14. अपने कर्तव्य को कैसे देखें

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "परमेश्वर में किसी मनुष्य के विश्वास की अत्यंत मूलभूत आवश्यकता यह है कि उसके पास एक सच्चा हृदय हो, और वह स्वयं को पूरी तरह से समर्पित कर दे, एवं सचमुच में आज्ञा का पालन करे। जो चीज़ किसी मनुष्य के लिए सबसे अधिक कठिन है वह है, सच्चे विश्वास के बदले में अपना संपूर्ण जीवन प्रदान करना, जिसके माध्यम से वह सारा सत्य अर्जित कर सकता है, और परमेश्वर के एक जीवधारी के रूप में अपने कर्तव्य को निभा सकता है। इसे ही उन लोगों के द्वारा अर्जित नहीं किया जा सकता है जो असफल होते हैं, और उनके द्वारा इसे अर्जित करना और भी ज़्यादा कठिन है जो मसीह को नहीं ढूंढ सकते हैं। क्योंकि मनुष्य परमेश्वर के प्रति स्वयं को पूरी रीति से समर्पित करने में अच्छा नहीं है; क्योंकि मनुष्य सृष्टिकर्ता के प्रति अपने कर्तव्य को निभाने के लिए तैयार नहीं है, क्योंकि मनुष्य ने सत्य को देखा तो है किन्तु उसे नज़रंदाज़ करता है और अपने स्वयं के पथ पर चलता है, क्योंकि मनुष्य हमेशा उन लोगों के पथ का अनुसरण करने की कोशिश करता है जो असफल हो चुके हैं, क्योंकि मनुष्य हमेशा स्वर्ग की अवहेलना करता है, इस प्रकार, मनुष्य हमेशा असफल हो जाता है, उसे हमेशा शैतान के छल द्वारा ठग लिया जाता है, और वह स्वयं के जाल में फंस जाता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है')। "कर्तव्य परमेश्वर द्वारा लोगों को सौंपे गए काम हैं; वे लोगों द्वारा पूरा करने के लिए विशेष कार्य हैं। लेकिन, एक कर्तव्य निश्चित रूप से तुम्हारा व्यक्तिगत व्यवसाय नहीं है, और न ही वह भीड़ में बेहतर दिखने का एक माध्यम है। कुछ लोग कर्तव्यों का उपयोग अपने प्रबंधन के लिए करते हैं; कुछ अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए करते हैं; कुछ अपने अंदर के खालीपन को भरने के लिए करते हैं; और कुछ भाग्य पर भरोसा करने वाली अपनी मानसिकता को संतुष्ट करने के लिए करते हैं यह सोचकर कि जब तक वे अपने कर्तव्यों को पूरा करते रहेंगे, तब तक परमेश्वर के घर में और परमेश्वर द्वारा मनुष्य के लिए व्यवस्थित अद्भुत गंतव्य में उनका भी एक हिस्सा होगा। कर्तव्य के बारे में इस तरह के दृष्टिकोण गलत हैं; वे परमेश्वर को घिनौने लगते हैं और उन्हें तत्काल दूर किया जाना चाहिए।" इसे पढ़ने के बाद, मैं अपने अनुभव पर संगति करना चाहूँगा।

2017 में, कलीसिया में मेरा काम लिखने का था। बाद में कलीसिया के अगुआ ने मेरे साथ भाई लिन के काम करने की व्यवस्था की और मुझसे कहा कि मैं उसकी पूरी मदद करूँ। मैंने खुशी से यह सोचते हुए हाँ कर दी, "मैंने सुना है कि भाई लिन को लेख लिखना बहुत पसंद है और वह इस काम में बहुत अच्छा है। अगर वह सिद्धांतों को जल्दी समझ जाए, तो हमारी टीम के काम में हमें ज़्यादा से ज़्यादा सफलता मिलेगी। अगुआ को लगेगा कि मैं योग्य हूँ और वह मेरी बड़ी कद्र करेंगे, इसलिए मुझे जितना हो सके उसकी मदद करनी चाहिए।" मैंने भाई लिन को पढ़ने के लिए सभी संबंधित सिद्धांत और सामग्री दे दी जो मैंने इकट्ठा की थी, ताकि वह सारी ज़रूरी बातें जल्द से जल्द समझ ले। जब भी उसे काम में कोई अड़चन आती, तो मैं उसे कुछ उदाहरण और संदर्भ बिंदु देते हुए उसके विचारों का विश्लेषण करने में मदद करता। कुछ समय बाद, वह कुछ सिद्धांतों को समझ गया और उसके द्वारा इकट्ठा किये गए लेख स्पष्ट और व्यवहारिक थे। उसे जल्दी तरक्की करते देख मैं बहुत खुश था। उसने इतनी जल्दी बातें समझ लीं तो मुझे लगा कि वह सच में काबिल है! हमारी टीम और अधिक कुशल हो गई और मेरा काम काफी कम हो गया। मुझे समझ आ गया कि भाई लिन को थोड़ा और प्रशिक्षण देने के बाद हमारे काम में और भी बेहतर नतीजे मिलेंगे।

एक दिन, अगुआ ने कहा कि एक कलीसिया को किसी ऐसे की बड़ी ज़रूरत है जो लेखों को इकट्ठा कर सके, और भाई लिन इसमें अच्छा है और ज़िम्मेदार भी है, तो उसे उस कलीसिया में लेखन कार्य को देखने के लिए भेज दिया जाएगा। मैं यह सुनकर चौक गया और सोचने लगा, "क्या? आप उसका ट्रांसफर कर रहे हैं? आप ऐसा नहीं कर सकते। मैंने उसे काम और सिद्धांत समझाने में इतनी मेहनत की है, उसने टीम में कुछ अच्छे आसार दिखाने शुरू ही किए हैं। अगर अभी उसका ट्रांसफर हो गया, तो हमारा काम ज़रूर बाधित होगा। फिर लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे? वे कहेंगे मैं योग्य नहीं हूँ।" इस बारे में मैं जितना सोचता उतना परेशान होता। अगुआ ने कहा कि भाई लिन के जाने के बाद मैं किसी और को प्रशिक्षित कर सकता हूँ। मैंने एक शब्द भी नहीं कहा, लेकिन मैं इसके विरोध में था। मैंने सोचा, "आप तो ऐसे कह रहे हैं जैसे यह छोटी बात है। क्या आपको लगता है कि प्रशिक्षण देना आसान है? इसमें बहुत समय और मेहनत लगती है! इसके अलावा, भाई लिन के जाने के बाद सारी ज़िम्मेदारी फिर से मुझ पर आ पड़ेगी। वैसे ही इतनी व्यस्तता है, एक आदमी के कम हो जाने से हमारे काम को ज़रूर नुकसान होगा।" इस बारे में मैं जितना सोचता उतना इसका विरोधी होता जाता। दो दिन बाद अगुआ ने मुझे भाई लिन का मूल्यांकन देने के लिए कहा। मैंने सोचा, "मैं उसकी अच्छी बातों पर नहीं बल्कि उसकी कमजोरियों और भ्रष्टता पर ज़ोर डालूंगा। शायद तब अगुआ उसे कहीं और नहीं भेजेंगे।" मूल्यांकन लिखने के बाद मैं थोड़ा दोषी महसूस कर रहा था, और सोच रहा था कि कहीं मैं बेईमानी तो नहीं कर रहा। लेकिन फिर मैंने सोचा कि मैं बस टीम के काम का ख्याल कर रहा हूँ। मैंने अपना मूल्यांकन अगुआ को सौंप दिया। कुछ दिनों बाद भी अगुआ का कोई जवाब नहीं आया, तो मैं परेशान होकर सोचने लगा, "कहीं ऐसा तो नहीं कि उन्होंने वह देखा ही नहीं और अभी भी भाई लिन को भेजने वाले हैं? नहीं, मैं ढीला नहीं पड़ सकता। उसे रखने का कोई और तरीका सोचना होगा।" मैंने टोह लेने की कोशिश करते हुए भाई लिन से पूछा, "किसी दूसरी कलीसिया में लेखन कार्य की ज़िम्मेदारी लेने के बारे में आप क्या सोचते हैं?" बिना एक पल गंवाए उसने कहा, "मैं कलीसिया की व्यवस्थाओं को समर्पित हूँ। मैं जाने को तैयार हूँ।" मैंने फौरन जवाब दिया, "लेखन कार्य की ज़िम्मेदारी में सिद्धांतों को समझना और योग्य होना ज़रूरी है। बिना उसके काम में प्रगति नहीं हो पाएगी। मुझे लगता है कि आपके लिए काम यहीं जारी रखना बेहतर होगा।" मुझे ताज्जुब हुआ कि भाई लिन पर इसका कोई असर नहीं हुआ, उसने विश्वास के साथ कहा, "अगर मौका आया तो मैं परमेश्वर पर विश्वास करके जाने को तैयार हूँ।" अपना मकसद पूरा न होने से मुझे निराशा हुई और मैं उससे थोड़ा परेशान हो गया। एक बार मैंने देखा कि जिस लेख पर उसने काम किया था उसमें कुछ समस्याएं थीं, इस पर मैं अपना गुस्सा नहीं रोक पाया और उसे काफी कुछ सुना दिया। इस दौरान, जब भाई लिन के दूसरी जगह जाने की बात सोचता तो मैं बहुत घबरा जाता था। मुझे काम में शांति नहीं मिल रही थी और मैं अपनी सोच पर काबू नहीं रख पा रहा था। काम के मसलों पर भी मेरे पास अंतर्दृष्टि नहीं थी। मैं निरंतर धुंध में जी रहा था। मैं बहुत परेशान था। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना कर निवेदन किया कि वह मेरा मार्गदर्शन करे जिससे मैं खुद को जान सकूं।

फिर मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : "अक्सर लोग सत्य को अभ्यास में नहीं लाते हैं, वे अक्सर सत्य से मुंह मोड़ लेते हैं, और वे अक्सर अपने गौरव, अपनी प्रतिष्ठा, अपने ओहदे और अपने स्वार्थ की रक्षा करते हुए एक स्वार्थी और अधम, भ्रष्ट शैतानी स्वभाव के भीतर रहते हैं। उन्होंने सत्य हासिल नहीं किया है। इस कारण से, तुम अत्यंत परेशान होते हो, ज़रूरत से ज़्यादा तनावग्रस्त रहते हो, और आवश्यकता से अधिक बंधे हुए हो" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन में प्रवेश दायित्‍वों के निर्वाह से प्रारंभ होना चाहिए')। "वह मानक क्या है जिसके द्वारा किसी व्यक्ति के कर्मों का मूल्यांकन अच्छे या बुरे के रूप में किया जाता है? यह इस बात पर निर्भर करता है कि अपने विचारों, अभिव्यक्तियों और कार्यों में तू सत्य को व्यवहार में लाने और सत्य की वास्तविकता को जीने की गवाही धारण करता है या नहीं। यदि तेरे पास यह वास्तविकता नहीं है या तू इसे नहीं जीता है, तो तू बिना किसी शक के एक कुकर्मी है। परमेश्वर कुकर्मियों को किस नज़र से देखता है? तुम्हारे विचार और बाहरी कर्म परमेश्वर की गवाही नहीं देते, न ही वे शैतान को शर्मिंदा करते या उसे हरा पाते हैं; इसके बजाय, वे परमेश्वर को शर्मिंदा करते हैं और ऐसे निशानों से भरे पड़े हैं जिनसे परमेश्वर शर्मिंदा होता है। तुम परमेश्वर की गवाही नहीं देते हो, न ही तुम परमेश्वर के लिये अपने आपको खपाते हो, तुम परमेश्वर के प्रति अपनी जिम्मेदारियों और दायित्वों को भी पूरा नहीं करते; इसके बजाय तुम अपने फ़ायदे के लिये काम करते हो। 'अपने फ़ायदे के लिये' का क्या आशय है? शैतान के लिये काम करना। इसलिये, अंत में परमेश्वर यही कहेंगे, 'हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ।' परमेश्वर की नज़रों में, तुमने अच्छे कर्म नहीं किये हैं; इसके बजाय, तुम्हारा व्यवहार दुष्टों वाला हो गया है। तुम्हें पुरस्कार नहीं दिया जाएगा; परमेश्वर तुम्हें स्मरण नहीं रखेगा। क्या यह पूरी तरह से व्यर्थ नहीं है?" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'तू अपने सच्चे हृदय को परमेश्वर की ओर मोड़ने के बाद सच्चाई को प्राप्त कर सकता है')। परमेश्वर के वचनों पर विचार करते हुए मुझे एहसास हुआ कि लोग अच्छे काम कर रहे हैं या बुरे, इसका निर्णय परमेश्वर इससे नहीं करता कि वे ऊपर-ऊपर से खुद को कितना खपाते हैं, कितना दर्द सहते हैं या कितनी कीमत चुकाते हैं, बल्कि इससे करता है कि लोगों के इरादे क्या हैं और उनके काम परमेश्वर के लिए हैं या उनके स्वयं के लिए, और इससे कि वे सत्य का अभ्यास करते हैं या नहीं। उस दौरान की अपनी अवस्था पर मैंने विचार किया और देखा कि मेरा भाई लिन को सिद्धांत समझने में मदद करना, कलीसिया के काम के लिए नहीं था। मैं बस टीम की दक्षता सुधारना चाहता था ताकि मैं अच्छा दिख सकूँ। जब मैंने देखा कि उसे कहीं और भेजा जा रहा है, तो मुझे लगा कि इससे टीम का काम रुकेगा और मेरे नाम और हैसियत को नुकसान होगा, इसलिए मूल्यांकन लिखते समय मैंने जानबूझकर उसकी गलतियां गिनाकर अगुआ को गुमराह करने की कोशिश की। काम को लेकर उसके उत्साह को कम दिखाने के लिए मैंने कुछ नकारात्मक बातें भी कहीं। यह सत्य का अभ्यास करना और कर्तव्य निभाना कैसे हुआ? मैं स्वार्थ के साथ अपना कर्तव्य कर रहा था और मुझे कलीसिया के संपूर्ण काम की नहीं, बस उस काम की चिंता थी जिसके लिए मैं ज़िम्मेदार था। मुझे मेरी प्रतिष्ठा और हैसियत को होने वाले नुकसान की परवाह थी। मैं धोखेबाज़ भी था और मैंने अगुआ द्वारा व्यवस्थित किए गए कलीसिया के काम में रुकावट डाली थी। परमेश्वर के घर के काम में बाधा डालने वाला मैं ही था जो दुष्टता और परमेश्वर का विरोध कर रहा था! जब मैंने अपनी खतरनाक अवस्था को देखा तो मैंने परमेश्वर से यह प्रार्थना की, "हे परमेश्वर, मैं स्वार्थी और घृणा योग्य हूँ। अपने हित के लिए मैंने परमेश्वर के घर के काम में रुकावट डाली है। परमेश्वर, मैं पश्चाताप करना चाहता हूँ।"

फिर मैंने परमेश्वर के वचनों में यह पढ़ा : "हमेशा अपने स्वयं के वास्ते कार्यों को मत कर, हमेशा अपने हितों की मत सोच, और अपनी स्वयं की हैसियत, चेहरे या प्रतिष्ठा पर विचार मत कर। लोगों के हितों के प्रति मत सोच। तुझे सबसे पहले परमेश्वर के घर के हितों पर विचार अवश्य करना चाहिए और उसे अपनी पहली प्राथमिकता बनाना चाहिए; तुझे परमेश्वर की इच्छा के बारे में मननशील होना चाहिए, इस पर चिंतन करने के द्वारा आरंभ कर कि तू अपने कर्तव्य को पूरा करने में अशुद्ध रहा है या नहीं, तूने वफादार होने में, अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करने में, अपना अधिकतम किया और अपना सर्वस्व दिया है या नहीं, तूने अपने कर्तव्य, और परमेश्वर के घर के कार्य के प्रति पूरे दिल से विचार किया है या नहीं। तुझे इन चीज़ों के बारे में विचार करने की आवश्यकता है। इन चीज़ों पर बार-बार विचार कर, और तेरे पास अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाने का एक आसान समय होगा" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'तू अपने सच्चे हृदय को परमेश्वर की ओर मोड़ने के बाद सच्चाई को प्राप्त कर सकता है')। मैंने परमेश्वर के वचनों में अभ्यास का पथ पाया। मुझे कर्तव्य में अपने इरादों को सुधारना है, परमेश्वर की जांच को स्वीकारना है, निजी हितों को छोड़कर परमेश्वर के घर के काम की मर्यादा रखनी है। भाई लिन की क्षमता अच्छी थी और समस्याओं को सामने पाकर वह सत्य खोजता था, तो अगर वह दूसरी कलीसिया में काम करेगा, तो इससे परमेश्वर के घर के काम को लाभ होगा। इस तरह वह ज़्यादा अभ्यास भी पा सकेगा, इसलिए मुझे उसका सहयोग करना चाहिए। फिर मैंने अगुआ को ढूंढा और उसे अपने स्वार्थी और धूर्त इरादे बता दिए और उसे भाई लिन का निष्पक्ष मूल्यांकन दे दिया। उसे दूसरी कलीसिया में भेज दिया गया, आखिरकार मुझे भी कुछ शांति का अनुभव हुआ।

उस समय, मुझे लगा था कि मैं थोड़ा बदल गया हूँ। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि दोबारा वैसी ही परिस्थिति में, मेरी स्वार्थी और घिनौनी शैतानी प्रकृति फिर सामने आएगी।

2018 की सर्दी में, भाई चेन और मैं, दोनों टीम लीडर के तौर पर साथ काम कर रहे थे। हम एक दूसरे की कमियों को पूरा करते थे, परमेश्वर के मार्गदर्शन से, हमारे काम में निरंतर बेहतर नतीजे मिल रहे थे। मुझे भाई चेन के साथ काम करना वाकई अच्छा लगता था। एक बार सभा के बाद, अगुआ ने मुझसे कहा कि दूसरी टीम को मदद की ज़रूरत है और शायद भाई चेन को वहाँ भेजा जाए। मुझे लगा कि भाई चेन की क्षमता अच्छी थी, वह सत्य जल्दी समझ जाता था और अपने कर्तव्य में ज़िम्मेदार था, इसलिए वह हमारी टीम का काम आगे बढ़ाने में बहुत मददगार था। अगर वह चला गया तो हमारा काम प्रभावित होगा, फिर अगुआ मेरे बारे में क्या सोचेंगे? क्या वे सोचेंगे कि मैं अपने काम में नकारा हूँ? मैं भाई चेन को जाने नहीं देना चाहता था, लेकिन कलीसिया के काम को देखते हुए मुझे सहमत होना पड़ा। मुझे बड़ी हैरानी हुई जब अगुआ ने मुझे बताया कि कलीसिया में एक और ज़रूरी काम था जिसके लिए वे चाहते थे कि बहन लू और टीम का एक अन्य सदस्य मदद के लिए जाएं। यह सुनकर मेरा कलेजा मुँह को आ गया। मैंने सोचा, "आप बहन लू को ले जा रहे हैं? पहले भाई चेन को हटा दिया, अब बहन लू भी जा रही हैं। हमारी टीम के दो मुख्य लोग चले जाएंगे, तो हमारे काम पर ज़रूर असर पड़ेगा। बिल्कुल नहीं! मैं आपको बहन लू को ले जाने नहीं दे सकता।" लेकिन फिर मुझे ख्याल आया, "अगर मैंने सीधे नकार दिया, तो क्या वे मुझे स्वार्थी नहीं कहेंगे?" फिर मैंने एक दूसरी बहन का नाम सुझाया जो उतनी काबिल नहीं थी। सोच-विचार करने के बाद भी अगुवा को लगा कि बहन लू ही बेहतर रहेंगी, और उन्होंने मुझसे बहन के साथ कर्तव्य के इस बदलाव के बारे में संगति करने को कहा। मैंने हाँ तो कर दी, पर दिल से मैं इसके बिलकुल खिलाफ था। उसके बाद मैंने दूसरे भाई से अगुआ के बारे में यह शिकायत की कि उन्हें मेरी परेशानियों की कोई परवाह नहीं थी, अचानक उन्होंने दो मुख्य लोगों को ट्रांसफर कर दिया। टीम लीडर के तौर पर मैं अपना काम करूँ भी तो कैसे? मैं बोलता ही जा रहा था कि अचानक मुझे एहसास हुआ कि मैं गलत हूँ। क्या अपनी शिकायतें सुना कर मैं इस भाई को अपने पक्ष में करने की कोशिश नहीं कर रहा हूँ? परमेश्वर के लिए यह अपमानजनक है। जितना मैं इस बारे में सोचता मुझे उतना ही बुरा लगता। मैं फौरन परमेश्वर से प्रार्थना करने गया और खुद पर विचार किया। प्रार्थना करने के बाद मैंने सोचा, जब भी मेरे दायरे में आने वाले किसी व्यक्ति को दूसरी जगह भेजा जाता है, तो क्यों मैं पूरा जोर लगाकर उसे रोकने में लग जाता हूँ? इस तरह के आचरण के पीछे असली प्रकृति क्या है?

मैंने परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा : "कर्तव्य परमेश्वर द्वारा लोगों को सौंपे गए काम हैं; वे लोगों द्वारा पूरा करने के लिए विशेष कार्य हैं। लेकिन, एक कर्तव्य निश्चित रूप से तुम्हारा व्यक्तिगत व्यवसाय नहीं है, और न ही वह भीड़ में बेहतर दिखने का एक माध्यम है। कुछ लोग कर्तव्यों का उपयोग अपने प्रबंधन के लिए करते हैं; कुछ अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए करते हैं। ... कर्तव्य के बारे में इस तरह के दृष्टिकोण गलत हैं; वे परमेश्वर को घिनौने लगते हैं और उन्हें तत्काल दूर किया जाना चाहिए।" "आज के कार्य के सन्दर्भ में, लोग अभी भी उसी प्रकार की चीज़ों को करेंगे जैसे कि 'मन्दिर परमेश्वर से बड़ा है।' उदाहरण के लिए, लोग अपने कर्तव्यों के निर्वहन को अपनी नौकरी के रूप मे देखते हैं; वे परमेश्वर के लिए गवाही देने और बड़े लाल अजगर से युद्ध करने को, प्रजातंत्र और स्वतन्त्रता के लिए, मानवाधिकारों के बचाव में एक राजनैतिक आन्दोलन के रूप में देखते हैं; वे अपने कर्तव्य को जीवनवृत्तियों के लिए अपने कौशलों का उपयोग करने की ओर मोड़ देते हैं, बल्कि वे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने को और कुछ नहीं बल्कि धार्मिक सिद्धांत के पालन के एक अंश के रूप में लेते हैं; इत्यादि। क्या मनुष्यों की ये अभिव्यक्तियाँ आवश्यक रूप से वैसी ही नहीं हैं जैसे कि 'मन्दिर परमेश्वर से बढ़कर है'? सिवाय इसके कि दो हज़ार वर्ष पहले, लोग भौतिक मन्दिर में अपने व्यक्तिगत व्यवसाय को कर रहे थे, बल्कि आज, लोग अमूर्त मन्दिरों में अपने व्यक्तिगत व्यवसाय करते हैं। जो लोग नियमों को बहुमूल्य समझते हैं वे नियमों को परमेश्वर से बढ़कर देखते हैं, जो लोग हैसियत से प्रेम करते हैं वे हैसियत को परमेश्वर से बढ़कर मानते हैं, जो लोग अपनी जीवनवृत्ति से प्रेम करते हैं वे जीवनवृत्ति को परमेश्वर से बढ़कर मानते हैं, इत्यादि—उनकी सभी अभिव्यक्तियाँ मुझे यह कहने की ओर ले जाती हैं: 'लोग अपने वचनों से परमेश्वर की सबसे बड़े के रूप में स्तुति करते हैं, किन्तु उनकी नज़रों में हर चीज़ परमेश्वर से बढ़कर है।' ऐसा इसलिए है क्योंकि जैसे ही लोगों को परमेश्वर का अनुसरण करने के अपने मार्ग के साथ-साथ अपनी प्रतिभाओं को प्रदर्शित करने, या अपने व्यवसाय या अपनी स्वयं की जीवनवृत्ति के प्रदर्शन का अवसर मिलता है, तो वे अपने आप को परमेश्वर से दूर कर देते हैं और अपने आप को उन जीवनवृत्तियों में झोंक देते हैं जिनसे वे प्रेम करते हैं। जहाँ तक जो कुछ परमेश्वर ने उन्हें सौंपा है उसका, और उसकी इच्छा का संबंध है, उन चीज़ों को बहुत पहले ही फेंक दिया गया है। इस परिदृश्य में, इन लोगों के बारे में और जो लोग दो हज़ार वर्ष पहले मन्दिर में अपना स्वयं का व्यवसाय कर रहे थे उनके बारे में क्या अन्तर है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III')।

परमेश्वर के वचनों पर विचार कर मुझे अपने कार्यों के सार पर अधिक स्पष्टता मिली। जब भी मेरी टीम से अगुआ किसी को ट्रांसफर करते थे तो मैं विरोधी बनकर रास्ते में खड़ा हो जाता था, खासकर इसलिए क्योंकि मैं अपने कर्तव्य को अपने निजी उपक्रम के रूप में देखता था। मैं उन भाई-बहनों को अपने द्वारा प्रशिक्षित लोग मानता था, इसलिए उन्हें मेरे दायरे में काम करना चाहिए और मेरी टीम के काम को आगे बढ़ाना चाहिए, उन्हें कहीं और नहीं भेजा जाना चाहिए। मेरी सोच बहुत ही बेतुकी और वाहियात थी। भाई-बहनों की क्षमता और सामर्थ्य परमेश्वर द्वारा उसके कार्य के लिए पूर्व निर्धारित थी। उन्हें परमेश्वर के घर में जहाँ भी ज़रूरत हो वहाँ रखा जाना चाहिए। यह तो स्पष्ट है। लेकिन मैं उन्हें अपने नियंत्रण में रखना चाहता था, उनके साथ ऐसा व्यवहार करता था जैसे वे मेरे लिए सेवा और श्रम करने वाले साधन हों। जो भी किसी को ट्रांसफर करना चाहता था मैं उसका विरोधी था, मैंने पीठ पीछे आलोचना की और गुटबाजी करने की कोशिश भी की। मैं उन फरिसियों से अलग कैसे हूँ जिन्होंने प्रभु यीशु का विरोध किया था? फरीसी मंदिर को अपना प्रभाव क्षेत्र मानते थे और वे विश्वासियों को उसे छोड़कर प्रभु यीशु का अनुसरण करने नहीं देते थे। विश्वासियों पर उनका काबू बना रहे इसके लिए उन्होंने जो हो सके वह किया ताकि उनकी हैसियत और कमाई बची रहे, और बेशर्मी से दावा किया कि विश्वासी उनके हैं। जहाँ तक मेरी बात है, मैंने भाई-बहनों को अपने नियंत्रण में रखा और नहीं चाहा कि परमेश्वर का घर उन्हें कहीं और भेजें। क्या मैं अपने प्रभाव का इस्तेमाल परमेश्वर का विरोध करने के लिए नहीं कर रहा था? परमेश्वर का विरोध कर मैं मसीह विरोधी के रास्ते पर चल पड़ा और उसके स्वभाव का अपमान किया। इस विचार ने मुझे डरा दिया, और मैं अपने स्वार्थी घिनौने शैतानी स्वभाव से नफरत करने लगा। पश्चाताप से भरकर मैं परमेश्वर से प्रार्थना करने दौड़ा। बहन लू से उसके ट्रांसफर के बारे में बात करने के बाद, मैंने जिस भाई को धोखा दिया था उससे बात की। मैंने जो कहा था उसकी प्रकृति और नतीजों पर संगति की और उसका विश्लेषण किया ताकि उसे कुछ विवेक मिल सके। आखिरकार मुझे कुछ शांति मिली।

बहन लू और भाई चेन के ट्रांसफर के बाद हमारी टीम में बहन ली आयीं। उनकी क्षमता अच्छी थी और वह चीजों को जल्दी समझ लेती थीं। टीम के काम में कोई देरी नहीं हुई। मैंने सच में अनुभव किया कि अपने मतलब के लिए नहीं बल्कि परमेश्वर के घर के फ़ायदे के लिए कर्तव्य निभाना, परमेश्वर की आशीषों को देखने का असल तरीका है। परमेश्वर काम के लिए सही लोगों की व्यवस्था करेगा। वह अपने काम को बनाए रखेगा। इसके तीन महीने बाद, एक दिन जब बहन लिन एक सभा से वापस आयीं, उन्होंने मुझे बताया कि पास की एक कलीसिया सुसमाचार का अच्छा कार्य कर रही है और वहाँ नवागंतुकों की सिंचाई के लिए लोगों की ज़रूरत है। अगुआ ने सुझाव दिया कि बहन ली सिंचाई की ज़िम्मेदारी लें। मैं फिर से थोड़ा चिढ़ गया, लेकिन तुरंत मुझे लगा कि मेरी सोच गलत है। मुझे पहले के समय का ख्याल आया जब मैंने अपने नाम और हैसियत के लिए परमेश्वर के घर के हितों को नजरअंदाज किया था। मुझे बहुत बुरा लगा और गलती का एहसास हुआ, और परमेश्वर के ये वचन मेरे मन में आए : "एक कर्तव्य तुम्हारा निजी मामला नहीं है, और इसे पूरा करके तुम अपने लिए कुछ नहीं कर रहे हो या अपना निजी व्यवसाय नहीं संभाल रहे हो। परमेश्वर के घर में, तुम चाहे जो भी करते हो, वह तुम्हारा अपना निजी उद्यम नहीं है; यह परमेश्वर के घर का काम है, यह परमेश्वर का काम है। तुम्हें इस ज्ञान को लगातार ध्यान में रखना होगा और कहना होगा, 'यह मेरा अपना मामला नहीं है; मैं अपना कर्तव्य निभा रहा हूँ और अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर रहा हूँ। मैं परमेश्वर के घर का काम कर रहा हूँ। यह काम मुझे परमेश्वर ने सौंपा है और मैं इसे उसके लिए कर रहा हूँ। यह मेरा अपना निजी मामला नहीं है।' अगर तुम्हें लगता है कि यह तुम्हारा निजी मामला है, और तुम इसे अपने इरादों, सिद्धांतों और उद्देश्यों के अनुसार करोगे, तो तुम मुसीबत में पड़ने वाले हो।" परमेश्वर के वचनों ने और भी स्पष्ट कर दिया कि मेरा कर्तव्य मेरे लिए परमेश्वर का आदेश है, मेरा निजी उपक्रम नहीं। अपने निजी हितों को संतुष्ट करने के लिए मैं अपनी मनमर्जी नहीं चला सकता। मुझे परमेश्वर के घर के हितों की, सत्य खोजने और परमेश्वर की अपेक्षानुसार कार्य करने की परवाह करनी चाहिए। एक सृजित प्राणी को अपने कर्तव्य में यही रवैया और सूझ-बूझ रखनी चाहिए। मैं हमेशा अपने हितों की सोचा करता था, और मैंने ऐसी बहुत-सी चीज़ें की थीं जो परमेश्वर का विरोध करती हैं और उसके घर के हितों को नुकसान पहुंचाती हैं। मैं जान गया था कि अब मैं वैसे नहीं जी सकता। मुझे अपनी स्वार्थी इच्छाएं छोड़नी होंगी और सत्य का अभ्यास करना होगा। इस क्षण मुझे चिंता मुक्त होने का एहसास हुआ। मैंने बहन लिन से कहा, "अगुआ ने परमेश्वर के घर के काम में मदद के लिए यह व्यवस्था की है। हमें फौरन बहन ली से काम के इस बदलाव के बारे में बात करनी चाहिए। हम परमेश्वर के घर के काम को प्रभावित होने नहीं दे सकते।"

कर्तव्य में अपने हितों को छोड़ना, परमेश्वर के घर के कार्य की सोचना, अपनी जगह पहचानना और ज़मीर और विवेक रखना सीखना, सब कुछ परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना का अनुभव करने से आता है।

पिछला: 13. अपने कर्तव्य को किस नजरिये से देखना चाहिए

अगला: 15. परमेश्वर के वचनों से मैंने ख़ुद को जाना है

दुनिया आपदा से घिर गई है। यह हमें क्या चेतावनी देती है? आपदाओं के बीच हम परमेश्वर द्वारा कैसे सुरक्षित किये जा सकते हैं? इसके बारे में ज़्यादा जानने के लिए हमारे साथ हमारी ऑनलाइन मीटिंग में जुड़ें।
WhatsApp पर हमसे संपर्क करें
Messenger पर हमसे संपर्क करें

संबंधित सामग्री

91. "अच्छा" बने रहने को अलविदा

लिन फ़ान, स्पेनमेरा बचपन अपनी सौतेली माँ की चीख़-चिल्लाहट और गालियाँ सुनने में ही बीता है। जब थोड़ी समझदार हुई, तो अपनी माँ और आस-पास के दूसरे...

9. हृदय की मुक्ति

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "इस युग के दौरान परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य मुख्य रूप से मनुष्य के जीवन के लिए वचनों का प्रावधान करना,...

वचन देह में प्रकट होता है अंत के दिनों के मसीह के कथन (संकलन) अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ जीवन में प्रवेश पर उपदेश और वार्तालाप अंत के दिनों के मसीह के लिए गवाहियाँ परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें) परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर (संकलन) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ (खंड I) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग्स

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें