2. पहले, मुझमें विवेक की कमी थी। मैंने अंतिम दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य का विरोध करने और उसकी निंदा करने में पादरियों और एल्डर्स का अनुसरण किया, और निंदा करने में उनके साथ हो लिया। क्या परमेश्वर फिर भी मुझे बचाएगा?
संदर्भ के लिए बाइबल के पद :
“जब धर्मी अपने धर्म से फिरकर, टेढ़े काम करने लगे, तो वह उनके कारण मरेगा, अर्थात् वह अपने टेढ़े काम ही के कारण मर जाएगा। फिर जब दुष्ट अपने दुष्ट कामों से फिरकर, न्याय और धर्म के काम करने लगे, तो वह अपना प्राण बचाएगा। वह जो सोच विचार कर अपने सब अपराधों से फिरा, इस कारण न मरेगा, जीवित ही रहेगा” (यहेजकेल 18:26-28)।
“तब यहोवा का यह वचन दूसरी बार योना के पास पहुँचा : ‘उठकर उस बड़े नगर नीनवे को जा, और जो बात मैं तुझ से कहूँगा, उसका उस में प्रचार कर।’ तब योना यहोवा के वचन के अनुसार नीनवे को गया। नीनवे एक बहुत बड़ा नगर था, वह तीन दिन की यात्रा का था। योना ने नगर में प्रवेश करके एक दिन की यात्रा पूरी की, और यह प्रचार करता गया, ‘अब से चालीस दिन के बीतने पर नीनवे उलट दिया जाएगा।’ तब नीनवे के मनुष्यों ने परमेश्वर के वचन की प्रतीति की; और उपवास का प्रचार किया गया और बड़े से लेकर छोटे तक सभों ने टाट ओढ़ा। तब यह समाचार नीनवे के राजा के कान में पहुँचा; और उसने सिंहासन पर से उठ, अपने राजकीय वस्त्र उतारकर टाट ओढ़ लिया, और राख पर बैठ गया। राजा ने प्रधानों से सम्मति लेकर नीनवे में इस आज्ञा का ढिंढोरा पिटवाया : ‘क्या मनुष्य, क्या गाय-बैल, क्या भेड़-बकरी, या अन्य पशु, कोई कुछ भी न खाए; वे न खाएँ और न पानी पीएँ। मनुष्य और पशु दोनों टाट ओढ़ें, और वे परमेश्वर की दोहाई चिल्ला-चिल्ला कर दें; और अपने कुमार्ग से फिरें; और उस उपद्रव से, जो वे करते हैं, पश्चाताप करें। सम्भव है, परमेश्वर दया करे और अपनी इच्छा बदल दे, और उसका भड़का हुआ कोप शान्त हो जाए और हम नष्ट होने से बच जाएँ।’ जब परमेश्वर ने उनके कामों को देखा, कि वे कुमार्ग से फिर रहे हैं, तब परमेश्वर ने अपनी इच्छा बदल दी, और उनकी जो हानि करने की ठानी थी, उसको न किया” (योना 3:1-10)।
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
मनुष्य पर परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य उसे परमेश्वर के इरादे पूरे करने में सक्षम बनाना है, और ऐसा उनका उद्धार करने के लिए किया जाता है। इसलिए, मनुष्य का उद्धार करते समय, परमेश्वर उसे दंड देने का काम नहीं करता। मनुष्य के उद्धार के समय परमेश्वर न तो बुरे को दंडित करता है, न अच्छे को पुरस्कृत करता है, और न ही वह विभिन्न प्रकार के लोगों की मंज़िल प्रकट करता है। बल्कि, अपने कार्य के अंतिम चरण के पूरा होने के बाद ही वह बुरे को दंडित और अच्छे को पुरस्कृत करने का काम करेगा, और केवल तभी वह सभी प्रकार के लोगों के अंत को भी प्रकट करेगा। दंडित केवल वही लोग किए जाएँगे, जिन्हें बचाया जाना संभव नहीं है, जबकि बचाया केवल उन्हीं लोगों को जाएगा, जिन्होंने परमेश्वर द्वारा मनुष्य के उद्धार के समय उसका उद्धार प्राप्त कर लिया है। जब परमेश्वर द्वारा उद्धार का कार्य किया जा रहा होगा, उस समय यथासंभव हर उस व्यक्ति को बचा लिया जाएगा, जिसे बचाया जा सकता है, और उनमें से किसी को भी छोड़ा नहीं जाएगा, क्योंकि परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य मनुष्य को बचाना है। जो लोग परमेश्वर द्वारा उद्धार के दौरान अपने स्वभाव में परिवर्तन नहीं ला पाएँगे—और वे भी, जो पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पित नहीं हो पाएँगे—वे दंड के भागी होंगे। कार्य का यह चरण—वचनों का कार्य—लोगों के लिए उन सभी तरीकों और रहस्यों को खोल देगा, जिन्हें वे नहीं समझते, ताकि वे परमेश्वर के इरादों को और उनसे परमेश्वर की अपेक्षाओं को समझ सकें, और अपने अंदर परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने की पूर्वापेक्षाएँ पैदा करके अपने स्वभाव में परिवर्तन ला सकें। परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए केवल वचनों का उपयोग करता है, अगर लोग थोड़े विद्रोही हो जाएँ, तो वह उन्हें दंडित नहीं करता; क्योंकि यह उद्धार के कार्य का समय है। यदि विद्रोही ढंग से कार्य करने वाले व्यक्ति को दंडित किया जाएगा, तो किसी को भी बचाए जाने का अवसर नहीं मिलेगा; हर व्यक्ति दंडित होकर रसातल में जा गिरेगा। मनुष्य का न्याय करने के लिए वचनों के प्रयोग का उद्देश्य उन्हें स्वयं को जानने और परमेश्वर के प्रति समर्पित होने देना है; यह उन्हें इस तरह के न्याय से दंडित करना नहीं है। वचनों के कार्य के दौरान बहुत-से लोग देहधारी परमेश्वर के प्रति अपनी विद्रोहशीलता और अवहेलना उजागर करने के साथ ही अपनी समर्पण की कमी भी उजागर करेंगे। फिर भी, वह उन्हें दंडित नहीं करेगा, बल्कि केवल उन लोगों को अलग कर देगा, जो पूरी तरह से भ्रष्ट हो चुके हैं और जिन्हें बचाया नहीं जा सकता। वह उनकी देह शैतान को दे देगा, और कुछ मामलों में, उनकी देह का अंत कर देगा। शेष लोग काट-छाँट किए जाने का अनुसरण और अनुभव करना जारी रखेंगे। यदि अनुसरण करते समय भी ये लोग काट-छाँट किए जाने को स्वीकार नहीं करते, और ज्यादा पतित हो जाते हैं, तो वे उद्धार पाने के अपने अवसर से वंचित हो जाएँगे। उन सभी व्यक्तियों के पास उद्धार के लिए कई अवसर होंगे जिन्होंने परमेश्वर द्वारा जीत लिया जाना स्वीकार लिया है; इनमें से प्रत्येक व्यक्ति के उद्धार में परमेश्वर उन्हें यथासंभव अधिकतम छूट देगा। दूसरे शब्दों में, उनके प्रति परम उदारता दिखाई जाएगी। अगर लोग गलत रास्ता छोड़ दें और पश्चात्ताप करें, तो परमेश्वर उन्हें उद्धार प्राप्त करने का अवसर देगा। जब मनुष्य पहली बार परमेश्वर से विद्रोह करते हैं, तो वह उन्हें मार गिराना नहीं चाहता; बल्कि, वह उन्हें बचाने की पूरी कोशिश करता है। यदि किसी में वास्तव में उद्धार के लिए कोई गुंजाइश नहीं है, तो परमेश्वर उन्हें दर-किनार कर देता है। कुछ लोगों को दंडित करने में परमेश्वर थोड़ा धीमा इसलिए चलता है क्योंकि वह हर उस व्यक्ति को बचाना चाहता है, जिसे बचाया जा सकता है। वह केवल वचनों से लोगों का न्याय करता है, उन्हें प्रबुद्ध करता है और उनका मार्गदर्शन करता है, वह उन पर प्रहार कर गिरा देने के लिए छड़ी का उपयोग नहीं करता। मनुष्य को उद्धार दिलाने के लिए वचनों का प्रयोग करना कार्य के अंतिम चरण का उद्देश्य और महत्त्व है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के उद्धार के लिए तुम्हें सामाजिक प्रतिष्ठा के आशीष से दूर रहकर परमेश्वर के इरादे को समझना चाहिए
“ईशनिंदा और परमेश्वर की बदनामी करना पाप है, जिसे इस जीवन में या आने वाली दुनिया में माफ नहीं किया जाएगा, और जो यह पाप करते हैं उनका दोबारा कभी देहधारण नहीं होगा।” इसका मतलब है कि परमेश्वर का स्वभाव मनुष्य द्वारा अपमानित होने को बर्दाश्त नहीं करता। यह संदेह से परे निश्चित है कि ईशनिंदा और परमेश्वर को बदनाम करना पाप है, जिसे इस जीवन में या आने वाली दुनिया में माफ नहीं किया जाएगा। परमेश्वर के खिलाफ ईशनिंदा, चाहे जानबूझकर की गई हो या अनजाने में, यह परमेश्वर के स्वभाव को नाराज करती है और चाहे कोई भी वजह हो, परमेश्वर के खिलाफ ईशनिंदा वाले शब्द बोलना निश्चित रूप से निंदनीय होगा। हालाँकि कुछ लोग ऐसी परिस्थितियों में निंदा और ईशनिंदा वाले शब्द बोलते हैं, जहाँ उन्हें यह समझ नहीं आता या जहाँ उन्हें दूसरों द्वारा गुमराह किया गया है, नियंत्रित किया गया है और दबाया गया है। इन शब्दों को कहने के बाद, वे असहज महसूस करते हैं, उन्हें लगता है कि वे इसके लिए दोषी हैं, और उन्हें बहुत पछतावा होता है। इसके बाद वे इसमें बदलाव लाते हुए और ज्ञान पाते हुए पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार करते हैं और इसी वजह से परमेश्वर उनके पिछले अपराधों को अब याद नहीं रखता। तुम लोगों को परमेश्वर के वचनों को ठीक से जानना चाहिए और उन्हें अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर मनमाने ढंग से लागू नहीं करना चाहिए। तुम्हें जरूर समझना चाहिए कि उसके वचन किसके लिए लक्षित हैं, और वह किस संदर्भ में बोल रहा है। तुम्हें परमेश्वर के वचनों को मनमाने ढंग से लागू या लापरवाही से परिभाषित नहीं करना चाहिए। जो लोग नहीं जानते कि अनुभव कैसे करना है वे किसी भी चीज के बारे में आत्म-चिंतन नहीं करते, और वे खुद को परमेश्वर के वचनों से नहीं आँकते, जबकि जिनके पास कुछ अनुभव और अंतर्दृष्टि होती है, उनके अतिसंवेदनशील होने की संभावना रहती है, जब वे परमेश्वर के शापों, उसकी घृणा और लोगों को निकाले जाने के बारे में पढ़ते हैं तो वे खुद को मनमाने ढंग से परमेश्वर के वचनों से आँकते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों को नहीं समझते हैं और हमेशा उसे गलत समझ लेते हैं। कुछ लोगों ने परमेश्वर के वर्तमान वचनों को नहीं पढ़ा या उसके वर्तमान कार्यों की जाँच नहीं की, पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता प्राप्त करना तो दूर की बात है। उन्होंने परमेश्वर की आलोचना में बात की और फिर किसी ने उन तक सुसमाचार का प्रचार किया, जिसे उन्होंने स्वीकार लिया। इसके बाद, उन्हें अपने किए पर पछतावा हुआ और वे पश्चात्ताप करना चाहते हैं, ऐसी स्थिति में हम देखेंगे कि आगे चलकर उनके व्यवहार और अभिव्यक्तियाँ कैसी होंगी। अगर विश्वास करना शुरू करने के बाद भी उनका व्यवहार बहुत खराब रहता है, और वे खुद को हारा हुआ मानकर छोड़ देते हैं, “मैंने पहले ही परमेश्वर के बारे में ईशनिंदा, बदनामी और आलोचना वाले शब्द बोले हैं, और अगर परमेश्वर ऐसे लोगों को दंडित करता है, तो मेरा अनुसरण निरर्थक ही है,” तो वे पूरी तरह से असफल होंगे। उन्होंने खुद को निराशा में धकेल दिया है और खुद ही अपनी कब्र खोद ली है।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन
थोड़ा-सा अपराध कर देने पर कुछ लोग अंदाजा लगाते हैं : “क्या परमेश्वर ने मुझे प्रकट कर हटा दिया है? क्या वह मुझे मार गिराएगा?” इस बार परमेश्वर लोगों को मार गिराने के लिए नहीं, बल्कि यथासम्भव अधिकतम सीमा तक उन्हें बचाने के लिए कार्य करने आया है। कोई भी त्रुटिहीन नहीं है—अगर सबको मार गिरा दिया जाए तो क्या यह “उद्धार” होगा? कुछ अपराध जानबूझकर किए जाते हैं, जबकि अन्य अपराध अनिच्छा से होते हैं। जो चीजें तुम अनिच्छा से करते हो उन्हें पहचान लेने के बाद अगर तुम बदल सकते हो तो क्या परमेश्वर तुम्हारे ऐसा करने से पहले तुम्हें मार गिराएगा? क्या परमेश्वर इस तरह से लोगों को बचाएगा? वह इस तरह काम नहीं करता! चाहे तुम्हारा विद्रोही स्वभाव हो या तुमने अनिच्छा से कार्य किया हो, यह याद रखो : तुम्हें आत्मचिंतन कर खुद को जानना चाहिए। तुरंत खुद को बदलो और अपनी पूरी ताकत से सत्य के लिए प्रयास करो—और, चाहे कैसी भी परिस्थितियाँ क्यों न आएँ, खुद को निराशा में न पड़ने दो। परमेश्वर मनुष्य के उद्धार का कार्य कर रहा है और वह जिन्हें बचाना चाहता है, उन पर यूँ ही मनमाने ढंग से प्रहार नहीं करेगा। यह निश्चित है। भले ही वास्तव में परमेश्वर का ऐसा कोई विश्वासी हो जिसे उसने अंत में मार गिराया हो, फिर भी जो कुछ परमेश्वर करता है, उसके धार्मिक होने की गारंटी होगी। समय पर वह तुम्हें जानने देगा कि उसने उस व्यक्ति को क्यों मार गिराया, ताकि तुम पूरी तरह कायल हो जाओ। अभी बस सत्य के लिए प्रयास करो, जीवन-प्रवेश पर ध्यान केंद्रित करो और अपने कर्तव्य के अच्छे प्रदर्शन का अनुसरण करो। इसमें कोई गलती नहीं है! चाहे परमेश्वर अंत में तुम्हें कैसे भी सँभाले, उसके धार्मिक होने की गारंटी है; तुम्हें इस पर संदेह नहीं करना चाहिए, और तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है। भले ही तुम परमेश्वर की धार्मिकता को इस समय नहीं समझ सकते, लेकिन एक दिन आएगा जब तुम कायल हो जाओगे। परमेश्वर न्यायपूर्वक और सम्मानपूर्वक कार्य करता है; वह खुलकर हर चीज प्रकट करता है। अगर तुम लोग इस पर ध्यान से विचार करो, तो तुम दिल से महसूस किए जाने वाले इस निष्कर्ष पर पहुँचोगे कि परमेश्वर का कार्य लोगों को बचाना और उनके भ्रष्ट स्वभावों को पूरी तरह बदलना है। यह देखते हुए कि परमेश्वर का कार्य लोगों के भ्रष्ट स्वभाव बदलने का कार्य है, यह असंभव है कि लोगों में भ्रष्टता का प्रकटीकरण न हो। भ्रष्ट स्वभाव के इन प्रकटीकरणों में ही लोग स्वयं को जान सकते हैं, यह स्वीकार सकते हैं कि उनका स्वभाव भ्रष्ट है और परमेश्वर का उद्धार प्राप्त करने के इच्छुक हो सकते हैं। अगर लोग भ्रष्ट स्वभाव प्रकट कर चुकने के बाद कोई सत्य नहीं स्वीकारते और अपने भ्रष्ट स्वभाव के अनुसार जीना जारी रखते हैं तो उनके द्वारा परमेश्वर के स्वभाव को नाराज की संभावना होगी। परमेश्वर उन्हें विविध मात्रा में प्रतिफल देगा और वे अपने अपराधों की कीमत चुकाएँगे। ...
जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, अतीत की घटनाएँ एक झटके में साफ की जा सकती हैं; अतीत के स्थान पर भविष्य को लाया जा सकता है; परमेश्वर की सहनशीलता समुद्र के समान असीम है। लेकिन इन वचनों में सिद्धांत भी निहित हैं। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर तुम्हारे द्वारा किए गए किसी भी पाप को मिटा देगा, चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो। परमेश्वर अपना सारा कार्य सिद्धांतों के साथ करता है। इस मुद्दे को हल करने के लिए अतीत में एक प्रशासनिक आदेश दिया गया था : परमेश्वर व्यक्ति के अपना नाम स्वीकारने से पहले किए गए सारे पाप माफ और क्षमा कर देता है। लेकिन जो लोग उसमें विश्वास करने के बाद भी पाप करते रहते हैं, उनके लिए यह एक अलग कहानी होती है : जो एक बार पाप दोहराता है उसे पश्चात्ताप करने का मौका दिया जाता है, जबकि इसे दो बार दोहराने वालों या बार-बार की फटकारों के बावजूद बदलने से इनकार करने वालों को पश्चात्ताप करने का कोई और मौका दिए बिना निष्कासित कर दिया जाता है। परमेश्वर हमेशा अपने कार्य में लोगों के साथ यथासंभव अधिकतम सीमा तक सहनशील रहता है। इसमें यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर का कार्य वास्तव में लोगों को बचाने का कार्य है। लेकिन अगर कार्य के इस अंतिम चरण में तुम अभी भी अक्षम्य पाप करते हो तो तुम वास्तव में उद्धार से परे हो और तुम्हें बचाया नहीं जा सकता।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन
बहुत से लोग ऐसे हैं जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और उन लोगों में, ऐसे भी हैं जो बहुत से दूसरे तरीकों से परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। जैसे सभी प्रकार के विश्वासी होते हैं, वैसे ही परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले भी सभी प्रकार के होते हैं, सब एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। जो लोग परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को स्पष्ट रूप से नहीं समझते, उनमें से एक को भी नहीं बचाया जा सकता। अतीत में इंसान ने परमेश्वर का कितना भी प्रतिरोध किया हो, लेकिन जब इंसान को परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य समझ में आ जाता है, और वो परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास करता है, तो परमेश्वर उसके पिछले सारे पाप धो देता है। अगर इंसान सत्य की खोज और सत्य का अभ्यास करे, तो परमेश्वर उसके कृत्यों को अपने मन में नहीं रखता। इसके अलावा, इंसान द्वारा सत्य के अभ्यास के आधार पर परमेश्वर उसे सही ठहराता है। यही परमेश्वर की धार्मिकता है। इंसान के परमेश्वर को देखने या उसके कार्य का अनुभव करने से पहले, परमेश्वर के प्रति इंसान का चाहे जो रवैया रहा हो, परमेश्वर उसे अपने मन में नहीं रखता। लेकिन, एक बार जब इंसान परमेश्वर को जान लेता है और उसके कार्य का अनुभव कर लेता है, तो इंसान के सभी कर्म और क्रियाकलाप परमेश्वर द्वारा “ऐतिहासिक अभिलेख” में लिख लिए जाते हैं, क्योंकि इंसान ने परमेश्वर को देख लिया है और उसके कार्य में जीवन जी लिया है।
जब इंसान वास्तव में परमेश्वर का स्वरूप देख लेता है, वह उसकी सर्वश्रेष्ठता को देख लेता है, और परमेश्वर के कार्य को वास्तव में जान लेता है, और इसके अलावा, जब इंसान का पुराना स्वभाव बदल जाता है, तब इंसान परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले अपने विद्रोही स्वभाव को पूरी तरह से दूर कर लेता है। ऐसा कहा जा सकता है कि हर इंसान ने कभी न कभी परमेश्वर का प्रतिरोध किया होगा और हर इंसान ने कभी न कभी परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह किया होगा। लेकिन, यदि तुम अपनी खुशी से देहधारी परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हो, और उसके बाद से परमेश्वर के हृदय को अपनी सत्यनिष्ठा द्वारा संतुष्ट करते हो, अपेक्षित सत्य का अभ्यास करते हो, अपेक्षित कर्तव्य का निर्वहन करते हो, और अपेक्षित नियमों को मानते हो, तो तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपने विद्रोह को दूर करना चाहते हो, और ऐसे व्यक्ति हो जिसे परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जा सकता है। यदि तुम अपनी गलतियाँ मानने से ढिठाई से इनकार करते हो, और तुम्हारी नीयत पश्चाताप करने की नहीं है, यदि तुम अपने विद्रोही आचरण पर अड़े रहते हो, और परमेश्वर के साथ ज़रा-सा भी सहयोग करने और उसे संतुष्ट करने का भाव नहीं रखते, तब तुम्हारे जैसे दुराग्रही और न सुधरने वाले व्यक्ति को निश्चित रूप से दण्ड दिया जाएगा, और परमेश्वर तुम्हें कभी पूर्ण नहीं बनाएगा। यदि ऐसा है, तो तुम आज परमेश्वर के शत्रु हो और कल भी परमेश्वर के शत्रु रहोगे और उसके बाद के दिनों में भी तुम परमेश्वर के शत्रु बने रहोगे; तुम सदैव परमेश्वर के प्रतिरोधी और परमेश्वर के शत्रु रहोगे। ऐसी स्थिति में, परमेश्वर तुम्हें कैसे क्षमा कर सकता है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर को न जानने वाले सभी लोग परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं
अगर तुम लोगों के पास अभी थोड़ी-सी भी उम्मीद बची है, तो चाहे परमेश्वर तुम्हारे पुराने अपराध याद रखे या न रखे, तुम्हें कैसी मानसिकता बनाए रखनी चाहिए? “मुझे अपने स्वभाव में बदलाव लाना होगा, परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करना होगा, दोबारा कभी शैतान के बहकावे में नहीं आना होगा, और दोबारा ऐसा कुछ भी नहीं करना होगा जो परमेश्वर के नाम को शर्मसार करे।” लोग अब गहन रूप से भ्रष्ट हैं और किसी काम के नहीं हैं। ऐसे कौन से मुख्य क्षेत्र हैं जिनसे पता चलता है कि उन्हें बचाया जा सकता है या नहीं और उनके लिए कोई उम्मीद बची है या नहीं? मुख्य बात है, किसी उपदेश को सुनने के बाद तुम सत्य को समझ सकते हो या नहीं, सत्य का अभ्यास कर सकते हो या नहीं, और तुम बदल सकते हो या नहीं। यही मुख्य क्षेत्र हैं। अगर तुम सिर्फ पछताते रहते हो और जब कुछ करने का समय आता है तो जो जी में आए वही करते हो, वही पुराने तरीके अपनाए रहते हो, न सिर्फ सत्य की खोज नहीं करते बल्कि अभी भी पुराने विचारों, तौर-तरीकों और विनियमों से चिपके रहते हो, न तो आत्म-चिंतन करते हो, न खुद को जानने का प्रयास करते हो, इसके बजाय और ज्यादा बिगड़ते जा रहे हो, और अभी भी अपने पुराने मार्ग पर चलने की जिद करते हो, तो तुम्हारे लिए कोई उम्मीद नहीं बची होगी, और तुम्हारा पत्ता साफ कर दिया जाना चाहिए। परमेश्वर के बारे में ज्यादा ज्ञान प्राप्त कर और खुद को गहराई से जानकर तुम बुराई या पाप करने से खुद को बेहतर ढंग से रोक सकोगे। अपनी प्रकृति के बारे में तुम्हारा ज्ञान जितना गहन होगा, उतने ही बेहतर तरीके से तुम अपनी रक्षा कर सकोगे, और अपने अनुभवों और सबक का सारांश निकालने के बाद तुम दोबारा असफल नहीं होगे। असल तथ्य यह है कि सब में कुछ दोष होते हैं; बात सिर्फ इतनी है कि इनके लिए परमेश्वर उन्हें उत्तरदायी नहीं ठहराता। दोष सब में हैं, अंतर सिर्फ मात्रा का है; कुछ के बारे में बात की जा सकती है, तो कुछ के बारे में नहीं। कुछ लोग ऐसे काम करते हैं जिनके बारे में दूसरे लोग जानते हैं, तो कुछ लोग ऐसे काम करते हैं कि इनके बारे में किसी को पता नहीं चलता। सबके अपने-अपने अपराध और दोष होते हैं, और वे सब कुछ निश्चित भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हैं, जैसे अहंकार या आत्मतुष्टता; सभी अपने-अपने कार्य में कुछ भटकते हैं या कभी-कभार विद्रोही होते हैं। यह समझ में आने वाली बात है; भ्रष्ट मानवजाति इनसे बच नहीं सकती। लेकिन लोग जब एक बार सत्य समझ लें तो उन्हें इनसे बचने में सक्षम होना चाहिए और आगे से अपराध नहीं करने चाहिए; उन्हें अतीत के अपराधों से और परेशान होने की जरूरत नहीं है। मुख्य बात यह है कि लोग पश्चात्ताप करते हैं या नहीं, वे वास्तव में बदल चुके हैं या नहीं। जो पश्चात्ताप कर बदल जाते हैं उन्हें ही बचाया जाता है, जबकि जो पश्चात्ताप नहीं करते और नहीं बदलते उन्हें निकाल देना चाहिए। अगर सत्य समझने के बाद भी लोग जानबूझकर अपराध करते हैं, अगर वे कितनी भी काट-छाँट होने या चेतावनी मिलने के बावजूद पश्चात्ताप न करने पर अड़े रहते हैं और बिल्कुल भी नहीं बदलते, तो ऐसे लोगों का उद्धार नहीं हो सकता है।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन
व्यावहारिक परमेश्वर का अनुसरण करते हुए, हममें यह संकल्प होना चाहिए : चाहे कितने ही बड़े परिवेश या किसी भी तरह की मुश्किल का सामना कर रहे हों, और चाहे हम कितने ही कमजोर या नकारात्मक हो जाएँ, हम अपने स्वभावगत बदलाव में या परमेश्वर के कहे वचनों में आस्था नहीं छोड़ेंगे। परमेश्वर ने लोगों से एक वादा किया है, और इसके लिए यह जरूरी है कि उनमें संकल्प, आस्था, और इसे धारण करने की दृढ़ता हो। परमेश्वर को कायर लोग पसंद नहीं हैं; वह दृढ़ निश्चयी लोगों को पसंद करता है। भले ही तुमने बहुत-सारी भ्रष्टता दिखाई है, भले ही तुमने बहुत-से विमार्ग लिए हैं या कई अपराध किए हैं, परमेश्वर के बारे में शिकायतें की हैं या धर्म के अंदर से परमेश्वर का प्रतिरोध किया या अपने दिल में उसके खिलाफ ईशनिंदा पाली है, वगैरह-वगैरह—परमेश्वर इन सब पर कतई गौर नहीं करता है। परमेश्वर सिर्फ यह देखता है कि क्या व्यक्ति सत्य का अनुसरण करता है या नहीं और क्या वह किसी दिन बदल सकता है या नहीं। बाइबल में एक बिगड़ैल बेटे की वापसी की कहानी है—प्रभु यीशु ने इस दृष्टांत का इस्तेमाल क्यों किया? इसका उद्देश्य लोगों को यह समझाना था कि मानवजाति को बचाने के लिए परमेश्वर का इरादा सच्चा है और वह लोगों को पश्चात्ताप करने और बदलने का मौका देता है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान परमेश्वर मनुष्य को समझता है, उसकी कमजोरियों और उसकी भ्रष्टता के स्तर को अच्छे से जानता है। वह जानता है कि लोग लड़खड़ाएँगे और नाकाम होंगे। ठीक किसी ऐसे बच्चे की तरह जो चलना सीख रहा है, वह तन से चाहे कितना ही मजबूत हो, उनके लड़खड़ाने और गिरने के, चीजों से टकराने और रपटने के मौके हमेशा आएँगे। परमेश्वर हर व्यक्ति को उतना जानता है जितना कोई माँ अपने बच्चे को जानती है। वह हर व्यक्ति की परेशानियों, कमजोरियों और जरूरतों को समझता है। उससे भी बढ़कर, परमेश्वर यह भी समझता है कि लोग स्वभावगत बदलाव में प्रवेश करने की प्रक्रिया में किन कठिनाइयों, कमजोरियों और नाकामियों का सामना करेंगे। ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें परमेश्वर बखूबी समझता है। वैसे कहा जाता है कि परमेश्वर लोगों के दिल की गहराइयों की जाँच-पड़ताल करता है। तुम चाहे कितने ही कमजोर हो, जब तक तुम परमेश्वर का नाम लेना नहीं छोड़ते, या उसे या उसका मार्ग नहीं छोड़ते, तब तक तुम्हारे पास स्वभाव बदलने का मौका हमेशा रहेगा। अगर तुम्हारे पास यह मौका है, तो फिर तुम्हारे जीवित रहने, और इसलिए परमेश्वर के हाथों बचा लिए जाने की उम्मीद है।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपना स्वभाव बदलने के लिए अभ्यास का मार्ग