26. मैंने व्यावहारिक ढंग से अपना कर्तव्य निभाना सीख लिया
अप्रैल 2023 में, मुझे अगुआओं से एक पत्र मिला जिसमें कहा गया था कि मेरा स्वभाव घमंडी है और मैं लोगों का चयन और नियुक्ति करते समय सत्य सिद्धांतों नहीं खोजती और हमेशा अपनी मनमर्जी के आधार पर अयोग्य लोगों को चुनती थी, जिससे कलीसिया के काम में गड़बड़ी और बाधा आई। इसमें यह भी कहा गया था कि संगति के बाद भी मैंने चीजों में कोई बदलाव नहीं किया और एक अगुआ के तौर पर एक साल के दौरान, मैंने ज्यादा प्रगति नहीं की थी। कुल मिलाकर, आकलन यह था कि मेरी काबिलियत औसत थी और मैं अगुआ या कार्यकर्ता के रूप में आगे विकसित किए जाने के अयोग्य थी। चूँकि मुझमें लिखने की कुछ प्रतिभा थी, इसलिए मुझे पाठ-आधारित कर्तव्य सौंपा गया। अगुआओं का पत्र पढ़कर मेरे दिल को गहरा धक्का लगा। अगुआओं के कहने का मतलब था कि मेरी खराब काबिलियत के कारण मैं अगुआई के कर्तव्य के लिए अयोग्य थी। इसका मतलब था कि मैं अब एक अगुआ या कार्यकर्ता के रूप में सेवा नहीं कर सकती थी। इससे न केवल मैं अपने भाई-बहनों का सम्मान खो दूँगी, बल्कि सत्य पाने के कई अवसर भी गँवा दूँगी और मेरे बचाए जाने की उम्मीद भी कम हो जाएगी। यह सोचकर मैं बेहद हताश हो गई। रात में, मैं बिस्तर पर करवटें बदलती रही, मुझे बिल्कुल नींद नहीं आ रही थी, मैं मन ही मन सोच रही थी, “मेरी खराब काबिलियत की वजह से मेरा कर्तव्य बदला गया है। मुझे फिर कभी आगे आने का मौका नहीं मिलेगा; मैं हमेशा बस एक मामूली इंसान बनकर रह जाऊँगी। पाठ-आधारित कर्तव्य करते समय, मैं हर दिन बस लेखों की जाँच करूँगी और पत्रों का जवाब दूँगी। यह एक अगुआ होने जैसा बिल्कुल नहीं है, जहाँ काम के सभी पहलुओं पर व्यवस्था करने और फैसले लेने को मिलता है, या काम का मार्गदर्शन करने के लिए भाई-बहनों के साथ सभाएँ करने को मिलती हैं। मुझे फिर कभी उनका सम्मान और समर्थन पाने का आनंद नहीं मिलेगा। इसके अलावा, अगुआ निश्चित रूप से मुझे जानने वाले भाई-बहनों को बता देंगे कि मुझे क्यों बरखास्त किया गया था। शायद वे मेरा भेद भी पहचान लेंगे। तब मेरी इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी और मेरी हर जगह बदनामी होगी!” मैं जितना इसके बारे में सोचती, मुझे उतना ही लगा कि मेरा जीवन अंधकारमय और भविष्य पूरी तरह से धुँधला है और मेरी आँखों से बेतहाशा आँसू बहने लगे। मुझे एहसास हुआ कि मेरे ये विचार गलत थे और मैं खुद को सँभालना और अपने कर्तव्य में अपना दिल लगाना चाहती थी। लेकिन जब भी मुझे याद आता कि मेरी खराब काबिलियत की वजह से मेरा कर्तव्य बदला गया है तो ऐसा लगता मानो मेरे दिल पर छुरियाँ चल रही हों। मैं अपना कर्तव्य करने में अपने दिल को शांत नहीं कर पाती थी और कभी-कभी मैं बस छिपकर अकेले में रोती थी। उस दौरान, मैं हर दिन अपने कर्तव्य में बस खाना-पूर्ति करती थी और समग्र काम की ज्यादा परवाह किए बिना बस अपने काम निपटाने में संतुष्ट रहती थी। जब मैंने देखा कि मेरी टीम के भाई-बहन अपने काम में ढीले थे और टीम अगुआ अपने कर्तव्य में कोई बोझ नहीं उठाती थी और इसके लिए उचित योजनाएँ नहीं बनाती थी तो मैं इसे सुलझाने के लिए संगति नहीं करती थी, यह सोचकर कि इसका मुझसे कोई लेना-देना नहीं है। चूँकि मैंने अपने कर्तव्य में कोई बोझ नहीं उठाया, इसलिए इसका कोई नतीजा नहीं निकला। जब पर्यवेक्षक ने मेरी समस्याओं की ओर इशारा किया और मेरी काट-छाँट की, तभी मुझे मसले की गंभीरता का एहसास हुआ। मुझे चिंता थी कि अगर मैं इसी तरह चलती रही तो मुझे बरखास्त कर दिया जाएगा, इसलिए मैं अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए सत्य खोजना चाहती थी। मैंने प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं वास्तव में बहुत बुरी अवस्था में हूँ और कभी कोई ऊर्जा नहीं जुटा पाती, लेकिन मैं नहीं जानती कि इसकी वजह क्या है। कृपया मुझे प्रबुद्ध करो ताकि मैं अपनी समस्याओं को समझ सकूँ और अपने सबक सीख सकूँ।”
अपनी आध्यात्मिक भक्ति के दौरान, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा जो सीधे-सीधे मेरी अवस्था से जुड़ा था। परमेश्वर कहता है : “जब कुछ लोगों को अगुआ के रूप में उनके पद से बर्खास्त कर दिया जाता है और वे ऊपरवाले को यह कहते हुए सुनते हैं कि उन्हें फिर से विकसित या इस्तेमाल नहीं किया जाएगा तो वे अत्यंत दुखी हो जाते हैं और फूट-फूट कर रोते हैं, मानो उन्हें हटाया जा रहा हो—यह कैसी समस्या है? क्या उन्हें फिर से विकसित या उपयोग न किए जाने का यह मतलब है कि उन्हें हटाया जा रहा है? क्या इसका यह मतलब है कि वे तब उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते? क्या प्रसिद्धि, लाभ और रुतबा उनके लिए वास्तव में इतने महत्वपूर्ण हैं? यदि वे सत्य का अनुसरण करने वाले व्यक्ति हैं तो उन्हें अपनी प्रसिद्धि, लाभ और रुतबा खोने पर आत्म-चिंतन करना चाहिए और सच्चा पश्चात्ताप महसूस करना चाहिए; उन्हें सत्य का अनुसरण करने का मार्ग चुनना चाहिए, नई शुरुआत करनी चाहिए और इतना परेशान नहीं होना चाहिए या रोना-धोना नहीं चाहिए। यदि वे अपने दिलों में यह जानते हैं कि उन्हें परमेश्वर के घर ने इसलिए बर्खास्त किया है कि वे वास्तविक कार्य नहीं करते और सत्य का अनुसरण नहीं करते और वे परमेश्वर के घर को यह कहते हुए सुनते हैं कि उन्हें फिर से पदोन्नत या इस्तेमाल नहीं किया जाएगा तो फिर उन्हें शर्मिंदा महसूस करना चाहिए, कि वे परमेश्वर के ऋणी हैं और उन्होंने परमेश्वर को निराश किया है; उन्हें पता होना चाहिए कि वे परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने योग्य नहीं हैं और इस तरह से उन्हें थोड़ा विवेकशील माना जा सकता है। लेकिन जब वे यह सुनते हैं कि परमेश्वर का घर उन्हें फिर से विकसित या इस्तेमाल नहीं करेगा तो वे निराश और परेशान हो जाते हैं, और यह दर्शाता है कि वे प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे के पीछे भाग रहे हैं और वे सत्य का अनुसरण करने वाले व्यक्ति नहीं हैं” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद बारह : जब उनके पास कोई रुतबा नहीं होता या आशीष पाने की आशा नहीं होती तो वे पीछे हटना चाहते हैं)। परमेश्वर के वचनों ने सीधे मेरे दिल को छुआ। मुझे बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई और साथ ही मैं बहुत द्रवित हुई। कर्तव्य में हुए इस बदलाव में, अगुआओं को यह कहते सुनना कि मेरी काबिलियत औसत है और मैं अगुआ के रूप में विकसित किए जाने के योग्य नहीं हूँ, एक गहरा धक्का था। मुझे लगा कि चूँकि मेरी खराब काबिलियत की वजह से मेरा कर्तव्य बदला गया है, इसलिए मैं कभी एक अगुआ के रूप में प्रशिक्षण नहीं पा सकूँगी या मुझे फिर कभी आगे आने का मौका नहीं मिलेगा। मुझे अपना जीवन अंधकारमय और भविष्य धुँधला लग रहा था और मैं अपने कर्तव्य के प्रति उदासीन थी। मैंने देखा कि मुझमें रुतबे की इच्छा बहुत प्रबल थी। पहले जब मैं एक अगुआ थी, तो मैं असीम ऊर्जा से भरी रहती थी। मैं सुबह से शाम तक कलीसिया के काम में भागदौड़ करती थी और जब भी मैं कोई समस्या देखती तो उसे सुलझाने में लग जाती थी। मुझे लगता था कि मैं एक वास्तविक बोझ उठाती हूँ और ऐसी व्यक्ति हूँ जो परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील है। लेकिन अगुआई का कर्तव्य खोने के बाद, मैं हवा निकले गुब्बारे की तरह हो गई थी और मैं बिल्कुल भी ऊर्जा नहीं जुटा पा रही थी। मैं हर दिन अपने कर्तव्य में बस खाना-पूर्ति करती थी। जब मैंने देखा कि टीम अगुआ अपने कर्तव्य में कोई बोझ नहीं उठा रही थी और टीम का काम अस्त-व्यस्त था तो मैंने ऐसा व्यवहार किया जैसे मैंने इसे देखा ही न हो। एक बाहरी व्यक्ति की तरह, मैंने बस काम में देरी होने दी। इस तरह अपना कर्तव्य करने में, मैं परमेश्वर के इरादों के प्रति बिल्कुल भी विचारशील नहीं थी; मैं बस प्रयास और मेहनत कर रही थी। मैंने देखा कि मेरा पिछला उत्साह और जो बोझ मैंने उठाया था, वह सब नेकनामी और रुतबे की खातिर था और यह कि मैं सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर नहीं चल रही थी। दरअसल, मेरी खराब काबिलियत मेरी बरखास्तगी की बस एक वजह थी; मुख्य वजह थी मेरी अहंकारी प्रकृति और सत्य को स्वीकार करने से इनकार करना। मुझे इस बरखास्तगी का इस्तेमाल अपने भ्रष्ट स्वभाव पर ठीक से चिंतन करने और उसे समझने और सच्चा पश्चात्ताप हासिल करने के लिए करना चाहिए था, न कि अपना रुतबा खोने पर दिन भर उदास रहना था, जिससे कलीसिया के काम में देरी हुई। यह बुराई करना था और परमेश्वर के लिए घिनौना था। उसके बाद, मैंने अपनी समस्याओं से संबंधित परमेश्वर के वचन ढूँढ़े ताकि मैं आत्मचिंतन कर सकूँ और खुद को समझ सकूँ। मैंने देखा कि अतीत में, मैंने अपने घमंडी स्वभाव के आधार पर अपना कर्तव्य किया था और लोगों को केवल उनकी बुद्धि और प्रतिभा के आधार पर चुना और नियुक्त किया था। जब अगुआओं ने मेरे साथ सत्य सिद्धांतों पर संगति की तो मैंने सुना ही नहीं। नतीजतन, मैंने गलत लोगों को चुना, जिससे कलीसिया के काम में गड़बड़ी और बाधा आई और कई काम लगभग ठप्प हो गए। अगुआओं का मुझे बरखास्त करना सही था; वे कलीसिया के काम की रक्षा कर रहे थे। कलीसिया ने मुझे अभी भी कर्तव्य करने का अवसर दिया था, इसलिए मुझे इसकी कद्र करनी चाहिए और ठीक से पश्चात्ताप करना चाहिए। उसके बाद, मैंने अपने कर्तव्य में अपना दिल लगाया और टीम के काम में शामिल होने के लिए पहल की। मैंने हमारी धीमी प्रगति के कारणों पर सावधानी से विचार किया और जब मुझे समस्याएँ मिलीं तो मैंने उन पर संगति करने और उन्हें सुलझाने के लिए संबंधित सत्य सिद्धांत खोजे। जब मैंने देखा कि टीम अगुआ बोझ नहीं उठा रही थी तो यह बात उठाई और उसके साथ संगति की। उसे अपनी समस्याओं की कुछ समझ मिली और वह चीजों को बदलने और पश्चात्ताप करने के लिए तैयार थी। बाद में, हमने साथ मिलकर काम की योजना बनाई, एक-दूसरे का पर्यवेक्षण किया और एक-दूसरे की खूबियों से सीखा। कुछ समय बाद, काम के नतीजों में कुछ सुधार दिखाई देने लगा।
जून में एक दिन, ऊपरी स्तर के अगुआओं ने अचानक पूछा कि क्या मैं परमेश्वर के घर की प्रूफरीडिंग टीम में कर्तव्य करने को तैयार हूँ। यह सुनकर, मेरे मन में मिली-जुली भावनाएँ थीं। पाठ-आधारित कर्तव्य सौंपे जाने के बाद अपनी हताश अवस्था के बारे में सोचकर, मुझे लगा कि मैं पदोन्नति के लायक नहीं हूँ। साथ ही, मैं थोड़ी चिंतित भी थी, “अगर मैं प्रूफरीडिंग टीम में पाठ-आधारित कर्तव्य करना चुनती हूँ तो शायद मुझे फिर कभी अगुआ बनने का मौका नहीं मिलेगा। क्या इससे मेरे लिए सबसे अलग दिखना मुश्किल नहीं हो जाएगा?” यह सोचकर, मैं वाकई मना करना चाहती थी, लेकिन मैं यह भी जानती थी कि कलीसिया हमेशा काम की जरूरतों के आधार पर कर्तव्यों की व्यवस्था करती है और एक सृजित प्राणी में समर्पण करने का विवेक होना चाहिए, इसलिए मैं जाने के लिए सहमत हो गई। शुरू में, मुझमें अपना कर्तव्य अच्छे से करने की कुछ इच्छा थी, लेकिन चूँकि मेरी अवस्था वास्तव में नहीं बदली थी, इसलिए जैसे ही कुछ हुआ, मैं फिर से बेनकाब हो गई। एक बार, मुझे पता चला कि एक बहन जिसे अगुआ के पद से बरखास्त किया गया था, उसने खुद की कुछ समझ हासिल की और पश्चात्ताप किया और जल्द ही उसे फिर से अगुआ चुना गया। मुझे बहुत ईर्ष्या हुई, “परमेश्वर ने उस पर इतनी कृपा क्यों की है और उसे इतनी अच्छी काबिलियत क्यों दी है? मैं लगभग उसी उम्र की हूँ, लेकिन अपनी खराब काबिलियत की वजह से, मैंने हमेशा के लिए अगुआ बनने का मौका खो दिया है। मैं केवल एक मामूली टीम सदस्य बनकर रह सकती हूँ। परमेश्वर ने मुझे अच्छी काबिलियत क्यों नहीं दी?” जब मैंने यह सोचा तो मुझे लगा कि परमेश्वर न तो मुझे ऊँचा उठा रहा है और न ही मुझ पर कृपा कर रहा है और न ही दूसरों द्वारा मेरा सम्मान किया जा रहा है और मुझे बेवजह उदासी और नुकसान का एहसास हुआ। कभी-कभी मैं खुद को इन चीजों के बारे में सोचने से रोकने की कोशिश करती थी, लेकिन अपना कर्तव्य पूरा करके जब भी मैं एक पल के लिए रुकती, तो ये विचार बरबस सामने आ जाते। मैं जितना इसके बारे में सोचती, मेरा दिल उतना ही बाधित महसूस करता। हालाँकि मेरी अपने कर्तव्य को छोड़ने की हिम्मत नहीं थी, लेकिन मैं जो कुछ भी करती थी उसके लिए कोई ऊर्जा नहीं जुटा पाती थी। मैं हर दिन बस खाना-पूर्ति करती थी और कोई नतीजा हासिल नहीं करती थी।
एक दिन अपनी आध्यात्मिक भक्ति के दौरान, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और मेरी अवस्था में कुछ सुधार हुआ। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर पर विश्वास करने वालों की चाहे जो भी समस्याएँ हों, चाहे ये रुतबे, प्रसिद्धि, लाभ और धन का अनुसरण की हों या फिर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ पूरी करने की, हर हाल में सभी समस्याएँ सत्य की खोज के माध्यम से अवश्य हल की जानी चाहिए। कोई भी समस्या सत्य से किनारा करके नहीं निकल सकती। कोई भी मामला सत्य से अलग नहीं है। जैसे ही कोई व्यक्ति परमेश्वर पर अपने विश्वास के सत्य से भटक जाता है, उसका विश्वास खोखला हो जाता है। किसी और चीज को पाने की कोशिश करना बेकार है। कुछ लोग केवल सम्मानजनक और शानदार कर्तव्य निभाने से संतुष्ट रहते हैं, जिससे दूसरे लोग उनका आदर करें और उनसे ईर्ष्या महसूस करें। क्या यह उपयोगी है? यह तुम्हारा अंतिम परिणाम नहीं है, न ही यह तुम्हारा अंतिम पुरस्कार है, और यह निश्चित रूप से तुम्हारा गंतव्य नहीं है। इसलिए तुम चाहे जो कर्तव्य निभाओ, यह केवल अस्थायी है, चिरस्थायी नहीं। कोई व्यक्ति अंततः उद्धार प्राप्त कर सकता है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर नहीं करता कि वह कौन-सा कर्तव्य करता है, बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि क्या वह सत्य को समझ और प्राप्त कर सकता है, और अंततः परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण प्राप्त कर सकता है और खुद को उसके आयोजन की दया पर छोड़ सकता है, अब अपने भविष्य और नियति पर विचार नहीं करता और एक मानक स्तर का सृजित प्राणी बन जाता है। परमेश्वर धार्मिक और पवित्र है, वह पूरी मानवजाति को मापने के लिए इस मानक का उपयोग करता है और यह मानक कभी नहीं बदलेगा—तुम्हें यह याद रखना चाहिए। इस मानक को अपने मन में दृढ़ता से रखो और उन अवास्तविक चीजों का अनुसरण करने के लिए सत्य का अनुसरण करने का मार्ग छोड़ने के बारे में कभी मत सोचो। बचाए जाने वाले सभी लोगों के लिए परमेश्वर का अपेक्षित मानक हमेशा अपरिवर्तनीय है। तुम कौन हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, यह वही रहता है। तुम परमेश्वर के अपेक्षित मानक के अनुसार परमेश्वर में विश्वास करके ही उद्धार प्राप्त कर सकते हो। यदि तुम कोई दूसरा मार्ग खोजते हो और अज्ञात चीजों का अनुसरण करते हो, यह कल्पना करते हो कि तुम भाग्य से सफल हो जाओगे, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर का प्रतिरोध और उसके साथ विश्वासघात करता है, और तुम्हें निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा शाप और दंड दिया जाएगा” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं समझ गई कि अगुआ या कार्यकर्ता होने का मतलब यह नहीं है कि अंत में किसी व्यक्ति का परिणाम अच्छा ही होगा। परमेश्वर किसी व्यक्ति का परिणाम इस आधार पर तय करता है कि उसने सत्य पाया है या नहीं और उसका भ्रष्ट स्वभाव बदला है या नहीं। मैं परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को नहीं समझती थी। मुझे हमेशा लगता था कि अगुआ होने से न केवल प्रतिष्ठा और दूसरों का उच्च सम्मान मिलता है, बल्कि सत्य पाने के और अवसर तथा बचाए जाने की अधिक उम्मीद भी मिलती है, इसलिए मैं उन लोगों से ईर्ष्या करती थी जो अगुआ थे। मेरा यह नजरिया सत्य के अनुरूप नहीं था। मैंने उन कई लोगों के बारे में सोचा जो अगुआ थे लेकिन अंत में बेनकाब कर निकाल दिए गए क्योंकि वे सत्य का अनुसरण नहीं करते थे और गलत रास्ते पर चलते थे। मेरे परिचित यांग को ही ले लीजिए। अपनी अहंकारी प्रकृति की वजह से जब वह एक अगुआ था उस दौरान उसने शोहरत, लाभ और रुतबे का पीछा किया; उसने शोहरत और लाभ के लिए भाई-बहनों के साथ होड़ की और यहाँ तक कि उसने असहमति जताने वालों की पीठ में छुरा घोंपने और उन्हें अलग-थलग करने जैसे काम भी किए। अंत में, उसने कलीसिया के काम में गंभीर रूप से गड़बड़ी और बाधा डाली और उसे एकांत में भेज दिया गया। फिर डैन थी, जो हमेशा एक अगुआ या कार्यकर्ता रही थी। उसकी प्रतिभा और हुनर शानदार थे, लेकिन अपने कर्तव्य में, वह अक्सर खुद को ऊँचा उठाती थी, दिखावा करती थी, सत्ता पर एकाधिकार जमाती थी और उन भाई-बहनों को दरकिनार कर देती थी जिनके साथ वह सहयोग करती थी। उसने कई बुरे काम किए और उसे एक मसीह-विरोधी ठहराकर निष्कासित कर दिया गया। इन असफल व्यक्तियों के उदाहरणों से, मैंने देखा कि अगुआ होना इस बात की गारंटी नहीं देता कि तुम बचाए जाओगे और पूर्ण बनाए जाओगे। अहम बात यह है कि क्या तुम सत्य का अनुसरण करते हो और सही रास्ते पर चलते हो। अगुआ और कार्यकर्ता ज्यादा लोगों, घटनाओं और चीजों का सामना करते हैं, इसलिए उनके पास निश्चित रूप से प्रशिक्षण के ज्यादा अवसर होते हैं। अगर वे अपने भ्रष्ट स्वभाव को सुलझाने के लिए सत्य का अनुसरण करने पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं, तो वे निश्चित रूप से अधिक सत्य पाएंगे, जो पूर्ण बनाए जाने के लिए फायदेमंद है। लेकिन अगर वे सत्य का अनुसरण नहीं करते और उनका भ्रष्ट स्वभाव नहीं बदलता तो वे बचाए नहीं जा सकते, भले ही वे अगुआ हों। अगर, अपने भ्रष्ट स्वभाव के आधार पर, वे बुराई करते हैं और कलीसिया के काम में गड़बड़ी और बाधा डालते हैं तो आखिरकार उन्हें बेनकाब कर निकाल दिया जाएगा। तुम अभी जो कर्तव्य करते हो, वह तुम्हारे भविष्य के परिणाम और मंजिल को तय नहीं करता। केवल सत्य का अनुसरण करके और अपने भ्रष्ट स्वभाव को त्यागकर ही तुम बच सकते हो। यह एहसास मेरे दिल में बहुत रोशनी लाया और मैंने देखा कि अब मुझे उन कर्तव्यों के पीछे नहीं भागना चाहिए जो प्रतिष्ठा लाते हैं और जिनसे लोग मेरा सम्मान और मुझसे ईर्ष्या करते हैं। मुझे अपने स्वभाव में बदलाव हासिल करने के लिए सत्य का अनुसरण करना चाहिए; यही सबसे महत्वपूर्ण है। उसके बाद, अपने कर्तव्य के प्रति मेरी मानसिकता कुछ हद तक बदल गई। जब भी मेरे पास खाली समय होता तो मैं परमेश्वर के वचनों पर विचार करती और अनुभवजन्य गवाही लेख लिखती। मैं पहले की तुलना में अपने कर्तव्य के प्रति अधिक सचेत थी और इससे कुछ नतीजे मिलने लगे।
बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों के कुछ और अंश पढ़े, जो मेरी अपनी समस्याओं को समझने में बहुत मददगार थे। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “मसीह-विरोधियों के लिए रुतबा और प्रतिष्ठा उनका जीवन हैं। चाहे वे कैसे भी जीते हों, चाहे वे किसी भी परिवेश में रहते हों, चाहे वे कोई भी काम करते हों, चाहे वे किसी भी चीज का अनुसरण करते हों, उनके कोई भी लक्ष्य हों, उनके जीवन की कोई भी दिशा हो, यह सब अच्छी प्रतिष्ठा और ऊँचा रुतबा पाने के इर्द-गिर्द घूमता है। और यह लक्ष्य बदलता नहीं है; वे कभी ऐसी चीजों को दरकिनार नहीं कर सकते हैं। यह मसीह-विरोधियों का असली चेहरा और सार है। तुम उन्हें पहाड़ों की गहराई में किसी घने-पुराने जंगल में छोड़ दो, फिर भी वे प्रतिष्ठा और रुतबे के पीछे दौड़ना नहीं छोड़ेंगे। तुम उन्हें लोगों के किसी भी समूह में रख दो, फिर भी वे सिर्फ प्रतिष्ठा और रुतबे के बारे में ही सोचेंगे। यूँ तो मसीह-विरोधी परमेश्वर में विश्वास करते हैं, लेकिन वे प्रतिष्ठा और रुतबे के अनुसरण को परमेश्वर में आस्था के समकक्ष रखते हैं और दोनों चीजों को समान पायदान पर रखते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जब वे परमेश्वर में आस्था के मार्ग पर चलते हैं तो वे प्रतिष्ठा और रुतबे का अनुसरण भी करते हैं। यह कहा जा सकता है कि मसीह-विरोधियों के दिलों में परमेश्वर में विश्वास करने में सत्य का अनुसरण ही प्रतिष्ठा और रुतबे का अनुसरण है तो प्रतिष्ठा और रुतबे का अनुसरण सत्य का अनुसरण भी है—प्रतिष्ठा और रुतबा हासिल करना सत्य और जीवन हासिल करना है। अगर उन्हें लगता है कि उन्होंने प्रसिद्धि, लाभ या रुतबा हासिल नहीं किया है, कि कोई उनका आदर नहीं करता, उन्हें उच्च सम्मान नहीं देता है या उनका अनुसरण नहीं करता है तो वे बहुत उदास हो जाते हैं, वे मानते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करने की कोई तुक नहीं है, इसका कोई मूल्य नहीं है और वे मन-ही-मन सोचते हैं, ‘क्या मैं परमेश्वर में इस तरह विश्वास कर विफल रहा हूँ? क्या मेरे लिए कोई आशा नहीं है?’ वे अक्सर अपने दिलों में ऐसी चीजों का हिसाब-किताब लगाते हैं। वे यह हिसाब-किताब लगाते हैं कि वे कैसे परमेश्वर के घर में अपने लिए जगह बना सकते हैं, वे कैसे कलीसिया में उच्च प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकते हैं, जब वे बात करें तो वे कैसे खुद को सुनने के लिए लोगों को जुटा सकते हैं और जब वे कार्य करें तो वे कैसे अपने सहारे और अपनी चापलूसी के लिए लोगों को जुटा सकते हैं, वे जहाँ कहीं भी हों वे कैसे अपना अनुसरण करने के लिए लोगों को जुटा सकते हैं और उनके पास कैसे कलीसिया में एक प्रभावी आवाज हो सकती है और उनके पास कैसे शोहरत, लाभ और रुतबा हो सकता है—वे वास्तव में अपने दिलों में ऐसी चीजों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। ऐसे लोग इन्हीं चीजों के पीछे भागते हैं” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग तीन))। “तुम्हारी खोज की दिशा या उद्देश्य चाहे जो भी हो, यदि तुम रुतबे और प्रतिष्ठा के पीछे दौड़ने पर विचार नहीं करते और अगर तुम्हें इसे दरकिनार करना बहुत मुश्किल लगता है तो वह तुम्हारे जीवन प्रवेश को प्रभावित करेगा। जब तक तुम्हारे दिल में रुतबा बसा हुआ है, तब तक यह तुम्हारे जीवन की दिशा और अनुसरण के लक्ष्य को नियंत्रित और प्रभावित करने में पूरी तरह से सक्षम होगा; ऐसी स्थिति में अपने स्वभाव में बदलाव लाने की बात तो तुम भूल ही जाओ, तुम्हारे लिए सत्य वास्तविकता में प्रवेश करना भी बहुत मुश्किल होगा; तुम अंततः परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त कर पाओगे या नहीं, यह बेशक स्पष्ट है। इसके अलावा यदि तुम रुतबे के पीछे भागना कभी नहीं त्याग पाते तो इससे तुम्हारे मानक स्तर के अनुरूप कर्तव्य करने की क्षमता पर भी असर पड़ेगा। तब तुम्हारे लिए मानक स्तर का सृजित प्राणी बनना बहुत मुश्किल हो जाएगा। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ? जब लोग रुतबे के पीछे भागते हैं तो परमेश्वर को इससे बेहद घृणा होती है, क्योंकि रुतबे के पीछे भागना शैतानी स्वभाव है, यह एक गलत मार्ग है, यह शैतान की भ्रष्टता से पैदा होता है, परमेश्वर इसका तिरस्कार करता है और परमेश्वर इसी चीज का न्याय और शुद्धिकरण करता है। लोगों के रुतबे के पीछे भागने से परमेश्वर को सबसे ज्यादा घृणा है और फिर भी तुम अड़ियल बनकर रुतबे के लिए होड़ करते हो, उसे हमेशा सँजोए और संरक्षित किए रहते हो, उसे हासिल करने की कोशिश करते रहते हो। क्या इन सभी में थोड़ा-सा परमेश्वर-विरोधी होने का गुण नहीं है? लोगों के लिए रुतबे को परमेश्वर ने नियत नहीं किया है; परमेश्वर लोगों को सत्य, मार्ग और जीवन प्रदान करता है, ताकि वे अंततः मानक स्तर के सृजित प्राणी, एक छोटा और नगण्य सृजित प्राणी बन जाएँ—वह इंसान को ऐसा व्यक्ति नहीं बनाता जिसके पास रुतबा और प्रतिष्ठा हो और जिस पर हजारों लोग श्रद्धा रखें। और इसलिए इसे चाहे किसी भी दृष्टिकोण से देखा जाए, रुतबे के पीछे भागने का मतलब एक अंधी गली में पहुँचना है। रुतबे के पीछे भागने का तुम्हारा बहाना चाहे जितना भी उचित हो, यह मार्ग फिर भी गलत है और परमेश्वर इसे स्वीकृति नहीं देता। तुम चाहे कितना भी प्रयास करो या कितनी बड़ी कीमत चुकाओ, अगर तुम रुतबा चाहते हो तो परमेश्वर तुम्हें वह नहीं देगा; अगर परमेश्वर तुम्हें रुतबा नहीं देता तो तुम उसे पाने की लड़ाई में नाकाम रहोगे और अगर तुम लड़ाई करते ही रहोगे तो उसका केवल एक ही परिणाम होगा : बेनकाब करके तुम्हें हटा दिया जाएगा और तुम्हारे सारे रास्ते बंद हो जाएँगे” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग तीन))।
परमेश्वर उजागर करता है कि मसीह-विरोधी अपनी जान से ज्यादा नेकनामी और रुतबे को अहम मानते हैं। वे नेकनामी और ऊँचा रुतबा हासिल करने को अपने अनुसरण का लक्ष्य बनाते हैं और वे अपने दिलों में लगातार साजिश रचते रहते हैं कि परमेश्वर के घर में पैर कैसे जमाएँ और दूसरों से अपनी इज्जत कैसे करवाएँ। जिस पल वे शोहरत, लाभ और रुतबा खो देते हैं और उन्हें अपने भाई-बहनों की प्रशंसा और आराधना नहीं मिलती, वे सारी ऊर्जा खो देते हैं और उन्हें लगता है कि जीवन निरर्थक है। इससे खुद की तुलना करके, मैंने देखा कि मेरा व्यवहार बिल्कुल एक मसीह-विरोधी जैसा था। मैं शैतानी जहरों के सहारे जीती थी जैसे “भीड़ से ऊपर उठो,” “आदमी ऊपर की ओर जाने के लिए संघर्ष करता है; पानी नीचे की ओर बहता है,” और “जो सैनिक सेनानायक नहीं बनना चाहता वह अच्छा सैनिक नहीं है।” मेरा मानना था कि सार्थक और मूल्यवान जीवन जीने के लिए मुझे भीड़ से ऊपर उठना होगा। स्कूल में, मैंने खूब पढ़ाई की। क्लास मॉनिटर चुने जाने के बाद, मेरे सहपाठी मेरा सम्मान करते थे और मेरी तारीफ करते थे। मुझे बहुत गर्व महसूस होता था और लगता था कि किसी भी तरह का कष्ट सहना सार्थक है। परमेश्वर को पाने के बाद, मैंने देखा कि अगुआ होने से रुतबा और प्रतिष्ठा मिलती है, इसलिए मैं हमेशा अगुआ बनने के पीछे भागी। जब मुझे एक अगुआ के रूप में चुना गया और मुझे अपने भाई-बहनों का सम्मान मिला, तो मेरे दिल में शहद-सी मिठास महसूस हुई। मुझे लगा कि परमेश्वर में विश्वास करने और अपना कर्तव्य करने में प्रयास के लायक कुछ है इसलिए मैंने काम के सभी पहलुओं में सक्रिय रूप से भाग लिया, हर दिन देर रात तक मेहनत की और इससे कभी नहीं थकी। जब मैंने ऊपरी स्तर के अगुआओं को यह कहते सुना कि मैं अगुआ बनने के योग्य नहीं हूँ, तो ऐसा लगा जैसे मुझ पर हथौड़े से वार किया गया हो। यह सोचकर कि मैं अब अगुआ नहीं बन सकूँगी और मुझे फिर कभी अपने भाई-बहनों का सम्मान और आराधना नहीं मिलेगी और शायद वे मेरा भेद भी पहचान लेंगे, मुझे ऐसा लगा जैसे मेरा जीवन रसातल में चला गया है। मैं भयानक मानसिक पीड़ा में थी और मैंने हर चीज के लिए सारी ऊर्जा खो दी थी। मैंने यहाँ तक कि शिकायत की कि परमेश्वर ने मुझे अच्छी काबिलियत नहीं दी है और मैंने अपने दिन अस्पष्टता में बिताए, गलतफहमी और हताशा में जीती रही, अपने कर्तव्य में कोई बोझ नहीं उठाया और अपने काम में कोई नतीजा हासिल नहीं किया। मैंने नेकनामी और रुतबे को अपनी जान माना, उन्हें सत्य का अनुसरण करने और अपना कर्तव्य अच्छे से करने से ज्यादा महत्वपूर्ण समझा। जब मेरे पास रुतबा था, तो मैंने उत्साह के साथ अनुसरण किया; लेकिन जब मैंने अपनी शोहरत और रुतबा खो दिया, तो ऐसा लगा जैसे मेरी आत्मा खींच ली गई हो और मैं नकारात्मक हो गई और अपने कर्तव्य में ढीली पड़ गई। मुझमें रुतबे की इच्छा बहुत प्रबल थी! साफ तौर पर मेरी काबिलियत खराब थी और मैं घमंडी थी, मुझमें सत्य वास्तविकता का एक कण भी नहीं था और मैं अगुआई के कर्तव्य के लिए पूरी तरह से अयोग्य थी। फिर भी मैं अगुआ बनने के बारे में सोचना बंद नहीं कर सकी और एक साधारण पाठ-आधारित कार्यकर्ता बनने को तैयार नहीं थी। मेरा एक अहंकार भरा सपना था कि एक दिन मैं फिर से अगुआ बन सकूँ और अपने भाई-बहनों की प्रशंसा और आराधना का आनंद ले सकूँ। मैं कितनी घमंडी और दंभी थी और मुझमें समझ की बिल्कुल कमी थी। अगुआ बनने की मेरी इच्छा परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होने या परमेश्वर को संतुष्ट करने के बारे में बिल्कुल नहीं थी, न ही यह वास्तव में बचाए जाने के लिए सत्य का अनुसरण करने के बारे में थी। यह सब मेरे अपने दंभ को संतुष्ट करने और रुतबे के फायदों का आनंद लेने के लिए था। मैं एक मसीह-विरोधी के रास्ते पर चल रही थी! अगर मैं इसी तरह जिद्द के साथ पीछा करती रही, तो मैं परमेश्वर के प्रति और अधिक विद्रोही और प्रतिरोधी बन जाऊँगी और आखिरकार परमेश्वर के स्वभाव का अपमान करूँगी और उसके द्वारा बेनकाब करके निकाल दी जाऊँगी, बिल्कुल एक मसीह-विरोधी की तरह। यह एहसास होने पर मैं डर गई। मुझे लगा कि नेकनामी और रुतबे का पीछा करने की प्रकृति और नतीजे बहुत गंभीर हैं। आज मेरा अगुआ न होना मेरे रुतबे की इच्छा की काट-छाँट करने का परमेश्वर का तरीका था, जो मुझे उसके प्रति समर्पण करना, एक सृजित प्राणी के स्थान पर आज्ञाकारी होकर खड़े रहना और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य अच्छे से करना सिखा रहा था। यह मेरे लिए परमेश्वर की सुरक्षा और उद्धार था। मेरा दिल परमेश्वर के लिए कृतज्ञता से भर गया और मैं अब नेकनामी और रुतबे का पीछा नहीं करना चाहती थी।
बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों के कुछ और अंश पढ़े और मुझे सिद्धांत और अभ्यास का मार्ग मिला। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर का घर लोगों का इस तरह से उपयोग करता है कि हर किसी का सर्वश्रेष्ठ उपयोग हो सके, वह भूमिकाएँ ऐसे तय करता है कि वे हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त हों, और इसे एक ऐसे तरीके से करता है जो बिल्कुल सही है। अगर तुम में अच्छी मानवता है लेकिन तुम्हारी काबिलियत खराब है, तो तुम्हें अपना कर्तव्य अपने पूरे दिल और ताकत से अच्छी तरह करना चाहिए; ऐसा नहीं है कि परमेश्वर द्वारा स्वीकृत किए जाने के लिए तुम्हें अगुआ या कार्यकर्ता होना ही चाहिए। भले ही तुम प्रयास करने के इच्छुक हो, लेकिन तुम उस तरीके से प्रयास करने में समर्थ नहीं हो जिस तरीके से एक अगुआ को करना चाहिए और तुम में वह काबिलियत नहीं है जो अगुआ बनने के लिए होनी चाहिए और तुम इस मामले में पीछे रह जाते हो, तो फिर तुम क्या कर सकते हो? तुम्हें खुद को मजबूर नहीं करना चाहिए या अपने लिए चीजें कठिन नहीं बनानी चाहिए; अगर तुम 25 किलो वजन ही उठा सकते हो, तो तुम्हें 25 किलो वजन ही उठाना चाहिए। तुम्हें अपनी सीमाओं से आगे जाकर दिखावा करने का प्रयास नहीं करना चाहिए, यह नहीं कहना चाहिए, ‘25 किलो पर्याप्त नहीं है। मैं इससे ज्यादा उठाना चाहता हूँ। मैं 50 किलो उठाना चाहता हूँ। मैं इसे करने का इच्छुक हूँ, भले ही मैं थकान से मर ही क्यों ना जाऊँ!’ तुम अगुआ या कार्यकर्ता बनने में सक्षम नहीं हो, लेकिन फिर भी अगर तुम दिखावा करने के लिए अपनी सीमाओं से आगे जाते रहे, तो वैसे तो तुम बहुत ज्यादा नहीं थकोगे, लेकिन तुम कलीसियाई कार्य में देरी का कारण बनोगे, तुम कार्य की प्रगति और कुशलता को प्रभावित करोगे और तुम कई लोगों की जीवन प्रगति में देरी करोगे—यह ऐसी जिम्मेदारी नहीं है जिसे उठाने का सामर्थ्य तुम रख सको” (वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (8))। “अगर तुम खराब क्षमता के हो, फिर भी अपना सारा समय अगुआ बनना चाहने या किसी महत्वपूर्ण कार्य का बीड़ा उठाने, या समग्र कार्य की जिम्मेदारी लेने, या कुछ ऐसा करने में लगाते हो जो तुम्हें सबसे अलग दिखाता हो, तो मैं तुमसे कहता हूँ : यह महत्वाकांक्षा है। महत्वाकांक्षा आपदाओं को आमंत्रित कर सकती है, इसलिए तुम्हें इससे सावधान रहना चाहिए। सभी लोगों में प्रगति करने की इच्छा होती है और वे सत्य की ओर बढ़ने के प्रयास करने के इच्छुक होते हैं, जो कोई समस्या नहीं है। कुछ लोगों में काबिलियत होती है, वे अगुआ होने के मानदंड पूरे करते हैं और सत्य की ओर बढ़ने के प्रयास करने में सक्षम होते हैं, और यह अच्छी बात है। दूसरों में काबिलियत नहीं होती, इसलिए उन्हें अपने कर्तव्य पर टिके रहते हुए अपने सामने के कर्तव्य को अच्छी तरह से और सिद्धांत के अनुसार, और परमेश्वर के घर की अपेक्षाओं के मुताबिक करना चाहिए। उनके लिए यही बेहतर, सुरक्षित, अधिक यथार्थपरक है” (वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (5))। “एक अगुआ या कार्यकर्ता होने के लिए, व्यक्ति में काबिलियत का एक निश्चित स्तर अवश्य होना चाहिए। व्यक्ति की काबिलियत उसकी कार्य क्षमता और उस हद को निर्धारित करती है जिस हद तक वह सत्य सिद्धांतों को समझ सकता है। यदि तुम्हारी काबिलियत में कुछ कमी है और तुममें सत्य की पर्याप्त गहन समझ नहीं है, लेकिन तुम जितना समझ सकते हो उतना अभ्यास करने में समर्थ हो, और तुम जो समझते हो उसे अमल में ला सकते हो, और दिल से तुम शुद्ध और ईमानदार हो, और अपने खुद की ओर से कोई षडयंत्र नहीं रचते हो या प्रसिद्धि, लाभ, और रुतबा पाने के पीछे नहीं भागते हो, और परमेश्वर की जाँच को स्वीकार कर सकते हो, तो तुम सही व्यक्ति हो” (वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (20))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मुझे समझ आया कि परमेश्वर के घर में, अगुआ या कार्यकर्ता होने के लिए न केवल सत्य का अनुसरण करने की, बल्कि एक निश्चित काबिलियत और कार्यक्षमता की भी जरूरत होती है। तभी तुम कलीसिया का काम अच्छे से कर सकते हो। कलीसिया ने मुझे अतीत में अगुआ के रूप में प्रशिक्षण के अवसर दिए थे और मैंने अपने अनुसरण में कड़ी मेहनत की थी। हालाँकि मैं परमेश्वर के वचनों के अनुसार भाई-बहनों की समस्याओं और कठिनाइयों को सुलझा सकती थी, लेकिन जब लोगों के चयन और नियुक्ति या निर्णय लेने वाले काम जैसे बड़े मामलों की बात आती, तो मैं लोगों का भेद नहीं कर पाती थी या उचित रूप से नहीं चुन पाती थी। मैं धर्म-सैद्धांतिक तौर पर कुछ सिद्धांत जानती थी, लेकिन अभ्यास में उन्हें लागू करते समय मैं हमेशा गलतियाँ करती थी। मैं घमंडी भी थी और दूसरों के सुझाव नहीं सुनती थी, हमेशा अयोग्य लोगों का चयन और नियुक्ति करती थी, जिससे कलीसिया के काम में गड़बड़ी और बाधा आई। मैंने देखा कि मेरी काबिलियत वास्तव में खराब थी। अगर मैं एक अगुआ के रूप में बनी रहती, तो मैं न केवल भाई-बहनों को नुकसान पहुँचाती बल्कि कलीसिया के काम में गड़बड़ी और बाधा भी पैदा करती। अब, कलीसिया ने मेरी काबिलियत और खूबियों के आधार पर मुझे पाठ-आधारित कर्तव्य सौंपा है, जो मेरी क्षमताओं का सबसे अच्छा उपयोग करता है और मेरी योग्यता के अनुरूप है। यह मेरे लिए एक सुरक्षा भी है। मुझमें नेकनामी और रुतबे की इच्छा इतनी प्रबल है कि अगर मैं एक अगुआ होती, तो मैं बरबस ही रुतबे के लिए मेहनत करने को मजबूर हो जाती, अपने काम और धर्मोपदेशों में हर मोड़ पर खुद का दिखावा करती और सत्य सिद्धांतों को खोजने के लिए परमेश्वर के सामने खुद को शांत करने में असमर्थ होती। मैं अपनी रुतबे की महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए गड़बड़ी और बाधा भी पैदा करती और मसीह-विरोधी के रास्ते पर चलती। इसलिए, अगुआ न होना वास्तव में मेरे लिए अच्छी बात है। अब, अपने पाठ-आधारित कर्तव्य में, मैं परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने और सत्य पर विचार करने के लिए अपने दिल को और अधिक शांत कर सकती हूँ। इससे मुझे आत्म-चिंतन करने और खुद को जानने में मदद मिलती है और यह मेरे जीवन प्रवेश के लिए फायदेमंद है। यह मेरे घमंड और महत्वाकांक्षा पर भी एक अंकुश है और इसके द्वारा मेरी सुरक्षा होती है। यह परमेश्वर का श्रमसाध्य इरादा है। मुझे कलीसिया की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना चाहिए, अपनी उचित जगह पर खड़े रहना चाहिए और अपना पाठ-आधारित कर्तव्य अच्छे से करना चाहिए। जब मैंने इस तरह सोचा, तो मेरा दिल बहुत उज्ज्वल हो गया। ऐसा लगा जैसे मैंने कोई भारी बोझ उतार दिया हो और मैंने खुद को बहुत अधिक आजाद महसूस किया।
एक दिन, मुझे पता चला कि बहन की या को कलीसिया अगुआ चुना गया है और मुझे ईर्ष्या की एक टीस महसूस हुई। “उसकी काबिलियत अच्छी है और वह कलीसिया में एक अगुआ के रूप में मुख्य भूमिका निभा सकती है, लेकिन मैं केवल पाठ-आधारित कर्तव्य कर सकती हूँ। मुझे फिर कभी अगुआ बनने और सम्मानित होने का मौका नहीं मिलेगा।” जब ये विचार प्रकट हुए, तो मुझे तुरंत एहसास हुआ कि मेरी रुतबे की इच्छा फिर से सिर उठा रही है, इसलिए मैंने अपने विचारों के खिलाफ विद्रोह किया। मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा: “सृजित मानवता के एक सदस्य के रूप में, तुम्हें अपनी उचित स्थिति बनाए रखनी चाहिए और अनुशासित आचरण करना चाहिए। सृष्टिकर्ता द्वारा तुम्हें जो सौंपा गया है उस पर कर्तव्यपरायणता से टिके रहो। अनुचित कार्य मत करो, न ही ऐसे कार्य करो जो तुम्हारी क्षमता के दायरे से बाहर हों या जो परमेश्वर के लिए घृणित हों। एक महान व्यक्ति, अतिमानव या एक भव्य व्यक्ति बनने का अनुसरण मत करो और परमेश्वर बनने का अनुसरण मत करो। ये सब ऐसी इच्छाएँ हैं जो लोगों में नहीं होनी चाहिए” (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I)। “कार्य समान नहीं हैं। एक शरीर है। तुममें से प्रत्येक को अपना कर्तव्य करना चाहिए और तुममें से प्रत्येक को अपनी जगह पर रहकर अपना सर्वश्रेष्ठ देना चाहिए—प्रत्येक चिंगारी के लिए प्रकाश की एक चमक होनी चाहिए—और तुम्हें जीवन में परिपक्वता की खोज करनी चाहिए। इस प्रकार मैं संतुष्ट रहूँगा” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 21)। परमेश्वर के वचनों पर विचार करते हुए, मैं परमेश्वर का इरादा समझ गई। परमेश्वर हर किसी को अलग-अलग काबिलियत देता है और उनके लिए अलग-अलग कर्तव्यों की व्यवस्था करता है; कोई भी कर्तव्य ऊँचे या नीचे रुतबे का नहीं होता। मुझे अपनी जगह पर खड़े रहना चाहिए, सत्य का अनुसरण करना चाहिए और परमेश्वर के दिल को तसल्ली देने के लिए अपना कर्तव्य अच्छे से करना चाहिए। यही सबसे सार्थक है। यह सोचकर, मैं अपने कर्तव्य के लिए अपने दिल को शांत कर पाई। कभी-कभी, जब मैं अपना कर्तव्य अच्छे से नहीं करती थी, तो मैं विचार करती थी कि मेरी कमियाँ कहाँ हैं और मैं कैसे सुधार कर सकती हूँ और बाधाओं को तोड़ सकती हूँ। कुछ समय तक इस तरह अभ्यास करने के बाद, मैं अपने कर्तव्य में कुछ अच्छे नतीजे हासिल कर पाई। ये बदलाव लाने में मेरी अगुआई करने के लिए परमेश्वर का धन्यवाद!