व्यक्त नहीं करते हैं जिनके बारे में दूसरे बात कर रहे होते हैं। वे अपने दृष्टिकोण क्यों व्यक्त नहीं करते? पहली बात, उनमें निश्चित रूप से सत्य की कमी होती है और वे चीजों की असलियत देख नहीं पाते हैं। यदि वे बोलते हैं, तो वे गलतियाँ कर सकते हैं और उनकी असलियत सामने आ सकती है; उन्हें नीचा दिखाए जाने का डर होता है, इसलिए वे चुप रहने का दिखावा करते हैं और गहनता का ढोंग करते हैं, अपनी थाह पाना दूसरों के लिए मुश्किल बना देते हैं, और यहाँ तक ऐसा इसलिए करते हैं ताकि दूसरों को लगे कि वे बुद्धिमान और प्रतिष्ठित हैं। इस तरीके से, लोग मसीह-विरोधियों को कम आँकने की हिम्मत नहीं करते, और उनके दिखने में शांत और संयमित रूप को देखकर वे उन्हें उच्च सम्मान तक देते हैं और उन्हें तुच्छ समझने की कतई हिम्मत नहीं करते हैं। यह मसीह-विरोधियों का कुटिल और दुष्ट पहलू होता है। वे आसानी से अपने दृष्टिकोण व्यक्त नहीं करते क्योंकि उनके अधिकांश दृष्टिकोण सत्य के अनुरूप नहीं होते हैं, बल्कि मानवीय धारणाएँ और कल्पनाएँ होती हैं, सबके सामने लाने के लिए पूर्ण रूप से अनुपयुक्त। इसलिए, वे चुप रहते हैं। अंदर से वे कुछ रोशनी प्राप्त करने की आशा भी करते हैं जिसे वे खुद को दूसरों से उच्च सम्मान दिलाने के लिए फैला सकें, लेकिन चूँकि उनके पास इसका अभाव होता है, वे सत्य की संगति के दौरान चुप और छिपे हुए रहते हैं, मौका तलाश रहे भूतों की तरह अंधेरे में दुबके रहते हैं। जब वे दूसरों को रोशनी व्यक्त करते पाते हैं, तो वे इसे अपना बनाने के तरीके खोज लेते हैं, इसे दूसरे तरीके से व्यक्त करके दिखावा करते हैं। मसीह-विरोधी इतने ही चालाक होते हैं। वे चाहे जो भी करें, वे दूसरों से अलग दिखने और श्रेष्ठ बनने का प्रयास करते हैं, क्योंकि तभी वे प्रसन्न महसूस करते हैं। यदि उन्हें अवसर नहीं मिलता, तो वे पहले छिपे रहते हैं, और अपने दृष्टिकोण अपने तक सीमित रखते हैं। यह मसीह-विरोधी लोगों की चालाकी होती है। उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर के घर से कोई धर्मोपदेश जारी किया जाता है, तो कुछ लोग कहते हैं कि यह परमेश्वर के वचनों जैसा लगता है, और अन्य लोग सोचते हैं कि यह ऊपरवाले की ओर से संगति जैसा लगता है। अपेक्षाकृत सरल हृदय वाले लोग वही बोलते हैं जो उनके मन में होता है, लेकिन मसीह-विरोधियों के पास भले ही इस बारे में कोई राय हो, वे इसे छिपाए रखते हैं। वे ध्यान से देखते रहते हैं और बहुमत के दृष्टिकोण का पालन करने को तैयार रहते हैं, लेकिन वास्तव में वे स्वयं इसे पूरी तरह से नहीं समझ पाते। क्या ऐसे चालाक और धूर्त लोग सत्य समझ सकते हैं या उनमें वास्तविक विवेकशीलता हो सकती है? जो सत्य नहीं समझता, वह किस चीज की असलियत देख सकता है? वह किसी भी चीज की असलियत नहीं देख सकता है। कुछ लोग चीजों की असलियत देख नहीं पाते हैं, फिर भी वे गंभीर होने का दिखावा करते हैं; वास्तव में, उनमें विवेकशीलता की कमी होती है और उन्हें डर बना रहता है कि दूसरे लोग उन्हें पहचान जाएँगे। ऐसी परिस्थितियों में सही रवैया यह होता है : ‘हम इस मामले की असलियत नहीं जान पा रहे हैं। चूँकि हम नहीं जानते, इसलिए हमें लापरवाही से नहीं बोलना चाहिए। गलत तरीके से बोलने से नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। मैं इंतजार करूँगा और देखूँगा कि ऊपरवाला क्या कहता है।’ क्या यह ईमानदारी से बोलना नहीं है? यह बहुत सरल भाषा है, और फिर भी मसीह-विरोधी ऐसे क्यों नहीं कहते? वे नहीं चाहते कि उनकी असलियत दिखाई दे; वे अपनी सीमा को जानते हैं लेकिन वे फिर भी गुपचुप रूप से एक घृणित इरादा रखते हैं—दूसरों से खुद को उच्च सम्मान दिलाना। क्या यह सबसे घिनौनी बात नहीं है?(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद छह)। परमेश्वर ने उजागर किया है कि मसीह-विरोधी चालाक और कुटिल होते हैं। जब वे आदतन ज्यादा नहीं बोलते, तो इसका कारण यह नहीं है कि वे सरल-दिमाग के हैं और उनके पास विचार नहीं हैं। बल्कि, इसका कारण यह है कि उनके पास सत्य नहीं होता है और वे चीजों की असलियत नहीं देख सकते हैं। लेकिन, वे गहराई वाले होने का नाटक करते हैं ताकि वे अपनी कमियाँ प्रकट न करें। वे खुद को प्रदर्शित करने और दिखावा करने के लिए दूसरे लोगों के विचारों और अंतर्दृष्टि को चुराने के मौके का इंतजार करते हैं। उनकी प्रकृति बहुत दुष्ट है! मेरी दशा ठीक वैसी ही थी जो परमेश्वर ने उजागर किया था। जब मैंने देखा कि लंबे समय तक पाठ-आधारित कर्तव्य निभाने के बावजूद मैं इतनी सारी कमियाँ प्रकट कर रही हूँ, तो मुझे यह चिंता हुई कि मेरे भाई-बहन मुझे नीची नजर से देखेंगे और मुझे और अधिक गलतियाँ करने और खुद को फिर से शर्मिंदा करने का डर होता था। इसलिए, समस्याओं पर चर्चा करते समय मैं अपने पास कुछ स्पष्ट राय होने के बावजूद अपनी राय के बारे में संगति नहीं करती थी और यहाँ तक कि गंभीरता से विचार करने का दिखावा भी करती थी, जानबूझकर तब तक देरी करती थी जब तक कि मैं आखिरी न होऊँ और सबकी राय को मिला न सकूँ। इस तरह से, भले ही मेरे द्वारा प्रकट की गई राय चाहे गलत हो, तो बाकी सब भी गलत होंगे और मुझे शर्मिंदा नहीं होना पड़ेगा। अगर मैं सही होती, तो जो मैंने कहा वह मेरी बहनों की कही बातों से बेहतर और ज्यादा पूर्ण होता। इससे सबको पता चलता कि भले ही मैं छोटी हूँ, लेकिन मेरी काबिलियत अच्छी है और मैं समस्याओं का आकलन कर सकती हूँ, जो मुझे अच्छा दिखाता। वास्तव में, मैं समस्याओं को समग्र रूप से नहीं देखती हूँ और मेरी काबिलियत खराब है, लेकिन मैं इसका सही ढंग से सामना नहीं कर सकी। मैं लोगों को चकमा देने और गुमराह करने के लिए अच्छी काबिलियत वाले व्यक्ति के रूप में निरंतर छद्मवेश धारणा करना चाहती थी। मैं सच में बहुत दुष्ट और धोखेबाज थी। मैंने जो प्रकट किया था वह एक मसीह-विरोधी का स्वभाव था, जो परमेश्वर की घृणा और नफरत का कारण बनता है!

मैंने भक्ति के दौरान परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और अपनी दशा के पीछे की मूल वजह के बारे में कुछ समझ हासिल की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “जब परिवार के बुजुर्ग अक्सर तुमसे कहते हैं कि ‘जैसे पेड़ को उसकी छाल की जरूरत है वैसे ही लोगों को आत्मसम्मान की जरूरत है’ तो यह इसलिए होता है ताकि तुम अच्छे दिखने को अहमियत दो, एक सम्मानजनक जीवन जियो और ऐसी चीजें न करो जिनसे तुम्हारी बदनामी हो। तो यह कहावत लोगों को सकारात्मक दिशा की ओर लेकर जाती है या नकारात्मक? क्या यह तुम्हें सत्य की ओर ले जा सकती है? क्या यह तुम्हें सत्य समझने की ओर ले जा सकती है? (नहीं, बिल्कुल नहीं।) यकीनन यह ऐसा नहीं कर सकती है! परमेश्वर लोगों से यही अपेक्षा करता है कि वे ईमानदार हों। जब तुमने अपराध किया हो या कुछ गलत किया हो या कुछ ऐसा किया हो जो परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह हो या सत्य के विरुद्ध जाता हो तो तुम्हें आत्मचिंतन करने, अपनी गलती जानने और अपने भ्रष्ट स्वभावों का गहन-विश्लेषण करने की जरूरत है; सिर्फ इसी तरीके से तुम सच्चा पश्चात्ताप कर सकते हो और उसके बाद परमेश्वर के वचनों के अनुसार व्यवहार कर सकते हो। ईमानदार व्यक्ति होने का अभ्यास करने के लिए लोगों के पास किस तरह की मानसिकता होने की जरूरत है? क्या अपेक्षित मानसिकता और इस कहावत ‘जैसे पेड़ को उसकी छाल की जरूरत है वैसे ही लोगों को आत्मसम्मान की जरूरत है’ द्वारा पेश किए गए दृष्टिकोण के बीच कोई टकराव है? (हाँ।) क्या टकराव है? ‘जैसे पेड़ को उसकी छाल की जरूरत है वैसे ही लोगों को आत्मसम्मान की जरूरत है,’ इस कहावत का उद्देश्य यह है कि लोग अपने उज्ज्वल और आकर्षक पक्ष को जीने को महत्व दें और ऐसे काम अधिक करें जिनसे उनकी छवि निखरे—न कि वे बुरे या अपमानजनक काम करें या अपने स्वभाव के कुरूप पक्ष को उजागर करें—और इसका उद्देश्य उन्हें ऐसा जीवन जीने से रोकना है जो सम्मानजनक या गरिमापूर्ण नहीं है। अपने आत्मसम्मान की खातिर, अपनी छवि चमकाने की खातिर व्यक्ति अपने बारे में यह नहीं कह सकता है कि वह निपट बेकार है, दूसरों को अपने अंधेरे पक्ष और शर्मनाक पहलुओं के बारे में बताना तो दूर की बात है, क्योंकि व्यक्ति को सम्मानजनक और गरिमापूर्ण जीवन जीना है और गरिमावान होने के लिए व्यक्ति को आत्मसम्मान की जरूरत होती है और आत्मसम्मान होने के लिए व्यक्ति को दिखावा करने और अच्छा आवरण ओढ़ने की जरूरत होती है। क्या यह एक ईमानदार व्यक्ति होने के विरुद्ध नहीं है? (हाँ।) जब तुम एक ईमानदार व्यक्ति होते हो तो तुम इस कहावत को पहले ही त्याग चुके होते हो कि ‘जैसे पेड़ को उसकी छाल की जरूरत है वैसे ही लोगों को आत्मसम्मान की जरूरत है।’ अगर तुम ईमानदार व्यक्ति होना चाहते हो तो अपनी छवि को अहमियत मत दो; व्यक्ति की छवि दो कौड़ी की भी नहीं होती है। सत्य से सामना होने पर व्यक्ति को खुद को उजागर करना चाहिए, दिखावा नहीं करना चाहिए या मुखौटा नहीं ओढ़ना चाहिए। व्यक्ति को अपने सच्चे विचारों, अपनी गलतियों, सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन करने वाले पहलुओं वगैरह को परमेश्वर के सामने प्रकट कर देना चाहिए और अपनी इन चीजों को भाई-बहनों के सामने भी खोलकर रख देना चाहिए। यह अपने आत्मसम्मान की खातिर जीने का मामला नहीं है, बल्कि एक ईमानदार व्यक्ति होने की खातिर जीने, सत्य का अनुसरण करने की खातिर जीने, एक सच्चा सृजित प्राणी बनने की खातिर जीने और परमेश्वर को संतुष्ट करने और खुद को बचाए जाने की खातिर जीने का मामला है। लेकिन जब तुम इस सत्य को नहीं समझते हो और परमेश्वर के इरादों को नहीं समझते हो तब तुम्हारे परिवार के शिक्षा के प्रभावों से उपजी बातें तुम्हारे दिल में प्रमुखता पाने लगती हैं। इसलिए जब तुम कुछ गलत करते हो तो उस पर पर्दा डाल देते हो और दिखावा करते हो, यह सोचते हो, ‘मैं इस बारे में किसी को कुछ नहीं बता सकता और इस बारे में जो कोई जानता है मैं उसे भी लोगों को नहीं बताने दूँगा। अगर तुममें से किसी ने किसी को कुछ बताया तो मैं तुम्हें आसानी से नहीं छोडूँगा। मेरा आत्मसम्मान सबसे पहले है। अपने आत्मसम्मान के सिवाय किसी और चीज के लिए जीना व्यर्थ है, यह किसी भी चीज से ज्यादा जरूरी है। यदि किसी व्यक्ति के पास आत्मसम्मान नहीं होता है तो वह अपनी सारी गरिमा खो देता है। इसलिए तुम सत्यतापूर्वक नहीं बोल सकते हो, तुम्हें दिखावा करना होगा, चीजों पर पर्दा डालना होगा, वरना तुम्हारे पास कभी आत्मसम्मान नहीं होगा या गरिमा नहीं होगी और तुम्हारा जीवन निरर्थक हो जाएगा। अगर कोई भी तुम्हारा सम्मान नहीं करता है तो तुम एकदम बेकार हो, बस रास्ते का कचरा हो।’ क्या इस तरह से अभ्यास करके ईमानदार व्यक्ति होना मुमकिन है? क्या पूरी तरह खुलकर बोलना और अपना गहन-विश्लेषण करना मुमकिन है? (नहीं, मुमकिन नहीं है।) बेशक, ऐसा करके तुम इस कहावत का पालन कर रहे हो : ‘जैसे पेड़ को उसकी छाल की जरूरत है वैसे ही लोगों को आत्मसम्मान की जरूरत है,’ जो तुम्हारे परिवार के शिक्षा के प्रभाव से तुम्हारे भीतर बैठा दी गई है। हालाँकि, अगर तुम सत्य का अनुसरण और अभ्यास करने के लिए इस कहावत को त्याग देते हो, तो फिर यह तुम्हें प्रभावित नहीं करेगी, और यह कोई काम करने के लिए तुम्हारा आदर्श वाक्य या सिद्धांत भी नहीं रहेगी, बल्कि तुम जो भी करोगे वह इस कहावत से बिल्कुल विपरीत होगा कि ‘जैसे पेड़ को उसकी छाल की जरूरत है वैसे ही लोगों को आत्मसम्मान की जरूरत है।’ तुम न तो अपने आत्मसम्मान की खातिर जी रहे होगे, न ही अपनी गरिमा की खातिर, बल्कि तुम सत्य का अनुसरण करने और ईमानदार व्यक्ति होने के लिए जियोगे, परमेश्वर को संतुष्ट करने और एक सच्चे सृजित प्राणी की तरह जीने का प्रयास करोगे। अगर तुम इस सिद्धांत का पालन करते हो तो तुम अपने परिवार द्वारा उत्पन्न किए गए शिक्षा के प्रभावों को छोड़ दोगे(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (12))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मुझे याद आया कि मेरी माँ ने मुझे बचपन से सिखाया था कि तुम्हें जीवन में अपनी इज्जत बचानी है, और तुम्हें अपना बुरा पक्ष किसी भी बाहरी व्यक्ति को नहीं दिखाना चाहिए, वरना वे तुम्हें नीची नजरों से देखेंगे। उस समय से मेरे दिल में इस शैतानी जहर ने गहरी जड़ें जमा ली थीं : “जैसे पेड़ को उसकी छाल की जरूरत है वैसे ही लोगों को आत्मसम्मान की जरूरत है।” मेरा मानना था कि लोगों को जीवन में अपनी इज्जत बचानी पड़ती है, और अपनी कमियों और खामियों को कभी भी लापरवाही से उजागर नहीं करना चाहिए; अगर उन्होंने ऐसा किया तो वे अपना सम्मान घटा देंगे और सत्यनिष्ठा या गरिमा खो बैठेंगे। इन विचारों और रायों से नियंत्रित होकर, मैं अपनी इज्जत बचाने पर खास ध्यान देती थी और कभी भी अपनी कमियों और खामियों को लापरवाही से उजागर नहीं करती थी और उन्हें ढकने और छिपाने के तरीके खोजने की कोशिश तक करती थी। उदाहरण के लिए, जब मैं स्कूल में थी, भले ही मैं कुछ सवालों को अच्छी तरह से नहीं समझती थी, लेकिन मुझे यह डर रहता था कि अगर मैं दूसरों से पूछूँगी तो मेरी इज्जत चली जाएगी और मैं सम्मान खो बैठूँगी, इसलिए मैं पूछती नहीं थी। अब, जब मैं अपना कर्तव्य कर रही थी तो भी ऐसा ही था। जब सब लोग मिलकर समस्याओं पर चर्चा करते हैं, तो यह अपनी समझ और दृष्टिकोणों का आदान-प्रदान करना होता है। हमें उतना बोलना चाहिए जितना हम समझते हैं। हम जितनी अधिक संगति करते हैं, उतने ही अधिक स्पष्ट होते जाते हैं और हम समस्याओं को और अधिक समग्र रूप से देखते हैं। यह कार्य के लिए लाभकारी है और एक-दूसरे की कमियों की भरपाई भी कर सकता है। लेकिन, मुझे डर था कि अगर मैंने बहुत सारी गलतियाँ कीं, तो इससे मैं खराब काबिलियत वाली दिखूँगी। इसलिए अपनी राय जाहिर करते समय, मैं बहुत सतर्क रहती थी। मुझे कोई वाक्य बोलने से पहले उस पर अपने दिमाग में कई बार भली-भाँति सोचना पड़ता था, यह डर रहता था कि अगर मैं सावधान नहीं रही तो खुद को शर्मिंदा कर बैठूँगी। मैं स्पष्ट रूप से समस्याओं को समग्रता में नहीं देख पाती थी, फिर भी मैं अपनी राय सच्चाई से बताने की हिम्मत नहीं करती थी। मैं तो यहाँ तक चाहती थी कि सराहे जाने का अपना लक्ष्य प्राप्त के लिए मैं दूसरे लोगों की समझ और राय को अपने लिए चुरा लूँ। जब पर्यवेक्षक ने मुझे संगति में अगुआई करने के लिए कहा, तो मैंने सक्रिय रूप से संगति करने के बजाय समय बर्बाद करना और प्रगति में देरी करना बेहतर समझा। अपनी राय व्यक्त करना बहुत पीड़ादायक लगा और मैंने अपना कर्तव्य छोड़ने के बारे में भी सोचा। मैंने अपना कर्तव्य निभाने और सत्य का अभ्यास करने से ज्यादा मान अपनी इज्जत बचाने को दिया। मैंने देखा कि इन शैतानी जहरों के अनुसार जीने से मैं खास तौर से स्वार्थी और धोखेबाज बन गई थी, हमेशा यह महसूस करती थी कि सरल-दिल से खुलने के कारण मैं खुद को शर्मिंदा करने के जोखिम में डाल दूँगी और अगर मैंने कोई गलत राय जाहिर की, तो यह बहुत शर्मनाक होगा। लेकिन, परमेश्वर इसे इस तरह नहीं देखता। परमेश्वर चाहता है कि हम ईमानदार लोग बनें, अपने सच्चे विचारों को खोलकर रख दें और उतनी संगति करें जितना हम समझते हैं, स्पष्टवादिता से आचरण करें, और तभी हम गरिमा और सत्यनिष्ठा के साथ जी सकते हैं। मुझमें बहुत सी कमियाँ और खामियाँ हैं, और सबकी संगति के जरिए मेरी कमियों की भरपाई की जा सकती है। यह असल में मेरे लिए सत्य को समझने का एक अच्छा मौका है। लेकिन, मैं हमेशा अपनी इज्जत बचाने की कोशिश करती थी और नकारात्मक और निष्क्रिय रहती थी, मैंने सत्य को प्राप्त करने के बहुत-से मौके गँवा दिए। मैं खुद को नुकसान पहुँचा रही थी!

बाद में, मैंने अपनी समस्याओं के बारे में खोजना जारी रखा, और अभ्यास का एक मार्ग और स्पष्ट हो गया। मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “ईमानदार व्यक्ति होने के लिए तुम्हें पहले अपना दिल खोलकर रखना चाहिए ताकि सभी उसके भीतर झाँक सकें, तुम्हारी सोच और तुम्हारा असली चेहरा देख सकें। तुम्हें भेस बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, या खुद को छिपाना नहीं चाहिए। तभी दूसरे तुम पर भरोसा करेंगे, और तुम्हें ईमानदार व्यक्ति मानेंगे। यह सबसे बुनियादी अभ्यास है, और ईमानदार व्यक्ति बनने की पहली शर्त है। यदि तुम हमेशा ढोंग करते हो, हमेशा पवित्रता, कुलीनता, महानता और ऊँचे चरित्र का दिखावा करते हो, दूसरों से अपनी भ्रष्टता और खामियों को छिपाते हो, उनके सामने एक झूठी छवि पेश करते हो और उन्हें यह विश्वास दिलाते हो कि तुम ईमानदार, महान, आत्म-त्यागी, न्यायप्रिय और निस्वार्थी हो—तो क्या इसमें कपट और छल नहीं है? समय बीतने के साथ, क्या लोग तुम्हारी असलियत नहीं जान पाएँगे? इसलिए, पाखंडी मत बनो या दिखावा मत करो। इसके बजाय, सरल और खुले बनो, और खुद को खोलकर रख देना सीखो—अपना दिल खोलकर दूसरों को देखने दो। यदि तुम अपने सभी विचारों और उन सभी चीजों को जो तुम करना चाहते हो—चाहे वे सकारात्मक हों या नकारात्मक—दूसरों के देखने के लिए खोलकर रख सकते हो तो क्या तुम ईमानदार नहीं हो रहे हो? ... क्या ऐसा कर पाना आसान है? इसके लिए कुछ समय तक प्रशिक्षण और परमेश्वर से अक्सर प्रार्थना कर उस पर भरोसा करने की जरूरत है। तुम्हें हर विषय पर अपने दिल की बात को सरल ढंग से खुलकर बोलने के लिए खुद को प्रशिक्षित करना होगा। ऐसे प्रशिक्षण से तुम तरक्की कर सकोगे। अगर तुम्हारे सामने कोई बड़ी मुश्किल आए तो तुम्हें परमेश्वर से प्रार्थना कर सत्य को खोजना चाहिए; जब तक कि तुम सत्य का अभ्यास न कर लो, तुम्हें अपने दिल में युद्ध कर देह को जीतना चाहिए। खुद को इस प्रकार प्रशिक्षित करने से थोड़ा-थोड़ा करके तुम्हारा दिल धीरे-धीरे खुल जाएगा। तुम और ज्यादा शुद्ध हो जाओगे, तुम्हारे कथन और कार्य के प्रभाव पहले से अलग होंगे। तुम्हारी झूठी बातें और चालबाजी धीरे-धीरे कम होती जाएँगी और तुम परमेश्वर के समक्ष जी पाओगे। फिर तुम मूल रूप से ईमानदार व्यक्ति बन चुके होगे(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास)। “ईमानदार लोग जिम्मेदारी ले सकते हैं। वे अपनी फायदों और नुकसानों पर विचार नहीं करते, वे बस परमेश्वर के घर के काम और हितों की रक्षा करते हैं। उनके दिल दयालु और ईमानदार होते हैं, साफ पानी के उस कटोरे की तरह, जिसका तल एक नजर में देखा जा सकता है। उनके क्रियाकलापों में पारदर्शिता भी होती है(वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (8))। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गई कि जब तुम सभाओं में संगति करते हो या कलीसिया में कार्य पर चर्चा करते हो, तो तुम्हें सरल-दिलवाला और खुला होना चाहिए और एक ईमानदार व्यक्ति होना चाहिए, अपने आत्मसम्मान या हितों के बारे में नहीं सोचना चाहिए या खुद पर पर्दा नहीं डालना चाहिए और छद्मवेश धारण नहीं करना चाहिए। जब तुम अपने कर्तव्य में कोई समस्या देखते हो, तुम्हें उसके बारे में खुलकर बताना और बोलना चाहिए और अपनी राय व्यक्त करने से नहीं डरना चाहिए। यह कलीसिया के कार्य के लिए लाभदायक है और भाई-बहन एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं। पहले, मैं हमेशा अपने आत्मसम्मान से बाधित रहती थी और अपनी राय व्यक्त करने की हिम्मत नहीं करती थी। हर बार जब हम धर्मोपदेशों पर चर्चा करते थे तो मैं खुद को बड़े दबाव में महसूस करती थी। मुझे अपनी कमियाँ उजागर करने का डर रहता था, इसलिए मैं अपनी राय व्यक्त करने में देरी करती थी, बार-बार प्रगति में बाधा डालती थी। मैं न केवल कोई प्रगति करने में विफल रही, बल्कि परमेश्वर भी मुझसे घृणा करता था। यह सत्य का अभ्यास न करने का कड़वा फल था! मैंने सोचा कि प्रभु यीशु ने क्या कहा था : “मैं तुम से सच कहता हूँ कि जब तक तुम न फिरो और बालकों के समान न बनो, तुम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने नहीं पाओगे(मत्ती 18:3)। परमेश्वर ईमानदार लोगों से प्रेम करता है। अगर मैं एक छोटे बच्चे जितनी सरल-दिल वाली और ईमानदार नहीं हो सकती, तो मुझे बचाया नहीं जाएगा। उस दौरान मैं बार-बार परमेश्वर से प्रार्थना करती थी, उससे विनती करती थी कि वह मेरे दिल की पड़ताल करे और मुझे आस्था और शक्ति दे। मैं अपने आत्मसम्मान और हितों को त्यागने, सत्य का अभ्यास करने और एक ईमानदार व्यक्ति बनने को तैयार थी, मैं जितना समझती थी उतना बोल रही थी, सरल-दिल के साथ खुलकर बोल रही थी और अब अपने आत्मसम्मान और रुतबे की रक्षा नहीं कर रही थी।

जल्द ही, मैं पाठ-आधारित कर्तव्य करने के लिए दूसरी जगह चली गई। एक बार, एक धर्मोपदेश पर चर्चा करते समय, मैं उसमें एक समस्या को स्पष्ट रूप से नहीं देख सकी। उसे कई बार पढ़ने के बाद भी, मैं थोड़ी उलझन में थी, इसलिए मैं अपनी राय जताने में झिझक गई। जैसे-जैसे समय बीतता गया, मैं अधिकाधिक बेचैन होती गई। मैंने मन में सोचा, “मैं अभी भी इस सवाल के बारे में बहुत स्पष्ट नहीं हूँ। क्या मुझे इसके बारे में कुछ कहना चाहिए? हाल ही में धर्मोपदेशों पर चर्चा करते समय मेरी राय में अक्सर कुछ विचलन हुए हैं। अगर मैंने फिर से कुछ गलत कह दिया तो मैं क्या करूँगी? पर्यवेक्षक और मेरी सहकर्मी बहन मेरे बारे में क्या सोचेंगी? क्या वे यह सोचेंगी कि मेरी काबिलियत काफी खराब है और मैं इस कर्तव्य के लिए खरी नहीं उतरती हूँ? शायद मुझे पहले उस बहन के बोलने का इंतजार करना चाहिए जिसके साथ मैं कार्य कर रही हूँ। मैं उसकी राय सुनूँगी और फिर तय करूँगी कि क्या मुझे खुलकर बोलना चाहिए।” लेकिन, फिर मैंने सोचा कि अगर मैंने और देरी की, तो समय बर्बाद होगा। मैंने अपने दिल में चुपचाप प्रार्थना की, परमेश्वर से विनती की कि वह मेरे दिल को शांत करे ताकि मैं आत्मसम्मान से बँधना बंद कर सकूँ और जितना समझती हूँ उतनी संगति कर सकूँ। मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “पाखंडी मत बनो या दिखावा मत करो। इसके बजाय, सरल और खुले बनो, और खुद को खोलकर रख देना सीखो—अपना दिल खोलकर दूसरों को देखने दो(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास)। “ईमानदार लोग जिम्मेदारी ले सकते हैं। वे अपनी फायदों और नुकसानों पर विचार नहीं करते, वे बस परमेश्वर के घर के काम और हितों की रक्षा करते हैं। उनके दिल दयालु और ईमानदार होते हैं, साफ पानी के उस कटोरे की तरह, जिसका तल एक नजर में देखा जा सकता है। उनके क्रियाकलापों में पारदर्शिता भी होती है(वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (8))। परमेश्वर के वचनों ने मेरे दिल में मुझे शक्ति दी। यूँ तो मैं इस समस्या को समझ नहीं सकी, लेकिन मेरे पास अपनी राय अवश्य थी। मुझे निडर बनना था और अपने मन की बात कहनी थी और खुद पर पर्दा डालना और छद्मवेश धारण करना बंद करना था। इसलिए, मैंने अपनी राय साझा की और अपनी उलझन के बारे में बात की। पर्यवेक्षक ने मेरी राय के कुछ विवरणों पर चर्चा की और इसके माध्यम से, जो मुद्दा मुझे उलझा रहा था वह हल हो गया, और मैंने अपनी कमियों और खामियों को भी देखा। मैं बहुत खुश थी कि मैंने अपनी राय और विचार व्यक्त किए, वरना मैं अभी भी इस समस्या को लेकर उलझन में रहती। यूँ तो यह कदम उठाने से मेरी कमियाँ उजागर हो गईं, लेकिन इससे उनकी भरपाई करने में भी मदद मिली। बाद में, कार्य के बारे में बातचीत करते समय या धर्मोपदेशों पर चर्चा करते समय मैं सोच-समझकर अपने आत्मसम्मान को त्याग देती थी और जितना समझती थी उतना बोल देती थी। यूँ तो इससे मेरी बहुत-सी कमियाँ और खामियाँ उजागर हो गईं और मैंने थोड़ी-सी इज्जत भी गँवा दी, लेकिन मैं प्रासंगिक सत्य सिद्धांतों के बारे में काफी और स्पष्ट हो गई और अपना कर्तव्य करने में मेरी दक्षता में भी बहुत अधिक सुधार हुआ है। मैं अब अनुभव कर चुकी हूँ सत्य का अभ्यास करने और एक ईमानदार व्यक्ति होने से मुझे बहुत सारे लाभ हुए हैं। अब मैं अपना कर्तव्य निभाते समय इतने सारे बोझों में उलझी नहीं रहती और मेरा मन काफी और सरल हो गया है। मैंने जो थोड़ा-सा भी अभ्यास और प्रवेश प्राप्त किया है वह परमेश्वर के वचनों के प्रबोधन और मार्गदर्शन का नतीजा है। परमेश्वर का धन्यवाद!

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