7. परमेश्वर का अनुसरण करना मेरे जीवन का सबसे अच्छा चुनाव रहा है

चेन झान, चीन

जब मैं स्कूल में थी, जब भी मैं अपनी पढ़ाई में ढिलाई बरतती, तो मेरी माँ मेरे पीछे पड़ जातीं, “अपनी बड़ी मौसी को देखो; वे कॉलेज गईं और उन्हें पक्की नौकरी मिल गई, इसलिए उन्हें रोटी-कपड़े की चिंता नहीं करनी पड़ती। वे जहाँ भी जाती हैं, लोग उनकी इज्जत करते हैं और आदर देते हैं। अगर तुमने अभी मन लगाकर पढ़ाई नहीं की, तो तुम्हारा कॉलेज में दाखिला नहीं होगा और तुम्हें अपनी छोटी मौसी की तरह किसी कारखाने में काम करना पड़ेगा। लोग तुम्हें नीची नजरों से देखेंगे!” मुझे अपनी बड़ी मौसी से ईर्ष्या होती थी और मैं उम्मीद करती थी कि एक दिन मैं भी उनकी तरह बनूँगी, मेरे पास प्रसिद्धि और लाभ होगा और मैं ऐसा जीवन जियूँगी जिससे लोग ईर्ष्या करें और मेरा आदर करें। इसलिए मैंने कसकर पढ़ाई की। लेकिन जब मैंने पहली बार कॉलेज प्रवेश परीक्षा दी तो मेरा चयन नहीं हुआ। उस समय मुझे लगा जैसे मेरी पूरी दुनिया में अंधेरा छा गया था। मैं पूरी जिंदगी नीची निगाह से नहीं देखी जाना चाहती थी, इसलिए मैंने दबाव के बावजूद साल दोहराने का फैसला किया। उस समय मैं हर दिन आधी रात के बाद तक पढ़ाई करती थी। साल दोहराने के दबाव के साथ-साथ कड़ी पढ़ाई ने मुझे शारीरिक और मानसिक रूप से थका दिया था, मेरी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो गई और मुझे लगभग हर महीने जुकाम हो जाता था। लेकिन बीमार होने पर भी मैं छुट्टी माँगने की हिम्मत नहीं करती थी, डरती थी कि कहीं कोई मुख्य बात छूट न जाए, परीक्षा खराब न हो जाए और कॉलेज जाने का मौका फिर से न गँवा दूँ। अगले साल मेरा दाखिला एक शिक्षक प्रशिक्षण विश्वविद्यालय में हो गया। सभी रिश्तेदार और दोस्त मुझे बधाई देने आए और कहने लगे, “स्नातक होने और शिक्षिका बनने के बाद समाज में तुम्हारा रुतबा ऊँचा हो जाएगा, तुम्हें सम्मान मिलेगा और तुम्हारा जीवन चिंता-मुक्त हो जाएगा!” उनकी ये बातें सुनकर मुझे बहुत खुशी हुई।

स्नातक होने के बाद मैंने एक केंद्रीय प्राथमिक स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया। काम में अपना नाम कमाने के लिए और स्कूल नेतृत्व द्वारा महत्व पाने और अपने सहकर्मियों की नजरों में आदर पाने के लिए मैं अपने पहले डेमो क्लास में सबसे अलग दिखना चाहती थी। मैंने एक महीने पहले से ही तैयारी शुरू कर दी। हर दिन अपनी नियमित कक्षाओं के अलावा मैं अपना सारा समय डेमो क्लास से संबंधित सामग्री खोजने, अनुभवी शिक्षकों से सलाह लेने और फिर पाठ योजनाओं को याद करने में बिताती थी। मैं हर दिन आईने के सामने बार-बार अभ्यास करती थी जब तक कि मैं पूरी शिक्षण योजना को शुरू से अंत तक सुना न सकूँ। हालाँकि यह बहुत थका देने वाला था, लेकिन जब मैंने देखा कि मूल्यांकन बैठक में स्कूल के अगुआ लगातार स्वीकृति में सिर हिला रहे थे, तो मेरी सारी थकान एक पल में गायब हो गई। मैंने सोचा, “अब स्कूल अगुआओं ने मेरी क्षमता देख ली है। अगले सेमेस्टर में वे शायद मुझे उप-जिले के लिए डेमो क्लास सँभालने दें। तब मेरे पास चमकने के और भी मौके होंगे।” यह सोचकर मुझे लगा कि यह सब सार्थक था, चाहे मैं कितनी भी थकी क्यों न होऊँ। दूसरे सेमेस्टर में मुझे केंद्रीय उप-जिले में एक डेमोंस्ट्रेशन लेसन पढ़ाने का अवसर मिला, जिससे मैं उत्साहित और घबराई हुई दोनों थी। मैं घबराई हुई थी कि अगर मैंने अच्छा नहीं पढ़ाया, तो स्कूल नेतृत्व निश्चित रूप से सोचेगा कि मेरी क्षमता औसत है और भविष्य में ऐसे अवसर मिलना मुश्किल होगा। मैं उत्साहित थी क्योंकि अगर मैंने अच्छा किया, तो मैं सेंट्रल स्कूल में अपने पैर जमा लूँगी और शायद मुझे जिला या शहर स्तर पर भी पब्लिक लेसन लेने का मौका मिल जाए। यह तो बेहद प्रतिष्ठा की बात होगी! इसलिए मैंने एक बार फिर ध्यान से तैयारी की और दिन में केवल तीन या चार घंटे सोई। लेकिन पाठ वाले दिन बहुत ज्यादा घबराने की वजह से कक्षा में मेरा प्रदर्शन मेरी उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहा। फिर भी मुझे स्कूल अगुआओं और अन्य शिक्षकों से बहुत सराहना मिली। उस पल मुझे लगा कि चाहे कितनी भी मुश्किल या थकान क्यों न हुई हो, यह सब सार्थक था। मुझे लगा कि जीवन ऐसा ही होना चाहिए। अगर मुझे स्कूल अगुआओं और अपने सहकर्मियों का सम्मान और तारीफ नहीं मिल सकती, तो काम करने का क्या मतलब है? कुछ समय बाद स्कूल अगुआओं ने मुझसे संपर्क किया, उन्होंने कहा कि स्कूल मेरे प्रशिक्षण को तेजी से कराना चाहता है और मुझसे स्कूल के सुरक्षा प्रभारी के रूप में भी सेवा करने के लिए कहा। मैं अपने दिल में बहुत खुश थी, क्योंकि सुरक्षा का काम ऐसा नहीं था जिसे हर शिक्षक सँभाल सके। अगर मैंने अच्छा काम किया, तो भविष्य में एक उत्कृष्ट शिक्षक के रूप में पहचाने जाने की मेरी संभावनाएँ बढ़ जाएँगी और मेरे सहकर्मी भी मुझे और भी सम्मान की नजर से देखेंगे, इसलिए मैं सहमत हो गई। लेकिन यह भूमिका सँभालने के एक महीने के भीतर ही मैं थककर चूर हो गई। मुझे हर कुछ दिनों में सुरक्षा दस्तावेज मिलते थे और उनमें से ज्यादातर को जारी करना, लागू करना और उन पर रिपोर्ट देना होता था। मुझे अधीनस्थ स्कूलों से भी सामग्री व्यवस्थित करनी पड़ती थी। इसके ऊपर मैं अपने विषय के पाठ्यक्रमों के लिए भी जिम्मेदार थी। हर दिन अपने सहकर्मियों के घर जाने के बाद भी मैं ऑफिस में व्यस्त रहती थी और मैं सप्ताहांत पर भी आराम नहीं कर पाती थी। मैं शुरू में अपने साथ काम करने के लिए किसी और शिक्षक को माँगना चाहती थी, लेकिन जब मुझे याद आया कि प्रधानाचार्य ने कहा था कि जिला स्तर या उससे ऊपर एक उत्कृष्ट शिक्षक के रूप में पहचाने जाने के लिए बहुमुखी होना जरूरी है, तो मैंने यह विचार छोड़ दिया। कुछ महीनों के बाद मुझे लगा कि इस तरह काम करना बहुत थका देने वाला है, लेकिन मैं आधे रास्ते में छोड़ने को तैयार नहीं थी कि कहीं दूसरे लोग मुझे अक्षम न कहें, इसलिए मैंने जैसे-तैसे काम जारी रखा। हर व्यस्त अवधि के बाद मुझे हमेशा अपने दिल में एक खालीपन महसूस होता था। मैंने सोचा कि मुझे काम के बहुत ज्यादा दबाव के कारण आराम करने की जरूरत है, इसलिए मैं मजे करने और अच्छा खाना खाने के लिए सप्ताहांत पर बाहर जाती थी और यहाँ तक कि चीन के पश्चिमी हिस्से की यात्रा भी की। लेकिन खाने और मजे करने के बाद भी मेरे दिल में बहुत खालीपन महसूस होता था। मैंने इस बारे में कुछ दोस्तों से बात की, लेकिन उन सबने कहा कि मैं बेकार में ज्यादा सोच रही हूँ, कि मेरे पास इतनी अच्छी नौकरी और रहने की स्थिति है, इसलिए मेरे लिए खालीपन महसूस करने का कोई मतलब नहीं बनता। 2007 में जाकर जब मेरी माँ ने मुझे अंत के दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर के सुसमाचार का प्रचार किया, तब परमेश्वर के वचन पढ़ने और कलीसियाई जीवन जीने के जरिए मेरे दिल में खालीपन का एहसास धीरे-धीरे गायब हो गया।

एक दिन एक सभा के दौरान मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और मुझे खालीपन की जड़ पता चली। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “अपने हृदय में परमेश्वर के लिए स्थान न होने पर मनुष्य का आंतरिक संसार अंधकारमय, निराशाजनक और खाली होता है। ... मनुष्य के हृदय का खालीपन कोई व्यक्ति नहीं भर सकता, क्योंकि कोई भी व्यक्ति मनुष्य का जीवन नहीं हो सकता और कोई भी सामाजिक सिद्धांत मनुष्य को खालीपन की परेशानियों से मुक्ति नहीं दिला सकता। विज्ञान, ज्ञान, स्वतंत्रता, लोकतंत्र, सुख और आराम मनुष्य को केवल अस्थायी सांत्वना देते हैं। यहाँ तक कि इन चीजों के होने के बावजूद मनुष्य अभी भी अनिवार्यतः पाप करता है और समाज में फैले अन्याय की शिकायत करता है। ये चीजें होना मनुष्य की खोजी अभिलाषा और इच्छा को बाधित नहीं कर सकतीं। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर द्वारा बनाया गया था और मनुष्यों के बेतुके त्याग और अन्वेषण उनके लिए और अधिक कष्ट ही ला सकते हैं और मनुष्य को एक निरंतर व्याकुलता की स्थिति में रख सकते हैं, और वह यह नहीं जान सकता कि मानवजाति के भविष्य या आगे आने वाले मार्ग का सामना किस प्रकार किया जाए, इस हद तक कि मनुष्य ज्ञान-विज्ञान से भी डरने लगता है और खालीपन के एहसास से तो और भी घबराने लगता है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 2 : परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य पर संप्रभु है)। मुझे एहसास हुआ कि मैं खाली महसूस करती थी क्योंकि मैं परमेश्वर को नहीं जानती थी या उनकी आराधना नहीं करती थी और मेरे दिल में परमेश्वर के लिए कोई जगह नहीं थी। बचपन से ही मुझे नास्तिक शिक्षा मिली थी, यह नहीं जानती थी कि मानवजाति परमेश्वर द्वारा रची गई थी, यह समझना तो दूर की बात है कि लोगों को परमेश्वर पर विश्वास करना चाहिए और उनकी आराधना करनी चाहिए। मेरा मानना था कि अच्छी नौकरी होना और दूसरों से उच्च सम्मान और प्रशंसा पाना ही खुशी है और इसके लिए मैंने जी-तोड़ मेहनत की। बाद में मैंने स्कूल अगुआओं की सराहना और अपने सहकर्मियों का बहुत सम्मान पाया, लेकिन इन चीजों से मुझे केवल अस्थायी आनंद मिला; मेरा दिल अभी भी खाली था। मैंने सोचा कि खाने-पीने और मजे करने से मेरे दिल का खालीपन दूर हो सकता है, लेकिन वह आनंद गुजरने के बाद मैं फिर भी खाली महसूस करती थी। आखिरकार लोगों का सृजन परमेश्वर द्वारा किया गया था और हमें अपने जीवन के लिए परमेश्वर के प्रावधान की जरूरत है। केवल परमेश्वर के सामने लौटकर ही हम शांति और आनंद पा सकते हैं। उसके बाद मैं अक्सर सभाओं में शामिल होती थी और परमेश्वर के वचन पढ़ती थी और अपने खाली समय का इस्तेमाल सुसमाचार का प्रचार करने के लिए भी करती थी। मेरे दिल को बहुत शांति महसूस होती थी। लेकिन एक दिन जब मेरी गिरफ्तारी की नौबत आ गई, तो मेरा शांतिपूर्ण जीवन बिखर गया।

दिसंबर 2012 में स्कूल के अगुआओं को मेरे परमेश्वर में विश्वास करने के मामले का पता चला। इससे शिक्षा ब्यूरो और राष्ट्रीय सुरक्षा ब्यूरो में भी हड़कंप मच गया। प्रधानाचार्य ने लगातार तीन दिनों तक मुझसे बात की, नास्तिकता और भौतिकवाद का इस्तेमाल करके मुझे अपनी आस्था छोड़ने के लिए मनाया। मैंने प्रधानाचार्य के साथ बहस की, उन्हें परमेश्वर के कार्य के बारे में गवाही दी। जब वे बहस नहीं जीत सके, तो उन्होंने मेरी सोच बदलने की कोशिश छोड़ दी, लेकिन उन्होंने मुझे स्कूल में सुसमाचार का प्रचार करने से मना कर दिया। उसके बाद स्कूल मेरे अब बाहर जाकर पाठ पढ़ने की व्यवस्था नहीं करता था और न ही मुझे शिक्षण और अनुसंधान गतिविधियों में भाग लेने देता था। मेरे सहकर्मियों ने भी मुझसे दूरी बना ली। अब स्कूल अगुआओं द्वारा महत्व न दिए जाने और सहकर्मियों द्वारा अजीब माने जाने पर मुझे बहुत दर्द और हताशा महसूस हुई। बाद में मैंने सोचा कि कैसे नूह ने परमेश्वर की इच्छा का पालन किया और जहाज बनाया। उस समय कई लोगों ने नूह को मूर्ख कहा, लेकिन नूह ने परवाह नहीं की कि उसके आस-पास के लोग उसे कैसे आँकते हैं और उसकी निंदा करते हैं। एक सरल हृदय के साथ उसने परमेश्वर के वचन सुने, सुसमाचार का प्रचार करते हुए जहाज बनाया। अंत में जब बाढ़ आई, तो नूह के परिवार के आठों सदस्य बच गए। फिर मैंने सोचा कि कैसे प्रभु यीशु को मानवजाति को छुटकारा दिलाने के लिए सरकार द्वारा सताया गया, दुनिया के लोगों ने नकारा और निंदा की और यहाँ तक कि क्रूस पर चढ़ा दिया गया। परमेश्वर ने मानवजाति को बचाने के लिए बहुत कष्ट सहा है। मैंने जो थोड़ा सा कष्ट सहा, उसकी क्या बिसात? मैं परमेश्वर पर विश्वास करके जीवन में सही रास्ते पर चल रही हूँ; यह एक न्यायसंगत कार्य है और इसमें शर्म की कोई बात नहीं है। मैं दूसरों की रूखी नजरों को परमेश्वर के साथ अपने सामान्य रिश्ते पर असर नहीं डालने दे सकती थी : मुझे अभी भी सभाओं में जाना था और सुसमाचार का प्रचार करना था। उसके बाद मैं हमेशा की तरह काम पर गई और स्कूल के बाद मैं सभाओं में भाग लेने चली गई।

मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी कि अगस्त 2013 में स्कूल शुरू होने से एक हफ्ते पहले मुझे प्रधानाचार्य का फोन आएगा, जो मुझसे दो कक्षाओं को गणित पढ़ाने और एक कक्षा के लिए क्लास टीचर भी बनने के लिए कहेंगे। मैंने मन ही मन सोचा, “फिर मेरे पास सभाओं और अपने कर्तव्य के लिए समय कैसे होगा?” मैंने परेशान होकर पूछा, “इस साल ये इंतजाम क्यों किए जा रहे हैं?” प्रधानाचार्य ने कहा, “इस तरह तुम्हारे पास परमेश्वर पर विश्वास करने और सभाओं में जाने का समय नहीं होगा!” उन्होंने मुझे धमकी भी दी, “अगर तुम सेंट्रल स्कूल में काम करने के लिए तैयार नहीं हो, तो मैं तुम्हें अधीनस्थ स्कूल में भेजने का इंतजाम कर दूँगा!” मैंने मन ही मन सोचा, “अधीनस्थ स्कूलों की तुलना में सेंट्रल स्कूल के शिक्षक गतिविधियों में अक्सर हिस्सा लेते हैं, इसलिए उनके पास चमकने के ज्यादा मौके होते हैं। अगर मैं अधीनस्थ स्कूल में जाती हूँ, तो मुझे यह सम्मान नहीं मिलेगा और सेंट्रल स्कूल के शिक्षकों को देखकर मुझे उनसे कमतर महसूस होगा। इसके अलावा अधीनस्थ स्कूलों के शिक्षक मेरे बारे में क्या सोचेंगे? क्या वे सोचेंगे कि मेरी क्षमता बहुत खराब थी, इसलिए मुझे पदावनत कर दिया गया? लेकिन अगर मैं सेंट्रल स्कूल में रहती हूँ, तो मेरे पास परमेश्वर पर विश्वास करने और अपना कर्तव्य निभाने का समय कैसे होगा?” फिर मैंने चुपचाप परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मुझे क्या चुनना चाहिए?” तभी मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया : “सकारात्मक और नकारात्मक, काले और सफेद, परिवार और परमेश्वर, संतानों और परमेश्वर, सद्भाव और बिगाड़, धन और गरीबी, रुतबा और मामूलीपन, समर्थन दिए जाने और ठुकरा दिए जाने इत्यादि के बीच सभी संघर्ष के दौरान तुम लोगों ने जो विकल्प चुने हैं उनके बारे में तुम लोग निश्चित ही अनजान नहीं हो! एक सौहार्दपूर्ण परिवार और टूटे हुए परिवार के बीच तुमने पहले को चुना और तुमने ऐसा बिना किसी संकोच के किया; धन-संपत्ति और कर्तव्य के बीच तुमने फिर से पहले को चुना, यहाँ तक कि तुममें किनारे पर वापस लौटने की इच्छा भी नहीं रही; विलासिता और निर्धनता के बीच तुमने पहले को चुना; अपने बच्चों, पत्नियों और पतियों या मेरे बीच तुमने पहले को चुना; और धारणाओं और सत्य के बीच तुमने अब भी पहले को चुना। तुम लोगों के तरह-तरह के बुरे कर्मों को देखते हुए मेरा विश्वास तुम पर से बिल्कुल उठ गया है, मैं बिल्कुल स्तब्ध हूँ। तुम्हारे हृदय अप्रत्याशित रूप से इतने कठोर हैं कि उन्हें कोमल नहीं बनाया जा सकता। सालों तक मैंने अपने हृदय का जो खून खपाया है, उससे मुझे आश्चर्यजनक रूप से तुम्हारे परित्याग और विवशता से अधिक कुछ नहीं मिला, लेकिन तुम लोगों के प्रति मेरी आशाएँ हर गुजरते दिन के साथ बढ़ती ही जाती हैं, क्योंकि मेरा दिन सबके सामने पूरी तरह से खुला पड़ा रहा है। फिर भी अब तुम लोग अंधेरी और बुरी चीजों का पीछा कर रहे हो और उनसे अपनी पकड़ ढीली करने से इनकार करते हो। तो फिर तुम्हारा परिणाम क्या होगा?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम वास्तव में किसके प्रति वफादार हो?)। अंत के दिनों में परमेश्वर मुख्य रूप से लोगों को शुद्ध करने और बचाने के लिए वचन व्यक्त करता है। परमेश्वर उम्मीद करता है कि हम सत्य को समझने, अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से निभाने और उद्धार पाने को अपने भ्रष्ट स्वभाव त्यागने के लिए उसके वचनों को पढ़ने में ज्यादा समय बिता सकें। लेकिन जब चुनाव करने की बारी आई, तो मुझे अभी भी अपनी प्रसिद्धि और लाभ की परवाह थी, न कि अपने जीवन की या अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाने की। मैंने परमेश्वर को बहुत अधिक निराश किया था! अगर मैं सेंट्रल स्कूल में रहना जारी रखती, तो मैं निश्चित रूप से अभी भी विभिन्न सम्मानों के लिए लड़ती। काम के इतने भारी बोझ के साथ, यहाँ तक कि सभाओं में जाने और परमेश्वर के वचन पढ़ने पर भी असर पड़ता, अपना कर्तव्य निभाना तो दूर की बात है। फिर मैं तब भी परमेश्वर पर विश्वास कैसे कर पाती? अगर मैं अधीनस्थ स्कूल में जाती, तो काम का बोझ हल्का होता और मैं सभाओं में जा सकती थी और सामान्य रूप से अपना कर्तव्य कर सकती थी। भले ही मेरे पास कम व्यक्तिगत सम्मान होते और मेरे सहकर्मी मुझे नीची नजरों से देखते, यह केवल बेइज्जती की बात होती; हालाँकि मेरे जीवन को नुकसान नहीं होता, और यही सबसे ज्यादा मायने रखता था। यह समझकर मैंने प्रधानाचार्य से कहा, “मैं एक अधीनस्थ स्कूल में जाना चाहती हूँ।” प्रधानाचार्य इतने गुस्से में थे कि उन्होंने तुरंत फोन काट दिया।

अधीनस्थ स्कूल में मैं दिन में पढ़ाती थी और शाम को सभाओं में जाती थी और अपना कर्तव्य करती थी। एक साल बाद, चूँकि जिस कक्षा को मैंने पढ़ाया था उसकी अंतिम परीक्षा के अंक सेंट्रल स्कूल से अधिक थे, प्रधानाचार्य ने मेरा तबादला वापस सेंट्रल स्कूल में कर दिया। लेकिन अच्छा समय ज्यादा दिन नहीं चला। राष्ट्रीय सुरक्षा ब्रिगेड के कप्तान मेरे विश्वास के बारे में पूछने फिर मेरे दरवाजे पर आए। पुलिस को अपना पीछा करने और भाई-बहनों को मुसीबत में डालने से बचाने के लिए मेरे पास कुछ समय के लिए सभाओं में जाना बंद करने के अलावा कोई चारा नहीं था। कलीसियाई जीवन के बिना, अपने कर्तव्य के बिना, समय के साथ मेरा दिल परमेश्वर से दूर और दूर होता गया और मैं अनजाने ही वापस कड़ी प्रतिस्पर्धा में धकेल दी गई। जिन छात्रों को मैं पढ़ाती थी, वे लगभग हर साल प्रतियोगिताओं में पहले और दूसरे पुरस्कार जीतते थे और हमारी कक्षा के अंतिम परीक्षा के अंक हमेशा शीर्ष पर रहते थे। प्रधानाचार्य ने बैठकों में मेरे काम को भी सराहा। जिस कक्षा को मैं पढ़ाती थी, उसमें न केवल पढ़ाई का अच्छा माहौल था, बल्कि क्लास में एकता भी थी और माता-पिता भी मेरे काम के बहुत समर्थक थे। सेंट्रल स्कूल लौटने के बाद के दो सालों में, हालाँकि मुझे पहले से ज्यादा फूल और तालियाँ मिलीं, मेरा दिल अक्सर भारी और घुटन भरा महसूस करता था। मैं जानती थी कि ऐसा इसलिए था क्योंकि काम मेरा बहुत अधिक समय और ऊर्जा ले लेता था, इसलिए मेरे पास परमेश्वर के वचन पढ़ने के लिए बहुत कम समय होता था और मेरा दिल परमेश्वर से दूर था। उस समय मैंने कई भाई-बहनों को देखा जिन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी थी और अपने परिवार छोड़ दिए थे ताकि वे पूरे मन से अपना कर्तव्य कर सकें। मुझे उनसे बहुत जलन होती थी और मैं भी अपनी नौकरी छोड़ना चाहती थी और अपने पूरे दिल और दिमाग से अपना कर्तव्य करना चाहती थी। लेकिन जैसे ही मैं अपना इस्तीफा लिखने वाली थी, मुझे अपने छात्रों के माता-पिता से कई संदेश मिले, जिनको उम्मीद थी कि मैं उनके बच्चों को पढ़ाना जारी रखूँगी। ये देखकर मेरा दिल फिर डगमगा गया। “अगर मैं चली गई, तो क्या मेरे छात्र और उनके माता-पिता निराश नहीं होंगे? स्कूल के अगुआ और मेरे सहकर्मी मेरे बारे में क्या सोचेंगे? मेरे पिता ने हमेशा मेरी माँ और मुझे परमेश्वर पर विश्वास करने से रोकने की कोशिश की है और यहाँ तक कि मेरी माँ को तलाक भी दे दिया। अगर उन्हें पता चला कि मैं अपना कर्तव्य पूर्णकालिक रूप से करने के लिए अपनी नौकरी छोड़ रही हूँ, तो वे निश्चित रूप से मुझे रोकने की कोशिश करेंगे और मुझे घर भी छोड़ना पड़ सकता है। मैंने नौकरी पाने के लिए उन्नीस साल तक कड़ी मेहनत की और आज मेरे पास जो उपलब्धियाँ हैं, उन्हें पाने के लिए दूसरे तरसते थे। मेरे रिश्तेदार, दोस्त और सहकर्मी सभी मुझसे ईर्ष्या करते हैं। एक बार मैंने इस्तीफा दे दिया, तो मेरी नौकरी चली जाएगी, मेरी प्रसिद्धि और लाभ चला जाएगा और मुझे अपनी आरामदेह जीवन की स्थितियाँ छोड़नी पड़ेंगी। तब सब मेरे बारे में क्या कहेंगे?” मुझे लगा जैसे मेरा दिल इधर-उधर खिंच रहा है। यह बेहद दर्दनाक था। मैंने चुपचाप परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं जानती हूँ कि पूर्णकालिक रूप से अपना कर्तव्य करना अच्छी बात है, लेकिन मैं इस नौकरी को नहीं छोड़ पा रही हूँ। अगर मेरे पास लोगों का सम्मान और तारीफ नहीं होगी, तो क्या मेरा जीवन खुशहाल हो सकता है? हे परमेश्वर, इस मुद्दे को स्पष्ट रूप से देखने में मेरी मदद करो।” कुछ समय बाद प्रधानाचार्य ने मुझे पदोन्नति देकर वित्त प्रमुख बना दिया। इस पद में कई बैठकें और थकाऊ काम शामिल थे। दिन में मुझे कई विभागों में भागदौड़ करनी पड़ती थी और शाम को या सप्ताहांत पर मुझे अक्सर कॉल आते थे कि मुझे सामग्री पहुँचानी है, इसलिए अक्सर मेरे काम और मेरे कर्तव्य के बीच समय का टकराव होता था। सभाओं के दौरान मैं कभी भी अपने दिल को शांत नहीं कर पाती थी, हमेशा डरती थी कि स्कूल अगुआ मुझे किसी काम के लिए बुला लेंगे। कभी-कभी मैं घर पर परमेश्वर के वचन पढ़ रही होती और स्कूल अगुआओं का कॉल आने का मतलब होता कि मुझे बाहर जाना होगा और तुरंत कुछ सँभालना होगा। मुझे लगता था कि मेरा दिल परमेश्वर से बहुत दूर है और मेरा जीवन बहुत थका देने वाला है, लेकिन मैं अपनी नौकरी छोड़ने के लिए तैयार नहीं थी। मैं अक्सर प्रार्थना करती थी, परमेश्वर से मेरी मदद करने के लिए कहती थी।

जून 2018 में एक दिन मैं बीस से ज्यादा सहकर्मियों के साथ लिफ्ट में ऊपर जा रही थी। चलने के बाद लिफ्ट अचानक नीचे गिर गई। हम सब डर गए। लिफ्ट अटक गई और हम सब अंदर फँस गए। चूँकि लिफ्ट में हवा का संचार नहीं था, थोड़ी देर बाद हमें साँस लेने में तकलीफ होने लगी। मैं बेचैन हुए बिना नहीं रह सकी। “अगर रखरखाव कर्मचारी नहीं आए तो क्या होगा? क्या मैं यहाँ दम घुटने से मर जाऊँगी?” उस पल मेरी शिक्षण नौकरी जो शान और पैसा मेरे लिए लाई थी, वह अब महत्वपूर्ण नहीं था। मैं बस यही सोच पाती थी कि जिंदा कैसे रहूँ। मुझे याद आया कि परमेश्वर पर विश्वास करने के इन वर्षों में, जब भी मैं मुश्किल में थी, लाचार और खोई हुई थी, तो हमेशा परमेश्वर ने ही मेरे लिए रास्ता खोला और अपने वचनों से मेरा मार्गदर्शन किया, मुझे चलने के लिए एक रास्ता दिया। परमेश्वर पर विश्वास करके मैं परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर सकती हूँ, परमेश्वर के अधिकार को जान सकती हूँ और सृष्टिकर्ता के अद्भुत कार्यों को महसूस कर सकती हूँ। यह मेरा आशीष है। मुझे अपनी नौकरी छोड़ देनी चाहिए थी और पूर्णकालिक रूप से अपना कर्तव्य करना चाहिए था, लेकिन मैंने प्रसिद्धि और लाभ का आनंद लेने की खातिर ऐसा नहीं किया। अब मौत से सामना होने पर आखिरकार मैंने देखा कि प्रसिद्धि, लाभ और रुतबा सब ढलती परछाई की तरह हैं और पूरी तरह से अर्थहीन हैं। उस पल मैं परमेश्वर से मदद माँगना चाहती थी, लेकिन मुझे बोलने में बहुत शर्म आ रही थी। “क्या परमेश्वर अभी भी मुझ पर दया करेगा? क्या मेरे पास अभी भी सार्थक जीवन जीने का मौका होगा?” मैं परमेश्वर से केवल कुछ दिल की बातें कह सकी, “हे परमेश्वर, तुम पर विश्वास करने के बाद मैंने ठीक से सत्य का अनुसरण नहीं किया। आज हुई इस घटना के ज़रिए ही मुझे अचानक समझ आया : जब मौत सामने खड़ी हो तो मैं सत्य के बिना कितनी डरी हुई और लाचार हूँ! हे परमेश्वर, भले ही मैं आज यहाँ मर जाऊँ, मैं फिर भी तुम्हारी व्यवस्थाओं के आगे समर्पण करूँगी। अगर मैं जीवित बाहर निकल सकी, तो मैं निश्चित रूप से अपने भविष्य के जीवन पर फिर से विचार करूँगी।” ठीक उस पल मैंने देखा कि मेरे सभी सहकर्मी ऑक्सीजन की कमी के कारण नीचे झुक रहे थे, लेकिन मुझे अचानक अपनी नाक से ताजी हवा की एक लहर टकराती हुई महसूस हुई। मैं हैरान और खुश थी, यह जानती थी कि परमेश्वर मुझ पर दया कर रहा था। जैसे ही लिफ्ट के दरवाजे खुले, मेरे सभी सहकर्मी खुशी से झूम रहे थे, लेकिन मेरा दिल परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता से भरा था। मैं जानती थी कि परमेश्वर ने लिफ्ट की खराबी का इस्तेमाल मुझे जीवन के अर्थ और मूल्य पर विचार करवाने के लिए किया था।

बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों के दो अंश देखे और प्रसिद्धि और लाभ के सार की और भी स्पष्ट समझ हासिल की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “कोई भी महान या प्रसिद्ध व्यक्ति—या वास्तव में कोई भी व्यक्ति—जीवन भर जिन सारी चीजों का पीछा करता है वे केवल इन दो शब्दों से जुड़ी होती हैं : ‘प्रसिद्धि’ और ‘लाभ’। लोग सोचते हैं कि एक बार उनके पास प्रसिद्धि और लाभ आ जाए तो उनके ऊँचे रुतबे और अपार धन-संपत्ति का आनंद लेने और जीवन का आनंद लेने के लिए पूँजी होती है। उन्हें लगता है कि एक बार उनके पास प्रसिद्धि और लाभ आ जाए तो उनके पास वह पूँजी होती है जिसका इस्तेमाल वे सुख खोजने और देह के उच्छृंखल आनंद में लिप्त रहने के लिए कर सकते हैं। लोग जिस प्रसिद्धि और लाभ की कामना करते हैं उनकी खातिर वे खुशी से और अनजाने में, अपने शरीर, दिल और यहाँ तक कि अपनी संभावनाओं और नियतियों समेत वह सब जो उनके पास है, शैतान को सौंप देते हैं। वे ऐसा बिना किसी हिचकिचाहट के, बिना एक पल के संदेह के करते हैं और बिना कभी यह जाने करते हैं कि वे वह सब कुछ वापस पा सकते हैं जो कभी उनके पास था। लोग जब इस प्रकार खुद को शैतान को सौंप देते हैं और उसके प्रति वफादार हो जाते हैं तो क्या वे खुद पर कोई नियंत्रण बनाए रख सकते हैं? कदापि नहीं। वे पूरी तरह से और बुरी तरह शैतान से नियंत्रित होते हैं। वे पूरी तरह से और सर्वथा इस दलदल में धँस जाते हैं और अपने आप को मुक्त कराने में असमर्थ रहते हैं। जब कोई प्रसिद्धि और लाभ की दलदल में फँस जाता है तो फिर वह कभी उसे नहीं खोजता जो उजला है, जो न्यायोचित है या वे चीजें नहीं खोजता जो खूबसूरत और अच्छी हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोगों के लिए प्रसिद्धि और लाभ का प्रलोभन बहुत बड़ा होता है और ये ऐसी चीजें हैं जिनका अनुसरण लोग अंतहीन ढंग से अपने पूरे जीवन भर और यहाँ तक कि अनंत काल तक कर सकते हैं। क्या यह असली स्थिति नहीं है?(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI)। “अब आओ, समीक्षा करते हैं : मनुष्य को मजबूती से अपने नियंत्रण में रखने के लिए शैतान किस चीज का उपयोग करता है? (प्रसिद्धि और लाभ का।) शैतान लोगों के विचारों को नियंत्रित करने के लिए प्रसिद्धि और लाभ का इस्तेमाल करता है, उनसे और कुछ नहीं, बस इन दो ही चीजों के बारे में सोच-विचार करवाता है और उनसे प्रसिद्धि और लाभ के लिए संघर्ष करवाता है, प्रसिद्धि और लाभ के लिए कष्ट उठवाता है, प्रसिद्धि और लाभ के लिए अपमान सहन करवाता है और भारी बोझ उठवाता है, प्रसिद्धि और लाभ के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करवाता है और उनसे प्रसिद्धि और लाभ की खातिर हर फैसला या निर्णय करवाता है। इस तरीके से शैतान लोगों पर अदृश्य बेड़ियाँ डाल देता है और इन बेड़ियों के रहते उनमें उन्हें तोड़ देने की न तो क्षमता होती है, न ही साहस होता है। अनजाने में वे बड़ी ही कठिनाई से कदम-दर-कदम आगे घिसटते हुए ये बेड़ियाँ ढोते रहते हैं। ... शायद आज भी तुम शैतान की धूर्त मंशाओं की असलियत नहीं देख पाते हो क्योंकि तुम्हें लगता है कि प्रसिद्धि और लाभ के बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं होगा और लोग अब आगे का मार्ग नहीं देख पाएँगे, अपने लक्ष्य नहीं देख पाएँगे और उनका भविष्य अंधकारमय, धुँधला और प्रकाशरहित हो जाएगा(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI)। परमेश्वर के वचनों के उजागर करने से मैंने देखा कि प्रसिद्धि और लाभ खुशी नहीं ला सकते; इसके विपरीत वे ऐसे औजार हैं जिनका इस्तेमाल शैतान लोगों को भ्रष्ट करने, बाँधने और नियंत्रित करने के लिए करता है। शैतान हमारे अंदर गलत विचार डालता है, जिससे हम गलती से यह मानने लगते हैं कि प्रसिद्धि और लाभ होने से हमारे पास सब कुछ है—कि न केवल हम उच्च-गुणवत्ता वाले जीवन का आनंद ले सकते हैं, बल्कि दूसरे हमारा बहुत सम्मान भी करेंगे। यह हमें महसूस कराता है कि ऐसा जीवन मूल्यवान है और इस तरह जीने से खुशी मिलती है। नतीजतन, पूरा समाज प्रसिद्धि और लाभ के लिए प्रयास करता है। लेकिन हम प्रसिद्धि और लाभ के पीछे छिपे शैतान के नापाक इरादों को नहीं जानते। प्रसिद्धि और लाभ के अनुसरण में हमें बहुत समय और ऊर्जा खर्च करने पड़ते हैं, खुले और छिपे संघर्षों में शामिल होना पड़ता है, कई हथकंडे अपनाने पड़ते हैं और न केवल अपने स्वास्थ्य का बलिदान देना पड़ता है बल्कि अपने जमीर, गरिमा और सत्यनिष्ठा को भी त्यागना पड़ता है। प्रसिद्धि और लाभ प्राप्त करने के बाद हम एक पल की संतुष्टि का आनंद जरूर लेते हैं, लेकिन यह केवल क्षणिक होता है। जो बचता है वह ज्यादातर खालीपन, दर्द और अंतहीन कड़वाहट होती है। जब परमेश्वर हमें बचाने के लिए आते हैं और हमसे सत्य का अनुसरण करने और जीवन के सही रास्ते पर चलने की अपेक्षा करते हैं, तो हम प्रसिद्धि, लाभ और दंभ के प्रति अपने लगाव के कारण सत्य को अस्वीकार कर देते हैं, परमेश्वर के उद्धार का अवसर गँवा देते हैं और अंततः शैतान के साथ नाश हो जाते हैं। हमसे प्रसिद्धि और लाभ का अनुसरण करवाने का शैतान का यही नापाक इरादा है। बचपन से ही मेरे माता-पिता ने मुझे मेरी दो मौसियों की अलग-अलग परिस्थितियों के बारे में बताया था, मेरे अंदर ऐसे विचार भरे जैसे “एक व्यक्‍ति जहाँ रहता है वहाँ अपना नाम छोड़ता है, जैसे कि एक हंस जहाँ कहीं उड़ता है आवज करता जाता है” और “जैसे पेड़ को उसकी छाल की जरूरत है वैसे ही लोगों को आत्मसम्मान की जरूरत है।” मैं यह मानने लगी कि केवल विश्वविद्यालय में दाखिला लेने और एक स्थिर नौकरी पाने से, जिससे लोग मुझे सम्मान की नजर से देखें, मेरा जीवन खुशहाल होगा। इसके लिए मैंने कड़ी पढ़ाई की। पहली बार जब मैं कॉलेज प्रवेश परीक्षा में असफल हुई, तो मुझे लगा जैसे मेरी दुनिया ढह गई है। परीक्षा में सफल होने के लिए मैंने भारी दबाव के बावजूद साल दोहराने का फैसला किया, जिससे मैं हर दिन बहुत तनाव में रहती थी। मेरा शरीर अपनी सीमा से परे थक चुका था और मैं बहुत दर्द में थी। कॉलेज से स्नातक होने और काम शुरू करने के बाद मैंने हर प्रदर्शन पाठ की बारीकी से तैयारी की और स्कूल अगुआओं द्वारा सौंपे गए हर काम को अच्छी तरह से किया, सौ से अधिक शिक्षकों के बीच अलग दिखने के लिए अक्सर ओवरटाइम काम किया, ताकि स्कूल अगुआ और मेरे सहकर्मी मेरी तारीफ करें और मुझ पर ध्यान दें। स्कूल अगुआओं और अपने सहकर्मियों की तारीफ पाने के बाद हालाँकि मुझे प्रतिष्ठा मिली, लेकिन मैं शारीरिक और मानसिक रूप से थक चुकी थी और मेरी आत्मा खाली महसूस करती थी। अंत के दिनों के परमेश्वर का कार्य स्वीकार करने के बाद मैं जानती थी कि अंत के दिनों में परमेश्वर के उद्धार के कार्य का समय कम है और मुझे सत्य का अनुसरण करना चाहिए और पूर्णकालिक रूप से अपना कर्तव्य करना चाहिए। मेरे जीवन के लिए यही सबसे ज्यादा फायदेमंद है। लेकिन “एक व्यक्‍ति जहाँ रहता है वहाँ अपना नाम छोड़ता है, जैसे कि एक हंस जहाँ कहीं उड़ता है आवाज़ करता जाता है” और “जैसे पेड़ को उसकी छाल की जरूरत है वैसे ही लोगों को आत्मसम्मान की जरूरत है” के शैतानी जहर मेरे दिल में गहराई से जमे हुए थे, जो मुझे पूरे दिल से सत्य का अनुसरण करने के लिए अपनी नौकरी, प्रसिद्धि और लाभ को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होने दे रहे थे और मुझे तब तक सता रहे थे जब तक कि मैं पूरी तरह से टूट नहीं गई। वास्तव में आपके पास चाहे जितनी प्रसिद्धि और लाभ हो, वे सब ढलती परछाई की तरह हैं। सत्य पाए बिना जब आपदाएँ आएँगी तो लोग मर जाएँगे। यह बिल्कुल 2004 में हिंद महासागर में आई सुनामी की तरह है—छुट्टियों के स्वर्ग में कितने लोगों ने अपनी जान गँवाई? उनमें प्रतिष्ठा और रुतबे वाले कई लोग थे। जब आपदा आई, तो पैसा, प्रसिद्धि और लाभ उन्हें नहीं बचा सके। बहुत से तथ्य साबित करते हैं कि चाहे किसी व्यक्ति के पास कितनी भी प्रसिद्धि और लाभ हो, यह सब खाली होता है और जीवन एक पल में जा सकता है। अगर मैं अड़ियल बनी रही और नहीं जागी, अगर मैंने सत्य का अनुसरण करने के लिए समय का लाभ नहीं उठाया और परमेश्वर का कार्य समाप्त होने तक मैंने खुद को पर्याप्त सत्य से सुसज्जित न किया और मेरा स्वभाव नहीं बदला, तो मैं आपदा में पड़ जाऊँगी और तब तक पछताने के लिए बहुत देर हो चुकी होगी। लिफ्ट की इस घटना ने मुझे झकझोर कर जगा दिया। जब आपदा आती है, तो परमेश्वर के अलावा कोई मुझे नहीं बचा सकता। यह घटना परमेश्वर द्वारा मेरी जान लेने की कोशिश नहीं थी, बल्कि मुझे जीवन पर विचार करने और उस नुकसान को स्पष्ट रूप से देखने के लिए प्रेरित करना था जो प्रसिद्धि और लाभ ने मुझे पहुँचाया था, ताकि मैं समय रहते जाग सकूँ और जीवन में सही रास्ते पर चल सकूँ।

बाद में राष्ट्रीय सुरक्षा ब्रिगेड के कप्तान ने मेरे ठिकाने की जाँच करने के लिए फिर से फोन किया और यह भी कहा कि मेरा पुलिस रिकॉर्ड है, इसलिए जब भी मैं दूर यात्रा करूँ तो मुझे उन्हें रिपोर्ट करना होगा। अगर उन्हें पता चला कि मैं अभी भी परमेश्वर पर विश्वास करती हूँ, तो वे मुझे गिरफ्तार कर लेंगे। मैं विशेष रूप से आक्रोशित थी और मैंने यह भी देखा कि जब तक मैं सीसीपी के सिस्टम के भीतर काम कर रही हूँ, मैं उनसे कसकर बँधी रहूँगी और अपना कर्तव्य बिल्कुल नहीं कर पाऊँगी। इसने मेरे नौकरी त्यागने के संकल्प को और मजबूत कर दिया। गर्मियों की छुट्टियों के दौरान मैंने अपने भाई-बहनों के साथ अपना कर्तव्य निभाया। काम में उलझे बिना मेरा दिल बहुत शांत था और मैंने सामान्य रूप से परमेश्वर के वचन पढ़े और सभाओं में भाग लिया। एक दिन पर्यवेक्षक ने मुझसे पूछा कि क्या मैं पूर्णकालिक रूप से अपना कर्तव्य करने के लिए तैयार हूँ और मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश भी पढ़कर सुनाया : “जब तुम लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हो, स्वयं को पाप के स्थानों से दूर करते हो और दुष्ट लोगों के समूहों से दूरी बनाते हो, तो कम से कम तुम्हारे विचार और दिल शैतान की भ्रष्टता और रौंदने का शिकार नहीं होंगे। तुम एक शुद्ध भूमि पर आए हो, परमेश्वर के समक्ष आए हो। क्या यह एक बहुत बड़ा आशीष नहीं है? लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी, वर्तमान समय तक, पुनर्जन्म लेते हैं और उन्हें ऐसे कितने मौके मिलते हैं? क्या यह मौका केवल उन लोगों को नहीं मिला है जो अंत के दिनों में पैदा हुए हैं? यह कितनी अच्छी बात है! यह नुकसान की बात नहीं है, यह सबसे बड़ा आशीष है। तुम्हें बेहद खुश होना चाहिए! समस्त सृष्टि के बीच सृजित प्राणियों के रूप में, पृथ्वी पर कई अरब लोगों के बीच ऐसे कितने लोग हैं जिन्हें सृजित प्राणियों के रूप में अपनी पहचान के साथ सृष्टिकर्ता के कर्मों की गवाही देने और परमेश्वर के कार्य में अपने कर्तव्य और जिम्मेदारी निभाने का अवसर मिला है? किसके पास ऐसा अवसर है? क्या ऐसे बहुत-से लोग हैं? ऐसे लोग बहुत कम हैं! इसका अनुपात क्या है? दस हजार में एक? नहीं, इससे भी कम! विशेष रूप से तुम सभी जो अपने कर्तव्य निभाने के लिए अपने सीखे हुए कौशल और ज्ञान का उपयोग कर सकते हो, क्या तुम बहुत धन्य नहीं हो? तुम किसी आदमी की गवाही नहीं देते हो और जो तुम करते हो वह कोई आजीविका नहीं है—जिसकी तुम सेवा करते हो वह सृष्टिकर्ता है। यह सबसे सुंदर और कीमती चीज है! क्या तुम सबको गर्व महसूस नहीं करना चाहिए? (हमें करना चाहिए।) अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हें परमेश्वर का सिंचन और पोषण प्राप्त होता है। इतने अच्छे माहौल और अवसर के साथ, अगर तुम कुछ भी वास्तविक प्राप्त नहीं करते हो, अगर तुम सत्य प्राप्त नहीं करते हो, तो क्या तुम्हें जीवन भर पछतावा नहीं होगा? इसलिए तुम्हें अपने कर्तव्य निभाने के अवसर का लाभ उठाना चाहिए और इसे हाथ से जाने नहीं देना चाहिए; अपना कर्तव्य निभाते हुए ईमानदारी से सत्य का अनुसरण करो और उसे प्राप्त करो। यह सबसे मूल्यवान चीज है जो तुम कर सकते हो, यही सबसे सार्थक जीवन है! सभी सृजित प्राणियों में कोई भी व्यक्ति या लोगों का समूह ऐसा नहीं है जो तुम सबसे अधिक धन्य हो। अविश्वासी किस चीज के लिए जीते हैं? वे पुनर्जन्म लेने के लिए और दुनिया का आनंद लेने के लिए जीते हैं। तुम सभी किस चीज के लिए जीते हो? तुम सभी एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने के लिए जीते हो। ऐसे जीवन का मूल्य कितना अधिक है!(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपना हृदय परमेश्वर को देकर व्यक्ति सत्य प्राप्त कर सकता है)। जब मैंने परमेश्वर के वचनों पर विचार किया, तो मैं समझ गई कि अगर हम मूल्य और अर्थ वाला जीवन जीना चाहते हैं, तो हमें सत्य का अनुसरण करना होगा, अपना कर्तव्य करना होगा और सत्य को ज्यादा समझने के लिए परमेश्वर के वचनों को ज्यादा पढ़ना होगा। केवल इसी तरह हम शैतान के पाखंड, भ्रांतियों और विभिन्न चालों का भेद पहचान सकते हैं और प्रकाश में जीने के लिए शैतान के बंधन और नियंत्रण से मुक्त हो सकते हैं। मेरे साथ भी ऐसा ही है। न केवल मेरे अंदर प्रसिद्धि और रुतबे की प्रबल इच्छा थी, बल्कि मेरे अंदर स्वार्थ, हठ और अहंकार जैसे कई भ्रष्ट स्वभाव भी थे। अगर मैंने ईमानदारी से परमेश्वर के वचन नहीं पढ़े और उसके वचनों के न्याय और ताड़ना का अनुभव नहीं किया, तो ये भ्रष्ट स्वभाव हल नहीं हो सकते थे और मैं अभी भी दर्द और अंधेरे में जी रही होती। अपनी नौकरी छोड़ने से मुझे अपना कर्तव्य करने, अपनी भ्रष्टता को हल करने के लिए सत्य का अनुसरण करने और परमेश्वर के सामने जीने के लिए ज्यादा समय मिलेगा। ऐसा जीवन सबसे खुशहाल होगा। जैसा कि परमेश्वर कहता है : “जब तुम लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हो, स्वयं को पाप के स्थानों से दूर करते हो और दुष्ट लोगों के समूहों से दूरी बनाते हो, तो कम से कम तुम्हारे विचार और दिल शैतान की भ्रष्टता और रौंदने का शिकार नहीं होंगे। तुम एक शुद्ध भूमि पर आए हो, परमेश्वर के समक्ष आए हो। क्या यह एक बहुत बड़ा आशीष नहीं है?” फिर मैंने पतरस के बारे में सोचा। उसने प्रभु यीशु का अनुसरण करने के लिए सब कुछ त्याग दिया और अपने जीवन भर सत्य और परमेश्वर के प्रति समर्पण का अनुसरण किया। सैकड़ों परीक्षणों का अनुभव करने के बाद अंततः उसे पूर्ण बनाया गया। ऐसा जीवन सबसे सार्थक और मूल्यवान होता है। यह समझ आने पर मुझे आस्था मिली और मैंने अपना कर्तव्य करने के लिए घर छोड़ने की तैयारी शुरू कर दी।

जैसे ही मैं अपना इस्तीफा लिखने की तैयारी कर रही थी, मुझे शहर के शिक्षा ब्यूरो से एक वरिष्ठ पेशेवर भूमिका के लिए नियुक्ति का प्रमाण पत्र मिला। इस प्रमाण पत्र के साथ मैं एक वरिष्ठ शिक्षक के पारिश्रमिक और लाभों का आनंद ले सकती थी। न केवल मुझे काम पर सम्मान मिलता, बल्कि मेरे वार्षिक वेतन में भी दस हजार युआन से ज्यादा की बढ़ोतरी हो जाती। कुछ ही समय बाद स्कूल के शिक्षण निदेशक ने मुझसे जिला स्तर पर उत्कृष्ट शिक्षक पुरस्कार के लिए एक फॉर्म भरने के लिए कहा। मुझे इस पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। स्कूल के सौ से ज्यादा शिक्षकों में से प्रति वर्ष केवल दो ही स्थान होते थे। यह एक ऐसा सम्मान था जिसका सपना सभी शिक्षक देखते थे! अगर मैं इस्तीफा नहीं देती, तो मैं कुछ दिनों में शिक्षक दिवस पर सम्मान पाने के लिए जिला सरकार के सभागार में जा सकती थी। मेरा नाम शहर के शिक्षा समाचार पत्र में प्रकाशित होता और मुझे स्कूल से बोनस भी मिलता। इन दो सम्मानों के हाथ में होने से अगला सेमेस्टर निश्चित रूप से मेरे लिए प्रतिष्ठा लाता और कौन जाने मेरे कितने और सहकर्मी मुझसे ईर्ष्या करते। लेकिन मुझे जल्द ही एहसास हुआ कि यह शैतान का प्रलोभन था। मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “यदि तुम डटकर खड़े हो जाते हो और शैतान के साथ संग्राम करते हो, शैतान के साथ जीवन और मरण की लड़ाई लड़ने के लिए तुम परमेश्वर में अपनी आस्था, समर्पण और परमेश्वर के भय का उपयोग हथियारों की तरह करते हो, ऐसे कि तुम शैतान को पूरी तरह परास्त कर देते हो और उसे तुम्हें देखते ही दुम दबाने और भीतकातर बन जाने को मजबूर कर देते हो, केवल तभी वह तुम्हारे विरुद्ध अपने आक्रमणों और आरोपों को पूरी तरह छोड़ देगा, और उस मुकाम पर, तुम बचाए जाओगे और स्वतंत्र हो जाओगे(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II)। शैतान जानता था कि मुझे प्रसिद्धि और लाभ की परवाह है, इसलिए उसने मुझे ललचाने के लिए इन दो सम्मानों का इस्तेमाल किया, उसे व्यर्थ उम्मीद थी कि मैं प्रसिद्धि और लाभ के लिए होड़ करने और उसके द्वारा रौंदे जाने और नियंत्रित किए जाने के लिए कार्यस्थल पर बनी रहूँगी। शैतान ने हमेशा मेरे दिल को बाँधने और मुझे सत्य का अनुसरण करने से रोकने के लिए प्रसिद्धि और लाभ का इस्तेमाल किया था। मैं उसकी चालों में फिर से नहीं फँस सकती थी। सबसे जरूरी बात, मैं लोगों को बचाने के परमेश्वर के इस हजार साल में एक बार मिलने वाले अवसर को गँवाना नहीं चाहती थी। मुझे एक सृजित प्राणी का कर्तव्य पूरा करना था, अपने भविष्य के जीवन को परमेश्वर को सौंपना था और एक सार्थक जीवन जीने का अनुसरण करना था। जैसा कि परमेश्वर के वचन कहते हैं : “यदि तुम्हारे पास ऊँचा रुतबा है, अत्यधिक प्रतिष्ठा है, प्रचुर ज्ञान है, असंख्य संपत्तियाँ हैं और बहुत से लोगों का सहारा है, लेकिन तुम इन बातों से अप्रभावित रहते हो और परमेश्वर के पुकार और आदेश को स्वीकार करने और परमेश्वर तुमसे जो कुछ कहता है वह करने के लिए अभी भी उसके सम्मुख आते हो तो फिर तुम जो कुछ भी करोगे वह सब पृथ्वी पर सर्वाधिक सार्थक ध्येय होगा और मनुष्य का सर्वाधिक न्यायसंगत उपक्रम होगा(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 2 : परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य पर संप्रभु है)। दुनिया में एक सृजित प्राणी का कर्तव्य अच्छी तरह से निभाने से ज्यादा सार्थक या मूल्यवान कुछ नहीं है। अतीत पर विचार किया कि मैंने कड़ी मेहनत की थी और स्कूल अगुआओं और माता-पिता की सराहना हासिल की थी, लेकिन मैंने अपना खुद का कर्तव्य अच्छी तरह से नहीं किया था या परमेश्वर की स्वीकृति हासिल नहीं की थी और मेरा दिल अभी भी खाली था। अब बड़ी आपदाएँ पहले ही शुरू हो चुकी हैं और समय किसी का इंतजार नहीं करता। कई लोगों ने अभी तक अंत के दिनों के परमेश्वर का सुसमाचार नहीं सुना है और उनके पास जीवन में सही दिशा नहीं है। मुझे जल्दी करनी थी और सुसमाचार का प्रचार करना था ताकि अधिक लोग परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार कर सकें। यह परमेश्वर का अत्यावश्यक इरादा है। यह समझते हुए मैंने प्रधानाचार्य को अपना इस्तीफा सौंप दिया। प्रधानाचार्य बहुत हैरान हुए और बोले, “बहुत से लोग इस पदवी के लिए जी-जान से लड़ रहे हैं, फिर भी तुम इसे छोड़ना चाहती हो। तुम्हें ध्यान से सोचना चाहिए! अगर तुम इतनी अच्छी नौकरी छोड़ दोगी, तो भविष्य में कैसे जियोगी? अगर यह काम के बोझ की वजह से है, तो हम इस साल तुम्हारा काम का बोझ कम कर देंगे। मैं अपने ऑफिस का नवीनीकरण करवाऊँगा और उसे तुम्हारे लिए वित्त कार्यालय बना दूँगा। मुझे उम्मीद है कि तुम रुकोगी और काम करना जारी रखोगी।” प्रधानाचार्य की बातें सुनकर मैं अब और नहीं हिचकिचाई और मैंने दृढ़ता से जाने का फैसला किया। घर लौटने के बाद मैंने अपने पिता के लिए एक पत्र छोड़ा और फिर अपना सामान लिया और अपना कर्तव्य करने के लिए घर छोड़ दिया।

मैंने पीछे मुड़कर सोचा कि कैसे इन वर्षों में मैंने प्रसिद्धि और लाभ का अनुसरण किया था और केवल अपने खाली समय में परमेश्वर पर विश्वास करने से संतुष्ट थी, ज्यादा कर्तव्य नहीं करती थी और केवल यह जानती थी कि परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद कैसे लिया जाए। मुझे अपने भ्रष्ट स्वभावों, अपने गलत दृष्टिकोणों और विभिन्न शैतानी जहरों के भेद की कोई पहचान नहीं थी और मेरा जीवन स्वभाव बिल्कुल नहीं बदला था। अब मैं कलीसिया में अपना कर्तव्य कर रही हूँ और अक्सर परमेश्वर के वचनों को पढ़ने से मुझे कई सत्य समझने को मिले हैं। आमतौर पर जब मैं कोई भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करती हूँ, तो भाई-बहन इसे देखते ही इंगित कर देते हैं और वे मेरे साथ संगति करते हैं और परमेश्वर के वचनों का उपयोग करके मेरी मदद करते हैं। मैंने अपने बारे में कुछ ज्ञान हासिल किया है और मेरे जीवन ने भी कुछ प्रगति की है। मैं अपने दिल की गहराई से महसूस करती हूँ कि परमेश्वर का अनुसरण करना इस जीवन में मेरा सबसे अच्छा चुनाव है। परमेश्वर का धन्यवाद!

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