15. परमेश्वर के नामों के रहस्य को समझकर, मैं मेमने के पदचिह्नों पर चल पाती हूँ

लेखिका मु झेन, ताइवान

जब मैं छोटी थी, मैं एक तेज़ और समझदार बच्ची थी और इसलिए मुझे हमेशा मेरे माता-पिता, रिश्तेदारों और दोस्तों का भरपूर प्यार मिलता था। क्योंकि स्कूल में हमेशा मुझे अच्छे ग्रेड आते थे, मैं विनम्र और मिलनसार थी, इसलिये शिक्षक और सहपाठी मुझे काफ़ी पसंद करते थे। उस दौरान, मैं भविष्य के प्रति उम्मीदों से भरपूर थी। हालांकि, जब हाई स्कूल के टेस्ट का समय आया तो मैं हैरान रह गई, मैं सबसे अच्छी लड़कियों के स्कूल के लिये क्वालीफ़ाई करने से सिर्फ़ आधे पॉइंट से चूक गई थी, तब मुझे इसके बजाय दूसरी श्रेणी के स्कूल में दाखिला मिला। जो कुछ हुआ था, मैं उसे स्वीकार नहीं कर पाई थी और मैंने दो दिनों तक अपने आपको एक कमरे में बंद कर लिया था, मैंने खाना-पीना भी छोड़ दिया था। यह पहला अवसर था जब मैंने अपने जीवन में नाकामी का सामना किया था—मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे कि मैं रसातल में गिर गई थी, मैं पीड़ा और संताप से भर गई थी।

जब फिर से स्कूल खुले, तो मैं काफ़ी निराशा के साथ ओरिएंटेशन में गई। ओरिएंटेशन के दौरान एक सीनियर सहकर्मी ने मुझे यीशु मसीह का सुसमाचार सुनाया। जब मैं और अधिक कलीसिया की सभाओं में गई और जब मैंने भाई-बहनों के अनुभव को अधिक सुना, तो मैंने महसूस किया कि प्रभु का अनुग्रह विश्वास के योग्य है और इस पर भरोसा किया जा सकता है। मेरा मानना था कि अगर मैं प्रभु यीशु मसीह से प्रार्थना करती हूँ और उनसे विनती करती हूँ, तो मुझे उनका संरक्षण और स्नेह मिलेगा, मैं अपने दिल में शांति और सुरक्षा का अनुभव करूंगी। गहरी निराशा के उस स्थान से, मैंने अपनी उम्मीद और सकारात्मकता वापस पाई। बाद में, हाई स्कूल के अपने दूसरे साल में, एक ईसाई के तौर पर मेरा बप्तिस्मा किया गया।

बाइबल के सत्यों के बारे में ज़्यादा जानने के लिए, मैं एक धर्मशास्त्र के कॉलेज में गई। एक नई शिक्षार्थी के तौर पर मैंने पादरी द्वारा पढ़ाया जाने वाला एक कोर्स "धर्म का परिचय" लिया। एक कक्षा के दौरान, पादरी ने हमसे कहा, "इब्रानियों के अध्याय 13, पद 8 कहता है, 'यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एक–सा है।' प्रभु यीशु हमारा एकमात्र उद्धारक है। वह विश्वसनीय और भरोसेमंद है, युग कोई भी हो, उसका नाम कभी नहीं बदलेगा। सिर्फ यीशु के नाम पर भरोसा करके हम बचाये जा सकते हैं...।" उनके व्याख्यान से, मैंने यह जाना कि सिर्फ़ प्रभु यीशु के उद्धार के माध्यम से हम शैतान और मौत के चंगुल से मुक्त हो सकते हैं, और सिर्फ़ प्रभु यीशु के नाम में विश्वास करके ही हम बचाये जा सकते हैं। मुझे पता चला कि कक्षा की सीनियर सहपाठी महिलाएं जो मुझे कलीसिया में लेकर आयी थीं, शायद इसी कारण से हमेशा इतनी खुश और आत्मविश्वास से भरपूर नज़र आती थीं क्योंकि उन्हें प्रभु में अपने विश्वास के कारण शक्ति मिली थी। उस कक्षा के बाद, मैंने प्रभु यीशु का अनुसरण करने का अपना मन बना लिया और अपने सारे प्रयास उनकी सेवा में लगा दिये। अब तक, कक्षाओं के बाद मैंने अपना पूरा समय सभाओं में हिस्सा लेने, बाइबल का अध्ययन करने, सुसमाचार के मिशनरी कार्य करने में बिताया है, और मैंने उपदेश या सभा में हिस्सा लेने का एक भी मौक़ा नहीं गंवाया है।

समय के साथ, मुझे यह समझ में आया कि पादरी और एल्डर के उपदेशों में हमेशा उन्हीं पुरानी बातों की चर्चा होती थी—उनकी बातों में कोई भी नई रोशनी नहीं होती थी और विश्वासियों के तौर पर हमें उनके वचनों से ज़रा सा भी आध्यामिक पोषण नहीं मिलता था। कुछ भाई-बहन निराशा में रहते थे—वे कभी सभाओं में नहीं जाते थे और कोई भी उनकी मदद या सहयोग करने नहीं आता था। कुछ भाई-बहन उपदेशों को सुनकर ऊंघने लगते थे और फिर सभावों के बाद लोगों को सामान या बीमा बेचा करते थे। कुछ लोग तो राजनीतिक उम्मीदवारों के चुनाव प्रचार अभियानों में भी मदद किया करते थे। मैंने मन ही मन सोचा, "क्या तुम सिर्फ़ निजी लाभ की चाह के साथ प्रभु में विश्वास करते हो और अपने आध्यात्मिक जीवन में प्रगति की कोशिश नहीं करते हो, तो क्या तुम अब भी एक ईसाई हो? पादरी और एल्डर इस तरह की घटनाओं को रोकने की कोशिश भी नहीं करते थे—क्या यह प्रभु की इच्छा और अपेक्षाओं के अनुरूप है?" कलीसिया की स्थिति ने मुझे नाराज़ और निराश कर दिया। क्योंकि मुझे काफ़ी समय से कोई भी आध्यात्मिक पोषण नहीं मिला था, मैंने अपने आपको आध्यात्मिक रूप से दुर्बल और कमजोर महसूस किया। इतना ही नहीं, क्यों मैं अपने काम में व्यस्त रहती थी और अक्सर हफ़्ते के आखिर में ओवरटाइम किया करती थी, अन में मैंने सभाओं में हिस्सा लेना भी छोड़ दिया। जब मैंने कुछ समस्याओं का सामना किया, तब जाकर बाइबल पढ़ने और प्रभु के नाम की प्रार्थना करने में समय लगाया। मैंने अपने आपको निराश और निरुद्देश्य, हारी हुई और असहाय महसूस किया।

अक्टूबर 2016 में, ऑनलाइन मेरी मुलाक़ात सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के भाई वांग से हुई। भाई वांग ने भाई जिन और कुछ अन्य भाई-बहनों से मेरा परिचय कराया। भाई जिन की सहभागिता ने कई सत्यों को समझने में मेरी मदद की, जिन्हें मैं पहले नहीं समझ पाई थी। परमेश्वर के देहधारण के सत्य के संबंध में उनकी सहभागिता विशेष रूप से व्यावहारिक और स्पष्ट थी, इससे मुझे बहुत कुछ हासिल हुआ। मैंने कई सालों से प्रभु में विश्वास किया था, बाइबल का अध्ययन किया था, और आध्यात्मिक हस्तियों, पादरियों एवं एल्डर के असंख्य उपदेश सुने थे, लेकिन मैंने किसी को भी सत्य के इस पहलू के बारे में इतने निर्णायक ढ़ंग से और साफ़ तौर पर कहते कभी नहीं सुना था। मेरी आत्मा सिंचित हो गई थी, और मेरे अंदर खोज करने की चाह उत्पन्न हो गई थी। इसके बाद, मैं अक्सर ऑनलाइन उनकी सभाओं में हिस्सा लेने लगी।

ऐसी ही एक सभा के दौरान, भाई जिन ने सहभागिता करते हुए कहा, "मानवजाति को पूरी तरह से बचाने के लिये, परमेश्वर ने छः हज़ार वर्षों की प्रबंधन योजना शुरू की है, इसे तीन अलग-अलग युग में बाँटा है और हर युग में वह कार्य का एक नया चरण पूरा करता है। अपने अलग-अलग कार्य के साथ परमेश्वर का नाम बदलता रहता है। उदाहरण के लिये, व्यवस्था के युग में परमेश्वर ने 'यहोवा' के नाम से अपना कार्य पूरा किया, नियमों और आज्ञाओं की घोषणा की, और धरती पर उस ज़माने के इज़राइलियों के जीवन की अगुवाई की। हालांकि, जब परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में अपना कार्य पूरा कर लिया और अनुग्रह के युग में छुटकारे का अपना कार्य शुरू किया, तो उनका नाम 'यहोवा' से बदलकर 'यीशु' हो गया। अब हम अंत के दिनों में हैं और परमेश्वर यीशु के छुटकारे के कार्य की नींव पर, अपने घर से शुरू होने वाला न्याय का कार्य कर रहा है। उसने अनुग्रह के युग को समाप्त किया है, राज्य के युग की शुरुआत की है, और ऐसा करने में, उनका नाम बदलकर 'सर्वशक्तिमान परमेश्वर' हो गया है।" जब मैंने भाई जिन को यह कहते सुना कि परमेश्वर का नाम बदल गया है, मैंने मन ही मन सोचा, "बाइबल साफ़ तौर पर कहती है: 'यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एक–सा है' (इब्रानियों 13:8)। जिस प्रभु यीशु पर मैं विश्वास करती हूँ वह एक सच्चा परमेश्वर है और प्रभु यीशु का नाम कभी नहीं बदलेगा। सिर्फ़ प्रभु यीशु का नाम लेने से ही हम बचाये जा सकते हैं—आप यह कैसे कह सकते हैं कि प्रभु यीशु का नाम बदल गया है? अगर हमारी प्रार्थनाओं में, हम यीशु का नाम नहीं लेते हैं, बल्कि किसी और नाम का इस्तेमाल करते हैं, तो फिर वह भी वह बाइबल के अनुरूप कैसे हो सकता है?" भाई जिन की सहभागिता ने मेरे विश्वासों को भारी चुनौती दी थी। उन्होंने एक उपमा देते हुए कहा, "बहन मु झेन, अगर किसी कंपनी ने एक साल आपको प्लानिंग ऑफिसर और दूसरे साल मैनेजर बनाया, तो इसका मतलब हुआ कि प्लानिंग ऑफिसर हो या मैनेजर, किसी भी पद पर रहते हुए आपके कार्य की आवश्यकताएं आपके नाम को बदल सकती हैं। पहले लोग आपको प्लानिंग ऑफिसर मु कहा करते थे, लेकिन अब वे आपको मैनेजर मु कहते हैं—इसके बावजूद कि आपका नाम और पद बदल गया है, क्या आप स्वयं भी बदल गई हैं? क्या आप अब भी पहले वाली बहन मु नहीं हैं?" मैंने जवाब दिया, "मैं अब भी वही हूँ" और मैंने कोई आपत्ति नहीं की, लेकिन अपने दिल में अब भी मैं उनकी कही बात को स्वीकार नहीं कर पाई। मैंने अपने मन में सोचा, "परमेश्वर का नाम कभी नहीं बदल सकता। सिर्फ़ प्रभु यीशु के नाम में विश्वास करके ही हम बचाए जा सकते हैं। आप मुझे इतनी आसानी से समझा नहीं सकते। अब से मैं अब आप सभी लोगों को अनदेखा कर दूंगी और यही मेरा अंतिम फैसला होगा।" सभा ख़त्म होने के बाद, मैंने चैट वाले ऐप में सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के सभी भाई-बहनों को ब्लॉक कर दिया।

जब मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के सभी भाई-बहनों को ब्लॉक कर दिया था, एक दिन रात को करीब 8 बजे जब मैं किचन में बर्तन धो रही थी, तभी अचानक मुझे दरवाज़े की घंटी की आवाज़ सुनाई दी। मैंने दरवाज़ा खोला तो अपने सामने दो लड़कियों को देखकर मैं हैरान रह गई, मैंने उन्हें पहले कभी नहीं देखा था। उनमें से एक लड़की ने मुझे एक जानकारी वाली पर्ची दी। पहले मैं उन लड़कियों से बड़ी विनम्रता से पेश आ रही थी, लेकिन जब मैंने देखा कि लड़की ने जो पर्ची मुझे दी थी उस पर बड़े अक्षरों में लिखा था, "मसीह की वापसी—प्रभु यीशु बादलों के साथ लौट आये हैं", मुझे अचानक यह एहसास हुआ कि वे सुसमाचार का प्रचार करने आई थीं। चूंकि उस समय मेरा यह मानना था कि प्रभु यीशु का नाम कभी नहीं बदलेगा, मैं दोनों लड़कियों से थोड़ी नाराज़ हो गई और उनकी दी हुई पर्ची को वापस लौटा दिया। उनका चेहरा थोड़ा मुरझा गया और जब वे वहां से जाने के लिए मुड़ीं, तो एक बहन ने मुझसे पूछा, "बहन, क्या आप इस समाचार को इसलिए नहीं स्वीकार कर पा रही हैं कि आप परमेश्वर में विश्वास नहीं करती हैं या आप किसी अन्य संप्रदाय से जुड़ी हैं। क्या आपने कभी सावधानी से सत्य की जांच-पड़ताल और खोज की है?" बहनों ने चाहे कुछ भी कहा हो, मैं असल में उन्हें अपना और समय नहीं देना चाहती थी, इसलिये मैं वापस किचन में अपने बर्तन धोने चली गई। जब मैं बर्तन धो रही थी, तो उस बहन के सवाल मेरे मन में घूमते रहे, "क्या आपने कभी सावधानी से सत्य की जांच-पड़ताल और खोज की है?" मैंने अपने मन में सोचा, "मुझे लगता है मैंने वाकई कभी सावधानी से सत्य की खोज नहीं की है।" मैं उस समय के बारे में सोचा कि कैसे भाई वांग और अन्य लोगों ने परमेश्वर के नाम बदलने के बारे में सहभागिता की थी और फिर मैंने सोचा कि यह मेरी अपनी समझ से कैसे अलग था। लेकिन जब मैं समझ नहीं पाई थी, तब भी मेरे अंदर सत्य की खोज करने की इच्छा नहीं थी, और मैंने बाइबल के अपने ज्ञान का इस्तेमाल करके ही उनकी कही बातों का विश्लेषण किया था। मैंने उनकी सहभागिता के उन पहलुओं को स्वीकार कर लिया था जिनसे मैं सहमत थी, लेकिन जिन पहलुओं से मैं असहमत थी उनकी खोज करने या उन पर ध्यान देने में नाकाम रही थी। तब मुझे यह एहसास हुआ कि बाइबल के बारे में मेरे ज्ञान मैंने अपने हृदय की शुद्धता और सरलता खो दी थी। मैंने सत्य के प्रति एक आत्मतुष्ट रवैया अपना लिया था—मैंने अपने आपको एक ऐसी इंसान कैसे मान लिया था जो जिसने ईमानदारी से सत्य की खोज की थी?

जब मेरा मन थोड़ा शांत हुआ, तो मैंने उन बातों को याद किया जिनके बारे में सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के भाई-बहन अक्सर सहभागिता किया करते थे: "परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की वाणी सुनती हैं—अगर हम प्रभु की वापसी का स्वागत करना चाहते हैं, तो हमें परमेश्वर की वाणी सुननी होगी, उनकी वाणी को समझना होगा और यह समझना होगा कि सत्य क्या है।" भाई-बहनों की सहभागिता बाइबल के अनुरूप थी। बुद्धिमान कुँवारियों को परमेश्वर की वाणी सुननी चाहिये थी, और क्या अनुग्रह के युग में पतरस इसलिए प्रभु यीशु का अनुसरण करने में सक्षम था क्योंकि उसने प्रभु के वचनों में परमेश्वर की वाणी सुनी थी? इसका एहसास होने पर, मैंने फ़ौरन बाइबल निकाली और प्रकाशित वाक्य की पुस्तक के अध्याय 3, पद 20-22 को खोला, जिसमें यह कहा गया है, "देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ। जो जय पाए मैं उसे अपने साथ अपने सिंहासन पर बैठाऊँगा, जैसे मैं भी जय पाकर अपने पिता के साथ उसके सिंहासन पर बैठ गया। जिसके कान हों वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है" (प्रकाशितवाक्य 3:20-22)। मैंने बाइबल के इस अंश पर सावधानी से विचार किया और अपने आप से पूछा, "परमेश्वर हमसे कहते हैं कि जब कभी भी पवित्र आत्मा बोलता है, हमें उसकी बात सुननी चाहिए। अब मैं ऐसी भाग्यशाली इंसान थी जिसने प्रभु की वापसी के बारे में सुना था और जिसे अंत के दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य के बारे में जानने का अवसर मिला था। फिर मैं क्यों अब भी अपनी धारणाओं को अपने कदम रोकने दे रही हूँ? क्यों मैं ऐसे किसी भी विचार को सुनने से इनकार कर देती हूँ जिसे मैं नहीं समझती या जो मेरी धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं? यहाँ तक कि अगर मैं अभी इस बात को स्वीकार नहीं कर सकती कि प्रभु का नाम बदल गया है, तब भी मुझे कम से कम इस मामले की जांच-पड़ताल करनी चाहिए और इसके बारे में अच्छी तरह समझ लेने के बाद ही कोई निर्णय लेना चाहिए!" फिर मैंने मत्ती के अध्याय 7, पद 7 के इस अंश को देखा: "माँगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूँढ़ो, तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा।" मैंने सोचा, "अगर परमेश्वर वाकई दरवाज़े पर दस्तक देते हुए आये हैं, और मैं अपनी धारणाओं के धोखे में रहकर अपने कान बंद कर लेती हूँ और अपनी पूरी असंवेदनशीलता से उन्हें बाहर ही रहने देती हूँ और अंत के दिनों में परमेश्वर के उद्धार को गँवा देती हूँ, तो क्या यह बहुत बड़ी शर्मिंदगी की बात नहीं होगी?"

उस रात, मैं सो नहीं पाई और उस दिन शाम को हुई सारी बातें मेरे मन में घूमती रहीं। मैंने अपने मन में सोचा, "मैं 18 सालों से यहाँ रह रही हूँ और यह पहली बार है जब कोई सुसमाचार का प्रचार करने आया है। उस बहन ने मुझे यह भी पूछा कि क्या मैंने कभी सावधानी से सत्य की खोज और जांच-पड़ताल की है—क्या ऐसा हो सकता है कि इन दोनों बहनों का मुझे सुसमाचार के प्रचार के लिए आना परमेश्वर की योजना हो, जबकि मैं इनसे कभी नहीं मिली थी? फिर जब उन्हें अस्वीकार करने के बाद मैं परेशान महसूस कर रही थी और जवाबों के लिए बाइबल को पढ़ा, तब परमेश्वर ने मुझे उस अंश को पढने के लिए निर्देशित किया जिसमें प्रभु के दरवाज़े पर दस्तक देने की बात थी—क्या मैंने उनको वापस भेजकर गलती की थी? क्या सर्वशक्तिमान परमेश्वर वाकई लौटकर आये प्रभु यीशु हैं?" मन में घुमड़ते इन विचारों के साथ, मैं तुरंत बिस्तर से उठी और प्रभु से मार्गदर्शन और प्रबुद्धता मांगते हुए प्रार्थना की। अपनी प्रार्थना पूरी करने के बाद, मैंने अपना कंप्यूटर खोला और सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की वेबसाइट देखने लगी, जिसका नाम है "राज्य के अवरोहण का सुसमाचार"। उसमें मैंने परमेश्वर के नाम से संबंधित अंशों को खोजा। मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का यह अंश मिला: "कुछ कहते हैं कि परमेश्वर का नाम बदलता नहीं है, तो फिर क्यों यहोवा का नाम यीशु हो गया? मसीह के आने की भविष्यवाणी की गई थी, तो फिर क्यों यीशु नाम का एक व्यक्ति आया? परमेश्वर का नाम क्यों बदला गया? क्या इस तरह का कार्य काफी समय पहले नहीं किया गया था? क्या परमेश्वर आज के दिन कोई नया कार्य नहीं कर सकता है? कल का कार्य बदला जा सकता है, और यीशु का कार्य यहोवा के कार्य के बाद नहीं आ सकता है। क्या यीशु के कार्य के बाद कोई अन्य कार्य नहीं हो सकता है? यदि यहोवा का नाम बदल कर यीशु हो सकता है, तो क्या यीशु का नाम भी नहीं बदला जा सकता है? यह असामान्य नहीं है, और लोग ऐसा केवल अपनी नासमझी के कारण सोचते हैं। परमेश्वर हमेशा परमेश्वर ही रहेगा। उसके कार्य और नाम में परिवर्तन की परवाह किए बिना, उसका स्वभाव और विवेक हमेशा अपरिवर्तित रहता है, वह कभी भी नहीं बदलेगा। यदि तुम मानते हो कि परमेश्वर केवल यीशु के नाम से ही पुकारा जा सकता है, तो तुम्हें बहुत कम ज्ञान है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "मनुष्य, जिसने परमेश्वर को अपनी ही धारणाओं में सीमित कर दिया है, वह किस प्रकार उसके प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है?")। इस अंश को पढ़ने के बाद, मैं समझ गई कि परमेश्वर हर युग में एक नया कार्य करता है और नये कार्य की आवश्यकता के अनुसार एक नया नाम लेता है। मैंने सोचा कि कैसे व्यवस्था के युग में परमेश्वर का नाम यहोवा था, और इस नाम से परमेश्वर ने इसराइलियों की अगुवाई की। हालांकि, जब प्रभु यीशु अपना कार्य करने के लिये आए, तो क्या परमेश्वर का नाम यहोवा से बदलकर यीशु नहीं हो गया था? सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने अब इस मुद्दे को काफ़ी स्पष्ट तरीके से समझाया है—अगर परमेश्वर सत्य को व्यक्त करने के लिए नहीं आये होते तो भला कौन इन रहस्यों को उजागर कर सकता था? मैंने परमेश्वर के नाम बदलने के विचार की खोज और जांच-पड़ताल करने से इनकार कर दिया था क्योंकि यह मेरे अपने विचारों से मेल नहीं खाता था। अगर सर्वशक्तिमान परमेश्वर वाकई प्रभु यीशु का पुनर्प्रकटन हैं, और उनके बार-बार मेरे दरवाज़े पर दस्तक देने के बावजूद मैंने दरवाज़ा बंद कर लिया, तो यह कितनी बड़ी शर्मिंदगी की बात होगी जब मैंने प्रभु की वापसी का स्वागत करने का अवसर गँवा दिया होगा। इस तरह, मैंने अंत के दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य की खोज और जांच-पड़ताल करने का फैसला कर लिया।

इसके बाद, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के भाई-बहनों को अनब्लॉक कर दिया और उस रात मुझे हुए अनुभव के बारे में उन्हें बताया। एक सभा के दौरान, भाई-बहनों ने बाइबल का यह अंश मुझे सुनाया: "तुम क्या सोचते हो? यदि किसी मनुष्य की सौ भेड़ें हों, और उनमें से एक भटक जाए, तो क्या वह निन्यानबे को छोड़कर, और पहाड़ों पर जाकर, उस भटकी हुई को न ढूँढ़ेगा?" (मत्ती 18:12)। भाई-बहनों ने कहा कि मैं ठीक उस खोई हुई भेड़ के समान हूँ और यह कि परमेश्वर मुझे खोजते हुए आये थे और उन्होंने मुझे वापस अपने पास बुला लिया है। यह वाकई परमेश्वर का अनुग्रह था कि जब मैं भटक गई थी, परमेश्वर ने भाई-बहनों को अनब्लॉक करने और लगातार सभाओं में हिस्सा लेने के लिए मेरा मार्गदर्शन किया। परमेश्वर का धन्यवाद कि उन्होंने मेरा परित्याग नहीं किया!

तभी, बहन शिलिंग ने मुझसे कहा, "बहन मु झेन, क्या आपने अचानक हर किसी को ब्लॉक कर दिया था क्योंकि आप सत्य के कुछ पहलुओं को नहीं समझ पाई थीं?" मैंने यह कहते हुए सिर हिलाया, "बाइबल साफ़ तौर पर कहती है, 'यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एक–सा है' (इब्रानियों 13:8)। इससे साबित होता है कि यीशु मसीह हमेशा से अपरिवर्तनीय हैं। यहाँ तक कि अंत के दिनों में लौटकर आने के बाद भी, परमेश्वर का नाम यीशु रहना चाहिए—यह नाम कभी नहीं बदलेगा। फिर भी भाई जिन ने सहभागिता करते हुए कहा कि अंत के दिनों में परमेश्वर का नाम सर्वशक्तिमान परमेश्वर है और मैं इसे बिलकुल भी स्वीकार नहीं कर सकती। जब से मेरा बप्तिस्मा हुआ है, मैंने हमेशा से प्रभु यीशु का नाम लेकर प्रार्थना की है, तो मैं उसे किसी और नाम से कैसे पुकार सकती हूँ?" जब मैंने अपनी बात पूरी की, तब बहन शिलिंग ने परमेश्वर के वचनों का यह अंश मुझे भेजा: "ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि परमेश्वर अपरिवर्तशील है। यह सही है, किन्तु यह परमेश्वर के स्वभाव और सार की अपरिवर्तनशीलता का संकेत करता है। उसके नाम और कार्य में परिवर्तन से यह साबित नहीं होता है कि उसका सार बदल गया है; दूसरे शब्दों में, परमेश्वर हमेशा परमेश्वर रहेगा, और यह कभी नहीं बदलेगा। यदि तुम कहते हो कि परमेश्वर का कार्य हमेशा अपरिवर्तित रहता है, तो क्या वह अपनी छः-हजार वर्षीय प्रबंधन योजना को पूरा करने में सक्षम होगा? तुम केवल यह जानते हो कि परमेश्वर हमेशा ही अपरिवर्तनीय है, किन्तु क्या तुम जानते हो कि परमेश्वर हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है? यदि परमेश्वर का कार्य अपरिवर्तनशील था, तो क्या वह मानवजाति की आज के दिन तक अगुआई कर सकता था? यदि परमेश्वर अपरिवर्तशील है, तो ऐसा क्यों है कि उसने पहले ही दो युगों का कार्य कर लिया है? ... 'परमेश्वर हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है' वचन उसके कार्य के संदर्भ में हैं, और 'परमेश्वर अपरिवर्तशील है' वचन उस संदर्भ में हैं जो परमेश्वर का अंतर्निहित स्वरूप है। इसके बावज़ूद, तुम छह-हज़ार-वर्ष के कार्य को एक बिंदु निर्भर नहीं कर सकते हो, या इसे केवल मृत शब्दों से सीमित नहीं कर सकते हो। मनुष्य की मूर्खता ऐसी ही है। परमेश्वर इतना सरल नहीं है जितना मनुष्य कल्पना करता है, और उसका कार्य किसी एक युग में नहीं रुका रह सकता है। उदाहरण के लिए, यहोवा हमेशा परमेश्वर के नाम के लिए नहीं हो सकता है; परमेश्वर यीशु के नाम के तहत भी अपना कार्य कर सकता है। यह एक संकेत है कि परमेश्वर का कार्य हमेशा आगे की ओर प्रगति करते हुए बढ़ रहा है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)")।

इसके बाद बहन शिलिंग ने कहा, "सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन बहुत स्पष्ट रूप से इसकी व्याख्या करते हैं: जब हम कहते हैं कि 'परमेश्वर अपरिवर्तशील है,' तो हम उसके स्वभाव और सार की बात करते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि परमेश्वर का नाम कभी नहीं बदलेगा। परमेश्वर हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता, परमेश्वर का कार्य हमेशा आगे बढ़ता रहता है, और उसके कार्य में हुए बदलावों को दर्शाने के लिये उसका नाम अवश्य बदलेगा। हालांकि, परमेश्वर का नाम चाहे कैसे भी बदलता हो, परमेश्वर का सार कभी नहीं बदलता है परमेश्वर बिलकुल स्थिर है। फिर भी हम यह नहीं समझते कि वास्तव में 'अपरिवर्तनीय' का क्या मतलब है और यह नहीं जानते कि कैसे परमेश्वर का कार्य हमेशा नया रहता है और कभी नहीं बदलता। इसलिए, परमेश्वर के कार्य को सीमाओं में बाँधना और यहाँ तक कि हमारी अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर परमेश्वर का विरोध करना भी हमारे लिये बहुत आसान है। उदाहरण के लिये, फ़रीसी इस धारणा से चिपके रहे कि 'यहोवा ही एकमात्र परमेश्वर है, यहोवा के अलावा कोई उद्धारकर्ता नहीं है।' इसलिये, जब परमेश्वर 'यीशु' के नाम से अपना कार्य करने आये और फ़रीसियों ने देखा कि यहोवा का नाम बदल गया है लेकिन उसे 'मसीहा' नहीं कहा जाता है, जैसा कि भविष्यवाणियों में कहा गया था, तब उन्होंने इस बात से इनकार कर दिया कि प्रभु यीशु ही मसीह थे, वही स्वयं परमेश्वर थे। उन्होंने पागलों की तरह प्रभु यीशु की निंदा की और उनका विरोध किया। आख़िरकार, उन्होंने रोमन अधिकारियों के साथ सांठ-गाँठ करके प्रभु यीशु को सूली पर लटका दिया। इस सबसे जघन्य पाप के कारण उन्हें परमेश्वर के दंड का भागी बनाना पड़ा। इसी तरह, अगर हम आँखें बंद करके बाइबल से चिपके रहने की जिद करते हैं और इस धारणा से चिपक जाते हैं कि परमेश्वर का नाम अपरिवर्तनीय है और हम अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को अस्वीकार कर देते हैं, तो क्या हम उन फ़रीसियों से अलग होंगे जो परमेश्वर में विश्वास करने का दावा तो करते थे लेकिन परमेश्वर के विरोध का मार्ग अपना लिया?"

इसके बाद, उन्होंने मुझे परमेश्वर के वचनों के दो अंशों को पढ़ने के लिए कहा: "प्रत्येक युग में, परमेश्वर नया कार्य करता है और उसे एक नए नाम से बुलाया जाता है; वह भिन्न-भिन्न युगों में एक ही कार्य कैसे कर सकता है? वह पुराने से कैसे चिपका रह सकता है? यीशु का नाम छुटकारे के कार्य के वास्ते लिया गया था, तो क्या जब वह अंत के दिनों में लौटेगा तो तब भी उसे उसी नाम से बुलाया जाएगा? क्या वह अभी भी छुटकारे का कार्य करेगा? ऐसा क्यों है कि यहोवा और यीशु एक ही हैं, फिर भी उन्हें भिन्न-भिन्न युगों में भिन्न-भिन्न नामों से बुलाया जाता है? क्या यह इसलिए नहीं है क्योंकि उनके कार्य के युग भिन्न-भिन्न हैं? क्या केवल एक अकेला नाम परमेश्वर का उसकी संपूर्णता में प्रतिनिधित्व कर सकता है? ऐसा होने पर, परमेश्वर को भिन्न युग में भिन्न नाम के द्वारा अवश्य बुलाया जाना चाहिए, युग को परिवर्तित करने और युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए नाम का उपयोग अवश्य किया जाना चाहिए। क्योंकि कोई भी एक नाम पूरी तरह से स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है, और प्रत्येक नाम केवल एक दिए गए युग के दौरान परमेश्वर के स्वभाव के उस समय से संबंधित पहलू का ही प्रतिनिधित्व कर सकता है; और प्रत्येक नाम को केवल उसके कार्य का प्रतिनिधित्व ही करना है। इसलिए, समस्त युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए परमेश्वर ऐसे किसी भी नाम को चुन सकता है जो उसके स्वभाव के अनुकूल है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)")। "क्या यीशु का नाम—'परमेश्वर हमारे साथ'—परमेश्वर के स्वभाव को उसकी समग्रता से व्यक्त कर सकता है? क्या यह पूरी तरह से परमेश्वर को स्पष्ट कर सकता है? यदि मनुष्य कहता है कि परमेश्वर को केवल यीशु कहा जा सकता है, और उसका कोई अन्य नाम नहीं हो सकता है क्योंकि परमेश्वर अपना स्वभाव नहीं बदल सकता है, तो ऐसे वचन वास्तव में ईशनिन्दा हैं! क्या तुम मानते हो कि हमारे पास यीशु, परमेश्वर नाम, अकेला परमेश्वर का उसकी समग्रता से प्रतिनिधित्व कर सकता है? परमेश्वर को कई नामों से बुलाया जा सकता है, किन्तु इन कई नामों में से, एक भी ऐसा नहीं है जो परमेश्वर के समस्त को संपुटित कर सकता हो, एक भी ऐसा नहीं है जो परमेश्वर का पूरी तरह से प्रतिनिधित्व कर सकता हो। और इसलिए, परमेश्वर के कई नाम हैं, किन्तु ये बहुत से नाम परमेश्वर के स्वभाव को पूरी तरह से स्पष्ट नहीं कर सकते हैं, क्योंकि परमेश्वर का स्वभाव इतना समृद्ध है, कि यह बस मनुष्य के जानने की सीमा से बढ़ कर है। ... एक विशेष शब्द या नाम परमेश्वर का उसकी समग्रता में प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ है, तो क्या आपको लगता है कि उसके नाम को तय किया जा सकता है? परमेश्वर बहुत महान और बहुत पवित्र है फिर भी तुम उसे प्रत्येक नए युग में अपना नाम बदलने की अनुमति नहीं दोगे? इसलिए, प्रत्येक युग में जिसमें परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से अपना स्वयं का कार्य करता है, वह उस कार्य को संपुटित करने के लिए जिसे करने का वह इरादा रखता है, एक नाम का उपयोग करता है जो युग के अनुकूल होता है। वह इस विशेष नाम, एक ऐसा नाम जिसका अस्थायी महत्व है, का उपयोग उस युग के अपने स्वभाव का प्रतिनिधित्व करने के लिए करता है। यह परमेश्वर है जो अपने स्वयं के स्वभाव को व्यक्त करने के लिए मनुष्य की भाषा का उपयोग कर रहा है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)")।

बहन शिलिंग ने यह कहते हुए सहभागिता की, "किसी भी युग में परमेश्वर अपनी कार्य योजना का सिर्फ़ एक हिस्सा पूरा करता है और अपने स्वभाव के सिर्फ़ एक पहलू को व्यक्त करता है। किसी ख़ास युग में परमेश्वर जो भी नाम लेता है, वह सिर्फ़ उस युग में उसके द्वारा अभिव्यक्त स्वभाव और उसके द्वारा किये गये कार्य को दर्शाता है। उदाहरण के लिये, व्यवस्था के युग में परमेश्वर के कार्य को दर्शाने के साथ-साथ उसके स्वभाव के प्रतापी, क्रोधपूर्ण, दयावान और शापित करने वाले पहलुओं को व्यक्त करने के लिये यहोवा नाम का इस्तेमाल किया गया। यहोवा के नाम से, परमेश्वर ने नियमों और आज्ञाओं की घोषणा की, इंसान को धरती पर अपना जीवन जीने के लिए मार्गदर्शन दिया। इसके फलस्वरूप, लोगों का व्यवहार अधिक से अधिक नियमित हो गया और उन्होंने परमेश्वर की आराधना करने का तरीका सीख लिया। चूंकि व्यवस्था के युग का अंत आते-आते शैतान ने इंसान को अधिक से अधिक भ्रष्ट कर दिया था, उसने नियमों और आज्ञाओं का पालन करना बंद कर दिया, वह दंड पाने और मृत्यु का भागी बनने के जोखिम के दायरे में आ गया। नियमों की कड़ाई से लोगों को बचाने के लिये, परमेश्वर ने यीशु के नाम से उद्धार का कार्य पूरा किया, इस तरह अनुग्रह के युग की शुरुआत हुई और व्यवस्था के युग का अंत हुआ। परमेश्वर ने अपना स्नेही और दयावान स्वभाव व्यक्त किया, पश्चाताप का मार्ग बताया और आख़िरकार स्वयं सूली पर चढ़कर इंसान को छुटकारा दिलाया। जिन लोगों ने प्रभु यीशु को उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार किया था और प्रभु के नाम से प्रार्थना करके अपने पापों को क़ुबूल करते हुए पश्चाताप किया था, उन सभी को क्षमा कर दिया गया। इससे हम यह देख सकते हैं कि हर युग में परमेश्वर द्वारा चुना गया नाम सार्थक है। हर नाम सिर्फ़ परमेश्वर के कार्य के एक हिस्से को और उसके स्वभाव के एक पहलू को दर्शाता है—एक नाम परमेश्वर की संपूर्णता को प्रतिबिंबित नहीं कर सकता। अगर अनुग्रह के युग में परमेश्वर यीशु के नाम से नहीं, बल्कि यहोवा के नाम से आया होता, तो परमेश्वर का कार्य व्यवस्था के युग से आगे नहीं बढ़ पाता, भ्रष्ट इंसानों के रूप में हमें कभी हमारे पापों से छुटकारा नहीं मिलता। इसके बजाय, नियमों और आज्ञाओं का उल्लंघन करने के कारण हमें दंडित किया जाता और हम मृत्यु के भागी बनते। इसी तरह, अगर अंत के दिनों में लौटकर आये परमेश्वर को अब भी यीशु कहा जाता, तो परमेश्वर का कार्य अनुग्रह के युग से आगे नहीं बढ़ पाता। हमारे पापों को क्षमा कर दिया जाता, लेकिन हम अब भी पाप करके उसे स्वीकार करने के दुष्चक्र में फंसे होते और पाप के बंधनों से मुक्त होकर शुद्धता हासिल नहीं कर पाते। इस तरह, पाप के बंधनों से पूरी तरह मुक्त होने और शुद्धता हासिल करने के लिये, परमेश्वर ने एक बार फिर देहधारण किया है, ताकि वह अपने वचन व्यक्त कर सके और न्याय एवं शुद्धिकरण का अपना कार्य कर सके। इस तरह राज्य का युग स्थापित किया जाएगा और अनुग्रह के युग का अंत होगा। युग बदलने के साथ परमेश्वर का नाम भी बदलकर 'सर्वशक्तिमान परमेश्वर' हो गया है, जो प्रकाशित वाक्य की पुस्तक के अध्याय 1, पद 8 की इस भविष्यवाणी को पूरा करता है, 'प्रभु परमेश्‍वर, जो है और जो था और जो आनेवाला है, जो सर्वशक्‍तिमान है, यह कहता है, मैं ही अल्फ़ा और ओमेगा हूँ।'"

भाई-बहनों की सहभागिता से, मुझे यह समझ आ गया कि कैसे बाइबल के इस अंश "यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एक–सा है" (इब्रानियों 13:8) का अर्थ यह नहीं है कि परमेश्वर का नाम कभी नहीं बदलेगा, इसके बजाय इसका अर्थ है कि परमेश्वर का सार अपरिवर्तनीय है। मैंने यह भी जाना कि परमेश्वर ने अपनी छह हज़ार सालों की प्रबंधन योजना को तीन युगों—व्यवस्था का युग, अनुग्रह का युग और राज्य का युग—में बाँटा है और कार्य के प्रत्येक नये चरण के साथ परमेश्वर उस युग के दौरान अपने कार्य और स्वभाव को दर्शाने के लिये एक नया नाम लेता है। साथ ही, एक नये युग की शुरुआत करने के लिये वह एक नए नाम को अपनाने का तरीका चुनता है। हर युग में परमेश्वर का नाम कितना सार्थक है! अगर, जैसा कि पहले मेरा मानना था, परमेश्वर का नाम कभी नहीं बदला और लौटकर आने पर भी उसका नाम यीशु ही था, क्या उसका कार्य स्थिर ही नहीं बना रहता?

सभा के बाद मैंने प्रकाशित वाक्य की पुस्तक के कुछ अंशों पर फिर से गौर किया: "प्रभु परमेश्‍वर, जो है और जो था और जो आनेवाला है, जो सर्वशक्‍तिमान है, यह कहता है, 'मैं ही अल्फ़ा और ओमेगा हूँ'" (प्रकाशितवाक्य 1:8)। "जो जय पाए उसे मैं अपने परमेश्‍वर के मन्दिर में एक खंभा बनाऊँगा, और वह फिर कभी बाहर न निकलेगा; और मैं अपने परमेश्‍वर का नाम और अपने परमेश्‍वर के नगर अर्थात् नये यरूशलेम का नाम, जो मेरे परमेश्‍वर के पास से स्वर्ग पर से उतरनेवाला है, और अपना नया नाम उस पर लिखूँगा" (प्रकाशितवाक्य 3:12)। इन अंशों को पढ़ने के बाद अचानक सब कुछ स्पष्ट हो गया और मैंने अपने मन में सोचा, "मैंने पहले भी इन दो अंशों को पढ़ा है, तो फिर मुझे कैसे पता नहीं चला कि इनका वास्तव में क्या अर्थ है? बाइबल के ये दो अंश स्पष्ट रूप से बताते हैं कि कैसे जब परमेश्वर अंत के दिनों में लौटता है, तो उसे यीशु नहीं कहा जाएगा और उसका नया नाम 'सर्वशक्तिमान' होगा। मैंने हमेशा बाइबल के उस उद्धरण से चिपकी रही थी जिसमें कहा गया है, 'यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एक–सा है' (इब्रानियों 13:8), यह सोचकर कि परमेश्वर का नाम कभी नहीं बदलेगा, लेकिन मैंने बाइबल के अन्य अंशों की जांच करने की बात कभी नहीं सोची, मैं लगातार अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को अस्वीकार करती रही और उसका विरोध करती रही। कितनी अनजान थी मैं!" भाई-बहनों की सहभागिता और परमेश्वर के नाम के संबंध में बाइबल की भविष्यवाणियों के माध्यम से, अब अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा चुने गए नाम को लेकर मेरे मन में कोई संदेह नहीं रह गया था।

बाद में, कभी एक सभा के दौरान हमने परमेश्वर के वचनों का दूसरा अंश पढ़ा: "एक समय मुझे यहोवा के नाम से जाना जाता था। मुझे मसीहा भी कहा जाता था, और लोगों ने कभी मुझे उद्धारकर्त्ता यीशु कहा था क्योंकि वे मुझ से प्रेम करते थे और मेरा आदर करते थे। किन्तु आज मैं वह यहोवा या यीशु नहीं हूँ जिसे लोग बीते समयों में जानते थे—मैं वह परमेश्वर हूँ जो अंत के दिनों में वापस आ गया है, वह परमेश्वर जो युग को समाप्त करेगा। वह परमेश्वर मैं स्वयं हूँ जो अपने स्वभाव की परिपूर्णता के साथ, और अधिकार, आदर एवं महिमा से भरपूर होकर पृथ्वी के छोरों से उदय होता है। लोग कभी भी मेरे साथ संलग्न नहीं हुए हैं, मुझे कभी जाना नहीं है, और मेरे स्वभाव से हमेशा अनभिज्ञ रहे हैं। संसार की रचना के समय से लेकर आज तक, एक मनुष्य ने भी मुझे नहीं देखा है। यह वही परमेश्वर है जो अंत के दिनों के दौरान मनुष्यों पर प्रकट होता है किन्तु वह मनुष्य के बीच में छुपा हुआ है। वह, सामर्थ्य से भरपूर और अधिकार से लबालब भरा हुआ, धधकते हुए सूरज और दहकती हुई आग के समान, सच्चे और वास्तविक रूप में, मनुष्यों के बीच निवास करता है। कोई ऐसा मनुष्य या चीज़ नहीं है जिसका न्याय मेरे वचनों के द्वारा नहीं किया जाएगा, और कोई ऐसा मनुष्य या चीज़ नहीं है जिसे आग की जलती हुई लपटों के माध्यम से शुद्ध नहीं किया जाएगा। अंततः, मेरे वचनों के कारण सारे राष्ट्र धन्य हो जाएँगे, और मेरे वचनों के कारण टुकड़े-टुकड़े भी कर दिए जाएँगे। इस तरह, अंत के दिनों के दौरान सभी लोग देखेंगे कि मैं ही वह उद्धारकर्त्ता हूँ जो वापस लौट आया है, मैं ही वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूँ जो समस्त मानवजाति को जीतता है, और मैं ही एक समय मनुष्य के लिए पाप बलि था, किन्तु अंत के दिनों में मैं सूरज की ज्वाला भी बन जाता हूँ जो सभी चीज़ों को जला देती है, और साथ ही मैं धार्मिकता का सूर्य भी बन जाता हूँ जो सभी चीज़ों को प्रकट कर देता है। अंत के दिनों का मेरा कार्य ऐसा ही है। मैंने इस नाम को अपनाया है और मैं इस स्वभाव से सम्पन्न हूँ ताकि सभी लोग देख सकें कि मैं धर्मी परमेश्वर हूँ, धधकता हुआ सूरज हूँ, और दहकती हुई आग हूँ। ऐसा इसलिए है ताकि सभी मेरी, एकमात्र सच्चे परमेश्वर की, आराधना कर सकें, और ताकि वे मेरे असली चेहरे को देख सकें: मैं न केवल इस्राएलियों का परमेश्वर हूँ, और न मात्र छुटकारा दिलाने वाला हूँ—मैं समस्त आकाश, पृथ्वी और महासागरों के सारे प्राणियों का परमेश्वर हूँ" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "उद्धारकर्त्ता पहले ही एक 'सफेद बादल' पर सवार होकर वापस आ चुका है")।

बहन शिलिंग ने सहभागिता करते हुए कहा, "अंत के दिनों में, परमेश्वर ने 'सर्वशक्तिमान परमेश्वर' के नाम से राज्य के युग में वचनों द्वारा न्याय का कार्य शुरू किया है और इंसान के सामने अपने न्यायी, प्रतापी स्वभाव को प्रकट किया है जो कोई अपराध सहन नहीं करता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त किये गए वचन शैतान के हाथों इंसान की भ्रष्टता की सच्चाई को और परमेश्वर के प्रति हमारे विरोध के स्रोत को उजागर करते हैं। परमेश्वर के वचन हमारे विद्रोही और अन्यायी स्वभाव का न्याय करते हैं, हमें वह मार्ग और दिशा दिखाते हैं जिसका अनुसरण करना हमारे स्वभावों को परिवर्तित करने के लिये आवश्यक है। अगर हम सभी चीज़ों में सत्य की खोज करने पर हमारा ध्यान केंद्रित करते हैं, हमारे भ्रष्ट स्वभावों को जड़ से मिटाने के लिये सत्य का उपयोग करते हैं और दूसरों के साथ परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप व्यवहार करते हैं, तो हम धीरे-धीरे हमारे भ्रष्ट स्वभावों से छुटकारा पा सकते हैं और परमेश्वर का पूर्ण उद्धार हासिल कर सकते हैं। जब धरती पर सर्वशक्तिमान परमेश्वर का कार्य पूरा हो जाएगा, तब उन सभी लोगों को जिन्होंने अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को स्वीकार किया था और परमेश्वर के शुद्दिकरण एवं उद्धार को हासिल किया था, परमेश्वर द्वारा उनके राज्य में ले जाया जाएगा, ताकि वे परमेश्वर के आशीषों और उनके वादे का आनंद उठा सकें। जिन लोगों ने अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को अस्वीकार कर दिया था और उसका विरोध, निंदा, अपमान और तिरस्कार किया था, उन सभी को अंत के समय की भीषण आपदाओं का सामना करना होगा और परमेश्वर द्वारा उन्हें दंडित करके नष्ट कर दिया जाएगा। इसलिये, परमेश्वर अपने उस न्यायी, प्रतापी स्वभाव को व्यक्त करने के लिए, जो इंसानों के किसी भी अपराध को सहन नहीं करता है, 'सर्वशक्तिमान परमेश्वर' का नाम लेता है, वह लोगों को उनके प्रकार के अनुसार अलग-अलग करता है, शैतान के इस युग का अंत करता है और परमेश्वर की छह हज़ार सालों की प्रबंधन योजना के सभी कार्यों को पूरा करता है। परमेश्वर चाहता है कि हम इस बात को समझें कि वह न सिर्फ़ सभी चीज़ों का मालिक और सृजनकर्ता है बल्कि वह हमारी पाप बलि के तौर पर भी काम करता है, वह इंसान को पूर्ण, परिवर्तित और शुद्ध करता है। परमेश्वर ही सबसे पहला और सबसे आख़िरी है, इंसान उसके चमत्कारी कार्यों की थाह नहीं पा सकता। इस तरह, परमेश्वर द्वारा 'सर्वशक्तिमान परमेश्वर' का नाम लिया जाना खास तौर पर सार्थक है। वर्तमान में, पवित्र आत्मा सिर्फ़ सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम से किये गए कार्य की सुरक्षा करता है। वे सभी लोग जो अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करते हैं और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम से प्रार्थना करते हैं, पवित्र आत्मा के कार्य और जीवन जल की आपूर्ति को हासिल कर सकते हैं। अनुग्रह के युग की कलीसियाएं उजाड़ और वीरान हो गई हैं—उनके विश्वासियों की आस्था ठंडी पड़ गई है, उनके उपदेशों में सार की कमी है, वे प्रार्थना में अप्रभावित रहते हैं, उनमें से ज़्यादातर लोग सांसारिक प्रवृत्तियों की ओर आकर्षित हो गए हैं। उनकी समस्याओं का सार इस तथ्य में निहित है कि परमेश्वर नया कार्य कर रहा है और पवित्र आत्मा का कार्य अनुग्रह के युग की कलीसियाओं से राज्य के युग की कलीसियाओं में स्थानांतरित हो गया है। वे मेमने के पदचिह्नों पर चलने में विफल रहे हैं, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्याय कार्य को समझने में नाकाम रहे हैं और इस तरह वे जीवन जल की आपूर्ति नहीं प्राप्त कर सकते और वे अँधेरे में डूब जाएंगे जहाँ से निकलने का कोई रास्ता नहीं होगा।"

परमेश्वर के वचनों को पढ़कर और बहन की सहभागिता को सुनकर, मुझे परमेश्वर द्वारा अलग-अलग युग में अलग-अलग नाम लिये जाने का अर्थ पूरी तरह से समझ में आ गया। मैंने परमेश्वर के न्याय कार्य और अंत के दिनों में उनके द्वारा व्यक्त किये जाने वाले स्वभाव का ज्ञान भी हासिल हुआ—यह पाप के बंधनों से हमारे मुक्त होने और परमेश्वर द्वारा हमारे उद्धार के लिये महत्वपूर्ण है! इससे पता चला कि क्यों मैंने हाल के वर्षों में उपदेशों को सुनते हुये आपूर्ति का अनुभव नहीं किया था और क्यों मेरे भाई-बहनों का विश्वास कमज़ोर पड़ गया था और उनके उपदेशों में सार का अभाव था, इसका कारण यह था कि पवित्र आत्मा का कार्य पहले ही स्थानांतरित हो चुका था: अब पवित्र आत्मा सिर्फ़ सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम से किए गए कार्य की सुरक्षा करता है। चूंकि हम लोगों ने परमेश्वर के नये नाम को स्वीकार नहीं किया था और मेमने के पदचिह्नों पर चलने में विफल रहे थे, हम अँधेरे में गिर गये थे। तब मेरे दिल ने यह मान लिया कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर सचमुच लौटकर आये प्रभु यीशु हैं।

बाद में, मेरे भाई-बहनों ने सहभागिता करते हुए बताया कि असली कलीसियाओं को झूठी कलीसियाओं से अलग कैसे करें, शैतान के कार्य और पवित्र आत्मा के कार्य में अंतर कैसे करें। साथ ही, उन्होंने सत्य के अन्य पहलुओं के बारे में भी बताया। इन सहभागिताओं से मुझे काफ़ी लाभ हुआ। जब भी मैं भाई-बहनों के साथ मिलकर सुसमाचार की फ़िल्में और वीडियो देखती, तो मुझे आध्यात्मिक पूर्णता का एहसास होता और मेरे दिल में शांति और सुरक्षा की भावना भर जाती। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों ने मेरे उन सवालों का समाधान कर दिया था जो प्रभु में मेरी आस्था के दौरान पहले मेने मन में उठते थे। साथ ही, मेरे जीवन की कई समस्याओं का भी समाधान हो गया था। मुझ में विश्वास की वह भावना भी फिर से प्रबल हो गई जो प्रभु में विश्वास की शुरुआत में मेरे मन में थी। मुझे इस बात की खुशी थी कि परमेश्वर ने अपने अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार करने के लिये मुझे चुना था और मैं मेमने के पदचिह्नों पर चलने लगी। अब, मैं हर दिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़ती हूँ। इन वचनों को मैं जितना अधिक पढ़ती हूँ उतनी ही रोशनी मेरे हृदय में भरती जाती है और अपने दिल की गहराइयों से मुझे यह यकीन है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन सत्य और परमेश्वर की वाणी हैं। मुझे पूरी तरह यकीन हो गया कि परमेश्वर प्रकट हो गये हैं और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के रूप में कार्य कर रहे हैं। मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम को स्वीकार कर लिया और आधिकारिक तौर पर सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के साथ जुड़ गई। मुझे बचाने के लिये सर्वशक्तिमान परमेश्वर का धन्यवाद!

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