3. परमेश्वर पर विश्वास में, तुम्हें परमेश्वर के साथ सामान्य सम्बन्ध स्थापित करना चाहिए
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
परमेश्वर में विश्वास करने में, तुम्हें कम से कम परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध रखने के मुद्दे का समाधान करना आवश्यक है। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा सामान्य संबंध नहीं है, तो परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास का अर्थ खो जाता है। परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना परमेश्वर की उपस्थिति में शांत रहने वाले हृदय के साथ पूर्णतया संभव है। परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रखने का अर्थ है परमेश्वर के किसी भी कार्य पर संदेह न करने या उससे इनकार न करने और उसके कार्य के प्रति समर्पित रहने में सक्षम होना। इसका अर्थ है परमेश्वर की उपस्थिति में सही इरादे रखना, स्वयं के बारे में योजनाएँ न बनाना, और सभी चीजों में पहले परमेश्वर के परिवार के हितों का ध्यान रखना; इसका अर्थ है परमेश्वर की जाँच को स्वीकार करना और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना। तुम जो कुछ भी करते हो, उसमें तुम्हें परमेश्वर की उपस्थिति में अपने हृदय को शांत करने में सक्षम होना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर के इरादों को नहीं भी समझते, तो भी तुम्हें अपनी सर्वोत्तम योग्यता के साथ अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को पूरा करना चाहिए। एक बार परमेश्वर के इरादे तुम पर प्रकट हो जाते हैं, तो फिर उन पर अमल करो, यह बहुत विलंब नहीं होगा। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य हो जाता है, तब लोगों के साथ भी तुम्हारा संबंध सामान्य होगा। परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध बनाने के लिए, सबकुछ परमेश्वर के वचनों की नींव पर बनाया जाना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के वचनों और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य निभाना चाहिए, तुम्हें अपने विचार एकदम सरल रखने चाहिए और हर चीज में सत्य खोजना चाहिए। जब तुम सत्य समझ जाओ तो तुम्हें सत्य का अभ्यास करना चाहिए, और चाहे तुम्हारे साथ कुछ भी हो, तुम्हें परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और उसके प्रति समर्पण करने वाले हृदय से खोजना करना चाहिए। इस प्रकार अभ्यास करते हुए, तुम परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध बना पाओगे। साथ ही अपने कर्तव्य का उचित ढंग से पालन करते हुए, तुम्हें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि तुम ऐसा कुछ भी न करो जिससे परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन प्रवेश को लाभ न हो, और ऐसा कुछ भी न कहो जो भाई-बहनों की मदद न करे। तुम्हें ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए जो तुम्हारे जमीर के विरुद्ध हो और वह तो बिलकुल नहीं करना चाहिए जो शर्मनाक हो। तुम्हें खासकर ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जो परमेश्वर से विद्रोह करे या उसका विरोध करे, और ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए जो कलीसिया के कार्य या जीवन को बाधित करे। अपने हर कार्य में न्यायसंगत और सम्माननीय रहो और सुनिश्चित करो कि तुम्हारा हर कार्य परमेश्वर के समक्ष प्रस्तुत करने योग्य हो। यद्यपि कभी-कभी देह कमज़ोर हो सकती है, फिर भी तुम्हें अपने व्यक्तिगत लाभ का लालच न करते हुए, कोई भी स्वार्थी या नीच कार्य न करते हुए, आत्म-चिंतन करते हुए परमेश्वर के परिवार के हित पहले रखने चाहिए। इस तरह तुम अक्सर परमेश्वर के सामने रह सकते हो, और परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध पूरी तरह सामान्य हो जाएगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?
अपने हर कार्य में तुम्हें यह जाँचना चाहिए कि क्या तुम्हारे इरादे सही हैं। यदि तुम परमेश्वर की माँगों के अनुसार कार्य कर सकते हो, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है। यह न्यूनतम मापदंड है। अपने इरादों पर ग़ौर करो, और अगर तुम यह पाओ कि गलत इरादे पैदा हो गए हैं, तो उनके खिलाफ विद्रोह करो और परमेश्वर के वचनों के अनुसार कार्य करो; इस तरह तुम एक ऐसे व्यक्ति बन जाओगे जो परमेश्वर के समक्ष सही है, जो बदले में दर्शाएगा कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है, और तुम जो कुछ करते हो वह परमेश्वर के लिए है, न कि तुम्हारे अपने लिए। तुम जो कुछ भी करते या कहते हो, उसमें अपने हृदय को सही बनाने और अपने कार्यों में न्यायपूर्ण होने में सक्षम बनो, और अपनी भावनाओं से संचालित मत होओ, न अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करो। ये वे सिद्धांत हैं, जिनके अनुसार परमेश्वर के विश्वासियों को आचरण करना चाहिए। छोटी-छोटी बातें व्यक्ति के इरादे और आध्यात्मिक कद प्रकट कर सकती हैं, और इसलिए, परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग में प्रवेश करने के लिए व्यक्ति को पहले अपने इरादे और परमेश्वर के साथ अपना संबंध सुधारना चाहिए। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होता है, केवल तभी तुम परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किए जा सकते हो; केवल तभी तुममें परमेश्वर की काट-छाँट, अनुशासन और शोधन अपना अपेक्षित प्रभाव हासिल कर पाएगा। कहने का अर्थ यह है कि यदि मनुष्य अपने हृदय में परमेश्वर को रखने में सक्षम हैं और वे व्यक्तिगत लाभ के पीछे नहीं भागते या अपनी संभावनाओं पर विचार नहीं करते (देह-सुख के अर्थ में), लेकिन इसके बजाय जीवन प्रवेश का बोझ उठाते, सत्य का अनुसरण करने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करते और परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण करते—अगर तुम ऐसा कर सकते हो, तो जिन लक्ष्यों का तुम अनुसरण करते हो, वे सही होंगे, और परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य हो जाएगा। परमेश्वर के साथ अपना संबंध सही करना व्यक्ति की आध्यात्मिक यात्रा में प्रवेश करने का पहला कदम कहा जा सकता है। यद्यपि मनुष्य का भाग्य परमेश्वर के हाथों में है और वह परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित है, और मनुष्य द्वारा उसे बदला नहीं जा सकता, तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जा सकते हो या नहीं अथवा तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा सकते हो या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है या नहीं। तुम्हारे कुछ हिस्से ऐसे हो सकते हैं, जो कमज़ोर या विद्रोही हों—परंतु जब तक तुम्हारी राय और इरादे सही हैं, और जब तक परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सही और सामान्य है, तब तक तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के योग्य हो। यदि तुम्हारा परमेश्वर के साथ सही संबंध नहीं है, और तुम देह के लिए या अपने परिवार के लिए कार्य करते हो, तो चाहे तुम जितनी भी मेहनत करो, यह व्यर्थ ही होगा। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है, तो बाकी सब चीजें भी ठीक हो जाएँगी। परमेश्वर कुछ और नहीं देखता, केवल यह देखता है कि क्या परमेश्वर में विश्वास करते हुए तुम्हारी राय सही हैं : तुम किस पर विश्वास करते हो, तुम किसके लिए विश्वास करते हो और तुम क्यों विश्वास करते हो। यदि तुम इन बातों को स्पष्ट रूप से देख सकते हो, और अपनी राय अच्छी तरह से रखते हुए अभ्यास करते हो, तो तुम अपने जीवन में उन्नति करोगे, और तुम्हें सही मार्ग पर प्रवेश की गारंटी भी दी जाएगी। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य नहीं है, और परमेश्वर में विश्वास के तुम्हारे विचार विकृत हैं, तो बाकी सब-कुछ बेकार है; तुम कितना भी दृढ़ विश्वास क्यों न करो, तुम कुछ प्राप्त नहीं कर पाओगे। परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होने के बाद ही तुम परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त करोगे, जब तुम देह-सुख के खिलाफ विद्रोह कर दोगे, प्रार्थना करोगे, दुःख उठाओगे, सहन करोगे, समर्पण करोगे, अपने भाई-बहनों की सहायता करोगे, परमेश्वर के लिए खुद को अधिक खपाओगे, इत्यादि।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?
जब लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उससे प्रेम करते हैं और उसे संतुष्ट करते हैं, तो वे अपने हृदय से परमेश्वर के आत्मा को छूते हैं और इसके द्वारा परमेश्वर की संतुष्टि प्राप्त करते हैं; परमेश्वर के वचनों से जुड़ने के लिए वे अपने हृदय का उपयोग करते हैं और इस प्रकार वे उसके आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाते हैं। अगर तुम एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन जीना और परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना चाहते हो, तो तुम्हें पहले उसे अपना हृदय देना चाहिए। अपने हृदय को उसके सामने शांत करने और अपने पूरे हृदय को उस पर उँड़ेलने के बाद ही तुम धीरे-धीरे एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन विकसित करने में सक्षम होगे। अगर परमेश्वर में अपने विश्वास में लोग उसे अपना हृदय नहीं देते, अगर उनका हृदय उसके साथ नहीं होता और वे उसके दायित्व को अपना दायित्व नहीं मानते, तो जो कुछ भी वे करते हैं, वह सब परमेश्वर को धोखा देने का कार्य है, धार्मिक व्यक्तियों का विशिष्ट कार्य, और इसे परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त नहीं होगी। परमेश्वर इस तरह के व्यक्ति से कुछ हासिल नहीं कर सकता, वह परमेश्वर के काम में केवल एक विषमता का कार्य कर सकता है। वे लोग परमेश्वर के घर में सजावट की तरह होते हैं—वे जगह घेरने वाले होते हैं, कचरा होते हैं, और परमेश्वर उनका कोई उपयोग नहीं करता। न केवल उनमें पवित्र आत्मा के काम करने की कोई संभावना नहीं है, बल्कि उन्हें पूर्ण किए जाने का भी कोई मूल्य नहीं है। इस प्रकार का व्यक्ति असली चलती-फिरती लाश होता है। उसका कोई भी हिस्सा पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, वह पूरी तरह से शैतान द्वारा नियंत्रित और गहराई से भ्रष्ट किया जा चुका है। परमेश्वर इन लोगों को निकाल देगा। आज जब पवित्र आत्मा लोगों का इस्तेमाल करता है, तो काम पूरे करवाने के लिए वह न सिर्फ उनके वांछित हिस्सों का उपयोग करता है—बल्कि वह उनके उन हिस्सों को पूर्ण भी करता और बदलता है, जो अवांछित हैं। अगर तुम अपना हृदय परमेश्वर में उँड़ेलने और उसे उसके सामने शांत करने में सक्षम हो, तो तुम्हारे पास पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए जाने और उस की प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त करने का अवसर और योग्यता होगी। इससे भी बढ़कर, तुम्हारे पास पवित्र आत्मा द्वारा तुम्हारी कमियाँ दूर किए जाने का अवसर होगा। जब तुम अपना हृदय परमेश्वर को देते हो, तो सकारात्मक पक्ष में, तुम अधिक गहन प्रवेश और अंतर्दृष्टि का एक उच्च तल प्राप्त कर सकोगे। नकारात्मक पक्ष में, तुम अपनी अपूर्णताओं और कमियों का अधिक ज्ञान प्राप्त कर लोगे और परमेश्वर के इरादे पूरे करने के लिए ज्यादा लालायित होगे और ज्यादा खोजोगे। इसके अलावा, तुम नकारात्मक नहीं रहोगे, सक्रिय रूप से प्रवेश कर पाओगे। यह दर्शाता है कि तुम एक सही व्यक्ति हो।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है
अगर तुम परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना चाहते हो तो तुम्हारा हृदय उसकी तरफ मुड़ना चाहिए; फिर इसी बुनियाद पर तुम दूसरे लोगों के साथ भी सामान्य संबंध रखोगे। अगर परमेश्वर के साथ तुम्हारा सामान्य संबंध नहीं है तो चाहे तुम दूसरों के साथ संबंध बनाए रखने के लिए कुछ भी कर लो, चाहे तुम जितनी भी मेहनत कर लो या जितना भी प्रयास लगा दो, यह सब सांसारिक आचरण का इंसानी फलसफा होगा। तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार सामान्य पारस्परिक संबंध स्थापित करने के बजाय लोगों के बीच अपनी स्थिति कायम रख रहे होगे और इंसानी दृष्टिकोणों और इंसानी फलसफों के जरिये उनकी प्रशंसा प्राप्त कर रहे होगे। अगर तुम दूसरे लोगों के साथ अपने संबंधों पर ध्यान केंद्रित नहीं करते हो, बल्कि इसके बजाय परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध बनाए रखते हो और तुम परमेश्वर को अपना हृदय देने और उसके प्रति समर्पण करना सीखने के लिए तैयार हो, तो सभी लोगों के साथ तुम्हारे संबंध भी स्वाभाविक रूप से सामान्य हो जाएँगे। तब ये संबंध देह पर नहीं, बल्कि परमेश्वर के प्रेम की बुनियाद पर निर्मित होंगे। दूसरे लोगों के साथ तुम्हारा लगभग कोई दैहिक मिलना-जुलना नहीं होगा, बल्कि आध्यात्मिक स्तर पर संगति होगी और साथ ही आपसी प्रेम, सांत्वना और पोषण होगा। यह सब परमेश्वर को संतुष्ट करने की इच्छा की बुनियाद पर किया जाता है—ये संबंध इंसानी सांसारिक आचरण के फलसफों के जरिये नहीं बनाए रखे जाते, ये स्वाभाविक रूप से तब बनते हैं, जब तुम्हारे पास परमेश्वर के लिए बोझ की भावना होती है। उनके लिए तुम्हारी ओर से किसी इंसानी प्रयास की आवश्यकता नहीं होती और तुम्हें सिर्फ परमेश्वर के वचनों के सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने की आवश्यकता होती है। क्या तुम परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होने के लिए तैयार हो? क्या तुम उसके सामने “विवेक रहित” व्यक्ति बनने के लिए तैयार हो? क्या तुम अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर को देने और अन्य लोगों के बीच अपनी स्थिति की परवाह न करने के लिए तैयार हो? तुम जिन लोगों से बातचीत करते हो, उन सभी में से किसके साथ तुम्हारे सबसे अच्छे संबंध हैं? किसके साथ तुम्हारे सबसे खराब संबंध हैं? क्या लोगों के साथ तुम्हारे संबंध सामान्य हैं? क्या तुम सभी लोगों से समान व्यवहार करते हो? क्या दूसरों के साथ तुम्हारे संबंध तुम्हारे सांसारिक आचरण के फलसफे पर आधारित हैं, या वे परमेश्वर के प्रेम की बुनियाद पर बने हैं? जब लोग परमेश्वर को अपना हृदय नहीं देते, तो उनकी आत्मा सुस्त, सुन्न और अचेत हो जाती है। ऐसे लोग कभी परमेश्वर के वचनों को नहीं समझेंगे, उनका परमेश्वर के साथ कभी सामान्य संबंध नहीं होगा, और वे कभी अपने स्वभाव में परिवर्तन हासिल नहीं करेंगे। अपना स्वभाव बदलना अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर को देने और उसके वचनों से प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त करने की प्रक्रिया है। परमेश्वर का कार्य लोगों को सक्रियता से प्रवेश करने देता है, और वह उन्हें अपना ज्ञान प्राप्त करने के बाद अपने नकारात्मक हिस्से दूर करने में सक्षम बनाता है। जब तुम अपना हृदय परमेश्वर को दे देते हो, तो तुम हर बार यह महसूस करने में सक्षम होगे कि तुम्हारी आत्मा थोड़ी प्रेरित हुई है, और तुम परमेश्वर की प्रबुद्धता और रोशनी के हर हिस्से को जान जाओगे। अगर तुम दृढ़ रहते हो, तो तुम धीरे-धीरे पवित्र आत्मा द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग में प्रवेश कर जाओगे। तुम्हारा हृदय परमेश्वर के सामने जितना शांत होगा, तुम्हारी आत्मा उतनी ही अधिक संवेदनशील और नाज़ुक होगी, उतनी ही अधिक वह यह महसूस कर पाएगी कि पवित्र आत्मा किस तरह उसे प्रेरित करता है, और परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध उतना ही अधिक सामान्य हो जाएगा। सामान्य पारस्परिक संबंध अपना हृदय परमेश्वर की ओर मोड़ने की नींव पर स्थापित होते हैं, इंसानी प्रयासों के जरिये नहीं। अगर व्यक्ति के हृदय से परमेश्वर अनुपस्थित है, तो अन्य लोगों के साथ उसके संबंध केवल दैहिक हैं। वे सामान्य नहीं हैं, वे कामुक आसक्तियाँ हैं, परमेश्वर उनसे घृणा करता है और उन्हें नापसंद करता है। अगर तुम कहते हो कि तुम्हारी आत्मा प्रेरित हुई है, लेकिन तुम केवल उन्हीं लोगों के साथ संगति करना चाहते हो जिन्हें तुम पसंद करते हो और जिनका सम्मान करते हो, और जिन्हें तुम पसंद नहीं करते, उनके प्रति पूर्वाग्रह रखते हो और जब वे तुमसे कुछ जानने के लिए आते हैं तो उनके साथ बोलने से इनकार कर देते हो, तो यह इस बात का और भी अधिक प्रमाण है कि तुम अपनी भावनाओं से नियंत्रित हो और परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध बिलकुल भी सामान्य नहीं है। यह दर्शाता है कि तुम परमेश्वर को मूर्ख बनाने और अपनी कुरूपता छिपाने का प्रयास कर रहे हो। तुम अपना कुछ ज्ञान साझा करने में सक्षम हो सकते हो, लेकिन अगर तुम्हारे इरादे गलत हैं, तो जो कुछ भी तुम करते हो, वह केवल इंसानी मानकों से ही अच्छा है, और परमेश्वर तुम्हें स्वीकृति नहीं देगा। तुम्हारे कार्य तुम्हारी देह से संचालित होंगे, परमेश्वर के दायित्व से नहीं। तुम केवल तभी परमेश्वर के उपयोग के लिए उपयुक्त होते हो, जब तुम परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत करने में सक्षम रहते हो और उन सभी के साथ सामान्य संबंध रखते हो जो उससे प्रेम करते हैं। अगर तुम ऐसा कर सकते हो, तो तुम चाहे दूसरों के साथ कैसे भी बातचीत करो, तुम किसी सांसारिक आचरण के फलसफे के अनुसार कार्य नहीं कर रहे होगे, तुम परमेश्वर के दायित्व का विचार कर रहे होगे और उसके सामने जी रहे होगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है
परमेश्वर के हर कथन को पढ़ो और जैसे ही तुम उन्हें समझ जाओ, उन पर अमल करना शुरू कर दो। शायद कुछ अवसरों पर तुम्हारी देह कमज़ोर थी, या तुम विद्रोही थे, या तुमने प्रतिरोध किया; इस बात की परवाह न करो कि अतीत में तुमने किस तरह का व्यवहार किया था, यह कोई बड़ी बात नहीं है, और यह आज तुम्हारे जीवन को परिपक्व होने से नहीं रोक सकती। अगर आज तुम परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रख सकते हो, तो आशा की किरण बाकी है। यदि हर बार परमेश्वर के वचन पढ़ने पर तुममें परिवर्तन होता है, और दूसरे लोग बता सकते हैं कि तुम्हारा जीवन बदलकर बेहतर हो गया है, तो यह दिखाता है कि अब तुम्हारा परमेश्वर के साथ संबंध सामान्य है और उसे सही रखा गया है। परमेश्वर लोगों से उनके अपराधों के अनुसार व्यवहार नहीं करता। एक बार जब तुम समझ जाते हो और जागरूक हो जाते हो, जब तुम विद्रोही नहीं रहते और प्रतिरोध करना छोड़ देते हो, तो परमेश्वर फिर भी तुम पर दया करता है। जब तुम्हारे पास परमेश्वर द्वारा तुम्हें पूर्ण किए जाने की समझ और संकल्प होता है, तो परमेश्वर की उपस्थिति में तुम्हारी अवस्था सामान्य हो जाएगी। तुम चाहे कुछ भी कर रहे हो, उसे करते हुए बस इस बात पर ध्यान दो : यदि मैं यह कार्य करूँगा, तो परमेश्वर क्या सोचेगा? क्या इससे मेरे भाई-बहनों को लाभ पहुँचेगा? क्या यह परमेश्वर के घर के कार्य के लिए लाभकारी होगा? अपनी प्रार्थना, संगति, बोलचाल, कार्य और लोगों के साथ संपर्क में अपने इरादों की जाँच करो, और देखो कि क्या परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है? यदि तुम अपने इरादों और विचारों को नहीं समझ सकते, तो इसका अर्थ है कि तुममें विवेक की कमी है, जिससे प्रमाणित होता है कि तुम सत्य को बहुत कम समझते हो। अगर तुम, जो कुछ भी परमेश्वर करता है, उसे स्पष्ट रूप से समझने और परमेश्वर के पक्ष में खड़े होकर चीजों को उसके वचनों के लेंस के माध्यम से देखने में समर्थ हुए, तो तुम्हारे दृष्टिकोण सही हो गए होंगे। अतः परमेश्वर के साथ अच्छे संबंध बनाना हर उस व्यक्ति के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण है, जो परमेश्वर में विश्वास रखता है; सभी को इसे सर्वोपरि महत्त्व का कार्य और अपने जीवन की सबसे बड़ी घटना मानना चाहिए। जो कुछ भी तुम करते हो, उसे इस बात से मापा जाता है कि क्या परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है? यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है और तुम्हारे इरादे सही हैं, तो कार्य करो। परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध बनाए रखने के लिए तुम्हें अपने व्यक्तिगत हितों का नुकसान उठाने से डरने की आवश्यकता नहीं है; तुम शैतान को जीतने नहीं दे सकते, तुम शैतान को अपने ऊपर पकड़ बनाने नहीं दे सकते, और तुम शैतान को तुम्हें हँसी का पात्र बनाने नहीं दे सकते। ऐसे इरादे होना इस बात का संकेत है कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है—यह देह के लिए नहीं है, बल्कि आत्मा की शांति के लिए है, पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने के लिए है और परमेश्वर के इरादे पूरे करने के लिए है। सही स्थिति में प्रवेश करने के लिए तुम्हें परमेश्वर के साथ अच्छा संबंध बनाना और उस पर विश्वास करने के विचारों को सही रखना आवश्यक है। ऐसा इसलिए, ताकि परमेश्वर तुम्हें प्राप्त कर सके और ताकि वह अपने वचन के फल तुममें प्रकट कर सके, और तुम्हें और अधिक प्रबुद्ध और प्रकाशित कर सके। इस प्रकार से तुम सही तरीके में प्रवेश करोगे। परमेश्वर के आज के वचनों को लगातार खाते-पीते रहो, पवित्र आत्मा के कार्य के वर्तमान तरीके में प्रवेश करो, परमेश्वर की आज की माँगों के अनुसार कार्य करो, अभ्यास के पुराने तरीकों का पालन मत करो, कार्य करने के पुराने तरीकों से मत चिपके रहो, और जितना जल्दी हो सके, कार्य करने के आज के तरीके में प्रवेश करो। इस तरह परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध पूरी तरह से सामान्य हो जाएगा और तुम परमेश्वर में विश्वास रखने के सही मार्ग पर चल पड़ोगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?