2. सच्चे मार्ग की खोज में तुम्हारे पास यह विवेक होना चाहिए

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर और मनुष्य के बारे में बराबरी पर बात नहीं की जा सकती। परमेश्वर का सार और कार्य मनुष्य के लिए सर्वाधिक अथाह और समझ से परे है। यदि परमेश्वर मानवजाति के बीच व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य न करे और अपने वचन न कहे तो चाहे कुछ भी हो जाए, मनुष्य कभी भी परमेश्वर के इरादे नहीं समझ पाएगा। और इसलिए वे लोग भी जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन परमेश्वर को समर्पित कर दिया है, उसका अनुमोदन प्राप्त नहीं कर पाएंगे। यदि परमेश्वर कार्य करने के लिए तैयार न हो तो मनुष्य चाहे कितना भी अच्छा क्यों न करे, वह सब व्यर्थ हो जाएगा क्योंकि परमेश्वर के विचार मनुष्य के विचारों से सदैव ऊँचे रहेंगे और परमेश्वर की बुद्धि की थाह कोई भी व्यक्ति नहीं ले सकता है। और इसीलिए मैं कहता हूँ कि जो लोग परमेश्वर और उसके कार्य को “पूरी तरह से समझने” का दावा करते हैं, वे अनाड़ियों की जमात हैं; वे सभी अभिमानी और अज्ञानी हैं। मनुष्य को परमेश्वर के कार्य को परिभाषित नहीं करना चाहिए; और तो और, मनुष्य परमेश्वर के कार्य को परिभाषित नहीं कर सकता। परमेश्वर की दृष्टि में मनुष्य तो एक चींटी से भी छोटा है; तो फिर वह परमेश्वर के कार्य की थाह कैसे पा सकता है? जो लोग गंभीरतापूर्वक यह कहना पसंद करते हैं, “परमेश्वर इस तरह से या उस तरह से कार्य नहीं करता,” या “परमेश्वर ऐसा है या वैसा है”—क्या वे अहंकारपूर्वक नहीं बोलते? हम सबको जानना चाहिए कि मनुष्य, जो कि देह का है, शैतान द्वारा भ्रष्ट किया जा चुका है। मानवजाति की प्रकृति ही है परमेश्वर का विरोध करना। मानवजाति परमेश्वर के समान नहीं हो सकती, परमेश्वर के कार्य के लिए परामर्श देने की उम्मीद तो वह बिलकुल भी नहीं कर सकती। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि परमेश्वर मनुष्य का मार्गदर्शन कैसे करता है, तो यह स्वयं परमेश्वर का कार्य है। यह उचित है कि इस या उस दृष्टिकोण का दावा करने के बजाय मनुष्य को समर्पण करना चाहिए, क्योंकि मनुष्य धूल मात्र है। चूँकि हमारा इरादा परमेश्वर की खोज करने का है, इसलिए हमें परमेश्वर के विचार के लिए उसके कार्य पर अपनी अवधारणाएँ नहीं थोपनी चाहिए, और जानबूझकर और प्रबलता से परमेश्वर के कार्य का विरोध करने के लिए अपने भ्रष्ट स्वभाव का उपयोग तो बिलकुल भी नहीं करना चाहिए। क्या ऐसा करना हमें मसीह-विरोधी नहीं बनाएगा? ऐसे लोग परमेश्वर में विश्वास कैसे कर सकते हैं? चूँकि हम विश्वास करते हैं कि परमेश्वर है, और चूँकि हम उसे संतुष्ट करना और उसे देखना चाहते हैं, इसलिए हमें सत्य के मार्ग की खोज करनी चाहिए, और परमेश्वर के अनुकूल रहने का मार्ग तलाशना चाहिए। हमें परमेश्वर के अड़ियल विरोध में खड़े नहीं होना चाहिए। ऐसे कार्यों से क्या भला हो सकता है?

आज परमेश्वर ने नया कार्य किया है। हो सकता है, तुम इन वचनों को स्वीकार न कर पाओ और ये तुम्हें असामान्य लगें, पर मैं तुम्हें सलाह दूँगा कि तुम फिलहाल अपनी स्वाभाविकता प्रकट मत करो, क्योंकि जो लोग परमेश्वर के समक्ष धार्मिकता के लिए सचमुच भूख-प्यास रखते हैं केवल वे ही सत्य को प्राप्त कर सकते हैं, और जो सचमुच धर्मनिष्ठ हैं केवल वे ही परमेश्वर द्वारा प्रबुद्ध किए जा सकते हैं और उसका मार्गदर्शन पा सकते हैं। नतीजे संयम और शांति के साथ सत्य खोजने से मिलते हैं, झगड़े और विवाद से नहीं। जब मैं यह कहता हूँ कि “आज परमेश्वर ने नया कार्य किया है” तो मैं परमेश्वर के देह में लौटने की बात कर रहा हूँ। शायद ये वचन तुम्हें व्याकुल न करते हों; शायद तुम इनसे घृणा करते हो; या शायद ये तुम्हारे लिए बड़े रुचिकर हों। चाहे जो भी मामला हो, मुझे आशा है कि वे सब, जो परमेश्वर के प्रकट होने के लिए वास्तव में लालायित हैं, इस तथ्य का सामना कर सकते हैं और इसके बारे में झटपट निष्कर्षों पर पहुँचने के बजाय इसकी सावधानीपूर्वक जाँच कर सकते हैं; जैसा कि बुद्धिमान व्यक्ति को करना चाहिए।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना

यीशु की वापसी उन लोगों के लिए एक महान उद्धार है, जो सत्य को स्वीकार करने में सक्षम हैं, पर उनके लिए जो सत्य को स्वीकार करने में असमर्थ हैं, यह दंडाज्ञा का संकेत है। तुम लोगों को अपना स्वयं का रास्ता चुनना चाहिए, और पवित्र आत्मा के खिलाफ निंदा नहीं करनी चाहिए और सत्य को अस्वीकार नहीं करना चाहिए। तुम लोगों को अज्ञानी और अभिमानी व्यक्ति नहीं बनना चाहिए, बल्कि ऐसा बनना चाहिए जो पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के प्रति समर्पण करता हो और सत्य के लिए प्यासा होकर इसकी खोज करता हो; सिर्फ इसी तरीके से तुम लोग लाभान्वित होगे। मैं तुम लोगों को परमेश्वर में विश्वास के रास्ते पर सावधानी से चलने की सलाह देता हूँ। स्वेच्छाचारी रूप से निष्कर्ष पर मत पहुँचो; और परमेश्वर में अपने विश्वास में लापरवाह और ढीले-ढाले तो और भी मत रहो। तुम लोगों को जानना चाहिए कि कम से कम, जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं उनके पास विनम्र और परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय होना चाहिए। जिन्होंने सत्य सुन लिया है और फिर भी इस पर अपनी नाक-भौंह सिकोड़ते हैं, वे मूर्ख और अज्ञानी हैं। जिन्होंने सत्य सुन लिया है और फिर भी लापरवाही के साथ निष्कर्षों तक पहुँचते हैं या उसकी निंदा करते हैं वे अहंकारी लोग हैं। जो भी यीशु पर विश्वास करता है वह दूसरों को शाप देने या निंदा करने के योग्य नहीं है। तुम सब लोगों को ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जिसके पास विवेक है और जो सत्य स्वीकार करता है। शायद सत्य का मार्ग सुन लेने और जीवन का वचन पढ़ लेने के बाद तुम्हें यह लगता है कि इन वचनों में से सिर्फ 10,000 में एक वचन तुम्हारे दृष्टिकोणों और बाइबल के अनुरूप है और फिर तुम्हें इन वचनों में से उस 10,000वें हिस्से में खोज जारी रखनी चाहिए। मैं अब भी तुम्हें सुझाव देता हूँ कि विनम्र बनो, अति-आत्मविश्वासी न बनो और अपनी बहुत बड़ाई न करो। परमेश्वर का भय मानने वाले अपने थोड़े-से हृदय से तुम अधिक रोशनी प्राप्त करोगे। यदि तुम इन वचनों की सावधानी से जाँच करो और इन पर बार-बार मनन करो, तब तुम समझोगे कि वे सत्य हैं या नहीं, वे जीवन हैं या नहीं। शायद, केवल कुछ वाक्य पढ़कर, कुछ लोग इन वचनों की आँखें मूँदकर यह कहते हुए निंदा करेंगे, “यह पवित्र आत्मा की थोड़ी प्रबुद्धता से अधिक कुछ नहीं है,” या “यह एक झूठा मसीह है जो लोगों को गुमराह करने आया है।” जो लोग ऐसी बातें कहते हैं वे अज्ञानता से अंधे हो गए हैं! तुम परमेश्वर के कार्य और बुद्धि को बहुत कम समझते हो और मैं तुम्हें पुनः शुरू से आरंभ करने की सलाह देता हूँ! तुम लोगों को अंत के दिनों के दौरान झूठे मसीहों के प्रकट होने की वजह से परमेश्वर द्वारा अभिव्यक्त वचनों की आँख मूँदकर निंदा नहीं करनी चाहिए और तुम्हें गुमराह होने के डर से ऐसा व्यक्ति नहीं बनना चाहिए जो पवित्र आत्मा के खिलाफ ईशनिंदा करता हो। क्या यह बहुत ही बड़े दुख की बात नहीं होगी? यदि, बहुत जाँच के बाद, अब भी तुम्हें लगता है कि ये वचन सत्य नहीं हैं, मार्ग नहीं हैं और परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं हैं, तो फिर अंततः तुम दंडित किए जाओगे और आशीष के बिना होगे। यदि तुम ऐसा सत्य, जो इतने सादे और स्पष्ट ढंग से कहा गया है, स्वीकार नहीं कर सकते, तो क्या तुम परमेश्वर के उद्धार के अयोग्य नहीं हो? क्या तुम एक ऐसे व्यक्ति नहीं हो जो परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौटने के लिए पर्याप्त आशीषित नहीं है? इस बारे में सोचो! उतावले और अविवेकी न बनो और परमेश्वर में विश्वास के साथ खेल की तरह पेश न आओ। अपनी मंज़िल के लिए, अपनी संभावनाओं के वास्ते, अपने जीवन के लिए सोचो और स्वयं से खेल न करो। क्या तुम इन वचनों को स्वीकार कर सकते हो?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जब तक तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देखोगे, परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को फिर से बना चुका होगा

चूँकि हम परमेश्वर के पदचिह्नों की खोज कर रहे हैं, इसलिए हमारा दायित्व बनता है कि हम परमेश्वर के इरादों, उसके वचनों और कथनों की खोज करें। ऐसा इसलिए क्योंकि जहाँ कहीं भी परमेश्वर द्वारा बोले गए नए वचन हैं, वहाँ परमेश्वर की वाणी है और जहाँ कहीं भी परमेश्वर के पदचिह्न हैं, वहाँ परमेश्वर के कर्म हैं; जहाँ कहीं भी परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, वहाँ परमेश्वर प्रकट होता है, और जहाँ कहीं भी परमेश्वर प्रकट होता है, वहाँ सत्य, मार्ग और जीवन विद्यमान होता है। परमेश्वर के कदमों की तलाश में तुम लोगों ने इन वचनों की अनदेखी कर दी है कि “परमेश्वर सत्य, मार्ग और जीवन है।” और इसलिए, बहुत-से लोग सत्य को प्राप्त करके भी यह नहीं मानते कि उन्हें परमेश्वर के पदचिह्न मिल गए हैं और वे परमेश्वर के प्रकटन को तो बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करते। कितनी गंभीर ग़लती है! परमेश्वर का प्रकटन मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं हो सकता और परमेश्वर उस तरह तो और भी प्रकट नहीं हो सकता जैसा इंसान उससे माँग करता है। परमेश्वर जब अपना कार्य करता है, तो वह अपनी पसंद और अपनी योजनाएँ बनाता है; इसके अलावा, उसके अपने उद्देश्य और अपने तरीके हैं। वह जो भी कार्य करता है, उसके बारे में उसे मनुष्य से चर्चा करने या उसकी सलाह लेने की आवश्यकता नहीं है, और अपने कार्य के बारे में हर-एक व्यक्ति को सूचित करने की आवश्यकता तो उसे बिल्कुल भी नहीं है। यह परमेश्वर का स्वभाव है, और हर व्यक्ति को इसे पहचानना चाहिए। यदि तुम लोग परमेश्वर के प्रकटन को देखने और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करने की इच्छा रखते हो, तो तुम लोगों को पहले अपनी धारणाओं से दूरी बना लेनी चाहिए। तुम लोगों को यह माँग नहीं करनी चाहिए कि परमेश्वर ऐसा करे या वैसा करे, तुम्हें उसे अपनी सीमाओं और अपनी धारणाओं तक सीमित तो बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए। इसके बजाय, तुम लोगों को खुद से यह पूछना चाहिए कि तुम्हें परमेश्वर के कदमों की तलाश कैसे करनी चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के प्रकटन को कैसे स्वीकार करना चाहिए, और तुम्हें परमेश्वर के नए कार्य के प्रति कैसे समर्पण करना चाहिए : मनुष्य को ऐसा ही करना चाहिए। चूँकि मनुष्य सत्य नहीं है, और उसके पास भी सत्य नहीं है, इसलिए उसे खोजना, स्वीकार करना और समर्पण करना चाहिए।

चाहे तुम अमेरिकी हो, ब्रिटिश या फिर किसी अन्य देश के, तुम्हें अपनी राष्ट्रीयता की सीमाओं से बाहर कदम रखना चाहिए, अपनी अस्मिता के पार जाना चाहिए, और परमेश्वर के कार्य को एक सृजित प्राणी की पहचान से देखना चाहिए। इस तरह तुम परमेश्वर के कदमों को किसी निश्चित दायरे में नहीं सीमित करोगे। ऐसा इसलिए है, क्योंकि आजकल बहुत-से लोग इसे असंभव समझते हैं कि परमेश्वर किसी विशेष राष्ट्र में या कुछ निश्चित लोगों के बीच प्रकट होगा। परमेश्वर के कार्य का कितना गहन अर्थ है, और परमेश्वर का प्रकटन कितना महत्वपूर्ण है! मनुष्य की धारणाएँ और सोच भला उन्हें कैसे माप सकती हैं? और इसलिए मैं कहता हूँ, कि तुम्हें परमेश्वर के प्रकटन की तलाश करने के लिए अपनी राष्ट्रीयता और जातीयता की धारणाओं को तोड़ देना चाहिए। केवल इसी प्रकार से तुम अपनी धारणाओं से बाध्य नहीं होगे; केवल इसी प्रकार से तुम परमेश्वर के प्रकटन का स्वागत करने के योग्य होगे। अन्यथा, तुम शाश्वत अंधकार में रहोगे, और कभी भी परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं करोगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 1 : परमेश्वर के प्रकटन ने एक नए युग का सूत्रपात किया है

परमेश्वर समस्त मानवजाति का परमेश्वर है। वह स्वयं को किसी भी राष्ट्र या लोगों की निजी संपत्ति नहीं मानता, बल्कि अपना कार्य अपनी बनाई योजना के अनुसार, किसी भी रूप, राष्ट्र या लोगों द्वारा बंधे बिना करता है। शायद तुमने इस रूप की कभी कल्पना नहीं की है या शायद इस रूप के प्रति तुम्हारा रवैया इनकार करने वाला है या शायद वह देश जहाँ परमेश्वर प्रकट होता है और वे लोग जिनके बीच वह प्रकट होता है, बस संयोग से ऐसे हैं जिनके साथ सभी के द्वारा भेदभाव किया जाता है और जो बस संयोग से पृथ्वी पर सर्वाधिक पिछड़े हुए हैं। लेकिन परमेश्वर के पास अपनी बुद्धि है। उसने अपने महान सामर्थ्य के साथ और अपने सत्य और स्वभाव के माध्यम से सचमुच ऐसे लोगों के समूह को हासिल कर लिया है जो उसके साथ एक मन वाले हैं और जिन्हें वह पूरा करना चाहता है—उसके द्वारा जीता गया एक समूह जो सभी प्रकार के परीक्षणों, कष्टों और उत्पीड़न को सहन कर चुका है और अंत तक उसका अनुसरण कर सकता है। परमेश्वर का प्रकटन, जो किसी राष्ट्र या रूप तक सीमित नहीं है, इसका लक्ष्य उसे अपनी योजना के अनुसार कार्य पूरा करने में सक्षम बनाना है। यह वैसा ही है जैसे जब परमेश्वर यहूदिया में देह बना, तब उसका लक्ष्य समस्त मानवजाति के छुटकारे के लिए सलीब पर चढ़ने का कार्य पूरा करना था। फिर भी यहूदियों का मानना था कि परमेश्वर के लिए ऐसा करना असंभव है और उन्हें यह असंभव लगता था कि परमेश्वर देह बन सकता है और प्रभु यीशु का रूप ग्रहण कर सकता है। उनका “असंभव” वह आधार बन गया जिस पर उन्होंने परमेश्वर की निंदा की और उसका विरोध किया और जो अंततः इस्राएल को विनाश की ओर ले गया। आज बहुत से लोग वैसी ही गलती कर चुके हैं। वे अपनी समस्त शक्ति के साथ परमेश्वर के आसन्न प्रकटन की घोषणा करते हैं, मगर साथ ही उसके प्रकटन की निंदा भी करते हैं; उनका “असंभव” परमेश्वर के प्रकटन को एक बार फिर उनकी कल्पना की सीमाओं के भीतर कैद कर देता है। और इसलिए मैंने बहुत से लोगों को परमेश्वर के वचन सुनने के बाद असभ्य और कर्कश हँसी का ठहाका लगाते देखा है। लेकिन क्या यह हँसी यहूदियों द्वारा की गई निंदा और ईशनिंदा से किसी भी तरह से भिन्न है? तुम लोग सत्य की उपस्थिति में श्रद्धावान नहीं हो और तुममें ललक का रवैया तो और भी कम है। तुम बस हठी होकर अध्ययन करते हो और लापरवाही भरी उदासीनता के साथ प्रतीक्षा करते हो। इस तरह अध्ययन और प्रतीक्षा करने से तुम क्या हासिल कर सकते हो? क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हें परमेश्वर से व्यक्तिगत मार्गदर्शन मिलेगा? यदि तुम परमेश्वर के कथनों का भेद नहीं समझ सकते तो तुम किस तरह से परमेश्वर का प्रकटन देखने के योग्य हो? जहाँ कहीं परमेश्वर प्रकट होगा, वहीं सत्य व्यक्त किया जाएगा और वहीं परमेश्वर की वाणी होगी। जो लोग सत्य स्वीकार कर सकते हैं केवल वही परमेश्वर की वाणी सुन पाएँगे और केवल इसी तरह के लोग परमेश्वर के प्रकटन को देखने के योग्य हैं। अपनी धारणाओं को जाने दो! खुद को शांत करो और इन शब्दों को ध्यान से पढ़ो। जब तक तुम्हारे पास ऐसा दिल है जो सत्य के लिए लालायित रहता है, तब तक परमेश्वर तुम्हें प्रबुद्ध करेगा ताकि तुम उसके इरादे और वचन समझ सको। “असंभवता” के अपने तर्क छोड़ दो! लोग किसी चीज़ को जितना अधिक असंभव मानते हैं, उसके घटित होने की उतनी ही अधिक संभावना होती है, क्योंकि परमेश्वर की बुद्धि स्वर्ग से ऊँची है, परमेश्वर के विचार मनुष्य के विचारों से ऊँचे हैं और परमेश्वर अपना कार्य मनुष्य की सोच और धारणा की सीमाओं से परे करता है। जितना अधिक कुछ असंभव होता है, उतना ही अधिक उसमें खोजने लायक सत्य होता है; जितना अधिक किसी चीज की कल्पना मनुष्य की धारणाओं द्वारा नहीं की जा सकती है, उसमें परमेश्वर के इरादे उतने ही अधिक होते हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर चाहे कहीं भी प्रकट क्यों न हो, वह फिर भी परमेश्वर है, और उसका सार उसके प्रकटन के स्थान या तरीके के आधार पर कभी नहीं बदलेगा। परमेश्वर के कदम चाहे कहीं भी हों, उसका स्वभाव नहीं बदलेगा, और चाहे परमेश्वर के कदम कहीं भी हों, वह समस्त मनुष्यजाति का परमेश्वर है, ठीक वैसे ही, जैसे कि प्रभु यीशु न केवल इस्राएलियों का परमेश्वर है, बल्कि वह एशिया, यूरोप और अमेरिका के सभी लोगों का, और इससे भी अधिक, वह समस्त ब्रह्मांड का एकमात्र, अद्वितीय परमेश्वर है। तो आओ, हम परमेश्वर के इरादे खोजें और उसके कथनों और वचनों में उसके प्रकटन का पता लगाएँ, और उसके कदमों के साथ तालमेल रखें! परमेश्वर सत्य, मार्ग और जीवन है। उसके वचन और उसका प्रकटन साथ-साथ विद्यमान हैं, और उसका स्वभाव और पदचिह्न हर समय मानवजाति के सामने सार्वजनिक रूप से प्रकट किए जाते हैं। प्यारे भाई-बहनो, मुझे आशा है कि तुम लोग इन वचनों में परमेश्वर का प्रकटन देख सकते हो, उसके पदचिह्नों के साथ-साथ चलना शुरू कर सकते हो और एक नए युग की तरफ बढ़ सकते हो, और उस सुंदर नए स्वर्ग और पृथ्वी में प्रवेश कर सकते हो, जिसे परमेश्वर ने उन लोगों के लिए तैयार किया है, जो उसके प्रकटन का इंतजार करते हैं!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 1 : परमेश्वर के प्रकटन ने एक नए युग का सूत्रपात किया है

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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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1. प्रभु ने हमसे यह कहते हुए, एक वादा किया, “मैं तुम्हारे लिये जगह तैयार करने जाता हूँ। और यदि मैं जाकर तुम्हारे लिये जगह तैयार करूँ, तो फिर आकर तुम्हें अपने यहाँ ले जाऊँगा कि जहाँ मैं रहूँ वहाँ तुम भी रहो” (यूहन्ना 14:2-3)। प्रभु यीशु पुनर्जीवित हुआ और हमारे लिए एक जगह तैयार करने के लिए स्वर्ग में चढ़ा, और इसलिए यह स्थान स्वर्ग में होना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु लौट आया है और पृथ्वी पर ईश्वर का राज्य स्थापित कर चुका है। मुझे समझ में नहीं आता : स्वर्ग का राज्य स्वर्ग में है या पृथ्वी पर?

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परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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