6. आखिरकार मैं परमेश्वर के परीक्षणों का महत्व समझ गई

लू यी, चीन

जुलाई 2024 में एक दिन, मैं अपनी सहयोगी बहनों के साथ लेखों का मूल्यांकन कर रही थी कि तभी बहन जेन ने अचानक कहा कि उसकी तबीयत ठीक नहीं है, उसे चक्कर आ रहा है और सीने में जकड़न महसूस हो रही है। वह कुर्सी पर बैठी-बैठी लड़खड़ाने लगी और ऐसा लग रहा था कि किसी भी पल बेहोश हो जाएगी। पहले तो हमें लगा कि यह सिर्फ उमस भरे मौसम और कमरे में हवा के खराब संचार के कारण है। लेकिन बाद में ये दौरे लगातार अधिक होने लगे। जब वे गंभीर होते तो उसमें बोलने की भी ताकत नहीं होती थी और कुछ ही कदम चलने पर उसकी साँस फूलने लगती थी। वह रोजमर्रा के जीवन में अपनी देखभाल भी नहीं कर पाती थी, अपना कर्तव्य निभाना तो दूर की बात थी। मुझे चिंता होने लगी, “क्या उसे कोई बड़ी बीमारी हो सकती है?” लेकिन फिर मैंने मन ही मन सोचा, “हम सब पाठ-आधारित कर्तव्य कर रहे हैं, जो काफी महत्वपूर्ण है। साथ ही, बहन जेन अपना कर्तव्य निभाने में कठिनाई सह सकती है और कीमत चुका सकती है और उसने इसमें कुछ परिणाम भी हासिल किए हैं। परमेश्वर निश्चित रूप से उसकी रक्षा करेगा और उसे कोई बड़ी बीमारी नहीं होने देगा। शायद परमेश्वर उसकी परीक्षा ले रहा है। शायद जब वह अपना सबक सीख लेगी तो परमेश्वर उसकी बीमारी दूर कर देगा।” फिर बहन जेन जाँच के लिए अस्पताल गई। डॉक्टर ने कहा कि उसकी सभी जाँच रिपोर्ट सामान्य थीं, लेकिन उसकी हृदय गति धीमी थी और हृदय में रक्त का प्रवाह कम था। उसने उसके हृदय और रक्त संचार के लिए कुछ दवाएँ दीं और उसे भरपूर आराम करने और अपना ख्याल रखने को कहा। जाँच के नतीजे देखकर हम सबने मान लिया कि कुछ आराम और स्वास्थ्य लाभ के बाद बहन जेन ठीक हो जाएगी। मैं मन ही मन परमेश्वर का धन्यवाद करती रही और मुझे और भी यकीन हो गया कि हम अविश्वासियों से अलग हैं : हम विश्वासियों के पास परमेश्वर की देखरेख और सुरक्षा है, एक बार जब हम अपने सबक सीख लेंगे तो हमारी बीमारियाँ ठीक हो जाएँगी। लेकिन अप्रत्याशित रूप से, बहन जेन के अस्पताल से लौटने और कुछ समय तक स्वास्थ्य लाभ करने के बाद उसकी बीमारी वापस आ गई और उसे और भी ज्यादा दौरे पड़ने लगे।

एक सुबह वह अपने कमरे में आराम कर रही थी क्योंकि वह अस्वस्थ महसूस कर रही थी कि तभी जाने कैसे वह बिस्तर से नीचे गिर गई। हमने शोर सुना और कमरे के अंदर भागे तो देखा कि वह फर्श पर पड़ी थी, हिल भी नहीं पा रही थी। उसकी आँखें कसकर बंद थीं, वह हाँफ रही थी, उसके हाथ-पैर बर्फ की तरह ठंडे थे, उसके अंग अकड़ गए थे और उसका पूरा शरीर बेकाबू होकर काँप रहा था। ऐसा लग रहा था कि वह एक और साँस नहीं ले पाएगी और किसी भी पल मर सकती है। हम बुरी तरह डर गए थे। हमारी मेजबान बहन ने जल्दी से दिल पर तुरंत असर करने वाली कुछ गोलियाँ ढूँढ़कर उसे दीं, तब जाकर उसे धीरे-धीरे होश आने लगा। जब मैं उस पल के बारे में सोचती तो मेरा दिल अभी भी जोर से धड़कता था। अगर हमने थोड़ी भी देर कर दी होती तो क्या हो जाता, यह सोचकर ही डर लगता है। बहन जेन को बिस्तर पर लेटे हुए, दिल पर हाथ रखे और दर्द से तड़पते चेहरे के साथ देखकर, मेरा दिल दुख उठा। “यह कैसे हो सकता है? क्या डॉक्टर ने नहीं कहा था कि वह ठीक है? लेकिन यह तो साफ है कि उसे दिल की कोई गंभीर समस्या है। मैंने सुना है कि अगर दिल की बीमारी गंभीर हो तो साँस रुक सकती है और अचानक मौत हो सकती है। वह सिर्फ उम्र के तीसवें दशक में है—उसे इतनी गंभीर बीमारी कैसे हो गई?” यह खासकर तब मुश्किल था जब मैंने उसे कमजोर आवाज में यह कहते सुना, “मेरी तबीयत अभी बहुत खराब है, ऐसा लगता है जैसे मेरा दिल किसी भी पल धड़कना बंद कर देगा। अगर मैं मर जाऊँ तो तुम मेरी माँ को जरूर बताना कि वह परमेश्वर को गलत न समझे। परमेश्वर जो भी करता है, वह धार्मिक है...।” वह कुछ कहती और फिर रुक जाती, छोटे-छोटे, हड़बड़ी भरे वाक्यों में बोल रही थी। उसे इस तरह देखकर मैं बहुत डर गई। मैंने कभी किसी को मौत के इतने करीब नहीं देखा था और एक पल के लिए मुझे समझ नहीं आया कि उसे दिलासा देने के लिए क्या कहूँ। बाद में उसकी सेहत का ख्याल रखते हुए अगुआ ने उसके परिवार को खबर दी और उन्हें उसे ठीक होने के लिए घर ले जाने को कहा।

बहन जेन की बीमारी का मामला मुझे समझ नहीं आ रहा था। “वह एक सच्ची विश्वासी है। कर्तव्य निभाने पर उसके पति ने जबरन उसे घर से निकाल दिया था, इन बीते सालों में वह कलीसिया में महत्वपूर्ण कर्तव्य निभाती रही है और उसने कुछ नतीजे भी हासिल किए हैं। वह इतनी बीमार क्यों हो गई? परमेश्वर ने उसकी रक्षा क्यों नहीं की? भले ही यह एक परीक्षण हो, इसे इतना गंभीर तो नहीं होना चाहिए, है न? अगर वह मर गई तो उसे कैसे बचाया जा सकता है? मैं यह तो समझ सकती हूँ कि अविश्वासियों और परमेश्वर का प्रतिरोध करने वालों पर हर तरह के दुर्भाग्य आते हैं, लेकिन बहन जेन अलग है। वह सच्चे दिल से परमेश्वर में विश्वास करती है। उस पर इतना भयानक दुर्भाग्य कैसे आ सकता है?” मेरा मन बहुत बेचैन था और मैं समझ नहीं पा रही थी कि परमेश्वर का इरादा क्या था। इसके चलते मैं अपने बारे में सोचने लगी। मैं सोचती थी कि चूँकि मुझे अपना कर्तव्य निभाने के लिए अपना परिवार और करियर छोड़े हुए दस साल से ज्यादा हो गए हैं और मैंने हमेशा महत्वपूर्ण कर्तव्य निभाए हैं और कुछ नतीजे भी हासिल किए हैं, अगर मैं इसी तरह अनुसरण करती रही तो निश्चित रूप से मुझे बचाया जाएगा और मैं परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करूँगी। लेकिन बहन जेन की स्थिति ने मुझे अचानक महसूस कराया कि मेरे अपने उद्धार की भी कोई गारंटी नहीं है। क्या होगा अगर एक दिन बहन जेन की तरह ही मुझ पर भी कोई बड़ा दुर्भाग्य आ पड़े या मुझे मौत का सामना करना पड़े? अगर मैं मर गई तो मुझे कैसे बचाया जा सकेगा? तो क्या इतने सालों तक कीमत चुकाने और खुद को खपाने के मेरे सारे प्रयास व्यर्थ नहीं चले जाएँगे? जब मैंने यह सोचा तो मैं थोड़ी हताश हो गई। मेरा दिल अब अपने कर्तव्य में नहीं लग रहा था और मैं बस हर दिन उतना ही करती जितना काम निपटा पाती, सिर्फ हाथ में मौजूद काम को पूरा करने से ही संतुष्ट थी। मुझे लगा जैसे मेरे और परमेश्वर के बीच कोई दीवार खड़ी हो गई है। मैं खुद से पूछे बिना नहीं रह सकी, “मेरी समस्या क्या है? जब से बहन ज़ेन बीमार हुई है, मैं अपने कर्तव्य के लिए कोई प्रेरणा क्यों नहीं जुटा पा रही हूँ?”

खोज के दौरान मैंने “क्या आपदा से पीड़ित होना बुरी बात है?” नामक एक अनुभवजन्य गवाही का वीडियो देखा। उसमें बताए गए परमेश्वर के वचनों के दो अंश सीधे मेरी अवस्था पर लागू होते थे। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “जब कुछ लोग किसी व्यक्ति को कठिनाइयों का सामना करते देखते हैं तो वे खुद को उस व्यक्ति के स्थान पर रखकर तुरंत अपने बारे में सोचते हैं। जब भी वे किसी को किसी प्रकार की पीड़ा, बीमारी, क्लेश या विपत्ति का सामना करते देखते हैं तो वे तुरंत अपने बारे में सोचकर आशंकित होते हैं, ‘अगर मेरे साथ ऐसा होता तो मैं क्या करता? इससे पता चलता है कि विश्वासी अभी भी इन चीजों का सामना कर सकते हैं और ऐसी पीड़ा झेल सकते हैं। तो वास्तव में परमेश्वर कैसा परमेश्वर है? यदि परमेश्वर उस शख्स की भावनाओं के प्रति इतना ही अविचारशील है तो क्या वह मेरे साथ भी वैसा ही व्यवहार करेगा? इससे पता चलता है कि परमेश्वर विश्वसनीय नहीं है। किसी भी जगह और किसी भी समय वह लोगों के लिए एक अनपेक्षित माहौल बनाता है और उन्हें लगातार शर्मनाक स्थितियों में और किसी भी परिस्थिति में डाल सकता है।’ वे डरते हैं कि यदि वे विश्वास के मार्ग से हटे तो आशीष से वंचित रहेंगे, यदि विश्वास करना जारी रखते हैं तो आपदा का सामना करना पड़ेगा। इस वजह से परमेश्वर के समक्ष प्रार्थना करते हुए लोग बस यही कहते हैं, ‘परमेश्वर, मैं तुमसे आशीष देने की विनती करता हूँ’ और यह कहने की हिम्मत नहीं करते, ‘परमेश्वर, मेरी परीक्षा लो, मुझे अनुशासित करो और जैसा तुम चाहो वैसा करो, मैं इसे स्वीकार करने को तैयार हूँ’—वे इस तरह प्रार्थना करने का साहस नहीं करते। कुछ बाधाओं और विफलताओं का अनुभव करने के बाद लोगों का संकल्प और साहस कम हो जाता है, उनमें परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव, उसकी ताड़ना और न्याय और उसकी संप्रभुता की अलग ‘समझ’ होती है और वे परमेश्वर को लेकर सावधान भी हो जाते हैं। इस तरह लोगों और परमेश्वर के बीच एक दीवार खड़ी हो जाती है, एक अलगाव बन जाता है। क्या लोगों में ये मनोदशाएँ होना सही है? (नहीं।) तो क्या ये मनोदशाएँ तुम लोगों के भीतर विकसित होती हैं? क्या तुम इन मनोदशाओं में रहते हो? (हाँ।) ऐसी समस्याओं को कैसे हल किया जाना चाहिए? क्या सत्य न खोजना ठीक है? यदि तुम सत्य को नहीं समझते हो और तुममें आस्था नहीं है तो तुम्हारे लिए अंत तक परमेश्वर का अनुसरण करना कठिन होगा और तुम जब भी विपत्तियों और आपदाओं का सामना करोगे, चाहे वे प्राकृतिक हों या मानव निर्मित, तुम गिर जाओगे(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है (11))। “परमेश्वर में विश्वास रखने वाला हर व्यक्ति केवल परमेश्वर के अनुग्रह, आशीष और वादों को स्वीकारने के लिए तैयार है, और केवल उसकी दया और करुणा को स्वीकारना चाहता है। कोई भी परमेश्वर की ताड़ना और न्याय, उसके परीक्षण और शोधन या उसके द्वारा वंचित किए जाने को स्वीकारने की प्रतीक्षा या तैयारी नहीं करता है; एक भी व्यक्ति परमेश्वर के न्याय और ताड़ना, उसके द्वारा वंचित किए जाने या उसके शाप को स्वीकारने के लिए तैयारी नहीं करता है। लोगों और परमेश्वर के बीच यह रिश्ता सामान्य है या असामान्य? (असामान्य।) तुम इसे असामान्य क्यों कहते हो? इसमें कहाँ कमी रह जाती है? इसमें कमी यह है कि लोगों के पास सत्य नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोगों के पास बहुत सारी धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं, वे लगातार परमेश्वर को गलत समझते हैं और सत्य खोजकर इन चीजों को ठीक नहीं करते हैं—इससे समस्याएँ उत्पन्न होने की संभावना सबसे अधिक होती है। विशेष रूप से, लोग केवल आशीष पाने के लिए ही परमेश्वर में विश्वास करते हैं। वे परमेश्वर के साथ बस सौदा करना चाहते हैं, उससे चीजों की मांग करते हैं, पर वे सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं। यह बहुत ही खतरनाक है। जैसे ही उनका सामना किसी ऐसी चीज से होता है जो उनकी धारणाओं के विपरीत है तो उनमें तुरंत परमेश्वर को लेकर धारणाएँ, शिकायतें और गलतफहमियां विकसित हो जाती हैं और वे उसे धोखा देने की हद तक भी जा सकते हैं। क्या इसके परिणाम गंभीर होते हैं? ज्यादातर लोग परमेश्वर में विश्वास रखते हुए किस मार्ग पर चलते हैं? भले ही तुम लोगों ने बहुत सारे उपदेश सुने होंगे और महसूस किया होगा कि तुम बहुत-से सत्यों को समझ गए हो, पर सच तो यह है कि तुम लोग अभी भी सिर्फ भरपेट निवाले खाने के लिए परमेश्वर में विश्वास के मार्ग पर चल रहे हो(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है (11))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैं समझी कि मेरी हताशा का असली कारण यह था कि परमेश्वर में विश्वास को लेकर मेरे दृष्टिकोण में समस्या थी। मैं परमेश्वर में सिर्फ इसलिए विश्वास करती थी क्योंकि मैं उनसे आशीषें पाना चाहती थी। जिस पल मुझे आशीष पाने की कोई उम्मीद नहीं दिखी, मैं परमेश्वर को गलत समझने और उनके बारे में शिकायत करने लगी, और मेरी उन पर से आस्था जाने लगी। जब बहन ज़ेन पहली बार बीमार हुई, तो हालाँकि मैं थोड़ी चिंतित थी, मैंने सोचा कि चूँकि हम महत्वपूर्ण कर्तव्य निभा रही थीं और वह एक सच्ची विश्वासी थी, परमेश्वर निश्चित रूप से उसकी रक्षा करेंगे और उसे ठीक कर देंगे। साथ ही, जब अस्पताल की जाँच में उसकी सभी रिपोर्ट सामान्य आईं, तो मुझे और भी यकीन हो गया कि परमेश्वर विश्वासनीय हैं, और जो लोग सच में उनके लिए खुद को खपाते हैं, उन्हें निश्चित रूप से उनकी आशीषें और सुरक्षा मिलेगी। लेकिन जब उसकी बीमारी वापस आई और वह मौत का सामना कर रही थी, तो मैं परमेश्वर को गलत समझने और उनके बारे में शिकायत करने लगी, “उस पर इतना भयानक दुर्भाग्य क्यों आया? परमेश्वर ने उसकी रक्षा क्यों नहीं की?” मुझे तो यह भी लगने लगा कि विश्वासी अविश्वासियों से अलग नहीं हैं, और उनके उद्धार की भी कोई गारंटी नहीं है। मैंने फौरन अपने बारे में सोचा, मैं चिंता करने लगी कि बहन ज़ेन की तरह ही मुझ पर भी अचानक कोई दुर्भाग्य आ सकता है। अगर मुझे कोई लाइलाज बीमारी हो गई और मैं मर गई, तो मैं कैसे बचाई जा सकूँगी? जैसे ही मैंने अपने भविष्य और मंज़िल के बारे में चिंता करना शुरू किया, मेरा दिल परमेश्वर से दूर हो गया, और मैं अपने कर्तव्य में निष्क्रिय और नकारात्मक हो गई। मैंने देखा कि मैं परमेश्वर पर अपनी आस्था में उनसे केवल आशीषें और अनुग्रह पाना चाहती थी। जिस पल मेरी इच्छाएँ चकनाचूर हुईं, मैं उन्हें गलत समझने और उनके बारे में शिकायत करने से खुद को रोक नहीं सकी, यहाँ तक कि हताशा में डूब गई और अपने कर्तव्य में लापरवाह हो गई। यह परमेश्वर का विरोध करना था; यह उनके साथ विश्वासघात था! मेरा व्यवहार धार्मिक दुनिया के उन लोगों से अलग नहीं था जो सिर्फ भरपेट निवाले खाते हैं। जब परमेश्वर ने मुझे आशीष दी, तो मैं उत्साह से भरी थी, त्यागने व खपाने को और कोई भी कीमत चुकाने को तैयार थी। लेकिन जिस पल आशीष पाने की मेरी उम्मीदें खत्म हो गईं, मैं फौरन मुरझा गई। मैंने देखा कि मैंने सालों तक सिर्फ आशीषों और अनुग्रह के लिए ही परमेश्वर में विश्वास किया था, और मैं एक ऐसी छद्म-विश्वासी थी जो सिर्फ भरपेट निवाले खाने के लिए ही विश्वास करती थी। मैं खुद से घृणा और नफरत करने लगी। परमेश्वर को इतना गलत समझने के लिए मुझे आत्म-निंदा और अपराध-बोध भी महसूस हुआ।

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा, और परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव के बारे में कुछ समझ हासिल की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “यदि तुम्हारा मन पहले से ही न्याय और ताड़ना, परीक्षणों और शोधन को स्वीकारने के लिए तैयार है और तुमने मानसिक रूप से खुद को आपदा झेलने के लिए भी तैयार कर लिया है, और यदि तुमने परमेश्वर के लिए खुद को कितना ही खपाया हो और अपना कर्तव्य निभाने में कितने ही त्याग किए हो, तुम्हें वास्तव में अय्यूब जैसे परीक्षणों का सामना करना पड़ा हो, और परमेश्वर ने तुमसे तुम्हारी सारी संपत्ति छीन ली हो, यहाँ तक कि तुम्हारा जीवन खत्म होने के कगार पर हो, तब तुम क्या करोगे? तुम्हें परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं से कैसे निपटना चाहिए? तुम्हें अपने कर्तव्य से कैसे निपटना चाहिए? परमेश्वर ने तुम्हें जो सौंपा है उससे तुम्हें कैसे निपटना चाहिए? क्या तुम्हारे पास सही समझ और सही रवैया है? इन प्रश्नों का उत्तर देना आसान है या नहीं? यह तुम लोगों के सामने खड़ी की गई एक बड़ी बाधा है। क्योंकि यह एक बाधा और समस्या है, तो क्या इसका समाधान नहीं किया जाना चाहिए? (बिल्कुल किया जाना चाहिए।) इसका समाधान कैसे करें? क्या इसे सुलझाना आसान है? मान लो कि इतने साल तक परमेश्वर में विश्वास रखने, परमेश्वर के इतने सारे वचन पढ़ने, इतने सारे उपदेश सुनने और इतने सारे सत्य समझने के बाद तुम पहले से ही परमेश्वर को सब कुछ आयोजित करने देने के लिए तैयार हो, फिर चाहे वह आशीषें प्राप्त करने की बात हो या दुर्भाग्य सहने की। और मान लो कि खुद को त्यागने और खपाने और तुमने जो कीमत चुकाई है और जीवनभर की मेहनत के बावजूद अंततः तुम्हें बदले में परमेश्वर का शाप ही मिलता है या वह तुम्हें वंचित कर देता है। तब भी अगर तुम शिकायत नहीं करते, तुम्हारी अपनी कोई इच्छा या अपेक्षा नहीं रहती, बल्कि तुम केवल परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और खुद को उसके आयोजनों की दया पर रखने का प्रयास करते हो, और तुम्हें लगता है कि परमेश्वर की संप्रभुता के बारे में थोड़ी-सी भी समझ और थोड़ा-सा भी समर्पण तुम्हारे जीवन को सार्थक बनाता है—यदि तुम्हारे पास ऐसा सही दृष्टिकोण है तो क्या तब कुछ कठिनाइयाँ आने पर उन्हें हल करना आसान नहीं है? ... परमेश्वर सभी के साथ उचित व्यवहार करता है, और जब किसी सृजित प्राणी की बात आती है, तो परमेश्वर के स्वभाव में करुणा और प्रेम के साथ-साथ प्रताप और क्रोध भी होता है। हरेक व्यक्ति के साथ परमेश्वर के व्यवहार में उसके धार्मिक स्वभाव की करुणा, प्रेम, प्रताप और क्रोध बदलता नहीं है। परमेश्वर कभी भी केवल गिने-चुने लोगों पर दया और प्रेम और केवल दूसरों पर प्रताप और क्रोध नहीं दिखाएगा। परमेश्वर ऐसा कभी नहीं करेगा क्योंकि वह धार्मिक परमेश्वर है और सबके साथ निष्पक्ष रहता है। परमेश्वर की करुणा, प्रेम, प्रताप और क्रोध सभी के लिए है। परमेश्वर लोगों को अनुग्रह और आशीष दे सकता है और उनकी सुरक्षा कर सकता है। साथ ही साथ, परमेश्वर लोगों का न्याय कर सकता है और उन्हें ताड़ना दे सकता है, उन्हें शाप दे सकता है और उनसे वो सब छीन सकता है जो उसने उन्हें दिया है। परमेश्वर लोगों को बहुत कुछ देता है, पर वह उनसे सब कुछ छीन भी सकता है। यह परमेश्वर का स्वभाव है और उसे सबके साथ यही करना चाहिए। इसलिए यदि तुम सोचते हो, ‘मैं परमेश्वर की नजरों में अनमोल हूँ, उसकी आँखों का तारा हूँ। वह मुझे ताड़ना देने और मेरा न्याय करने की बात बिल्कुल भी सहन नहीं कर सकता, और उसके पास ऐसा दिल बिल्कुल भी नहीं होगा कि वह मुझसे वह सब छीन ले जो उसने मुझे दिया है, अन्यथा मैं परेशान और व्यथित हो जाऊँगा’ तो क्या यह सोच गलत नहीं है? क्या यह परमेश्वर के बारे में धारणा नहीं है? (बिल्कुल है।) तो इन सत्यों को समझने से पहले, क्या तुम केवल परमेश्वर के अनुग्रह, करुणा और प्रेम का आनंद उठाने के बारे में नहीं सोचते रहते? इस वजह से तुम बार-बार यह भूल जाते हो कि परमेश्वर प्रतापी और क्रोधी भी है। भले ही तुम्हारे होठ कहते हैं कि परमेश्वर धार्मिक है और जब वह तुम पर करुणा और प्रेम दिखाता है तो तुम उसका धन्यवाद और उसकी स्तुति करने में सक्षम हो, और जब परमेश्वर तुम्हारा न्याय करने और ताड़ना देने में तुम पर प्रताप और क्रोध दिखाता है तो तुम बहुत परेशान हो जाते हो। तुम सोचते हो, ‘काश ऐसा परमेश्वर होता ही नहीं। काश परमेश्वर ने मेरे साथ ये सब न किया होता, काश परमेश्वर मुझे निशाना न बनाता, काश परमेश्वर का इरादा ऐसा नहीं होता, काश ये सब दूसरों के साथ होता। क्योंकि मैं एक दयालु व्यक्ति हूँ, मैंने कुछ भी बुरा नहीं किया है और मैंने कई वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास रखने की भारी कीमत चुकाई है इसलिए परमेश्वर को इतना निर्दयी नहीं होना चाहिए। मुझे परमेश्वर की करुणा और प्रेम के साथ-साथ उसके प्रचुर अनुग्रह और आशीष का आनंद लेने का हकदार और योग्य होना चाहिए। परमेश्वर मेरा न्याय नहीं करेगा या मुझे ताड़ना नहीं देगा, न ही उसके पास ऐसा करने वाला दिल है।’ क्या यह महज मनमानी और गलत सोच है? (हाँ।) यह किस तरह से गलत है? यहाँ गलत बात यह है कि तुम खुद को एक सृजित प्राणी, सृजित मानवता का सदस्य नहीं मानते। तुम गलती से खुद को सृजित मानवता से अलग करके एक विशेष समूह या विशेष प्रकार का सृजित प्राणी मानते हो, खुद को एक विशेष दर्जा दे देते हो। क्या यह अहंकारी और आत्मतुष्ट होना नहीं है? क्या यह विवेकहीन होना नहीं है? क्या यह वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पण करने वाला व्यक्ति है? (नहीं।) बिल्कुल नहीं(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है (11))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं समझ गई कि परमेश्वर सभी के प्रति निष्पक्ष और धार्मिक है। वह हमेशा किसी की रक्षा और उसे आशीष नहीं देता, उसे हर दुर्भाग्य से नहीं बचाता, सिर्फ इसलिए कि उसका कर्तव्य महत्वपूर्ण है या उसने अपने कर्तव्य में कुछ विशेष योगदान दिया है। लेकिन मैं हमेशा सोचती थी कि दुर्भाग्य केवल अविश्वासियों या उन लोगों पर आता है जो परमेश्वर के प्रति सच्चे नहीं थे और सत्य का अनुसरण नहीं करते थे। मेरा मानना था कि चूँकि बहन ज़ेन कलीसिया में एक महत्वपूर्ण कर्तव्य निभा रही थी और उसने कुछ परिणाम भी हासिल किए थे, तो परमेश्वर को उसे गंभीर बीमारी और दुर्भाग्य से बचाना चाहिए था। यह पूरी तरह से मेरी अपनी धारणा और कल्पना थी और यह बिल्कुल भी सत्य के अनुरूप नहीं थी। परमेश्वर का सार धार्मिक है। चाहे परमेश्वर लोगों को आशीष दें या उन्हें दुर्भाग्य भुगतने दें, वे हमेशा धार्मिक रहते हैं। परमेश्वर कोई गलती नहीं करते। एक सृजित प्राणी को जो करना चाहिए वह है स्वीकार करना और समर्पण करना। यही वह विवेक है जो हममें होना चाहिए। मैंने एक बहन के बारे में सोचा जो हमेशा एक अगुआ रही थी, कई महत्वपूर्ण कार्यों की जिम्मेदारी उठाई थी। बाद में, उसे गंभीर उच्च रक्तचाप और अन्य बीमारियाँ हो गईं जो जानलेवा भी बन गई थीं। हालाँकि वह कमजोर महसूस करती थी, उसने सबक सीखने के लिए सत्य खोजने पर ध्यान केंद्रित किया और समर्पण कर सकी। इस अनुभव के बाद, उसने अपने भ्रष्ट स्वभाव और परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव के बारे में कुछ समझ हासिल की, और अपनी अनुभवजन्य समझ के बारे में एक लेख भी लिखा। परमेश्वर ने उसके भीतर की भ्रष्टता और अशुद्धियों को शुद्ध करने के लिए बीमारियों को उस पर आने दिया; यह परमेश्वर का उसे बचाना और उसे पूर्ण बनाना था, और यह उसके कार्य की बुद्धि थी। और फिर अय्यूब है। वह एक ऐसा व्यक्ति था जो परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था। परमेश्वर ने शैतान को उसे ललचाने की अनुमति दी : उसकी संपत्ति छीन ली गई, उसके बच्चे मारे गए, और उसका अपना शरीर दर्दनाक फोड़ों से ढक गया। उसके देह ने बहुत कष्ट सहा, लेकिन उसने परमेश्वर को नहीं त्यागा और न ही एक भी ऐसा शब्द कहा जिससे वे नाराज़ हों, और उसने परमेश्वर के लिए एक ज़बरदस्त गवाही दी। सतही तौर पर, यह हमारी धारणाओं के विपरीत लगता है कि परमेश्वर शैतान को अय्यूब को ललचाने और उसे इतना कष्ट देने की अनुमति देंगे। लेकिन परमेश्वर ने इन चीजों का इस्तेमाल अय्यूब से शैतान के सामने अपने लिए एक ज़बरदस्त गवाही दिलवाने के लिए किया, और अय्यूब की आस्था पूर्ण की गई। परमेश्वर चाहे जो भी करें, वह अच्छा ही होता है। लोगों का दुर्भाग्य का सामना करना ज़रूरी नहीं कि बुरी बात हो। अगर लोग परमेश्वर का इरादा खोज सकें और सबक सीख सकें, सत्य को समझ सकें, और शुद्ध हो सकें, तो बुरी बात अच्छी बात बन जाती है। मैं सोचती थी कि सब कुछ सुरक्षित होना और सुचारू रूप से चलना एक अच्छी बात है, जबकि आपदाएँ और दुर्भाग्य बुरी बातें थीं। अब मैं देखती हूँ कि मेरा यह दृष्टिकोण विकृत था। अंत के दिनों में परमेश्वर का कार्य न्याय और शुद्धिकरण का कार्य है। वह हमें परखने और हमारा शोधन करने के लिए हर तरह की ऐसी घटनाओं का उपयोग करते हैं जो हमारी धारणाओं से मेल नहीं खातीं, हमारे भ्रष्ट स्वभावों और हमारे इरादों की अशुद्धियों को प्रकट करते हैं, ताकि हम खुद पर चिंतन कर सकें और खुद को जान सकें, सत्य खोज सकें, सत्य का अभ्यास कर सकें, और परमेश्वर का उद्धार पाने के लिए अपने भ्रष्ट स्वभावों को उतार फेंके। लेकिन मैं परमेश्वर के कार्य को नहीं समझी। अपनी आस्था में, मैंने केवल चीजों के सुरक्षित होने, सुचारू रूप से चलने, और परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेने का ही अनुसरण किया। मैं परीक्षणों या दुर्भाग्य का सामना नहीं करना चाहती थी। मैं चाहे कितने भी साल इस तरह से परमेश्वर के कार्य का अनुभव करती, मैं कभी भी शुद्धिकरण या बदलाव हासिल नहीं कर पाती। अब, मैं समझती हूँ कि बहन ज़ेन की गंभीर बीमारी के पीछे परमेश्वर का इरादा ज़रूर है, और उसके लिए सीखने को सबक हैं। अगर मैं इस मामले की असलियत नहीं देख सकती, तो मुझे इसे मानवीय दृष्टिकोण से विश्लेषण और अध्ययन करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। मुझे सत्य और परमेश्वर का इरादा खोजना चाहिए, और सबसे बढ़कर, मुझे अपने हाथ में मौजूद कर्तव्य में देरी नहीं करनी चाहिए। मुझमें यही समझ होनी चाहिए।

बाद में, मैंने सोचा, “बहन ज़ेन के बीमार होने के बाद मैं लगातार इतनी हताश क्यों थी? इस हताशा का मूल कारण क्या था?” खोज करते समय, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “परमेश्वर के परिवार में भाई-बहनों के बीच तुम्हारा रुतबा या स्थान चाहे कितना भी ऊँचा हो या तुम्हारा कर्तव्य कितना भी महत्वपूर्ण हो और तुम्हारी प्रतिभा और योगदान कितना ही महान हो या तुमने कितने ही लंबे समय से परमेश्वर में विश्वास किया हो, परमेश्वर की नजर में तुम एक सृजित प्राणी ही हो, एक सामान्य सृजित प्राणी, और तुमने खुद को जो महान पदवियाँ और उपाधियाँ दी हैं उनका कोई अस्तित्व नहीं है। यदि तुम हमेशा उन्हें ताज की तरह मानते हो या पूँजी की तरह मानते हो जो तुम्हें एक विशेष समूह से संबंधित होने या एक विशेष हस्ती होने में सक्षम बनाता है, तब ऐसा करके तुम परमेश्वर के विचारों का प्रतिरोध करते हो और उनसे टकराते हो और परमेश्वर के साथ मेल नहीं खाते हो। इसके परिणाम क्या होंगे? क्या यह तुम्हें उन कर्तव्यों का प्रतिरोध करने के लिए प्रेरित करेगा जो एक सृजित प्राणी को निभाने चाहिए? परमेश्वर की नजर में तुम सिर्फ एक सृजित प्राणी हो, लेकिन तुम खुद को ऐसा नहीं मानते। क्या तुम सचमुच ऐसी मानसिकता के साथ परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हो? तुम हमेशा मनमाने ढंग से सोचते हो, ‘परमेश्वर को मेरे साथ ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए, वह मेरे साथ ऐसा व्यवहार कभी नहीं कर सकता।’ क्या इससे परमेश्वर के साथ टकराव पैदा नहीं होता? जब परमेश्वर तुम्हारी धारणाओं, मानसिकता और जरूरतों के विपरीत कार्य करेगा तो तुम्हारा दिल क्या सोचेगा? परमेश्वर ने तुम्हारे लिए जिन परिवेशों की व्यवस्था की है तुम उनसे कैसे निपटोगे? क्या तुम समर्पण करोगे? (नहीं।) तुम समर्पण नहीं कर पाओगे और तुम निश्चित रूप से विरोध, प्रतिरोध और शिकायत करोगे, असंतोष दिखाओगे, अपने दिल में बार-बार इस पर विचार करते हुए सोचोगे, ‘मगर परमेश्वर तो मेरी रक्षा करता था और मेरे साथ कृपापूर्ण व्यवहार करता था। वह अब क्यों बदल गया है? मैं अब और नहीं जी सकता!’ फिर तुम चिड़चिड़े होकर असामान्य व्यवहार करने लगते हो। यदि तुम अपने घर में माता-पिता के साथ ऐसा व्यवहार करते हो तो यह क्षमा योग्य होगा और वे तुम्हारे साथ कुछ नहीं करेंगे। लेकिन यह परमेश्वर के घर में स्वीकार्य नहीं है। क्योंकि तुम बालिग और एक विश्वासी हो, दूसरे लोग तक तुम्हारी बेहूदगी बर्दाश्त नहीं करेंगे—क्या तुम्हें लगता है कि परमेश्वर ऐसा व्यवहार सहन करेगा? क्या वह यह सहन करेगा कि तुम उसके साथ यह करो? नहीं, वह ऐसा नहीं करेगा। क्यों नहीं करेगा? परमेश्वर तुम्हारा माता-पिता नहीं है, वह परमेश्वर है, सृष्टिकर्ता है, और सृष्टिकर्ता कभी भी किसी सृजित प्राणी को चिड़चिड़े और विवेकहीन होने या अपने सामने नखरे दिखाने की अनुमति नहीं देगा। जब परमेश्वर तुम्हें ताड़ना देता है, तुम्हारा न्याय करता है, तुम्हारी परीक्षा लेता है या तुमसे चीजें छीन लेता है, तुम्हें प्रतिकूल परिस्थिति में डालता है, तो वह सृष्टिकर्ता के साथ व्यवहार में एक सृजित प्राणी का रवैया देखना चाहता है, वह देखना चाहता है कि सृजित प्राणी कौन-सा मार्ग चुनता है, और वह तुम्हें कभी भी चिड़चिड़े और विवेकहीन होने या बेतुके बहाने बनाने की अनुमति नहीं देगा। इन चीजों को समझने के बाद क्या लोगों को यह नहीं सोचना चाहिए कि सृष्टिकर्ता जो कुछ भी करता है उससे कैसे निपटा जाए? सबसे पहले लोगों को सृजित प्राणियों के रूप में अपना उचित स्थान ग्रहण करना चाहिए और सृजित प्राणियों के रूप में अपनी पहचान स्वीकारनी चाहिए। क्या तुम यह स्वीकार सकते हो कि तुम एक सृजित प्राणी हो? यदि तुम इसे स्वीकार कर सकते हो, तो तुम्हें एक सृजित प्राणी के रूप में अपना उचित स्थान संभालना चाहिए और सृष्टिकर्ता की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होना चाहिए और यदि तुम थोड़ा कष्ट उठाते भी हो, तो तुम्हें शिकायत नहीं करनी चाहिए। विवेकयुक्त व्यक्ति होने का यही मतलब है। यदि तुम यह नहीं सोचते कि तुम एक सृजित प्राणी हो, बल्कि मानते हो कि तुम्हारे पास पदवी और सिर पर प्रभामंडल है, और तुम एक रुतबे वाले व्यक्ति, एक महान अगुआ, संचालक, संपादक या परमेश्वर के परिवार में निर्देशक हो, और तुमने परमेश्वर के परिवार के कार्य में सुयोग्य योगदान दिया है—यदि तुम ऐसा सोचते हो तो तुम सबसे विवेकहीन और खुल्लमखुल्ला बेशर्म व्यक्ति हो। क्या तुम लोग रुतबा, स्थान और मूल्य वाले व्यक्ति हो? (हम ऐसे नहीं हैं।) तो फिर तुम क्या हो? (मैं एक सृजित प्राणी हूँ।) सही कहा, तुम बस एक सामान्य सृजित प्राणी हो। लोगों के बीच तुम अपनी योग्यताओं का प्रदर्शन कर सकते हो, बड़े होने का फायदा उठा सकते हो, अपने योगदानों के बारे में डींगें हाँक सकते हो या अपनी बहादुरी के कारनामों के बारे में बात कर सकते हो। लेकिन परमेश्वर के समक्ष इन चीजों का अस्तित्व नहीं है, और तुम्हें उनके बारे में कभी भी बात नहीं करनी चाहिए या उनका दिखावा नहीं करना चाहिए या खुद के बहुत अनुभवी होने का ढोंग नहीं करना चाहिए। यदि तुम अपनी योग्यताओं का दिखावा करोगे तो चीजें उलट-पुलट हो जाएंगी। परमेश्वर तुम्हें एकदम विवेकहीन और बेहद अहंकारी मानेगा। वह तुमसे प्रतिकर्षित होगा और घिनाएगा और तुम्हें दरकिनार कर देगा, फिर तुम मुसीबत में पड़ जाओगे(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है (11))। “मसीह-विरोधियों का तर्क गलत है। चाहे सत्य पर कैसी भी संगति की जाए और चाहे वह कितनी भी स्पष्ट रूप से की जाए, वे अभी भी परमेश्वर के इरादे नहीं समझते या यह नहीं समझते कि परमेश्वर में विश्वास करने का क्या उद्देश्य है और वह सही मार्ग कौन-सा है जो लोगों को अपनाना चाहिए। अपने दुष्ट स्वभाव के कारण, अपनी दुष्ट प्रकृति के कारण और ऐसे लोगों के प्रकृति सार के कारण, वे गहराई से यह अंतर नहीं कर पाते हैं कि सत्य क्या है और सकारात्मक चीजें क्या हैं, सही क्या है और गलत क्या है। वे अपनी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं पर दृढ़ता से अड़े रहते हैं, उन्हें सत्य मानते हैं, जीवन का एकमात्र लक्ष्य मानते हैं और सबसे सही उपक्रम मानते हैं। वे यह सत्य नहीं जानते कि अगर किसी व्यक्ति का स्वभाव नहीं बदलता है तो वह हमेशा परमेश्वर का शत्रु बना रहेगा; वे नहीं जानते कि परमेश्वर किसी व्यक्ति को क्या आशीष देता है और वह किसी व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करता है यह उसकी काबिलियत, खूबियों, प्रतिभाओं या पूँजी पर आधारित नहीं है, बल्कि इस बात पर आधारित है कि वह कितने सत्यों का अभ्यास करता है और कितना सत्य प्राप्त करता है; क्या वह परमेश्वर का भय मानने वाला और बुराई से दूर रहने वाला व्यक्ति है। ये ऐसे सत्य हैं जिन्हें मसीह-विरोधी कभी नहीं समझ पाएँगे। मसीह-विरोधी इसे कभी नहीं देख पाएँगे और यहीं पर वे सबसे बड़े मूर्ख हैं। शुरू से अंत तक, अपने कर्तव्य के प्रति मसीह-विरोधियों का क्या रवैया रहता है? वे मानते हैं कि अपना कर्तव्य निभाना एक लेन-देन है, जो कोई भी अपने कर्तव्य में खुद को सबसे अधिक खपाता है, परमेश्वर के घर में सबसे बड़ा योगदान देता है और परमेश्वर के घर में सबसे अधिक वर्षों तक कष्ट सहता है, उसके पास अंत में आशीष और मुकुट प्राप्त करने की अधिक संभावना होगी। यही मसीह-विरोधियों का तर्क है(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग सात))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैंने महसूस किया कि मसीह-विरोधी आशीष पाने को ही अपने अनुसरण का लक्ष्य बनाते हैं। वे अपनी आस्था में सत्य का अनुसरण नहीं करते; वे केवल आशीषें पाना चाहते हैं। वे सोचते हैं कि जब तक वे परमेश्वर के घर में महत्वपूर्ण कर्तव्य निभाते हैं और कुछ योगदान देते हैं, वे परमेश्वर से बड़ी आशीषें पाने के हकदार हैं। मैंने महसूस किया कि मेरे अनुसरण के पीछे का दृष्टिकोण एक मसीह-विरोधी के समान था। मेरा मानना था कि जब तक मैं एक महत्वपूर्ण कर्तव्य निभा रही हूँ, कठिनाई सह सकती हूँ, कीमत चुका सकती हूँ, अपने कर्तव्य में कुछ परिणाम हासिल कर सकती हूँ, और पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार कर सकती हूँ, तो मेरे योगदान जितने अधिक होंगे, परमेश्वर मुझे उतनी ही अधिक आशीष देंगे, और मैं बचाई जा सकूँगी। जब इस बार बहन ज़ेन बीमार हुई, और मैंने उसकी हालत को जानलेवा होने की हद तक बिगड़ते देखा, तो मैंने परमेश्वर को गलत समझा, और उसकी रक्षा न करने के लिए परमेश्वर के बारे में शिकायत की। मुझे चिंता हुई कि मैं भी बहन ज़ेन की तरह अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ सकती हूँ या किसी दुर्भाग्य का सामना कर सकती हूँ, और अंततः उद्धार की सारी आशा खो दूँगी। इसने मुझे अविश्वसनीय रूप से हताश कर दिया, और मैंने अपना कर्तव्य निभाने की सारी प्रेरणा खो दी। मेरी ये अभिव्यक्तियाँ परमेश्वर से मुकाबला कर रही थीं, और उसकी संप्रभुता और व्यवस्थाओं का विरोध कर रही थीं। मुझमें सचमुच समझ की कमी थी! हम सिर्फ साधारण सृजित प्राणी हैं, और चाहे हम कलीसिया में कोई भी कर्तव्य करें, परमेश्वर की नजर में हम सब बराबर हैं। लेकिन मैं खुद को लेकर ज्यादा ही ऊँचा सोचती थी और अपने उचित स्थान पर नहीं खड़ी थी। क्योंकि मुझे हमेशा लगता था कि मैं एक महत्वपूर्ण कर्तव्य निभा रही हूँ, मैंने इसे परमेश्वर से अनुग्रह और आशीषें माँगने के लिए पूँजी के रूप में इस्तेमाल किया, यह माँग करते हुए कि वह मुझे आपदाओं और दुर्भाग्य से बचाएँ। मुझमें सचमुच बिल्कुल भी समझ नहीं थी! मैंने परमेश्वर में विश्वास किया और अपना कर्तव्य अपने जीवन स्वभाव में बदलाव लाने के लिए सत्य का अनुसरण करने के वास्ते नहीं, बल्कि पुरस्कार और आशीषें पाने के लिए किया। क्या मैं ठीक वैसी ही नहीं थी जैसा अनुग्रह के युग में पौलुस था? परमेश्वर में पौलुस के विश्वास में सच्चाई की कमी थी; उसका काम और व्यय उसकी अपनी निरंकुश इच्छाओं से भरा था। वह अक्सर दूसरों के सामने खुद को ऊँचा उठाता और अपनी उपलब्धियों का दिखावा करता था, इस बात की डींगें हाँकता था कि उसने प्रभु के लिए कितना काम किया है और कितने फल दिए हैं। उसने इन्हें परमेश्वर से पुरस्कार और मुकुट माँगने के लिए पूँजी के रूप में इस्तेमाल किया, यहाँ तक कि उसने ऐसे बेशर्मी भरे शब्द भी कहे, जैसे, “मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्वास की रखवाली की है। भविष्य में मेरे लिये धर्म का वह मुकुट रखा हुआ है” (2 तीमुथियुस 4:7-8)। उसने परमेश्वर के स्वभाव को नाराज़ किया और परमेश्वर द्वारा उसे दंडित किया गया। मैं जिस रास्ते पर चल रही थी, वह पौलुस का रास्ता था। अगर मैंने जल्दी से अपना रास्ता नहीं बदला और अपना कर्तव्य निभाने में अपने इरादों को ठीक नहीं किया, और आशीषों का अनुसरण करना जारी रखा, तो मुझे भी पौलुस की तरह ही परमेश्वर द्वारा हटा दिया जाएगा, और मैं बचाए जाने का अपना मौका खो दूँगी।

बाद में, मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े, और इस बारे में स्पष्ट समझ हासिल की कि परमेश्वर किस तरह के व्यक्ति का अनुमोदन करते हैं और पसंद करते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “अपने कर्तव्य का मानक-स्तरीय ढंग से निर्वहन करने के लिए यह मायने नहीं रखता कि तुमने कितने वर्ष परमेश्वर में विश्वास किया है, तुमने कितने कर्तव्य निभाए या तुमने परमेश्वर के घर में कितना योगदान दिया, तुम अपने कर्तव्य में कितने अनुभवी हो यह मायने रखना तो दूर की बात है। परमेश्वर मुख्यतः यह देखता है उस व्यक्ति ने कौन-सा मार्ग पकड़ा है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर यह देखता है कि सत्य और सिद्धांतों के प्रति व्यक्ति का रवैया क्या है और उसके कार्यों की दिशा, स्रोत और प्रारंभिक बिंदु क्या है। परमेश्वर इन बातों पर ध्यान केंद्रित करता है; यही बातें तुम्हारे मार्ग का निर्धारण करती हैं(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने कर्तव्‍य का मानक स्तर का निर्वहन क्‍या है?)। “मनुष्य सोचता है कि उन सभी को जो परमेश्वर के लिए कोई न कोई योगदान देते हैं पुरस्कार मिलना चाहिए, और योगदान जितना अधिक होता है, उतना ही अधिक यह मान लिया जाता है कि उन्हें परमेश्वर की कृपा प्राप्त होनी चाहिए। मनुष्य के दृष्टिकोण का सार लेन-देन से संबंधित है, और वह सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने की सक्रिय रूप से खोज नहीं करता है। परमेश्वर के लिए, लोग परमेश्वर के प्रति सच्चे प्रेम की और परमेश्वर के प्रति संपूर्ण समर्पण की जितनी अधिक कोशिश करते हैं, जिसका अर्थ सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने की कोशिश करना भी है, उतनी ही अधिक वे परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त कर पाते हैं। परमेश्वर का दृष्टिकोण यह माँग करना है कि मनुष्य अपना मूल कर्तव्य और हैसियत पुनः प्राप्त करे। मनुष्य सृजित प्राणी है और इसलिए मनुष्य को परमेश्वर से कोई भी माँग करके अपनी सीमा नहीं लाँघनी चाहिए और सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने से अधिक कुछ नहीं करना चाहिए। पतरस और पौलुस की मंज़िलों को, उनके योगदान के आकार के अनुसार नहीं, बल्कि इस बात के अनुसार आँका गया था कि सृजित प्राणियों के रूप में वे अपने कर्तव्य का निर्वहन कर सकते थे या नहीं; उनकी मंजिलें उससे निर्धारित हुई थीं जिसकी उन्होंने शुरुआत से खोज की थी, इसके अनुसार नहीं कि उन्होंने कितना कार्य किया था, या उनके बारे में अन्य लोगों का आकलन क्या था। और इसलिए, सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य सक्रिय रूप से निभाना ही सफलता का पथ है; परमेश्वर के प्रति सच्चे प्रेम के पथ की खोज करना ही सबसे सही पथ है; अपने पुराने स्वभाव में बदलावों की खोज करना, और परमेश्वर के प्रति शुद्ध प्रेम की खोज करना ही सफलता का पथ है। सफलता का ऐसा ही पथ मूल कर्तव्य की पुनः प्राप्ति का और साथ ही सृजित प्राणी के मूल प्रकटन का पथ भी है। यह पुनः प्राप्ति का पथ है, और यह आरंभ से अंत तक परमेश्वर के समस्त कार्य का लक्ष्य भी है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर व्यक्ति चलता है)। परमेश्वर के वचन इससे ज्यादा स्पष्ट नहीं हो सकते। परमेश्वर के घर में, कोई भी कर्तव्य ऊँचा, नीचा, महान या तुच्छ नहीं होता। कोई व्यक्ति बचाया जा सकता है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर नहीं करता कि वह कौन-सा कर्तव्य करता है या उसने योगदान या उपलब्धियाँ हासिल की हैं या नहीं। महत्वपूर्ण यह है कि क्या वे सत्य का अनुसरण करते हैं और क्या वे अपने जीवन स्वभाव में बदलाव ला पाते हैं। यह बहुत महत्वपूर्ण है। मुझे वे मसीह-विरोधी याद आए जो कलीसिया में बेनक़ाब हुए थे। उनमें से कई वे अगुआ और कार्यकर्ता थे जिन्होंने अतीत में अपने कर्तव्यों में बहुत कुछ त्यागा और खपाया था। हालाँकि, वे गलत रास्ते पर चल रहे थे। उन्होंने अपने कर्तव्य में सत्य सिद्धांतों की खोज नहीं की और लापरवाही से काम किया, परमेश्वर के घर के काम में गंभीर रूप से गड़बड़ी और रुकावट पैदा की। चाहे उनके साथ कितनी भी संगति की गई, उन्होंने पश्चाताप करने से इनकार कर दिया और अंततः उन्हें बेनक़ाब किया और हटा दिया गया। दूसरी ओर, कुछ ऐसे भी हैं जो कलीसिया में साधारण कर्तव्य करते हैं, लेकिन वे सत्य का अनुसरण करने और अपने जीवन प्रवेश पर ध्यान केंद्रित करते हैं। वे अपना कर्तव्य निभाने में सत्य सिद्धांतों की खोज करते हैं, और वे अपना कर्तव्य जितना अधिक करते हैं, उतना ही बेहतर करते जाते हैं। ऐसे लोगों के पास बचाए जाने की आशा होती है। इससे, मैंने देखा कि परमेश्वर किसी व्यक्ति का परिणाम और मंज़िल उसके द्वारा किए गए कर्तव्य या उसके परिमाण के महत्व के आधार पर निर्धारित नहीं करते हैं। परमेश्वर इस बात को महत्व देते हैं कि क्या कोई व्यक्ति सत्य पा सकता है और क्या उसके जीवन स्वभाव में बदलाव आता है। यही सबसे महत्वपूर्ण है। मुझे परमेश्वर के वचनों के अनुसार लोगों और चीजों को देखना चाहिए, पतरस के मार्ग पर चलना चाहिए, अपने जीवन स्वभाव में बदलाव लाने के लिए सत्य का अनुसरण करना चाहिए, और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाना चाहिए। मुझे इसी का अनुसरण करना चाहिए।

बाद में, मैंने सोचा, “जब मुझ पर कोई परीक्षण आए, तो परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होने के लिए मेरा रवैया कैसा होना चाहिए?” फिर मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा : “परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना ऐसा बुनियादी सबक है जो परमेश्वर के प्रत्येक अनुयायी के सामने आता है। यह सबसे गहरा सबक भी है। तुम जिस हद तक परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में सक्षम होते हो, तुम्हारा आध्यात्मिक कद उतना ही बड़ा होता है, और तुम्हारी आस्था भी उतनी ही अधिक होती है—ये चीजें आपस में जुड़ी हुई हैं। ... पतरस कई परीक्षणों और शोधनों से गुजरा था। उसने अपनी सभी निजी माँगें, योजनाएँ और इच्छाएँ किनारे रख दी, और परमेश्वर से कुछ भी करने की माँग नहीं की। उसके पास अपने स्वयं के कोई विचार नहीं थे, और फिर, उसने स्वयं को पूरी तरह से परमेश्वर को सौंप दिया। उसने सोचा : ‘परमेश्वर जो भी करना चाहे वह कर सकता है। वह मेरा परीक्षण कर सकता है, वह मुझे ताड़ना दे सकता है, वह मेरा न्याय कर सकता है या मुझे दंडित कर सकता है। वह मेरी काट-छाँट करने के लिए परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकता है, वह मुझे तपा सकता है, वह मुझे शेर की गुफा या भेड़ियों की माँद में डाल सकता है। परमेश्वर जो भी करता है, वह सही है, और मैं किसी भी चीज के लिए समर्पण करने को तैयार हूँ। परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह सत्य है। मैं कोई शिकायत नहीं करूँगा या मेरे अपने कोई चुनाव नहीं होंगे।’ क्या यह पूर्ण समर्पण नहीं है? कभी-कभी लोग सोचते हैं : ‘परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह सत्य है, तो फिर मुझे परमेश्वर द्वारा किए गए इस काम में कोई सत्य क्यों नहीं मिला? ऐसा लगता है कि परमेश्वर भी कभी-कभी ऐसे काम करता है जो सत्य से मेल नहीं खाते। परमेश्वर भी कई बार गलत होता है। लेकिन चाहे कुछ भी हो, परमेश्वर तो परमेश्वर है, इसलिए मैं समर्पण करूँगा!’ क्या इस प्रकार का समर्पण पूर्ण है? (नहीं।) यह चयनात्मक समर्पण है; यह सच्चा समर्पण नहीं है। ... परमेश्वर में विश्वास रखते हुए लोगों को सृजित प्राणी के स्थान पर टिके रहना चाहिए। चाहे कोई भी समय हो, परमेश्वर तुमसे छिपा हो या तुम्हारे सामने प्रकट हुआ हो, तुम उसका प्रेम महसूस कर पाओ या न कर पाओ, तुम्हें अपने दायित्वों, बाध्यताओं और कर्तव्यों का पता होना चाहिए—तुम्हें अभ्यास के बारे में इन सत्यों की समझ होनी चाहिए। यदि तुम अभी भी यह कहकर अपनी धारणाओं से चिपके रहोगे, ‘यदि मैं स्पष्ट रूप से देख सकूँ कि यह मामला सत्य और मेरे विचारों के अनुरूप है, तो मैं समर्पण करूँगा; यदि यह मेरे लिए स्पष्ट नहीं है और मैं पुष्टि न कर सकूँ कि ये परमेश्वर के कार्य हैं, तो मैं पहले थोड़ी प्रतीक्षा करूँगा और जब यकीन हो जाएगा कि यह परमेश्वर द्वारा किया गया है, तो मैं समर्पण करूँगा,’ क्या यह परमेश्वर के प्रति समर्पण करने वाला व्यक्ति है? नहीं। यह एक सशर्त समर्पण है; असीमित, पूर्ण समर्पण नहीं है। परमेश्वर का कार्य मानवीय धारणाओं और कल्पनाओं के अनुरूप नहीं होता है; देहधारण और खासकर, न्याय और ताड़ना, मानवीय धारणाओं और कल्पनाओं के अनुरूप नहीं होते हैं। अधिकांश लोग इसे स्वीकारने और इसके प्रति समर्पित होने के लिए वास्तव में संघर्ष करते हैं। यदि तुम परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण नहीं कर सकते, तो क्या तुम एक सृजित प्राणी का कर्तव्य पूरा कर सकते हो? यह बिल्कुल संभव नहीं है। एक सृजित प्राणी का कर्तव्य क्या है? (एक सृजित प्राणी की स्थिति में खड़े होना, परमेश्वर के आदेश को स्वीकार करना और परमेश्वर की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना।) यह सही है, यही इसका मूल है। तो फिर क्या इस समस्या को हल करना आसान नहीं है? एक सृजित प्राणी के स्थान पर खड़े होना और अपने परमेश्वर, सृष्टिकर्ता के प्रति समर्पण करना—यही वह चीज है जिसका हर सृजित प्राणी को सबसे अधिक पालन करना चाहिए(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर के प्रति समर्पण सत्‍य प्राप्‍त करने के लिए बुनियादी सबक है)। परमेश्वर के वचनों ने अभ्यास का मार्ग बताया : चाहे हम पर कोई भी दुर्भाग्य या परीक्षण आए, हमें उसे परमेश्वर से स्वीकार करना चाहिए और उसकी संप्रभुता और आयोजनों के प्रति समर्पण करना चाहिए। जब पतरस ने परीक्षणों का अनुभव किया, तो चाहे परमेश्वर ने कैसा भी माहौल बनाया हो या उसने कितना भी दुख और शोधन सहा हो, उसने कभी अपने हितों पर विचार नहीं किया और केवल इस बात पर ध्यान केंद्रित किया कि परमेश्वर को कैसे संतुष्ट किया जाए और उनसे कैसे प्रेम किया जाए। उसने परमेश्वर के लिए अपनी जान तक दे दी। पतरस के अभ्यास को परमेश्वर ने याद रखा, और उसे परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त हुई। इसके विपरीत, जब मैंने बहन ज़ेन को इतनी गंभीर रूप से बीमार पड़ते देखा, तो मेरा दिल परमेश्वर के प्रति शिकायतों और प्रतिरोध से भर गया। मुझे डर था कि मुझे भी दुर्भाग्य का सामना करना पड़ेगा, और मैं मौत से और भी ज्यादा डरने लगी। मेरी परमेश्वर पर कोई आस्था नहीं थी; समर्पण तो मैंने और भी नहीं दिखाया। मैंने फिल्म “मेरी देर से आई गवाही” के बारे में सोचा। जब नायक, झोउ श्यांगमिंग को पहली बार पुलिस ने गिरफ्तार किया और बेरहमी से प्रताड़ित किया, तो उसने मौत के डर से अपने विश्वासी होने से इनकार कर दिया। बाद में, उसने परमेश्वर के वचनों के माध्यम से खुद पर चिंतन किया और खुद को जाना, पछतावा और आत्म-निंदा महसूस की, और इतने कमजोर होने के लिए खुद से नफरत की कि उसने शैतान के सामने परमेश्वर को नकार दिया। इसके बाद के दस सालों में, उसने खुद को सत्य से लैस करने पर ध्यान केंद्रित किया। वह परमेश्वर के परीक्षणों का अर्थ और मनुष्य के लिए उसकी अपेक्षाओं को समझ गया। उसने जीवन और मृत्यु की असलियत भी जान ली और परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने, अपना जीवन परमेश्वर को सौंपने को तैयार था। उसकी आशा थी कि एक दिन उसे परमेश्वर की गवाही देने का मौका मिले। परमेश्वर ने उसकी प्रार्थनाएँ सुनीं, और बाद में उसे बड़े लाल अजगर ने फिर से गिरफ्तार कर लिया। इस बार, वह न तो डरपोक था और न ही डरा हुआ, और न ही वह मृत्यु से बाधित था। इसके बजाय, उसने पुलिस के सामने बड़े लाल अजगर के दुष्ट सार को उजागर किया, और अंततः शैतान को लज्जित किया। जिस क्षण वह जेल से बाहर निकला, उसके चेहरे पर एक आनंदमयी मुस्कान थी। मेरा मानना है कि उसने ज़रूर सोचा होगा कि एक बार परमेश्वर के प्रति समर्पण करने के लिए अपनी जान जोखिम में डालना उसके जीवन में किया गया सबसे मूल्यवान और सार्थक काम था। हालाँकि मुझे अभी तक परमेश्वर से किसी परीक्षण का सामना नहीं करना पड़ा है, मुझे भाई झोउ से सीखना चाहिए। अपना कर्तव्य पूरा करते समय, मुझे खुद को सत्य से लैस करने और अपना आध्यात्मिक कद तैयार करने पर ध्यान देना चाहिए। अगर किसी दिन मुझ पर परमेश्वर का कोई परीक्षण आता है, तो मुझे उम्मीद है कि मैं भाई झोउ की तरह अपना सब कुछ परमेश्वर को सौंप सकूँगी, उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करते हुए, परमेश्वर की गवाही देते हुए, और उसके दिल को सुकून दे सकूँगी।

कुछ समय बाद, हमें बहन ज़ेन का एक पत्र मिला। उसने घर लौटने के बाद के अपने अनुभवों और बीमारी के इस अनुभव से मिले लाभों के बारे में बताया। उसने कहा कि उसकी हालत में कुछ सुधार हुआ है, वह अब अपनी क्षमता के अनुसार कुछ कर्तव्य कर रही है, और यह भी कि भविष्य में चाहे उसकी बीमारी ठीक हो या न हो, वह इसका अनुभव करने के लिए परमेश्वर पर भरोसा करने और उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने को तैयार है। यह देखकर कि मेरी बहन बीमारी का अनुभव करते हुए इसे सकारात्मक तरीके से स्वीकार कर सकी और अपने सबक सीख सकी, मैंने सच में महसूस किया कि चाहे कुछ भी हो, उसके पीछे परमेश्वर के नेक इरादे होते हैं। परमेश्वर बहन ज़ेन को पूर्ण करने के लिए इस बीमारी का उपयोग कर रहे थे और मुझे भी इससे सबक सीखने दे रहे थे। परमेश्वर का धन्यवाद!

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