59. अब मैं बुढ़ापे में अपना कर्तव्य अच्छे से न निभाने को लेकर परेशान नहीं होती हूँ

शू ल्यांग, चीन

सन् 1999 में, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकार किया। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं अंत के दिनों में प्रभु का स्वागत कर पाऊँगी। मैं इतनी खुश थी कि बता भी नहीं सकती। मुझे लगा कि इस बार आखिरकार स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने और अनंत जीवन पाने की आशा है। उस समय मैं अपनी उम्र के पचास के दशक में थी और मुझमें अभी भी काफी सारी ऊर्जा थी। चाहे मैं कलीसिया की अगुआ के रूप में सेवा कर रही होती थी, सुसमाचार का प्रचार कर रही होती थी या नए विश्वासियों को सींच रही होती थी, मैं बहुत सक्रियता से कार्य करती थी और हर दिन बहुत ही तृप्तिदायक होता था। 2018 के अंत में, मुझे अचानक चक्कर आने लगा, मेरे पैर भारी लगने लगे, और मैं चलने के लिए अपने पैर नहीं उठा पा रही थी। मैं समतल जमीन पर चलते हुए भी हमेशा ठोकर खाकर गिर जाती थी, और अक्सर मेरे घुटनों और कोहनियों में खरोंच लग जाती थी, जिससे खून बहने लगता था। मेरी बेटी मुझे जांच के लिए अस्पताल ले गई। डॉक्टर ने कहा कि मुझे मस्तिष्क में आघात से होने वाला “लैकुनर इन्फार्क्शन” है और गंभीरता से चेतावनी दी, “इस हालत में आपको बहुत सावधान रहना होगा! अगर आप फिर से गिरीं, तो मस्तिष्क में रक्तस्राव (सेरिब्रल हैमरेज) होने की संभावना है।” डॉक्टर की यह बात सुनकर मैं काफी डर गई। “अगर मुझे सच में सेरिब्रल हैमरेज हो गया, तो मैं कोई कर्तव्य कैसे निभा पाऊँगी? अगर मैं अपना कर्तव्य नहीं निभा सकती हूँ तो मैं कैसे बचाई जा सकती हूँ? क्या इतने सालों का मेरा विश्वास व्यर्थ नहीं चला जाएगा?” इसके बाद, मैंने इलाज के लिए दवा ली, और धीरे-धीरे मेरी हालत स्थिर हो गई और मैं बेहतर महसूस करने लगी। मैं जानती थी कि यह परमेश्वर की सुरक्षा है और मैं इस दौरान अपना कर्तव्य निभाने में डटी रही। 70 साल की होने के बाद, मैंने साफ तौर पर महसूस किया कि मेरा शरीर कई मायनों में कमजोर होने लगा है। मैं बस थोड़ा-सा कार्य करने के बाद थकी हुई महसूस करती थी और मेरी याददाश्त कमजोर हो गई थी। जब मैं 73 साल की थी, मैं कलीसिया में धर्मोपदेशों की छँटाई कर रही थी। एक दिन, पर्यवेक्षक ने हमारे साथ एक सभा की। मैंने देखा कि कई भाई-बहन काफी जवान थे, और जब पर्यवेक्षक ने सिद्धांतों के बारे में संगति की, तो उनकी उंगलियाँ फुर्ती से कंप्यूटर कीबोर्ड पर चल रही थीं, जिससे खट-खट की तेज आवाज आ रही थी। मुझे उनसे बहुत ईर्ष्या हुई, और मैंने सोचा, “हम सभी परमेश्वर में विश्वास करते हैं और कर्तव्य निभा रहे हैं। फिर इतना बड़ा अंतर क्यों है? युवा लोग हर चीज करने में फुर्तीले हैं और सिद्धांतों को समझने और उनमें पारंगत होने में तेज हैं। लेकिन मेरा क्या? मेरी आँखें साथ नहीं दे पाती हैं और मेरा दिमाग प्रतिक्रिया देने में धीमा है। मैं जवानों से कई कदम पीछे हूँ। अब मैं बूढ़ी हो गई हूँ, और जो भी करने की कोशिश करती हूँ, शरीर साथ नहीं देता। क्या मैं यह कर्तव्य अच्छे से कर सकती हूँ?” मैंने इस बारे में जितना अधिक सोचा, मैं उतनी ही अधिक हताश होती गई। धीरे-धीरे, मैं हवा निकले गुब्बारे जैसी हो गई और कोई भी चीज करने में मेरी कोई रुचि नहीं थी। मुझे नहीं पता था कि प्रार्थना में क्या कहूँ, और परमेश्वर के वचन पढ़ने से मुझे कोई प्रबुद्धता या रोशनी नहीं मिलती थी। मुझे लगा कि कहीं मैं परमेश्वर द्वारा त्याग और हटा तो नहीं दी जाऊँगी। बाद में, मैंने मन में सोचा, “मैं बूढ़ी हूँ और कम काबिलियत वाली हूँ। अगर मैं सक्रिय रूप से आगे बढ़ने की कोशिश न करूँ तो क्या मैं और भी पीछे नहीं रह जाऊँगी? जैसा कि कहावत है, ‘धीमे चलने से मत डरो, बस रुकने से डरो; एक बार रुकना तुम्हें ढाई मील पीछे कर देता है।’ नहीं, मुझे ऊपर की ओर प्रयास करना ही होगा!” उन दिनों मैं लगातार प्रार्थना करती रही, परमेश्वर से विनती करती रही कि वह मुझे नकारात्मक दशा से निकलने के लिए प्रबुद्ध करे और मार्गदर्शन दे।

बाद में, मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “मैं तुम लोगों में से किसी को भी छोड़ने या निकाल देने का इच्छुक नहीं हूँ, किंतु यदि मनुष्य अच्छा करने का प्रयत्न नहीं करता, तो वह केवल अपने आप को बरबाद कर रहा है; वह मैं नहीं हूँ जो तुम्हें निकाल देता है, बल्कि वह तुम स्वयं हो।” मैंने परमेश्वर के वचनों के इस अंश को पढ़ने के लिए ढूँढ़ निकाला। परमेश्वर कहता है : “मैं तुम लोगों में से किसी को भी छोड़ने या निकाल देने का इच्छुक नहीं हूँ, किंतु यदि मनुष्य अच्छा करने का प्रयत्न नहीं करता, तो वह केवल अपने आप को बरबाद कर रहा है; वह मैं नहीं हूँ जो तुम्हें निकाल देता है, बल्कि वह तुम स्वयं हो। ... मेरा इरादा तुम सभी लोगों को पूर्ण बनाना है, और कम से कम तुम लोगों पर विजय पाना है, ताकि कार्य के इस चरण को सफलतापूर्वक पूरा किया जा सके। प्रत्येक व्यक्ति के लिए परमेश्वर की इच्छा है कि उसे पूर्ण बनाया जाए, अंततः उसके द्वारा उसे प्राप्त किया जाए, उसके द्वारा उसे पूरी तरह से शुद्ध किया जाए, और वह ऐसा इंसान बने जिससे वह प्रेम करता है। चाहे मैं तुम लोगों को पिछड़ा हुआ कहता हूँ या निम्न क्षमता वाला—यह सब तथ्य है। मेरा ऐसा कहना यह प्रमाणित नहीं करता कि मेरा तुम्हें छोड़ने का इरादा है, कि मैंने तुम लोगों में आशा खो दी है, और यह तो बिल्कुल नहीं कि मैं तुम लोगों को बचाना नहीं चाहता। आज मैं तुम लोगों के उद्धार का कार्य करने के लिए आया हूँ, जिसका तात्पर्य है कि जो कार्य मैं करता हूँ, वह उद्धार के कार्य की निरंतरता है। प्रत्येक व्यक्ति के पास पूर्ण बनाए जाने का अवसर होता है : बशर्ते तुम तैयार हो, बशर्ते तुम प्रयास करते हो, अंत में तुम इस परिणाम को प्राप्त करने में समर्थ होगे और तुममें से किसी एक को भी छोड़ नहीं दिया जाएगा। यदि तुम कम काबिलियत के हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी कम काबिलियत के अनुसार होंगी; यदि तुम उच्च काबिलियत के हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी उच्च काबिलियत के अनुसार होंगी; यदि तुम अज्ञानी और निरक्षर हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ इसी अनुसार होंगी; यदि तुम साक्षर हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारे साक्षर होने के अनुसार होंगी; यदि तुम उम्रदराज हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी उम्र के अनुसार होंगी; यदि तुम मेजबानी का कर्तव्य निभाने में सक्षम हो तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ इसी अनुसार होंगी; यदि तुम कहते हो कि तुम मेजबानी का कर्तव्य नहीं निभा सकते हो और केवल कोई निश्चित कार्य ही कर सकते हो, चाहे वह सुसमाचार प्रचार का कार्य हो या कलीसिया की देखरेख करने का कार्य या अन्य सामान्य मामलों को करने का कार्य, तो मेरे द्वारा तुम्हारी पूर्णता भी उस कार्य के अनुसार होगी जो तुम करते हो। वफादार होना, बिल्कुल अंत तक समर्पण करना और परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च प्रेम रखने का प्रयास करना—ये चीजें तुम्हें अवश्य करनी चाहिए, बस ये तीन चीजें और यही सर्वोत्तम अभ्यास हैं। अंततः, लोगों से यह माँग की जाती है कि वे इन तीन चीजों को प्राप्त करे और जो इन्हें प्राप्त कर सकते हैं वे पूर्ण बनाए जाएंगे। किंतु, इन सबसे ऊपर, तुम्हें सच में अनुसरण करना होगा, तुम्हें सक्रियता से आगे और ऊपर की ओर बढ़ते जाना होगा और इस संबंध में निष्क्रिय नहीं होना होगा(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मेरा दिल बहुत रोशन हो गया। परमेश्वर चाहता है कि हर कोई बचाया जाए और पूर्ण बनाया जाए। जब तक हम सत्य का अनुसरण करते हैं, परमेश्वर हमें नहीं हटाएगा, और अंत में हम सभी परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा सकते हैं। परमेश्वर लोगों से उनकी अलग-अलग काबिलियत के आधार पर माँग करता है और सबको एक ही लाठी से हाँकने के ढंग से लोगों के साथ पेश नहीं आता है। परमेश्वर बुजुर्गों से उन मानकों की अपेक्षा नहीं करता जिन्हें जवान हासिल कर सकते हैं, न ही उसने यह कहा है कि वह लोगों को बूढ़े हो जाने पर नहीं बचाएगा। जब तक तुम सत्य का अनुसरण करने को तैयार हो, तुम्हारे पास बचाए जाने का मौका है। परमेश्वर इतना धार्मिक है! लेकिन मैंने परमेश्वर के इरादे को नहीं समझा। मैं मानती थी कि चूँकि युवा लोग सिद्धांतों को जल्दी समझ लेते हैं और अपने कर्तव्य निभाने में दक्ष होते हैं, इसलिए उनके पास बचाए जाने की अधिक संभावना है; और चूँकि मैं बूढ़ी हूँ, प्रतिक्रिया करने में धीमी हूँ और अपने कर्तव्य निभाने में मेरी दक्षता नौजवानों की तुलना में कहीं कमतर है, इसलिए मैं निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा हटाए जाने की पात्र हूँ। यह परमेश्वर के बारे में मेरी गलतफहमी थी। कलीसिया में कर्तव्य निभाना दुनिया में किसी मालिक के लिए काम करने जैसा नहीं है, जहाँ बूढ़े हो जाने पर कोई तुम्हें काम पर नहीं रखता। परमेश्वर लोगों के साथ इस तरह पेश नहीं आता है। पहले, मैं परमेश्वर के इरादे के प्रति अंधी थी, और यहाँ तक कि गलतफहमी में थी, यह सोचती थी कि परमेश्वर बूढ़ों को नहीं बचाता है और इसलिए निराश और हताश महसूस करती थी। मुझे ऐसा नहीं सोचना चाहिए था! परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे महसूस हुआ कि मानो एक शांत लहर ने मेरे मन को धो दिया हो। मुझे सत्य का गंभीरता से अनुसरण करना चाहिए और इसके प्रति सक्रिय रूप से आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए।

फरवरी 2022 की शुरुआत में, 80 वर्षीय बहन लियू यी बीमारी के कारण चल बसी। इसका मुझ पर गहरा असर पड़ा। मैं दिन-ब-दिन बूढ़ी होती जा रही हूँ, और मुझे लैकुनर इन्फार्क्शन है। अगर मैं गलती से गिर गई और मेरे सिर में चोट लग गई, तो मुझे सेरिब्रल हैमरेज हो सकता है। खास तौर पर एक बार, मुझे अचानक चक्कर आ गया और मैं खड़ी नहीं हो सकी, और अपनी आँखें खोलने की हिम्मत नहीं हुई। मैं बहुत डर गई थी, इस बात से भयभीत थी कि कहीं मैं अचानक बीमार पड़कर मर न जाऊँ। मैंने सोचा, “मैं लगभग 80 साल की हूँ, और जो आज बहन लियू के साथ हुआ, वह कल मेरे साथ हो सकता है। मैं अपना कर्तव्य ठीक से निभाने के लिए अपने पास उपलब्ध समय को लपक लेना चाहती हूँ, लेकिन अब मैं बूढ़ी हो गई हूँ, मेरा शरीर वह नहीं करेगा जो मैं इससे कराना चाहती हूँ, फिर चाहे मैं जो भी कार्य करूँ, और मैं हमेशा चीजों को भूलती जा रही हूँ। अगर मैं अपना कर्तव्य नहीं निभा सकती हूँ तो कैसे बचाई जा सकती हूँ? काश! मैं कुछ साल और जवान होती!” महामारी को बद से बदतर होते देख, मुझे चिंता हुई कि कहीं किसी दिन मैं संक्रमित न हो जाऊँ, कि मेरा लैकुनर इन्फार्क्शन और न बिगड़ जाए, और मैं किसी भी क्षण मरने के खतरे में रहूँगी। उन दिनों, मैं लगातार दुख और चिंता में जीती रही। मेरा दिल दुखी और तड़प रहा था, और मैं अपना कर्तव्य निभाने के लिए कोई ऊर्जा नहीं जुटा पा रही थी। लेकिन, मैं जानती थी कि चाहे कुछ भी हो, अपना कर्तव्य न निभाना कोई विकल्प नहीं था। अगर मैंने अपना कर्तव्य छोड़ दिया, तो यह और भी खतरनाक होगा। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “प्रिय परमेश्वर, अब जब मैं बूढ़ी होती जा रही हूँ, मुझे लगता है जैसे मेरे जीवन की उलटी गिनती शुरू हो गई है और मुझे मृत्यु का निरंतर भय है। प्रिय परमेश्वर, तू मेरा मार्गदर्शन कर कि मैं सत्य को समझ सकूँ और चिंता और दुख से बाहर निकल सकूँ।”

एक बार, मैंने आध्यात्मिक भक्ति के दौरान परमेश्वर के वचन पढ़े और उसकी संप्रभुता की कुछ समझ हासिल की। मेरा दिल अब उतना दुखी और चिंतित नहीं था। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “यदि परमेश्वर तुम्हें जीवित रहने की अनुमति देता है, तो चाहे तुम कितने भी बीमार पड़ जाओ, तुम नहीं मरोगे। यदि परमेश्वर तुम्हें जीवित रहने की अनुमति नहीं देता है, तो भले ही तुम बीमार न हो, फिर भी अगर मरना बदा है तो तुम मरोगे। तुम्हारा जीवनकाल परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत है। अगर तुम इस मामले को स्पष्टता से देख सकते हो तो यह दिखाता है कि तुम सत्य को समझते हो और तुममें सच्ची आस्था है। तो क्या परमेश्वर संयोग से लोगों को बीमार कर देता है? यह संयोग से नहीं है; यह उनकी आस्था को परिष्कृत करने का एक तरीका है। यह ऐसी पीड़ा है जो लोगों को सहनी ही चाहिए। यदि वह तुम्हें बीमार करता है तो इससे बचने की कोशिश न करो; यदि वह तुम्हें बीमार नहीं करता है तो इसके लिए अनुरोध न करो। सब कुछ सृष्टिकर्ता के हाथों में है और लोगों को यह सीखना चाहिए कि प्रकृति को उसकी राह पर चलने दें। प्रकृति क्या है? प्रकृति में कुछ भी संयोग से नहीं होता; यह सब परमेश्वर से आता है। यह सत्य है। एक ही बीमारी से पीड़ित लोगों में से कुछ मर जाते हैं और अन्य जीवित रहते हैं; यह सब परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत कर दिया गया था। यदि तुम जीवित रह सकते हो, तो यह साबित करता है कि तुमने अभी तक वह मिशन पूरा नहीं किया है जो परमेश्वर ने तुम्हें दिया था। तुम्हें उसे पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत करनी चाहिए और इस समय को सँजोना चाहिए; इसे बरबाद मत करो। बात इतनी ही है। यदि तुम बीमार हो, तो इससे बचने की कोशिश न करो, और यदि तुम बीमार नहीं हो, तो इसके लिए अनुरोध न करो। किसी भी मामले में, तुम केवल अनुरोध करके वह प्राप्त नहीं कर सकते, जो तुम चाहते हो, और न ही तुम किसी बात से इसलिए बच सकते हो कि तुम बचना चाहते हो। परमेश्वर ने जो करने का निश्चय किया है, उसे कोई नहीं बदल सकता(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे एहसास हुआ कि व्यक्ति का जीवनकाल परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत होता है। बहन लियू की 80 वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई क्योंकि उसका जीवनकाल समाप्ति पर आ चुका था। हर कोई जन्म, बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु का अनुभव करता है—यह जीवन का प्राकृतिक नियम है। मैंने अपने पड़ोसी शाओशी के बारे में सोचा। जब उसकी मृत्यु हुई तो वह केवल 34 वर्ष का था, और हमेशा बहुत स्वस्थ रहता था। अप्रत्याशित रूप से, वह एक बिजली के खंभे से टकराकर मर गया। मुझे एहसास हुआ कि सभी का जीवन परमेश्वर के हाथों में है, और हम अपने भाग्य को नियंत्रित नहीं कर सकते। जब हमारा जीवनकाल समाप्ति पर आ जाता है, तो हम मर जाएंगे, फिर चाहे हम बीमार न भी हों। मेरा ही उदाहरण लें। जब मेरे लैकुनर इन्फार्क्शन का पता चला, तो डॉक्टर ने कहा कि इस उम्र में इस बीमारी के साथ, अगर मैं गिर गई तो सेरिब्रल हैमरेज का बहुत ज़्यादा खतरा होगा। लेकिन मैं हाल के वर्षों में बहुत बार गिरी हूँ और मुझे सेरिब्रल हैमरेज नहीं हुआ। एक बार ऐसा भी हुआ जब मुझे अचानक चक्कर आया और मैं सुध-बुध खो बैठी, मानो मैं किसी भी पल मरने वाली हूँ। लेकिन एक दिन की बेचैनी के बाद मैं ठीक हो गई। अगर मेरा मिशन पूरा नहीं हुआ है, तो मैं बूढ़ी और बीमार होने पर भी नहीं मरूँगी। अगर किसी दिन मेरी बीमारी सच में बढ़ जाती है, तो यह वह पीड़ा है जो मुझे सहनी चाहिए। जब मेरे गुजरने का समय आएगा, तो मैं परमेश्वर की संप्रभुता और आयोजनों के प्रति समर्पण करूँगी। मुझमें यही विवेक होना चाहिए। जब तक मेरी साँसें चल रही हैं, मुझे अपने पास मौजूद अवसर को लपक लेना चाहिए और अपना समय और ऊर्जा अपना कर्तव्य निभाने और सत्य का अनुसरण करने में लगाना चाहिए, हर उस दिन जब मैं जीवित हूँ, कुछ प्राप्त करने का प्रयास करूँ। मैं अब अपने दिन चिंता और घबराहट में नहीं बिता सकती हूँ, अपना अनमोल समय बर्बाद नहीं कर सकती हूँ। जब मैं यह समझ गई, तो मुझे बहुत सुकून महसूस हुआ, और अपने कर्तव्य निभाने के लिए और अधिक ऊर्जा मिली।

बाद में, मैं कोविड-19 से संक्रमित हो गई और मेरी सेहत और याददाश्त और भी कमजोर हो गईं। एक बार, पर्यवेक्षक ने हमारे साथ सभा की और परमेश्वर के वचन पढ़े। उस समय, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा जो मेरी दशा से बखूबी मेल खाता था और मैं बाद में इस अंश के बारे में संगति करना चाहती थी। लेकिन जब मैं पढ़ती गई तो मुझे पहले का मुख्य बिंदु याद नहीं रहा और जब हमने पढ़ना समाप्त किया और मैं उस अंश को खोजने के लिए वापस गई तो मैं उसे ढूँढ़ नहीं सकी। मैं इतनी चिंतित थी कि मेरी नाक के छोर पर पसीना आ गया। अंत में मैंने किसी तरह कुछ शब्द संगति में कहे, लेकिन वे असंगत थे। मुझे बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई, और मैं थोड़ी हताश और निराश हो गई। मैंने सोचा, “अब जब मैं बूढ़ी हो गई हूँ, तो मैं सच में किसी काम की नहीं रही। मेरा दिमाग प्रतिक्रिया देने में धीमा है और मैं चाहे कितनी भी कोशिश करूँ, मैं युवा लोगों की बराबरी नहीं कर सकती हूँ!” मैं जितना अधिक इस बारे में सोचती, उतनी ही अधिक नकारात्मक होती गई। मुझे लगा कि मेरे बचाए जाने की संभावनाएँ धुँधली होती जा रही हैं और मेरे पास आशीष पाने की तो और भी कम उम्मीद है। एक और मौके पर एक बहन ने मेरे लिए परमेश्वर के वचनों के पाठ का एक वीडियो कॉपी किया। मैंने अपनी आँखों से देखा कि बहन ने उसे मेरे लिए कॉपी किया, लेकिन जब मैं घर पहुँची और अपना कंप्यूटर चालू किया, तो मैं उसे नहीं ढूँढ़ सकी। मैंने मन में सोचा, “लगता है कि मैं बुढ़ापा स्वीकार करने से वास्तव में इनकार नहीं कर सकती हूँ। मेरी याददाश्त इतनी खराब क्यों है? अगर कुछ अत्यावश्यक होता है, तो क्या मैं आखिर उसमें देरी नहीं कर बैठूँगी?” जब मैं चिंतित हो रही थी, तभी मेरी बहन आई और मैंने उससे शिकायत करते हुए कहा, “मैं अब इतनी बूढ़ी हो गई हूँ कि मुझे कुछ भी याद नहीं रहता। क्या मेरा सब कुछ खत्म नहीं हो गया? क्या मैं अभी भी सत्य का अनुसरण कर सकती हूँ और बचाई जा सकती हूँ?” मुझे थोड़ा नकारात्मक देखकर बहन ने मुझे दिलासा दिया और परमेश्वर के वचनों का अध्याय “सत्य का अनुसरण कैसे करें (3)” पढ़ने को कहा। मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “बूढ़े लोगों को हमेशा भ्रांति होती है, वे मानते हैं कि वे भ्रमित हैं, उनकी याददाश्त कमजोर है, और इसलिए वे सत्य को नहीं समझ सकते। क्या वे सही हैं? (नहीं।) हालाँकि युवा बूढ़ों से ज्यादा ऊर्जावान और शारीरिक रूप से सशक्त होते हैं, मगर वास्तव में उनकी समझने, बूझने और जानने की क्षमता बूढ़ों के बराबर ही होती है। क्या बूढ़े लोग भी कभी युवा नहीं थे? वे बूढ़े पैदा नहीं हुए थे, और सभी युवा भी किसी-न-किसी दिन बूढ़े हो जाएँगे। बूढ़े लोगों को हमेशा यह नहीं सोचना चाहिए कि चूँकि वे बूढ़े, शारीरिक रूप से कमजोर, बीमार और कमजोर याददाश्त वाले हैं, इसलिए वे युवाओं से अलग हैं। असल में कोई अंतर नहीं है। कोई अंतर नहीं है कहने का मेरा अर्थ क्या है? कोई बूढ़ा हो या युवा, उनके भ्रष्ट स्वभाव एक-समान होते हैं, हर तरह की चीज को लेकर उनके रवैये और सोच एक-समान होते हैं और हर तरह की चीज को लेकर उनके परिप्रेक्ष्य और दृष्टिकोण एक-समान होते हैं। ... तो ऐसा नहीं है कि बड़े-बूढ़ों के पास करने को कुछ नहीं है, न ही वे अपना कर्तव्य निभाने में असमर्थ हैं, उनके सत्य का अनुसरण करने में असमर्थ होने की तो बात ही नहीं उठती—उनके लिए करने को बहुत कुछ है। अपने जीवन में जो विविध पाखंड और भ्रांतियाँ तुमने पाल रखी हैं, साथ ही जो विविध पारंपरिक विचार और धारणाएँ, अज्ञानी, जिद्दी, दकियानूसी, अतार्किक और विकृत चीजें तुमने इकट्ठा कर रखी हैं, वे सब तुम्हारे दिल में जमा हो गई हैं और तुम्हें युवाओं से भी ज्यादा वक्त इन चीजों को खोद निकालने, गहन विश्लेषण करने और पहचानने में लगाना चाहिए। ऐसी बात नहीं है कि तुम्हारे पास कुछ करने को नहीं है, या कोई काम न होने पर तुम्हें संतप्त, व्याकुल और चिंतित अनुभव करना चाहिए—यह न तो तुम्हारा कार्य है न ही तुम्हारी जिम्मेदारी। अव्वल तो बड़े-बूढ़ों की मनःस्थिति सही होनी चाहिए। भले ही तुम्हारी उम्र बढ़ रही हो और शारीरिक रूप से तुम अपेक्षाकृत बूढ़े हो, फिर भी तुम्हें युवा मनःस्थिति रखनी चाहिए। भले ही तुम बूढ़े हो रहे हो, तुम्हारी सोचने की शक्ति धीमी हो गई है, तुम्हारी याददाश्त कमजोर है, फिर भी अगर तुम खुद को जान पाते हो, मेरी बातें समझ सकते हो, और सत्य को समझ सकते हो, तो इससे साबित होता है कि तुम बूढ़े नहीं हो, और तुम्हारी काबिलियत कम नहीं है। अगर कोई 70 की उम्र में होकर भी सत्य को नहीं समझ पाता, तो यह दिखाता है कि उसका आध्यात्मिक कद बहुत ही छोटा है, और कामकाज के लायक नहीं है। इसलिए सत्य की बात आने पर उम्र असंगत होती है...। परमेश्‍वर के घर में और जब सत्य की बात आती है, तो क्या बड़े-बूढ़े लोग एक खास समूह होते हैं? नहीं, बिल्कुल नहीं। सत्य के मामले में उम्र असंगत है, जैसे कि यह तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव, तुम्हारी भ्रष्टता की गहराई, तुम सत्य का अनुसरण करने योग्य हो या नहीं, तुम उद्धार प्राप्त कर सकते हो या नहीं, या तुम्हारे बचाए जाने की संभाव्यता क्या है, इसमें असंगत है। क्या ऐसा नहीं है? (जरूर है।)” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में)। परमेश्वर के वचन सीधे मेरे दिल में उतर गए, खासकर ये वचन : “भले ही तुम बूढ़े हो रहे हो, तुम्हारी सोचने की शक्ति धीमी हो गई है, तुम्हारी याददाश्त कमजोर है, फिर भी अगर तुम खुद को जान पाते हो, मेरी बातें समझ सकते हो, और सत्य को समझ सकते हो, तो इससे साबित होता है कि तुम बूढ़े नहीं हो, और तुम्हारी काबिलियत कम नहीं है।” परमेश्वर हम बूढ़े लोगों को इतनी अच्छी तरह जानता है। वह बुजुर्गों को अस्वीकार नहीं करता, बल्कि वह हमें प्रोत्साहित करता है कि हम एक सकारात्मक मानसिकता रखें, अपनी उम्र के कारण संकट और चिंता में न जिएँ और अपनी पूरी क्षमता के अनुसार अपने कर्तव्य अच्छी तरह निभाने का भरसक प्रयास करें। परमेश्वर के वचनों ने मुझे अभ्यास का एक मार्ग दिया, और मैंने कुछ आशा देखी। मैं हमेशा यह मानती थी कि जवानों की काबिलियत अच्छी होती है, वे सत्य को जल्दी समझते हैं, अपना कर्तव्य निभाने में दक्ष होते हैं और इसलिए उनके पास उद्धार की अधिक आशा होती है। दूसरी ओर, उम्र बढ़ने के साथ मेरी सारी शारीरिक क्रियाएँ ढलती जा रही हैं। मेरी याददाश्त कमजोर है, मैं सत्य को समझने में धीमी हूँ और किसी भी चीज की गति के साथ तालमेल नहीं बिठा पाती हूँ। खासकर कोविड-19 से संक्रमित होने के बाद मेरी याददाश्त और खराब हो गई और मुझे लगता है मानो मैं बेकार हूँ, मेरे पास आशीष प्राप्त की कोई उम्मीद नहीं है। मैं संकट और चिंता की नकारात्मक भावनाओं में जीती रही, जिससे न केवल मेरे अपने जीवन प्रवेश में बाधा आई, बल्कि मेरे कर्तव्य में भी रुकावट आई। मैंने देखा कि नकारात्मक भावनाओं में जीना कितना हानिकारक है, और मुझे सकारात्मक और सक्रिय रूप से सत्य की ओर आगे बढ़ने का प्रयास करना था। यूँ तो मैं बूढ़ी हूँ, समझने में धीमी हूँ और मेरी याददाश्त कमजोर है, लेकिन ऐसा नहीं है कि मैं सत्य को बिल्कुल भी नहीं समझ सकती हूँ और मैं इतनी भी बूढ़ी नहीं हूँ कि परमेश्वर के वचनों को न समझ सकूँ। मुझे अपने सीमित समय को संजोना चाहिए और अपने भ्रष्ट स्वभावों को बदलने के लिए सत्य का अनुसरण करना चाहिए। मुझमें अभी भी बहुत से ऐसे भ्रष्ट स्वभाव हैं जिन्हें मैंने उतार नहीं फेंका है और बहुत से ऐसे दृष्टिकोण हैं जिन्हें पूरी तरह बदलने की जरूरत है। जब तक मैं सत्य का अनुसरण करना नहीं छोड़ती, मेरे पास उद्धार पाने का मौका है। सत्य लोगों के साथ अनुचित रूप से पेश नहीं आता है। जब मैं यह समझ गई तो मेरा दिल सहज हो गया।

इसके बाद के दिनों में, मैं लगातार इस बात पर विचार करती रही कि मुझे निरंतर यह भय क्यों था कि कर्तव्य निभाने के लिए बहुत बूढ़ी होने के कारण मैं बचाई नहीं जा सकूँगी। कौन-सा भ्रष्ट स्वभाव मुझ पर हावी हो रहा था? मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : “लोग आशीष पाने, पुरस्कृत होने, ताज पहनने के लिए परमेश्वर में विश्वास रखते हैं। क्या यह सबके दिलों में नहीं है? ... आशीष प्राप्त करने की इस प्रेरणा के बिना तुम लोग कैसा महसूस करोगे? तुम किस रवैये के साथ अपना कर्तव्य निभाओगे और परमेश्वर का अनुसरण करोगे? अगर लोगों के दिलों में छिपी आशीष प्राप्त करने की यह प्रेरणा दूर कर दी जाए तो ऐसे लोगों का क्या होगा? संभव है कि बहुत-से लोग नकारात्मक हो जाएँगे, जबकि कुछ अपने कर्तव्यों के प्रति प्रेरणाहीन हो जाएँगे। वे परमेश्वर में अपने विश्वास में रुचि खो देंगे, मानो उनकी आत्मा गायब हो गई हो। वे ऐसे प्रतीत होंगे, मानो उनका हृदय छीन लिया गया हो। इसीलिए मैं कहता हूँ कि आशीष पाने की प्रेरणा ऐसी चीज है जो लोगों के दिल में गहरी छिपी है। शायद अपना कर्तव्य निभाते हुए या कलीसिया का जीवन जीते हुए उन्हें लगता है कि वे अपने परिवार त्यागने और खुद को खुशी-खुशी परमेश्वर के लिए खपाने में सक्षम हैं, और अब वे आशीष प्राप्त करने की अपनी प्रेरणा को जानकर इसे दरकिनार भी कर चुके हैं, और अब उससे नियंत्रित या विवश नहीं होते। फिर वे सोचते हैं कि उनमें अब आशीष पाने की प्रेरणा नहीं रही, लेकिन परमेश्वर ऐसा नहीं सोचता है। लोग मामलों को केवल सतही तौर पर देखते हैं। परीक्षणों के बिना, वे अपने बारे में अच्छा महसूस करते हैं। अगर वे कलीसिया नहीं छोड़ते या परमेश्वर के नाम को नहीं नकारते, और परमेश्वर के लिए खपने में लगे रहते हैं, तो वे मानते हैं कि वे बदल गए हैं। उन्हें लगता है कि वे अब अपने कर्तव्य-पालन में व्यक्तिगत उत्साह या क्षणिक आवेगों से प्रेरित नहीं हैं। इसके बजाय, वे मानते हैं कि वे सत्य का अनुसरण कर सकते हैं, और अपना कर्तव्य निभाते हुए लगातार सत्य की तलाश और अभ्यास कर सकते हैं, ताकि उनके भ्रष्ट स्वभाव शुद्ध हो सकें और वे कुछ वास्तविक बदलाव हासिल कर सकें। लेकिन जब सीधे लोगों की मंजिल और परिणाम से संबंधित कोई बात हो जाती है तो वे किस प्रकार व्यवहार करते हैं? सच्चाई पूरी तरह से प्रकट हो जाती है। तो आखिर में, जहाँ तक लोगों की बात है, क्या यह परिस्थिति उद्धार और पूर्णता की है या प्रकट किए जाने और हटाए जाने की? क्या यह अच्छी बात है या बुरी बात? सत्य का अनुसरण करने वालों के लिए इसका अर्थ उद्धार और पूर्णता है, जो अच्छा है; सत्य का अनुसरण न करने वालों के लिए इसका अर्थ है प्रकट किया जाना और हटाया जाना, जो बुरा है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, जीवन संवृद्धि के छह संकेतक)। परमेश्वर के वचनों पर मनन करते हुए मैंने उन्हें खुद से जोड़ा : मैं परमेश्वर में इसलिए विश्वास करती थी क्योंकि मैं आशीष पाना चाहती थी। कार्य के इस चरण को स्वीकार करने के बाद, मैंने उत्साहपूर्वक खुद को खपाया और कलीसिया द्वारा सौंपे गए हर कर्तव्य को निभाने में अपना सब कुछ लगा दिया, कभी भी दुख या थकान महसूस नहीं की। कभी-कभी, मैंने बड़े जोखिम में परमेश्वर के वचनों की किताबें स्थानांतरित कीं, लेकिन मैं डरी नहीं। 2018 में लैकुनर इन्फार्क्शन होने पर भी, मैंने अपने कर्तव्य निभाना बंद नहीं किया। मुझे लगता था कि अगर मैं इस तरह सक्रिय रूप से अपने कर्तव्य निभाती रही तो मुझे भविष्य में आशीष मिलेगा और मेरे पास एक अच्छी मंजिल होगी। लेकिन जब मैं 70 साल की हो गई, मेरी सारी शारीरिक क्रियाएँ ढलने लगीं और मेरी याददाश्त पहले जैसी अच्छी नहीं रही, ऊपर से मुझे लैकुनर इन्फार्क्शन भी था। मुझे डर था कि अगर मैं मर गई तो अपना कर्तव्य नहीं निभा पाऊँगी और बचाई नहीं जाऊँगी, इसलिए मैं एक हताश दशा में जीती थी। मैं बेमन से अपना कर्तव्य निभाती थी, लेकिन मुझमें कोई प्रेरणा नहीं थी। खासकर जब मुझे कोविड-19 संक्रमण हुआ और मैंने देखा कि मेरी सेहत और याददाश्त पहले से भी बदतर हो गई हैं तो उसके बाद मुझे लगा कि मेरे पास आशीष पाने की कोई उम्मीद नहीं है और मैं एक अच्छी मंज़िल हासिल नहीं कर सकती हूँ, इसलिए मैं नकारात्मकता और दुख में जीती थी और कुछ भी करने में मेरी रुचि नहीं होती थी। मैं न तो परमेश्वर के वचन पढ़ना चाहती थी और न ही परमेश्वर से प्रार्थना करना, और मैंने अपना कर्तव्य निभाने का सारा जोश खो दिया; मेरा दिल परमेश्वर से दूर और दूर होता चला गया। अतीत में, जब मुझे आशीष पाने की उम्मीद थी, मैं अपने कर्तव्य में पीड़ा सहने और कीमत चुका पाने में सक्षम थी, परमेश्वर के प्रति सच्चे दिल वाली लगती थी। लेकिन दरअसल मैं अपने कर्तव्य को आशीष प्राप्त करने की पूँजी मानती थी और मैं परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने और उसे धोखा देने की निरंतर कोशिश कर रही थी। मैं कितनी स्वार्थी और नीच थी, मुझमें मानवता की कितनी कमी थी! मैं किस तरह से परमेश्वर में एक सच्ची विश्वासी थी? परमेश्वर पवित्र है और उसके स्वभाव को नाराज नहीं किया जा सकता है। वह यह कैसे सहन कर सकता है कि लोगों उसे चकमा देने की कोशिश करें? ऐसा व्यवहार करने के बावजूद, मैंने फिर भी परमेश्वर से अच्छा प्रतिफल माँगा। मैं कैसी अत्यंत बेशर्म थी! मैंने उन सभी वर्षों में सत्य का अनुसरण करने पर कोई ध्यान नहीं दिया, और मेरा स्वभाव नहीं बदला। मैं आशीष प्राप्त करने की खातिर परमेश्वर में विश्वास करती थी। मैं पौलुस के मार्ग पर चल रही थी! अगर परमेश्वर ने मुझे उजागर न किया होता, तो मैं अब भी आशीषों का अनुसरण कर रही होती और अंत में मुझे पूरी तरह से हटा दिया जाता और नरक में भेज दिया जाता। आज मैं समझ सकी कि मैं किस गलत मार्ग पर थी। यह मेरे लिए परमेश्वर का महान उद्धार था! जब मैं यह समझ गई, तो मुझे सच में पछतावा हुआ कि मैंने इन सभी वर्षों में सत्य का अनुसरण नहीं किया। आगे, मुझे आशीष पाने का अपना इरादा त्यागना था और गंभीरता से सत्य का अनुसरण करना था। मैं परमेश्वर को निराश करना जारी नहीं रख सकती थी।

मैंने आत्म-चिंतन करना जारी रखा और मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया : “मैं प्रत्येक व्यक्ति की मंजिल उसकी आयु, वरिष्ठता और उसके द्वारा सही गई पीड़ा की मात्रा के आधार पर निर्धारित नहीं करता और इस आधार पर तो और भी नहीं कि वह कितना दयनीय है, बल्कि इस बात के अनुसार तय करता हूँ कि उनके पास सत्य है या नहीं। इसके अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अपनी मंजिल के लिए पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार करो)। परमेश्वर ने किसी व्यक्ति के परिणाम को निर्धारित करने के मानकों को स्पष्ट रूप से बताया है। परमेश्वर लोगों के परिणाम इस आधार पर निर्धारित करता है कि क्या वे सत्य का अनुसरण करते हैं, सत्य का अभ्यास करते हैं, और, अंततः क्या वे अपने स्वभाव में बदलाव हासिल करते हैं। यही परमेश्वर की धार्मिकता है। मैं सोचती थी कि परमेश्वर लोगों के परिणाम उनकी उम्र और वे कितना कर्तव्य निभाते हैं, इस आधार पर तय करता है। मेरे दृष्टिकोण से देखें तो, सभी बूढ़े लोगों को हटा दिया जाता, और सभी जवानों का उद्धार हो जाता। अगर ऐसा होता, तो परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव प्रकट नहीं होता। मैंने उन युवा लोगों के बारे में सोचा जिन्हें हमारी कलीसिया से हटा दिया गया था। वे होशियार और गुणी थे, लेकिन वे सत्य का अनुसरण करते ही नहीं थे, सांसारिक सुखों के लालची थे और न तो परमेश्वर के वचन पढ़ते थे और न ही अपने कर्तव्य निभाते थे। अंत में, उन्हें छद्म-विश्वासी निरूपित कर दिया गया और हटा दिया गया। मैंने देखा कि चाहे कोई व्यक्ति जवान हो या बूढ़ा, अगर वह सत्य का अनुसरण नहीं करता है और उसका स्वभाव नहीं बदलता है तो वह अंततः हटा दिया जाएगा।

मैंने परमेश्वर के थोड़े और वचन पढ़े और मेरा दिल और भी रोशन हो गया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “कुछ लोग कहते हैं, ‘मैं साठ साल का हूँ। साठ साल से परमेश्वर मुझ पर निगाह रख रहा है, मेरी रक्षा और मेरा मार्गदर्शन कर रहा है। बूढ़ा होने पर अगर मैं कोई कर्तव्य नहीं निभा पाया और कुछ करने लायक नहीं रहा—क्या परमेश्वर तब भी मेरी परवाह करेगा?’ क्या यह कहना मूर्खता नहीं है? ऐसा नहीं है कि परमेश्वर बस एक जीवनकाल के लिए एक व्यक्ति पर नजर रखता और उसकी रक्षा करता और उसके भाग्य पर उसकी संप्रभुता होती है। अगर यह केवल एक जीवनकाल की, एक ही जीवन की बात होती तो इससे यह प्रदर्शित नहीं हो पाता कि परमेश्वर सर्वशक्तिमान है और सभी चीजों पर उसकी संप्रभुता है। किसी के लिए प्रयास करने और कीमत चुकाने में, परमेश्वर केवल यह व्यवस्था नहीं करता है कि वह इस जीवन में क्या करेगा—वह उसके लिए अनगिनत जीवनकालों की व्यवस्था करता है। परमेश्वर हर उस आत्मा की पूरी ज़िम्मेदारी लेता है जिसका पुनर्जन्म होता है। वह अपने दिल से कार्य करता है, अपने जीवन की कीमत चुकाता है, हर व्यक्ति का मार्गदर्शन करता है और उनमें से हरेक के जीवन की व्यवस्था करता है। यह देखते हुए कि परमेश्वर मनुष्य की खातिर इतना प्रयास करता है और इतनी कीमत चुकाता है और मनुष्य को ये सभी सत्य और यह जीवन प्रदान करता है, यदि इन अंतिम दिनों में लोग सृजित प्राणियों का कर्तव्य नहीं निभाते हैं और सृष्टिकर्ता के सामने नहीं लौटते हैं—यदि चाहे वे कितने भी जीवन और पीढ़ियों से गुज़रे हों, वे अंततः अपने कर्तव्यों को अच्छे ढंग से निभाने और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने में असफल रहते हैं—तो क्या परमेश्वर के प्रति उनका ऋण बहुत ज़्यादा नहीं हो जाएगा? क्या वे उन सारी कीमतों के अयोग्य नहीं होंगे जो परमेश्वर ने चुकाई हैं? उनमें जमीर का इतना अभाव होगा कि वे इंसान कहलाने लायक नहीं रहेंगे, क्योंकि परमेश्वर के प्रति उनका ऋण बहुत बड़ा हो जाएगा(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य प्राप्त करने के लिए कीमत चुकाना बहुत महत्वपूर्ण है)। “तो अब तुम लोगों को क्या करना चाहिए? जबकि परमेश्वर का दिल अभी भी मानवजाति के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है, जब वह मानवजाति के लिए योजनाएँ बना रहा है, जब वह मनुष्य की प्रत्येक गतिविधि और हाव-भाव पर दुखी और क्षुब्ध हो जाता है, तुम्हें जल्द से जल्द अपना चुनाव कर लेना चाहिए और अपने अनुसरण का लक्ष्य और दिशा निर्धारित करनी चाहिए। अपनी योजनाएँ बनाने के लिए तब तक प्रतीक्षा मत करो जब तक परमेश्वर के आराम के दिन न आ जाएँ। यदि तुम्हें तब तक सच्चा पछतावा, खेद, संताप और विलाप महसूस न हो, तो बहुत देर हो चुकी होगी। तुम्हें कोई भी नहीं बचा सकेगा, न ही परमेश्वर बचाएगा(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, मनुष्य को सत्य का अनुसरण क्यों करना चाहिए)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैं बहुत द्रवित हो गई। परमेश्वर हमेशा लोगों की रखवाली और सुरक्षा करता रहा है और हमेशा उनकी अगुआई करता रहा है। मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर ने जो कीमत चुकाई है वह बहुत बड़ी है। मेरा ही उदाहरण ले लो। मैं सिर्फ एक साधारण गृहिणी हूँ। मैं एक निर्धन परिवार में पली-बढ़ी और मेरा कोई आदर नहीं करता था, इसलिए मैं हीन भावना के साथ जीती थी। परमेश्वर ने अंत के दिनों का अपना कार्य स्वीकार करने और कलीसिया में कर्तव्य निभाने की अनुमति देकर मुझ पर अनुग्रह किया है, मुझे बचाए जाने का अवसर प्राप्त करने दिया है। परमेश्वर मेरी भ्रष्टता प्रकट करने के लिए माहौल आयोजित करता रहा है, अपने वचनों का उपयोग करता रहा है ताकि मुझे प्रबुद्ध करे और मेरी यह मदद करे कि मैं खुद को जानूँ और कुछ सत्यों को समझूँ। जब मैं बूढ़ी हो गई, तो मुझे विश्वास हो गया कि चूँकि मेरी प्रतिक्रियाएँ बहुत धीमी थीं और मैं कोई कर्तव्य नहीं कर सकती थी, इसलिए मैं बचाई नहीं जा सकती हूँ और इसलिए मैं एक नकारात्मक दशा में जीती रही। लेकिन परमेश्वर ने फिर भी मुझे सत्य को समझने के लिए प्रबुद्ध किया और संकट और चिंता की नकारात्मक भावनाओं से बाहर निकलने में मेरी मदद की, वह थोड़ा-थोड़ा करके मुझे सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर ले आया। परमेश्वर ने मुझ पर अपना इतना अधिक श्रमसाध्य इरादा लगाया है! मैं परमेश्वर के वचनों पर मनन करते हुए रो पड़ी, ऐसा महसूस हुआ कि मैं अंतरात्मा और विवेक से बिल्कुल विहीन हूँ! मैंने इन सभी वर्षों में ईमानदारी से सत्य का अनुसरण न करके वास्तव में परमेश्वर को निराश किया था, और बहुत सारे पछतावे छोड़ दिए थे। अब परमेश्वर का कार्य अभी समाप्त नहीं हुआ है, और वह अभी भी लोगों को बचाने के लिए कार्य कर रहा है। मुझे अपना सारा समय और ऊर्जा सत्य का अनुसरण करने, अपने भ्रष्ट स्वभावों का समाधान करने और अपना कर्तव्य निभाने में लगाना चाहिए। मुझे उस हद तक अपना कर्तव्य अच्छे से निभाना चाहिए, जिस हद तक मैं निभा सकती हूँ और अब परमेश्वर को मेरे लिए और अधिक परेशान और चिंतित नहीं करना है।

अब मैं दो समूहों की सभाओं के लिए जिम्मेदार हूँ। जब मैं किसी ऐसे भाई या बहन को देखती हूँ जो खराब दशा में है या जिसे कोई कठिनाई है तो मैं समस्याएँ हल करने में उसकी मदद करने के लिए परमेश्वर के प्रासंगिक वचन खोजती हूँ। जब मैं देखती हूँ कि उसकी समस्याएँ थोड़ी-सी हल हो गई हैं, तो मैं वास्तव में खुशी महसूस करती हूँ। जब मेरे पास समय होता है, तो मैं अनुभवजन्य गवाही लेख लिखने और सुसमाचार का प्रचार करने में भी खुद को प्रशिक्षित करती हूँ, और मैं अपनी पूरी क्षमता से अपना कर्तव्य निभाती हूँ। इस तरह जीने से, मैं प्रतिदिन बहुत तृप्त और सहज महसूस करती हूँ। सर्वशक्तिमान परमेश्वर को उसके उद्धार के लिए धन्यवाद!

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