3. यहूदी धर्म और ईसाई धर्म में भी कई लोग हैं जो सच्चे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, जो उपासना-गृहों और कलीसियाओं में परमेश्वर की पूजा करते हैं, और जो सभी देखने में बहुत पवित्र लगते हैं। यद्यपि कुछ लोग अंतिम दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं, उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया है जो परमेश्वर का प्रकट रूप से विरोध या उसकी निंदा करता हो। क्या परमेश्वर उनके जैसे लोगों को बचाएगा?
संदर्भ के लिए बाइबल के पद :
“क्योंकि परमेश्वर ने कहा है, ‘अपने पिता और अपनी माता का आदर करना’, और ‘जो कोई पिता या माता को बुरा कहे, वह मार डाला जाए।’ पर तुम कहते हो कि यदि कोई अपने पिता या माता से कहे, ‘जो कुछ तुझे मुझ से लाभ पहुँच सकता था, वह परमेश्वर को भेंट चढ़ाया जा चुका’, तो वह अपने पिता का आदर न करे, इस प्रकार तुम ने अपनी परम्परा के कारण परमेश्वर का वचन टाल दिया। हे कपटियो, यशायाह ने तुम्हारे विषय में यह भविष्यद्वाणी ठीक ही की है : ‘ये लोग होठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उनका मन मुझ से दूर रहता है। और ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्यों की विधियों को धर्मोपदेश करके सिखाते हैं’” (मत्ती 15:4-9)।
“जो मुझ से, ‘हे प्रभु! हे प्रभु!’ कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है। उस दिन बहुत से लोग मुझ से कहेंगे, ‘हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत से आश्चर्यकर्म नहीं किए?’ तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा, ‘मैं ने तुम को कभी नहीं जाना। हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ’” (मत्ती 7:21-23)।
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
मनुष्य जिस मानक से दूसरे मनुष्य को आंकता है, वह व्यवहार पर आधारित है; जिनका आचरण अच्छा है वे धार्मिक हैं और जिनका आचरण घृणित है वे बुरे हैं। परमेश्वर जिस मानक से मनुष्यों का न्याय करता है, उसका आधार यह है कि क्या व्यक्ति का सार परमेश्वर को समर्पित है या नहीं; जो परमेश्वर को समर्पित है वह धार्मिक है और जो नहीं है वह शत्रु और बुरा व्यक्ति है, भले ही उस व्यक्ति का आचरण अच्छा हो या बुरा, भले ही इस व्यक्ति की बातें सही हों या गलत हों। कुछ लोग अच्छे कर्मों का उपयोग भविष्य में अच्छी मंज़िल प्राप्त करने के लिए करना चाहते हैं और कुछ लोग अच्छी वाणी का उपयोग एक अच्छी मंज़िल हासिल करने में करना चाहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति का यह ग़लत विश्वास है कि परमेश्वर मनुष्य के व्यवहार को देखकर या उनकी बातें सुनकर उसका परिणाम निर्धारित करता है; इसलिए बहुत से लोग परमेश्वर को धोखा देने के लिए इसका फ़ायदा उठाना चाहते हैं, ताकि वह उन पर क्षणिक कृपा कर दे। भविष्य में, जो लोग विश्राम की अवस्था में जीवित बचेंगे, उन सभी ने क्लेश के दिन को सहन किया हुआ होगा और परमेश्वर की गवाही दी हुई होगी; ये वे सब लोग होंगे, जिन्होंने अपने कर्तव्य पूरे किए हैं और जिन्होंने जानबूझकर परमेश्वर को समर्पण किया है। जो केवल सत्य का अभ्यास करने से बचने के इरादे से सिर्फ सेवा करने के अवसर का लाभ उठाना चाहते हैं, उन्हें रहने नहीं दिया जाएगा। प्रत्येक व्यक्ति के परिणाम की व्यवस्था के लिए परमेश्वर के पास उचित मानक हैं; वह केवल यूँ ही किसी के शब्दों या आचरण के अनुसार ये निर्णय नहीं लेता, न ही वह एक अवधि के दौरान किसी के व्यवहार के अनुसार निर्णय लेता है। अतीत में किसी व्यक्ति द्वारा परमेश्वर के लिए की गई किसी सेवा की वजह से वह किसी के बुरे आचरण के प्रति नर्मी कतई नहीं बरतेगा, न ही वह परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाने की समय अवधि बिताने के कारण किसी को मृत्यु से बचाएगा। कोई भी अपनी बुराई के प्रतिफल से नहीं बच सकता, न ही कोई अपने बुरे व्यवहार को छिपा सकता है और फलस्वरूप विनाश की पीड़ा से बच सकता है। यदि लोग वास्तव में अपने कर्तव्य का अच्छे से पालन कर सकते हैं, तो इसका अर्थ है कि वे अनंतकाल तक परमेश्वर के प्रति वफादार हैं और उन्हें इसकी परवाह नहीं होती कि उन्हें आशीष मिलते हैं या वे दुर्भाग्य से पीड़ित होते हैं, वे पुरस्कार की तलाश नहीं करते। यदि लोग आशीष दिखने पर परमेश्वर के लिए निष्ठावान रहते हैं और आशीष न दिखने पर अपनी निष्ठा खो देते हैं और अगर ये लोग—जिन्होंने कभी परमेश्वर के लिए निष्ठापूर्वक श्रम किया था—अंत में परमेश्वर के लिए गवाही देने या अपने जिम्मे आए कर्तव्य पूरे करने में असमर्थ हैं तो ऐसे लोग अभी भी विनाश की वस्तु होंगे। संक्षेप में, बुरे लोग अनंतकाल तक जीवित नहीं रह सकते, न ही वे विश्राम में प्रवेश कर सकते हैं; केवल धार्मिक लोग ही विश्राम के स्वामी हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे
परमेश्वर का अनुसरण करने में प्रमुख महत्व इस बात का है कि हर चीज आज परमेश्वर के वचनों के अनुसार होनी चाहिए : चाहे तुम जीवन प्रवेश का अनुसरण कर रहे हो या परमेश्वर के इरादों को पूरा कर रहे हो, सब कुछ आज परमेश्वर के वचनों के आसपास ही केंद्रित होना चाहिए। यदि तुम जिस बारे में संगति करते हो और जिसमें प्रवेश करना चाहते हो, वह आज परमेश्वर के वचनों के आसपास केंद्रित नहीं है, तो तुम परमेश्वर के वचनों के लिए एक अजनबी हो और पवित्र आत्मा के कार्य से पूरी तरह से परे हो। परमेश्वर ऐसे लोग चाहता है जो उसके पदचिह्नों का अनुसरण करें। भले ही जो तुमने पहले समझा था वह कितना ही अद्भुत और शुद्ध क्यों न हो, परमेश्वर उसे नहीं चाहता और यदि तुम ऐसी चीजों को दूर नहीं कर सकते, तो वो भविष्य में तुम्हारे प्रवेश के लिए एक भयंकर बाधा होंगी। वो सभी धन्य हैं, जो पवित्र आत्मा के वर्तमान प्रकाश का अनुसरण करने में सक्षम हैं। पिछले युगों के लोग भी परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलते थे, फिर भी वो आज तक इसका अनुसरण नहीं कर सके; यह आखिरी दिनों के लोगों के लिए आशीर्वाद है। जो लोग पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य का अनुसरण कर सकते हैं और जो परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलने में सक्षम हैं, इस तरह कि चाहे परमेश्वर उन्हें जहाँ भी ले जाए वो उसका अनुसरण करते हैं—ये वो लोग हैं, जिन्हें परमेश्वर का आशीर्वाद प्राप्त है। जो लोग पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य का अनुसरण नहीं करते हैं, उन्होंने परमेश्वर के वचनों के कार्य में प्रवेश नहीं किया है और चाहे वो कितना भी काम करें या उनकी पीड़ा जितनी भी ज़्यादा हो या वो कितनी ही भागदौड़ करें, परमेश्वर के लिए इनमें से किसी बात का कोई महत्व नहीं और वह उन्हें स्वीकार नहीं करेगा। आज वो सभी जो परमेश्वर के वर्तमान वचनों का पालन करते हैं, वो पवित्र आत्मा के प्रवाह में हैं; जो लोग आज परमेश्वर के वचनों से अनभिज्ञ हैं, वो पवित्र आत्मा के प्रवाह से बाहर हैं और ऐसे लोगों को परमेश्वर द्वारा स्वीकार नहीं किया जाता। वह सेवा जो पवित्र आत्मा के वर्तमान कथनों से जुदा हो, वह देह और धारणाओं की सेवा है और इसका परमेश्वर के इरादों के अनुसार होना असंभव है। यदि लोग धार्मिक धारणाओं में रहते हैं, तो वो ऐसा कुछ भी करने में असमर्थ होते हैं, जो परमेश्वर के इरादों के अनुरूप हो और भले ही वो परमेश्वर की सेवा करें, वो अपनी कल्पनाओं और धारणाओं के घेरे में ही सेवा करते हैं और परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा करने में पूरी तरह असमर्थ होते हैं। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करने में असमर्थ हैं, वो परमेश्वर के इरादों को नहीं समझते और जो परमेश्वर के इरादों को नहीं समझते, वो परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकते। परमेश्वर ऐसी सेवा चाहता है जो उसके इरादों के अनुरूप हो; वह ऐसी सेवा नहीं चाहता, जो धारणाओं और देह की हो। यदि लोग पवित्र आत्मा के कार्य के चरणों का पालन करने में असमर्थ हैं, तो वो धारणाओं के बीच रहते हैं। ऐसे लोगों की सेवा गड़बड़ी और विघ्न पैदा करती है और ऐसी सेवा परमेश्वर के विरुद्ध चलती है। इस प्रकार, जो लोग परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलने में असमर्थ हैं, वो परमेश्वर की सेवा करने में असमर्थ हैं; जो लोग परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलने में असमर्थ हैं, वो निश्चित रूप से परमेश्वर का विरोध करते हैं और वो परमेश्वर के साथ सुसंगत होने में असमर्थ हैं। “पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण” करने का मतलब है आज परमेश्वर के इरादों को समझना, परमेश्वर की वर्तमान अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करने में सक्षम होना, आज के परमेश्वर का अनुसरण और उसके प्रति समर्पण करने में सक्षम होना और परमेश्वर के नवीनतम कथनों के अनुसार प्रवेश करना। केवल यही ऐसा है, जो पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करता है और पवित्र आत्मा के प्रवाह में है। ऐसे लोग न केवल परमेश्वर की सराहना प्राप्त करने और परमेश्वर को देखने में सक्षम हैं बल्कि परमेश्वर के नवीनतम कार्य से परमेश्वर के स्वभाव को भी जान सकते हैं और परमेश्वर के नवीनतम कार्य से मनुष्य की धारणाओं और उसके विद्रोह को, मनुष्य की प्रकृति और सार को जान सकते हैं; इसके अलावा, वो अपनी सेवा के दौरान धीरे-धीरे अपने स्वभाव में परिवर्तन हासिल करने में सक्षम होते हैं। केवल ऐसे लोग ही हैं, जो परमेश्वर को प्राप्त करने में सक्षम हैं और जो सचमुच में सच्चा मार्ग पा चुके हैं। जिन लोगों को पवित्र आत्मा के कार्य से निकाल दिया गया है, वो लोग हैं, जो परमेश्वर के नवीनतम कार्य का अनुसरण करने में असमर्थ हैं और जो परमेश्वर के नवीनतम कार्य के विरुद्ध विद्रोह करते हैं। ऐसे लोग खुलेआम परमेश्वर का विरोध इसलिए करते हैं क्योंकि परमेश्वर ने नया कार्य किया है और क्योंकि परमेश्वर की छवि उनकी धारणाओं के अनुरूप नहीं है—जिसके परिणामस्वरूप वो परमेश्वर का खुलेआम विरोध करते हैं और परमेश्वर पर निर्णय देते हैं, जिसके नतीजे में परमेश्वर उन्हें ठुकरा देता है। परमेश्वर के नवीनतम कार्य का ज्ञान रखना कोई आसान बात नहीं है, लेकिन अगर लोगों में परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण करने और परमेश्वर के कार्य की तलाश करने का ज्ञान है, तो उन्हें परमेश्वर को देखने का मौका मिलेगा, और उन्हें पवित्र आत्मा का नवीनतम मार्गदर्शन प्राप्त करने का मौका मिलेगा। जो जानबूझकर परमेश्वर के कार्य का विरोध करते हैं, वो पवित्र आत्मा के प्रबोधन या परमेश्वर के मार्गदर्शन को प्राप्त नहीं कर सकते; इस प्रकार, लोग परमेश्वर का नवीनतम कार्य प्राप्त कर पाते हैं या नहीं, यह परमेश्वर के अनुग्रह पर निर्भर करता है, यह उनके अनुसरण पर निर्भर करता है और यह उनके इरादोंपर निर्भर करता है।
वो सभी धन्य हैं जो पवित्र आत्मा के वर्तमान कथनों के प्रति समर्पण करने में सक्षम हैं। इस बात से कोई फ़र्कनहीं पड़ता कि वो कैसे हुआ करते थे या उनके भीतर पवित्र आत्मा कैसे कार्य कियाकरती थी—जिन्होंने परमेश्वर का नवीनतम कार्य प्राप्त किया है, वो सबसे अधिक धन्य हैं और जो लोग आज नवीनतम कार्य का अनुसरण नहीं कर पाते, वे निकाल दिए जाते हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो
परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण में मनुष्य से तद्नुरूपी अपेक्षाएँ भी होती हैं। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा के भीतर हैं, वे सभी पवित्र आत्मा की उपस्थिति और अनुशासन के अधीन हैं, और जो पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में नहीं हैं, वे शैतान के नियंत्रण में और पवित्र आत्मा के किसी भी कार्य से रहित हैं। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा में हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करते हैं और उसमें सहयोग करते हैं। यदि इस मुख्य धारा में मौजूद लोग सहयोग करने में अक्षम रहते हैं और इस दौरान परमेश्वर द्वारा अपेक्षित सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ रहते हैं, तो उन्हें अनुशासित किया जाएगा, और सबसे खराब बात यह होगी कि उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा त्याग दिया जाएगा। जो पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार करते हैं, वे पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में जीएँगे और पवित्र आत्मा की देखभाल और सुरक्षा प्राप्त करेंगे। जो लोग सत्य को अभ्यास में लाने के इच्छुक हैं, उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध किया जाता है, और जो लोग सत्य को अभ्यास में लाने के अनिच्छुक हैं, उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा अनुशासित किया जाता है, यहाँ तक कि उन्हें दंड भी दिया जा सकता है। चाहे वे किसी भी प्रकार के व्यक्ति हों, यदि वे पवित्र आत्मा की मुख्य धारा के भीतर हैं, तो परमेश्वर उन सभी लोगों की ज़िम्मेदारी लेगा, जो उसके नाम की खातिर उसके नए कार्य को स्वीकार करते हैं। जो लोग उसके नाम को महिमामंडित करते हैं और उसके वचनों को अभ्यास में लाने के इच्छुक हैं, वे उसके आशीष प्राप्त करेंगे; जो लोग उससे विद्रोह करते हैं और उसके वचनों को अभ्यास में नहीं लाते, वे उसका दंड प्राप्त करेंगे। जो लोग पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में हैं, वे वो लोग हैं जो नए कार्य को स्वीकार करते हैं, और चूँकि उन्होंने नए कार्य को स्वीकार कर लिया है, इसलिए उन्हें परमेश्वर के साथ उचित सहयोग करना चाहिए, और उन विद्रोहियों के समान कार्य नहीं करना चाहिए, जो अपना कर्तव्य नहीं निभाते। यह मनुष्य से परमेश्वर की एकमात्र अपेक्षा है। यह उन लोगों के लिए नहीं है, जो नए कार्य को स्वीकार नहीं करते : वे पवित्र आत्मा की धारा से बाहर हैं, और पवित्र आत्मा का अनुशासन और फटकार उन पर लागू नहीं होते। पूरे दिन ये लोग देह में जीते हैं, अपने मस्तिष्क के भीतर जीते हैं, और वे जो कुछ भी करते हैं, वह सब उनके अपने मस्तिष्क के विश्लेषण और अनुसंधान से उत्पन्न हुए सिद्धांत के अनुसार होता है। यह वह नहीं है, जो पवित्र आत्मा के नए कार्य द्वारा अपेक्षित है, और यह परमेश्वर के साथ सहयोग तो बिल्कुल भी नहीं है। जो लोग परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं करते, वे परमेश्वर की उपस्थिति से वंचित रहते हैं, और, इससे भी बढ़कर, वे परमेश्वर के आशीषों और सुरक्षा से रहित होते हैं। उनके अधिकांश वचन और कार्य पवित्र आत्मा की पुरानी अपेक्षाओं को थामे रहते हैं; वे सिद्धांत हैं, सत्य नहीं। ऐसे सिद्धांत और विनियम यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि इन लोगों का एक-साथ इकट्ठा होना धर्म के अलावा कुछ नहीं है; वे चुने हुए लोग या परमेश्वर के कार्य के लक्ष्य नहीं हैं। उनमें से सभी लोगों की सभा को मात्र धर्म का महासम्मेलन कहा जा सकता है, उन्हें कलीसिया नहीं कहा जा सकता। यह एक अपरिवर्तनीय तथ्य है। उनके पास पवित्र आत्मा का नया कार्य नहीं है; जो कुछ वे करते हैं वह धर्म का द्योतक प्रतीत होता है, जैसा जीवन वे जीते हैं वह धर्म से भरा हुआ प्रतीत होता है; उनमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति और कार्य नहीं होता, और वे पवित्र आत्मा का अनुशासन या प्रबुद्धता प्राप्त करने के लायक तो बिल्कुल भी नहीं हैं। ये समस्त लोग निर्जीव लाशें और कीड़े हैं, जो आध्यात्मिकता से रहित हैं। उन्हें मनुष्य की विद्रोहशीलता और विरोध का कोई ज्ञान नहीं है, मनुष्य के समस्त कुकर्मों का कोई ज्ञान नहीं है, और वे परमेश्वर के समस्त कार्य और परमेश्वर के वर्तमान इरादों को तो बिल्कुल भी नहीं जानते। वे सभी अज्ञानी, अधम लोग हैं, और वे कूडा-करकट हैं जो विश्वासी कहलाने के योग्य नहीं हैं! वे जो कुछ भी करते हैं, उसका परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के साथ कोई संबंध नहीं है, और वह परमेश्वर के कार्य को बिगाड़ तो बिल्कुल भी नहीं सकता। उनके वचन और कार्य अत्यंत घृणास्पद, अत्यंत दयनीय, और एकदम अनुल्लेखनीय हैं। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा में नहीं हैं, उनके द्वारा किए गए किसी भी कार्य का पवित्र आत्मा के नए कार्य के साथ कोई लेना-देना नहीं है। इस वजह से, चाहे वे कुछ भी क्यों न करें, वे पवित्र आत्मा के अनुशासन से रहित होते हैं, और, इससे भी बढ़कर, वे पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता से रहित होते हैं। कारण, वे सभी ऐसे लोग हैं, जिन्हें सत्य से कोई प्रेम नहीं है, और जिन्हें पवित्र आत्मा ने तिरस्कृत कर दिया है। उन्हें कुकर्मी कहा जाता हैं, क्योंकि वे देह के अनुसार चलते हैं, और परमेश्वर के नाम की तख्ती के नीचे जो उन्हें अच्छा लगता है, वही करते हैं। जब परमेश्वर कार्य करता है, तो वे जानबूझकर उसके प्रति शत्रुता रखते हैं और उसकी विपरीत दिशा में दौड़ते हैं। परमेश्वर के साथ सहयोग करने में मनुष्य की असफलता अपने आप में चरम रूप से विद्रोही है, इसलिए क्या वे लोग, जो जानबूझकर परमेश्वर के प्रतिकूल चलते हैं, विशेष रूप से अपना उचित प्रतिफल प्राप्त नहीं करेंगे?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास
व्यवस्था के युग के वे यहूदी फरीसी, मुख्य याजक, और धर्मशास्त्री, नाममात्र के लिए परमेश्वर में विश्वास रखते थे, लेकिन उन्होंने उसके मार्ग को पीठ दिखाई, और यहाँ तक कि देहधारी परमेश्वर को सूली पर चढ़ा दिया। तो क्या उनके विश्वास को परमेश्वर की स्वीकृति मिल सकती थी? (नहीं।) परमेश्वर ने उन्हें पहले ही यहूदी आस्था के लोगों के रूप में, एक धार्मिक समूह के सदस्यों के रूप में निरूपित कर रखा था। और इसी तरह आज परमेश्वर, यीशु में विश्वास रखने वालों को एक धार्मिक समूह के सदस्यों के रूप में देखता है, इस अर्थ में कि वह उन्हें अपनी कलीसिया के सदस्यों के रूप में या अपने विश्वासियों के रूप में स्वीकार नहीं करता। परमेश्वर धार्मिक जगत की इस प्रकार निंदा क्यों करता होगा? इसलिए कि धार्मिक समूहों के सभी सदस्यों, विशेष तौर पर विभिन्न संप्रदायों के उच्च-स्तरीय अगुआओं के पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल नहीं होता, न ही वे परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण करने वाले होते हैं। वे सब छद्म-विश्वासी हैं। वे देहधारण में विश्वास नहीं करते हैं, सत्य को स्वीकारना तो दूर की बात है। वे कभी नहीं खोजते, सवाल नहीं पूछते, जाँच नहीं करते या अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य या उसके द्वारा व्यक्त किए गए सत्य को स्वीकार नहीं करते हैं, इसके बजाय वे अंत के दिनों में देहधारी परमेश्वर के कार्य की भर्त्सना और ईशनिंदा करते हैं। इसमें व्यक्ति स्पष्ट तौर पर देख सकता है कि वे शायद परमेश्वर में नाममात्र के लिए विश्वास रखते हों, मगर परमेश्वर उन्हें अपने विश्वासियों के रूप में स्वीकार नहीं करता है; वह कहता है कि वे कुकर्मी हैं, कि वे जो भी करते हैं उसका उसके उद्धार के कार्य से जरा भी संबंध नहीं है, वे गैर-विश्वासी हैं जो उसके वचनों से बाहर हैं। अगर तुम लोग परमेश्वर में विश्वास रखते हो जैसा कि तुम अभी रखते हो, तो क्या वह दिन नहीं आएगा जब तुम लोग भी बस धार्मिक अनुयायी बन कर रह जाओगे? धर्म के भीतर रहकर परमेश्वर में विश्वास रखने से उद्धार प्राप्त नहीं हो सकता—ऐसा आखिर क्यों है? अगर तुम लोग नहीं बता सकते कि ऐसा क्यों है, तो यह दर्शाता है कि तुम लोग बिल्कुल भी न तो सत्य समझते हो, न ही परमेश्वर के इरादे समझते हो। परमेश्वर में विश्वास के साथ सबसे बड़ी त्रासदी यही हो सकती है कि वह धर्म बनकर रह जाए और परमेश्वर उसे खत्म कर दे। मनुष्य के लिए यह अकल्पनीय है, और जो लोग सत्य नहीं समझते, वे इस मामले को कभी स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते। मुझे बताओ, जब एक कलीसिया परमेश्वर की दृष्टि में धीरे-धीरे धर्म में तब्दील हो चुकी होती है और अपनी स्थापना के बाद बहुत सारे वर्षों से गुजरकर एक संप्रदाय बन चुकी होती है तो क्या इसके लोग परमेश्वर के उद्धार के पात्र हैं? क्या वे उसके परिवार के सदस्य हैं? (नहीं।) वे सदस्य नहीं हैं। ये लोग, जो सच्चे परमेश्वर में केवल नाममात्र के लिए विश्वास रखते हैं, फिर भी वह उन्हें धार्मिक दिखावे वाले लोग मानता है; ये किस मार्ग पर चलते हैं? जिस मार्ग पर वे चलते हैं उस पर वे परमेश्वर में विश्वास की पताका लिए होते हैं, फिर भी वे कभी उसके मार्ग का अनुसरण नहीं करते; यह ऐसा मार्ग है जिस पर वे उसमें विश्वास तो रखते हैं फिर भी उसकी आराधना नहीं करते, यहाँ तक कि वे उसे त्याग देते हैं; यह ऐसा मार्ग है जिस पर वे परमेश्वर में विश्वास रखने का दावा करते हैं, फिर भी उसका प्रतिरोध करते हैं, परमेश्वर के नाम में, सच्चे परमेश्वर में नाममात्र के लिए विश्वास रखते हैं, फिर भी शैतान और दानवों की आराधना करते हैं, और अपने मानवीय उद्यम को संचालित करते हुए एक स्वतंत्र मानवी राज्य की स्थापना करते हैं। यही वो मार्ग है जिस पर वे चलते हैं। उनके चलने का मार्ग देखने से यह स्पष्ट है कि वे छद्म-विश्वासियों का जत्था हैं, मसीह-विरोधियों का गिरोह हैं, उन शैतानों और दानवों का समूह हैं जो स्पष्ट रूप से परमेश्वर का प्रतिरोध करने और उसके कार्य को बाधित करने के लिए निकल पड़े हैं। धार्मिक जगत का यही सार है। क्या ऐसे लोगों के समूह का मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की प्रबंधन योजना से कोई सरोकार है? (नहीं।) अगर परमेश्वर के विश्वासियों ने, वे चाहे जितने भी हों, अपने विश्वास को परमेश्वर से एक धार्मिक समूह के विश्वास के रूप में निरूपित करा दिया तो ये लोग परमेश्वर के कार्य और उद्धार के पात्र नहीं हैं और परमेश्वर इस बारे में पहले ही मन बना चुका है—इन लोगों को बचाया नहीं जा सकता। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? परमेश्वर के कार्य या मार्गदर्शन के बिना एक समूह जो बिल्कुल भी न उसके सामने समर्पण करता है और न उसकी आराधना करता है, शायद वह नाममात्र के लिए उसमें विश्वास रखता हो, लेकिन वह धर्म के पादरियों और एल्डरों का ही अनुसरण और पालन करता है, और धर्म के पादरी और एल्डर अपने सार से ही शैतान के और पाखंडी होते हैं। इसलिए, वे लोग जिनका अनुसरण और पालन करते हैं वे शैतान और दानव हैं। वे अपने दिलों में परमेश्वर में विश्वास का अभ्यास करते हैं, लेकिन दरअसल, मनुष्य उनके साथ हेर-फेर करता है, वे इंसानी आयोजनों और वर्चस्व के अधीन होते हैं। तो, अनिवार्यतः वे जिनका अनुसरण और पालन करते हैं वे शैतान और दानव हैं, परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाली दुराचारी शक्तियाँ हैं, और परमेश्वर के शत्रु हैं। क्या परमेश्वर ऐसे लोगों के गिरोह को बचाएगा? (नहीं।) क्यों नहीं? देखो, क्या ऐसे लोग पश्चात्ताप करने में सक्षम होते हैं? नहीं; वे पश्चात्ताप नहीं करेंगे। वे परमेश्वर में आस्था की पताका के नीचे इंसानी कामकाज और उद्यमों से जुड़ जाते हैं, जोकि मनुष्य के उद्धार हेतु परमेश्वर की प्रबंधन योजना के विपरीत है, जिसका अंतिम परिणाम यह होता है कि परमेश्वर उन्हें ठुकरा देगा। परमेश्वर द्वारा इन लोगों को बचाना असंभव है; वे पश्चात्ताप करने में सक्षम नहीं हैं और चूँकि वे शैतान के कब्जे में आ गए हैं, इसलिए परमेश्वर इन लोगों को उसे ही सौंप देता है। परमेश्वर में किसी की आस्था को परमेश्वर की स्वीकृति मिल सकेगी या नहीं, क्या यह उसकी परमेश्वर में आस्था की अवधि पर निर्भर करता है? क्या यह किसी के द्वारा किए जाने वाले अनुष्ठानों या माने जाने वाले विनियमों के प्रकार पर निर्भर करता है? क्या परमेश्वर इंसानी प्रथाओं को देखता है? क्या वह उनकी संख्या देखता है? (नहीं।) तो फिर वह किस बात पर गौर करता है? जब परमेश्वर लोगों के एक समूह को चुनता है, तो वह किस आधार पर यह मापता है कि उन्हें बचाया जा सकता है कि नहीं और वह उन्हें बचाएगा कि नहीं? यह इस पर आधारित है कि वे सत्य को स्वीकार कर सकते हैं कि नहीं; यह उस मार्ग पर आधारित है जिस पर वे चलते हैं। हालाँकि परमेश्वर ने अनुग्रह के युग में मनुष्य को उतने सत्य नहीं बताए होंगे, जितने वह आज बताता है, और हालाँकि वे इतने विनिर्दिष्ट नहीं थे, फिर भी वह उस समय भी मनुष्य को पूर्ण करने में सक्षम था, और ऐसे लोग भी थे जो बचाए जा सके। तो आज के युग के लोग, जिन्होंने इतने सत्य सुने हैं और जो परमेश्वर के इरादे समझते हैं, अगर उसके मार्ग का अनुसरण नहीं कर सकते, या उद्धार के मार्ग पर नहीं चल सकते, तो अंत में उनका परिणाम क्या होगा? उनका अंतिम परिणाम वैसा ही होगा जैसा ईसाई धर्म और यहूदी धर्म के विश्वासियों का हुआ—उन्हीं की तरह उन्हें भी बचाया नहीं जा सकेगा। यह परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव है। तुमने चाहे जितने भी धर्मोपदेश सुने हों, जितने भी सत्य समझ लिए हों, कोई फर्क नहीं पड़ता—अगर तुम अभी भी मनुष्य का अनुसरण करते हो, अभी भी शैतान का अनुसरण करते हो, और अंत में परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करने में सक्षम नहीं हो पाते हो, न ही उसका भय मान पाते हो, और बुराई से दूर रह पाते हो, तो ऐसे लोगों को परमेश्वर ठुकरा देता है। संभव है धर्म के लोग बाइबल के विशाल ज्ञान का प्रचार करने में सक्षम हों, और वे कुछ आध्यात्मिक धर्म-सिद्धांत समझते हों, लेकिन वे परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण नहीं कर पाते, उसके वचनों का अभ्यास और अनुभव नहीं कर पाते, या सच्चे दिल से उसकी आराधना नहीं कर पाते, न ही वे उसका भय मान पाते हैं और न बुराई से दूर रह पाते हैं। वे सब पाखंडी हैं, वे ऐसे लोग नहीं हैं जो सच्चे दिल से परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं। परमेश्वर की दृष्टि में, ऐसे लोगों को एक संप्रदाय, एक इंसानी समूह या इंसानी गिरोह और शैतान के बसेरे के रूप में परिभाषित किया जाता है। सामूहिक रूप में, वे शैतान के गिरोह हैं, मसीह-विरोधियों का राज्य हैं, और परमेश्वर उन्हें पूरी तरह ठुकरा देता है।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर का भय मानकर ही इंसान उद्धार के मार्ग पर चल सकता है
जो लोग मसीह द्वारा बोले गए सत्य पर भरोसा किए बिना जीवन प्राप्त करना चाहते हैं, वे पृथ्वी पर सबसे बेतुके लोग हैं, और जो मसीह द्वारा लाए गए जीवन के मार्ग को स्वीकार नहीं करते, वे कोरी कल्पना में खोए हैं। और इसलिए मैं कहता हूँ कि जो लोग अंत के दिनों के मसीह को स्वीकार नहीं करते, उनसे परमेश्वर हमेशा घृणा करेगा। मसीह अंत के दिनों के राज्य के लिए मनुष्य का प्रवेशद्वार है और ऐसा कोई नहीं है जो उसे लाँघकर निकल सके। मसीह के माध्यम के अलावा किसी भी दूसरे तरीके से किसी को भी परमेश्वर द्वारा पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें उसके वचन स्वीकारने चाहिए और उसके वचन के प्रति समर्पण करना चाहिए। सत्य और जीवन के प्रावधान को स्वीकारने में असमर्थ रहते हुए केवल आशीष प्राप्त करने की मत सोचो। मसीह अंत के दिनों में इसलिए आया है ताकि वह उन सबको जीवन प्रदान कर सके जो उसमें ईमानदारी से विश्वास रखते हैं। यह कार्य पुराने युग को समाप्त करने और नए युग में प्रवेश करने के लिए है, और यह कार्य वह मार्ग है जिसे नए युग में प्रवेश करने वाले सभी लोगों को अपनाना चाहिए। यदि तुम मसीह को नहीं स्वीकारते और यही नहीं, उसकी भर्त्सना, ईशनिंदा या उसका उत्पीड़न करते हो, तो तुम्हें अनंतकाल तक जलाया जाना तय है और तुम परमेश्वर के राज्य में कभी प्रवेश नहीं करोगे। ऐसा इसलिए क्योंकि यह मसीह स्वयं पवित्र आत्मा की अभिव्यक्ति है, परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, वह है जिसे परमेश्वर ने अपना कार्य पृथ्वी पर करने के लिए सौंपा है, और इसलिए मैं कहता हूँ कि यदि तुम वह सब स्वीकार नहीं करते जो अंत के दिनों के मसीह द्वारा किया जाता है, तो तुम पवित्र आत्मा की ईशनिंदा करते हो। पवित्र आत्मा की ईशनिंदा करने वाले जिस प्रतिफल के पात्र हैं, वह सभी को स्वतः स्पष्ट है। मैं तुम्हें यह भी बताता हूँ : अगर तुम अंत के दिनों के मसीह का प्रतिरोध करते हो, अगर तुम अंत के दिनों के मसीह को नकारते हो तो कोई भी अन्य तुम्हारे बदले में इसका अंजाम नहीं भुगत सकता है। इतना ही नहीं, उस बिंदु के बाद तुम्हें परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करने का दूसरा अवसर नहीं मिलेगा; यदि तुम अपने तौर-तरीके सुधारना भी चाहो, तब भी तुम दोबारा कभी परमेश्वर का चेहरा नहीं देख पाओगे। ऐसा इसलिए क्योंकि तुम जिसका प्रतिरोध कर रहे हो वह मानव नहीं है, तुम जिसे अस्वीकार कर रहे हो वह कोई तुच्छ व्यक्ति नहीं है, बल्कि मसीह है। क्या तुम जानते हो कि इसके क्या दुष्परिणाम हैं? तुम कोई छोटी-मोटी गलती नहीं कर रहे हो, बल्कि एक जघन्य पाप कर रहे हो। और इसलिए मैं हर व्यक्ति को सलाह देता हूँ कि सत्य के सामने अपने नुकीले दाँत और पंजे मत दिखाओ या मनमानी आलोचना मत करो, क्योंकि केवल सत्य ही तुम्हें जीवन दिला सकता है, और सत्य के अलावा कुछ भी तुम्हें पुनः जन्म लेने या दोबारा परमेश्वर का चेहरा देखने में सक्षम नहीं बना सकता।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है