60. खतरनाक परिवेश में एक विकल्प
मैं कलीसिया में एक उपदेशक के रूप में कार्य करती हूँ और कई कलीसियाओं के कार्य के लिए जिम्मेदार हूँ। जनवरी 2024 की एक रात, बहन लियू मिन ने यहूदा झांग को निष्कासित करने के बारे में एक कागज मुझे भेजा और बताया, “गिरफ्तार होने के बाद झांग ने बहुत सारे अगुआओं और कार्यकर्ताओं से गद्दारी की। उसने तुम्हारे साथ भी गद्दारी की। तुम्हें सावधान रहना है।” मैंने थोड़ी-सी घबराहट महसूस की और सोचा, “झांग ने मेरे साथ गद्दारी की है, इसलिए अब मैं एक निशाना बन गई हूँ, जिसका सीसीपी द्वारा पीछा किया जा रहा है। हो सकता है मैं किसी दिन गिरफ्तार हो जाऊँ, इसलिए मुझे सच में सावधान रहना होगा!” अप्रैल में एक दिन मुझे एक सहकर्मी का एक और पत्र मिला जिसमें लिखा था, “गिरफ्तार होने के बाद, यू यहूदा बन गई और उसने तुमसे गद्दारी की, लेकिन मुझे नहीं पता कि क्या उसने तुम्हारी तस्वीर की शिनाख्त की। तुम्हें सावधान रहना होगा।” यह सुनकर मैं और भी ज़्यादा चिंतित हो गई और सोचने लगी, “अगर सीसीपी पुलिस के पास मेरी तस्वीर है और उसने किसी यहूदा से मेरी शिनाख्त करने को भी कहा है, तो मैं एक बहुत ही खतरनाक स्थिति में हूँ! अब तो हर जगह हाई-डेफिनिशन कैमरे हैं, ड्रोन से भी निगरानी होती है। मैं जहाँ भी जाऊँगी मुझ पर नज़र रखी जाएगी और मैं देर-सवेर गिरफ्तार हो ही जाऊँगी! पुलिस जब अगुआओं और कार्यकर्ताओं को पकड़ती है, तो उन्हें मौत के मुँह तक सताती है। अगर मैं गिरफ्तार हो गई और यातना न सह सकी, यहूदा बन गई या पीट-पीटकर मार डाली गई, तो क्या मेरा विश्वास निरर्थक नहीं हो जाएगा?” मैं जितना इस बारे में सोचती, उतनी ही डर जाती। मुझे लगा कि अगुआ या कार्यकर्ता होना बहुत खतरनाक है। उस समय मैं जिन कलीसियाओं के लिए जिम्मेदार थी, वहाँ सुसमाचार कार्य के नतीजे नहीं मिल रहे थे। मैं जाकर पता लगाना चाहती थी कि कार्य के नतीजे क्यों नहीं मिल रहे हैं, लेकिन फिर मैंने सोचा कि कैसे सीसीपी द्वारा मेरा पीछा किया जा रहा है और जिन कलीसियाओं की मैं ज़िम्मेदार थी, वहाँ का माहौल ठीक नहीं था। अगर रास्ते में सीसीपी पुलिस की नज़र मुझ पर पड़ गई तो मैं किसी भी समय गिरफ्तार हो सकती थी। यह सोचकर, मेरी जाने की हिम्मत नहीं हुई। उस समय बहुत से भाई-बहन डर और कायरता में जी रहे थे और अपने कर्तव्य निभाने में ढीले पड़ गए थे। खासकर सुसमाचार कार्य में कोई सुधार नहीं दिख रहा था। यूँ तो मैं कार्य की खबर लेते रहने के लिए पत्र लिखती रही, लेकिन प्रगति अधिक नहीं हुई।
एक शाम, मुझे ऊपर के अगुआओं का एक पत्र मिला। उसमें लिखा था, “कुछ कलीसियाओं में सुसमाचार कार्य का कोई नतीजा नहीं मिल रहा है। एक उपदेशक के तौर पर तुम्हें स्वयं स्थिति को समझने, समस्याएँ खोजने और उन्हें हल करने के लिए कलीसियाओं में जाना चाहिए।” यह पढ़कर मैंने थोड़ा-सा प्रतिरोध महसूस किया और सोचा, “मैं जिन कलीसियाओं के लिए जिम्मेदार हूँ, वे सब खराब माहौल में हैं। वहाँ जाना और कार्य की खबर लेना मेरे लिए कुछ ज्यादा ही खतरनाक है। इसके अलावा, अगुआओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करना सीसीपी का मुख्य लक्ष्य है। अगर मैं गिरफ्तार हो गई तो हो सकता है अपनी जान तक गँवा बैठूँ। बेहतर है मैं कहीं न जाऊँ। मुझे बस छिपकर रहना चाहिए और कार्य की खबर लेने के लिए पत्र लिखने चाहिए। इस तरीके से यह अधिक सुरक्षित रहेगा।” जब मैंने यह सोचा तो मुझे अंदर बेचैनी महसूस हुई। जिन कलीसियाओं की मैं जिम्मेदार थी वहाँ के सुसमाचार कार्य में वास्तव में ठहराव आ गया था और इसका समाधान करने के लिए मुझे तुरंत वहाँ जाने की जरूरत थी। लेकिन मैं पकड़े जाने से डरती थी, इसलिए मैंने जाने की हिम्मत नहीं की। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ। मैं चिंता और बेचैनी में जी रही थी। अगले दिन, मुझे ऊपर के अगुआओं का एक और पत्र मिला। उसमें लिखा था, “जिन कलीसियाओं की तुम ज़िम्मेदार हो, वहाँ कार्य की विभिन्न मदों में धीमी प्रगति हुई है। भाई-बहन कायरता में जी रहे हैं और अपने कर्तव्य निभाने में बहुत निष्क्रिय हैं। तुम्हें जाकर देखना चाहिए।” अगुआओं का पत्र पढ़ने के बाद, मैं जानती थी कि मुझे कलीसियाओं में जाना चाहिए और असल में समस्याएँ सुलझानी चाहिए। लेकिन फिर मैंने यह सोचा कि कैसे कुछ समय पहले एक अगुआ को गिरफ्तार होने के तीन दिन बाद ही पुलिस ने पीट-पीटकर मार डाला था, और मैं अंदर से कायर हो गई। यहाँ तक कि मैं एक साधारण कर्तव्य करना चाहती थी जिसमें मुझे इतना बड़ा जोखिम न उठाना पड़े। मैंने एहसास किया कि मेरी दशा गलत थी और इसका समाधान करने के लिए परमेश्वर के वचन खोजे।
सुबह की भक्ति के दौरान मैंने एक अनुभवजन्य गवाही के वीडियो में बताए गए परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा, जो मेरे लिए बहुत मददगार था। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “जब लोग परमेश्वर द्वारा आयोजित माहौल और उसकी संप्रभुता को स्पष्ट रूप से देख, समझ और स्वीकार कर उसके आगे समर्पण नहीं कर पाते, और जब लोग अपने दैनिक जीवन में तरह-तरह की मुश्किलों का सामना करते हैं, या जब ये मुश्किलें सामान्य लोगों के बरदाश्त के बाहर हो जाती हैं, तो अवचेतन रूप में उन्हें हर तरह की चिंता और व्याकुलता होती है, और यहाँ तक कि संताप भी हो जाता है। वे नहीं जानते कि कल कैसा होगा या परसों या उनका भविष्य कैसा होगा और इसलिए वे हर चीज के बारे में संतप्त, व्याकुल और चिंतित महसूस करते हैं। ऐसा कौन-सा संदर्भ है जो इन नकारात्मक भावनाओं को जन्म देता है? होता यह है कि वे परमेश्वर की संप्रभुता में विश्वास नहीं रखते—यानी वे परमेश्वर की संप्रभुता में विश्वास करने में और इसकी असलियत देख पाने में असमर्थ होते हैं, और उनके दिलों में परमेश्वर के लिए कोई सच्ची आस्था नहीं होती। यहाँ तक कि अपनी आँखों से देखने पर भी परमेश्वर की संप्रभुता के तथ्य को नहीं समझ सकते या उस पर यकीन नहीं कर सकते। वे नहीं मानते कि उनके भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता है, वे नहीं मानते कि उनके जीवन परमेश्वर के हाथों में हैं और इसलिए उनके दिलों में परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा हो जाता है और फिर शिकायतें पैदा होती हैं और वे समर्पण नहीं कर पाते” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (3))। “अगर लोग सत्य का अनुसरण करते हैं, तो वे इन मुश्किलों में फँस कर संताप, व्याकुलता और चिंता की नकारात्मक भावनाओं में नहीं डूबेंगे। इसके उलट अगर लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, तो ये मुश्किलें उनमें पहले की ही तरह मौजूद होती हैं, और परिणाम क्या होगा? ये तुम्हें उलझा देंगी ताकि तुम बच कर निकल न सको, और अगर तुम इन्हें दूर न कर पाओ, तो आखिरकार ये नकारात्मक भावनाएँ बन जाएँगी जो तुम्हारे अंतरतम में गाँठ बन कर पैठ जाएँगी; ये तुम्हारे सामान्य जीवन और तुम्हारे सामान्य कर्तव्य-निर्वहन को प्रभावित करेंगी, और ये तुम्हें दबा हुआ और छुटकारा पाने में असमर्थ महसूस करवाएँगी—तुम पर इनका यह परिणाम होगा” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (3))। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गई कि गिरफ्तार होने और पीट-पीटकर मार दिए जाने का मेरा डर असल में परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और संप्रभुता को न समझने की वजह से था : मैं यह विश्वास नहीं करती थी कि सब कुछ परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है। चूँकि मेरे साथ एक यहूदा गद्दारी कर चुका था और मैं अब सीसीपी के निशाने पर थी, मुझे डर था कि अगर मैं गिरफ्तार हो गई और यातना न सह पाई, यहूदा बन गई या पीट-पीटकर मार डाली गई, तो मैं उद्धार पाने का अपना मौका खो दूँगी। इसलिए मैंने समस्याओं को सुलझाने के लिए कलीसियाओं में जाने की हिम्मत नहीं की। मैं उस परिवेश के प्रति समर्पण करने को तैयार नहीं थी जिसका परमेश्वर ने मेरे लिए आयोजन किया था। मैंने यह शिकायत भी की कि अगुआओं और कार्यकर्ताओं के कर्तव्य निभाना बहुत खतरनाक है, और मैं एक ऐसा साधारण कर्तव्य निभाना चाहती थी जिसमें कोई बड़ा जोखिम न हो। मैंने परमेश्वर के प्रति बिल्कुल भी वफादारी या समर्पण नहीं दिखाया!
फिर मैंने परमेश्वर के और अधिक वचन पढ़े और अपनी दशा की कुछ समझ हासिल की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “अपनी सुरक्षा पर ध्यान देने के अलावा कुछ मसीह-विरोधी और क्या सोचते हैं? वे कहते हैं, ‘फिलहाल, हमारा परिवेश अनुकूल नहीं है, इसलिए हमें लोगों के सामने कम ही आना चाहिए और सुसमाचार का कम प्रचार करना चाहिए। इस तरह हमारे पकड़े जाने की संभावना कम होगी और कलीसिया का काम नष्ट नहीं होगा। अगर हम पकड़े जाने से बच गए तो हम यहूदा नहीं बनेंगे और फिर हम भविष्य में कायम रह पाएँगे, है ना?’ क्या ऐसे मसीह-विरोधी नहीं हैं जो अपने भाई-बहनों को गुमराह करने के लिए ऐसे बहाने बनाते हैं? कुछ मसीह-विरोधी मौत से बहुत डरते हैं और अपने घिनौने वजूद को घसीटते रहते हैं; उन्हें प्रतिष्ठा और रुतबा भी पसंद है और वे अगुआई की भूमिकाएँ निभाने के लिए तैयार रहते हैं। भले ही वे जानते हैं कि ‘अगुआ का काम आसान नहीं है—अगर बड़े लाल अजगर को पता चला कि मुझे अगुआ बना दिया गया है तो मैं मशहूर हो जाऊँगा और हो सकता है कि मुझे वांछित लोगों की सूची में डाल दिया जाए, और जैसे ही मैं पकड़ा जाऊँगा, मेरी जान खतरे में पड़ जाएगी,’ फिर भी इस रुतबे के लाभों में लिप्त होने की खातिर वे इन खतरों को नजरअंदाज कर देते हैं। जब वे अगुआ के रूप में काम करते हैं तो केवल अपने दैहिक आनंद में लिप्त रहते हैं और वास्तविक कार्य नहीं करते। विभिन्न कलीसियाओं के साथ थोड़े-बहुत पत्राचार के अलावा वे कुछ और नहीं करते हैं। वे किसी स्थान पर छिप जाते हैं और किसी से नहीं मिलते, खुद को बंद रखते हैं और भाई-बहनों को नहीं पता होता कि उनका अगुआ कौन है—ये अगुआ इतने अधिक डरे हुए होते हैं। तो क्या यह कहना सही नहीं है कि वे केवल नाम के अगुआ हैं? (सही है।) वे अगुआ के रूप में कोई वास्तविक कार्य नहीं करते हैं; उन्हें बस खुद को छिपाने की परवाह होती है। जब दूसरे उनसे पूछते हैं, ‘अगुआ होना कैसा है?’ तो वे कहेंगे, ‘मैं बहुत व्यस्त रहता हूँ और अपनी सुरक्षा की खातिर मुझे घर बदलते रहना पड़ता है। यह परिवेश इतना अस्थिर करने वाला है कि मैं अपने काम पर ध्यान केंद्रित नहीं कर सकता।’ उन्हें हमेशा ऐसा लगता है कि उन पर बहुत सी नजरें गड़ी हुई हैं और वे नहीं जानते कि कहाँ छिपना सुरक्षित है। वेश बदलने, अलग-अलग जगहों पर खुद को छिपाने और एक स्थान पर टिके न रहने के अलावा वे प्रति दिन कोई वास्तविक कार्य नहीं करते हैं। क्या ऐसे अगुआ होते हैं? (हाँ।) वे किन सिद्धांतों का पालन करते हैं? ये लोग कहते हैं, ‘एक चालाक खरगोश के पास तीन बिल होते हैं। खरगोश को शिकारी जानवर के हमले से बचने के लिए तीन बिल बनाने पड़ते हैं ताकि वह खुद को छिपा सके। अगर किसी व्यक्ति का खतरे से सामना हो और उसे भागना पड़े, मगर उसके पास छिपने के लिए कोई जगह न हो तो क्या यह स्वीकार्य है? हमें खरगोशों से सीखना चाहिए! परमेश्वर के बनाए प्राणियों में जीवित रहने की यह क्षमता होती है और लोगों को उनसे सीखना चाहिए।’ अगुआ बनने के बाद से वे इस धर्म-सिद्धांत को समझ गए हैं और यहाँ तक मानते हैं कि उन्होंने सत्य को समझ लिया है। वास्तविकता में वे बहुत डरे हुए हैं। जैसे ही वे यह सुनते हैं कि किसी अगुआ की रिपोर्ट पुलिस में इसलिए की गई क्योंकि वह किसी असुरक्षित जगह पर रह रहा था या कोई अगुआ बड़े लाल अजगर के जासूसों के चंगुल में इसलिए फँस गया कि वह अपना कर्तव्य निभाने के लिए अक्सर बाहर जाता और बहुत से लोगों से मिलता-जुलता था और आखिरकार कैसे इन लोगों को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया तो वे तुरंत डर जाते हैं। वे सोचते हैं, ‘अरे नहीं, क्या पता इसके बाद मुझे ही गिरफ्तार किया जाए? मुझे इससे सीखना चाहिए। मुझे ज्यादा सक्रिय नहीं रहना चाहिए। अगर मैं कलीसिया के कुछ काम करने से बच सकता हूँ तो मैं उसे नहीं करूँगा। अगर मैं अपना चेहरा दिखाने से बच सकूँ तो मैं नहीं दिखाऊँगा। मैं अपना काम जितना हो सके उतना कम करूँगा, बाहर निकलने से बचूँगा, किसी से मिलने-जुलने से बचूँगा और यह पक्का करूँगा कि किसी को भी मेरे अगुआ होने की खबर न हो। आजकल, कौन किसी और की परवाह कर सकता है? सिर्फ जिंदा रहना भी अपने आप में एक चुनौती है!’ जबसे वे अगुआ बने हैं, बैग उठाकर छिपते फिरने के अलावा कोई काम नहीं करते। वे हमेशा पकड़े जाने और जेल जाने के निरंतर डर के साये में जीते हैं। मान लो वे किसी को यह कहते हुए सुन लें, ‘अगर तुम पकड़े गए तो तुम्हें मार दिया जाएगा! अगर तुम अगुआ न होते, अगर तुम बस एक साधारण विश्वासी होते तो तुम्हें छोटा-सा जुर्माना भरने के बाद शायद छोड़ दिया जाता, मगर चूँकि तुम अगुआ हो, इसलिए कुछ कहना मुश्किल है। यह बहुत खतरनाक है! पकड़े गए कुछ अगुआओं या कर्मियों ने जब कोई जानकारी नहीं दी तो पुलिस ने उन्हें पीट-पीटकर मार डाला।’ जब वे किसी के पीट-पीटकर मार दिए जाने के बारे में सुनते हैं तो उनका डर और बढ़ जाता है, वे काम करने से और भी ज्यादा डरने लगते हैं। हर दिन वे बस यही सोचते हैं कि पकड़े जाने से कैसे बचें, दूसरों के सामने आने से कैसे बचें, निगरानी से कैसे बचें और अपने भाई-बहनों के संपर्क से कैसे बचें। वे इन चीजों के बारे में सोचने में अपना दिमाग खपाते हैं और अपने कर्तव्यों को बिल्कुल भूल जाते हैं। क्या ये निष्ठावान लोग हैं? क्या ऐसे लोग कोई काम सँभाल सकते हैं? (नहीं, वे नहीं सँभाल सकते।)” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग दो))। परमेश्वर उजागर करता है कि जब खतरा उत्पन्न होता है तो मसीह-विरोधी सिर्फ अपनी रक्षा करने से सरोकार रखते हैं। वे सिर्फ खुद को नुकसान की राह से दूर रखते हैं और कलीसिया के हितों के बारे में बिल्कुल भी नहीं सोचते हैं। उनकी प्रकृति स्वार्थी और घिनौनी होती है। मुझे एहसास हुआ कि मेरा अपना व्यवहार भी बिल्कुल वैसा ही स्वार्थपूर्ण था जितना एक मसीह-विरोधी का होता है। मैं अच्छी तरह जानती थी कि जिन कलीसियाओं के लिए मैं जिम्मेदार थी, वहाँ के कार्य की विभिन्न मदें धीमे से प्रगति कर रही थीं और भाई-बहन डर और कायरता में जी रहे थे। खबर लेते रहने के लिए सिर्फ पत्र लिखने से कतई कोई नतीजा नहीं निकल पाया था। मुझे तुरंत कलीसियाओं में जाना था और इन समस्याओं का समाधान करना था। लेकिन गिरफ्तार होने के डर से मैंने निकलने की हिम्मत नहीं की और मैंने यह शिकायत भी की कि अगुआओं और कार्यकर्ताओं के कर्तव्य बहुत खतरनाक हैं। खासकर, जब मैंने सोचा कि कैसे कुछ समय पहले एक अगुआ को गिरफ्तार होने के तीन दिन बाद पुलिस द्वारा पीट-पीटकर मार डाला गया था तो मैं गिरफ्तार होने से और भी ज़्यादा डर गई; मैं इन समस्याओं को सुलझाने के लिए कलीसियाओं में नहीं जाना चाहती थी, और यहाँ तक कि एक ऐसा कर्तव्य निभाना चाहती थी जिसमें कोई जोखिम न लेना हो। एक अगुआ के तौर पर मैं एक अहम मौके पर कलीसिया के कार्य की रक्षा करने में नाकाम रही और मैंने अपने कर्तव्य और ज़िम्मेदारियों के बारे में कोई विचार नहीं किया, परमेश्वर के प्रति बिल्कुल भी वफादारी या समर्पण नहीं दिखाया। परमेश्वर ने मुझे एक अगुआ का कर्तव्य निभाने के लिए ऊँचा उठाया था; मुझे कलीसिया का कार्य अच्छी तरह से करना चाहिए था और परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करनी चाहिए थी। लेकिन इसके बजाय, खुद को बचाने के लिए मैं छिपी रही, अपने जीवन से शर्मनाक तरीके से चिपकी रही। अहम मौके पर, मैंने परवाह नहीं की कि भाई-बहन जिएँ या मरें, कलीसिया के हितों पर कोई ध्यान नहीं दिया, और अपने कर्तव्य के प्रति बिल्कुल भी समर्पित नहीं थी। इन कलीसियाओं का कार्य ठप पड़ा था और मैंने कार्य में देरी करके पहले ही अपने पीछे अपराध छोड़ दिए थे। अगर मैंने तुरंत पश्चात्ताप न किया, तो भले ही मैं छिपने में और गिरफ्तारी से बचने में कामयाब हो गई, मैंने अपने कर्तव्य या जिम्मेदारियाँ को अच्छे से नहीं निभाया होगा। यह परमेश्वर के साथ विश्वासघात होगा और अंत में, मैं बिल्कुल एक मसीह-विरोधी की तरह परमेश्वर द्वारा हटा दी जाऊँगी और दंडित की जाऊँगी।
बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों के कुछ और अधिक अंश पढ़े, जिसने मुझे आस्था और शक्ति दी। परमेश्वर कहता है : “सत्ता में रहने वाले लोग बाहर से दुष्ट लग सकते हैं, लेकिन डरो मत, क्योंकि ऐसा इसलिए है कि तुम लोगों में विश्वास कम है। जब तक तुम लोगों का विश्वास बढ़ता रहेगा, तब तक कुछ भी ज्यादा मुश्किल नहीं होगा। प्रसन्न रहो और जी भरकर उछलो! सब-कुछ तुम लोगों के पैरों-तले और मेरी पकड़ में है। क्या सिद्धि या विनाश मेरे एक वचन से तय नहीं होता?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 75)। “तुम्हें इस या उस चीज से नहीं डरना चाहिए; चाहे तुम्हें कितनी भी मुसीबतों या खतरों का सामना करना पड़े, तुम्हें किसी भी अड़चन से बाधित हुए बिना मेरे सम्मुख अडिग रहना चाहिए ताकि मेरी इच्छा बेरोक-टोक पूरी हो सके। यह तुम्हारा कर्तव्य है...। तुम्हें सब कुछ सहना होगा; मेरे लिए तुम्हें हर चीज छोड़ने और अपनी पूरी ताकत से मेरा अनुसरण करने को तैयार रहना होगा और कोई भी कीमत चुकाने के लिए तैयार रहना होगा। अब वह समय है जब मैं तुम्हें परखूँगा : क्या तुम अपनी वफादारी मुझे अर्पित करोगे? क्या तुम मार्ग के अंत तक वफादारी से मेरा अनुसरण कर सकते हो? डरो मत; मेरे सहारे के रहते कौन कभी इस मार्ग को अवरुद्ध कर सकता है?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 10)। सही कहा है। परमेश्वर का सहारा रहते, मुझे किस चीज का डर था? बड़ा लाल अजगर चाहे कितना भी उग्र और क्रूर क्यों न हो, यह परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है। यह परमेश्वर के हाथों में एक सेवा की वस्तु है। परमेश्वर की अनुमति के बिना, पुलिस मुझे गिरफ्तार नहीं कर पाएगी, भले ही मैं ठीक उसकी नाक के नीचे होऊँ। जब मैं उन वर्षों को याद करती हूँ जिस दौरान मैंने परमेश्वर का अनुसरण किया है तो बहुत बार ऐसा हुआ जब मुझ पर खतरा आया और मैं लगभग गिरफ्तार हो गई थी। यह परमेश्वर की अद्भुत सुरक्षा ही थी जिसने मुझे हर एक बार खतरे से बचाया। उदाहरण के लिए, 2020 की एक शाम, दो लोगों ने हमारे किराए के घर का निरीक्षण किया। चूँकि मेरी सुरक्षा को जोखिम थे और मैं उन्हें अपना पहचान पत्र नहीं दिखा सकती थी, वे हमारी रिपोर्ट करने जा रहे थे। उनमें से एक आदमी ने क्रुद्ध होकर मुझसे कहा, “जरा रुको, तुम्हें अभी गिरफ्तार करवाने के लिए मैं जाकर पुलिस बुलाता हूँ!” ऐसा कहकर वह बाहर चला गया। मैंने और मेरी बहनों ने मौके का फायदा उठाया और जल्दी से निकल गईं। अगली सुबह दस पुलिसवाले उस घर में गए। वे हमें गिरफ्तार नहीं कर सके, तो उन्होंने हमारे अविश्वासी मकान मालिक को ही गिरफ्तार कर लिया। मैंने देखा कि मैं गिरफ्तार होऊँगी या नहीं, यह परमेश्वर पर निर्भर था। ठीक जैसा कि परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर की अनुमति के बिना, शैतान जमीन पर पानी की एक बूँद या रेत के एक कण को भी आसानी से छू नहीं सकता; परमेश्वर की अनुमति के बिना, शैतान ज़मीन पर चींटियों का भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता, मानवजाति की तो बात ही छोड़ दो, जिसे परमेश्वर ने बनाया था” (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I)। अगर परमेश्वर ने मुझे गिरफ्तार होने दिया तो यह भी उसके अच्छे इरादे के साथ होगा और मुझे परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना चाहिए, परमेश्वर के प्रति अपनी गवाही में अडिग रहना चाहिए।
मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा और मृत्यु के बारे में एक काफी अधिक स्पष्ट नजरिया प्राप्त किया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “प्रभु यीशु के उन शिष्यों की मौत कैसे हुई? उनमें ऐसे अनुयायी थे जिन्हें पत्थरों से मार डाला गया, घोड़े से बाँध कर घसीटा गया, सूली पर उलटा लटका दिया गया, पाँच घोड़ों से खिंचवाकर उनके टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए—विभिन्न रूपों की मौत उन पर टूटी। उनकी मृत्यु का कारण क्या था? क्या ऐसा है कि उन्होंने कुछ गलत काम किया और फिर कानून द्वारा उन्हें फाँसी दे दी गई? नहीं। उन्होंने प्रभु के सुसमाचार का प्रसार किया, लेकिन दुनिया के लोगों ने इसे स्वीकार नहीं किया और इसके बजाय उनकी निंदा की, उन्हें पीटा और उन्हें कोसा, यहाँ तक कि उन्हें मार डाला—इस तरह वे शहीद हुए। ... वास्तव में, उनके शरीर इसी तरह मृत्यु को प्राप्त हुए और चल बसे; यह मानव संसार से प्रस्थान का उनका अपना तरीका था, तो भी इसका यह अर्थ नहीं था कि उनका परिणाम भी वैसा ही था। उनकी मृत्यु और प्रस्थान का तरीका चाहे जो भी रहा हो या यह चाहे जैसे भी हुआ हो, यह वैसा नहीं था जैसे परमेश्वर ने उन जीवनों के, उन सृजित प्राणियों के अंतिम परिणाम को निर्धारित किया था। तुम्हें यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिए। इसके विपरीत, यह सटीक तौर पर वह तरीका था जिससे उन्होंने इस संसार की घोर निंदा की और परमेश्वर के कर्मों की गवाही दी। इन सृजित प्राणियों ने अपने सर्वाधिक बहुमूल्य जीवन का उपयोग किया—उन्होंने परमेश्वर के कर्मों की गवाही देने के लिए, परमेश्वर के महान सामर्थ्य की गवाही देने के लिए अपने जीवन के अंतिम क्षण का उपयोग किया, और शैतान तथा इस संसार के समक्ष यह घोषित करने के लिए किया कि परमेश्वर के कर्म सही हैं, प्रभु यीशु परमेश्वर है, वह प्रभु है, और परमेश्वर का देहधारी शरीर है। यहाँ तक कि अपने जीवन के बिल्कुल अंतिम क्षण तक उन्होंने प्रभु यीशु का नाम कभी नहीं नकारा। क्या यह इस संसार के ऊपर न्याय का एक रूप नहीं था? उन्होंने अपने जीवन का उपयोग किया, संसार के समक्ष यह घोषित करने के लिए, मनुष्यों के सामने यह साबित करने के लिए कि प्रभु यीशु ही प्रभु है, प्रभु यीशु मसीह है, वह परमेश्वर का देहधारी शरीर है, कि उसने समस्त मानवजाति के छुटकारे के लिए जो कार्य किया, उसी के कारण मानवजाति जीवित रह पाई है—यह सच्चाई कभी बदलने वाली नहीं है। जो लोग प्रभु यीशु के सुसमाचार का प्रसार करने के लिए शहीद हुए, उन्होंने किस सीमा तक अपना कर्तव्य निभाया? क्या यह अंतिम सीमा तक किया गया था? यह अंतिम सीमा कैसे परिलक्षित होती थी? (उन्होंने अपना जीवन अर्पित किया।) यह सही है, उन्होंने अपने जीवन से कीमत चुकाई” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सुसमाचार का प्रचार करना वह कर्तव्य है जिसे निभाना सभी विश्वासियों का दायित्व है)। परमेश्वर के वचन मृत्यु का अर्थ बहुत स्पष्ट कर देते हैं। प्रभु के सुसमाचार का प्रसार करने के लिए प्रभु यीशु के शिष्य शहीद कर दिए गए। कुछ तलवार से मारे गए, कुछ को फाँसी दी गई और कुछ को क्रूस पर चढ़ाया गया। उन्होंने अपने जीवन का उपयोग परमेश्वर के लिए एक सुंदर और गूँजती हुई गवाही देने के लिए किया और शैतान को अपमानित किया। उनकी मृत्यु सार्थक और मूल्यवान थी, जिसे परमेश्वर ने अनुमोदन किया। यूँ तो उनकी देह मर गई, लेकिन यह असली मृत्यु नहीं थी : उनकी आत्माएँ परमेश्वर के पास लौट गई हैं। परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य में बहुत से भाई-बहनों ने भी शैतान पर विजय पाने की गवाही दी है। गिरफ्तार होने के बाद उन्हें पुलिस ने चाहे जैसे भी यातना दी हो, वे परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने या यहूदा बनने की बजाय मर जाना पसंद करते थे। लेकिन मुझे तो गिरफ्तार किए जाने से पहले ही पीट-पीटकर मार डाले जाने का डर था और अपने खोल में छिपे हुए कछुए की तरह मैंने अपना कर्तव्य निभाने की हिम्मत नहीं की। इसमें गवाही कहाँ थी? मैंने इस बारे में जितना अधिक सोचा, मुझे उतना ही अधिक पछतावा और आत्म-ग्लानि महसूस हुई। मुझे अपना चेहरा दिखाने में बहुत ही अधिक शर्मिंदगी हुई और इतनी स्वार्थी, घिनौनी होने और मानवता की कमी होने के लिए खुद से घृणा हुई। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, खुद को बचाने के लिए, मैं अपनी जान बचाने की कोशिश कर रही हूँ—मैं एक दयनीय जीवन जी रही हूँ और तुम्हारे प्रति कोई वफादारी या समर्पण नहीं दिखा रही हूँ। मैं गिरफ्तार होऊँगी या नहीं, इस पर अंतिम फैसला तुम्हारा है। मैं खुद को पूरी तरह से तुम्हारे हाथों में सौंपने और अब मौत के डर से बाधित न होने को तैयार हूँ। मैं असल में समस्याएँ सुलझाने और अपने कर्तव्य अच्छी तरह निभाने के लिए कलीसियाओं में जाने को तैयार हूँ।” प्रार्थना करने के बाद मुझे काफी अधिक सहज और आराम महसूस हुआ।
बाद में, मैं एक कलीसिया में गई। पूछताछ के जरिए मैंने पाया कि कलीसिया के अगुआओं को यह डर था कि सुसमाचार का प्रचार करने के लिए उनके भाई-बहन गिरफ्तार कर लिए जाएंगे और वे जिम्मेदार ठहराए जाएंगे, इसलिए वे कार्य की खबर लेते रहने में बहुत निष्क्रिय थे। इस दशा के जवाब में हमने परमेश्वर के वचनों को खाया, पिया और इन पर संगति की। कलीसिया के अगुआओं को यह समझ में आ गया कि जिम्मेदारी लेने का उनका डर और वास्तविक कार्य करने में उनकी विफलता उनके स्वार्थी और घिनौने शैतानी स्वभावों से नियंत्रित होने से उपजी थी, और वे चीजों को पूरी तरह बदलने के लिए तैयार थे। उसके बाद, उन्होंने टीम के अगुआओं, उपयाजकों और सुसमाचार कार्यकर्ताओं के साथ मिलना शुरू कर दिया, ताकि सुसमाचार कार्य की समस्याओं पर संगति और उनका समाधान कर सकें। हमने मिलकर कार्य किया और कलीसिया के कार्य में धीरे-धीरे सुधार के संकेत दिखने लगे। मैं तहे दिल से सर्वशक्तिमान परमेश्वर को धन्यवाद देती हूँ कि उसने मुझे उजागर किया और बचाया!