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अध्याय 7 सत्य के अन्य पहलू जो कि न्यूनतम हैं जिन्हें नए विश्वासियों द्वारा समझा जाना चाहिए

3. परमेश्वर पर विश्वास में, तुम्हें परमेश्वर के साथ सामान्य सम्बन्ध स्थापित करना चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर में विश्वास करने में तुम्हें कम से कम परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध रखने के विषय का समाधान करना चाहिए। परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध के बिना परमेश्वर में विश्वास करने का महत्व खो जाता है। परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध को स्थापित करना परमेश्वर की उपस्थिति में अपने हृदय को शांत करने के द्वारा ही किया जा सकता है। परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध को स्थापित करने का अर्थ है परमेश्वर के किसी भी कार्य पर संदेह न करना या उसका इनकार न करना, बल्कि उसके प्रति समर्पित रहना, और इससे बढ़कर इसका अर्थ है परमेश्वर की उपस्थिति में सही इरादों को रखना, स्वयं के बारे में न सोचते हुए हमेशा परमेश्वर के परिवार की बातों को सबसे महत्वपूर्ण विषय के रूप में सोचना, फिर चाहे तुम कुछ भी क्यों न कर रहे हो, परमेश्वर के अवलोकन को स्वीकार करना और परमेश्वर के प्रबंधनों के प्रति समर्पण करना। परमेश्वर की उपस्थिति में तुम जब भी कुछ करते हो तो तुम अपने हृदय को शांत कर सकते हो; यदि तुम परमेश्वर की इच्छा को नहीं भी समझते, फिर भी तुम्हें अपनी सर्वोत्तम योग्यता के साथ अपने कर्त्तव्यों और जिम्मेदारियों को पूरा करना चाहिए। परमेश्वर की इच्छा के प्रकट होने की प्रतीक्षा करने में कभी देर नहीं होती, और फिर तुम इसे कार्य में लागू करो। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य हो जाता है, तब तुम्हारा संबंध लोगों के साथ भी सामान्य होगा। सब कुछ परमेश्वर के वचनों पर स्थापित है। परमेश्वर के वचनों को खाने और उन्हें पीने से परमेश्वर की माँगों के अनुसार कार्य करो, अपने दृष्टिकोणों को सही रखो, और ऐसे कार्यों को न करो जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते हों या कलीसिया में विघ्न डालते हों। ऐसे कार्यों को न करो जो भाइयों और बहनों के जीवनों को लाभान्वित न करें, ऐसी बातों को न कहो जो दूसरे लोगों के जीवन में योगदान न दें, निंदनीय कार्य न करो। सब कार्यों को करने में न्यायी और सम्माननीय बनो और उन्हें परमेश्वर के समक्ष प्रस्तुत योग्य बनाओ। यद्यपि कभी-कभी देह कमजोर होती है, फिर भी तुम अपने लाभों का लालच न करते हुए परमेश्वर के परिवार को लाभान्वित करने को सर्वोच्च महत्त्व दे सकते हो, और धार्मिकता को पूरा कर सकते हो। यदि तुम इस तरह से कार्य कर सकते हो, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होगा।

जब भी तुम कुछ करते हो, तो तुम्हें यह जांचना आवश्यक है कि क्या तुम्हारी प्रेरणाएँ सही हैं। यदि तुम परमेश्वर की माँगों के अनुसार कार्य कर सकते हो, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है। यह निम्नतम मापदंड है। जब तुम अपनी प्रेरणाओं को जाँचते हो, तो यदि उनमें ऐसी प्रेरणाएँ मिल जाएँ जो सही न हों, और यदि तुम उनसे फिर सकते हो और परमेश्वर के वचनों के अनुसार कार्य कर सकते हो, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति बन जाओगे जो परमेश्वर के समक्ष सही है, और जो दर्शाएगा कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है, और तुम जो कुछ करते हो वह परमेश्वर के लिए है, न कि तुम्हारे अपने लिए। तुम जब भी कुछ करते या कहते हो, तो तुम्हें अपने हृदय को सही रखना, और धर्मी बनना चाहिए, और अपनी भावनाओं में नहीं बहना चाहिए, या तुम्हारी अपनी इच्छा के अनुसार कार्य नहीं करना चाहिए। ये ऐसे सिद्धांत हैं जिनमें परमेश्वर के विश्वासी स्वयं आचरण करते हैं। एक व्यक्ति की प्रेरणाएँ और उसका महत्व छोटी बातों में प्रकट हो सकता है, और इस प्रकार, परमेश्वर द्वारा सिद्ध बनाए जाने के मार्ग में प्रवेश करने के लिए लोगों को पहले उनकी अपनी प्रेरणाओं और परमेश्वर के साथ उनके संबंध का समाधान करना आवश्यक है। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होता है, केवल तभी तुम परमेश्वर के द्वारा सिद्ध किए जाओगे, और केवल तभी तुम में परमेश्वर का व्यवहार, काट-छाँट, अनुशासन और शोधन अपने वांछित प्रभाव को पूरा कर पाएगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?" से

यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर के साथ किसी के संबंध को सही करना उसकी आत्मिक यात्रा में प्रवेश करने का पहला कदम है। यद्यपि मनुष्य का गंतव्य या उसकी मंजिल परमेश्वर के हाथों में है, और परमेश्वर के द्वारा पूर्वनिर्धारित की जा चुकी है, और उनके स्वयं के द्वारा बदली नहीं जा सकती, फिर भी तुम सिद्ध बनाए जा सकते हो या नहीं या परमेश्वर के द्वारा स्वीकार किए जा सकते हो या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है या नहीं। शायद तुम्हारे कुछ भाग हैं जो कमजोर या अवज्ञाकारी हैं - परंतु जब तक तुम्हारा दृष्टिकोण सही है और तुम्हारी प्रेरणाएँ उचित हैं, और जब तक तुमने परमेश्वर के साथ अपने संबंध को सही रखा है और इसे सामान्य रखा है, तब तक तुम परमेश्वर के द्वारा सिद्ध बनाए जाने के योग्य हो जाओगे। यदि तुम्हारा परमेश्वर के साथ सही संबंध नहीं है, और तुम देह के लिए या अपने परिवार के लिए कार्य करते हो, तो चाहे तुम जितनी भी मेहनत करो, यह व्यर्थ ही होगा। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है, तो बाकी सब कुछ भी व्यवस्थित हो जाएगा। परमेश्वर किसी और बात को नहीं देखता, परंतु वह केवल यही देखता है कि क्या परमेश्वर पर विश्वास करने के तुम्हारे दृष्टिकोण सही हैं : तुम किस पर विश्वास करते हो, तुम किसके लिए विश्वास करते हो, और तुम क्यों विश्वास करते हो। यदि तुम इन बातों को स्पष्ट रूप से देख सकते हो, और अपने दृष्टिकोणों और कार्य को सही रख सकते हो, तब तुम्हारा जीवन उन्नति करेगा, और तुम निश्चित रूप से सही मार्ग में प्रवेश कर सकते हो। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य नहीं है, और परमेश्वर में विश्वास करने के तुम्हारे दृष्टिकोण पथभ्रष्ट हैं, तो ये शेष सब बातों को भी असंभव बना देंगे। इसका कोई महत्व नहीं है कि तुम परमेश्वर पर कैसा विश्वास करते हो, तुम कुछ भी प्राप्त नहीं कर पाओगे। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होता है, केवल तभी तुम परमेश्वर के द्वारा प्रमाणित ठहरोगे जब देह की बातों से फिर जाओगे, प्रार्थना करोगे, दुःख उठाओगे, सहन करोगे, आज्ञा मानोगे, अपने भाइयों और बहनों की सहायता करोगे, परमेश्वर के लिए और अधिक प्रयास करोगे इत्यादि।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?" से

यदि तुम एक उचित आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करना चाहते हो और परमेश्वर के साथ एक उचित संबंध स्थापित करना चाहते हैं, तो तुमको पहले उसे अपना हृदय अर्पित करना होगा, और अपने हृदय को उनके सामने शांत करना होगा। अपने पूरे हृदय को परमेश्वर की स्तुति में डुबोकर ही तुम धीरे-धीरे एक उचित आध्यात्मिक जीवन का विकास कर सकते हो। यदि लोग परमेश्वर को अपना हृदय अर्पित नहीं करते हैं और उस पर पूरी तरह विश्वास नहीं करते हैं, और अगर उनका दिल उन्हें महसूस नहीं करता है और वे परमेश्वर के बोझ को अपना बोझ नहीं मानते हैं, तो जो कुछ भी वो कर रहे हैं उससे केवल परमेश्वर को धोखा दे रहे हैं, और ये धार्मिक व्यक्तियों का केवल व्यवहार है—ये परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त नहीं कर सकता है।

अनुभव से यह देखा जा सकता है कि सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक है परमेश्वर के सामने अपने दिल को शांत करना। यह एक ऐसा मुद्दा है जो लोगों के आध्यात्मिक जीवन से और उनके जीवन के विकास से संबंधित है। तुम्हारा दिल जब परमेश्वर के सामने शांत रहेगा, केवल तभी सत्य की तुम्हारी खोज और तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तनों का फल प्राप्त होगा। तुम परमेश्वर के सामने बोझ से दबे हुए आते हो और तुम हमेशा महसूस करते हो कि तुम्हारे जीवन में बहुत कमियाँ हैं, ऐसे कई सत्य हैं जिन्हें तुमको जानना है, ऐसी कई वास्तविकताएं हैं जो तुमको अनुभव करने की आवश्यकता है, और यह कि तुमको अपनी हर चिंता परमेश्वर की इच्छा पर छोड़ देनी चाहिए—ये बातें हमेशा तुम्हारे दिमाग़ में चलती रहती हैं, और ऐसा लगता है जैसे ये बातें तुम पर इतना दबाव डाल रही हैं कि तुम्हारे लिए साँस लेना मुश्किल हो गया है, और यही वजह है कि तुम्हारा दिल भारी-भारी महसूस करता है (लेकिन एक नकारात्मक तरह से नहीं)। केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के वचनों की प्रबुद्धता को स्वीकार करने और परमेश्वर की आत्मा से प्रेरित होने के योग्य हैं। यह उनके बोझ की वजह से है, क्योंकि उनका दिल भारी-भारी महसूस करता है, और, कहा जा सकता है कि परमेश्वर के सामने जो कीमत वे अदा कर चुके हैं और जिस पीड़ा से वे गुज़र चुके हैं उसके कारण वे उसकी प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त करते हैं, क्योंकि परमेश्वर किसी का विशेष रूप से सत्कार नहीं करता है। लोगों के प्रति अपने व्यवहार में वह हमेशा निष्पक्ष रहता है, लेकिन वह लोगों को जो प्रदान करता है वह उसे मनमाने ढंग से और बिना किसी शर्त के नहीं देता है। यह उसके धर्मी स्वभाव का एक पहलू है। वास्तविक जीवन में, अधिकांश लोग अभी तक इस क्षेत्र को प्राप्त करने से दूर हैं। कम से कम, उनका दिल अभी भी पूरी तरह से परमेश्वर की ओर नहीं झुका है, और इसलिए उनके जीवन स्वभाव में अभी भी कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हो पाया है। इसका कारण यह है कि वे केवल परमेश्वर की कृपा के बीच रहते हैं, लेकिन वे अभी भी पवित्र आत्मा के कार्य को हासिल नहीं कर पाए हैं। लोगों का उपयोग करने के लिए परमेश्वर इन मानदंडों का इस्तेमाल करता है: उनका दिल परमेश्वर की ओर झुका होता है, परमेश्वर के वचनों का उनपर बोझ पड़ता है, उनके पास तड़पता हुआ दिल और सत्य को तलाशने का संकल्प होता है। केवल ऐसे लोग ही पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त कर सकते हैं और अक्सर प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त कर पाते हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के साथ एक उचित संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है" से

पहले प्रार्थना से आरम्भ कर: परमेश्वर के सामने शांति के साथ प्रार्थना करना बहुत फलदायक है। इसके पश्चात परमेश्वर के वचन को खा और पी, उसके वचनों पर मनन करके उससे प्रकाश पाने का प्रयास कर, अभ्यास करने की राह ढूँढने का प्रयत्न कर, परमेश्वर की कही गई बातों का उद्देश्य जान और भटकाव के बिना समझ। आमतौर से, अपने हृदय में सामान्य रूप से परमेश्वर के निकट आ, परमेश्वर के प्रेम पर मनन कर, बाहरी चीज़ों से प्रभावित हुये बिना, उसके वचनों पर मनन कर। जब तेरा हृदय उस सीमा तक शांत हो कि तू ध्यान लगाने में सक्षम हो, ताकि तू अपने अंदर परमेश्वर के प्रेम पर मनन कर सके और वास्तव में परमेश्वर के निकट आ सके, चाहे जो भी तेरा वातावरण हो, और तब तू एक ऐसी अवस्था में पहुँच जाता है कि तू अपने हृदय में प्रशंसा करता है, और यह प्रार्थना करने से भी अच्छा है, तब तू एक विशेष कद को प्राप्त करेगा। यदि ऊपर कही गयी अवस्थाएं तू प्राप्त कर पाते है तो यह प्रमाणित हो जाएगा कि तेरा हृदय परमेश्वर के समक्ष सही मायने में शांत है। यह पहला क़दम है; यह एक मूल अभ्यास है। जब लोग परमेश्वर के सामने शांत होने में सक्षम होंगे तभी पवित्र आत्मा के द्वारा प्रबुद्ध और प्रकाशित होंगे, केवल तभी वे परमेश्वर के साथ वास्तविक संवाद कर पायेंगे और परमेश्वर की इच्छा और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन को समझ पायेंगे, और इससे वे आध्यात्मिक जीवन की सही राह पर प्रवेश कर पायेंगे। ...

परमेश्वर के वचनों का ध्यान करना और प्रार्थना करना, साथ ही साथ परमेश्वर के वास्तविक वचनों को खाना और पीना – यही है वह पहला क़दम जिससे हम परमेश्वर के समक्ष शांति में रह सकते हैं। यदि तू वास्तव में परमेश्वर के समक्ष शांत रह सकता है तो पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और प्रकाश तेरे साथ रहेगी।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के समक्ष अपने आप को शांत रखना" से

परमेश्वर का साथ उनका सम्बन्ध सबसे अधिक सीधा सम्बन्ध होता है। प्रार्थना के दौरान लोगों और परमेश्वर के मध्य का सम्बन्ध सबसे अधिक घनिष्ठ बन जाता है। जब तुम कुछ कर रहे होते हो तो क्या तुम प्रायः उसी समय घुटने टेकते और प्रार्थना करते हो? परमेश्वर के साथ लोगों का सम्बन्ध सबसे करीबी होता है, जब वे घुटने टेकते और प्रार्थना करते हैं। जब तुम सब परमेश्वर के वचन पढ़ रहे होते हो, तो यदि तुम प्रार्थना करते और तब पुनः पढ़ते हो, तो तुम भिन्न महसूस करोगे। यदि तुम कुछ समय तक प्रार्थना नहीं करते हो, तब तुम परमेश्वर के वचनों को नहीं समझोगे, जब तुम उन्हें पढ़ोगे। जब तुम उनका अध्ययन समाप्त कर दोगे, तो तुम सब उनके अर्थ को नहीं जानोगे।

... प्रार्थना का उद्देश्य यह है कि लोग परमेश्वर की उपस्थिति में आ सकें और उन वस्तुओं को प्राप्त कर सकें, जिन्हें परमेश्वर उन्हें देना चाहता है। यदि तुम अक्सर प्रार्थना करते और अक्सर परमेश्वर की उपस्थिति में आते हो, तब तुम्हारा परमेश्वर के साथ एक नियमित सम्बन्ध होगा, और तुम सदैव परमेश्वर के द्वारा प्रेरित किये जाओगे, सर्वदा उसके प्रावधान प्राप्त करोगे; और इस लिए तुम रूपान्तरित कर दिए जाओगे, तुम्हारी परिस्थितियाँ निरन्तर सुधरेंगी और बदतर नहीं होंगी। विशेषतः जब भाई और बहनें प्रार्थना में एकसाथ एकत्र होंते हैं। जब प्रार्थना समाप्त हो जाती है, तब वहाँ एक असाधारण रूप से बड़ी मात्रा में ऊर्जा होती है, प्रत्येक का मुखमण्डल पसीने से भरा हुआ रहता है, और वे अनुभव करते हैं कि उन्होंने अनेक चीज़ें प्राप्त की हैं। वास्तव में तो, कुछ दिन एक साथ रहने के पश्चात उन्होंने अधिक संवाद नहीं किया, यह प्रार्थना ही थी, जिसने उनकी ऊर्जा को उत्तेजित किया, और वे अभिलाषा करते हैं कि वे एकसाथ अपने परिवारों और संसार को त्याग दें, वे अभिलाषा करते हैं कि सब कुछ त्याग दें, परमेश्वर को छोड़कर सब कुछ। तुम देखते हो कि उनकी ऊर्जा कितनी अधिक है।

"मसीह के प्रवचनों के अभिलेख" से "प्रार्थना का महत्व और अभ्यास" से

एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन का मतलब है परमेश्वर के समक्ष जीवन जीना। प्रार्थना करते समय एक व्यक्ति परमेश्वर के सामने अपने दिल को शांत कर सकता है, और प्रार्थना के माध्यम से पवित्र आत्मा से ज्ञान पाने की कामना कर सकता है, परमेश्वर के वचनों को जान सकता है, और परमेश्वर की इच्छा को समझ सकता है। परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते समय कोई व्यक्ति इस बात पर और अधिक साफ़ और स्पष्ट हो सकता है कि; परमेश्वर इस वक़्त क्या करना चाहते हैं, और रूढ़िवादी न होते हुए वह अभ्यास का एक नया रास्ता पा सकता है ताकि उसके अभ्यास का उद्देश्य केवल जीवन में प्रगति प्राप्त करना हो। उदाहरण के तौर पर, किसी की प्रार्थना अच्छे शब्दों का इस्तेमाल करने के उद्देश्य से नहीं होती, या परमेश्वर के सामने अपने कर्तव्य को व्यक्त करने के लिए ऊँचे स्वर में पुकारने के लिए नहीं होती, बल्कि यह किसी व्यक्ति के आत्मा का अभ्यास करने के लिए, परमेश्वर के सामने अपने दिल को शांत करने के लिए, हर चीज में मार्गदर्शन की खोज करने के लिए,अपने दिल को ऐसा दिल बनाने के लिए होती है जो हर दिन नए प्रकाश की ओर खिंचा जाता है, यह निष्क्रिय और आलसी होने के लिए नहीं बल्कि परमेश्वर के शब्दों के अभ्यास के सही मार्ग पर चलने के लिए होती है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन के सम्बन्ध में" से

यदि तुम एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन जीना चाहते हो, तो तुम्हें रोज़ाना नया प्रकाश प्राप्त करने की और परमेश्वर के वचनों की सही समझ खोजने की जरुरत है और सच्चाई में एक स्पष्टता हासिल करनी है। हर चीज में अभ्यास करने के लिए तुम्हारे पास एक मार्ग होना चाहिए, और हर दिन परमेश्वर के वचनों को पढ़ कर तुम्हें नए सवाल मिल सकते हैं और तुम्हें अपनी कमियों का ज्ञान मिल सकता है। फिर यह एक ऐसा दिल सामने लाएगा जो प्यासा है और जो ढूँढता है, जो तुम्हारे संपूर्ण अस्तित्व को गति देगा, और तुम किसी भी समय परमेश्वर के सामने शांत रह सकोगे, और तुममें पीछे रह जाने का डर होगा। अगर किसी व्यक्ति के पास ऐसा प्यासा दिल हो, ऐसा खोजी ह्रदय हो, और जो लगातार प्रवेश करने के लिए भी तैयार हो, तो वे एक आध्यात्मिक जीवन के सही रास्ते पर हैं। वे सभी जो पवित्र आत्मा से प्रेरित होना स्वीकार कर सकते हैं, जो प्रगति करना चाहते हैं, जो ईश्वर द्वारा सिद्ध किये जाने के लिए तैयार हैं, जो परमेश्वर के वचनों की गहरी समझ के लिए तड़पते हैं, और जो अलौकिक की खोज नहीं करते, लेकिन जो व्यावहारिक मूल्य चुकाते हैं, जो परमेश्वर की इच्छा के लिए व्यावहारिक विचार दिखाते हैं, वे व्यावहारिक रूप से प्रवेश करते हैं, अपना अनुभव अधिक सच्चा और अधिक वास्तविक बनाते हैं, जो सिद्धांतों के खाली शब्दों को नहीं खोजा करते, और जो अलौकिक भावना भी नहीं खोजते, और न ही किसी महान व्यक्ति की पूजा करते हैं- इस तरह के व्यक्ति एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश कर चुके हैं, और जो कुछ वे करते हैं वह जीवन में और अधिक प्रगति पाने के उद्देश्य से करते हैं, अपनी आत्मा को स्थिर नहीं बल्कि निर्मल रखने के लिए करते हैं, और इसलिए करते हैं ताकि वे हमेशा सकारात्मक रूप से प्रवेश करने में सक्षम हों।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन के सम्बन्ध में" से

यदि तुम आज के प्रकाश का अनुसरण करने में असमर्थ हो, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंध में एक दूरी शुरू हो गई है-हो सकता है कि यह संबंध शायद टूट भी चुका हो—और तुम एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन से रहित हो गए हो। परमेश्वर के साथ एक सामान्य सम्बन्ध परमेश्वर के वास्तविक वचनों को स्वीकार करने की नींव पर निर्मित किया जाता है। क्या तुम्हारे पास एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन है? क्या तुम्हारे पास परमेश्वर के साथ एक सामान्य सम्बन्ध है? क्या तुम कोई ऐसे व्यक्ति हो जो पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करता है? अगर तुम आज पवित्र आत्मा की ज्योति का अनुसरण कर सकते हो, और परमेश्वर की इच्छा को उसके वचनों के भीतर समझ सकते हो, और इन वचनों में प्रवेश कर सकते हो, तो तुम कोई ऐसे व्यक्ति हो जो पवित्र आत्मा की धारा का अनुसरण करता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और परमेश्वर के चरण-चिन्हों का अनुसरण करो" से

जब कोई व्यक्ति परमेश्वर में विश्वास करता है और जीवन में प्रवेश करने का प्रयास करता है और अपने स्वभाव में बदलाव का प्रयास करता है, तो उसे एक मूल्य अवश्य चुकाना चाहिए और वह अवस्था प्राप्त करनी चाहिए जहाँ वह हमेशा परमेश्वर का अनुसरण करेगा इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर क्या करता है। यह ऐसा कुछ है जिसे लोगों को अवश्य करना चाहिए। यद्यपि तुम इस सब का एक नियम के रूप में पालन करते हो, तो तुम्हें इस पर टिके अवश्य रहना चाहिए, और इस बात की परवाह किए बिना कि परीक्षण कितने बड़े हैं, तुम परमेश्वर के साथ अपने सामान्य रिश्ते को जाने नहीं दे सकते हो। तुम्हें प्रार्थना करने, अपने कलीसिया जीवन को बनाए रखने, और भाइयों और बहनों के साथ रहने में सक्षम होना चाहिए। जब परमेश्वर तुम्हारी परीक्षा लेता है, तब भी तुम्हें सच्चाई की तलाश करनी चाहिए। यह आध्यात्मिक जीवन के लिए न्यूनतम है। हमेशा तलाश करने वाला दिल रखते हुए और सहयोग करते हुए, अपनी समस्त ऊर्जा को लगाते हुए—क्या इसे किया जा सकता है? इस आधार पर, विवेक और वास्तविकता में प्रवेश करना कुछ ऐसा होगा जो तुम प्राप्त कर सकते हो। तुम्हारी स्वयं की अवस्था सामान्य होने पर परमेश्वर का वचन स्वीकार करना आसान है, और सच्चाई का अभ्यास करना मुश्किल नहीं लगता है, और तुम्हें लगता है कि परमेश्वर का काम महान है। लेकिन यदि तुम्हारी हालत खराब है, तब इससे फ़र्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर का काम कितना महान है और इससे फ़र्क नहीं पड़ता है कि कोई कितनी अच्छी तरह से बोलता है, तुम कोई ध्यान नहीं दोगे। जब किसी व्यक्ति की हालत सामान्य नहीं होती हैं, तो परमेश्वर उसमें काम नहीं कर सकता है, और वह अपने स्वभाव में परिवर्तन नहीं ला सकता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति अवश्य बनाए रखनी चाहिए" से

यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा उचित संबंध नहीं है, तो चाहे तुम दूसरों के साथ संबंध बनाए रखने की जितनी भी कोशिश कर लो, चाहे तुम जितनी भी मेहनत कर लो या जितनी भी ताक़त लगा दो, वह तब भी जीवन के मानवीय दर्शनशास्त्र का हिस्सा रहेगा। वह तुम लोगों के बीच एक मानवीय दृष्टिकोण और मानवीय दर्शनशास्त्र के माध्यम से अपनी स्थिति बनाकर रख रहा है ताकि वे तुम्हारी प्रशंसा करे। तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार लोगों के साथ उचित संबंध स्थापित नहीं करते हैं। यदि तुम लोगों के साथ अपने संबंधों पर ध्यान केंद्रित नहीं करते हो लेकिन परमेश्वर के साथ एक उचित संबंध बनाए रखते हो, अगर तुम अपने दिल को परमेश्वर को देने के लिए और उसकी आज्ञा का पालने करने के लिए तैयार हो, तो बहुत स्वाभाविक है कि सभी लोगों के साथ तुम्हारे संबंध सही हो जाएंगे। इस तरह से, ये संबंध शरीर के स्तर पर स्थापित नहीं होंगे, बल्कि परमेश्वर का प्रेम इनकी बुनियाद होगा। शरीर के आधार लगभग कोई मेलजोल नहीं होता है, लेकिन उसकी आत्मा में साहचर्य है, और साथ ही साथ प्रेम, आराम और एक दूसरे के लिए आदान-प्रदान की भावना है। यह सब एक ऐसे हृदय पर आधारित होता है, जो परमेश्वर को संतुष्ट करता हो। ये संबंध जीवन के मानवीय दर्शनशास्त्र के आधार पर नहीं बनाए रखे जाते हैं, बल्कि वे बहुत ही स्वाभाविक रूप से परमेश्वर के लिए बोझ के माध्यम से बनते हैं। इसके लिए मानवीय प्रयासों की आवश्यकता नहीं होती—परमेश्वर के वचन के सिद्धांतों के माध्यम से उन पर चला जाता है।…लोगों के बीच एक उचित संबंध परमेश्वर को अपना दिल सौंपने की नींव पर स्थापित होता है; यह मानवीय प्रयासों के माध्यम से प्राप्त नहीं किया जाता। परमेश्वर के बिना, लोगों के बीच संबंध केवल शरीर के स्तर पर रह जाते हैं। वे उचित नहीं होते, बल्कि वासना से आसक्त होते हैं—वे ऐसे रिश्ते होते हैं जिनसे परमेश्वर घृणा करता है, जिनसे वह नफ़रत करता है। यदि तुम कहते हो कि तुम्हारी आत्मा पर प्रभाव हुआ है, लेकिन तुम हमेशा उन लोगों के साथ साहचर्य चाहते हो जो तुमको आकर्षित करते हैं, जिन्हें तुम उत्कृष्ट मानते हो, और वहीं एक दूसरा साधक है जो तुमको आकर्षित नहीं करता है, जिसके बारे में तुम्हारे पूर्वाग्रह हैं और तुम उनके साथ मेलजोल नहीं करते हो, तो यह भी प्रमाण है कि तुम एक भावुक व्यक्ति हो और परमेश्वर के साथ तुम्हारे उचित संबंध नहीं हैं। तुम परमेश्वर को धोखा देने का और अपनी कुटिलता को छिपाने का प्रयास कर रहे हो। अगर तुम कुछ समझ साझा कर पाते हो, लेकिन तुम्हारे इरादे गलत हैं, तो तुम जो कुछ भी करते हो वे केवल मानवीय मानकों से ही अच्छे हैं। परमेश्वर तुम्हारी प्रशंसा नहीं करेगा—तुम शरीर के अनुसार काम कर रहे हो, परमेश्वर के बोझ के अनुसार नहीं। यदि परमेश्वर के सामने तुम अपने दिल को शांत करने में सक्षम हो और उन सभी लोगों के साथ तुम्हारे उचित संबंध हैं जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, केवल तब ही तुम परमेश्वर के उपयोग के लिए उपयुक्त होगे। इस तरह से चाहे तुम दूसरों के साथ जैसे भी जुड़े हो, तुम जीवन के दर्शनशास्त्र के अनुसार नहीं जुड़ोगे, बल्कि यह परमेश्वर के सामने जीना होगा, उसके बोझ के प्रति विचारशील होना होगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के साथ एक उचित संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है" से

पिछला:सच्चे मार्ग की खोज में तुम्हें तर्कशक्ति से सम्पन्न अवश्य होना चाहिए

अगला:पवित्र शिष्टता जो परमेश्वर के विश्वासियों को धारण करनी चाहिए

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