27. अपने कर्तव्य को किस नजरिये से देखना चाहिए

"मनुष्य के कर्तव्य और वह धन्य है या शापित, इनके बीच कोई सह-संबंध नहीं है। कर्तव्य वह है, जो मनुष्य के लिए पूरा करना आवश्यक है; यह उसकी स्वर्ग द्वारा प्रेषित वृत्ति है, जो प्रतिफल, स्थितियों या कारणों पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। केवल तभी कहा जा सकता है कि वह अपना कर्तव्य पूरा कर रहा है। धन्य होना उसे कहते हैं, जब कोई पूर्ण बनाया जाता है और न्याय का अनुभव करने के बाद वह परमेश्वर के आशीषों का आनंद लेता है। शापित होना उसे कहते हैं, जब ताड़ना और न्याय का अनुभव करने के बाद भी लोगों का स्वभाव नहीं बदलता, ऐसा तब होता है जब उन्हें पूर्ण बनाए जाने का अनुभव नहीं होता, बल्कि उन्हें दंडित किया जाता है। लेकिन इस बात पर ध्यान दिए बिना कि उन्हें धन्य किया जाता है या शापित, सृजित प्राणियों को अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए; वह करते हुए, जो उन्हें करना ही चाहिए, और वह करते हुए, जिसे करने में वे सक्षम हैं। यह न्यूनतम है, जो व्यक्ति को करना चाहिए, ऐसे व्यक्ति को, जो परमेश्वर की खोज करता है। तुम्हें अपना कर्तव्य केवल धन्य होने के लिए नहीं करना चाहिए, और तुम्हें शापित होने के भय से अपना कार्य करने से इनकार भी नहीं करना चाहिए। मैं तुम लोगों को यह बात बता दूँ : मनुष्य द्वारा अपने कर्तव्य का निर्वाह ऐसी चीज़ है, जो उसे करनी ही चाहिए, और यदि वह अपना कर्तव्य करने में अक्षम है, तो ऐसा उसकी विद्रोहशीलता के कारण है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर')। मैं परमेश्वर के वचनों से जुड़े अपने अनुभव के बारे में बताना चाहता हूँ।

विश्वासी बनने के कुछ ही समय बाद, मैंने अगुआ के रूप में कार्यरत भाई-बहनों को अक्सर सभा और सत्य के बारे में सहभागिता करते हुए देखा, और कुछ के कर्तव्य ऐसे थे जिनके लिए हुनर की ज़रूरत थी, जैसे कि वीडियो बनाना, या नाचना-गाना। मैं उन्हें बहुत सराहता था, मेरे लिए यह आदर योग्य काम था। जो लोग आतिथ्य या कलीसिया के मामले संभालने का काम करते थे, उनके कर्तव्य कुछ खास नहीं थे। उनमें कोई हुनर नहीं था, इसलिए वे कभी नाम नहीं कमा सकते थे। मैंने सोचा कि भविष्य में मुझे ऐसा काम मिले जिससे मैं अच्छा दिखूँ। दो साल बाद मुझे लिखने का काम सौंपा गया। मैं बेहद खुश था, खास तौर से जब हर बार मैं लिखने के काम पर मार्गदर्शन करने कलीसिया जाता, तो सभी भाई-बहन मुझसे बड़े स्नेह से मिलते और मेरी ओर प्रशंसा की नज़र से देखते। मैं खुद से वाकई बहुत खुश था, और मुझे लगा कि मेरा काम मुझे दूसरों की अपेक्षा ज़्यादा प्रशंसा दिलाता है। सन् 2018 में, मुझे अपना कर्तव्य करने एक दूसरे क्षेत्र में भेजा गया। वहां रहते हुए, एक बार जब एक भाई को पता चला कि मेरा काम क्या है, तो वह इस बारे में मुझसे बातचीत करने लगा। मेरे प्रति उसका आदर-भाव देख कर मुझे वाकई बहुत खुशी हुई, और मुझे लगा कि यह काम करना बड़े सम्मान की बात है।

उस दौरान मैं निरंतर आत्मतुष्टि और आत्मा-प्रशंसा की अवस्था में था। मैं अपने काम में नाम और लाभ पाने की होड़ में था और काम को गंभीरता से नहीं ले रहा था। कुछ महीनों बाद मुझे काम से निकाल दिया गया क्योंकि मैं कुछ भी हासिल नहीं कर पा रहा था। इससे मैं बहुत परेशान और थोड़ा नकारात्मक हो गया, तो अगुआ ने परमेश्वर की इच्छा के बारे में मेरे साथ सहभागिता की और कहा, "परमेश्वर के घर को हमारी फिल्मों के लिए मंचकर्मियों का काम करने वालों की ज़रूरत है। आप वो कर सकते हैं। आप चाहे जो कर्तव्य निभाएँ, उसमें आपको सत्य का अनुसरण करना होगा और अपना काम पूरी लगन से करना होगा।" मुझे कुछ मालूम नहीं था कि उस काम में क्या करना था, लेकिन मैं इतना समझ गया कि मुझे समर्पण करना है, क्योंकि अगुआ ने इस काम की व्यवस्था की है। कुछ समय तक मंचकर्मी रहने के बाद मैंने जाना कि यह ज़्यादातर कड़ी शारीरिक मेहनत का काम था, जिसमें मंच के सभी सामानों को यहाँ-वहां ले जाना था। इसमें किसी हुनर की ज़रूरत नहीं थी। बस बहुत भागदौड़ थी और फुटकर काम थे। मैंने सोचा, "पहले, लिखने के काम में मुझे दिमाग लगाना पड़ता था। इसमें प्रतिष्ठा थी और इसे आदर से देखा जाता था। सेट की इन सब चीज़ों को यहाँ-वहां लाना-ले जाना बस शारीरिक मेहनत है। यह गंदा और थकाने वाला है। क्या भाई-बहन मुझे नीची नज़र से देखेंगे?" इस ख़याल से मेरा दिल बैठ गया और मेरे मन में इस कर्तव्य के प्रति थोड़ा विरोध पैदा हो गया। उसके बाद से, मैं अनमने ढंग से काम करने लगा और मौका मिलने पर कामचोरी करता था। कभी-कभी जब हमारे पास कोई सामान नहीं होता और हमें किसी भाई-बहन से लेना होता, तो मैं माँगने के लिए किसी दूसरे को भेज देता, इस डर से कि अगर मैं यह काम करूं, तो मुझे जानने वाले भाई-बहनों को पता चल जाएगा कि मुझे पिछले काम से निकाल दिया गया है, और अब मैं सेट का घटिया काम कर रहा हूँ। तब वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे? मैं इससे जुड़े कौशल पर भी इस डर से मेहनत नहीं करना चाहता था, कि अगर मैंने ज़्यादा सीख लिया तो मैं हमेशा यही काम करता रहूँगा, और मेरा भीड़ से अलग दिखने का दिन कभी नहीं आयेगा। कभी-कभार जब हम सेट पर होते, तो निर्देशक मुझसे मंच के सामान को ख़ास तरीके से रखने को कहते। इससे मुझे हमेशा तकलीफ होती, मानो यह मेरे लिए शर्मिंदगी हो। मैं सोचता कि किस प्रकार पहले मेरे लेखन के काम में, दूसरे मेरा आदर करते और मेरे मार्गदर्शन पर चलते थे, लेकिन अब मुझे बताया जा रहा था कि क्या करना है। यह वाकई पदावनति थी। एक बार, एक भाई ने मुझे सेट के लिए धान की पराली लाने बाहर भेजा। मैं सच में यह नहीं करना चाहता था। मैंने सोचा, "यह करने के लिए बाहर जाना कितनी शर्म की बात है। अगर भाई-बहन ये देखेंगे, तो वे यकीनन सोचेंगे कि इतना युवा हो कर जब मैं ऐसा काम कर रहा हूँ, तो मेरा कुछ नहीं हो सकता।" मगर चूंकि मेरे कर्तव्य के लिए यह करना ही था, मैंने सबके चले जाने का इंतज़ार किया और फिर यह करने का साहस जुटाया। धान की पराली इकट्ठा करते वक्त मैंने एक भाई को अपनी ओर आते देखा। वह सफेद मोजे और चमड़े के जूते पहने थे—वह बहुत साफ-सुथरा लग रहा था। दूसरी ओर, मैं सिर से पैर तक गंदा था। अचानक मैं मुरझा-सा गया और बेचैन हो गया, यह सोच कर कि, "हम हमउम्र हैं, मगर वो एक अच्छा साफ़-सुथरा काम कर रहा है, जबकि मैं धान की पराली इकट्ठा करने जैसा गंदा काम कर रहा हूँ। कितना बडा फ़र्क है! कितनी शर्म की बात है! मैं वापस जाऊँगा और अगुआ से कहूंगा कि मैं अब यह काम नहीं करना चाहता, और उनसे कोई दूसरा काम देने को कहूँगा।"

लौटने के बाद, मेरे मन में वाकई द्वंद्व छिड़ गया, कि मुझे अगुआ से कुछ कहना चाहिए या नहीं। अगर मैं न कहूं तो तो मुझे वही काम करते रहना होगा, लेकिन अगर मैं खुल कर कह दूं कि मैं यह काम नहीं करना चाहता, तो मैं अपने कर्तव्य से मुंह मोड़ रहा होऊंगा। यह सोच कर, मैंने अपनी भावनाओं को दबाया और कुछ नहीं कहा। इसके थोड़े ही समय बाद, अगुआ ने मंचकर्मियों और कलाकारों के एक साथ सभाओं में शामिल होने की व्यवस्था की। मैं इस पर बिल्कुल भी खुश नहीं था। वे लोग नाम कमा सकते थे, लोकप्रियता में दमक सकते थे जबकि मैं चाकरी कर रहा था। हम एक स्तर पर थे ही नहीं। सभा में साथ होने से क्या मेरी हीनता और स्पष्ट नहीं होगी। सभी लोग सभाओं में सक्रिय रूप से सहभागिता करते थे, मगर मैं कुछ भी साझा नहीं करना चाहता था। कलाकारों के साथ सभाओं में मुझे महसूस होता कि मेरा काम सिर्फ उन्हें बेहतर दिखाना है। यह निराशाजनक था। वक्त गुज़रने के साथ, मेरे आत्मा का अंधकार घना होने लगा। मैं अब सभाओं में जाना ही नहीं चाहता था। मैं अक्सर लेखन के काम के अपने उन पलों को याद करता, जब भाई-बहन उत्साह से मेरा स्वागत करते और अगुआ मेरी कद्र करते। जब से मुझे उस काम से हटाया गया था, तबसे मैं सिर्फ फुटकर काम ही कर रहा था, कोई भी अब मुझे आदर-भाव से नहीं देखता था। मैं और भी अधिक हीन और असामाजिक महसूस करता था, मैं उदास और दुखी था। मैं निरंतर उदास रहता, मुझे लगता था कि अब मैं, मैं नहीं रहा। मेरा वजन बहुत तेज़ी से घट गया। एक शाम, जब मैं अकेला ही चहलकदमी कर रहा था, अपने भीतर के दुख के गुबार को रोक नहीं पाया। रोते हुए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, "हे परमेश्वर, पहले मैंने आपको संतुष्ट करने के लिए सत्य का अनुसरण करने और अपना कर्तव्य निभाने की ठानी थी, लेकिन अब चूंकि मेरे काम में दिखावा करने का कोई मौक़ा नहीं है, मैं हमेशा खुद को दूसरों से हीन समझता हूँ। मैं वाकई नकारात्मक और कमज़ोर हूँ, और मुझे लगता है जैसे मैं किसी भी पल आपको धोखा देने की कगार पर हूँ। हे परमेश्वर, मैं इतना ज़्यादा नकारात्मक नहीं होना चाहता, लेकिन मुझे नहीं पता मैं क्या करूं। मुझे इस अवस्था से बाहर निकालिए।"

इसके बाद, मैंने परमेश्वर के वचनों में यह अंश पढ़ा: "कर्तव्य अस्तित्व में कैसे आता है? आम तौर पर कहें, तो यह मानवता का उद्धार करने के परमेश्वर के प्रबंधन-कार्य के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आता है; ख़ास तौर पर कहें, तो जब परमेश्वर का प्रबंधन-कार्य मानवजाति के बीच खुलता है, तब विभिन्न कार्य उत्पन्न होते हैं, जिन्हें करने की आवश्यकता होती है, और उन्हें पूरा करने के लिए लोगों का सहयोग चाहिए। इसने लोगों द्वारा पूरे किए जाने के लिए जिम्मेदारियों और विशेष कार्यों को जन्म दिया है, और यही जिम्मेदारियाँ और विशेष कार्य वे कर्तव्य हैं, जो परमेश्वर मानवजाति को सौंपता है।" "तुम्हारा चाहे जो भी कर्तव्य हो, उसमें ऊँचे और नीचे के बीच भेद न करो। मान लो तुम कहते हो, 'हालाँकि यह काम परमेश्वर का आदेश और परमेश्वर के घर का कार्य है, पर यदि मैं इसे करूँगा, तो लोग मुझे नीची निगाह से देख सकते हैं। दूसरों को ऐसा काम मिलता है, जो उन्हें विशिष्ट बनाता है। मुझे दिए गए इस काम को, जो मुझे विशिष्ट नहीं बनाता, बल्कि परदे के पीछे मुझसे कड़ी मेहनत करवाता है, कर्तव्य कैसे कहा जा सकता है? इस कर्तव्य को मैं स्वीकार नहीं कर सकता; यह मेरा कर्तव्य नहीं है। मेरा कर्तव्य वह होना चाहिए, जो मुझे दूसरों के बीच ख़ास बनाए और मुझे प्रसिद्धि दे—और अगर प्रसिद्धि न भी दे या ख़ास न भी बनाए, तो भी मुझे इससे लाभ होना चाहिए और शारीरिक आराम मिलना चाहिए।' क्या यह कोई स्वीकार्य रवैया है? मीन-मेख निकालना परमेश्वर से आई चीज़ को स्वीकार करना नहीं है; यह अपनी पसंद के अनुसार विकल्प चुनना है। यह अपने कर्तव्य को स्वीकारना नहीं है; यह अपने कर्तव्य से इनकार करना है। जैसे ही तुम सोच-विचारकर चुनने का प्रयास करते हो, तुम सच्ची स्वीकृति के लिए सक्षम नहीं रह जाते। इस तरह मीन-मेख निकालने में तुम्हारी निजी पसंद और आकांक्षाओं की मिलावट होती है; जब तुम अपने लाभ, अपनी ख्याति आदि को महत्त्व देते हो, तो अपने कर्तव्य के प्रति तुम्हारा रवैया आज्ञाकारी नहीं होता। कर्तव्य के प्रति सही रवैया यह होता है : पहले तो तुम उसका विश्लेषण न करो, न ही यह सोचो कि उसे तुम्हें किसने सौंपा है; इसके बजाय तुम्हें उसे परमेश्वर से मिला हुआ मानना चाहिए, अपने कर्तव्य के रूप में और उस कार्य के रूप में, जो तुम्हें करना चाहिए। दूसरे, ऊँचे और नीचे के बीच भेद न करो, और उसकी प्रकृति के बारे में न सोचो—वह लोगों के सामने किया जाएगा या लोगों की नज़रों से हटकर, वह तुम्हें लोगों के बीच ख़ास बनाएगा या नहीं। इन चीज़ों पर ग़ौर मत करो। ये उस रवैये की दो विशेषताएँ हैं, जिससे लोगों को अपने कर्तव्य को देखना चाहिए।" इसको पढ़ कर मुझे पता चला कि अपने कर्तव्य के प्रति मेरा नज़रिया और रवैया गलत था। परमेश्वर अपेक्षा करता है कि हम अपना कर्तव्य निभायें, और यह करना सही और उचित है। इस बारे में विकल्प रखना हमसे अपेक्षित नहीं है। लेकिन मैंने अपनी पसंद को आड़े आने दिया, और सिर्फ ऐसा काम करना चाहा जिसमें इज़्ज़त और सराहना मिले। मैं परदे के पीछे के या किसी भी मामूली काम के ख़िलाफ़ था और मैंने उसको नामंज़ूर किया। मैंने परमेश्वर के नियम और व्यवस्थाओं को नहीं माना। मैं लापरवाह भी था, नकारात्मक भी, काम से इनकार करता था, और मैं परमेश्वर का विरोध कर रहा था। मैंने उस वक्त को याद किया जब मैं आस्था में नया था। मैं अगुआओं और कलाकार भाई-बहनों से ईर्ष्या करता था। मैं सोचता था कि उन कामों में वज़न है और दूसरे इनकी प्रशंसा करते हैं, और मामूली शारीरिक काम करने वाले लोगों के पास कोई खास वास्तविक कौशल नहीं होते। मैं सोचता था कि इस प्रकार का काम घटिया होता है और लोग उसे नीची नज़रों से देखते हैं। चूंकि मुझे गलतफ़हमी थी, इसलिए मैंने कर्तव्यों को अलग-अलग दर्जों में बाँट दिया था, इसलिए जब मैंने एक मंचकर्मी के रूप में काम शुरू किया तो सोचा कि मैं सिर्फ निचले दर्जे के फुटकर काम कर रहा हूँ और इससे मेरे नाम और मेरी छवि को नुकसान पहुंचेगा। मैं वाकई इसके विरोध में था और इसे समर्पित होना नहीं चाहता था। मैंने अपने कर्तव्य की जिम्मेदारी नहीं ली और जो हुनर मुझे सीखने चाहिए थे उनको नहीं सीखना चाहा। मैंने यह काम छोड़ कर परमेश्वर को धोखा तक देना चाहा। मैं समझ गया कि अपने कर्तव्य में मैं सिर्फ अपनी निजी पसंद की ही परवाह करता हूँ, और मैं सिर्फ अपने गर्व, इज्ज़त, और अपने हितों की ही सोचता हूँ। परमेश्वर की इच्छा के बारे में विचारशील होना या अपना कर्तव्य सही ढंग से निभाना तो दूर, मुझमें सच्ची आज्ञाकारिता का भी पूरा अभाव था। मेरा रवैया परमेश्वर के लिए बेहद घिनौना और अप्रिय था! यह जान कर मैं परेशान हो गया और मैंने खुद को धिक्कारा।

मैंने बाद में परमेश्वर के ये वचन पढ़े: "इंसान सृजित प्राणी हैं। सृजित प्राणियों के क्या कार्य होते हैं? यह लोगों के अभ्यास और कर्तव्यों को स्पर्श करता है। तुम एक सृजित प्राणी हो; परमेश्वर ने तुम्हें गा सकने का उपहार दिया है। जब वह तुम्हारा गाने के लिए उपयोग करे, तब तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हें परमेश्वर द्वारा सौंपे गए इस कार्य को स्वीकार कर अच्छे से गाना चाहिए। जब परमेश्वर तुम्हारा उपयोग सुसमाचार फैलाने के लिए करता है, तब एक सृजित प्राणी के रूप में तुम क्या बन जाते हो? तुम एक इंजीलवादी बन जाते हो। जब उसे एक अगुआ के रूप में तुम्हारी ज़रूरत पड़ती है, तब तुम्हें इस आदेश का पालन करना चाहिए; यदि तुम यह कर्तव्य सत्य के सिद्धांतों के अनुसार पूरा कर सकते हो, तो यह एक दूसरा कार्य होगा, जो तुम करते हो। कुछ लोग न तो सत्य को समझते हैं, न ही उसका अनुसरण करते हैं; वे केवल प्रयास कर सकते हैं। तो फिर उन सृजित प्राणियों का क्या कार्य है? यह कार्य प्रयास करना और सेवा प्रदान करना है" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्‍य की खोज करके ही आप परमेश्‍वर के कर्मों को जान सकते हैं')। परमेश्वर के वचनों से मैंने यह जाना कि परमेश्वर के घर में इंसान कोई भी काम करे, वह उल्लेखनीय हो या न हो, असल में कर्तव्य के सिर्फ अलग-अलग नाम और काम होते हैं, मगर इंसान की निजी जिम्मेदारी एक ही रहती है। इंसानों की निहित पहचान और सार नहीं बदलते—वे सदा एक सृजित जीव ही रहेंगे। मैं अपने लेखन-कार्य में एक सृजित जीव था, और अपने मंचकर्मी वाले काम में भी मैं सृजित जीव ही था। परमेश्वर के घर के कार्यों में कोई वर्गीकरण नहीं होता, और ये सब ज़रूरत, हर व्यक्ति के कद, क्षमता और शक्तियों के अनुसार व्यवस्थित होते हैं। काम चाहे जो हो, परमेश्वर की इच्छा यह है कि हम पूरी लगन से अपना काम करें, कि हम सत्य के अनुसरण में अडिग रहें, अपने भ्रष्ट स्वभाव का समाधान कर अपना काम सही ढंग से करें। जैसा कि परमेश्वर के वचनों में कहा गया है, "कार्य समान नहीं हैं। एक शरीर है। प्रत्येक अपना कर्तव्य करता है, प्रत्येक अपनी जगह पर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करता है—प्रत्येक चिंगारी के लिए प्रकाश की एक चमक है—और जीवन में परिपक्वता की तलाश करता है। इस प्रकार मैं संतुष्ट रहूंगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 21')। कलीसिया अगुआ ने मेरे लिए एक मंचकर्मी के काम की व्यवस्था की क्योंकि कार्य के लिए उसकी ज़रूरत थी और मुझे अपनी पसंद के आधार पर नकचढ़ा और नुक़्स निकालने वाला नहीं होना चाहिए, बल्कि परमेश्वर के नियम और व्यवस्था को स्वीकार करना चाहिए। कार्यक्रमों की ज़रूरत के अनुसार मुझे मंच के सामान को सजाना चाहिए और परमेश्वर की गवाही देते हुए हर प्रस्तुति के लिए अपना काम करना चाहिए। यही मेरा कार्य था। परमेश्वर की इच्छा को समझने के बाद मेरे नज़रिये में थोड़ा अंतर आया और लंबे समय से लदे बोझ को मैं छोड़ पाया। मैं अपने कर्तव्य को भी सही ढंग से देखने लगा। उसके बाद से, मैंने अपना कौशल बढ़ाने के लिए सामग्री और संदर्भ जानकारी को बारीकी से ढूंढ़ा, और कलाकारों के साथ सभाओं में, मैंने हमारे कामों के बीच तुलना करना बंद कर दिया, बल्कि इसके बजाय मैंने अपने विद्रोहीपन और भ्रष्टता के बारे में खुल कर बात की। अपनी पूरी समझ के बारे में मैंने सहभागिता की। इसके बाद मेरे काम में, कभी-कभी नीची नज़र से देखे जाने का मेरा डर ज़रूर उभरा, तब मैं समझ गया कि मैं फिर से कामों को ऊंची-नीची श्रेणी में डाल रहा हूँ, तब मैं परमेश्वर से फ़ौरन प्रार्थना कर अपनी गलत सोच को त्याग देता, काम में ध्यान लगाकर परमेश्वर की संतुष्टि को सबसे पहले रखता। कुछ समय तक इस प्रकार अभ्यास करके मुझे बहुत चिंता-मुक्ति और सुकून का एहसास हुआ। मुझे अब ऐसा नहीं लगा कि सेट पर काम करना और सामान यहाँ-वहां लाना-ले जाना कोई घटिया काम है। बजाय इसके मैंने महसूस किया कि परमेश्वर ने मुझे एक जिम्मेदारी सौंपी है। परमेश्वर के घर के फिल्म निर्माण के लिए अपने हिस्से का काम करके, यह कर्तव्य निभा के मैं सम्मानित और गौरवान्वित हुआ हूँ।

मैंने सोचा कि इस तरह उजागर किए जाने से, मैंने थोड़ा कद पा लिया है, कि मैं अपने काम में परमेश्वर की व्यवस्था को समर्पित हो पाऊंगा और मैं अब काम कुछ ख़ास न होने के कारण नकारात्मक और विद्रोही नहीं बनूंगा। लेकिन अगली बार जब मेरा सामना एक ऐसी स्थिति से हुआ जो मुझे पसंद नहींथी, तो वह पुराना मसला फिर से उठ खड़ा हुआ।

कुछ महीनों बाद जब किसानों के लिए बहुत व्यस्तता का समय आया, तो कुछ भाई-बहन, जो सुसमाचार फैलाने बाहर गये हुए थे, समय से फसल कटाई के लिए लौट नहीं पाये। अगुआ ने मुझसे पूछा कि क्या मैं खेती के काम में उनकी मदद कर सकता हूँ। मैंने सोचा, "ऐसा करके मैं उन भाई-बहनों के मन को सुकून दे पाऊंगा ताकि वे सुसमाचार के काम में ध्यान लगा सकें, और यह परमेश्वर के घर के कार्य के लिए फायदेमंद होगा। मुझे यह काम करना चाहिए।" लेकिन जब मैं खेतों में पहुंचा, तो देखा कि वहाँ मौजूद बाकी भाई चालीस-पचास की उम्र वाले थे। एक भी व्यक्ति मेरी तरह बीस की उम्र वाला नहीं था। इससे मुझे ज़्यादा खुशी नहीं हुई। उसी वक्त, एक भाई ने चकित हो मेरे करीब आ कर पूछा, "भाई, आप खेतों में काम करने का वक्त कैसे निकाल पाये? क्या आप अपना लेखन-कार्य नहीं कर रहे हैं?" मेरा चेहरा उसी पल लाल हो गया, और मैंने फ़ौरन जवाब दिया, "मैं बस कुछ वक्त के लिए मदद कर रहा हूँ।" उसके जाने के बाद, मैंने सोचा, "वह मेरे बारे में क्या सोचेगा? क्या वह सोचेगा कि इस उम्र में ऐसा काम करने का मतलब है कि मुझमें कोई वास्तविक क्षमता या प्रतिभा नहीं है, और मैं यहाँ सिर्फ इसलिए हूँ क्योंकि मैं कोई महत्वपूर्ण काम नहीं कर सकता? यह सचमुच अवनति है!" मैं बहुत ज़्यादा व्यथित हो गया। मैं शरीर से काम तो कर रहा था, पर मेरे मन में बस यही घूम रहा था कि वहां सभी भाई मेरे बारे में क्या सोचते हैं, और क्या वे मुझे नीची नज़र से देखते हैं। मैंने किसी तरह काम निपटा दिया। जब मैं घर पहुंचा, तो कुछ दूसरे भाइयों को कंप्यूटर पर अपना काम करते देखा, और एकाएक मुझे लगा कि मैं निचले स्तर पर हूँ। मैंने सोचा, "दूसरे लोगों को मिला काम मेरे काम से बेहतर है। मैं खेतों में जा कर कड़ी मेहनत क्यों करूं? जो भी हो, मैंने कम-से-कम यूनिवर्सिटी में कदम तो रखा है, और मैंने कड़ी मेहनत से पढ़ाई की है। क्या वह खेत में सारा दिन काम करने वाले किसान की नियति से बचने के लिए नहीं था? कल मैं नहीं जाऊंगा।" मैं जानता था कि मुझे ऐसा नहीं सोचना चहिए, मगर यह सोच कर कि खेतों में मुझसे काम करवाना मेरी प्रतिभा की बर्बादी और मेरा निरादर है, मुझे लगा कि मेरे साथ गलत हुआ है। इस बारे में सोच कर मैं और ज़्यादा बेचैन हो गया, तो मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, "हे परमेश्वर, मुझे लगता है खेती के काम में कड़ी मेहनत करना और पसीना बहाना एक तुच्छ काम है, जिसे दूसरे लोग नीची नज़र से देखेंगे। मैं अब यह काम नहीं करना चाहता। मुझे मालूम है कि इस बारे में मेरी सोच गलत है, मगर मैं कुछ नहीं कर सकता। मैं वाकई बहुत दुखी हूँ। मुझे प्रबुद्ध करें और आपकी इच्छा को समझने और आज्ञापालन करने में मेरा मार्गदर्शन करें।" अपनी प्रार्थना के बाद, मैंने परमेश्वर के वचनों में यह अंश पढ़ा: "सच्चा समर्पण क्या है? जब कभी भी परमेश्वर ऐसी चीज़ें करता है जो तुम्हारे अनुरूप चली जाती हैं, और तुम्हें ऐसा महसूस होता है कि सब कुछ संतोषजनक और उचित है, और तुम्हें भीड़ से अलग खड़े होने दिया गया है, तुम्हें यह सब काफी गौरवशाली लगता है और तुम कहते हो, 'परमेश्वर को धन्यवाद' और उसके आयोजनों एवं व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित हो पाते हो। हालांकि, जब कभी भी तुम्हें मामूली जगह पर तैनात कर दिया जता है, जहाँ तुम दूसरों से अलग दिखने में अक्षम होते हो, और जिसमें कोई भी कभी तुम्हें अभिस्वीकृत नहीं करता, तो तुम खुश नहीं रहते और समर्पण करना तुम्हें कठिन लगता है। ... जब परिस्थितियां अनुकूल हों, तब समर्पण करना आम तौर पर आसान होता है। अगर तुम प्रतिकूल परिस्थितियों में भी समर्पण दिखा सकते हो—उन मामलों में जहां चीज़ें तुम्हारे अनुकूल नहीं हो रही हैं और जब तुम्हारी भावनाओं को ठेस पहुँचती है, जो तुम्हें कमजोर करते हैं, जो तुम्हें शारीरिक रूप से तकलीफ़ देते हैं और तुम्हारी प्रतिष्ठा को आघात पहुंचाते हैं, जो तुम्हारे मिथ्याभिमान और गौरव को संतुष्ट नहीं कर पाते है, और जो तुम्हें मानसिक रूप से कष्ट पहुंचाते हैं—तब सही मायनों में तुम्हारे पास आध्यात्मिक कद है। क्या यह वही लक्ष्य नहीं है जिसका तुम्हें अनुसरण करना चाहिये? अगर तुम्हारे पास ऐसा संकल्प, ऐसा लक्ष्य है, तो उम्मीद बाकी है" (परमेश्‍वर की संगति)।

परमेश्वर के वचनों पर विचार कर मैंने शर्मिंदगी महसूस की। इन वचनों ने मेरी अवस्था को बिलकुल ठीक ढंग से स्पष्ट कर दिया था। लेखन का काम करते वक्त जब मैंने सोचा कि मैं दिखावा कर सकूंगा, तो इसे मंज़ूर करने और पालन करने में मुझे बहुत खुशी हुई थी, और मैंने अपना काम उत्साह से किया था। लेकिन जब मैं खेतों में मदद कर रहा था, और मेरे गुरूर और इज्ज़त पर चोट पहुंची, तो मैं बेचैन हो गया और यह नहीं करना चाहता था। खास तौर से जब मैंने दूसरे भाइयों को कंप्यूटरों पर काम करते देखा, तो मुझे लगा मैं उन जैसा काबिल नहीं हूँ। मैंने यह सोच कर अपना संतुलन खो दिया, कि मैं पढ़ा-लिखा हूँ, इसलिए मुझे ऐसा प्रतिष्ठित काम करना चाहिए जिसमें हुनर की ज़रूरत हो। मैंने विरोध किया और शिकायत की। मैं अब खेती का काम नहीं करना चाहता था। अपने काम में, मैंने यह विचार नहीं किया कि परमेश्वर के घर को किससे लाभ पहुंचेगा, न ही मैं उसकी इच्छा के प्रति विचारशील था। इसके बजाय हर मोड़ पर मैंने अपने गर्व के बारे में सोचा। मैं बहुत स्वार्थी और घिनौना था। मैं खुद को परमेश्वर के घर के एक सदस्य के रूप में बिल्कुल नहीं देख रहा था। परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशील सच्चा विश्वासी जहाँ भी उसकी ज़रूरत हो वहाँ हाथ बंटाता है, अपने कर्तव्य को अपनी निजी जिम्मेदारी मानता है, भले ही वह काम मुश्किल और थकाने वाला हो या उसके नाम और हितों के साथ समझौता करता हो। अगर वह काम कलीसिया के कार्य के लिए अच्छा है, तो वह उसे अच्छे ढंग से करने की पहल करता है। सिर्फ ऐसे ही लोगों में इंसानियत होती है, और वही परमेश्वर के घर के साथ खड़े रहते हैं। मैंने रबी फसल के अपने हाल के काम के बारे में सोचा। कुछ भाई-बहनों को मदद की ज़रूरत थी, और बहुत-से दूसरे लोग भी यह काम कर सकते थे, तो फिर ऐसा क्यों हुआ कि परमेश्वर ने यह काम मेरे जिम्मे डाल दिया? ऐसा नहीं था कि मैंने उस काम में कोई ख़ास योगदान दिया था। लेकिन परमेश्वर गंदा, थकाने वाला काम मुझसे करवा कर कर्तव्य के प्रति मेरे रवैये को उजागर कर रहे थे ताकि मैं वह काम करते वक्त अपनी भ्रष्टता और अशुद्धियों को जान सकूं, और तब अपने भ्रष्ट स्वभाव को मिटाने के लिए सत्य की खोज कर सकूं। लेकिन मैं परमेश्वर के कृपालु इरादों को समझ नहीं पाया। मैं अभी भी अपने काम को ले कर नखरे कर रहा था और हमेशा अपनी ही पसंद और मांगों पर अड़ा था। मैं परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं को मान नहीं पा रहा था, बल्कि विद्रोही हो कर परमेश्वर का विरोध कर रह था। मैंने उन्हें वाकई ठेस पहुंचायी! मैं समझता हूँ कि परमेश्वर की इच्छा उस स्थिति के जरिये मेरे भ्रष्ट स्वभाव को उजागर कर उसे शुद्ध करने, और कर्तव्य के प्रति मेरा रवैया सुधारने की थी। यह परमेश्वर का प्रेम था। अगर मुझे गंदा, थकाने वाला या मामूली काम दिया जाए, तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर इससे कलीसिया के काम को फायदा पहुंचे, तो मुझे इसे बिना शर्त मंज़ूर कर लेना चाहिए, और समर्पित हो कर पूरी लगन से उसे करना चाहिए। यही होता है अंतःकरण वाला और तर्कसंगत व्यक्ति होना। यह समझ हासिल करने के बाद, मुझे धीरे-धीरे शांति और सुकून मिला।

मैं आत्मचिंतन किए बिना नहीं रह पाया: जब मुझे एक मामूली-सा काम करना पड़ा तो मैं इतना विरोधी और बेचैन क्यों हो गया था? क्यों नहीं मैं इसे सच्चे मन से स्वीकार कर समर्पण कर सका? अपनी खोज में, मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े: "शैतान राष्ट्रीय सरकारों और प्रसिद्ध एवं महान व्यक्तियों की शिक्षा और प्रभाव के माध्यम से लोगों को दूषित करता है। उनके झूठ और बकवास मनुष्य की प्रकृति और जीवन बन गए हैं। 'हर कोई अपने लिए और बाकियों को शैतान ले जाये' एक प्रसिद्ध शैतानी कहावत है जिसे हर किसी में डाल दिया गया है और यह मानव जीवन बन गया है। जीने के लिए दर्शन के कुछ अन्य शब्द भी हैं जो इसी तरह के हैं। शैतान प्रत्येक देश की उत्तम पारंपरिक संस्कृति के माध्यम से लोगों को शिक्षित करता है और मानवता को विनाश की विशाल खाई में गिरने और उसमें निगल लिए जाने पर मजबूर कर देता है, और अंत में परमेश्वर लोगों को नष्ट कर देता है क्योंकि वे शैतान की सेवा करते हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं। ... अभी भी लोगों के जीवन में, और दूसरों के साथ उनके आचरण और व्यवहार में कई शैतानी विष उपस्थित हैं—वे यहाँ तक कि व्यवहारिक रूप से सच्चाई के पास भी नहीं है—उदाहरण के लिए, उनके जीवन दर्शन, काम करने के उनके तरीके, और उनकी सभी कहावतें बड़े लाल अजगर के विष से भरी हैं, और ये सभी शैतान से आते हैं। इस प्रकार, सभी चीजें जो लोगों की हड्डियों और रक्त में बहें, वह सभी शैतान की चीज़ें हैं" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें')। परमेश्वर के वचनों ने यह समझने में मेरी मदद की कि मेरा अवज्ञाकारी होना और अपने काम को लेकर नखरेबाजी दिखाना इसलिए था क्योंकि शैतान के "स्वर्ग उन लोगों को नष्ट कर देता है जो स्वयं के लिए नहीं हैं," जैसे ज़हरों से मुझे भ्रष्ट कर गलत बातें सीखा दी गयी थीं। "बुद्धिमान लोग बाहुबलियों पर राज करते हैं," और "सबसे बुद्धिमान या सबसे मूर्ख व्यक्ति ही कभी नहीं बदलता," और इसलिए क्योंकि मैं सबसे अलग दिखने की, सबसे बेहतर होने की कोशिश कर रहा था। मुझे उन दिनों को याद आई जब मैं स्कूल में था। मेरे शिक्षकों और माता-पिता ने मुझसे हमेशा कड़ी मेहनत करने को कहते थे कि मैं एक अच्छी यूनिवर्सिटी में दाखिला ले सकूं और एक किसान की ज़िंदगी से छुटकारा पा सकूं, कि आगे बढ़ने का बस यही एक तरीका है। यही कारण था कि मैं बचपन से ही मेहनत से पढ़ाई करता था, इस उम्मीद में कि मैं अच्छी डिग्री हासिल कर एक अधीक्षक या प्रबंधक जैसी एक इज़्ज़तदार नौकरी ढूंढ़ पाऊंगा—कोई सराहनीय काम करूंगा ताकि दूसरे मेरा आदर करें। एक विश्वासी बनने के बाद भी, मैं परमेश्वर के घर के कार्यों को ऊंचे या निचले दर्जे में बाँटकर, उन्हें एक अविश्वासी की नज़र से ही तौलता रहा। मैंने सोचा कि एक अगुआ होना या कोई हुनर वाला काम करना इज़्ज़तदार होता है, और भाई-बहन ऐसे कामों को आदर देंगे, जबकि परदे के पीछे वाले कड़ी शारीरिक मेहनत वाले काम निचले दर्जे के होते हैं और इनको नीची नज़र से देखा जाएगा। मैंने देखा कि ये शैतानी ज़हर मेरी प्रकृति बन चुका था और मेरी सोच पर छा गया था, और मुझे हमेशा कोई ख़ास इंसान बनने की चाह में हठी हो कर हैसियत और नाम कमाने को उकसा रहा था। जब मेरी प्रतिष्ठा और हैसियत को खतरा पैदा होता, मैं नकारात्मक और विरोधी हो जाता। मैं एक सृजित जीव की तरह अपने स्थान को मंज़ूर कर अपना कर्तव्य नहीं कर पा रहा था। मुझमें अंतःकरण और तर्क का पूर्ण अभाव था। मुझे पता था कि अगर मैं सत्य को न खोजते हुए परमेश्वर की अपेक्षा के अनुरूप कर्तव्य निभाये बिना, इस शैतानी ज़हर के अनुसार जीता रहा तो मैं सत्य और जीवन नहीं पा सकूंगा, बल्कि परमेश्वर को असंतुष्ट कर दूंगा और मिटा दिया जाऊंगा। यह सब समझने के बाद मैंने अपने देह-सुख का त्याग करने और परमेश्वर को संतुष्ट करने का संकल्प किया। मैं अब शैतानी ज़हर के अनुसार नहीं जीना चाहता था। मैं दूसरे दिन खेतों में दोबारा काम करने चला गया।

मैंने बाद में परमेश्वर के कुछ वचन पढ़े। "मैं प्रत्येक व्यक्ति की मंज़िल उसकी आयु, वरिष्ठता, पीड़ा की मात्रा के आधार पर नहीं और जिस हद तक वे दया आकर्षित करते हैं उस पर तो बिल्कल भी नहीं बल्कि इस बात के अनुसार तय करता हूँ कि वे सत्य को धारण करते हैं या नहीं। इसे छोड़कर अन्य कोई विकल्प नहीं है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो')। "अंतत:, लोग उद्धार प्राप्त कर सकते हैं या नहीं, यह इस बात पर निर्भर नहीं होता कि वे कौन-सा कर्तव्य निभाते हैं, बल्कि इस बात पर निर्भर होता है कि उन्होंने सत्य को समझा और हासिल किया है या नहीं, और वे परमेश्वर के आयोजनों के प्रति समर्पित हो सकते हैं या नहीं और एक सच्चे सृजित प्राणी बन सकते हैं या नहीं। परमेश्वर धार्मिक है, और यही वह सिद्धांत है, जिससे वह पूरी मानवजाति को मापता है। यह सिद्धांत अपरिवर्तनीय है, और तुम्हें यह याद रखना चाहिए। इसलिए कोई दूसरा रास्ता ढूँढ़ने की मत सोचो, और इस सिद्धांत को परिस्थितियों के अनुसार अपनाने का प्रयास मत करो। जिस पल तुम ऐसा करोगे, उसी पल तुम एक मूर्खतापूर्ण और अज्ञानता भरा कार्य कर चुके होगे। इस मामले में परमेश्वर लचीला नहीं है, और उद्धार पाने वाले सभी लोगों से अपेक्षित उसके मानक अपरिवर्तनीय हैं; वे वैसे ही रहते हैं, फिर चाहे तुम कोई भी क्यों न हो।" मैं परमेश्वर के वचनों में उसका धार्मिक स्वभाव देख पा रह था। परमेश्वर किसी इंसान का परिणाम और गंतव्य इस आधार पर तय नहीं करता, कि वह क्या काम करता है, उसने कितना काम किया है, या उसने कितना योगदान दिया है। परमेश्वर यह देखता है कि क्या वह उसके नियम और व्यवस्था को मानता है और एक सृजित जीव का कर्तव्य निभाता है, और क्या वह अंततः सत्य को प्राप्त कर अपने जीवन स्वभाव को बदल पाता है। अगर मैं अपनी आस्था में सत्य का अनुसरण न करूं, तो मेरा काम दूसरे लोगों को चाहे जितना भी अद्भुत या प्रभावशील लगे, मैं परमेश्वर की स्वीकृति और उसका पूर्ण उद्धार पाना तो दूर, कभी सत्य भी प्राप्त नहीं कर पाऊंगा। मुझे उस मसीह-विरोधी का ख़्याल आया जिसे हमारी कलीसिया ने निकाल बाहर किया था। उस महिला ने कुछ महत्वपूर्ण काम किये थे और एक अगुआ के रूप में कार्य किया था, और कलीसिया के कुछ नये सदस्य उसका बड़ा आदर करते थे। लेकिन उसने अपने कर्तव्य में सत्य के अनुसरण का या स्वभाव में बदलाव लाने का प्रयास नहीं किया, इसके बजाय वह नाम और हैसियत के लिए स्पर्धा करती रही और मसीह-विरोधी के रास्ते पर बनी रही। उसने हर किस्म के बुरे काम किये और परमेश्वर के घर के कार्य में बाधा डाली। इसी वजह से उसे आखिरकार निकाल बाहर किया गया था। मैंने यह भी देखा कि कुछ भाई-बहन साधारण काम किया करते थे, जो कुछ खास नहीं लगते थे, लेकिन वे शांति से बिना गिले-शिकवे के अपना काम करते। मुश्किलें पेश आने पर वे सत्य और परमेश्वर की इच्छा को खोजते। उनके कार्यों में पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और उसका मार्गदर्शन था, और वे अपने काम में बेहतर होते जाते थे। वे ज़्यादा-से-ज़्यादा मनुष्य सदृश जीवन जी रहे थे। इससे मुझे यह पता चला कि आस्था में, सत्य को प्राप्त करने का इससे कोई संबंध नहीं है कि किसी का कर्तव्य क्या है। इंसान चाहे कोई भी काम करे, सत्य का अनुसरण और स्वभाव में परिवर्तन मुख्य बातें हैं। अपनाने के लिए यही सही मार्ग है| अब अगुआ चाहे मुझसे मंचकर्मी का काम करायें या खेतिहर मज़दूर का, सब-कुछ परमेश्वर का नियम और व्यवस्था है, और अपने जीवन प्रवेश के लिए मुझे इसी की ज़रूरत है| मुझे सदा इसे अपनाना और इसके प्रति समर्पित होना चाहिए| अपने कर्तव्य में, मुझे सत्य को खोजनाचाहिए, परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करना होगा, और सत्य के सिद्धांतों पर चलना चाहिए। केवल यही परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है। यह सब समझने के बाद मुझे आज़ादी का एहसास हुआ। अगुआ ने बाद में मुझे और भी मामूली काम दिये, जिन्हें मैंने शांति से मंज़ूर कर लिया। अपने खाली वक्त में मैंने घर के कामकाज में भाई-बहनों का हाथ बंटाने की भी पेशकश की। जब मैंने इस प्रकार अभ्यास किया तब मैंने जाना कि चाहे मैं साफ़-सफाई में हाथ बंटाऊं या फिर पौधे रोपने या गड्ढा खोदने में, सीखने को हमेशा कुछ न कुछ होता है। शारीरिक श्रम करने के कारण परमेश्वर मेरे साथ भेदभाव नहीं करते। अगर मैं दिल लगा कर काम करता, सत्य को खोजता, और परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाता हूँ, तो मैं किसी भी काम में अच्छा परिणाम हासिल कर सकता हूँ।

यह अनुभव करने के बाद मैंने सचमुच जाना कि मेरा काम चाहे जो हो, परमेश्वर ने इसी की व्यवस्था की है, और अपने जीवन प्रवेश के लिए मुझे इसी की ज़रूरत है। मुझे इसे सदा स्वीकार कर आज्ञापालन करना चहिए, अपना कर्तव्य और जिम्मेदारियां निभानी चाहिए, और इस पूरी प्रक्रिया में सत्य की खोज तथा स्वभाव परिवर्तन करना चाहिए। भले ही मैंने विभिन्न कर्तव्यों को हमेशा श्रेणियों में बाँटा था, और अपनी पसंद का काम न मिलने पर मैंने परमेश्वर के प्रति विद्रोह और विरोध से भर कर उसका प्रतिरोध किया था, फिर भी मेरे साथ उसका व्यवहार मेरे उल्लंघनों के आधार पर नहीं था। इसके बजाय उसने अपने वचनों से कदम-दर-कदम मेरा मार्गदर्शन किया और मुझे समझने दिया कि सत्य क्या है और सृजित जीव की जिम्मेदारियां और लक्ष्य क्या हैं। उसने मेरे भटके हुए नज़रिये को सही स्थान दिया ताकि मैं अपने कर्तव्य के प्रति रवैया सही कर सकूं और उनका आज्ञापालन शुरू कर सकूं। यह परमेश्वर का प्रेम था। परमेश्वर का धन्यवाद!

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