11. मैं अपने पिता की रुकावट और उत्पीड़न से कैसे बाहर निकली

शिन आई, चीन

जब मैं छोटी थी, तो मेरे माता-पिता दोनों परमेश्वर में विश्वास करते थे। जिज्ञासा में मैंने भी परमेश्वर के वचनों की कुछ किताबें पढ़ीं और जाना कि स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजें परमेश्वर ने बनाई हैं और परमेश्वर हमारे भाग्य, जीवन और मृत्यु को नियंत्रित करता है। 2012 में, मेरे माता-पिता ने विश्वास करना छोड़ दिया, लेकिन मेरी दादी माँ अब भी विश्वास करती थीं और वे मेरे साथ परमेश्वर के वचन पढ़ती थीं। मई 2021 में, मैंने औपचारिक रूप से परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकार किया। जब मैं काम में व्यस्त रहती, तो मैं सभाओं में शामिल होने के लिए अपने खाली समय का उपयोग करती। उस समय मेरे पिता ने कोई आपत्ति नहीं की क्योंकि मैं हेयरड्रेसिंग उद्योग में काम कर रही थी और महीने में आठ से दस हजार युआन कमा रही थी। हमारे सभी रिश्तेदारों और दोस्तों ने कहा कि मैं अपनी जिंदगी में बहुत अच्छा कर रही हूँ और मेरे पिता यह सुनकर बहुत खुश और गौरवान्वित हुए। बाद में, सभाओं और परमेश्वर के वचन पढ़ने के माध्यम से, मुझे समझ आया कि एक सृजित प्राणी के नाते, मुझे परमेश्वर के प्रेम का प्रतिदान देने के लिए अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। हालाँकि, अपनी नौकरी के कारण, मेरे पास अपना कर्तव्य निभाने का समय नहीं था। लेकिन फिर मैंने सोचा कि पिछले एक साल में अपने भाई-बहनों के साथ सभा करने से मेरा दिल कैसे संतुष्ट महसूस करने लगा था और पहले की तरह खाली नहीं रहा। इसलिए, मैं पूर्णकालिक रूप से अपना कर्तव्य निभाना चाहती थी। खासकर जब मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा : “एक के बाद एक सभी तरह की आपदाएँ आ पड़ेंगी; सभी देश और स्थान आपदाओं का सामना करेंगे : हर जगह महामारी, अकाल, बाढ़, सूखा और भूकंप हैं। ये आपदाएँ बस एक-दो जगहों पर नहीं आ रही हैं, न ही वे एक-दो दिनों में समाप्त होंगी, बल्कि वे अधिकाधिक बड़े क्षेत्र तक फैल जाएँगी और अधिकाधिक गंभीर होती जाएँगी। इस दौरान एक के बाद एक तमाम तरह के कीट-प्रकोप आएँगे, और हर जगह नरभक्षण की घटनाएँ होंगी। असंख्य देशों और लोगों पर यह मेरा न्याय है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 65)। मैंने महसूस किया कि परमेश्वर का कार्य समाप्ति की ओर बढ़ रहा है। आपदाएँ ज्यादा-से-ज्यादा गंभीर होती जा रही हैं, खासकर पिछले दो सालों में, और केवल परमेश्वर के सामने आने से ही हम बचाए जा सकते हैं और जीवित रह सकते हैं। चूँकि समय निकलता जा रहा है, मुझे तुरंत सत्य का अनुसरण करना और अपना कर्तव्य निभाना है। जब मैंने यह सोचा, तो मैंने पूर्णकालिक रूप से अपना कर्तव्य निभाने को चुना। उस दौरान, मैं हर दिन सभाओं में शामिल होती और परमेश्वर के वचन पढ़ती थी और मैंने अपने दिल में एक ऐसी खुशी महसूस की जो पहले कभी नहीं जानी थी। दो महीने बाद, मैंने अपनी नौकरी छोड़ दी। जब मेरे पिता ने देखा कि मैं काम नहीं कर रही हूँ तो वे बिल्कुल भी खुश नहीं हुए। उन्होंने कहा, “यह अच्छी बात है कि तुम आस्था रखती हो, लेकिन तुम यूँ ही अपनी नौकरी नहीं छोड़ सकती। तुम पहले की तरह कर सकती हो, जब तुम कुछ समय काम करती थी और बाकी समय सभाओं में शामिल होती थी। अगर तुम काम नहीं करोगी, तो तुम गुजारा कैसे करोगी? अपना करियर बनाने के लिए तुम्हारे जीवन का यह सबसे अच्छा समय है। मैं यह सिर्फ तुम्हारी भलाई के लिए कह रहा हूँ। अगर तुम मेरी बात नहीं सुनोगी तो एक दिन पछताओगी!” उनकी बातें सुनकर मुझे बहुत बुरा लगा। बचपन से लेकर आज तक, मैंने जीवन भर हर बात में उनकी सुनी थी। अगर इस बार मैंने उनकी बात नहीं मानी तो उनका दिल कितना टूट जाएगा? लेकिन फिर मैंने सोचा कि जब मैं काम कर रही थी तो मेरा दिल कितना खाली महसूस करता था और अब जब मैं अपना कर्तव्य निभा रही हूँ तो मैं कितना अधिक संतुष्ट महसूस करती हूँ। अब मैं समझ गई थी कि जीवन में अनुसरण करने के लिए क्या सार्थक और मूल्यवान है। इसके अलावा, परमेश्वर का कार्य समाप्त होने वाला है, इसलिए मुझे सत्य का अनुसरण करने के लिए अपने सीमित समय का लाभ उठाना होगा। सत्य और जीवन पाना—यही सबसे महत्वपूर्ण है। यह ध्यान में रखते हुए, मैंने अपने पिता से कहा, “कार्यस्थल साजिशों और आपसी झगड़े से भरा है। अब अपना कर्तव्य निभाकर, मैं जीवन में सही मार्ग पर चल रही हूँ।” लेकिन उन्होंने फिर भी मुझे परमेश्वर में विश्वास करने से रोकने की कोशिश की।

एक दिन, मेरे पिता ने मुझे एक मैसेज भेजा : “मुझे निराश मत करना।” मेरी आँखों से तुरंत आँसू बहने लगे। मैंने मन में सोचा, “इतने सालों से मेरे पिता चाहते थे कि मैं सबसे अलग दिखूँ। उन्होंने मुझे विकसित करने के लिए बड़ी कीमत चुकाई है। अब जब मैं काम नहीं कर रही हूँ, तो उनकी उम्मीदें टूट गई हैं। उन्हें कितना दर्द हो रहा होगा! मैं अब बड़ी हो गई हूँ, लेकिन मैं अब भी उन्हें अपनी चिंता में डुबो रही हूँ। क्या यह नाखलफ होना नहीं है? जब से मैं बच्ची थी, मेरे पिता ने मुझे वह सब खरीद कर दिया जो मैं चाहती थी; उन्होंने हमेशा मुझे बहुत लाड़-प्यार किया। अगर मैंने भविष्य में फिर से काम करना बंद कर दिया तो मेरे लिए उनके सारे प्रयासों और खर्चों के बावजूद मैं उन्हें निराश करूँगी। हमारे रिश्तेदार और दोस्त मेरे बारे में क्या सोचेंगे?” अपनी नकारात्मकता के बीच, मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया, इसलिए मैंने उसे पढ़ने के लिए ढूँढ़ा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “मुझे बताओ, लोगों के साथ जुड़ी हर चीज किससे पैदा होती है? मानव-जीवन के लिए सबसे बड़ा बोझ कौन वहन करता है? (परमेश्वर।) मात्र परमेश्वर ही लोगों से सबसे अधिक प्रेम करता है। क्या लोगों के माता-पिता और रिश्तेदार वास्तव में उनसे प्रेम करते हैं? वे जो प्यार देते हैं क्या वह सच्चा प्रेम होता है? क्या वह लोगों को शैतान के प्रभाव से बचा सकता है? नहीं बचा सकता। लोग सुन्न और मंदबुद्धि होते हैं, वे इन चीजों के परे नहीं देख पाते और हमेशा कहते हैं, ‘परमेश्वर मुझसे कैसे प्रेम करता है? मुझे तो महसूस नहीं होता। वैसे भी, मेरे माता-पिता मुझे सबसे ज्यादा प्यार करते हैं। वे मेरी पढ़ाई-लिखाई का खर्च उठाते हैं, तकनीकी कौशल सिखवाते हैं ताकि मैं बड़ा होकर कुछ बन सकूँ, सफल हो सकूँ, एक प्रसिद्ध व्यक्ति या हस्ती बन सकूँ। मेरे माता-पिता मेरे पालन-पोषण पर इतना पैसा खर्च करते हैं, शिक्षा दिलाते हैं, बचत करके खुद थोड़े में गुजारा करते हैं। वह कैसा महान प्रेम है! मैं उनका ऋण कभी नहीं चुका सकता!’ तुम्हें लगता है कि यह प्यार है? जब तुम्हारे माता-पिता तुम्हें एक कामयाब इंसान बनाते हैं, दुनिया में एक हस्ती बनने, एक अच्छी नौकरी पाने योग्य और दुनियादारी के लायक बनाते हैं तो उसके क्या परिणाम होते हैं? वे तुमसे अनवरत रूप से सफलता का पीछा कराते हैं, अपने परिवार को सम्मान दिलाते हैं और दुनिया की बुरी प्रवृत्तियों को आत्मसात करवाते हैं, ताकि अंत में तुम पाप के गड्ढे में जा गिरो, तबाही झेलो और नष्ट हो जाओ और शैतान द्वारा निगल लिए जाओ। क्या यह प्रेम है? वे तुमसे प्यार नहीं कर रहे, तुम्हारा नुकसान कर रहे हैं, तुम्हें तबाह कर रहे हैं। किसी दिन तुम इतना नीचे डुबोगे कि तुम पश्चात्ताप नहीं कर पाओगे, इतना नीचे कि तुम खुद को बाहर नहीं निकाल पाओगे और नरक में उतर जाओगे। तभी तुम्हें एहसास होगा, ‘ओह, माता-पिता का प्यार दैहिक प्यार है, यह परमेश्वर में विश्वास रखने या सत्य प्राप्त करने में फायदेमंद नहीं है—यह सच्चा प्यार नहीं है!’ तुम लोगों को अभी तक इसका एहसास नहीं हुआ होगा। कुछ लोग कहते हैं, ‘मैं महसूस नहीं कर सकता कि परमेश्वर मुझसे कैसे प्रेम करता है। मुझे अब भी लगता है कि मेरी माँ मुझसे सबसे ज्यादा प्यार करती है। वह मेरे लिए दुनिया की सबसे करीबी इंसान है। एक गाना है “माँ दुनिया में सबसे अच्छी होती है।” यह नाम वास्तविकता से मेल खाता है; यह बिल्कुल सच है!’ किसी दिन, जब तुम्हारे पास वास्तव में जीवन प्रवेश होगा और जब तुमने सत्य प्राप्त कर लिया होगा, तो तुम कहोगे, ‘मुझसे सबसे ज्यादा प्यार करने वाली मेरी माँ नहीं है, न ही वे मेरे पिता हैं। परमेश्वर मुझसे सबसे ज्यादा प्यार करता है। वह मेरा सबसे प्यारा महबूब है, क्योंकि उसने मुझे जीवन दिया, और वह हमेशा मेरी अगुआई कर रहा है, मेरा भरण-पोषण कर रहा है और मुझे शैतान के प्रभाव से बचा रहा है। एकमात्र परमेश्वर ही है, जो लोगों को जीवन प्रदान कर सकता है, जो लोगों की अगुवाई कर सकता है और जिसकी सभी चीजों पर संप्रभुता है।’ जब तुम सत्य को समझ लोगे और सत्य को पूरी तरह से प्राप्त कर लोगे, तभी तुम इन वचनों को गहराई से सराह पाओगे(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य प्राप्त करने के लिए अपने आसपास के लोगों, घटनाओं और चीजों से सबक सीखना चाहिए)। मैं सोचती थी कि मेरे पिता ने मुझे विकसित करने में जो भी ऊर्जा और पैसा लगाया, वह प्रेम था। लेकिन परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं समझ गई कि मेरे पिता मेरे लिए जो महसूस करते थे, वह सच्चा प्रेम नहीं था। उनका लक्ष्य था मुझे ऐसा बनाना कि मैं खुद को तन-मन से करियर बनाने में झोंक दूँ, ज्यादा पैसा कमाऊँ और सबसे अलग दिखूँ, ताकि मैं अपने रिश्तेदारों और दोस्तों की प्रशंसा और ईर्ष्या पा सकूँ और उन्हें अच्छा दिखा सकूँ। मैंने सोचा कि जब मैं काम कर रही थी, तो मैं हफ्ते में केवल एक बार सभा में शामिल हो पाती थी और मेरे पास अपना कर्तव्य निभाने का बिल्कुल भी समय नहीं था। मेरा सारा समय और ऊर्जा काम करने, पैसा कमाने और अपने दोस्तों और सहकर्मियों से तुलना करने में खर्च हो जाता था। मेरा मन इसी बात में लगा रहता था कि पैसा कैसे कमाया जाए और ज्यादा पैसा कमाने के लिए, मैंने अपने सहकर्मियों के खिलाफ साजिशें रचीं और ग्राहकों को धोखा दिया। मेरा मन पूरी तरह से प्रसिद्धि और लाभ में डूबा हुआ था और मेरा दिल ज्यादा-से-ज्यादा खाली और दुखी महसूस करने लगा। केवल परमेश्वर के प्रेम और उद्धार के माध्यम से ही मुझे परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकारने का सौभाग्य मिला, मैं कलीसिया में आई और अपना कर्तव्य निभाना शुरू किया। मैं अब दुनिया की बुरी प्रवृत्तियों में नहीं जी रही थी, प्रसिद्धि और लाभ का अनुसरण नहीं कर रही थी। अगर मैं अपना कर्तव्य नहीं निभा रही होती तो मैं अब भी प्रसिद्धि और लाभ के भँवर में फँसी होती; मैं और भी दुष्ट हो गई होती और मैंने बचाए जाने का अपना मौका पूरी तरह से खो दिया होता। यह महसूस होने पर, मैंने अपने दिल में संकल्प लिया : मुझे कलीसिया में अपना कर्तव्य ठीक से निभाना ही होगा। मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा : “अगर तुम्हारे माता-पिता खराब मानवता के हैं, यदि वे तुम्हें परमेश्वर में विश्वास करने से लगातार रोकते हैं, और अगर वे तुम्हें परमेश्वर में विश्वास करने और अपना कर्तव्य निभाने से दूर खींचते रहते हैं, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हें किस सत्य का अभ्यास करना चाहिए? (अस्वीकार।) उस समय तुम्हें उन्हें अस्वीकार कर देना चाहिए। तुमने अपना दायित्व पूरा किया है। तुम्हारे माता-पिता परमेश्वर में विश्वास नहीं करते, इसलिए उनके प्रति संतानोचित आदर प्रदर्शित करने का तुम्हारा कोई दायित्व नहीं है। अगर वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो वे परिवार हैं, तुम्हारे माता-पिता हैं। अगर वे परमेश्वर में विश्वास नहीं करते, तो तुम लोग अलग-अलग मार्ग पर चल रहे हो : वे शैतान में विश्वास करते हैं और दानव राजा की पूजा करते हैं और वे शैतान के मार्ग पर चलते हैं, वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर में विश्वास करने वालों से भिन्न मार्गों पर चल रहे हैं। अब तुम एक परिवार नहीं हो। वे परमेश्वर में विश्वास करने वालों को अपना विरोधी और शत्रु मानते हैं, इसलिए उनकी देखभाल करने का तुम्हारा दायित्व नहीं रह गया है और तुम्हें उनसे पूरी तरह से संबंध तोड़ लेना चाहिए(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य वास्तविकता क्या है?)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं समझ गई कि मेरे पिता और मैं दो अलग-अलग रास्तों पर थे : मेरे पिता ने पैसा कमाने के लिए कड़ी मेहनत की और प्रसिद्धि और लाभ का अनुसरण किया ताकि दूसरे लोग उनका आदर करें; वे शैतान के मार्ग पर थे। जहाँ तक मेरी बात है, मैं परमेश्वर में विश्वास करती थी और अपना कर्तव्य निभा रही थी; मैं सत्य का अनुसरण करने और बचाए जाने के मार्ग पर थी। मैं पहले अपनी दैहिक भावनाओं में जी रही थी, यह सोचकर कि मैं नौकरी छोड़कर अपने पिता को दुखी और मायूस कर रही हूँ, मैं हमेशा उन्हें निराश करती रहती थी। लेकिन आज, परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मुझे अपने पिता के बारे में कुछ समझ हासिल हुई थी। वे परमेश्वर में विश्वास नहीं करते थे और मुझे विश्वास करने से रोकने की कोशिश भी करते थे। हम एक ही रास्ते पर नहीं थे, इसलिए मैं अब उन्हें एक देह से जुड़े रिश्तेदार की दृष्टि से नहीं देख सकती थी। एक बार जब मुझे यह एहसास हुआ तो मैं अपनी भावनाओं से बाधित नहीं रही।

दिसंबर 2022 में, मुझे अपना कर्तव्य निभाने में बहुत व्यस्त होने के कारण घर छोड़ना पड़ा और मैं हफ्ते में केवल एक बार घर वापस आती थी। एक बार जब मैं घर आई, तो मेरे पिता ने मुझसे कठोरता से कहा, “तुम नौकरी कब करोगी? अगर तुम काम नहीं करोगी तो यहाँ मत रहो। हमारे गाँव वाले गृहनगर वापस चली जाओ!” मुझे चिंता होने लगी, “अगर मैंने उनकी बात नहीं मानी तो क्या वे सच में मुझे हमारे गृहनगर वापस भेज देंगे? क्या मैं तब भी अपना कर्तव्य निभा पाऊँगी?” उसके बाद, मैं हमेशा चुपके से अपना कर्तव्य निभाने के लिए बाहर निकल जाती। एक बार, जैसे ही मैं अपना कर्तव्य निभाने के लिए निकलने वाली थी, मेरे पिता ने मुझे देख लिया। उन्होंने कठोरता से कहा, “अगर तुम दोबारा चुपके से बाहर निकली तो वापस मत आना। अगर आई, तो मैं तुम्हारी टाँगें तोड़ दूँगा! मैं मजाक नहीं कर रहा। आजमा कर देख लो!” मैं थोड़ी डर गई और सोचने लगी, “अगर मैं गई और फिर वापस आई तो क्या वे सच में मेरी टाँगें तोड़ देंगे? मुझे अपना कर्तव्य जारी रखना चाहिए या नहीं?” मैं बहुत दुविधा में थी, सोच रही थी, “लेकिन अगर मैं नहीं गई तो मेरे कर्तव्य का क्या होगा? कलीसिया का काम बहुत व्यस्त है और समय पर वापस न जाने से काम में देरी होगी।” मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और खोजा। फिर मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा : “तुम्हारे साथ चाहे जो भी बुरा हो, चाहे कोई परीक्षा या परीक्षण हो, चाहे तुम्हारी काट-छाँट हो रही हो, लोग तुमसे चाहे जैसा व्यवहार करें, तुम्हें इन चीजों को परे रखकर सत्य खोजने और अपनी दशा ठीक करने के लिए परमेश्वर के सामने अनन्य भाव से प्रार्थना करने आना चाहिए। पहले इसका समाधान निकलना चाहिए। तुम्हें कहना चाहिए, ‘यह मामला चाहे जितना बड़ा हो, चाहे आसमान टूट पड़े, मुझे अपना कर्तव्य अच्छे से निभाना है। जब तक मेरी साँस चल रही है, मैं अपना कर्तव्य नहीं छोड़ूँगा।’ तो फिर तुम अपना कर्तव्य अच्छी तरह कैसे निभाते हो? तुम बेमन से या शरीर से हाजिर होकर लेकिन मन भटकाकर कर्तव्य नहीं निभा सकते—अपने कर्तव्य में दिल और मन लगाना होगा(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, जीवन प्रवेश कर्तव्य निभाने से प्रारंभ होता है)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे आस्था दी। चाहे कुछ भी हो जाए, भले ही मेरे पिता सच में मेरी टाँगें तोड़ दें, मुझे अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी थी और मैं अपना कर्तव्य नहीं छोड़ सकती थी। यह सोचकर, मुझे तुरंत ताकत का एहसास हुआ और मैं अपना कर्तव्य निभाने के लिए घर से निकल गई। बाद में जब मैं फिर घर गई तो मेरे पिता ने मुझे मारा नहीं, लेकिन उन्होंने फिर भी मुझे काम पर जाने के लिए मनाने की कोशिश की। हालाँकि, मैं उनसे बाधित नहीं हुई और अपना कर्तव्य निभाती रही।

फरवरी 2023 में, मैं एक महीने तक घर नहीं लौटी क्योंकि मैं अपने कर्तव्य में बहुत व्यस्त थी और बड़ा लाल अजगर विश्वासियों को गंभीर रूप से सता रहा था और गिरफ्तार कर रहा था। मेरे पिता ने गुस्से से कहा, “इस बार, मैं तुम्हें जंजीरों से बाँध दूँगा ताकि तुम जा न सको!” बचपन से लेकर आज तक मेरे पिता ने मुझसे कभी इस तरह बात नहीं की थी—उनका चेहरा तमतमाया हुआ था, गुस्से से उसकी गर्दन की नसें तन गई थीं। मैं बुरी तरह डर गई थी। उस शाम, मेरी छोटी बहन ने मुझसे रोते हुए कहा, “दीदी, मत जाओ। जब भी तुम चली जाती हो तो पापा बस बोलते ही रहते हैं। तुम माँ और मेरे बारे में सोचती भी नहीं हो।” अगले दिन, जब मैं अपना कर्तव्य निभाने के लिए बाहर जाने वाली थी, तो मेरी माँ ने मुझे रोका और कहा, “अभी के लिए अपने पापा की बात मान लो और कोई नौकरी कर लो! तुम इतनी जिद्दी क्यों हो?” मेरा दिल बहुत कमजोर महसूस करने लगा। मैंने मन में सोचा, “माँ और बहन ने पहले कभी मेरी आस्था या मेरे कर्तव्य पर आपत्ति नहीं की, लेकिन अब वे पापा की तरफ हैं। अगर मैं अपना कर्तव्य निभाती रही, तो मेरे पापा हर दिन माँ से झगड़ा करेंगे। क्या होगा अगर उनका रिश्ता टूट गया और उनका तलाक हो गया? अगर मैंने अपने पापा की बात नहीं मानी, तो क्या मैं इस घर में रह भी पाऊँगी?” मैं थोड़ी चिंतित और डरी हुई थी और मैंने नौकरी करने और अपना कर्तव्य छोड़ देने के बारे में सोचा। लेकिन पिछले कुछ महीनों से अपना कर्तव्य निभाते हुए, मैंने अपने दिल में शांति और आनंद महसूस किया था। अब, हर तरह की आपदाएँ आ रही हैं और परमेश्वर का कार्य समाप्ति की ओर बढ़ रहा है। मैं परमेश्वर का उद्धार पाने का अवसर खोना नहीं चाहती थी। इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मेरा दिल कमजोर है और दर्द में है। मुझे डर है कि यह परिवार सच में टूट जाएगा, लेकिन मैं बाधित नहीं होना चाहती। कृपया मुझे अपनी गवाही में अडिग रहने का विश्वास दो।” उसके बाद, मैंने पढ़ने के लिए परमेश्वर के वचन ढूँढ़े। परमेश्वर कहता है : “तुम्हें सब कुछ सहना होगा; मेरे लिए तुम्हें हर चीज छोड़ने और अपनी पूरी ताकत से मेरा अनुसरण करने को तैयार रहना होगा और कोई भी कीमत चुकाने के लिए तैयार रहना होगा। अब वह समय है जब मैं तुम्हें परखूँगा : क्या तुम अपनी वफादारी मुझे अर्पित करोगे? क्या तुम मार्ग के अंत तक वफादारी से मेरा अनुसरण कर सकते हो? डरो मत; मेरे सहारे के रहते कौन कभी इस मार्ग को अवरुद्ध कर सकता है? यह याद रखो! याद रखो! हर चीज में मेरे अच्छे इरादे निहित हैं और हर चीज मेरी जाँच के अधीन है। क्या तुम अपनी हर कथनी-करनी में मेरे वचन का अनुसरण कर सकते हो? जब तुम्हारी अग्नि परीक्षाएँ होंगी तो क्या तुम घुटने टेकोगे और पुकारोगे? या तुम दुबक जाओगे और आगे बढ़ने में असमर्थ रहोगे?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 10)। “तुममें मेरा साहस होना चाहिए और जब उन अविश्वासी रिश्तेदारों का सामना करने की बात आए तो तुम्हारे पास सिद्धांत होने चाहिए। लेकिन मेरी खातिर तुम्हें किसी भी अंधकार की शक्ति से हार भी नहीं माननी चाहिए। तुम्हें पूर्ण मार्ग पर चलने के लिए मेरी बुद्धि पर निर्भर रहना चाहिए और शैतान के किसी भी षड्यंत्र को कामयाब नहीं होने देना चाहिए। अपने हृदय को मेरे सम्मुख रखने हेतु जो बन पड़े वह सब करो, मैं तुम्हें दिलासा दूँगा और तुम्हारे हृदय के लिए शांति और आनंद प्रदान करूँगा। यह परवाह मत करो कि लोगों को तुम कैसे प्रतीत होते हो; क्या मुझे संतुष्ट करना अधिक मूल्य और महत्व नहीं रखता है? क्या यह तुम्हारे लिए इस तरह और भी अनंत और जीवनपर्यंत शान्ति और आनंद लेकर नहीं आएगा?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 10)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे आस्था दी। मुझे इधर-उधर की बातों से नहीं डरना चाहिए; मुझे परमेश्वर पर आस्था रखनी होगी। मैं सिर्फ इसलिए अपना कर्तव्य नहीं छोड़ सकती थी क्योंकि मुझे अपने परिवार के टूटने का डर था। मैंने देखा कि परिवार के प्रति मेरा भावनात्मक लगाव बहुत मजबूत था। मैंने अपना दिल पूरी तरह से परमेश्वर को नहीं दिया था और मेरे पास सब कुछ त्यागने और उसका अनुसरण करने का संकल्प नहीं था। मुझमें परमेश्वर के प्रति वफादारी थी ही कहाँ? चाहे कितना भी मुश्किल क्यों न हो, मुझे परमेश्वर पर भरोसा करना था और उसकी गवाही देनी थी। परमेश्वर लोगों के विवाह और भाग्य पर संप्रभुता रखता है; हर किसी का अपना भाग्य होता है। मेरे माता-पिता के विवाह का क्या होता है और यह परिवार टूटेगा या नहीं, यह परमेश्वर पर निर्भर है। भविष्य में मेरा भाग्य कैसा होगा, यह भी परमेश्वर के हाथों में है; मेरे पिता का फैसला आखिरी नहीं है। मुझे अपने कर्तव्य में डटे रहना है और परमेश्वर को संतुष्ट करना है। अगर मैंने अपने पिता की बात मान ली और अपना कर्तव्य निभाना बंद कर दिया तो मुझे अपने परिवार का उत्पीड़न नहीं सहना पड़ेगा, लेकिन यह परमेश्वर के साथ विश्वासघात करना होगा और वह अनंत पीड़ा होगी!

एक और दिन बीत गया। सुबह-सुबह, मैं अपना कर्तव्य निभाने के लिए बाहर जाने की तैयारी कर रही थी। मुझे आश्चर्य हुआ, मेरे पिता मुझ पर नजर रखने के लिए सुबह चार या पाँच बजे उठ गए थे। छह बजे के कुछ देर बाद, वे मेरे कमरे में आए और सीसीपी की निराधार अफवाहों का एक वीडियो चलाया जिसमें सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को बदनाम किया जा रहा था। मैं जानती थी कि समाचार रिपोर्टें सच नहीं थीं, खासकर इसलिए कि इतने लंबे समय तक अपना कर्तव्य निभाने के बाद मैं कुछ सत्य समझ चुकी थी, इसलिए मैं उन निराधार अफवाहों से प्रभावित नहीं हुई। यह देखकर कि मेरे रवैये में कोई बदलाव नहीं आया, मेरे पिता ने मुझे यह कहते हुए मनाने की कोशिश की, “मैं हाल ही में तुम्हारे लिए बहुत चिंतित और परेशान रहा हूँ। मैंने तुम्हें अपने हाथों से पाला-पोसा है। मैं यह सिर्फ तुम्हारी भलाई के लिए कर रहा हूँ—क्या मैं कभी तुम्हारा नुकसान करूँगा? अगर तुम अभी काम पर जाती हो, तो मैं तुम्हें दस हजार युआन से ज्यादा का एक नया फोन खरीद दूँगा। जब तुम्हारी छोटी बहन की छुट्टी होगी तो मैं तुम्हें पैसे दूँगा ताकि तुम दोनों सान्या घूमने जा सको।” जब मेरे पिता ने यह कहा तो मुझे महसूस हुआ कि अगर मैंने इस बार उनकी बात नहीं मानी, तो मैं सचमुच उन्हें निराश कर रही होऊँगी। लेकिन मैं यह भी जानती थी कि परमेश्वर में विश्वास करना और अपना कर्तव्य निभाना जीवन का सही मार्ग है और मैं इसे छोड़ नहीं सकती थी। मैं दुविधा में पड़ गई थी। मुझे एहसास हुआ कि मेरी अवस्था गलत थी, इसलिए मैंने मन ही मन परमेश्वर से प्रार्थना की और उससे मेरे दिल को अपने पिता के शब्दों से प्रभावित न होने देने के लिए कहा। मेरे पिता ने देखा कि मैं कुछ नहीं कह रही हूँ और वे बैठक में वापस चले गए।

उसके बाद, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े, और महसूस किया कि मेरे पिता का मेरी आस्था में बाधा डालना शैतान की बाधा थी। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “अभी जब लोगों को बचाया नहीं गया है, तब शैतान के द्वारा उनके जीवन में प्रायः विघ्न डाला, और यहाँ तक कि उन्हें नियंत्रित भी किया जाता है। दूसरे शब्दों में, वे लोग जिन्हें बचाया नहीं गया है शैतान के क़ैदी होते हैं, उन्हें कोई स्वतंत्रता नहीं होती, वे अब भी शैतान की पकड़ में हैं, वे परमेश्वर की आराधना करने के योग्य नहीं हैं और न ही उनके पास इसका कोई अधिकार है, शैतान द्वारा उनका क़रीब से पीछा और उन पर क्रूरतापूर्वक आक्रमण किया जाता है। ऐसे लोगों के पास कहने को भी कोई खुशी नहीं होती है, उनके पास कहने को भी सामान्य अस्तित्व का अधिकार नहीं होता, और इतना ही नहीं, उनके पास कहने को भी कोई गरिमा नहीं होती है(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II)। “परमेश्वर के पास मनुष्य की परीक्षा लेने के लिए कई साधन और मार्ग हैं, किंतु उनमें से प्रत्येक को परमेश्वर के शत्रु, शैतान, के ‘सहयोग’ की आवश्यकता होती है। कहने का तात्पर्य यह, शैतान से युद्ध करने के लिए मनुष्य को हथियार देने के बाद, परमेश्वर मनुष्य को शैतान को सौंप देता है और शैतान को मनुष्य की कद-काठी की ‘परीक्षा’ लेने देता है। यदि मनुष्य शैतान की व्यूह रचनाओं को तोड़कर बाहर निकल सकता है, यदि वह शैतान की घेराबंदी से बचकर निकल सकता है और तब भी जीवित रह सकता है, तो मनुष्य ने परीक्षा उत्तीर्ण कर ली होगी। परंतु यदि मनुष्य शैतान की व्यूह रचनाओं से छूटने में विफल हो जाता है, और शैतान के आगे झुक जाता है, तो उसने परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की होगी। परमेश्वर मनुष्य के जिस किसी भी पहलू की जाँच करता है, उसकी कसौटी यही होती है कि मनुष्य शैतान द्वारा आक्रमण किए जाने पर अपनी गवाही पर डटा रहता है या नहीं, और उसने शैतान द्वारा फुसलाए जाने पर परमेश्वर को त्याग दिया है या नहीं और शैतान के आगे हार मानकर आत्मसमर्पण कर लिया है या नहीं। कहा जा सकता है कि मनुष्य को बचाया जा सकता है या नहीं यह इस पर निर्भर करता है कि वह शैतान को परास्त करके उस पर विजय प्राप्त कर सकता है या नहीं, और वह स्वतंत्रता प्राप्त कर सकता है या नहीं यह इस पर निर्भर करता है कि वह शैतान की दासता पर विजय पाने के लिए परमेश्वर द्वारा उसे दिए गए हथियार, अपने दम पर, उठा सकता है या नहीं, शैतान को पूरी तरह आस तजकर उसे अकेला छोड़ देने के लिए विवश कर पाता है या नहीं। यदि शैतान आस तजकर किसी को छोड़ देता है, तो इसका अर्थ है कि शैतान फिर कभी इस व्यक्ति को परमेश्वर से लेने की कोशिश नहीं करेगा, फिर कभी इस व्यक्ति पर दोषारोपण और उसे परेशान नहीं करेगा, फिर कभी उन्हें निर्दयतापूर्वक यातना नहीं देगा या आक्रमण नहीं करेगा; केवल इस जैसे किसी व्यक्ति को ही परमेश्वर द्वारा सचमुच प्राप्त किया गया होगा। यही वह संपूर्ण प्रक्रिया है जिसके द्वारा परमेश्वर लोगों को प्राप्त करता है(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं समझ गई कि मैं अभी तक शैतान की युद्ध-संरचनाओं से पूरी तरह बाहर नहीं निकली थी। शैतान अब भी मेरे पिता का इस्तेमाल करके मुझे लगातार परेशान कर रहा था, मुझे सीसीपी की मनगढ़ंत अफवाहें जबरदस्ती सुना रहा था। जब उसने देखा कि मैं नहीं सुनूँगी, तो उसने पारिवारिक स्नेह और मीठे शब्दों का इस्तेमाल किया, मुझे परमेश्वर के साथ विश्वासघात कराने के प्रयास में, नरम और गरम, हर पैंतरा आजमा रहा था। यह बहुत घिनौना था! मैंने उस समय के बारे में सोचा जब अय्यूब ने शैतान के प्रलोभनों का सामना किया था। उसके सारे झुंड और रेवड़ जो पहाड़ियों पर फैले थे, खत्म हो गए थे, वह पीड़ादायक फोड़ों से भर गया था, और उसकी पत्नी ने उसे परमेश्वर को त्यागने के लिए उकसाया। लेकिन अय्यूब ने कहा : “यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है” (अय्यूब 1:21)। “क्या हम जो परमेश्वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?” (अय्यूब 2:10)। जब अय्यूब ने अपनी परीक्षा का सामना किया तो उसने परमेश्वर को नहीं त्यागा और उसने परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग रहा। मुझे अय्यूब के उदाहरण का अनुसरण करना था, शैतान की घेराबंदी के बीच परमेश्वर के वचनों के हथियार से उस पर काबू पाना था और परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग रहना था। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और एक संकल्प लिया, उससे मुझे आस्था देने के लिए कहा कि मैं अपनी गवाही में अडिग रहूँ।

मैंने परमेश्वर के कुछ और अंश पढ़े और खुद के बारे में कुछ समझ हासिल की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “तुम्हें सत्य के लिए कष्ट उठाने होंगे, तुम्हें सत्य के लिए खुद को बलिदान करना होगा, तुम्हें सत्य के लिए अपमान सहना होगा और तुम्हें और अधिक सत्य प्राप्त करने की खातिर और अधिक कष्ट सहना होगा। यही तुम्हें करना चाहिए। पारिवारिक सामंजस्य का आनंद लेने के लिए तुम्हें सत्य का त्याग नहीं करना चाहिए और तुम्हें अस्थायी आनंद के लिए जीवन भर की गरिमा और सत्यनिष्ठा को नहीं खोना चाहिए। तुम्हें उस सबका अनुसरण करना चाहिए जो खूबसूरत और अच्छा है और तुम्हें जीवन में एक ऐसे मार्ग का अनुसरण करना चाहिए जो ज्यादा अर्थपूर्ण है। यदि तुम ऐसा साधारण और सांसारिक जीवन जीते हो और आगे बढ़ने के लिए तुम्हारा कोई अनुसरण नहीं है तो क्या इससे तुम्हारा जीवन बर्बाद नहीं हो रहा है? ऐसे जीवन से तुम्हें क्या हासिल हो सकता है? तुम्हें एक सत्य के लिए देह के सभी सुखों का त्याग करना चाहिए, और थोड़े-से सुख के लिए सारे सत्यों का त्याग नहीं कर देना चाहिए। ऐसे लोगों में कोई सत्यनिष्ठा या गरिमा नहीं होती; उनके अस्तित्व का कोई अर्थ नहीं होता!(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान)। “इन सब वर्षों में तुम लोगों ने मेरा अनुसरण किया है, फिर भी तुमने मुझे कभी वफादारी का एक कण भी नहीं दिया है। इसकी बजाय, तुम लोग उन लोगों के इर्दगिर्द घूमते रहे हो, जिनसे तुम प्रेम करते हो और जो चीज़ें तुम्हें पसंद हैं—इतना कि हर समय, और हर जगह जहाँ तुम जाते हो, उन्हें अपने हृदय के करीब रखते हो और तुमने कभी भी उन्हें छोड़ा नहीं है। जब भी तुम लोग किसी एक चीज के बारे में, जिससे तुम प्रेम करते हो, उत्सुक और जोशीले हो, तो ऐसा तब है जब तुम मेरा अनुसरण कर रहे होते हो, या तब भी जब तुम मेरे वचनों को सुन रहे होते हो। इसलिए मैं कहता हूँ कि जिस वफादारी की माँग मैं तुमसे करता हूँ, उसे तुम अपने ‘पालतुओं’ के प्रति वफादार होने और उन्हें प्रसन्न करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हो। हालाँकि तुम लोग मेरे लिए एक-दो चीजों का त्याग करते हो, पर वह तुम्हारे सर्वस्व का प्रतिनिधित्व नहीं करता, और यह नहीं दर्शाता कि वह मैं हूँ, जिसके प्रति तुम सचमुच वफादार हो(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम वास्तव में किसके प्रति वफादार हो?)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं समझ गई कि मुझे सत्य के लिए कष्ट सहना था और मुझे केवल पारिवारिक सद्भाव का आनंद लेने के लिए सत्य को त्यागना नहीं चाहिए। जितने समय से मैं परमेश्वर में विश्वास करती रही और अपना कर्तव्य निभाती रही, मैं सावधानी से इस परिवार को बनाए रखने की कोशिश करती रही थी, इस डर से कि उनके साथ मेरा रिश्ता टूट जाएगा और मैं घर नहीं जा पाऊँगी। अपने पिता के बार-बार के मनाने और धमकियों का सामना करते हुए, मैंने अंदर से बहुत कमजोर महसूस किया और मैं एक दुविधा में फँस गई थी, बाहर जाकर अपना कर्तव्य फिर से निभाने में झिझक रही थी। मैंने देखा कि मैं हमेशा इस परिवार के प्रति वफादार रही थी, परमेश्वर के प्रति नहीं और मैंने निश्चित रूप से सत्य का अनुसरण करने को प्राथमिकता नहीं दी थी। क्योंकि मेरे परिवार के प्रति मेरा भावनात्मक लगाव बहुत मजबूत था, मैं कई बार शैतान के प्रलोभनों में पड़ गई थी और लगभग परमेश्वर के साथ विश्वासघात कर चुकी थी। तभी मैंने देखा कि शैतान लोगों को पारिवारिक स्नेह में जीने, देह में लिप्त होने पर मजबूर करता है, और अंततः वे बचाए जाने का अपना मौका खो देते हैं। परमेश्वर का इरादा है कि हम सृजित प्राणियों के रूप में अपना कर्तव्य निभाएँ, सत्य का अनुसरण करें, एक सच्ची मानवीय समानता को जीएँ और उद्धार प्राप्त करें। अगर मैंने अपने पिता की बात मान ली और इस बार सिर्फ अपने दैहिक हितों की रक्षा के लिए नौकरी करने लगी तो मुझे शायद पारिवारिक सद्भाव का आनंद मिल जाए, लेकिन मैं सत्य पाने का अपना अवसर खो दूँगी। वह खालीपन और दर्द के अलावा और क्या होता? मुझे सही रास्ता चुनना था। एक सुबह, मेरे पिता को अचानक किसी काम से बाहर जाना पड़ा। मैंने मौके का फायदा उठाया और फिर से अपना कर्तव्य निभाने के लिए निकल गई।

दो महीने बाद, मुझे कलीसिया से एक पत्र मिला जिसमें कहा गया था कि मेरे पिता ने पुलिस में मेरी रिपोर्ट कर दी थी और उन्होंने मेरी दादी माँ और हमारे गृहनगर के भाई-बहनों की भी रिपोर्ट कर दी थी, जिसके कारण वे सभी गिरफ्तार हो गए। मेरे पिता मुझे पागलों की तरह सताने और मेरे कर्तव्य निर्वहन से मुझे रोकने के लिए हर तरह के तरीकों का इस्तेमाल करते रहे थे। जब उन्होंने देखा कि मैं नहीं सुनूँगी तो वे पूरी तरह से मेरे खिलाफ हो गए और पुलिस को सतर्क कर दिया, यहाँ तक कि मेरी दादी माँ को भी पकड़वा दिया। उनका सार एक दानव का है! उनके सार को स्पष्ट रूप से देख लेने के बाद से मैं अपनी भावनाओं से बाधित नहीं रही। उस दिन से, मैं कभी घर वापस नहीं गई। मैं तब से पूर्णकालिक रूप से अपना कर्तव्य निभा रही हूँ। सही चुनाव करने में मेरी अगुआई करने के लिए परमेश्वर का धन्यवाद!

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