2. सीसीपी और धार्मिक दुनिया सर्वशक्तिमान परमेश्वर की निंदा और विरोध करने में, कई अफवाहों और भ्रांतियों को फैलाते हुए, उन्मत्त रही है। परमेश्वर उन लोगों के साथ कैसा व्यवहार करेगा, जो इन अफवाहों और कुरीतियों को आँखें मूँद कर स्वीकार कर लेते हैं, और सही मार्ग की तलाश और जाँच करने का कोई प्रयास नहीं करते हैं? उनका अंत किस तरह का होगा?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"मेरे ज्ञान के न होने से मेरी प्रजा नष्‍ट हो गई" (होशे 4:6)।

"परन्तु मूढ़ लोग निर्बुद्धि होने के कारण मर जाते हैं" (नीतिवचन 10:21)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

जो लोग सत्य को सुनकर अपनी गर्दन ना में हिलाते हैं, जो मौत की बातें सुनकर अत्यधिक मुस्कराते हैं, वे शैतान की संतान हैं; और नष्ट कर दी जाने वाली वस्तुएँ हैं। ऐसे कई लोग कलीसिया में मौजूद हैं, जिनमें कोई विवेक नहीं है। और जब कुछ कपटपूर्ण घटित होता है, तो वे शैतान के पक्ष में जा खड़े होते हैं। जब उन्हें शैतान का अनुचर कहा जाता है तो उन्हें लगता है कि उनके साथ अन्याय हुआ है। यद्यपि लोग कह सकते हैं कि उनमें विवेक नहीं है, वे हमेशा उस पक्ष में खड़े होते हैं जहाँ सत्य नहीं होता है, वे महत्वपूर्ण समय पर कभी भी सत्य के पक्ष में खड़े नहीं होते हैं, वे कभी भी सत्य के पक्ष में खड़े होकर दलील पेश नहीं करते हैं। क्या उनमें सच में विवेक का अभाव है? वे अनपेक्षित ढंग से शैतान का पक्ष क्यों लेते हैं? वे कभी भी एक भी शब्द ऐसा क्यों नहीं बोलते हैं जो निष्पक्ष हो या सत्य के समर्थन में तार्किक हो? क्या ऐसी स्थिति वाकई उनके क्षणिक भ्रम के परिणामस्वरूप पैदा हुई है? लोगों में विवेक की जितनी कमी होगी, वे सत्य के पक्ष में उतना ही कम खड़ा हो पाएँगे। इससे क्या ज़ाहिर होता है? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि विवेकशून्य लोग बुराई से प्रेम करते हैं? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि वे शैतान की निष्ठावान संतान हैं? ऐसा क्यों है कि वे हमेशा शैतान के पक्ष में खड़े होकर उसी की भाषा बोलते हैं? उनका हर शब्द और कर्म, और उनके चेहरे के हाव-भाव, यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि वे सत्य के किसी भी प्रकार के प्रेमी नहीं हैं; बल्कि, वे ऐसे लोग हैं जो सत्य से घृणा करते हैं। शैतान के साथ उनका खड़ा होना यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि शैतान इन तुच्छ इब्लीसों को वाकई में प्रेम करता है जो शैतान की खातिर लड़ते हुए अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं। क्या ये सभी तथ्य पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

कुछ लोगों की प्रथम प्रतिक्रिया क्या होती है जब वे परमेश्वर के बारे में कोई अफवाह या निन्दात्मक बात सुनते हैं? उनकी पहली प्रतिक्रिया है: मुझे नहीं पता कि यह अफवाह सही है या नहीं, इसका अस्तित्व है या नहीं, इसलिए मैं प्रतीक्षा करूँगा और देखूँगा। तब वे विचार करना आरम्भ कर देते हैं: इसे सत्यापित करने का कोई तरीका नहीं है, क्या इसका अस्तित्व है? क्या यह अफवाह सच है या नहीं? यद्यपि ऐसे व्यक्ति इसे ऊपरी तौर पर प्रदर्शित नहीं कर रहे हैं, फिर भी उसके हृदय ने पहले से ही सन्देह करना आरम्भ कर दिया है, पहले से ही परमेश्वर का इनकार करना शुरू कर दिया है। इस प्रकार की प्रवृत्ति, इस प्रकार के दृष्टिकोण का सार क्या है? क्या यह विश्वासघात नहीं है? उनका सामना किसी मामले से होने से पहले, तुम नहीं देख सकते हो कि इस व्यक्ति का दृष्टिकोण क्या है—ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि वे परमेश्वर से संघर्ष नहीं करते हैं, मानो कि वे परमेश्वर को एक शत्रु के रूप में नहीं मानते हैं। हालाँकि, जैसे ही उनका सामना इससे होता है, वे तुरन्त शैतान के साथ खड़े हो जाते हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं। यह क्या बताता है? यह बताता है कि मनुष्य और परमेश्वर विरोधी हैं! ऐसा नहीं है कि परमेश्वर मनुष्य को अपने शत्रु के रूप में मानता है, बल्कि मनुष्य का सार ही अपने आपमें परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण है। चाहे कोई व्यक्ति कितने ही लम्बे समय से परमेश्वर का अनुसरण करता हो, वह कितनी भी कीमत चुकाता हो; किस भी प्रकार से परमेश्वर की स्तुति करता हो, किस भी प्रकार से वह परमेश्वर का प्रतिरोध करने से स्वयं को रोकता हो, यहाँ तक कि परमेश्वर से प्रेम करने के लिए अपने आपको उकसाता भी हो, लेकिन वह कभी भी परमेश्वर के साथ परमेश्वर के रूप में व्यवहार नहीं कर सकता है। क्या यह मनुष्य के सार के द्वारा निर्धारित नहीं होता है? यदि तुम उसके साथ परमेश्वर के रूप में व्यवहार करते हो, तुम सचमुच में विश्वास करते हो कि वह परमेश्वर है, तो क्या तब भी तुम्हें उसके प्रति कोई सन्देह होता है? क्या तब भी तुम्हारे हृदय में उसके सम्बन्ध में कोई प्रश्न चिन्ह हो सकता है? नहीं हो सकता है। इस संसार के चलन बहुत ही दुष्टतापूर्ण हैं, यह मनुष्यजाति बहुत बुरी है; तो ऐसा कैसे है कि उसके बारे में तुम्हारी कोई अवधारणाएँ न हों? तुम स्वयं ही बहुत दुष्ट हो, तो ऐसा कैसे है कि उसके बारे में तुम्हारी कोई अवधारणा न हो? फिर भी थोड़ी सी अफवाहें और कुछ निन्दा, परमेश्वर के बारे में इतनी बड़ी धारणाएँ उत्पन्न कर सकती हैं, इतने सारे विचारों को उत्पन्न कर सकती हैं, जो दर्शाता है कि तुम्हारी कद-काठी कितनी अपरिपक्व है! बस थोड़े से मच्छरों की "भनभनाहट," और कुछ घिनौनी मक्खियाँ, बस इतना ही काफी है तुम्हें धोखा देने के लिए? यह किस प्रकार का व्यक्ति है? क्या तुम जानते हो कि परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति के बारे में क्या सोचता है? परमेश्वर इन लोगों से किस प्रकार व्यवहार करता है इस बारे में उसकी प्रवृत्ति वास्तव में बिल्कुल स्पष्ट है। यह केवल इतना ही है कि इन लोगों के प्रति परमेश्वर का बर्ताव उन पर जानबूझकर कोई ध्यान नहीं देना है—उसकी प्रवृत्ति उन पर कोई ध्यान नहीं देना है, और इन अज्ञानी लोगों के साथ गंभीर नहीं होना है। ऐसा क्यों है? क्योंकि अपने हृदय में उसने ऐसे लोगों को प्राप्त करने की कभी योजना नहीं बनाई है जिन्होंने बिल्कुल अन्त तक उसके प्रति शत्रुतापूर्ण होने की शपथ खाई है, और जिन्होंने कभी भी परमेश्वर के सुसंगत होने के मार्ग की खोज करने की योजना नहीं बनाई है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

जो शैतान से संबंधित हैं, वे शैतान के पास लौट जाएँगे, जबकि जो परमेश्वर से संबंधित हैं, वे निश्चित रूप से सत्य की खोज में चले जाएँगे; यह उनकी प्रकृति के अनुसार तय होता है। उन सभी को नष्ट हो जाने दो जो शैतान का अनुसरण करते हैं! इन लोगों के प्रति कोई दया-भाव नहीं दिखाया जायेगा। जो सत्य के खोजी हैं, उनका भरण-पोषण होने दो और वे अपने हृदयों की तृप्ति तक परमेश्वर के वचनों में आनंद प्राप्त करें। परमेश्वर धार्मिक है; और वह किसी के प्रति भी पक्षपात नहीं करता है। यदि तू एक इब्लीस है, तो तू सत्य का अभ्यास करने में अक्षम है; और यदि तू कोई ऐसा है जो सत्य की खोज करता है, तो यह निश्चित है कि तू शैतान का बंदी नहीं बनेगा—इसमें किसी प्रकार का कोई संदेह नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

जो लोग विवेकशून्य हैं, वे अपनी तुच्छ चालाकी के कारण दुष्ट लोगों के हाथों विनाश को प्राप्त होंगे, और ऐसे लोग दुष्ट लोगों के द्वारा पथभ्रष्ट कर दिये जायेंगे तथा लौटकर आने में असमर्थ होंगे। इन लोगों के साथ इसी प्रकार पेश आना चाहिए, क्योंकि इन्हें सत्य से प्रेम नहीं है, क्योंकि ये सत्य के पक्ष में खड़े होने में अक्षम हैं, क्योंकि ये दुष्ट लोगों का अनुसरण करते हैं, ये दुष्ट लोगों के पक्ष में खड़े होते हैं, क्योंकि ये दुष्ट लोगों के साथ साँठ-गाँठ करते हैं और परमेश्वर की अवमानना करते हैं। वे बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि वे दुष्ट लोग दुष्टता विकीर्ण करते हैं, मगर वे अपना हृदय कड़ा कर लेते हैं और उनका अनुसरण करने के लिए सत्य के विपरीत चलते हैं। क्या ये लोग जो सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं लेकिन जो विनाशकारी और घृणास्पद कार्यों को करते हैं, दुष्टता नहीं कर रहे हैं? यद्यपि उनमें से कुछ ऐसे हैं जो अपने आप को सम्राटों की तरह पेश करते हैं और कुछ ऐसे हैं जो उनका अनुसरण करते हैं, किन्तु क्या परमेश्वर की अवहेलना करने की उनकी प्रकृति एक-सी नहीं है? उनके पास इस बात का दावा करने का क्या बहाना हो सकता है कि परमेश्वर उन्हें नहीं बचाता है? उनके पास इस बात का दावा करने का क्या बहाना हो सकता है कि परमेश्वर धार्मिक नहीं है? क्या यह उनकी अपनी दुष्टता नहीं है जो उनका विनाश कर रही है? क्या यह उनकी खुद की विद्रोहशीलता नहीं है जो उन्हें नरक में नहीं धकेल रही है? जो लोग सत्य का अभ्यास करते हैं, अंत में, उन्हें सत्य की वजह से बचा लिया जाएगा और सिद्ध बना दिया जाएगा। जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, अंत में, वे सत्य की वजह से विनाश को आमंत्रण देंगे। ये वे अंत हैं जो उन लोगों की प्रतीक्षा में हैं जो सत्य का अभ्यास करते हैं और जो नहीं करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

जो मसीह के द्वारा कहे गए सत्य पर भरोसा किए बिना जीवन प्राप्त करने की अभिलाषा करते हैं, वे पृथ्वी पर सबसे हास्यास्पद लोग हैं और जो मसीह के द्वारा लाए गए जीवन के मार्ग को स्वीकार नहीं करते हैं, वे कल्पना में ही खोए हुए हैं। इसलिए मैं यह कहता हूँ कि वे लोग जो अंत के दिनों के मसीह को स्वीकार नहीं करते हैं वे हमेशा के लिए परमेश्वर के द्वारा घृणित समझे जाएंगे। अंत के दिनों में मसीह मनुष्यों के लिए परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने का प्रवेशद्वार है, उससे होकर गए बिना कोई प्रवेश नहीं कर सकता। मसीह के माध्यम बिना कोई भी परमेश्वर के द्वारा पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकता। परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास है, और इसलिए तुम्हें उसके वचनों को स्वीकार करना ही चाहिए और उसके मार्ग का पालन करना चाहिए। सत्य को प्राप्त करने में या जीवन के प्रावधान को स्वीकार करने में असमर्थ रहते हुए तुम सिर्फ़ अनुग्रह प्राप्त करने के बारे में नहीं सोच सकते हो। मसीह अंत के दिनों में आता है ताकि वे सभी जो सच्चाई से उस पर विश्वास करते हैं, उन्हें जीवन प्रदान किया जाए। उसका कार्य पुराने युग को समाप्त करने और नए युग में प्रवेश करने के लिए है और यही वह मार्ग है जिसे नए युग में प्रवेश करने वालों को अपनाना चाहिए। यदि तुम उसे पहचानने में असमर्थ हो, और उसकी भर्त्सना करते हो, निंदा करते हो और यहाँ तक कि उसे उत्पीड़ित करते हो, तो तुम अनंत समय तक जलाए जाते रहने के लिए निर्धारित हो और तुम कभी भी परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर पाओगे। क्योंकि यह मसीह ही स्वयं पवित्र आत्मा और परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, जिसे परमेश्वर ने पृथ्वी पर अपना कार्य सौंपा है। इसलिए मैं कहता हूँ कि अंत के दिनों के मसीह के द्वारा जो भी कार्य किया गया है यदि उसे तुम स्वीकार नहीं करते हो तो तुम पवित्र आत्मा की निंदा करते हो। जो प्रतिकार पवित्र आत्मा की निंदा करने वालों को सहना होगा वह सभी के लिए स्वत:-स्पष्ट है। मैं यह भी कहता हूँ कि यदि तुम अंत के दिनों के मसीह का विरोध करोगे और उसे ठुकराओगे, तो ऐसा कोई भी नहीं है जो तुम्हारे लिए इसका नतीजा भुगत लेगा। इसके अलावा, आज के बाद से फिर कभी तुम्हें परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करने का अवसर नहीं मिलेगा; यदि तुम खुद की गलती पर प्रायश्चित करने की कोशिश भी करते हो, तो भी तुम कभी परमेश्वर का चेहरा नहीं देख पाओगे। क्योंकि तुम जिसका विरोध करते हो वह मनुष्य नहीं है, जिसको ठुकरा रहे हो वह क्षुद्र प्राणी नहीं है, बल्कि मसीह है। क्या तुम इसके परिणामों के बारे में जानते हो? तुमने कोई छोटी-मोटी गलती नहीं बल्कि एक बहुत ही जघन्य अपराध किया होगा। इसलिए मैं प्रत्येक को सलाह देता हूँ कि सत्य के सामने अपने ज़हरीले दाँत मत दिखाओ, या लापरवाही से आलोचना मत करो, क्योंकि केवल सत्य ही तुमको जीवन दिला सकता है और सत्य के अलावा कुछ भी तुम्हें नया जन्म पाने या फिर से परमेश्वर का चेहरा देखने की अनुमति नहीं दे सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है' से उद्धृत

पिछला: 1. दुनिया भर में आपदाएँ अक्सर हो रही हैं, और वे पैमाने में बड़ी होती जा रही हैं, अंतिम दिनों के आगमन की अग्र-सूचना देते हुए। बाइबल कहती है, "सब बातों का अन्त तुरन्त होनेवाला है" (1 पतरस 4:7)। हम जानते हैं कि जब अंतिम दिनों में परमेश्वर लौटेगा, तो वे अच्छे को पुरस्कृत तथा बुरे को दंडित करेगा, और लोगों के अंत का निर्धारण करेगा। तो वह कैसे अच्छे को पुरस्कृत और बुरे को दंडित करेगा, और वह लोगों के अंज़ामों को कैसे निर्धारित करेगा?

अगला: 3. कुछ लोगों ने स्वीकार किया है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर प्रभु यीशु की वापसी है, लेकिन चूँकि वे सीसीपी द्वारा गिरफ्तार किए जाने और सताए जाने से भयभीत हैं और धार्मिक समुदाय के पादरियों और एल्डर्स द्वारा डराए और धमकाए गए हैं, वे सच्चे मार्ग को स्वीकार करने का साहस नहीं कर पाते हैं। ऐसे लोगों का अंत कैसा होगा?

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