82. क्या केवल अनुग्रह और आशीष पाने के लिए ही परमेश्वर पर विश्वास करना सही है?
जुलाई 2008 में मेरी मौसी ने मुझे अंत के दिनों के परमेश्वर के सुसमाचार का उपदेश दिया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पढ़कर मैं समझ गई कि मनुष्य का जीवन परमेश्वर से आता है, मैं जिस भी चीज का आनंद लेती हूँ, वह उसी ने दी है, मुझे परमेश्वर पर विश्वास करना और उसकी आराधना करनी चाहिए। उस समय मेरा परिवार सुअर पालन का काम करता था। हर दिन सुअरों को खिलाने के बाद मैं परमेश्वर के वचन पढ़ती, भजन सुनती और नियमित रूप से सभाओं में जाती थी। कभी-कभी मैं सुसमाचार का प्रचार करने के लिए बाहर भी जाती थी। एक दिन हमारे एक पड़ोसी ने कहा कि उसके सुअरों को खाँसी आ रही है और ऐसा लग रहा था कि उन्हें तेज बुखार है। मुझे वाकई चिंता हुई कि कहीं मेरे सुअरों को भी यह बीमारी न लग जाए, इसलिए मैंने प्रार्थना की और यह मामला परमेश्वर को सौंप दिया। चमत्कारिक रूप से मेरा कोई भी सुअर संक्रमित नहीं हुआ, कुछ महीनों बाद हमने उन्हें दसियों हजार युआन में बेच दिया। मैं बहुत खुश थी। जब मैंने शुरुआत की थी तो मुझे सुअर पालन का कोई अनुभव नहीं था, फिर भी न तो सुअरों को और न ही सुअर के बच्चों को कोई बीमारी लगी और घर पर सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। परमेश्वर पर विश्वास करना वाकई बहुत अच्छा था! आगे से मुझे ठीक से परमेश्वर पर विश्वास करना था और परमेश्वर के प्रेम को चुकाने के लिए अपने कर्तव्य निभाने थे।
कुछ ही समय बाद अगुआ ने मुझे दो छोटे समूहों की देखरेख का काम सौंप दिया। मैं बहुत खुश थी और मैंने सोचा, “मैं जितनी अधिक सभाओं में जाऊँगी, उतने ही अधिक सत्य समझूँगी, और मैं जितने ज्यादा कर्तव्य निभाऊँगी, परमेश्वर मेरे परिवार की उतनी ही ज्यादा रक्षा करेगा।” उसके बाद घर पर चाहे कितनी भी व्यस्तता क्यों न हो, मैं हमेशा अपने कर्तव्य करने के लिए समय निकालने की कोशिश करती थी। लेकिन 2008 के अंत में एक अनहोनी घटना हुई। एक रात रात के करीब 12 बजे मेरे भाई, भाभी और पति काम से जल्दी में गाड़ी से घर आ रहे थे। अँधेरा था, बारिश हो रही थी और पहाड़ी सड़क ऊबड़-खाबड़ थी और वे एक मोड़ पर अचानक एक गहरी खाई में गिर गए। मेरे पति का सिर कार के दरवाजे से टकरा गया, टूटे हुए काँच उसके चेहरे पर गिरे, उसका चेहरा पूरी तरह से कट गया और वह खून से लथपथ हो गया। वह उसी समय बेहोश हो गया। उसका इतना खून बह गया था कि होश में आने से पहले वह करीब दो घंटे तक अस्पताल में कोमा में रहा। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद मेरे पति के सिर में हल्की चोट रह गई थी, और कभी-कभी वह ऊटपटांग बातें करने लगता था; उसका एक दाँत टूट गया था; उसके मुँह के घाव भरे नहीं थे और उसकी बोली साफ नहीं थी। उसे ऐसी बदहवास हालत में देखकर मेरा दिल दुखता था, मैं चैन से नहीं बैठ पाती थी और सोचती थी, “जब वह काम पर गया था तो ठीक था; वह इस हालत में कैसे वापस आ सकता है? यह सब मेरे भाई की गलती है जो इतनी लापरवाही से गाड़ी चला रहा था।” लेकिन फिर मैंने सोचा, “मैं परमेश्वर पर विश्वास करती हूँ, सभाओं में जाती हूँ और अपने कर्तव्य करती हूँ, तो ऐसी बात कैसे हो सकती है? परमेश्वर ने उनकी रक्षा क्यों नहीं की? अगर मेरे पति पर इसका कोई बुरा असर रह गया तो हमारी जिंदगी कैसी होगी? हमारे दो बेटे अभी छोटे हैं और हमारा सुअर फार्म भी है। मेरे लिए इन सब बातों की चिंता कौन करेगा?” अगले कुछ दिनों तक मैं इतनी चिंतित रही कि ठीक से खा या सो नहीं पाई, और चलते समय मेरे पैरों में भारीपन महसूस होता था। मेरा मन परमेश्वर के वचन पढ़ने या भजन सुनने का नहीं करता था और जब मैं जबरदस्ती सभा में जाती तो बस सिर झुकाए रहती और बोलना नहीं चाहती थी। बाद में मेरी दशा के बारे में जानने के बाद बहन वांग फांग ने परमेश्वर के वचनों का यह भजन चलाया : “तुम्हें सभी चीजों में परमेश्वर की गवाही देनी चाहिए।” “परमेश्वर द्वारा मनुष्य पर किए जाने वाले कार्य का हर कदम बाहर से यह लोगों के मध्य अंतःक्रिया प्रतीत होता है, मानो यह मानव-व्यवस्थाओं द्वारा या मानवीय विघ्न से उत्पन्न हुआ हो। किंतु, कार्य के प्रत्येक कदम, और घटित होने वाली हर चीज के पीछे शैतान द्वारा परमेश्वर के सामने चली गई बाजी है और इनमें अपेक्षित है कि लोग परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग बने रहें। उदाहरण के लिए, जब अय्यूब का परीक्षण हुआ : पर्दे के पीछे शैतान परमेश्वर के साथ शर्त लगा रहा था और अय्यूब के साथ जो हुआ वह मनुष्यों के कर्म थे और मनुष्यों के विघ्न थे। परमेश्वर द्वारा तुम लोगों पर किए गए कार्य के हर कदम के पीछे शैतान की परमेश्वर के साथ बाजी होती है—इसके पीछे एक लड़ाई होती है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है)। वांग फांग ने मेरे साथ संगति की : “बहन, हम सब अय्यूब के अनुभव के बारे में जानते हैं। भले ही ऐसा लगता था कि अय्यूब के भेड़-बकरियों और मवेशियों के विशाल झुंड को चोरों ने ले लिया था, असल में यह शैतान का एक प्रलोभन था। शैतान ने सोचा कि अय्यूब केवल इसलिए परमेश्वर का भय मानता था क्योंकि परमेश्वर ने उसे आशीष दी थी। परमेश्वर ने शैतान को अनुमति दी कि वह अय्यूब को प्रलोभन दे और इसलिए शैतान ने अय्यूब पर हमला करना शुरू कर दिया, उसके ऊँटों और मवेशियों को चुराने के लिए चोरों का इस्तेमाल किया, उसके बच्चों को नुकसान पहुँचाया और बाद में शैतान ने अय्यूब के पूरे शरीर को फोड़ों से भर दिया। शैतान का लक्ष्य था कि अय्यूब परमेश्वर के बारे में शिकायत करे और उसे नकार दे। लेकिन अय्यूब की परमेश्वर में सच्ची आस्था थी, वह मानता था कि यहोवा ने दिया था और यहोवा ने ही ले लिया और उसने परमेश्वर के नाम की स्तुति की। उसने परमेश्वर के लिए एक जबरदस्त गवाही दी। जब हम परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, शैतान हम पर आरोप लगाएगा और हमला करेगा और यही हमारे लिए प्रलोभन है। ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारे परिवार में जो हो रहा है, शैतान का लक्ष्य है कि तुम परमेश्वर का परित्याग कर दो और उसका उद्धार खो दो। हमें परमेश्वर में आस्था रखनी चाहिए और शैतान की चालों में नहीं फँसना चाहिए।” वांग फांग की संगति सुनने के बाद मुझे एहसास हुआ कि यह घटना असल में एक आध्यात्मिक लड़ाई थी और शैतान मुझे परेशान करने की कोशिश कर रहा था। शैतान नहीं चाहता था कि मैं परमेश्वर पर विश्वास करके बचाई जाऊँ, इसलिए वह मेरी आस्था और उद्धार को नष्ट करने और उसमें गड़बड़ करने की पूरी कोशिश कर रहा था। वह मेरे पति की कार दुर्घटना का इस्तेमाल करके परमेश्वर का अनुसरण करने के मेरे संकल्प को हिलाना चाहता था, वह चाहता था कि मैं परमेश्वर पर संदेह करूँ और उस पर विश्वास न करूँ और आखिरकार इसी के साथ नष्ट हो जाऊँ। शैतान बहुत दुर्भावनापूर्ण है और मैं उसकी चाल में नहीं फँस सकती थी! फिर मैंने अपने पति की दुर्घटना वाली रात के बारे में और सोचा। अँधेरा था और बारिश हो रही थी; पहाड़ी सड़क पहले से ही ऊबड़-खाबड़ थी और बारिश होने पर उस पर फिसलन हो गई थी; मेरे भाई ने लापरवाही से गाड़ी चलाई और गलती से गाड़ी खाई में गिरा दी; और यह तो होता ही, चाहे मैं परमेश्वर पर विश्वास करती या नहीं। लेकिन जब ये सब गलत हुआ तो मैंने परमेश्वर से शिकायत की। मुझमें विवेक की कितनी कमी थी! मुझे परमेश्वर के बारे में शिकायत नहीं करनी चाहिए थी! यह समझने के बाद मैंने परमेश्वर पर विश्वास करने और उसका अनुसरण जारी रखने का मन बना लिया। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना भी की और अपने पति को उसे सौंप दिया, क्योंकि मैं जानती थी कि वह जब भी ठीक होगा, उसे परमेश्वर ही तय करेगा; मैं समर्पण करने को तैयार थी। उसके बाद मैंने परमेश्वर पर विश्वास करना और सभाओं में जाना जारी रखा। छह महीने बाद दवा लेने और स्वस्थ होने के बाद मेरे पति का मन धीरे-धीरे सामान्य हो गया। वह ज्यादा ऊर्जावान हो गया और उस पर कोई स्थायी दुष्प्रभाव नहीं रहे। इस घटना से मैंने परमेश्वर की सुरक्षा देखी और उस पर मेरी आस्था और मजबूत हो गई।
फरवरी 2011 में एक दिन एक पड़ोसी ने मुझे बताया कि उसके कुछ सुअरों को खुरपका-मुँहपका रोग हो गया है, उसने पूछा कि मेरे सुअर कैसे हैं। मेरे पति ने उसे बताया कि हमारे सुअर ठीक हैं। लेकिन कुछ दिन बाद हमारी कुछ सुअरियों को, जिन्होंने अभी-अभी बच्चों को जन्म दिया था, उन्हें भी खुरपका-मुँहपका रोग हो गया। सुअरियों का दूध पीने वाले बच्चे भी संक्रमित हो गए और सिर्फ एक महीने में हमारे 60 से ज्यादा सुअर के बच्चे मर गए। इस सबसे मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे दिल में कोई छुरा घोंप रहा हो। मुझे वास्तव में चिंता थी कि अगर हमारे परिवार के दूसरे सुअर भी संक्रमित हो गए, तो हम अपनी मूल जमापूँजी और अपना संभावित मुनाफा, दोनों गँवा देंगे। मेरे ससुर ने मुझसे शिकायत की, “परमेश्वर में तुम्हारी आस्था ने परिवार को सुरक्षित नहीं रखा है। तुम्हारे पति का कार हादसा हुआ और अब सुअर बीमार हैं।” यहाँ तक कि मेरे पति ने तो मुझे सभाओं में भी नहीं जाने दिया। मेरे पूरे परिवार ने मुझे घेरकर एक के बाद एक मेरी कड़ी आलोचना की, मुझे बहुत दुख हुआ। मैंने अनजाने में परमेश्वर पर संदेह करना शुरू कर दिया, “इतने सारे सुअर के बच्चे मर गए हैं—क्या यह सच में मेरे परमेश्वर में आस्था रखने की वजह से हो सकता है?” मैं नकारात्मकता और कमजोरी में पड़ गई और दो-तीन महीने तक किसी भी सभा में नहीं गई। बाद में अपने पति की पिछली कार दुर्घटना के बारे में सोचकर मुझे एहसास हुआ कि यह शैतान था, जो मुझे फिर से व्यवधान में डालने की कोशिश कर रहा था। लेकिन मैं परमेश्वर के वचन खा-पी रही थी और अपना कर्तव्य कर रही थी, तो निश्चित रूप से मुझे परमेश्वर की सुरक्षा मिलनी चाहिए थी। परमेश्वर मुझे आशीष क्यों नहीं दे रहा था? परमेश्वर में विश्वास रखने और विश्वास न रखने में वाकई कोई अंतर नहीं था! मैंने इस बारे में जितना सोचा, उतना ही इस बारे में अनिश्चित हो गई कि इस स्थिति का अनुभव कैसे करूँ। इसलिए मैं घुटनों के बल झुकी और परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर! मेरे परिवार के दर्जनों सुअर के बच्चे मर गए हैं। मेरा परिवार इस वजह से मुझ पर लगातार हमला करता रहता है और मुझसे नहीं लगता कि मैं अब और सह पाऊँगी। कृपया मुझे अपना इरादा समझने के लिए प्रबुद्ध करो और मेरा मार्गदर्शन करो।” प्रार्थना करने के बाद मुझे बहन वांग फांग की वह संगति याद आई जो उसने पहले मेरे साथ अय्यूब के अनुभव के बारे में साझा की थी। जब शैतान ने अय्यूब को प्रलोभन देने की कोशिश की, अय्यूब की विशाल संपत्ति चोरों ने ले ली, उसके बच्चे कुचलकर मार दिए गए और वह फोड़ों से भर गया। लेकिन अय्यूब परमेश्वर की संप्रभुता को जानता था। वह जानता था कि परमेश्वर ने दिया था और परमेश्वर ने ही ले लिया था। अय्यूब को परमेश्वर के बारे में कोई संदेह नहीं थे और उसने परमेश्वर के नाम की स्तुति करना जारी रखा, परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में दृढ़ रहा और शैतान को अपमानित किया। मैंने सोचा कि कैसे मेरे सुअर के बच्चे बीमार होकर मर गए थे और यह भी शैतान ही था, जो मुझे प्रलोभन देने और मुझमें बाधा डालने की कोशिश कर रहा था, मुझे भी परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में दृढ़ रहना था। अय्यूब ने इतने सारे मवेशी और अपनी विशाल संपत्ति खो दी, फिर भी उसने परमेश्वर से शिकायत नहीं की। लेकिन जहाँ तक मेरी बात है, मैंने सिर्फ इसलिए परमेश्वर से शिकायत की क्योंकि मेरे कुछ दर्जन सुअर के बच्चे मर गए थे। जब मैंने अपनी तुलना उससे की तो मैं अय्यूब से वाकई बहुत पीछे थी! इसे महसूस करके मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, यह शपथ ली कि चाहे शैतान मुझे फिर से कितना भी व्यवधान में डालने की कोशिश करे, मैं फिर भी परमेश्वर में आस्था रखूँगी और उसकी आराधना करूँगी।
बाद में मैंने परमेश्वर के वचन पढ़ने के लिए खोजे, जो मेरी दशा के लिए प्रासंगिक थे। मैंने परमेश्वर के ये वचन देखे : “तुम परमेश्वर में विश्वास करने के बाद शांति प्राप्त करना चाहते हो—ताकि अपनी संतान को बीमारी से दूर रख सको, अपने पति के लिए एक अच्छी नौकरी पा सको, अपने बेटे के लिए एक अच्छी पत्नी और अपनी बेटी के लिए एक अच्छा पति पा सको, अपने बैल और घोड़े से जमीन की अच्छी जुताई कर पाने की क्षमता और अपनी फसलों के लिए साल भर अच्छा मौसम पा सको। तुम इन्हीं सब का अनुसरण करते हो। तुम्हारा लक्ष्य केवल सुखी जीवन बिताना है, तुम्हारे परिवार में कोई दुर्घटना न हो, आँधी-तूफान तुम्हारे पास से होकर गुजर जाएँ, धूल-मिट्टी तुम्हारे चेहरे को छू भी न पाए, तुम्हारे परिवार की फसलें बाढ़ में न बह जाएं, तुम किसी भी विपत्ति से प्रभावित न हो सको, तुम ‘परमेश्वर के आलिंगन’ में रहो, एक आरामदायक घरौंदे में रहो। तुम जैसा डरपोक इंसान, जो हमेशा दैहिक सुख के पीछे भागता है—क्या तुम्हारे अंदर एक दिल है, क्या तुम्हारे अंदर एक आत्मा है? क्या तुम एक पशु नहीं हो? मैं बदले में बिना कुछ मांगे तुम्हें एक सत्य मार्ग देता हूँ, फिर भी तुम उसका अनुसरण नहीं करते। क्या तुम उनमें से एक हो जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं? मैं तुम्हें एक सच्चा मानवीय जीवन देता हूँ, फिर भी तुम अनुसरण नहीं करते। क्या तुम कुत्ते और सूअर से भिन्न नहीं हो?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान)। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गई कि परमेश्वर उन लोगों से घृणा करता है जो आशीष पाने के इरादे से उस पर विश्वास करते हैं। लेकिन अपनी आस्था में मैं चाहती थी कि वह मेरे परिवार की शांति और स्वास्थ्य की रक्षा करे और मेरे मवेशियों के बहुत से बच्चे हों, हम उनसे अच्छी कमाई कर सकें। जब परिवार में बिना किसी आपदा या दुर्भाग्य के सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था, तो मैंने सक्रिय रूप से अपने कर्तव्य निभाए और मेरे पति के कार हादसे से ठीक होने के बाद मैंने मन ही मन परमेश्वर का धन्यवाद किया। लेकिन जब सुअर के बच्चे एक के बाद एक मरते रहे, तो मैंने अपने परिवार की रक्षा न करने के लिए परमेश्वर से शिकायत की। मैं इतनी नकारात्मक हो गई कि परमेश्वर के वचन पढ़ने पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाई और दो-तीन महीने तक सभाओं में नहीं गई। मैं हर दिन सुअरों के स्वास्थ्य और हमारे आर्थिक नुकसान के बारे में चिंता करती थी। मुझे एहसास हुआ कि मैं सिर्फ उसका अनुग्रह और आशीष पाने के लिए परमेश्वर पर विश्वास कर रही थी, मैं परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने की कोशिश कर रही थी। मैं सचमुच स्वार्थी और नीच थी! एक कुत्ते के बारे में सोचो : जब उसका मालिक उसे खिलाता है, तो वह अपने मालिक के लिए घर की रखवाली करता है, लेकिन जब मालिक उसे नहीं खिलाता, तब भी कुत्ता मालिक के लिए घर की रखवाली करता है। मैं तो एक कुत्ते से भी बदतर थी। जब परमेश्वर ने मुझे आशीष दी, तो मैंने उसका धन्यवाद किया, लेकिन जब परमेश्वर ने मुझे जरा भी संतुष्ट नहीं किया, तो मैंने उस पर से आस्था खो दी, यहाँ तक कि जब मेरे परिवार ने मुझ पर हमला किया, तो मैंने धीरे-धीरे उनके विचारों को स्वीकार करना शुरू कर दिया और परमेश्वर पर संदेह करने और उससे शिकायतें करने लगी। मैं कितनी भ्रमित थी! मुझे सुअर पालने का अनुभव नहीं था, इसलिए सुअरों को खुरपका-मुँहपका रोग होना और उनका मरना स्वाभाविक था। इसके अलावा मेरे पड़ोसियों द्वारा पाले गए कुछ सुअर भी मर गए थे और यह पशुपालन उद्योग में एक बहुत ही आम बात है। लेकिन मैं इस मामले को सही ढंग से नहीं देख सकी और इसके बजाय अपने परिवार की रक्षा न करने के लिए परमेश्वर से शिकायत की; क्या यह मेरी तरफ से अविवेकी नहीं था? परमेश्वर का इरादा समझने के बाद मुझे अपने दिल में बहुत मुक्ति महसूस हुई। मैं आशीषों की अपनी इच्छा छोड़ने और अब परमेश्वर से अब और आशीष या शांति न माँगने की इच्छुक थी और परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने और उसने मेरे लिए जो परिस्थितियाँ व्यवस्थित की थीं, उनमें सबक सीखने के लिए तैयार हो गई। उसके बाद मैंने सभाओं में जाना जारी रखा और धीरे-धीरे परमेश्वर के साथ मेरा रिश्ता और गहरा हो गया।
अगस्त में एक सुबह जब मैं सुअरों को चारा खिलाने गई, मैंने देखा कि दो वयस्क सुअरों को खाँसी आ रही थी और उनके शरीर पर लाल धब्बे थे। मैंने जल्दी से अपने पड़ोसी को फोन करके पूछा कि यह कौन सी बीमारी हो सकती है। मेरे पड़ोसी ने कहा, “इस समय सुअरों को तेज बुखार होने का खतरा रहता है। बगल के परिवार के कुछ सुअरों को यह बीमारी हो गई है। यह बीमारी संक्रामक है, इसलिए तुम्हें जल्दी से इसके लिए कुछ निवारक दवा खरीदनी चाहिए।” यह सुनकर कि यह बीमारी संक्रामक है, मैं बहुत चिंतित हो गई। मेरे परिवार के पास चालीस से ज्यादा वयस्क सुअर थे जो बाजार में बेचने के लिए लगभग तैयार थे। अगर उन सभी को बुखार आया और वे मर गए, तो क्या मेरे पिछले छह महीने का निवेश मेरे संभावित मुनाफे के साथ बर्बाद नहीं हो जाएगा? इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और यह उसे सौंप दिया। बाद में मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “मनुष्य का हृदय और आत्मा परमेश्वर की मुट्ठी में होते हैं और उसके जीवन की हर चीज परमेश्वर की दृष्टि में रहती है। चाहे तुम यह सब मानो या न मानो, एक-एक चीज चाहे वह सजीव हो या मृत, वह परमेश्वर के विचारों के अनुसार ही हटेगी, बदलेगी, नई बनेगी और अलोप होगी। परमेश्वर इसी तरह सभी चीजों पर संप्रभुता रखता है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है)। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गई कि सजीव और निर्जीव दोनों परमेश्वर के हाथों में हैं, ये सुअर संक्रमित होंगे या नहीं, यह भी परमेश्वर के हाथों में था। मैं बस एहतियात के तौर पर उन्हें कुछ दवा खिला सकती थी, उनका जीवन या मृत्यु परमेश्वर को ही तय करना था। परमेश्वर की संप्रभुता और आयोजनों के प्रति समर्पण करने को तैयार हो गई और मैंने फिर परमेश्वर से शिकायत नहीं की। बाद में सुअरों को चारा खिलाते समय मैंने निवारक दवा को उनके चारे में मिला दिया और कुछ दिन बाद दो बीमार सुअर ठीक हो गए, बाकी भी ठीक थे। दो महीने बाद भले ही दूसरे घरों के कई सुअर मर गए, मेरे सभी लगभग चालीस सुअर स्वस्थ थे और ऊँची कीमत पर बिके। इस बार मैंने सुअरों के बीमार होने पर परमेश्वर से शिकायत नहीं की, मैं बहुत खुश थी और उसकी सुरक्षा के लिए परमेश्वर की आभारी थी।
बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा और अभ्यास के लिए एक मार्ग पाया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “मनुष्य के कर्तव्य और उसे आशीष का प्राप्त होना या दुर्भाग्य सहना, इन दोनों के बीच कोई सह-संबंध नहीं है। कर्तव्य वह है, जो मनुष्य के लिए पूरा करना आवश्यक है; यह उसकी स्वर्ग द्वारा प्रेषित वृत्ति है, उसे प्रतिफल खोजे बिना, और बिना शर्तों या कारणों के इसे करना चाहिए। केवल इसे अपना कर्तव्य निभाना कहा जा सकता है। आशीष प्राप्त होना उन आशीषों को संदर्भित करता है जिनका कोई व्यक्ति तब आनंद लेता है जब उसे न्याय का अनुभव करने के बाद पूर्ण बनाया जाता है। दुर्भाग्य सहना उस सज़ा को संदर्भित करता है जो एक व्यक्ति को तब मिलती है जब ताड़ना और न्याय से गुजरने के बाद भी लोगों का स्वभाव नहीं बदलता—अर्थात जब उन्हें पूर्ण नहीं बनाया जाता। लेकिन इस बात पर ध्यान दिए बिना कि उन्हें आशीष प्राप्त होते हैं या दुर्भाग्य सहना पड़ता है, सृजित प्राणियों को अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए; वह करते हुए, जो उन्हें करना ही चाहिए, और वह करते हुए, जिसे करने में वे सक्षम हैं। यह न्यूनतम है, जो व्यक्ति को करना चाहिए, ऐसे व्यक्ति को, जो परमेश्वर की खोज करता है। तुम्हें अपना कर्तव्य केवल आशीष प्राप्त करने के लिए नहीं निभाना चाहिए, और तुम्हें दुर्भाग्य सहने के भय से अपना कर्तव्य निभाने से इनकार भी नहीं करना चाहिए” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर)। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गई कि आस्था में कर्तव्य निभाना मनुष्य के लिए स्वर्ग से मिला बुलावा है; यही वह है, जो हमें करना चाहिए और यह प्रतिफल पर निर्भर नहीं होना चाहिए। यही वह विवेक की भावना है जो एक व्यक्ति में होनी चाहिए। मुझे अपनी आस्था में परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। जब परमेश्वर ने मेरे परिवार को आशीष दी और उसकी रक्षा की, तो मैंने उसका धन्यवाद किया, लेकिन अगर घर पर चीजें गलत हुईं और दुर्भाग्य आया, तो मैंने परमेश्वर से शिकायत करना शुरू कर दिया। ऐसी आस्था परमेश्वर द्वारा स्वीकृत नहीं है। मैं एक सृजित प्राणी हूँ और मेरी नियति और संपत्ति परमेश्वर के हाथों में है। चाहे परमेश्वर दे या ले ले, मुझे परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना चाहिए और अपने कर्तव्य पूरे करने चाहिए। इन अनुभवों के माध्यम से मैंने शैतान की चालों का कुछ भेद पहचाना और अपनी आस्था के जरिए आशीष पाने के अपने इरादे के बारे में कुछ समझ हासिल की। परमेश्वर में आस्था के बारे में मेरा गलत दृष्टिकोण भी थोड़ा सुधर गया, और मैंने जाना कि परमेश्वर पर विश्वास करने में हमें परमेश्वर के प्रति समर्पण करना चाहिए, सत्य का अनुसरण करना चाहिए और स्वभावगत बदलाव खोजना चाहिए। मुझे जो समझ और लाभ मिले हैं, उनके लिए मैं परमेश्वर की बहुत आभारी हूँ!