38. रुतबे से आज़ादी पाना

मैं 2019 में एक कलीसिया की अगुआ बनी। मैंने सारे काम अपने ढंग से किये, अपने कर्तव्य में गैर-ज़िम्मेदार रही, मैंने सही लोगों को सही काम नहीं सौंपे, जिससे कलीसिया के जीवन पर बुरा असर पड़ा। मुझे बेहद पछतावा हुआ। इसलिए मैंने कलीसिया के काम पर अच्छी पकड़ रखने का संकल्प लिया। उस वक्त, दो समूह-अगुआओं को कहीं और नियुक्त करना था, मगर उनकी जगह भरने के लिए मुझे दूसरे उपयुक्त लोग नहीं मिले। मैं फ़िक्र और सोच में डूब गयी, "अगर मुझे इन पदों के लिए योग्य लोग नहीं मिल पाये, तो मेरे अगुआ कहेंगे कि मुझे व्यावहारिक कार्य करना नहीं आता। अगर मुझे ही बदल दिया गया तो?" मैंने अपना दिमाग कुरेदा, तो बहन झांग का ख़याल आया : वह बहुत काबिल थी और अपने काम में कुशल। वह एक समूह-अगुआ के रूप में बढ़िया रहेगी। यह ख़याल आने पर मैंने राहत की सांस ली। मुझे लगा उस पद के लिए मुझे कोई मिल गया, उस काम पर सही व्यक्ति के तैनात होने से मेरा काम अब आसान हो जाएगा।

मगर उसी पल, एक दूसरी कलीसिया की अगुआ बहन ली ने मुझे फोन पर बताया कि उसकी कलीसिया में बड़ी संख्या में नवधर्मी आ गये हैं, और उनके सिंचन के लिए ज़्यादा लोग नहीं हैं। वे मुझसे जानना चाहती हैं कि क्या नवधर्मियों के सिंचन के लिए बहन झांग को उनकी कलीसिया में नियुक्त करने की कोई संभावना है। मैं इस विचार के बिल्कुल खिलाफ थी। "हमारी कलीसिया का क्या होगा?" मैंने सोचा। "अगर बहन झांग को कहीं और नियुक्त कर दिया गया, तो हम लोग क्या करेंगे? अगर मुझे समूह-अगुआ बनाने के लिए और कोई नहीं मिला और मैं इस काम को ठीक से नहीं संभाल पायी, तो हो सकता है मुझे ही बदल दिया जाए!" मुझे चुप देखकर, बहन ली ने कहा, "हमारी कलीसिया के ज़्यादातर लोग बहुत पुराने विश्वासी हैं और अपनी आस्था में रमे हुए लोग हैं। अगर बहन झांग का तबादला कर दिया गया, तो आप किसी दूसरे को ज़रूर प्रशिक्षित कर सकती हैं। आपके काम पर बहुत ज़्यादा असर नहीं पड़ेगा।" मैं वाकई ये सब नहीं सुनना चाहती थी और मेरे अंदर प्रतिरोध उमड़ रहा था। मैंने सोचा, "आप इसे हल्के में ले रही हैं, मानो किसी को प्रशिक्षित करना इतना आसान काम है!" मैं जानती थी कि बहन ली की कलीसिया को मदद की ज़रूरत है, लेकिन मैं अपने भ्रष्ट स्वभाव के नियंत्रण में थी। वे चाहे जो कहें, मैंने उनकी बात मानने से इनकार कर दिया। मैंने उन्हें दोष भी दिया, यह सोच कर कि वे स्वार्थी हैं, और सिर्फ अपनी कलीसिया के बारे में ही सोच रही हैं। इस विचार के बारे में मेरा प्रतिरोध देख कर बहन ली ने ज़ोर देना छोड़ दिया। इस बातचीत के बाद मैं बहुत बेचैन हो गयी, मैंने मन-ही-मन ठान लिया कि मैं नहीं मानूँगी, कोई भी कहे मैं बहन झांग को नहीं छोड़ूँगी। अगले दिन, मुझसे इस बारे में बात करने के लिए मेरी अगुआ आ गयीं। मैं लगातार बोलकर उन्हें बताती रही कि हमारी कलीसिया में लोगों की कैसी कमी है और हम कैसी तकलीफें झेल रहे हैं। मैं अपनी कठिनाइयों के बारे में बोलती रही ताकि अगुआ को अपनी बात पर ज़ोर देने का मौक़ा न मिले। आखिरकार, वे कुछ नहीं बोल सकीं, उन्होंने फिर ज़ोर नहीं डाला। इससे मैं प्रसन्न हुई : मैं बहन झांग को साथ रख सकूँगी। उस शाम, बहन झांग की तरक्की के बारे में चर्चा करने के लिए मैं कुछ उपयाजकों से मिली। मगर, मैंने यह नहीं बताया कि बहन ली अपनी कलीसिया में किन मुश्किलों से जूझ रही हैं, और हमारी अपनी अगुआ भी बहन झांग की किसी और जगह नियुक्ति की बात करने आयी थीं। जो कुछ घटा वो सब न बताने के कारण वे सब बहन झांग को समूह-अगुआ बनाने को राजी हो गये। मैं खुश हो ही रही थी कि हमारी अगुआ मुझसे और मेरी कार्य-संगिनी से बात करने के लिए आकस्मिक दौरे पर आ गयीं। यह फैसला लिया जा चुका था कि काम की ज़रूरत के मुताबिक़ बहन झांग को कहीं और नियुक्त किया जाएगा। सबको इसके लिए राजी देखकर, मैं विरोध नहीं कर पायी, लेकिन मैं इस बात से खुश नहीं थी; मुझे लगा मानो किसी ने मेरा दायाँ हाथ काट दिया हो। अगले दो-चार दिनों में, यह पूरा मामला मन में आने पर मैं वाकई बहुत परेशान हो गयी। अपना काम करने में भी मेरा मन नहीं लग रहा था। मैं रात को बिस्तर पर करवट बदलती रहती, ज़रा भी सो नहीं पाती, इस मामले से बार-बार मन में खलबली मची रहती। आखिरकार, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की : "हे परमेश्वर, मैं बस अपने पद को बचाये रखने के लिए बहन झांग को छोड़ने को तैयार नहीं हूँ। मैं इस बात को छोड़ नहीं पा रही हूँ। हे परमेश्वर, मेरा मार्गदर्शन करो, मुझे इस हालत से बाहर निकालो। मुझे खुदगर्ज़ी छोड़ खुद को थोड़ा जानने लायक बनाओ।"

इस प्रार्थना के बाद, मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : "यह दर्शाता है कि लोग कभी-कभार ही सत्य का अभ्यास करते हैं, वे अक्सर सत्य से अपना मुंह मोड लेते हैं, और ऐसे भ्रष्ट शैतानी स्वभाव में जीते रहते हैं, जो स्वार्थपूर्ण और घिनौना होता है। यह दर्शाता है कि वे सिर्फ अपनी प्रतिष्ठा, साख, रुतबे और हितों को देखते हैं, और उनके पास सत्य नहीं होता। इसलिए उनके कष्ट बहुत बड़े होते हैं, उनकी चिंताएँ बहुत ज्यादा होती हैं, और उनकी बेड़ियाँ अनगिनत होती हैं" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन में प्रवेश अपने कर्तव्य को निभाने का अनुभव करने से प्रारंभ होना चाहिए')। "क्रूर मानवजाति! साँठ-गाँठ और साज़िश, एक-दूसरे से छीनना और हथियाना, प्रसिद्धि और संपत्ति के लिए हाथापाई, आपसी कत्लेआम—यह सब कब समाप्त होगा? परमेश्वर द्वारा बोले गए लाखों वचनों के बावजूद किसी को भी होश नहीं आया है। लोग अपने परिवार और बेटे-बेटियों के वास्ते, आजीविका, भावी संभावनाओं, हैसियत, महत्वाकांक्षा और पैसों के लिए, भोजन, कपड़ों और देह-सुख के वास्ते कार्य करते हैं। पर क्या कोई ऐसा है, जिसके कार्य वास्तव में परमेश्वर के वास्ते हैं? यहाँ तक कि जो परमेश्वर के लिए कार्य करते हैं, उनमें से भी बहुत थोड़े ही हैं, जो परमेश्वर को जानते हैं। कितने लोग अपने स्वयं के हितों के लिए काम नहीं करते? कितने लोग अपनी हैसियत बचाए रखने के लिए दूसरों पर अत्याचार या उनका बहिष्कार नहीं करते?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'दुष्टों को निश्चित ही दंड दिया जाएगा')। परमेश्वर के वचनों ने मेरे दिल को चीर कर रख दिया। परमेश्वर ने शैतान द्वारा इंसान के भ्रष्ट होने की बदसूरती, शोहरत और दौलत की खातिर आपस में लड़ने-झगड़ने का खुलासा किया— मेरा भी ठीक यही हाल था। बहन झांग के इस मामले में मैंने जो प्रकट किया, उस बारे में मैंने सोचा। अगुआ के अपने पद की रक्षा करने के लिए मैंने परमेश्वर के घर के संपूर्ण कार्य की अनदेखी की, इस डर से कि अगर हमने बहन झांग को जाने दिया तो हमारी कलीसिया के काम पर बुरा असर पड़ेगा, और मैं अगुआ का अपना पद गँवा बैठूंगी। इसी वजह से जब अगुआ बहन झांग की बात करने के लिए आयीं, तो मैंने इनकार करने के तमाम तर्क सामने रख दिये। सारे फैसले मैंने किये और बहन झांग के काम की व्यवस्था करने की अगुआई की। मैंने बहन ली और अपनी अगुआ के साथ चाल चली और उपयाजकों की आँखों में धूल झोंकने का कुचक्र चला। मैंने कोई कसर नहीं छोड़ी और अपनी शोहरत, दौलत और रुतबे को बचाने के लिए दिमाग को खूब कुरेदा। मैं कितनी ज्यादा स्वार्थी, नीच और कपटी थी! इसने मुझे प्राणी जगत के जंगली जानवरों की याद दिला दी। वे इलाके और खाने को लेकर एक-दूसरे से लड़ते और उन्हें मार डालते हैं, सबसे ताकतवर अपना दबदबा जमा लेता है। और यहाँ मैं थी : लोगों पर काबू करने और अपने पद की रक्षा करने की होड़ में, मैं एक जंगली जानवर जैसी बन गयी थी, मुझमें बिल्कुल भी इंसानियत नहीं थी। मुझे एहसास हुआ कि मेरा व्यवहार कितना डरावना था। हालांकि मैं यों जता रही थी मानो मैं बड़ा बोझ ढो रही हूँ, अपनी कलीसिया के काम के बारे में सोच रही हूँ, मगर दरअसल गहराई में मेरे विचार मेरे अपने पद पर टिके हुए थे। जैसे कि परमेश्वर के वचन प्रकट करते हैं : "कितने लोग अपने स्वयं के हितों के लिए काम नहीं करते? कितने लोग अपनी हैसियत बचाए रखने के लिए दूसरों पर अत्याचार या उनका बहिष्कार नहीं करते?" शुरुआत से आखिर तक, मैं बहन झांग को काबू में करने की कोशिश कर रही थी, उसे छोड़ने को तैयार नहीं थी। मैं उसे अपनी कलीसिया का एक सदस्य मानती थी, सोचती थी कि उसके काम के बारे में हमारी ही बात चलनी चाहिए। मुझे ही प्रभारी होना चाहिए, किसी और को दखल देने का अधिकार नहीं है। मैंने समझ लिया कि मैं कितनी घमंडी थी। आसान शब्दों में कहूं, तो मैं अपनी इंसानियत और समझ खो चुकी थी! तभी मैंने उस वक्त को याद किया जब मैं धार्मिक लोगों के सामने सुसमाचार का प्रचार करती थी, तब पादरियों ने देखा कि उनकी सभा के अनेक सदस्य परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार कर रहे हैं, और उनके पद खतरे में पड़ते जा रहे हैं। उन्होंने लोगों को सच्चे मार्ग की जांच-पड़ताल करने से रोकने की भरसक कोशिश की। उन्होंने सुसमाचार फैलाने वालों पर न सिर्फ हमला किया, बल्कि बेशर्मी से यह दावा भी किया कि विश्वासी उनके ही हैं और कोई भी उन्हें चुरा नहीं सकता। तब मुझे एहसास हुआ कि सार रूप में देखें, तो मेरा व्यवहार उन पादरियों के व्यवहार से ज़रा भी अलग नहीं है। अपना पद और आजीविका बनाये रखने के लिए मैं भाई-बहनों को अपने काबू में रखना चाहती थी, परमेश्वर के घर को उन्हें कहीं और नियुक्त करने की इजाज़त नहीं देना चाहती थी। मैं परमेश्वर की भेड़ों को हथियाने और इन लोगों के लिए परमेश्वर के साथ होड़ लगाने की कोशिश कर रही थी! इस ख़याल से मुझे डर लगने लगा। डर के मारे सिहरती हुई मैंने परमेश्वर के सामने जाकर प्रार्थना की : "हे परमेश्वर, मैंने गलती की है। मैंने तुम्हारा प्रतिरोध किया है, मैं तुम्हारे सामने पश्चाताप करना चाहती हूँ।"

जल्दी ही, परमेश्वर ने मेरा इम्तहान लेने के लिए फिर एक स्थिति तैयार की। एक दूसरी कलीसिया की अगुआ ने एक संदेश भेजा, दस्तावेज़ संपादन का कार्यभार संभालने के लिए किसी को शीघ्रता से भेजने को कहा। उन्होंने सुन रखा था कि हमारी कलीसिया की बहन चेन इस काम में कुशल हैं और अपने कर्तव्य की पूरी ज़िम्मेदारी लेती हैं, इसलिए वे जानना चाहती थीं कि क्या बहन चेन इस पद का कार्यभार संभाल सकेंगी। मैं अच्छी तरह जानती थी कि बहन चेन इस काम के लिए बहुत योग्य हैं, लेकिन वे हमारी कलीसिया में एक इंजीलवादी हैं, और वे इस काम में भी काबिल हैं। बहन चेन का तबादला हो जाए और इस वजह से हमारा सुसमाचार-कार्य प्रभावित हो जाए, तो परिणाम क्या होगा? अगर अगुआ मेरा निपटान कर दें कि मैं व्यावहारिक कार्य करने में नाकाबिल हूँ, तो क्या होगा? हो सकता है मेरा पद भी हाथ से निकल जाए। मैंने फैसला किया कि बेहतर होगा अगर वे किसी और को ढूँढ़ लें, इसलिए मैंने जान-बूझ कर उस अगुआ के संदेश का जवाब नहीं दिया। फिर एकाएक मन में कौंधा, "मैं अपना पद बनाये रखने के लिए बहन झांग को उन्हें देने को तैयार नहीं हुई। इस बार मैं ऐसे रोड़े नहीं अटका सकती।" मगर अभी भी मैं सचमुच अंतर्द्वंद्व और पीड़ा महसूस कर रही थी। मैंने सोचा, "जब भी किसी को कहीं और नियुक्त करने की ज़रूरत पड़ती है, मैं इतनी प्रतिरोधी क्यों हो जाती हूँ? मैं हमेशा हमारे काम पर बुरा असर पड़ने और अपना पद खो देने की फ़िक्र करती रहती हूँ। मैं शोहरत, दौलत और रुतबे की सांकलों और बंधनों से कैसे आज़ाद हो सकती हूँ?" फिर मैंने परमेश्वर से मौन प्रार्थना की, उससे विनती की कि रुतबे के पीछे भागने के अपने सार को समझने में मेरा मार्गदर्शन और अगुआई करे, देह-सुख का त्याग करने और सत्य का अभ्यास करने में मेरी मदद करे।

अपने धार्मिक कार्यों के दौरान, मैंने परमेश्वर के वचनों का यह अंश पढ़ा : "मसीह-विरोधियों के व्यवहार का सार यह है कि वे लगातार ऐसे बहुत-से साधनों और तरीकों का इस्तेमाल करते रहते हैं, जिनसे वे रुतबा हासिल करने और लोगों को जीतने के अपने लक्ष्य को पूरा कर सकें, ताकि लोग उनका अनुसरण करें और उनका स्तुतिगान करें। संभव है कि अपने दिल की गहराइयों में वे जानबूझकर मानवता को लेकर परमेश्वर से होड़ न कर रहे हों, पर एक बात तो पक्की है, अगर मनुष्यों को लेकर वे परमेश्वर के साथ होड़ न भी कर रहे हों तो भी वे मनुष्यों के बीच रुतबा और शक्ति पाना चाहते हैं। अगर वह दिन आ भी जाए जब उन्हें यह अहसास होने लगे कि वे परमेश्वर के साथ होड़ कर रहे हैं, और वे अपने-आप पर लगाम लगा लें, तो भी वे दूसरे तरीकों का इस्तेमाल करके लोगों के बीच रुतबा और मान्यता पाने की कोशिश करते रहते हैं। संक्षेप में, भले ही मसीह-विरोधी जो कुछ भी करते हैं उससे वे अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करते प्रतीत होते हैं, और परमेश्वर के सच्चे अनुयायी लगते हैं, पर लोगों को नियंत्रित करने और उनके बीच रुतबा और शक्ति हासिल करने की उनकी महत्वाकांक्षा कभी नहीं बदलेगी। चाहे परमेश्वर कुछ भी कहे या करे, चाहे वह लोगों से कुछ भी चाहता हो, वे वह नहीं करते जो उन्हें करना चाहिए, या अपने कर्तव्य उस तरह से नहीं निभाते कि वे परमेश्वर के वचनों और जरूरतों के अनुरूप हों, न ही वे उसके कथनों और सत्य को समझते हुए शक्ति और रुतबे का मोह ही त्यागते हैं। पूरे समय उनकी महत्वाकांक्षा उन पर सवार रहती है, उनके व्यवहार और विचारों को नियंत्रित और निर्देशित करती है, और उस रास्ते को तय करती है जिस पर वे चलते हैं। यह एक मसीह-विरोधी का सार-संक्षेप है। यहाँ क्या बात रेखांकित होती है? कुछ लोग पूछते हैं, 'क्या मसीह-विरोधी वे लोग नहीं हैं जो लोगों को जीतने के लिए परमेश्वर से होड़ करते हैं, और जो उसे नहीं मानते?' वे परमेश्वर को मानने वाले भी हो सकते हैं, वे सही तौर पर उसे मानने वाले और उसके अस्तित्व में विश्वास रखने वाले हो सकते हैं, वे उसका अनुसरण करने और सत्य की खोज के इच्छुक भी हो सकते हैं, पर एक चीज कभी नहीं बदलेगी : वे शक्ति और रुतबे की अपनी महत्वाकांक्षा का त्याग कभी नहीं करेंगे, न ही वे अपने वातावरण के कारण या अपने प्रति परमेश्वर के रवैये के कारण इन चीजों का पीछा करना छोड़ेंगे। ये एक मसीह-विरोधी की विशिष्टताएँ हैं। किसी व्यक्ति ने कितना ही कष्ट क्यों न उठाया हो, उसने सत्य को कितना ही क्यों न समझ लिया हो, उसने कितनी ही सत्य-वास्तविकताओं में प्रवेश क्यों न कर लिया हो, उसे परमेश्वर का कितना ही ज्ञान क्यों न हो, इन बाहरी प्रतिभासों और अभिव्यक्तियों से परे, वह व्यक्ति कभी भी रुतबे और शक्ति के लिए अपनी महत्वाकांक्षा और प्रयासों पर न तो लगाम लगाएगा और न ही इनका परित्याग करेगा, और इससे उसका प्रकृति सार स्पष्ट रूप से निर्धारित हो जाता है। ऐसे लोगों को मसीह-विरोधियों के रूप में परिभाषित करने में परमेश्वर ने जरा-सी भी गलती नहीं की है, इसे उनके प्रकृति सार ने ही निर्धारित कर दिया है" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (3)')। परमेश्वर ने मसीह-विरोधियों की प्रकृति और लक्षण प्रकट किये कि वे सत्ता और रुतबे के लोभी होते हैं, वे इन चीज़ों को अपने जीने का प्रयोजन मानते हैं। उनके हर काम की जड़ और प्रेरणा होती है, शोहरत, दौलत और रुतबे की उनकी आकांक्षा, इतनी ज़्यादा कि वे परमेश्वर की भेड़ों को भी अपनी मानते हैं, परमेश्वर का विरोध करते हैं, और प्रायश्चित करने से साफ़ इनकार करते हैं, जब तक कि उन्हें उजागर करके हटा नहीं दिया जाता। परमेश्वर के वचनों पर सोच-विचार करके मैं भयभीत होने लगी। मैं सचमुच अपने रुतबे को संजोती हूँ। पहली बार, मैंने अपना पद बचाये रखने के लिए बहन झांग की कहीं और नियुक्ति से इनकार कर दिया था। अब इस बार, मैं फिर से अपने पद की खातिर किसी व्यक्ति को छोड़ने को तैयार नहीं हूँ। मैं बस अपने रुतबे के बारे में ही सोचती हूँ, मैं परमेश्वर के घर के कार्य के बारे में सोचना तो दूर, परमेश्वर की इच्छा का कोई विचार नहीं करती, परमेश्वर के घर के कार्य की कीमत पर भी मैं अपना पद बनाये रखने को कृतसंकल्प हूँ, अपने रुतबे के लिए लोगों पर काबू के लिए मैं परमेश्वर के साथ होड़ लगाने तक में भी सक्षम हूँ। परमेश्वर के प्रति मेरा सम्मान कहाँ है? मेरी आस्था परमेश्वर में नहीं है; मेरी आस्था रुतबे और सत्ता में है, क्या यह मसीह-विरोधी की प्रकृति नहीं है? मैं अच्छी तरह जानती थी कि बहन चेन दस्तावेज़ संपादन में कुशल हैं, और उन्हें इस प्रकार का काम अच्छा लगता है। लेकिन अपने पद को बचाये रखने के लिए मैंने उनकी राय नहीं जाननी चाही, न ही उनकी काबिलियत के अनुसार उन्हें किसी उपयुक्त काम में लगाया, इसके बजाय उनके मालिक जैसा व्यवहार किया और एक दूसरी कलीसिया में अपना काम करने को जाने देने से मना कर दिया। मैं कलीसिया को अपने इलाके की तरह ले रही हूँ और मेरे कहे बिना किसी को भी कहीं और नियुक्त नहीं किया जा सकता। क्या मैं मसीह-विरोधी की तरह लोगों को पिंजड़े में बंद कर उन पर नियंत्रण करने की कोशिश नहीं कर रही हूँ? अपने पद पर मज़बूत पकड़ के लिए मैंने अच्छी योग्यता और हुनर वाले भाई-बहनों को अपनी कलीसिया में रखने की कोशिश की। मैं उनके साथ यों पेश आयी जैसे वे मेरी संपत्ति हों, और मैंने उन पर राज किया, चाहा कि मेरे अपने पद के लिए और भी ज़्यादा लोग मेहनत करें। परमेश्वर वाकई मेरी इस महत्वाकांक्षा से घृणा करता है, मैं शापित होने के योग्य हूँ! मैंने जाना कि इतने वर्षों की आस्था के बाद भी अनुसरण करने के बारे में मेरी सोच नहीं बदली है, मैं शोहरत, दौलत और रुतबे की सांकलों में मजबूती से बंधी हुई हूँ और मसीह-विरोधियों की राह पर चल रही हूँ। तब मेरे मन में एक मसीह-विरोधी का ख़याल आया जिसे मैं जानती थी। वह हमेशा शोहरत, दौलत और रुतबे के पीछे भागता था, अगुआ बनने के बाद उसने लोगों को अपने काबू में करके, अपने खुद की आज़ाद जागीर बनाने की कोशश करके, अपने पद को मजबूत करना चाहा। उसने सत्य को बिल्कुल स्वीकार नहीं किया, एक तानाशाह की तरह पेश आया। उसने परमेश्वर के घर के कार्य में बहुत अड़चनें पैदा कीं, और आखिर में उसे उजागर करके हटा दिया गया। मुझे एहसास हुआ कि शोहरत, दौलत और रुतबे का अनुसरण मसीह-विरोधियों का मार्ग है, जोकि नरक में ले जाता है! परमेश्वर ने मुझे उजागर करने के लिए बार-बार हालात तैयार किये, ताकि मैं अपनी शैतानी प्रकृति को पहचान सकूं और समझ सकूं कि मैं गलत रास्ते पर हूँ, ताकि मैं समय रहते वापस लौट सकूं। ये हालात मेरे लिए उसका न्याय थे, बल्कि उससे भी ज़्यादा वे परमेश्वर का महान प्रेम और उद्धार थे! जब मैंने परमेश्वर के उन मेहनतकश प्रयासों के बारे में सोच-विचार किया, तब मैं नरम पड़ने लगी और अब मैंने ऐसे हालात के प्रति प्रतिरोध महसूस नहीं किया। मुझे लगा कि परमेश्वर की हर व्यवस्था ठीक मेरी ज़रूरत के अनुसार थी। मैं सचमुच पश्चाताप करना चाहती थी और उन हालात को विनम्र हृदय के साथ अनुभव करना चाहती थी।

फिर मैंने परमेश्वर के वचनों के दो अंशों का वीडियो पाठ देखा। "कर्तव्य क्या है? कर्तव्य तुम लोगों द्वारा प्रबंधित नहीं है—यह तुम्हारा अपना कार्यक्षेत्र या तुम्हारी अपनी रचना भी नहीं है। इसकी बजाय, यह परमेश्वर का कार्य है। परमेश्वर के कार्य के लिए तुम लोगों के सहयोग की आवश्यकता है, जो तुम लोगों के कर्तव्य को उत्पन्न करता है। परमेश्वर के कार्य का वह हिस्सा जिसमें मनुष्य को अवश्य सहयोग करना चाहिए वह है उसका कर्तव्य। कर्तव्य परमेश्वर के कार्य का एक हिस्सा है—यह तुम्हारा कार्यक्षेत्र नहीं है, तुम्हारा घरेलू मामला नहीं है, और न ही यह तुम्हारा व्यक्तिगत मामला है। चाहे तुम्हारा कर्तव्य आंतरिक या बाहरी मामलों से निपटना हो, यह परमेश्वर के घर का कार्य है, यह परमेश्वर की प्रबंधन योजना के एक हिस्से का निर्माण करता है, और यही वह आदेश है जो परमेश्वर ने तुम्हें दिया है। यह तुम लोगों का व्यक्तिगत कारोबार नहीं है" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य के सिद्धांतों की खोज करके ही अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाया जा सकता है')। "तुम लोग जिस भी कर्तव्य को स्वीकार करो—उदाहरण के लिए, अगर तुम्हें कलीसिया के अगुआ के रूप में चुना गया है, तो अगुआई करना तुम्हारा कर्तव्य है—अगर तुम इसे अपना कर्तव्य मानते हो तो तुम्हें इसे कैसे करना चाहिए? (परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप।) परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार काम करना इसे कहने का एक आम तरीका है। इसका खास ब्यौरा क्या है? सबसे पहले, तुम्हें यह मालूम होना चाहिए कि यह एक कर्तव्य है, यह कोई ओहदा नहीं है। अगर तुम सोचोगे कि तुम्हें एक ओहदा मिल गया है तो इससे समस्याएँ पैदा हो जाएँगी। लेकिन अगर तुम लोग कहते हो, 'मुझे कलीसिया के अगुआ के रूप में चुना गया है, इसलिए मुझे दूसरों से एक दर्जा नीचे रहने की जरूरत; तुम सब मुझसे ऊपर हो और मुझसे बड़े हो,' तो यह भी एक गलत रवैया है; अगर तुम सत्य को नहीं समझते हो तो कितना भी दिखावा करने से तुम्हारा कोई भला नहीं होगा। तुम्हें सत्य की सही समझ होनी चाहिए। सबसे पहले, तुम लोगों को यह मालूम होना चाहिए कि यह कर्तव्य बहुत महत्वपूर्ण है। किसी कलीसिया के दर्जनों सदस्य होते हैं, और तुम्हें यह सोचना होगा कि इन लोगों को परमेश्वर के सामने कैसे लाया जाए और इनमें से बहुसंख्यक लोगों को सत्य को समझने और सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करने के योग्य कैसे बनाया जाए। इसके साथ ही, कमजोर और ढीले लोगों के मामले में तुम्हें उन्हें उनकी कमजोरी और ढीलेपन से मुक्ति दिलाने का प्रयास करना होगा, ताकि वे सक्रिय रूप से अपने कर्तव्यों का पालन कर सकें, और जो लोग अपने कर्तव्यों का पालन करने में सक्षम हैं, तुम्हें उन्हें पूरे मनोयोग से इनका पालन करने में सक्षम बनाना होगा। उन्हें अपने कर्तव्यों का पालन करने से जुड़े सत्यों को समझाओ, ताकि वे उनका पालन करने में कोई ढील न बरतें और उन्हें अच्छी तरह से संपन्न करें, और परमेश्वर के साथ एक सामान्य सम्बंध बना सकें। ऐसे लोग भी होते हैं जो विघ्न और व्यवधान डालते हैं, या जो वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करते रहे हैं पर एक दुष्ट मानवता रखते हैं; इन लोगों मे से जिनका निपटारा होना है उनका निपटारा होगा, और जिनका शुद्धिकरण होना है उनका शुद्धिकरण होगा। हर व्यक्ति के लिए उसकी किस्म के अनुसार उपयुक्त व्यवस्थाएँ की जाएँगी। यह भी महत्वपूर्ण है कि जो थोड़े-से अपेक्षाकृत भली मानवता वाले लोग कलीसिया में आते हैं, जिनमें कुछ क्षमता होती है, जो किसी काम के एक पहलू की जिम्मेदारी ले सकते हैं, उन सबको भी विकसित करने की जरूरत है। ... तुम्हें हर व्यक्ति का अधिकतम उपयोग करना होगा, उनकी व्यक्तिगत क्षमताओं का पूरा-पूरा लाभ उठाना होगा और उनकी योग्यता के अनुसार उनके लिए उपयुक्त जिम्मेदारियाँ तय करनी होंगी, उनकी क्षमता का स्तर क्या है, उनकी उम्र क्या है, वे कितने समय से परमेश्वर में विश्वास करते रहे हैं। तुम्हें हर किस्म के व्यक्ति के लिए उसके अनुकूल एक साँचे में ढली योजना बनानी होगी, जो हर व्यक्ति के अनुसार बदलती रहेगी, ताकि वे परमेश्वर के घर में अपने कर्तव्यों को पूरा कर सकें और अपने कार्यों को अधिकतम ऊंचाई तक ले जा सकें" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'कर्तव्‍य का समुचित निर्वाह क्‍या है?')। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ सकी कि कर्तव्य किसी का निजी उद्यम नहीं होता। हमारा कर्तव्य परमेश्वर तय करता है, और हमें इसे उसकी अपेक्षा के अनुसार निभाना चाहिए। लोगों को प्रशिक्षण देना एक ऐसा काम है जिसकी परमेश्वर अगुआओं से अपेक्षा करता है। परमेश्वर ने अपने कार्य के लिए सभी प्रकार के कुशलता-प्राप्त लोग तैयार किये हैं, और एक कलीसिया अगुआ के रूप में मुझे अपना कर्तव्य उसकी अपेक्षाओं और सिद्धांतों के अनुसार निभाना चाहिए। जब कोई प्रतिभाशाली व्यक्ति मेरी नज़र में आये तो मुझे उसे प्रशिक्षित कर उसकी सिफारिश करनी चाहिए, ताकि सभी को सही जगह पर अपनी काबिलियत दिखाने का पूरा मौक़ा मिले, वे अपना कर्तव्य निभा सकें, और सुसमाचार कार्य को बेहतर ढंग से फैलाने के लिए अपना-अपना कार्य पूरा कर सकें। सिर्फ यही परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है, और भाई-बहन भी यही करना चाहते हैं। एक बार परमेश्वर की इच्छा को समझ लेने के बाद, मैंने उस दूसरी कलीसिया की अगुआ को एक संदेश भेज दिया कि मैं बहन चेन को वहां नियुक्त करने के लिए तैयार हूँ। इस तरह का अभ्यास शुरू करने से मेरे दिल को बड़ा सुकून मिला। फिर मैंने परमेश्वर के आशीष देखे। मुझे यह देखकर बड़ी हैरानी हुई कि उस साल नवंबर में, हमारे सुसमाचार कार्य से हासिल नवधर्मियों की संख्या पिछले महीने के मुकाबले तीन गुना ज़्यादा हो गयी। मैं जान गयी कि यह परमेश्वर के कार्य से ही हासिल हो सका है, मैं उसका धन्यवाद करने और उसका गुणगान करने से नहीं रह पायी!

पहले, शोहरत और दौलत की होड़ लगाने या शोहरत, दौलत और रुतबे का अनुसरण करने की भ्रष्टताओं के लिए मैंने कभी घृणा का अनुभव नहीं किया था। मेरा ख़याल था कि अगर हम सभी को शैतान द्वारा भ्रष्ट समझेंगे, तो फिर हम सभी का स्वभाव एक-जैसा होगा, और यह ऐसी चीज़ नहीं है जिसे दो-चार दिन में बदला जा सके। इस सोच ने मुझे समस्या को सुलझाने के लिए सत्य की खोज करने से रोक दिया था। परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना से गुज़र कर, इम्तहान देकर और उजागर होकर आखिरकार मैं उन चीज़ों का अनुसरण करने के सार को कुछ हद तक समझ पायी। मैं समझ गयी कि ऐसी चीज़ों का अनुसरण करना परमेश्वर का प्रतिरोध करना है, और मैं दिल की गहराई से खुद से नफ़रत करने लगी। मैं सत्य का अनुसरण करने, प्रायश्चित करने और बदलने को तैयार हो गयी, परमेश्वर के कार्य की बदौलत ही अब मैं देह-सुख को त्याग पायी हूँ और कुछ हद तक सत्य पर अमल कर पायी हूँ। सर्वशक्तिमान परमेश्वर का धन्यवाद!

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13. हृदय की मुक्ति

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "इस युग के दौरान परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य मुख्य रूप से मनुष्य के जीवन के लिए वचनों का प्रावधान करना,...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ जीवन में प्रवेश पर उपदेश और वार्तालाप अंत के दिनों के मसीह—उद्धारकर्ता का प्रकटन और कार्य राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें) परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर (संकलन) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ (खंड I) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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