1. दुनिया भर में आपदाएँ अक्सर हो रही हैं, और वे पैमाने में बड़ी होती जा रही हैं, अंतिम दिनों के आगमन की अग्र-सूचना देते हुए। बाइबल कहती है, "सब बातों का अन्त तुरन्त होनेवाला है" (1 पतरस 4:7)। हम जानते हैं कि जब अंतिम दिनों में परमेश्वर लौटेगा, तो वे अच्छे को पुरस्कृत तथा बुरे को दंडित करेगा, और लोगों के अंत का निर्धारण करेगा। तो वह कैसे अच्छे को पुरस्कृत और बुरे को दंडित करेगा, और वह लोगों के अंज़ामों को कैसे निर्धारित करेगा?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

युग का समापन करने के अपने अंतिम कार्य में, परमेश्वर का स्वभाव ताड़ना और न्याय का है, जिसमें वह वो सब प्रकट करता है जो अधार्मिक है, ताकि वह सार्वजनिक रूप से सभी लोगों का न्याय कर सके और उन लोगों को पूर्ण बना सके, जो सच्चे दिल से उसे प्यार करते हैं। केवल इस तरह का स्वभाव ही युग का समापन कर सकता है। अंत के दिन पहले ही आ चुके हैं। सृष्टि की सभी चीज़ें उनके प्रकार के अनुसार अलग की जाएँगी और उनकी प्रकृति के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित की जाएँगी। यही वह क्षण है, जब परमेश्वर लोगों के परिणाम और उनकी मंज़िल प्रकट करता है। यदि लोग ताड़ना और न्याय से नहीं गुज़रते, तो उनकी अवज्ञा और अधार्मिकता को उजागर करने का कोई तरीका नहीं होगा। केवल ताड़ना और न्याय के माध्यम से ही सभी सृजित प्राणियों का परिणाम प्रकट किया जा सकता है। मनुष्य केवल तभी अपने वास्तविक रंग दिखाता है, जब उसे ताड़ना दी जाती है और उसका न्याय किया जाता है। बुरे को बुरे के साथ रखा जाएगा, भले को भले के साथ, और समस्त मनुष्यों को उनके प्रकार के अनुसार अलग किया जाएगा। ताड़ना और न्याय के माध्यम से सभी सृजित प्राणियों का परिणाम प्रकट किया जाएगा, ताकि बुरे को दंडित किया जा सके और अच्छे को पुरस्कृत किया जा सके, और सभी लोग परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन हो जाएँ। यह समस्त कार्य धार्मिक ताड़ना और न्याय के माध्यम से पूरा करना होगा। चूँकि मनुष्य की भ्रष्टता अपने चरम पर पहुँच गई है और उसकी अवज्ञा अत्यंत गंभीर हो गई है, इसलिए केवल परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव ही, जो मुख्यत: ताड़ना और न्याय से संयुक्त है और अंत के दिनों में प्रकट होता है, मनुष्य को रूपांतरित कर सकता है और उसे पूर्ण बना सकता है। केवल यह स्वभाव ही बुराई को उजागर कर सकता है और इस तरह सभी अधार्मिकों को गंभीर रूप से दंडित कर सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)' से उद्धृत

परमेश्वर की ताड़ना और न्याय का सार मानवजाति को शुद्ध करना है, और यह अंतिम विश्राम के दिन के लिए है। अन्यथा, संपूर्ण मानवजाति अपने स्वयं के स्वभाव का अनुसरण करने या विश्राम में प्रवेश करने में समर्थ नहीं होगी। यह कार्य ही मानवजाति के लिए विश्राम में प्रवेश करने का एकमात्र मार्ग है। केवल परमेश्वर द्वारा शुद्ध करने का कार्य ही मानवजाति को उसकी अधार्मिकता से शुद्ध करेगा, और केवल उसका ताड़ना और न्याय का कार्य ही मानव जाति की अवज्ञा की बातों को प्रकाश में लाएगा, फलस्वरूप, जिन्हें बचाया नहीं जा सकता है उनमें से जिन्हें बचाया जा सकता है उन्हें, और जो नहीं बचेंगे उनमें से जो बचेंगे उन्हें अलग करेगा। जब यह कार्य समाप्त हो जाएगा, तो जिन लोगों को बचे रहने की अनुमति मिलेगी वे सभी शुद्ध किए जाएँगे, और वे मानवता के उच्चतर स्तर में प्रवेश करेंगे जहाँ वे एक अद्भुत द्वितीय मानव जीवन का पृथ्वी पर आनंद उठाएँगे; दूसरे शब्दों में, वे मानवजाति के विश्राम में प्रवेश करेंगे और परमेश्वर के साथ-साथ रहेंगे। जो नहीं बच सकते हैं उनके ताड़ना और न्याय से गुजरने के बाद, उनके मूल स्वरूप पूर्णतः प्रकट हो जाएँगे; उसके बाद वे सबके सब नष्ट कर दिए जाएँगे और, शैतान के समान, उन्हें पृथ्वी पर जीवित रहने की अनुमति नहीं होगी। भविष्य की मानवजाति में इस प्रकार के कोई भी लोग शामिल नहीं होंगे; ये लोग अंतिम विश्राम के देश में प्रवेश करने के योग्य नहीं है, न ही ये लोग उस विश्राम के दिन में प्रवेश करने के योग्य हैं जिसे परमेश्वर और मनुष्य दोनों साझा करेंगे, क्योंकि वे दण्ड के लक्ष्य हैं और दुष्ट हैं, और वे धार्मिक लोग नहीं हैं। उन्हें एक बार छुटकारा दिया गया था, और उन्हें न्याय और ताड़ना भी दी गई थी; उन्होंने एक बार परमेश्वर को सेवाएँ भी दी थीं, परंतु जब अंतिम दिन आएगा, तो उन्हें तब भी उनकी अपनी दुष्टता, अवज्ञा व छुटकारा न पाने की योग्यता के कारण दूर और नष्ट कर दिया जाएगा। भविष्य के संसार में उनका अब और अस्तित्व नहीं रहेगा, और भविष्य की मानवजाति के बीच उनका अब और अस्तित्व नहीं रहेगा। जब मानवजाति में से पवित्र लोग विश्राम में प्रवेश करेंगे, तो कोई भी और सभी कुकर्मी और कोई भी और सभी जिन्हें बचाया नहीं गया है इस बात की परवाह किए बिना कि वे मृतकों की आत्माएँ हैं या अभी भी देह में जीवित हैं, नष्ट कर दिए जाएँगे। इस बात की परवाह किए बिना कि ये कुकर्मी लोगों की आत्माएँ और कुकर्मी जीवित लोग हैं, या फिर धार्मिक लोगों की आत्माएँ और वे लोग हैं जो धार्मिक कार्य करते हैं, किस युग से संबंधित हैं, प्रत्येक कुकर्मी नष्ट कर दिया जाएगा, और प्रत्येक धार्मिक व्यक्ति जीवित रहेगा। कोई व्यक्ति या आत्मा उद्धार प्राप्त करती है कि नहीं यह पूर्णतः अंत के युग के समय के कार्य के आधार पर तय नहीं होता है, बल्कि इस आधार पर निर्धारित किया जाता है कि क्या उन्होंने परमेश्वर का प्रतिरोध किया था या वे परमेश्वर की अवज्ञा करते थे। यदि पिछले युगों में लोगों ने बुरा किया और बचाए नहीं जा सके थे, तो वे निःसंदेह दण्ड के भागी बनेंगे। यदि इस युग में लोग बुरा करते हैं और बचाए नहीं जा सकते हैं, तो वे भी निश्चित रूप से दण्ड के लिए भागी हैं। लोग अच्छे और बुरे के आधार पर पृथक किए जाते हैं, युग के आधार पर नहीं। एक बार अच्छे और बुरे के आधार पर अलग-अलग कर दिए जाने पर, लोगों को तुरंत दण्ड या पुरस्कार नहीं दिया जाता है; बल्कि, परमेश्वर अंत के दिनों में अपने विजय के कार्य को समाप्त करने के बाद बुराई को दण्डित करने और अच्छाई को पुरस्कृत करने का अपना कार्य करेगा। वास्तव में, वह अच्छे और बुरे का उपयोग मानवजाति को पृथक करने के लिए तब से कर रहा है जब से उसने मानव जाति के बीच अपना कार्य आरंभ किया था। कार्य का अंत करने पर वह दुष्टों और धार्मिकों को पृथक करने और फिर बुरे को दण्ड और अच्छे को पुरस्कार देने का कार्य आरंभ करने के बजाय, वह अपने कार्य की समाप्ति पर ही केवल धार्मिकों को पुरस्कार और दुष्टों को दण्ड देगा। बुरे को दण्ड और अच्छे को पुरस्कार देने का उसका परम कार्य समस्त मानवजाति को सर्वथा शुद्ध करने के लिए है, ताकि वह पूर्णतः शुद्ध मानवजाति को अनंत विश्राम में ले जाए। उसके कार्य का यह चरण सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य है। यह उसके समस्त प्रबंधन कार्य का अंतिम चरण है। यदि परमेश्वर दुष्टों का नाश नहीं करता बल्कि उन्हें बचा रहने देता तो संपूर्ण मानव जाति अभी भी विश्राम में प्रवेश करने योग्य नहीं होती, और परमेश्वर समस्त मानवजाति को एक बेहतर राज्य में नहीं पहुँचा पाता। इस प्रकार वह कार्य पूर्णतः समाप्त नहीं होता। जब वह अपना कार्य समाप्त कर लेगा, तो संपूर्ण मानव जाति पूर्णतः पवित्र हो जाएगी। केवल इस तरह से ही परमेश्वर शांतिपूर्वक विश्राम में रह सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

अब वह समय है जब मैं प्रत्येक व्यक्ति का अंत करने का निश्चय करता हूँ, उस चरण का नहीं जिस पर मैंने मनुष्यों पर कार्य आरंभ किया था। मैं अपनी अभिलेख पुस्तक में एक-एक करके, प्रत्येक व्यक्ति के कथनों और कार्यों को, और साथ ही मेरा अनुसरण करने में उनके मार्ग को, उनके अंतर्निहित अभिलक्षणों को और उनके अंतिम प्रदर्शन को लिखता हूँ। इस तरह, किसी भी प्रकार का मनुष्य मेरे हाथ से नहीं बचेगा, और सभी अपने स्वयं के प्रकार के लोगों के साथ होंगे, जैसा मैं उन्हें नियत करूँगा। मैं प्रत्येक व्यक्ति की मंज़िल उसकी आयु, वरिष्ठता, पीड़ा की मात्रा के आधार पर नहीं और जिस हद तक वे दया आकर्षित करते हैं उस पर तो बिल्कल भी नहीं बल्कि इस बात के अनुसार तय करता हूँ कि वे सत्य को धारण करते हैं या नहीं। इसे छोड़कर अन्य कोई विकल्प नहीं है। तुम्हें यह अवश्य समझना चाहिए कि वे सब जो परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण नहीं करते हैं, दण्डित किए जाएँगे। यह एक अडिग तथ्य है। इसलिए, वे सब जो दण्ड पाते हैं, वे परमेश्वर की धार्मिकता के कारण और अपने अनगिनत बुरे कार्यों के प्रतिफल के रूप में इस तरह से दण्ड पाते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो' से उद्धृत

मनुष्यों के विश्राम में प्रवेश करने से पहले, हर एक व्यक्ति का दण्ड या पुरस्कार पाना यह इस बात पर आधारित होगा कि क्या वे सत्य की खोज करते हैं, क्या वे परमेश्वर को जानते हैं, क्या वे साक्षात् परमेश्वर की आज्ञा का पालन कर सकते हैं। वे जिन्होंने साक्षात् परमेश्वर को सेवाएँ दीं, पर उसे नहीं जानते या आज्ञापालन नहीं करते हैं, उनमें सत्य नहीं है। ये लोग कुकर्मी हैं, और कुकर्मी निःसंदेह दण्डित किए जाएँगे। इससे अधिक, वे अपने बुरे आचरण के अनुसार दण्ड पाएँगे। परमेश्वर मनुष्यों द्वारा विश्वास किये जाने के लिए है, और वह मनुष्यों के द्वारा आज्ञापालन किये जाने योग्य भी है। वे लोग जो केवल अस्पष्ट और अदृश्य परमेश्वर पर विश्वास करते हैं वे लोग परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं, और वे परमेश्वर की आज्ञा मानने में भी असमर्थ हैं। यदि ये मनुष्य साक्षात् परमेश्वर पर विश्वास नहीं कर पाते, और उसके विजयी किए जाने के कार्य के पूरा होने तक अवज्ञाकरते रहते हैं और परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं—जो देह में दृश्यमान है, तो ये सबसे अधिक अस्पष्ट लोग हैं, और निःसंदेह नष्ट किये जाएँगे। यह उसी प्रकार है जैसे तुम लोगों के बीच यदि कोई मौखिक रूप में देहधारी परमेश्वर को मानता है, परंतु देहधारी परमेश्वर के प्रति सत्य को अमल में नहीं ला पाता है, तो वह अंत में निकाल दिया जाएगा और नष्ट कर दिया जाएगा और यदि कोई मौखिक रूप में साक्षात् परमेश्वर को मानता है और देहधारी परमेश्वर द्वारा अभिव्यक्त सत्य को खाता और पीता है परंतु फिर भी अस्पष्ट और अदृश्य परमेश्वर को खोजता है, तो भविष्य में और भी अधिक उसका नाश किया जाएगा। इन लोगों में से कोई भी, परमेश्वर का कार्य पूरा होने व उसके विश्राम का समय आने तक नहीं बच सकता है; विश्राम के समय जो लोग बच जाएँगे, उनमें इन लोगों के समान कोई भी नहीं होगा। दुष्ट लोग वे हैं जो सत्य पर अमल नहीं करते, उनका मूल तत्व प्रतिरोध करना और परमेश्वर की अवज्ञा करना है, उनमें परमेश्वर की आज्ञा मानने की लेशमात्र भी इच्छा नहीं है। ऐसे सभी लोग नष्ट होंगे। चाहे तुममें सत्य हो, चाहे तुम परमेश्वर का प्रतिरोध करो, इसका निर्धारण तुम्हारे रूपरंग या कुछेक अवसरों पर तुम्हारी बातचीत और आचरण से नहीं, बल्कि तुम्हारे मूलतत्व के आधार पर होगा। प्रत्येक व्यक्ति का मूलतत्व तय करेगा कि उनका नाश किया जाएगा या नहीं, इसका निर्धारण उनके आचरण में प्रकट उनके मूलतत्व और उनकी सत्य की खोज में प्रकट होता है। उन लोगों में जो यही कार्य करते हैं और उतने ही परिमाण में कार्य करते हैं, वे लोग जिनका मानवीय मूलतत्व अच्छा है, और जो सत्य धारण करते हैं, वे ही लोग बच सकते हैं, परंतु वे जिनके मानवीय मूलतत्व बुरे हैं और जो साक्षात् परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करते हैं, वे नष्ट कर दिये जाएँगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

मनुष्य जिस मानक से दूसरे मनुष्य को जाँचता है उसका आधार चरित्र या व्यवहार है; वह जिसका आचरण अच्छा है, वह धार्मिक है, और जिसका आचरण घृणित है, वह दुष्ट है। परमेश्वर जिस मानक से मनुष्य को जाँचता है, उसका आधार है कि क्या व्यक्ति का मूलतत्व परमेश्वर की आज्ञा मानना है, वह जो परमेश्वर की आज्ञा मानता है, धार्मिक है, और जो परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानता है, वह शत्रु और दुष्ट व्यक्ति है—भले ही उस व्यक्ति का आचरण अच्छा हो या बुरा हो, भले ही इस व्यक्ति की वाणी सही हो या गलत हो। कुछ लोग अच्छे कर्मों का भविष्य में एक अच्छी नियति प्राप्त करने के लिए उपयोग करना चाहते हैं, और कुछ लोग अच्छी वाणी का एक अच्छी नियति खरीदने के लिए उपयोग करना चाहते हैं। लोग गलत ढंग से विश्वास करते हैं कि परमेश्वर मनुष्य के व्यवहार या वाणी के अनुसार उसका परिणाम निर्धारित करता है, और इसलिए बहुत से लोग धोखे से अस्थायी अनुग्रह प्राप्त करने के लिए इसका उपयोग करने का प्रयास करते हैं। जो लोग बाद में विश्राम के माध्यम से जीवित बचेंगे उन सबने क्लेश के दिन को सहन किया हुआ होगा और परमेश्वर की गवाही दी हुई होगी; ये वे लोग होंगे जिन्होंने अपने कर्तव्य पूरे किए हैं और परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहते हैं। जो लोग केवल सत्य का अभ्यास करने से बचने के लिए सेवा करने के अवसर का लाभ उठाना चाहते हैं, वे नहीं बच पाएँगे। परमेश्वर के पास सभी लोगों के परिणामों के प्रबंधन के लिए उचित मानदण्ड हैं; वह केवल किसी के वचनों या आचरण के अनुसार इन निर्णयों को नहीं लेता है, न ही वह इन्हें किसी एक समयावधि के दौरान उनके व्यवहार के अनुसार लेता है। वह अतीत में किसी व्यक्ति द्वारा परमेश्वर के लिए की गयी किसी सेवा की वजह से किसी के समस्त दुष्ट व्यवहार के प्रति सर्वथा उदार व्यवहार नहीं करेगा, न ही परमेश्वर के लिए एक बार के व्यय की वजह से किसी को मृत्यु से बचा लेगा। कोई भी अपनी दुष्टता के लिए दण्ड से नहीं बच सकता है, न ही कोई अपने दुष्ट आचरण को छिपा सकता है और फलस्वरूप विनाश की पीड़ा से बच सकता है। यदि कोई वास्तव में अपने कर्तव्यों का पालन कर सकता है, तो इसका अर्थ है कि वह परमेश्वर के प्रति अनंतकाल तक विश्वसनीय है, और पुरस्कार की तलाश नहीं करता है, इस बात की परवाह किए बिना कि चाहे उन्हें आशीषें मिले या वे दुर्भाग्य से पीड़ित हों। यदि आशीषों को देखते समय लोग विश्वसनीय रहते हैं किन्तु जब वे आशीषों को नहीं देख सकते हैं तो विश्वसनीयता खो देते हैं, और अभी भी अंत में वे परमेश्वर की गवाही देने में असमर्थ रहते हैं और अभी भी अपने उन कर्तव्यों को करने में असमर्थ रहते हैं जो उन्हें करने चाहिए, तो ये लोग जिन्होंने किसी समय विश्वसनीयता से परमेश्वर की सेवा की थी, तब भी नष्ट हो जाएँगे। संक्षेप में, दुष्ट लोग अनंतकाल तक जीवित नहीं बच सकते हैं, न ही वे विश्राम में प्रवेश कर सकते हैं; केवल धार्मिक लोग ही विश्राम के अधिकारी हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

चाहे किसी व्यक्ति को आशीषें मिलें या दुर्भाग्य सहना पड़े, इसका निर्धारण व्यक्ति के भाव के अनुसार होगा, यह उस आम भाव के अनुसार नहीं होगा जो वह दूसरों के साथ साझा करता है। राज्य में बस इस प्रकार की लोकोक्ति या इस प्रकार का नियम नहीं है। यदि कोई अंत में बच कर जीवित रहने में सक्षम रहता है, तो ऐसा इसलिए है क्योंकि उसने परमेश्वर की अपेक्षाओं को प्राप्त कर लिया है, और यदि कोई विश्राम के दिनों में बचने में सक्षम नहीं हो पाता है, तो ऐसा इसलिए है क्योंकि वह व्यक्ति परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी नहीं है और उसने परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा नहीं किया है। प्रत्येक की एक अनूकूल नियति है। ये नियतियाँ प्रत्येक व्यक्ति के मूलतत्व के अनुसार निर्धारित होती हैं और दूसरों से इनका कोई संबंध नहीं है। किसी बच्चे का दुष्ट आचरण उसके माता-पिता को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता है, और न ही किसी बच्चे की धार्मिकता को उसके माता-पिता के साथ साझा किया जा सकता है। माता-पिता का दुष्ट आचरण उसकी संतानों को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता है, माता-पिता की धार्मिकता को उनके बच्चों के साथ साझा नहीं किया जा सकता है। हर कोई अपने-अपने पापों को ढोता है। और हर कोई अपने-अपने सौभाग्य का आनंद लेता है। कोई भी दूसरे का स्थान नहीं ले सकता है। यही धार्मिकता है। मनुष्य के विचार में, यदि माता-पिता अच्छा सौभाग्य पाते हैं, तो उनके बच्चे भी वैसा ही पा सकते हैं, यदि बच्चे बुरा करते हैं, उनके पापों के लिए माता-पिता को प्रायश्चित अवश्य करना चाहिए। यह मनुष्य का दृष्टिकोण है, और कार्य करने का मनुष्य का तरीका है। यह परमेश्वर का दृष्टिकोण नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति के परिणाम का निर्धारण उस मूलतत्व के अनुसार होता है जो उसके आचरण से आता है और इसका निर्धारण सदैव उचित तरीके से होता है। कोई भी किसी दूसरे के पापों को नहीं ढो सकता; इससे भी अधिक, कोई भी किसी दूसरे के बदले में दण्ड प्राप्त नहीं कर सकता है। यह परम सिद्धान्त है। माता-पिता का अपनी संतान की बहुत ज़्यादा देखभाल का अर्थ यह नहीं है कि वे अपनी संतान के बदले में धार्मिकता के कर्म कर सकते हैं। न ही किसी बच्चे के अपने माता-पिता के प्रति कर्त्तव्यनिष्ठ स्नेह का यह अर्थ है कि वह अपने माता-पिता के लिए धार्मिकता के कर्म कर सकता है। यही इन वचनों का वास्तविक अर्थ है, "उस समय दो जन खेत में होंगे, एक ले लिया जाएगा और दूसरा छोड़ दिया जाएगा। दो स्त्रियाँ चक्‍की पीसती रहेंगी, एक ले ली जाएगी और दूसरी छोड़ दी जाएगी।" कोई भी अपने बच्चों के लिए अपने गहन प्रेम के आधार पर बुरा कार्य करने वाले अपने बच्चों को विश्राम में नहीं ले जा सकता है, न कोई अपने स्वयं के धार्मिक आचरण के आधार पर अपनी पत्नी (या पति) को विश्राम में पहुँचा सकता है। यह एक प्रशासनिक नियम है; और इसमें किसी के लिए भी कोई अपवाद नहीं हो सकता है। धार्मिकता करने वाले धार्मिकता ही करेंगे और बुरा करने वाले, बुरा ही करेंगे। धार्मिकता करने वाले जीवित बच सकेंगे, और बुरा करने वाले नष्ट हो जाएँगे। जो पवित्र हैं, वे पवित्र हैं; वे अशुद्ध नहीं हैं। जो अशुद्ध हैं वे अशुद्ध हैं, और उनमें पवित्रता का एक अंश भी नहीं है। सभी दुष्ट लोग नष्ट कर दिए जाएँगे, और सभी धार्मिक लोग जीवित बचेंगे, भले ही बुरा कार्य करने वालों की संतानें धार्मिक कर्म करें और भले ही किसी धार्मिक व्यक्ति के माता-पिता दुष्टता के कर्म करें। एक विश्वास करने वाले पति और विश्वास न करने वाली पत्नी के बीच कोई संबंध नहीं है, और विश्वास करने वाले बच्चों और विश्वास न करने वाले माता-पिता के बीच कोई संबंध नहीं है। ये दोनों असंगत प्रकार हैं। विश्राम में प्रवेश से पहले, उसके रक्त-संबंधी थे, किन्तु एक बार विश्राम में प्रवेश कर लेने पर, कहने के लिए उसके कोई रक्त-संबंधी नहीं होंगे। जो अपना कर्तव्य करते हैं और जो नहीं करते हैं वे शत्रु हैं; जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं और जो घृणा करते हैं वे एक दूसरे के विरोध में हैं। जो विश्राम में प्रवेश करते हैं और जो नष्ट किए जा चुके हैं वे दो अलग-अलग असंगत प्रकार के प्राणी है। अपने कर्तव्यों को करने वाले प्राणी जीवित बच पाने में समर्थ होंगे, और अपने कर्तव्यों को पूरा नहीं करने वाले प्राणी नष्ट हो जाएँगे; इसके अलावा, यह सब अनंत काल के लिए होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

क्या अब तुम समझ गए हो कि न्याय क्या है और सत्य क्या है? अगर तुम समझ गए हो, तो मैं तुम्हें न्याय किए जाने के लिए आज्ञाकारी ढंग से समर्पित होने की नसीहत देता हूँ, वरना तुम्हें कभी भी परमेश्वर द्वारा सराहे जाने या उसके द्वारा अपने राज्य में ले जाए जाने का अवसर नहीं मिलेगा। जो केवल न्याय को स्वीकार करते हैं लेकिन कभी शुद्ध नहीं किए जा सकते, अर्थात् जो न्याय के कार्य के बीच से ही भाग जाते हैं, वे हमेशा के लिए परमेश्वर की घृणा के शिकार हो जाएँगे और नकार दिए जाएँगे। फरीसियों के पापों की तुलना में उनके पाप संख्या में बहुत अधिक और ज्यादा संगीन हैं, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया है और वे परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं। ऐसे लोग, जो सेवा करने के भी योग्य नहीं हैं, अधिक कठोर दंड प्राप्त करेंगे, जो चिरस्थायी भी होगा। परमेश्वर ऐसे किसी भी गद्दार को नहीं छोड़ेगा, जिसने एक बार तो वचनों से वफादारी दिखाई, मगर फिर परमेश्वर को धोखा दे दिया। ऐसे लोग आत्मा, प्राण और शरीर के दंड के माध्यम से प्रतिफल प्राप्त करेंगे। क्या यह हूबहू परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का प्रकटन नहीं है? क्या मनुष्य का न्याय करने और उसे उजागर करने में परमेश्वर का यह उद्देश्य नहीं है? परमेश्वर उन सभी को, जो न्याय के समय के दौरान सभी प्रकार के दुष्ट कर्म करते हैं, दुष्टात्माओं से आक्रांत स्थान पर भेजता है, और उन दुष्टात्माओं को इच्छानुसार उनके दैहिक शरीर नष्ट करने देता है, और उन लोगों के शरीरों से लाश की दुर्गंध निकलती है। ऐसा उनका उचित प्रतिशोध है। परमेश्वर उन निष्ठाहीन झूठे विश्वासियों, झूठे प्रेरितों और झूठे कार्यकर्ताओं का हर पाप उनकी अभिलेख-पुस्तकों में लिखता है; और फिर जब सही समय आता है, वह उन्हें गंदी आत्माओं के बीच में फेंक देता है, और उन अशुद्ध आत्माओं को इच्छानुसार उनके संपूर्ण शरीरों को दूषित करने देता है, ताकि वे कभी भी पुन: देहधारण न कर सकें और दोबारा कभी भी रोशनी न देख सकें। वे पाखंडी, जो किसी समय सेवा करते हैं, किंतु अंत तक वफ़ादार बने रहने में असमर्थ रहते हैं, परमेश्वर द्वारा दुष्टों में गिने जाते हैं, ताकि वे दुष्टों की सलाह पर चलें, और उनकी उपद्रवी भीड़ का हिस्सा बन जाएँ; अंत में परमेश्वर उन्हें जड़ से मिटा देगा। परमेश्वर उन लोगों को अलग फेंक देता है और उन पर कोई ध्यान नहीं देता, जो कभी भी मसीह के प्रति वफादार नहीं रहे या जिन्होंने अपने सामर्थ्य का कुछ भी योगदान नहीं किया, और युग बदलने पर वह उन सभी को जड़ से मिटा देगा। वे अब और पृथ्वी पर मौजूद नहीं रहेंगे, परमेश्वर के राज्य का मार्ग तो बिलकुल भी प्राप्त नहीं करेंगे। जो कभी भी परमेश्वर के प्रति ईमानदार नहीं रहे, किंतु उसके साथ बेमन से व्यवहार करने के लिए परिस्थिति द्वारा मजबूर किए जाते हैं, वे परमेश्वर के लोगों की सेवा करने वालों में गिने जाते हैं। ऐसे लोगों की एक छोटी-सी संख्या ही जीवित बचेगी, जबकि बड़ी संख्या उन लोगों के साथ नष्ट हो जाएगी, जो सेवा करने के भी योग्य नहीं हैं। अंतत: परमेश्वर उन सभी को, जिनका मन परमेश्वर के समान है, अपने लोगों और पुत्रों को, और परमेश्वर द्वारा याजक बनाए जाने के लिए पूर्वनियत लोगों को अपने राज्य में ले आएगा। वे परमेश्वर के कार्य के परिणाम होंगे। जहाँ तक उन लोगों का प्रश्न है, जो परमेश्वर द्वारा निर्धारित किसी भी श्रेणी में नहीं आ सकते, वे अविश्वासियों में गिने जाएँगे—तुम लोग निश्चित रूप से कल्पना कर सकते हो कि उनका क्या परिणाम होगा। मैं तुम सभी लोगों से पहले ही वह कह चुका हूँ, जो मुझे कहना चाहिए; जो मार्ग तुम लोग चुनते हो, वह केवल तुम्हारी पसंद है। तुम लोगों को जो समझना चाहिए, वह यह है : परमेश्वर का कार्य ऐसे किसी शख्स का इंतज़ार नहीं करता, जो उसके साथ कदमताल नहीं कर सकता, और परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव किसी भी मनुष्य के प्रति कोई दया नहीं दिखाता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है' से उद्धृत

पिछला: 7. कुछ लोग सोचते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करने का अर्थ है रविवार को कलीसिया में भाग लेने के लिए प्रतिबद्ध होना, दान करना और धर्मार्थी होना, और नियमित रूप से चर्च की गतिविधियों में भाग लेना। उनका मानना है कि इन चीज़ों को करने से उन्हें बचाया जा सकता है। क्या ऐसे विचार परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हैं?

अगला: 2. सीसीपी और धार्मिक दुनिया सर्वशक्तिमान परमेश्वर की निंदा और विरोध करने में, कई अफवाहों और भ्रांतियों को फैलाते हुए, उन्मत्त रही है। परमेश्वर उन लोगों के साथ कैसा व्यवहार करेगा, जो इन अफवाहों और कुरीतियों को आँखें मूँद कर स्वीकार कर लेते हैं, और सही मार्ग की तलाश और जाँच करने का कोई प्रयास नहीं करते हैं? उनका अंत किस तरह का होगा?

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