79. प्रसिद्धि और लाभ की बेड़ियों से मैं कैसे आजाद हुई

सू मी, चीन

2002 में, मैं 18 साल की थी और एक कपड़ा फैक्ट्री में काम करती थी। जब भी मैं टीवी नाटकों के मुख्य पात्रों को सोने-चाँदी से लदे, सुंदर और फैशनेबल कपड़े पहने देखती, आलीशान कोठियों में रहते और बढ़िया गाड़ियाँ चलाते देखती, जहाँ भी वे जाते उनकी आगवानी और विदाई बड़े जोश से होते और उन्हें बहुत शानदार लगते देखती तो मुझे उस तरह की जिंदगी से ईर्ष्या होती थी। मैं सपने देखती कि जब मैं परिवार शुरू करूँगी तो मैं ऐसा ही रुतबे वाला जीवन जीने के लिए कड़ी मेहनत करूँगी। मेरा सपना पूरा करने के लिए, हमारी शादी के कुछ ही समय बाद मैं और मेरे पति काम करने के लिए बाहर चले गए। ज्यादा पैसे कमाने के लिए, सात या आठ महीने की गर्भवती होने पर भी मैं हर दिन दस घंटे से ज्यादा कपड़े सिलने का काम करती थी। लंबे समय तक थकान की वजह से, मेरी सेहत काफी गिर गई और मेरा वजन अचानक दस पाउंड से ज्यादा घट गया। ज्यादा देर तक बैठे रहने और कम पानी पीने की वजह से मेरे पति के गुर्दे में पथरी हो गई और वह अब मेरे साथ कपड़े बनाने का काम नहीं कर सकता था। बाद में, मेरे पति को एक कंपनी में नौकरी मिल गई और जल्दी ही उसने बॉस का भरोसा जीत लिया। बॉस ने उसे कंपनी के कई मामले सौंप दिए और कुछ सालों के बाद, हमने कुछ बचत कर ली और हमने शहर में घर खरीदने के लिए लोन ले लिया। मेरे पति का करियर अच्छा चल रहा था और हमने एक कार भी खरीदने की योजना बनाई। जब भी हम अपने गाँव वापस जाते तो गाँव वाले हमारी तारीफ करते कि हम इतनी कम उम्र में शहर में बस गए हैं और काबिल होने के लिए हमारी सराहना करते। ऐसी तारीफ सुनकर, मुझे बहुत गर्व महसूस होता और ऐसा लगता मानो मैं हवा में उड़ रही हूँ। मैंने सोचा कि पैसे होना बहुत अच्छी बात है—मैं जहाँ भी जाती, मेरी तारीफ और प्रशंसा होती। लेकिन धीरे-धीरे, मुझे अंदर एक अजीब सा खालीपन महसूस होने लगा। मैं महंगे कपड़े और स्किनकेयर का सामान खरीदने जाती, या अलग-अलग जगहों पर घूमने जाती, लेकिन कोई भी चीज मेरे दिल का खालीपन नहीं भर सकी। मैं खुद से पूछे बिना नहीं रह सकी, “आखिर मैंने पैसे कमाने के लिए इतनी कड़ी मेहनत किसलिए की है? क्या सिर्फ अच्छा खाने, पहनने और रहने और लोगों की तारीफ पाने के लिए? लेकिन यह सब पाने के बाद भी मुझे अंदर से इतना खालीपन क्यों महसूस हो रहा है?” मैं इसी तरह हर दिन बेमन से गुजारती रही, जीवन से बहुत थकान महसूस कर रही थी।

2019 में, मेरे पति की कंपनी एक आर्थिक विवाद में फँस गई। मेरा पति कंपनी के वित्त का इंचार्ज था, इसलिए वह भी इसमें फँस गया। हमें मुआवजे के तौर पर 4,00,000 युआन चुकाने पड़े। मेरे पति पर भी मुकदमा चलाया गया और आखिरकार उसे साढ़े चार साल की जेल की सजा सुनाई गई। मुझे लगा जैसे मेरी दुनिया ढह रही है। मेरा पति हमारे परिवार का आधार स्तंभ था। उसके जेल में होने से, ऐसा कोई नहीं था जो पैसे कमा सके या हमारा भरण-पोषण कर सके। हमें अभी भी हर महीने गिरवी रखे घर की किश्त चुकानी थी, साथ ही हमारे दोनों बच्चों की पढ़ाई और दैनिक खर्च भी उठाने थे। हमने मुआवजा चुकाने के लिए भी बहुत सारा पैसा उधार लिया था। यह सारा दबाव अकेले मुझ पर आ पड़ा था। आर्थिक बोझ के अलावा, मुझे अपने आस-पास के लोगों की हिकारत और तिरस्कार भरी नजरें भी सहनी पड़ती थीं। जीते रहना बहुत कष्टदायक लगता था और मैंने सोचा कि इससे तो मेरा मर जाना ही बेहतर होगा। लेकिन मेरे दोनों बच्चे अभी छोटे थे और यही वह समय था जब उन्हें मेरी देखभाल की जरूरत थी, मैं उन्हें छोड़ना सह नहीं सकती थी। मैं हर दिन रोती थी, यह न जानते हुए कि मैं भविष्य का सामना कैसे करूँगी। ठीक जब मुझे लगा कि कोई रास्ता नहीं बचा है, मेरी माँ ने मुझे अंत के दिनों का सर्वशक्तिमान परमेश्वर का सुसमाचार सुनाया। परमेश्वर के वचन पढ़ने और भाई-बहनों की संगति सुनने से, मुझे समझ आया कि शुरुआत में लोग अदन की वाटिका में रहते थे और उन्हें कोई चिंता, दुख या दर्द नहीं था। लेकिन शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद लोगों में कई तरह की महत्वाकांक्षाएँ, इच्छाएँ और अपने अनुसरण को लेकर गलत नजरिए पैदा हो गए। इसीलिए इतना ज्यादा दुख और तकलीफ है। इस बार, परमेश्वर कार्य करने आया है ताकि वह इंसान को शैतान के नुकसान से आजाद करे और उसका वह जीवन पुनर्स्थापित कर दे जो अदन की वाटिका में कभी इंसान के पास था। केवल अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर का उद्धार स्वीकार करके ही कोई शैतान के नुकसान से आजाद हो सकता है और परमेश्वर का उद्धार पा सकता है। मुझे लगा जैसे मुझे कोई सहारा मिल गया है और मेरे दिल का दर्द काफी कम हो गया। मैं सभाओं में जाने और परमेश्वर के वचन पढ़ने के लिए तैयार हो गई।

उसके बाद, मैं कपड़े बनाने के साथ-साथ सभाओं में भी जाने लगी। चूँकि मैं कपड़े बनाने में माहिर थी, इसलिए मेरी कमाई से न केवल मेरे परिवार का दैनिक खर्च चलता था बल्कि मैं कुछ बचत भी कर लेती थी। मैंने फिर से भविष्य के लिए योजनाएँ बनाईं, यह सोचते हुए, “अगर मैं कुछ और साल काम करती रहूँ, तो मेरे हालात बेहतर हो जाएँगे और तब दूसरे लोग मुझे नीची नजर से नहीं देखेंगे और गरीब होने के लिए मेरा मजाक नहीं उड़ाएँगे।” लेकिन मुझे हफ्ते में तीन बार सभाओं में जाना पड़ता था और हालाँकि यह मेरे जीवन प्रवेश के लिए फायदेमंद था लेकिन इसका मतलब था कि मैं कम घंटे काम करती थी और पहले से कम पैसे कमाती थी। तो मैंने सोचा, “क्या मैं अपनी सभाएँ घटाकर हफ्ते में सिर्फ एक बार कर सकती हूँ? इस तरह, मैं हर महीने कुछ हजार युआन ज्यादा कमा सकूँगी, और घर की किश्त चुकाने के बाद भी, मेरे पास अतिरिक्त पैसे बचेंगे। अगर मैं कुछ साल बचत कर लूँ तो मैं अपना कर्ज चुका सकूँगी और अगर फिर मैं गाड़ी खरीद पाई तो मैं सिर उठाकर बाहर निकल सकूँगी।” बाद में, सभाओं में भाई-बहनों के साथ संगति के जरिए, मुझे एहसास हुआ कि अगर मैंने सिर्फ पैसे कमाने पर ध्यान दिया और नियमित रूप से सभाओं में नहीं जा पाई, तो मैं परमेश्वर से और दूर होती जाऊँगी। तो फिर मैं परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा कैसे पा सकूँगी? जब आपदाएँ आती हैं तो पैसे से इंसान की जान वापस नहीं खरीदी जा सकती! मुझे याद आया मैंने सुना था कि महामारी के दौरान सुरक्षात्मक कपड़े बनाने में बहुत मुनाफा था, इसलिए कुछ लोगों ने ऐसा करने के लिए दिन-रात काम किया और आखिरकार फैक्ट्री में ही मर गए। पैसे के लिए जान देने के ऐसे बहुत सारे मामले थे। मुझे शैतान की चालों की असलियत देखनी थी और पैसे की खातिर जीवन पाने का मौका नहीं गँवाना था। मुझे नियमित रूप से सभाओं में जाना जारी रखना था। शुरू में, मैं अभी भी हफ्ते में तीन बार सभाओं में जा पा रही थी, लेकिन कुछ समय बाद, जब कम काम करने की वजह से मेरा मासिक वेतन काफी कम हो गया तो मुझे चिंता होने लगी, “ज्यादा सभाओं में जाने से मुझे और सत्य समझने में मदद मिलेगी और मेरे जीवन प्रवेश को फायदा होगा, लेकिन अभी फैक्ट्री के पास बहुत सारे ऑर्डर हैं और वेतन ज्यादा है। यह पैसे कमाने का अच्छा समय है। अगर मैंने यह ज्यादा माँग का समय गँवा दिया तो बाद में कारोबार मुश्किल होगा और तब चाहे मैं कितने भी कपड़े बना लूँ, उनसे ज्यादा मुनाफा नहीं होगा। नहीं, मुझे अभी पैसे को प्राथमिकता देनी होगी। जब फैक्ट्री में काम कम होगा तब मैं ज्यादा सभाओं में जाऊँगी।” इसलिए मैंने हफ्ते में दो बार सभाओं में जाने का फैसला किया। हर सभा के बाद, मैं काम करने के लिए फैक्ट्री भागती और दूसरों की छुट्टी होने के बाद भी मैं काम करती रहती। उस दौरान, मुझे बहुत थकान महसूस होती थी, मेरे पास परमेश्वर के वचन पढ़ने का समय नहीं था, मुझे समझ नहीं आता था कि प्रार्थना में क्या कहूँ और मेरा दिल परमेश्वर से दूर और दूर होता गया।

बाद में, कम माँग होने के दौरान फैक्ट्री कुछ समय के लिए बंद हो गई। मैं इस छुट्टी का इस्तेमाल और सभाओं में जाने और खुद को और सत्यों से सुसज्जित करने के लिए कर सकती थी लेकिन मैं जल्दी से और पैसे कमाना चाहती थी ताकि वही प्रशंसा पा सकूँ जो अमीर होने पर मुझे मिलती थी, इसलिए मैं सुरक्षात्मक कपड़े बनाने के लिए दूसरी फैक्ट्री में चली गई। कभी-कभी, ज्यादा कमाने के लिए मैं छुट्टी होने के बाद भी रुकी रहती थी और जब तक मैं घर पहुँचती, मेरी बहन सभा में शामिल होने के लिए पहले से ही मेरा इंतजार कर रही होती थी। लेकिन दिन भर काम करने के बाद मेरा पूरा शरीर दुख रहा होता था और मेरे हाथों में इतना दर्द होता था कि मैं उन्हें उठा भी नहीं पाती थी। मैं बस जल्दी आराम करना चाहती थी और इसलिए सभाएँ असरदार नहीं होती थीं। ज्यादा कमाने के लिए मैं नाश्ता बनाने के लिए रोज सुबह 5:30 बजे उठ जाती थी और समय बचाने के लिए, मैं अपना दोपहर का खाना फैक्ट्री साथ ले जाती थी। लंबे समय तक खाने की अनियमित आदतों और हमेशा ठंडा खाना खाने की वजह से, एक महीने बाद, एक दिन मुझे अचानक बहुत तेज उल्टी और दस्त होने लगे। डॉक्टर ने कहा कि मुझे एक्यूट गैस्ट्रोएंटेराइटिस हो गया है, जो काफी गंभीर था और मुझे ठीक होने के लिए घर पर ही रहना होगा। बिस्तर पर लेटे हुए, मैं विचार करने लगी, “मैं न अपनी आध्यात्मिक भक्ति करती रही हूँ, न ही नियमित रूप से सभाओं में जाती रही हूँ। मेरा ध्यान बस पैसे कमाने और लोगों की तारीफ पाने के लिए अच्छा जीवन जीने पर लगा है। क्या यह परमेश्वर के इरादे के खिलाफ नहीं है?” एक सभा के दौरान, एक बहन ने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा जो विशेष रूप से मेरी दशा के बारे में था : “अय्यूब का परमेश्वर पर विश्वास कोई नाममात्र के लिए नहीं था; वह एक सच्चे विश्वासी का आदर्श प्रतिनिधि था। वह हर चीज में परमेश्वर से प्रार्थना करता था। वह अपने बच्चों की मौज-मस्ती से असहज था और उसने परमेश्वर से प्रार्थना की और उन्हें परमेश्वर को सौंप दिया। निश्चित रूप से वह अक्सर अपने मवेशियों के पालन-पोषण के लिए भी प्रार्थना करता था। उसने अपना सब कुछ परमेश्वर को सौंप दिया था। यदि वह एक गैर-विश्वासी की तरह होता जो हमेशा मनुष्य की इच्छा से अपने मवेशियों के पालन-पोषण की योजना बनाता और विचार करता रहता है, जो अपने बनाए हुए लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए केवल अपने दिमाग और कल्पना पर भरोसा करता है और अपना दिमाग चलाता है, तब अगर उसे अनेक असफलताओं और नाकामियों का अनुभव भी करना पड़े, तो क्या वह इसमें परमेश्वर के हाथ और उसकी संप्रभुता और व्यवस्थाओं को देख पाएगा? ... लोग अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए परमेश्वर पर भरोसा करने की जगह मानव तरीकों का उपयोग करके अपना दिमाग क्यों मथते रहते हैं? जब वे कोई योजना बनाते हैं, तो क्या वे परमेश्वर की आकांक्षाएँ खोजते हैं? क्या उनका रवैया आज्ञाकारी होता है और वह यह कहते हैं, ‘मुझे नहीं पता कि परमेश्वर क्या करने जा रहा है। पहले मैं यह योजना बना लेता हूँ और सारा आकलन कर लेता हूँ, लेकिन मुझे यह नहीं पता कि मैंने जो लक्ष्य बनाया है उसे मैं हासिल कर पाऊँगा या नहीं; यह बस एक योजना ही है। यदि अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया, तो यह परमेश्वर का आशीष होगा। यदि नहीं किया, तो इसका कारण मेरा अपना अंधापन होगा; मेरी योजना परमेश्वर के इरादों के अनुरूप नहीं थी’? क्या उनका रवैया ऐसा है? (नहीं।) तो ऐसे काम करने का तरीका कैसे शुरू होता है? ये सब मानवीय कल्पनाएँ और धारणाएँ, मानवीय इच्छाएँ, परमेश्वर से मनुष्यों की अनुचित अपेक्षाएँ हैं; ये सब भ्रष्ट स्वभावों से उत्पन्न होती हैं। यह तो इसका एक पहलू है। इसके अतिरिक्त, क्या ऐसे लोगों के पास परमेश्वर के प्रति समर्पण करने वाला दिल है? (नहीं।) तुम्हें कैसे पता चलता है कि उनके पास परमेश्वर के प्रति समर्पण करने वाला दिल नहीं है? (एक बार योजना बना लेने पर उन्हें पूरा करने के लिए वे दृढ़निश्चयी हैं।) यह कैसा स्वभाव है? यह घमंड और विद्रोह है। उनका मानना है कि परमेश्वर उन्हें आशीष देता है, लेकिन जब उनकी अपनी इच्छाएँ और आकलन होते हैं, तो वे परमेश्वर को एक तरफ कर देते हैं, यह एक घमंडी स्वभाव है। जब वे परमेश्वर को एक तरफ कर देते हैं तो क्या वे समर्पण कर रहे होते हैं? वे नहीं कर रहे होते और परमेश्वर उनके दिल में नहीं होता। वे यह नहीं सोचते कि परमेश्वर कैसे चीजों पर संप्रभुता रखता है और उनकी व्यवस्था करता है और यह तो बिल्कुल भी नहीं सोचते कि वह कैसे काम करना चाहता है। वे इन मामलों के बारे में बिल्कुल भी नहीं सोचते। इससे क्या समझा जा सकता है? वे कोई खोज नहीं करते, न ही वे समर्पण करते हैं, न ही उनके पास परमेश्वर से डरने वाला दिल है। वे पहले अपनी योजनाएँ बनाते हैं, फिर इसके बाद, वे परमेश्वर के इरादों के बारे में सोचे बिना, मानवीय तरीकों, कल्पनाओं और धारणाओं पर भरोसा करते हुए, अपनी योजनाओं के अनुसार कार्य करते हैं और बहुत मेहनत करते हैं। जब मवेशियों के पालन-पोषण की बात आती है, तो लोगों को कम से कम अपने दिल में यह जान लेना चाहिए कि ‘मनुष्य को अपना काम करने और स्वर्ग की इच्छा के प्रति समर्पण करने की पूरी कोशिश करनी चाहिए,’ अर्थात : ‘मैं अपने मवेशियों को खिलाने की अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करूँगा, मैं उनमें पोषण की कमी नहीं होने दूँगा, या ठंड नहीं लगने दूँगा, या भूखा नहीं रहने दूँगा, या बीमार नहीं पड़ने दूँगा। यह परमेश्वर के हाथ में है कि अगले वर्ष उनकी कितनी संतानें होंगी; मुझे यह नहीं पता, मैं इसकी माँग नहीं करता और मैं इसके लिए कोई योजनाएँ नहीं बनाऊँगा। ये सभी मामले परमेश्वर के हाथों में हैं।’ यदि वे अपने कार्यों के लिए मानवीय धारणाओं और कल्पनाओं पर भरोसा करने पर जोर देते हैं, तो क्या परमेश्वर के प्रति उनका रवैया आज्ञाकारी है? (नहीं।) इन दोनों काम करने के तरीकों में से कौन-सा मानव की मर्जी पर आधारित है, और कौन-सा परमेश्वर के प्रति समर्पित है? (पहला तरीका मनुष्य की मर्जी पर आधारित है और यह छद्म-विश्वासियों के काम करने का तरीका है; काम करने का दूसरा तरीका उन लोगों का है जो पूरी निष्ठा से परमेश्वर पर विश्वास करते हैं और सत्य की खोज करते हैं।) वे सभी परमेश्वर में विश्वास रखते हैं और वे सभी एक ही काम करते हैं, लेकिन उनके कार्यों का मकसद, स्रोत और लक्ष्य, साथ ही उनके सिद्धांत अलग-अलग हैं। इस प्रकार, लोग जिस रास्ते पर हैं उसे देखा जा सकता है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर के प्रति समर्पित होने के अभ्यास के सिद्धांत)। बहन ने संगति की कि अय्यूब ऐसा व्यक्ति था जो परमेश्वर पर सच्चा विश्वास करता था। जीवन में, चाहे कुछ भी हो जाए, उसकी कोई निजी योजना या एजेंडा नहीं होता था और वह अपनी मर्जी के अनुसार काम नहीं करता था। सभी चीजों में, वह परमेश्वर की संप्रभुता और आयोजनों के प्रति समर्पित होता था। लेकिन अगर हम खुद को देखें, भले ही हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन हम उसकी संप्रभुता पर सच्चा विश्वास नहीं करते। हम हमेशा अपनी नियति बदलने के लिए अपने प्रयासों पर भरोसा करना चाहते हैं और नतीजतन, हम दुख और थकान में जीते हैं। बहन की संगति सुनते हुए मैं लगातार सिर हिलाती रही। मैंने सोचा कि कैसे, परमेश्वर को पाने से पहले, मैं हमेशा अपने प्रयासों पर भरोसा और अमीर बनने के लिए बेतहाशा काम करना चाहती थी। लेकिन अंत में, न केवल मैं अमीर बनने में नाकाम रही, बल्कि मुझ पर बहुत सारा कर्ज भी चढ़ गया। अब, मैं ज्यादा काम करने और पैसे कमाने के लिए अपने सिलाई के हुनर पर भरोसा करना चाहती थी। मैं अपनी पिछली अमीर जीवनशैली वापस पाना चाहती थी, इसलिए मैंने ओवरटाइम किया और पैसे कमाने के लिए जो कर सकती थी किया, लेकिन अंत में मैंने खुद को थका दिया और बीमार कर लिया और जो पैसे मैंने कमाए थे वे लगभग सारे इलाज के खर्च में चले गए। मेरा भाग्य ऐसा कुछ नहीं है जिसकी मैं खुद योजना बना सकूँ और हिसाब लगा सकूँ। मैं सिर्फ कड़ी मेहनत करके वह प्रसिद्धि और लाभ नहीं पा सकती थी जिसकी मुझे इच्छा थी, क्योंकि सब कुछ परमेश्वर की संप्रभुता और आयोजनों के अधीन है। अब जब मैंने परमेश्वर को पा लिया है, अगर मैंने अब भी परमेश्वर की संप्रभुता पर विश्वास नहीं किया और अपनी नियति बदलने की कोशिश करने के लिए अपने प्रयासों पर भरोसा करती रही तो मैं बस एक अविश्वासी की तरह होऊँगी। मैं एक छद्म-विश्वासी होऊँगी। यह समझकर, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, मैं बहुत विद्रोही रही हूँ। मैं सब कुछ तेरे हाथों में सौंपने के लिए तैयार हूँ।” उसके बाद, मैं नियमित रूप से सभाओं में जाने लगी और अपनी पूरी क्षमता से अपने कर्तव्य करने लगी।

एक दिन, अपनी आध्यात्मिक भक्ति के दौरान, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक भजन सुना, जिसका शीर्षक था “मानव के भविष्य पर परमेश्वर विलाप करता है” :

1  दुनिया के विशाल विस्तार में अनगिनत बार गाद भरने से महासागर खेतों में बदल जाते हैं और खेत बाढ़ से महासागरों में बदल जाते हैं। सिवाय उसके जो सभी चीजों पर संप्रभुता रखता है, ऐसा कोई नहीं है जो इस मानवजाति की अगुआई और मार्गदर्शन कर सके। कोई ऐसा “पराक्रमी” नहीं है जो इस मानवजाति के लिए कड़ी मेहनत या तैयारी कर सकता हो, और ऐसा तो कोई भी नहीं है जो इस मानवजाति को प्रकाश की मंजिल की ओर ले जाने में अगुआई कर सके और इसे मानव संसार के अन्यायों से मुक्त करा सके। परमेश्वर मानवजाति के भविष्य पर विलाप करता है, वह मानवजाति के पतन पर शोक करता है, और उसे पीड़ा होती है कि मानवजाति कदम-दर-कदम क्षय और ऐसे मार्ग की ओर बढ़ रही है जहाँ से वापसी संभव नहीं है। किसी ने कभी यह नहीं सोचा है : जिस मानवजाति ने पूरी तरह परमेश्वर का दिल तोड़ दिया है और बुरे को खोजने के लिए परमेश्वर का त्याग कर दिया है, वह भला कहाँ जा रही होगी?

2  ठीक इसी कारण से कोई परमेश्वर के कोप को भाँपने की कोशिश नहीं करता, उस मार्ग को नहीं खोजता जो परमेश्वर को खुश करे या परमेश्वर के करीब आने की कोशिश नहीं करता, और इससे भी अधिक, कोई परमेश्वर के दुख और दर्द को समझने की कोशिश नहीं करता। परमेश्वर की वाणी सुनने के बाद भी मनुष्य अपने मार्ग पर चलता रहता है, परमेश्वर से दूर रहने, परमेश्वर के अनुग्रह और देखभाल से बचने, उसके सत्य से कतराने में लगा रहता है, अपने आप को परमेश्वर के दुश्मन, शैतान को बेचना पसंद करता है। और किसने इस बात पर कोई विचार किया है कि क्या मनुष्य को अपने हठीपन पर अड़े रहना चाहिए, परमेश्वर इस मानवजाति के साथ कैसा व्यवहार करेगा जो उसका इतना अत्यंत निरादर करती है?

3  कोई नहीं जानता कि मनुष्य को लेकर परमेश्वर के बार-बार के अनुस्मारकों और आग्रहों का कारण यह है कि उसने अपने हाथों में अभूतपूर्व विनाश तैयार कर लिए हैं, ऐसे विनाश जो मनुष्य की देह और आत्मा के लिए असहनीय होंगे, ये विनाश केवल देह का ही दंड नहीं होंगे, बल्कि मनुष्य की आत्मा को भी निशाना बनाएँगे। तुम्हें यह जानने की आवश्यकता है : जब परमेश्वर की योजना निष्फल होगी और जब उसके अनुस्मारकों और आग्रहों का कोई प्रतिदान नहीं मिलेगा तो वह किस प्रकार का क्रोप प्रकट करेगा? यह ऐसा होगा जिसे पहले कभी किसी सृजित प्राणी ने अनुभव किया या जाना नहीं होगा। और इसलिए मैं कहता हूँ, ये विनाश पहले कभी नहीं हुए और कभी दोहराए नहीं जाएँगे। क्योंकि परमेश्वर की योजना मानवजाति का केवल इस बार सृजन करने और उसे केवल इस बार बचाने की है। यह पहली बार है और यही अंतिम बार भी है। इसलिए परमेश्वर इस बार इंसान को जिन श्रमसाध्य इरादों और उत्साहपूर्ण प्रत्याशा से बचाता है, उन्हें कोई नहीं समझ सकता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है

जैसे ही मैंने बोलों पर विचार किया, मुझे लगा कि परमेश्वर मानव के भविष्य और मंजिल पर विलाप कर रहा है और साथ ही लगातार मानवता को याद दिला रहा है और प्रोत्साहित कर रहा है। वह उम्मीद करता है कि लोग उसके सामने आएँगे और उसका उद्धार स्वीकार करेंगे। ये वचन परमेश्वर की दिली अभिव्यक्तियाँ हैं, और एक-एक वचन वास्तविक और सत्य है। मैं अब और परमेश्वर के उद्धार से बच नहीं सकती और उसे ठुकरा नहीं सकती। मैंने सोचा कि कैसे, परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार करने के बाद, मैंने जाना कि परमेश्वर ही मनुष्य की नियति पर संप्रभु है और केवल परमेश्वर पर विश्वास करके और उसकी आराधना करके ही कोई मूल्यवान जीवन जी सकता है। लेकिन अमीरी का जीवन जीने और दूसरों की सराहना पाने के लिए, मैंने खुद को जी-जान से काम में झोंक दिया। मैंने सभाओं को बोझ माना, और परमेश्वर के साथ मेरे रिश्ते में दूरियाँ बढ़ती गईं। अगर मुझे बीमारी न हुई होती तो मैं अभी भी पैसे के पीछे भागने के भँवर में फँसी होती और बाहर नहीं निकल पाती। इस बारे में सोचकर, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, मैं पश्चात्ताप करना चाहती हूँ और पैसे के बंधन से आजाद होना चाहती हूँ, लेकिन मुझमें खुद को आजाद करने की ताकत नहीं है। मेरा मार्गदर्शन करो।” फिर मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया : “तुम्हें ध्यान से सुनना चाहिए! जो लोग होशियार हैं, वे जल्दी से सच को पहचान जाएंगे! उन सभी चीज़ों को त्याग दो, जिन्हें तुम छोड़ने के इच्छुक नहीं हो। मैं तुम्हें एक बार फिर बताता हूँ कि ये चीज़ें वास्तव में तुम्हारे जीवन के लिए हानिकारक हैं और इनका कोई लाभ नहीं है!(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 14)। परमेश्वर के वचनों से मुझे एहसास हुआ कि धन, प्रसिद्धि और लाभ के पीछे भागना मेरा जीवन बर्बाद कर देगा। ठीक लूत की पत्नी की तरह, जब परमेश्वर सदोम को नष्ट करने वाला था, वह अपनी संपत्ति का मोह नहीं छोड़ पाई और उसने पीछे मुड़कर देखने की जिद की और नतीजतन, वह नमक का खंभा बन गई। अगर मैंने सिर्फ तत्कालीन फायदों पर ध्यान दिया और सत्य का अनुसरण नहीं किया या स्वभाव में बदलाव की खोज नहीं की तो जब परमेश्वर का कार्य पूरा हो जाएगा, मैं उद्धार पाने का अपना मौका गँवा दूँगी। परमेश्वर के प्रेम और लोगों को बचाने के उसके तात्कालिक इरादों को समझते हुए मैंने और अधिक बार सभाओं में जाने और परमेश्वर के वचनों को ज्यादा खाने और पीने का फैसला किया। बाद में, मैं परमेश्वर के वचनों पर संगति करने के लिए भाई-बहनों के साथ अक्सर सभाओं में जाने लगी। हर दिन बहुत संतोषजनक होता था, और मेरी सेहत में जल्दी सुधार हो गया।

एक महीने बाद मेरी बीमारी में थोड़ा सुधार हुआ था। एक दिन मैं अपने मायके वापस गई और मेरी चाची, जो दूर से ही मेरा गर्मजोशी से स्वागत करती थी, उसने मुझे देखते ही मुँह फेर लिया और मुझे अनदेखा कर दिया। मेरी छोटी बहन, जो अपने दिल की भड़ास मेरे सामने निकालती थी और मुझे अपने मन की बात बताती थी, मेरे परिवार पर बुरा वक्त आने के बाद उसने मुझे अपने मन की बात बताना बंद कर दिया। यहाँ तक कि उसने कभी जानबूझकर तो कभी अनजाने में, मुझ पर कुछ ताने भी कसे। इससे मुझे कुछ बुरा महसूस हुआ। पहले, मैं जहाँ भी जाती थी मेरी तारीफ होती थी, लेकिन अब जब मेरे पास पैसे नहीं थे तो मेरी चाची मुझे अलग नजर से देखती थी और मेरी छोटी बहन भी अब मुझे गंभीरता से नहीं लेती थी। ऐसा लगता था कि पैसा होना ही बेहतर है—जब तुम्हारे पास पैसा होता है तभी दूसरे लोग तुम्हें गंभीरता से लेते हैं। इसलिए मैं कपड़ा फैक्ट्री में काम करने वापस चली गई। शुरू में, मैं तब भी नियमित रूप से सभाओं में जा पाती थी, लेकिन बाद में, जब मुझे एहसास हुआ कि मेरा वेतन मेरे सहकर्मियों से काफी कम है तो मैं सोचने लगी कि मैं अपनी सिलाई की रफ्तार कैसे बढ़ा सकती हूँ और ज्यादा पैसे कैसे कमा सकती हूँ। मेरा दिल बस काम में ही लगा रहता था। उस समय, मैं सभाओं में बस खानापूर्ति कर रही थी और जैसे ही सभाएँ खत्म होतीं, मैं तुरंत फैक्ट्री भागती। फैक्ट्री में, मैं बिना थके सिलाई मशीन का पैडल चलाती रहती। बस इसी तरह, मैं अपनी पुरानी जीवनशैली में वापस चली गई और एक मशीन की तरह, मैं हर दिन पैसे कमाने के लिए लगातार काम करती रही। मेरे पास परमेश्वर के वचन खाने या पीने का समय नहीं था और मेरा दिल परमेश्वर से और दूर होता गया। कभी-कभी, मुझे दोषी महसूस होता, मैं सोचती, “मैं पैसे का मोह क्यों नहीं छोड़ सकती? मैं परमेश्वर के सामने इतनी बेईमान क्यों हूँ और हमेशा अपनी बात से क्यों मुकर जाती हूँ?” मुझे खुद से नफरत होती थी, और मैं खुद को थप्पड़ मारना चाहती थी। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, मैं सभाओं में जाना चाहती हूँ और तुम्हारे वचनों को ठीक से खाना और पीना चाहती हूँ, लेकिन मैं पैसे कमाने की अपनी इच्छा नहीं छोड़ पा रही हूँ। कृपया मुझे पैसे के फंदे से बाहर निकालो।”

एक दिन एक सभा के दौरान, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और पैसे के पीछे भागने की अपनी जड़ के बारे में कुछ समझ हासिल की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “‘दुनिया पैसों के इशारों पर नाचती है’ यह शैतान का एक फ़लसफ़ा है। यह संपूर्ण मानवजाति में, हर मानव-समाज में प्रचलित है; तुम कह सकते हो, यह एक रुझान है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यह हर एक व्यक्ति के हृदय में बैठा दिया गया है, जिन्होंने पहले तो इस कहावत को स्वीकार नहीं किया, किंतु फिर जब वे जीवन की वास्तविकताओं के संपर्क में आए, तो इसे मूक सहमति दे दी, और महसूस करना शुरू किया कि ये वचन वास्तव में सत्य हैं। क्या यह शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने की प्रक्रिया नहीं है? ... शैतान लोगों को प्रलोभन देने के लिए धन का उपयोग करता है, और उन्हें भ्रष्ट करके उनसे धन की आराधना करवाता है और भौतिक चीजों की पूजा करवाता है। और लोगों में धन की इस आराधना की अभिव्यक्ति कैसे होती है? क्या तुम लोगों को लगता है कि बिना पैसे के तुम लोग इस दुनिया में जीवित नहीं रह सकते, कि पैसे के बिना एक दिन जीना भी असंभव होगा? लोगों की हैसियत इस बात पर निर्भर करती है कि उनके पास कितना पैसा है, और वे उतना ही सम्मान पाते हैं। गरीबों की कमर शर्म से झुक जाती है, जबकि धनी अपनी ऊँची हैसियत का मज़ा लेते हैं। वे ऊँचे और गर्व से खड़े होते हैं, जोर से बोलते हैं और अहंकार से जीते हैं। यह कहावत और रुझान लोगों के लिए क्या लाता है? क्या यह सच नहीं है कि पैसे पाने के लिए लोग कुछ भी बलिदान कर सकते हैं? क्या अधिक पैसे की खोज में कई लोग अपनी गरिमा और ईमान का बलिदान नहीं कर देते? क्या कई लोग पैसे की खातिर अपना कर्तव्य निभाने और परमेश्वर का अनुसरण करने का अवसर नहीं गँवा देते? क्या सत्य प्राप्त करने और बचाए जाने का अवसर खोना लोगों का सबसे बड़ा नुकसान नहीं है? क्या मनुष्य को इस हद तक भ्रष्ट करने के लिए इस विधि और इस कहावत का उपयोग करने के कारण शैतान कुटिल नहीं है? क्या यह दुर्भावनापूर्ण चाल नहीं है? जैसे-जैसे तुम इस लोकप्रिय कहावत का विरोध करने से लेकर अंततः इसे सत्य के रूप में स्वीकार करने तक की प्रगति करते हो, तुम्हारा हृदय पूरी तरह से शैतान के चंगुल में फँस जाता है, और इस तरह तुम अनजाने में इस कहावत के अनुसार जीने लगते हो। इस कहावत ने तुम्हें किस हद तक प्रभावित किया है? हो सकता है कि तुम सच्चे मार्ग को जानते हो, और हो सकता है कि तुम सत्य को जानते हो, किंतु उसकी खोज करने में तुम असमर्थ हो। हो सकता है कि तुम स्पष्ट रूप से जानते हो कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, किंतु तुम सत्य को पाने के लिए क़ीमत चुकाने का कष्ट उठाने को तैयार नहीं हो। इसके बजाय, तुम बिल्कुल अंत तक परमेश्वर का विरोध करने में अपने भविष्य और नियति को त्याग दोगे। चाहे परमेश्वर कुछ भी क्यों न कहे, चाहे परमेश्वर कुछ भी क्यों न करे, चाहे वह प्रेम कितना गहरा और कितना महान क्यों न हो जो परमेश्वर को तुम्हारे प्रति है, जहाँ तक तुम समझने में समर्थ हो, तुम फिर भी हठपूर्वक अपने रास्ते पर ही चलते रहने का आग्रह करोगे और इस कहावत की कीमत चुकाओगे। कहने का तात्पर्य यह है कि यह कहावत पहले ही तुम्हारे विचारों को गुमराह और नियंत्रित कर चुकी है, यह पहले ही तुम्हारे व्यवहार को नियंत्रित कर चुकी है, और तुम धन की खोज छोड़ने के बजाय इसे अपने भाग्य पर शासन करने दोगे। लोग इस प्रकार कार्य कर सकते हैं कि उन्हें शैतान के शब्दों द्वारा नियंत्रित और प्रभावित किया जा सकता है—क्या इसका यह अर्थ नहीं कि उन्हें शैतान द्वारा गुमराह और भ्रष्ट किया गया है? क्या शैतान के दर्शन, उसकी मानसिकता और उसके स्वभाव ने तुम्हारे दिलों में जड़ें नहीं जमा ली हैं? जब तुम आँख मूँदकर धन के पीछे दौड़ते हो, और सत्य की खोज छोड़ देते हो, तो क्या शैतान ने तुम्हें गुमराह करने का अपना उद्देश्य प्राप्त नहीं कर लिया है?(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V)। “वास्तव में, मनुष्य की आकांक्षाएँ चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, उसकी इच्छाएँ चाहे कितनी भी यथार्थपरक क्यों न हों या वे कितनी भी उचित क्यों न हों, वह सब जो मनुष्य हासिल करना चाहता है और वह सब जो मनुष्य खोजता है, वह अटूट रूप से दो शब्दों से जुड़ा है। ये दो शब्द हर व्यक्ति के लिए उसके संपूर्ण जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, और ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें शैतान मनुष्य के भीतर बैठाना चाहता है। वे दो शब्द कौन-से हैं? वे हैं ‘प्रसिद्धि’ और ‘लाभ।’ शैतान एक बहुत ही सौम्य तरीका चुनता है, एक ऐसा तरीका जो मनुष्य की धारणाओं के बहुत ही अनुरूप है और जो बहुत आक्रामक नहीं है, ताकि वह लोगों से अनजाने में ही जीवित रहने के अपने साधन और नियम स्वीकार करवा ले, जीवन लक्ष्य और जीवन की दिशाएँ विकसित करवा ले और जीवन की आकांक्षाएँ रखवाने लगे। अपने जीवन की आकांक्षाओं के बारे में लोगों के वर्णन कितने ही आडंबरपूर्ण क्यों न लगते हों, ये आकांक्षाएँ हमेशा ‘प्रसिद्धि’ और ‘लाभ’ के इर्द-गिर्द घूमती हैं। कोई भी महान या प्रसिद्ध व्यक्ति—या वास्तव में कोई भी व्यक्ति—जीवन भर जिन सारी चीजों का पीछा करता है वे केवल इन दो शब्दों से जुड़ी होती हैं : ‘प्रसिद्धि’ और ‘लाभ’। लोग सोचते हैं कि एक बार उनके पास प्रसिद्धि और लाभ आ जाए तो उनके ऊँचे रुतबे और अपार धन-संपत्ति का आनंद लेने और जीवन का आनंद लेने के लिए पूँजी होती है। उन्हें लगता है कि एक बार उनके पास प्रसिद्धि और लाभ आ जाए तो उनके पास वह पूँजी होती है जिसका इस्तेमाल वे सुख खोजने और देह के उच्छृंखल आनंद में लिप्त रहने के लिए कर सकते हैं। लोग जिस प्रसिद्धि और लाभ की कामना करते हैं उनकी खातिर वे खुशी से और अनजाने में, अपने शरीर, दिल और यहाँ तक कि अपनी संभावनाओं और नियतियों समेत वह सब जो उनके पास है, शैतान को सौंप देते हैं। वे ऐसा बिना किसी हिचकिचाहट के, बिना एक पल के संदेह के करते हैं और बिना कभी यह जाने करते हैं कि वे वह सब कुछ वापस पा सकते हैं जो कभी उनके पास था। लोग जब इस प्रकार खुद को शैतान को सौंप देते हैं और उसके प्रति वफादार हो जाते हैं तो क्या वे खुद पर कोई नियंत्रण बनाए रख सकते हैं? कदापि नहीं। वे पूरी तरह से और बुरी तरह शैतान से नियंत्रित होते हैं। वे पूरी तरह से और सर्वथा इस दलदल में धँस जाते हैं और अपने आप को मुक्त कराने में असमर्थ रहते हैं(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI)। फिर एक बहन ने संगति की, “शैतान लोगों को भ्रष्ट करने और बाँधने के लिए प्रसिद्धि, लाभ और पैसे का इस्तेमाल करता है। जहर जैसे कि ‘पैसा ही सब कुछ नहीं है, लेकिन इसके बिना तुम कुछ नहीं कर सकते हो,’ ‘जब तुम्हारे पास पैसा है, तो तुम्हारे पास सब कुछ है,’ ‘दुनिया पैसों के इशारों पर नाचती है,’ आदि आज के समाज में प्रचलित प्रवृत्ति और लोगों के जीने के नियम बन गए हैं। लोग मानते हैं कि तुम्हारे पास जितना ज्यादा पैसा होगा, तुम्हारा रुतबा उतना ही ऊँचा होगा और तुम्हारा जीवन उतना ही शानदार होगा। इस लक्ष्य को पाने के लिए लोग पैसे कमाने में कोई कसर नहीं छोड़ते और वे शैतान के फंदे में फँस जाते हैं। वे तन और मन दोनों से शैतान द्वारा पूरी तरह नियंत्रित हो जाते हैं और उनके पास सत्य का अनुसरण करने या परमेश्वर की आराधना करने के लिए समय और ऊर्जा नहीं बचती और वे परमेश्वर से और भी दूर होते जाते हैं।” बहन की संगति सुनने के बाद, मुझे एहसास हुआ कि मैं बिल्कुल ऐसी ही थी। मैंने हमेशा एक अमीर इंसान बनने और दूसरों से बेहतर जीवन जीने का सपना देखा था और मैंने सोचा था कि खुशहाल जीवन का यही मतलब होता है। इसे पाने के लिए, मैंने पैसे कमाने के लिए बेतहाशा काम किया और अपनी सारी ऊर्जा इसमें लगा दी। यहाँ तक कि गर्भवती होने पर भी मैंने ओवरटाइम किया। बाद में, एक अप्रत्याशित आर्थिक विवाद हो गया। मेरे पति को जेल की सजा हो गई, हमारे परिवार पर कर्ज हो गया और मेरा जीवन अचानक पूरी तरह पलट गया। मुझे डर था कि अगर दूसरों ने ऊँचाई से मुझे ऐसे गिरते देख लिया तो वे मुझे नीची नजर से देखेंगे, इसलिए मैंने पैसे कमाने के लिए और भी ज्यादा बेतहाशा काम किया। परमेश्वर को पाने के बाद मैं अच्छी तरह जानती थी कि परमेश्वर ने अंत के दिनों में लोगों को बचाने के लिए सत्य व्यक्त करने को देहधारण किया है, कि यह असाधारण रूप से दुर्लभ मौका था और मुझे ज्यादा सभाओं में जाना चाहिए और परमेश्वर के वचन ज्यादा खाने और पीने चाहिए ताकि मैं और सत्य समझ सकूँ। लेकिन मेरा दिल पैसे, प्रसिद्धि और लाभ की इच्छा से भरा था, और मुझे लगता था कि सभाओं में जाने से मेरी पैसे कमाने की क्षमता पर असर पड़ेगा, इसलिए मैं कम सभाओं में जाना, या कभी-कभी बिल्कुल भी सभाओं में न जाना चुनती रही। माँग कम होने के दौरान जब फैक्ट्री में काम नहीं होता था और वह अस्थायी रूप से बंद थी तो मैंने दूसरी फैक्ट्री में काम किया, और यहाँ तक कि बीमारी की हद तक खुद को थकाने के बाद भी, मैंने पीछे हटने से इनकार कर दिया। शैतान मुझे कसकर बाँधने के लिए पैसे, प्रसिद्धि और लाभ का इस्तेमाल कर रहा था, मुझे उनके भँवर में फँसा रहा था, जिससे मैं निकलने में असमर्थ थी। मैंने पैसे, प्रसिद्धि और लाभ के अनुसरण को सत्य के अनुसरण से ज्यादा, और जीवन से भी ज्यादा महत्व दिया। अगर मैं बिना बदले इसी रास्ते पर चलती रहती तो आखिरकार मैं उद्धार पाने का अपना मौका गँवा देती। इसी समय मैं पैसे, प्रसिद्धि और लाभ के जरिए लोगों को भ्रष्ट करने के शैतान के बुरे इरादों को साफ तौर पर देख पाई। और मैं समझ गई कि मुझमें सिलाई का हुनर होना परमेश्वर का अनुग्रह था ताकि मैं दुनिया में जीवित रह सकूँ और अपना गुजारा कर सकूँ, लेकिन मेरी नियति यह नहीं थी कि मैं उस हुनर का इस्तेमाल प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे की अपनी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं को पूरा करने के लिए करूँ। खाने और पहनने के लिए काफी होने पर संतुष्ट रहने से जीवन आसान हो जाता है और परमेश्वर की आराधना के लिए काफी समय बचता है। इन बातों को समझकर, मैं अब और बेतहाशा काम नहीं करना चाहती थी और शैतान द्वारा मूर्ख नहीं बनना चाहती थी और नुकसान नहीं उठाना चाहती थी और मैं सभाओं में जाने और ठीक से सत्य का अनुसरण करने के लिए तैयार हो गई।

बाद में, मैंने आत्मचिंतन भी किया, “क्या मैं वाकई अपनी कड़ी मेहनत से वह प्रसिद्धि और लाभ पा सकती हूँ जिसकी मैं इच्छा करती हूँ?” मुझे याद आया परमेश्वर ने कहा था : “तुम्हारी पृष्ठभूमि जो भी हो और तुम्हारी आगे की यात्रा जैसी भी हो, किसी भी स्थिति में कोई भी स्वर्ग के आयोजनों और व्यवस्थाओं से बच नहीं सकता और कोई भी अपनी नियति को नियंत्रित नहीं कर सकता, क्योंकि जो सभी चीजों का संप्रभु है सिर्फ वही ऐसा करने में सक्षम है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है)। इंसान का भाग्य परमेश्वर के हाथों में है और इसे व्यक्ति के अपने प्रयासों से नहीं बदला जा सकता। मैं किस तरह का जीवन जीती हूँ, चाहे वह शानदार और प्रतिष्ठित हो या गरीब और साधारण, यह ऐसा कुछ नहीं है जिसे मैं तय कर सकती हूँ और मुझे परमेश्वर की संप्रभुता और आयोजनों के प्रति समर्पित होना चाहिए। केवल सत्य का अनुसरण करने और अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभाव को त्यागने से ही, मैं वह व्यक्ति बन सकती हूँ जिसका परमेश्वर अनुमोदन करता है। केवल ऐसा जीवन ही मूल्यवान और सार्थक है। उसके बाद, मैंने पैसे कमाने के लिए अब और बेतहाशा काम नहीं किया और मैं नियमित रूप से सभाओं में जाने और परमेश्वर के वचन खाने और पीने में सक्षम हो गई।

2020 में, कलीसिया की अगुआ ने कहा कि कई नवागत धर्मांतरित हुए हैं और उसने पूछा कि क्या मैं उन्हें सींचने के लिए तैयार हूँ। मैंने मन ही मन सोचा, “अगर मैं नवगतों को सींचती हूँ, तो मेरे पास काम करने और पैसे कमाने का समय नहीं होगा। तो अगर मेरे पैसे खत्म हो गए तो मैं क्या करूँगी? मेरे पुराने सुनहरे दिनों को वापस पाना तो और भी दूर की बात है। लेकिन यह सुसमाचार फैलाने के लिए भी एक महत्वपूर्ण समय है और कोई सींचने वाला न होने पर, ये नवागत जो सत्य नहीं समझते, किसी भी समय शैतान द्वारा ले जाए जा सकते हैं।” मैंने सोचा कि जब मैंने पहली बार परमेश्वर को पाया था और मैं कुछ नहीं समझती थी, अगर भाई-बहनों ने मुझे सही समय पर सींचने और सहारा देने के लिए अपना समय और ऊर्जा न दी होती तो मुझे सच्चे परमेश्वर को लेकर निश्चित न हुई होती, न ही मैंने परमेश्वर का उद्धार पाया होता। तो अब जब यह कर्तव्य मेरे पास आया है, अगर मैंने इनकार कर दिया, तो क्या मैं जमीर से बिल्कुल रहित नहीं हूँ? फिर मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश मिला : “सभी लोगों को अर्थपूर्ण जीवन जीने का प्रयास अवश्य करना चाहिए और उन्हें अपनी वर्तमान परिस्थितियों से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। उन्हें पतरस की छवि को जीना आना चाहिए, और उनमें पतरस के ज्ञान और अनुभवों का होना जरूरी है। लोगों को उन चीजों का अनुसरण अवश्य करना चाहिए जो उच्चतर और अधिक गहन हैं। उन्हें परमेश्वर के प्रति एक अधिक गहरे एवं शुद्ध प्रेम का अनुसरण जरूर करना चाहिए और एक ऐसे जीवन का अनुसरण अवश्य करना चाहिए जिसका मूल्य और अर्थ हो। सिर्फ यही जीवन है; तभी वे बिल्कुल पतरस जैसे बन पाएँगे। तुम्हें सक्रिय रूप से सकारात्मक पक्ष में प्रवेश करने पर ध्यान देना चाहिए और साथ ही, तुम्हें अधिक गहन, अधिक विस्तृत और अधिक व्यावहारिक सत्यों को नजरअंदाज करते हुए निष्क्रिय नहीं हो जाना चाहिए और खुद को पीछे नहीं हटने देना चाहिए क्योंकि तुम अस्थायी आसानी से संतुष्ट हो। तुम्हारे पास व्यावहारिक प्रेम होना चाहिए और तुम्हें बिल्कुल जानवरों जैसे इस पतनशील और बेपरवाह जीवन से खुद को मुक्त करने के लिए हर संभव उपाय ढूँढ़ना चाहिए। तुम्हें एक सार्थक जीवन, एक मूल्यवान जीवन जीना चाहिए और तुम्हें अपने-आपको मूर्ख नहीं बनाना चाहिए और अपने जीवन से एक ऐसे खिलौने की तरह पेश नहीं आना चाहिए जो खेलने के लिए है। संकल्प रखने वाले और परमेश्वर से प्रेम करने वाले हर व्यक्ति के लिए कोई भी सत्य अप्राप्य नहीं हैं और ऐसा कोई न्याय नहीं है जिस पर वह अडिग न रह सके। तुम्हें अपना जीवन कैसे जीना चाहिए? तुम्हें परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए और कैसे इस प्रेम का उपयोग उसके इरादे पूरे करने के लिए करना चाहिए? तुम्हारे जीवन में इससे बड़ा मामला कोई नहीं है। सबसे बढ़कर, तुममें इस तरह का संकल्प और दृढ़ता होनी चाहिए और रीढ़विहीन निर्बल नहीं होना चाहिए। तुम्हें सीखना चाहिए कि एक अर्थपूर्ण जीवन का अनुभव कैसे किया जाता है और तुम्हें अर्थपूर्ण सत्यों का अनुभव करना चाहिए और उस मार्ग में अपने-आपसे लापरवाही से पेश नहीं आना चाहिए। तुम्हें एहसास भी नहीं होगा और तुम्हारा जीवन तुम्हारे हाथ से निकल जाएगा; उसके बाद क्या तुम्हारे पास अभी भी परमेश्वर से प्रेम करने का इस प्रकार का अवसर होगा? क्या मनुष्य मरने के बाद परमेश्वर से प्रेम कर सकता है? तुम्हारे अंदर बिल्कुल पतरस जैसा संकल्प और जमीर होना चाहिए; तुम्हें एक अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहिए और अपने साथ खेल नहीं खेलने चाहिए। एक मनुष्य के रूप में और परमेश्वर का अनुसरण करने वाले एक व्यक्ति के रूप में तुम्हें सावधानीपूर्वक अपने जीवन पर विचार करना चाहिए और इससे निपटने में सक्षम होना चाहिए—यह विचार करना चाहिए कि तुम्हें अपने-आपको परमेश्वर को कैसे अर्पित करना चाहिए, तुममें परमेश्वर के प्रति और अधिक अर्थपूर्ण आस्था कैसे होनी चाहिए और चूँकि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो, इसलिए तुम्हें उससे कैसे इस तरीके से प्रेम करना चाहिए कि यह ज्यादा निष्कलंक, ज्यादा सुंदर और ज्यादा अच्छा हो(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं समझ गई कि एक सार्थक जीवन जीने के लिए, किसी को पतरस की तरह सत्य का अनुसरण करना चाहिए, केवल परमेश्वर से प्रेम करने के अनुसरण के लिए जीना चाहिए और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाना चाहिए और केवल इसी तरह कोई परमेश्वर कि स्वीकृति पा सकता है। लेकिन मैंने अपना आधा जीवन पैसे, प्रसिद्धि और लाभ के पीछे भागने में बिता दिया था। मैंने अमीरी का जीवन जीने और लोगों की प्रशंसा पाने के लिए कड़ी मेहनत की, लेकिन अंत में, हमारे परिवार ने अपना सारा पैसा गँवा दिया, और हम पर दूसरों का कर्ज हो गया और मैं थकान से बीमार पड़ गई। भले ही मैंने प्रसिद्धि और लाभ पा लिया, लोगों की सराहना और तारीफ पा ली और मेरे अहंकार को संतुष्टि मिल गई, लेकिन ये ऊपरी चीजें मेरे दिल का खालीपन नहीं भर सकीं। इस तरह, मैं प्रसिद्धि और लाभ से बँधी हुई थी, अपना समय बर्बाद कर रही थी और अंत में, मुझे कुछ हासिल नहीं हुआ। जब से मैंने परमेश्वर को पाया, मैंने कलीसियाई जीवन जिया है और भाई-बहनों के साथ परमेश्वर के वचनों पर संगति की है, मैंने कुछ सत्य समझे हैं और मेरे दिल को आराम, शांति और सहारा मिला है। खासकर जब मैं अपना कर्तव्य कर रही थी, मैं अक्सर परमेश्वर के सामने खुद को शांत कर पाती थी, उसके वचन पढ़ती थी, और उसके वचनों की प्रबुद्धता और मार्गदर्शन पाती थी और मुझे दिल में बहुत खुशी महसूस होती थी। जब मैं अपना कर्तव्य करते हुए भ्रष्ट अवस्थाएँ प्रकट करती थी या मुश्किलों और समस्याओं का सामना करती थी तो सत्य की खोज करके और भाई-बहनों के साथ संगति करके, मैं अपने भ्रष्ट स्वभाव के बारे में कुछ समझ पाती थी और अभ्यास का मार्ग पा लेती थी। मुझे महसूस हुआ कि मेरे जीवन में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है और मुझे एहसास हुआ कि केवल अपना कर्तव्य करके ही मैं और सत्य समझ सकती हूँ। अब, महा विनाश शुरू हो चुके हैं और वे ठीक हमारी आँखों के सामने हैं। अगर मैं अब भी सत्य का अनुसरण करने के लिए इस समय का लाभ नहीं उठाती तो भविष्य के परीक्षणों में, परमेश्वर के वचनों की बुनियाद के बिना, मैं शिकायत कर सकती हूँ और शायद परमेश्वर का प्रतिरोध भी कर सकती हूँ और इस तरह उद्धार पाने का अपना मौका गँवा सकती हूँ। तब मैं रोते और दाँत पीसते हुए विनाश में जा गिरूँगी। जब मैंने इस बारे में सोचा तो मैंने अपनी नौकरी छोड़ने और ठीक से अपना कर्तव्य करने और सत्य का अनुसरण करने का संकल्प लिया। अगले दिन, मैंने अगुआ को बताया कि मैं नवागतों को सींचने के लिए तैयार हूँ। बाद में, परमेश्वर ने मेरे लिए एक रास्ता भी खोला। मेरी सास ने देखा कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है और मुझसे कहा कि मैं अपनी सेहत का अच्छे से ख्याल रखूँ और परिवार के कर्ज की चिंता न करूँ क्योंकि वह, मेरे ससुर और ननद उसे चुका देंगे। मैंने काम करके कमाए हुए पैसों का इस्तेमाल घर की किश्त चुकाने के लिए किया और मैं हर महीने समय पर इसे चुका पाई। मैं जानती थी कि यह परमेश्वर का प्रेम है। मुझे शैतान की शक्ति से बचाने के लिए परमेश्वर का धन्यवाद। मैं आने वाले दिनों में ठीक से अपने कर्तव्य करने, और परमेश्वर के प्रेम का कर्ज चुकाने के लिए स्वभाव में बदलाव लाने के लिए सत्य का अनुसरण करने के लिए तैयार हूँ।

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