सत्य को खोजने वाले सभी लोगों का हम से सम्पर्क करने का स्वागत करते हैं

परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं

ठोस रंग

विषय-वस्तुएँ

फॉन्ट

फॉन्ट का आकार

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

0 खोज परिणाम

कोई परिणाम नहीं मिला

`

अध्याय 7 सत्य के अन्य पहलू जो कि न्यूनतम हैं जिन्हें नए विश्वासियों द्वारा समझा जाना चाहिए

4. पवित्र शिष्टता जो परमेश्वर के विश्वासियों को धारण करनी चाहिए

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

वचनों का आज्ञापालन करता था। वह स्वभाविक रूप से सही समझ और सद्विवेक का था, और सामान्य मानवता का था। शैतान के द्वारा भ्रष्ट होने के बाद, उसकी मूल समझ, सद्विवेक, और मानवता मंदी हो गईं और शैतान के द्वारा खराब हो गईं। इस प्रकार, उसने परमेश्वर के प्रति अपनी आज्ञाकारिता और प्रेम को खो दिया है। मनुष्य की समझ धर्मपथ से हट गई है, उसकी समझ एक जानवर के समान हो गई है, और परमेश्वर के प्रति उसकी विद्रोहशीलता और भी अधिक लगातार और गंभीर हो गई है। अभी तक मनुष्य इसे न तो जानता है और न ही पहचानता है, और केवल आँख बंद करके विरोध और विद्रोह करता है। ..."सामान्य समझ" आज्ञापालन और परमेश्वर के प्रति विश्वास योग्य बने रहने को, परमेश्वर के प्रति तड़प, परमेश्वर के प्रति स्पष्ट, और परमेश्वर के प्रति सद्सद्विवेक होने को संदर्भित करती है। यह परमेश्वर के प्रति एक हृदय और मन होने को संदर्भित करती है, और जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करने को नहीं। वे जो धर्मपथ से हटनेवाली समझ के हैं वे ऐसे नहीं हैं। मनुष्य शैतान के द्वारा भ्रष्ट किया गया था इसिलिए, उसने परमेश्वर के बारे में धारणाओं का उत्पादन किया है, और परमेश्वर के लिए उसके पास निष्ठा या चाहत नहीं है, और परमेश्वर के प्रति कुछ भी कहने के लिए सद्विवेक नहीं है। मनुष्य जानबूझकर विरोध करता और परमेश्वर पर दोष लगाता है, और, इसके अलावा, उसकी पीठ-पीछे उस पर जोर से अपशब्द फेंक कर मारता है। मनुष्य स्पष्ट रूप से जानता है कि वह परमेश्वर है, फिर भी उसकी पीठ-पीछे उस पर दोष लगाता है, उसकी आज्ञाकारिता करने का कोई भी इरादा नहीं है, और सिर्फ परमेश्वर से अंधाधुंध माँग और निवेदन करता रहता है। ऐसे लोग—वे लोग जो अनैतिक समझ के हैं—वे अपने खुद के घृणित स्वभाव को जानने या अपनी विद्रोहशीलता का पछतावा करने के अयोग्य हैं। यदि लोग अपने आप को जानने के योग्य हों, तो फिर वे अपनी समझ को थोड़ा सा पुनः प्राप्त कर चुके हैं; जितने अधिक लोग परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं लेकिन अपने आप को नहीं जानते, उतने अधिक वे सही समझ के नहीं हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता होना है" से

आज, तुम पूर्ण होने का प्रयास कर सकते हो अपने बाहरी मनुष्यत्व में बदलाव और क्षमताओं में विकास भी कर सकते हो, परंतु प्रमुख बात यह है कि तुम यह समझ सको कि जो कुछ आज परमेश्वर कर रहा है वह सार्थक और लाभकारी हैः यह तुम्हें गंदगी की धरती पर जीने उस अपवित्रता से बाहर निकलने और उस गंदगी को झटकने की क्षमता प्रदान करता है, यह तुम्हें शैतान के प्रभाव से पार पाने में और शैतान के अंधकारमय प्रभाव को पीछे छोड़ने की क्षमता प्रदान करता है और इन बातों पर ध्यान देने से, तुम इस अपवित्र भूमि पर सुरक्षा प्राप्त करते हो। आखिरकार तुम्हें क्या गवाही देने को कहा जाएगा? तुम एक अपवित्र भूमि पर रहते हुए भी पवित्र बनने में समर्थ हो, और आगे फिर अपवित्र और अशुद्ध नहीं होगे , तुम शैतान के अधिकार क्षेत्र में रहकर भी अपने आपको उसके प्रभाव से छुड़ा लेते हो, और शैतान द्वारा ग्रसित और सताए नहीं जाते, और तुम सर्वशक्तिमान के हाथों में रहते हो। यही गवाही है, और शैतान से युद्ध में विजय का साक्ष्य है। तुम शैतान को त्यागने में सक्षम हो, जो जीवन तुम जीते हो उसमें शैतान प्रकाशित नहीं होता, परंतु क्या यह वही है जो परमेश्वर ने मनुष्य के सृजन के समय चाहा था कि मनुष्य इन्हें प्राप्त करे: सामान्य मानवता, सामान्य युक्तता, सामान्य अंतर्दृष्टि, परमेश्वर के प्रेम हेतु सामान्य संकल्पशीलता, और परमेश्वर के प्रति निष्ठा। यह परमेश्वर के प्राणी मात्र की गवाही है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (2)" से

सामान्य मानवता में ये पहलू शामिल होते हैं: अंतर्दृष्टि, समझ, विवेक, और चरित्र। यदि तुम इनमें से प्रत्येक के संबंध में सामान्यता प्राप्त कर सकते हो, तो तुम्हारी मानवता मानक के मुताबिक है। तुममें एक सामान्य इंसान की समानता होनी चाहिए और तुम्हें परमेश्वर में विश्वासी की तरह व्यवहार करना चाहिए। तुम्हें महान ऊँचाइयाँ नहीं प्राप्त करनी हैं या कूटनीति में संलग्न नहीं होना है। तुम्हें बस एक सामान्य व्यक्ति की समझ वाला, चीजों का स्वभाव जानने में सक्षम, केवल एक सामान्य इंसान होना है, और कम से कम एक सामान्य इंसान की तरह दिखाई देना है। यह पर्याप्त होगा।…बहुत से लोग देखते हैं कि युग बदल गया है, इसलिए वे किसी भी विनम्रता या धैर्य का अभ्यास नहीं करते हैं, और हो सकता है कि उनमें कोई प्रेम या संतों वाली शालीनता भी न हो। ये लोग बहुत बेहूदा हैं! क्या उनमें सामान्य मानवता का एक औंस भीहै? क्या उनके पास बोलने के लिए कोई गवाही है? उनके पास किसी भी तरह की कोई अंतर्दृष्टि और समझ नहीं है। निस्सन्देह, लोगों के व्यवहार के कुछ पहलू जो पथभ्रष्ट और गलत हैं, उन्हें सही किए जाने की आवश्यकता है। लोगों की कठोर आध्यात्मिक जीवन या अतीत की संवेदनशून्यता और मूर्खता का आभास—इन सभी चीजों को बदलना होगा। परिवर्तन का अर्थ यह नहीं है कि तुम्हें स्वच्छंद होने दिया जाए या शरीर में आसक्त होने दिया जाए या तुम जो चाहो वह करने दिया जाए। लापरवाही से बोलने से कार्य नहीं चल सकता है! एक सामान्य इंसान की तरह व्यवहार करना सुसंगति से बोलना है। हाँ का अर्थ हाँ, नहीं का अर्थ नहीं है। तथ्यों के प्रति सच्चे रहें और उचित तरीके से बोलें। कपट मत करो, झूठ मत बोलो।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "क्षमता को सुधारने का प्रयोजन परमेश्वर द्वारा उद्धार प्राप्त करना है" से

सामान्य लोगों के व्यवहारों में कोई कुटिलता या कपट नहीं होता है, लोगों का एक-दूसरे के साथ एक सामान्य संबंध होता है, वे अकेले नहीं खड़े होते हैं, और उनका जीवन न तो मामूली और न ही पतनोन्मुख होता है। इसलिए भी, परमेश्वर सभी के बीच उत्कर्षित है, उसके वचन मनुष्यों के बीच व्याप्त हैं, लोग एक-दूसरे के साथ शांति से और परमेश्वर की देखभाल और संरक्षण में रहते हैं, पृथ्वी, शैतान के हस्तक्षेप के बिना, सद्भाव से भरी है, और परमेश्वर की महिमा मनुष्यों के बीच सर्वाधिक महत्व रखती है। ऐसे लोग स्वर्गदूतों की तरह हैं: शुद्ध, जोशपूर्ण, परमेश्वर के बारे में कभी भी शिकायत नहीं करने वाले, और पृथ्वी पर पूरी तरह से परमेश्वर की महिमा के लिए अपने सभी प्रयासों को समर्पित करने वाले।

"वचन देह में प्रकट होता है"से "सोलहवें कथन की व्याख्या"से

मैं जिस सामान्य मानवता के बारे में बात करता हूँ वह ऐसी अलौकिक नहीं है जैसा कि लोग समझते हैं। बल्कि, इसका अर्थ यह है कि तुम सभी व्यक्तियों, घटनाओं, और बातों से पार जा सकते हो, अपने आसपास की मजबूरियों पर विजय प्राप्त कर सकते हो, और कि तुम किसी भी स्थान या किसी भी वातावरण में मेरे निकट हो सकते हो और मेरे साथ संगति कर सकते हो।

"आरंभ में मसीह के कथन और गवाहियाँ" से 

तुम लोगों को जानना चाहिए कि परमेश्वर एक ईमानदार मनुष्य को पसंद करता है।… ईमानदारी का अर्थ है अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करना; किसी भी चीज़ में उस से ढकोसला नहीं करना; सभी चीजों में उसके प्रति निष्कपट होना, सत्य को कभी भी नहीं छुपाना; कभी भी ऐसा कार्य नहीं करना जो उन लोगों को धोखा देता हो जो ऊँचे हैं और उन लोगों को भ्रम में डालता हो जो नीचे हैं; और कभी भी ऐसा काम नहीं करना जो केवल परमेश्वर की चापलूसी करने के लिए किया जाता है। संक्षेप में, ईमानदार होने का अर्थ है अपने कार्यों और वचनों में अशुद्धता से परहेज करना, और न तो परमेश्वर को और न ही मनुष्य को धोखा देना।

"वचन देह में प्रकट होता है"से "तीन चेतावनियाँ" से

मेरी बहुत-सी इच्छाएं हैं। मैं चाहता हूँ कि तुम लोग अपने आचरण को उपयुक्त और बेहतर बनाओ, अपने दायित्व पूरी निष्ठा से पूरे करो, तुम्हारे अंदर सच्चाई और मानवीयता हो, ऐसे बनो जो अपना सर्वस्व, अपना जीवन परमेश्वर के लिये न्योछावर कर सके, वगैरह-वगैरह। ये सारी कामनाएँ तुम्हारी कमियों, भ्रष्टता और अवज्ञाओं से उत्पन्न होती हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "उल्लंघन मनुष्य को नरक में ले जाएगा" से

कोई मानवता नहीं है, और तुम लोगों में अंतर्दृष्टि की कमी है। यही कारण है कि तुम सभी को मानवता की चीजों के साथ खुद को लैस करने की आवश्यकता है। ज़मीर, तर्क-संगतता और अंतर्दृष्टि रखना, चीजों को कैसे कहें और देखें इसका ज्ञान होना, स्वच्छता पर ध्यान देना, एक सामान्य मानव की तरह काम करना—ये सभी सामान्य मानवता के व्यवहारिक ज्ञान हैं। जब तुम लोग ये ठीक से करते हो, तो तुम्हारी मानवता मानक स्तर तक पहुँचेगी। दूसरा पहलू आध्यात्मिक जीवन के लिए खुद को तैयार करना है। तुम सभी को पृथ्वी पर परमेश्वर के कार्य की सम्पूर्णता ज्ञात होनी चाहिए, और उसके वचनों की अनुभूति करनी चाहिए। तुम्हें पता होना चाहिए कि कैसे उसकी व्यवस्थाओं का पालन करना है, और एक सृष्ट जीव का कर्तव्य कैसे पूरा किया जाए। ये दो पहलू हैं जिनमें तुम्हें आज प्रवेश करना चाहिए। 

"वचन देह में प्रकट होता है"से "अभ्यास (7)" से

परमेश्वर चाहता है कि लोग वास्तविक जीवन में सामान्य मनुष्यत्व को जीएँ, न केवल कलीसियाई जीवन में; कि वे वास्तविक जीवन में सत्य को जीएँ, न केवल कलीसियाई जीवन में; कि वे वास्तविक जीवन में अपने कार्य को पूरा करें, न केवल कलीसियाई जीवन में। वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए एक व्यक्ति को सब कुछ वास्तविक जीवन की ओर मोड़ देना चाहिए। यदि परमेश्वर पर विश्वास करने वाले वास्तविक जीवन में प्रवेश नहीं कर सकते और स्वयं को नहीं जान सकते या वास्तविक जीवन में सामान्यमनुष्यत्व को नहीं जी सकते, तो वे विफल हो जाएँगे। वे जो परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानते वे सब ऐसे लोग हैं जो वास्तविक जीवन में प्रवेश नहीं कर सकते। वे सब ऐसे लोग हैं जो मनुष्यत्व के बारे में बात करते हैं परंतु दुष्टात्माओं की प्रकृति में जीते हैं। वे सब ऐसे लोग हैं जो सत्य के बारे में बात करते हैं परंतु उसके स्थान पर धर्मसिद्धांतों को जीते हैं। जो वास्तविक जीवन में सत्य के साथ नहीं जी सकते, वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर पर विश्वास तो करते हैं परंतु वे उसके द्वारा घृणित और अस्वीकृत माने जाते हैं। तुम्हें वास्तविक जीवन में प्रवेश करने का अभ्यास करना है, अपनी कमियों, अवज्ञाकारिता, और अज्ञानता को जानना है, और अपने असामान्य मनुष्यत्व और अपनी कमियों को जानना है। इस तरह से, तुम्हारा सारा ज्ञान तुम्हारी वास्तविक परिस्थिति और कठिनाइयों के साथ एकीकृत हो जाएगा। केवल इस प्रकार का ज्ञान वास्तविक होता है और तुम्हें स्वयं की दशा को सच्चाई के साथ समझने और तुम्हारे स्वभाव-संबंधी परिवर्तनों को प्राप्त करने की अनुमति दे सकता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कलीसिया जीवन और वास्तविक जीवन पर विचार-विमर्श" से

जिन लोगों का परमेश्वर इस्तेमाल करता है, वे बाहर से तर्कहीन प्रतीत होते हैं और ऐसा लगता है कि दूसरों के साथ वे उचित संबंध नहीं रख पाते, हालांकि वे औचित्य के साथ और न कि लापरवाही के साथ बोलते हैं, और परमेश्वर के सामने हमेशा शांत हृदय रख पाते हैं। लेकिन केवल इसी तरह का व्यक्ति पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए जाने के लिए पर्याप्त है। जिन "तर्कहीन" व्यक्तियों के बारे में परमेश्वर बात करता है वे कुछ ऐसे दिखते हैं जैसे उनके दूसरों के साथ कोई भी उचित संबंध नहीं हैं, और उनका कोई भी बाहरी प्रेम या दिखावटी अभ्यास नहीं हैं, लेकिन जब वे आध्यात्मिक चीज़ों पर संवाद करते हैं, तो वे अपने दिल को पूरी तरह खोल सकते हैं और निस्वार्थ रूप से दूसरों को वह रोशनी और प्रबुद्धता प्रदान कर सकते हैं जो उन्होंने परमेश्वर के साथ अपने वास्तविक अनुभव से हासिल की है। यही वह तरीका है जिससे वे परमेश्वर के प्रति अपना प्रेम व्यक्त करते हैं और परमेश्वर की इच्छा को पूरा करते हैं। जब दूसरे सभी लोग उनकी निंदा और उपहास कर रहे होते हैं, तो वे बाहर के लोगों, घटनाओं, या चीज़ों द्वारा नियंत्रित नहीं किए जा सकते हैं, और फिर भी परमेश्वर के सामने शांत रह पाते हैं। ऐसे व्यक्ति के पास अपनी स्वयं की अनूठी अंतर्दृष्टि होती है। दूसरे चाहे कुछ भी कहें या करें, उनका दिल कभी भी परमेश्वर से दूर नहीं जाता है। जब दूसरे लोग उत्साहपूर्वक और मज़ाकिया ढंग से बातें करते हैं, तो उनका दिल तब भी परमेश्वर के समक्ष रहता है, परमेश्वर के वचनों पर विचार करता रहता है या उनकी मंशा प्राप्त करने के प्रयास में अपने मन में परमेश्वर को चुपचाप प्रार्थना करता रहता है। वे दूसरों के साथ अपने उचित संबंधों को बनाए रखने के प्रयास को अपने ध्यान का मुख्य केंद्र नहीं बनाते हैं। इस तरह के व्यक्ति का जीवन के बारे में कोई दर्शनशास्त्र नहीं होता है। बाहरी रूप से ऐसा व्यक्ति जीवंत, प्रिय, और मासूम होता है, लेकिन उसके पास शांति की भावना मौजूद रहती है। परमेश्वर जिन व्यक्तियों का उपयोग करता है उनमें कुछ ऐसे ही गुण होते हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के साथ एक उचित संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है" से

जिन में सत्य है वे ऐसे लोग हैं जिनके पास असली अनुभव है और वे अपनी गवाही में,परमेश्वर के लिये दृढ़ता से खड़े रह सकते हैं, बिना कभी पीछे हटे और जो परमेश्वर के साथ प्रेम रखते हैं और लोगों के साथ भी सामान्य सम्बन्ध रखतेहैं, जबउनके साथ कुछघटनाएं घटती हैं, तोवे पूरी तरह से परमेश्वर का आज्ञापालन कर सकते हैं और मृत्यु तक उसका आज्ञापालन करने में सक्षम होतेहैं। वास्तविक जीवन में तुम्हारा व्यवहार और प्रकाशन परमेश्वर के लिए गवाही है, वे मनुष्य के द्वारा जीए जाते हैं और परमेश्वर के लिए गवाही ठहरते हैं, और वास्वत में यही परमेश्वर के प्रेम को आनन्द लेना है; जब इस बिन्दु तक तुम्हारा अनुभव होता है, तो उसमें एक प्रभाव की उपलब्धि हो चुकी होती है। तुम असली जीवन जी रहे होते हैं, और तुम्हारे प्रत्येक कार्य को अन्य लोग प्रशंसा से देखते हैं, तुम्हारा बाह्य रूप साधारण होता है परन्तु तुम अत्यंत धार्मिकता का जीवन जीते हैं, और जब तुम परमेश्वर के वचन दूसरों तक पहुंचाते हो तो तुम्हें परमेश्वर मार्गदर्शन और प्रबुद्धता प्रदान करता है। तुम अपने शब्दों के द्वारा परमेश्वर की इच्छा को व्यक्त करते हो और वास्तविकता को सम्प्रेषित करते हो, और आत्मा की सेवा को अच्छी तरह समझते हो। तुम खुलकर बोलते हो, तुम सभ्य और ईमानदार हो, झगड़ालू नहीं और शालीन हो, परमेश्वर के प्रबंधों को मानते हो और जब तुम पर चीज़ें आ पड‌ती हैं तो तुम अपनी गवाही में दृढ़ रहते हो, चाहे कुछ भी हो जाए तुम जिसके साथ भी व्यवहार कर रहे होते हो शांत और शांतचित्त बने रहते हो।इस तरह के व्यक्ति ने परमेश्वर के प्रेम को देखा है। कुछ लोग अभी भी युवा हैं, परन्तु वे मध्यम आयु के समान व्यवहार करते हैं; वे परिपक्व होते हैं, सत्य को धारण किए रहते हैं और दूसरों के द्वारा प्रशंसा प्राप्त करते हैं - और यह वे लोग हैं जो गवाही देते हैं और परमेश्वर की अभिव्यक्ति हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग हमेशा के लिए उसके प्रकाश में रहेंगे" से

मनुष्य की सहभागिता:

एक व्यक्ति जो वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करता है वह हर दिन कम से कम इन पाँच पहलुओं को अपने आध्यात्मिक जीवन में करता हैः परमेश्वर के वचन को पढ़ना, परमेश्वर से प्रार्थना करना, सत्य के साथ संवाद करना, भजनों और स्तुतियों को गाना और हर चीज में खोज करना। यदि तुम्हारे जीवन में भी इस प्रकार की बातें पाई जाती हैं, तो तुम्हें बहुत आनन्द मिलेगा। यदि कोई व्यक्ति ग्रहण करने की सामान्य योग्यता से सज्जित है, जिसका अर्थ है कि वह स्वयं परमेश्वर के वचनों को पढ़कर परमेश्वर के इरादों को समझ सकता है, सत्य को समझ सकता है, और जान सकता है कि कैसे सत्य के अनुरूप हो सकता है, तो तुम कह सकते हो कि इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर पर विश्वास में सफल होगा। यदि किसी व्यक्ति का इस प्रकार का आध्यात्मिक जीवन नहीं है, या यदि उसका आध्यात्मिक जीवन अत्यधिक असामान्य है और केवल यदा-कदा ही होता है, तो वह व्यक्ति एक पथभ्रष्ट और भ्रमित विश्वासी है। भ्रमित विश्वासियों का आध्यात्मिक जीवन नहीं होता है और वे अपने कर्तव्य को पूर्ण करने में अधिक परिणाम प्राप्त नहीं कर सकते हैं। एक आध्यात्मिक जीवन जीए बिना परमेश्वर में विश्वास करना परमेश्वर में विश्वास के लिए केवल दिखावटी प्रेम करना है, परन्तु उनके हृदयों में कोई परमेश्वर नहीं होता है और निश्चित रूप से परमेश्वर का कोई भय नहीं होता है। उनमें कैसे एक सामान्य मनुष्य की समानता हो सकती है? मैं कुछ लोगों को देखता हूँ जो परमेश्वर के विश्वासी बिल्कुल नहीं दिखाई देते हैं। उनकी जीवन शैली और उनके प्रति दिन के वचनों और क्रियाओं से, वे पूरी तरह से अविश्वासी प्रतीत होते हैं। उनमें सामान्य मनुष्य की समानता नहीं होती हैं, और जो बातें वे बोलते और करते हैं वे रचनात्मक नहीं होती हैं। कुछ यहाँ तक कि घृणा किए जाते हैं, कुछ पर क्रोध किया जाता है या कुछ को बहिष्कृत भी किया जाता है। यह न केवल कुछ ऐसा है जो परमेश्वर का अपमान करता है, बल्कि परन्तु उनके कर्तव्य को भी रोकता है और भविष्य के सुसमाचार के कार्य के लिए समस्याएँ लाता है। नाना प्रकार की स्थितियाँ हैं जिन पर तुम्हें ध्यान देने की आवश्यकता हैः

एक सामान्य व्यक्ति का दूसरों के साथ जो सम्पर्क होता है वह गरिमामय और धार्मिक, वास्तविक और शिष्ट होता है। परन्तु यह उनके मामले में नहीं होता है जो गुप्त, कपटी हैं और बात करते समय लोगों पर आँख से इशारा करते हैं। उनके पास सामान्य व्यक्ति वाला व्यवहार नहीं होता है; वे थोड़ा चोर के समान होते हैं, किसी ऐसे की तरह जो अपने बारे में लोगों को सावधान करवाता है। कुछ लोग पहले से ही ख़राब प्रकटन के साथ पैदा होते हैं। यदि वे अच्छी तरह कपड़े भी न पहनें, तो उनका एक सम्मानित और ईमानदार रूप-रंग नहीं होगा, और इससे उनके कर्तव्यों को पूर्ण करने में कुछ समस्याएँ आ सकती हैं। इससे वास्तव में अपने कर्तव्य को उचित रूप से पूरा करने के लिये तुम्हें अभ्यास और सीखने की आवश्यकता होती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लोग एक दूसरे से अपरिचित हैं और अधिकांश लोग रूप-रंग द्वारा आकलन करते हैं, इसलिए यदि तुम वास्तव में एक चोर के समान दिखाई देते हो तो कोई भी तुम्हारे प्रति सचेत दिखाई देगा। इसलिए, तुम्हें यह अवश्य सीखना चाहिए कि तुम्हें एक प्रतिष्ठित और ईमानदार व्यक्ति की तरह क्या पहनना और कैसे पहनना चाहिए, अपने वचनों और क्रियाओं में ईमानदार और गंभीर अवश्य होना चाहिए। तुम्हें अवश्य कभी भी बकवादी नहीं होना चाहिए या लोगों पर आँख के इशारे नहीं करने चाहिए, और इसके अलावा, तुम्हें अपने आप पर संयम अवश्य रखना चाहिए। दूसरे लोगों के घरों के आसपास मत टहलो या उनकी वस्तुओं को मत छुओ। उन चीज़ों को मत देखो जो तुम्हें नहीं देखनी चाहिए या वहाँ मत जाओ जहाँ तुम्हें नहीं जाना चाहिए। अच्छा व्यवहार करो ताकि लोग वास्तव में सहजता से रहें, और ताकि वे तुम पर विश्वास कर सकें और उन पर तुम्हारा अच्छा प्रभाव पड़े। इस तरह, तुम अपने कर्तव्य को ठीक तरह से पूरा कर सकते हो। ये ऐसे मामले हैं जिन पर कुछ लोगों को ध्यान देना चाहिए।

एक अन्य स्थिति है जिसमें कुछ लोग अन्य लोगों के साथ मिलजुल कर नहीं रह सकते हैं और दूसरों के साथ सामान्य रूप से बातचीत या संगति नहीं कर सकते हैं। उनमें यहाँ तक कि वे मानव भावनाएँ भी नहीं होती हैं जो सामान्य लोगों के पास होनी चाहिए। वे बस इतना ही जानते हैं कि कैसे अपने कार्य को शीघ्रता से करना है और उसके बाद झटपट चले जाना है, तथा कुछ भी और समझते हुए प्रतीत नहीं होते हैं। अन्य लोगों के सम्पर्क में आने पर वे कोई प्रेम प्रकट नहीं करते हैं, जिससे लोग कोई गर्मजोशी या जुनून महसूस नहीं कर पाते हैं। बल्कि, उनके पास निर्दयता की भावना दिखाई देती है, मानो कि कोई नृशंस हत्यारा आ गया हो। इस तरह वे अपना कार्य ठीक से कैसे कर सकते हैं? किसी भोजन को स्वादिष्ट बनाने के लिए तुम्हें भिन्न-भिन्न चीजें उपयोग करनी पड़ती हैं। लोगों के साथ व्यवहार करते समय तुम्हें और भी अधिक ध्यान देना पड़ेगा—तुम अत्यधिक नीरस नहीं हो सकते हो। सामान्य परिस्थितियों में, किसी के साथ एक दिन या आधा दिन बातचीत करना उन पर अच्छा प्रभाव छोड़ने में समर्थ हो सकता है—निष्कपट, जोशीला, प्रेम के साथ और सत्य को धारण करने वाला, मिलने-जुलने में आसान और एक असाधारण रूप से अच्छा भाई या बहन। चीजों को अत्यधिक नीरसता से करना, उन चीजों का अभाव होना जिनसे सामान्य मानवता को सम्पन्न होना चाहिए, और कोई बुद्धि नहीं होना—ये सभी बातें चीज़ों को करवाना मुश्किल बना देंगी। ये कुछ लोगों की कमियाँ हैं, और यह सबसे अच्छा है कि यदि उन्हें शीघ्रता से ठीक कर दिया जाए और सुधार दिया जाए।

एक अन्य स्थिति है, और वह है बिना बुद्धि के इंजीलवाद का कार्य करना: लोगों के साथ बातचीत करते समय परिस्थितियों पर ध्यान नहीं देना, यह नहीं जानना कि परिस्थतियों का कैसे आकलन करें या अवसरों को कैसे ढूँढें, और निश्चिति रूप से यह नहीं जानना कि कहाँ आरम्भ करना उचित होगा; चीजों को करते समय तरीकों या तकनीकों का नहीं होना, उचित कदम नहीं उठाना, लोगों के सामने बस एक ही साँस में समझे-बूझे बिना सब कुछ कहना और फिर अपनी बात कहने के बाद तुरन्त चले जाना। इस प्रकार से कार्य करने से कोई व्यक्ति लापरवाह, थोड़ा सा नासमझ और काफी मूर्ख भी प्रतीत होता है। यह भी एक कमी है जो लोगों में होती है, और इस संबंध में हर एक को बहुत सी विफलताएँ मिली हैं। सुसमाचार को फैलाना बिना बुद्धि या धैर्य के नहीं किया जा सकता है। तुम जितना अधिक अधीर होगे उतना ही अधिक तुम विफल होगे। शांत-मिज़ाज का होना और थोड़ी सी बुद्धि का होना तुम्हें लाभ प्रदान करता है, जबकि जो लोग अधीर होते हैं और अपने आप पर संयम नहीं रख सकते है और जिनमें बुद्धि की कमी होती है वे निश्चित रूप से इस कार्य को नहीं कर पाएँगे। यदि किसी शांत-मिज़ाज वाले व्यक्ति के साथ कोई तुनकमिज़ाज भागीदारी करता है यह सबसे अच्छा है। यदि दोनो ही आधीर होंगे तो वे और भी जल्दी ही समाप्त कर घर वापस चले जाएँगे। सुसमाचार को फैलाना और याजकीय कार्य करना दोनों .ही भिन्न हैं। इंजीलवाद के कार्य में बुद्धि, प्रेम और करुणा की अत्यधिक आवश्यकता होती है। असाधारण धैर्य के बिना यह कार्य नहीं किया जा सकता है। आवश्यकता पड़ने पर, लोगों के प्रति अपने ईमानदार और स्पष्ट प्रेम को व्यक्त करने के लिए तुम्हें अपने आप को विनम्र भी करना पड़ता है। कुछ लोगो ने महत्वपूर्ण क्षणों में दूसरों को घुटने टेकने और परमेश्वर से अनुग्रह माँगने के लिए गहराई से प्रेरित किया है। धैर्य के बिना और ईमानदार और प्रेमी हृदय के बिना ऐसा नहीं किया जा सकता है।

अधम चरित्र के कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जो अपने मेज़बान परिवार के घर को अपने स्वयं के घर जैसा समझते हैं। वे नियमों के किसी ज्ञान के बिना जो कुछ भी चाहें करते हैं, वे जो कुछ भी देखते हैं उसे उपयोग करते हैं और उससे अपने आस-पास खेलने लगते हैं मानो कि उन्होंने दुनिया कभी नहीं देखी है, और हर कहीं घूमने और देखने लगते हैं। ऐसे लोग दूसरों का असंतोष और उनकी नाराजगी को भड़काते हैं, जो क्रोध में केवल इसलिए बर्दाश्त कर सकते हैं क्योंकि वे न कहने में कठिनाई महसूस करते हैं। यहाँ तक कि ऐसे भी लोग होते हैं जो, जब वे केवल कुछ दिन ही एक साथ बिता लेते हैं और अभी भी एक दूसरे से अपरिचित होते हैं, पैसा उधार माँगते हैं या दूसरे लोगों की चीज़ों का उपयोग करते हैं। यह वास्तव में लोगों को एक कठिन परिस्थिति में डाल देता है। ऐसे भी कुछ लोग होते हैं जो दूसरे लोगों के घरों में रहते समय वासना में लिप्त हो कर, दूसरों के प्रति अपमानजनक हो कर, आकस्मिक मज़ाक करके और सुस्ती में समय गँवा कर, अपनी पवित्र शालीनता को खो कर, कोई शिष्टाचार नहीं दर्शाते हैं। जबकि मैं मज़ाक करने के विरोध में नहीं हूँ, किन्तु अधर्मी और अश्लील मज़ाक उपयुक्त नहीं होते हैं। विनोदी और मज़ाकिया होना निस्संदेह अच्छा है ताकि लोग प्रसन्न और निश्चिन्त महसूस कर सकें, परन्तु सबसे अच्छा है अश्लील मज़ाक से बचना जो लोगों में चिढ़ और घृणा उत्पन्न करता है। मैंने कुछ लोगों में देखा है जिनमें इस बात का बहुत अभाव है कि किसी मनुष्य को कैसा होना चाहिए। यद्यपि हर किसी में कमी होती है, कम से कम लंपटता के विरुद्ध संयम, कुछ शिष्टाचार, अन्य लोगों के प्रति कुछ आदर, और नियमों की कुछ समझ तो होनी चाहिए, ताकि दूसरों के सामने उचित दिखाई दें। केवल इस प्रकार से कार्य करके ही तुम लोगों को लाभ प्रदान कर सकते हो। परमेश्वर का नाम भी अपमानित नहीं होगा और तुम्हारा कर्तव्य करना भी फलदायी होगा।

यह अत्यधिक महत्वपूर्ण है कि परमेश्वर का विश्वासी एक उचित मनुष्य की तरह व्यवहार करे। कोई व्यक्ति जो परमेश्वर पर विश्वास करता है किन्तु एक उचित मनुष्य की तरह व्यवहार नहीं करता है उसमें अवश्य मानवता का बहुत अभाव होना चाहिए और वह निश्चित रूप से सत्य को धारण नहीं करता है। कोई व्यक्ति जो अन्य लोगों के द्वारा पसंद नहीं किया जाता है वह परमेश्वर के द्वारा और भी अधिक घृणा किया जाता है। बिना मानवता वाले व्यक्ति को आसानी से नहीं बचाया जा सकता है भले ही वह परमेश्वर पर विश्वास करता हो। परमेश्वर के घर में, ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर पर विश्वास करता है किन्तु एक उचित मनुष्य की तरह कार्य नहीं करता है वह एक कठिन व्यक्ति है, खतरे में पड़ा हुआ व्यक्ति है। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के उद्धार के कार्य की अवधि के दौरान बिल्कुल भी नहीं बदला है और उसका रूप-रंग अभी भी अविश्वासियों का शैतान के जैसा है, तो जब परमेश्वर का दिन आएगा, तो इस प्रकार के व्यक्ति को निश्चित रूप से दण्डित किया जाएगा। कुछ लोग शिष्टाचार और नियमों को नहीं जानते हैं क्योंकि उन्हें अच्छी परवरिश नहीं मिली है, किन्तु इसे सीखा और अभ्यास में लाया जा सकता है। यह समझना अति आवश्यक है कि किन चीजों से सामान्य मानवता को सुसज्जित होना चाहिए। यह जानना कि कैसे एक उचित मनुष्य बनें और एक सामान्य मानवता में प्रवेश करना भी एक सीखे जाने वाला सबक है। यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, तो तुम्हें अवश्य उद्धार की तलाश करनी चाहिए और एक सार्थक जीवन जीना चाहिए। मानवता की कोई जानकारी न होने से भी कोई काम नहीं चलेगा। हममें से अधिकांश परमेश्वर के विश्वासी सभी श्रमजीवी वर्ग के परिवारों में पले-बढ़े हैं। हमारे माता-पिता के पास अधिक ज्ञान या बुद्धि नहीं है और वे केवल इतना ही जानते हैं कि कैसे परिवार के भरण-पोषण के लिए पैसा कमाया जाए। वे मूल रूप से यह नहीं जानते हैं कि बच्चों को कैसे पाल-पोष कर वयस्क बनाया जाए। हमारे जैसे लोग वास्तव में दयनीय हैं। शैतान की भ्रष्टता के विभिन्न तरीकों से गुजरने के बाद, हम जो जानते हैं वह है जीवन में कोई रास्ता तलाशने के लिए जो कुछ भी होता है केवल वह करना। हमें बचाने के लिए परमेश्वर को देहधारी होकर आने के कारण, अब हम मनुष्य की भ्रष्टता की सीमा को, मनुष्य में क्या कमी है उसे जानते हैं और जानते हैं कि सत्य और जीवन को प्राप्त करने के लिए कैसे खोज करनी है। यह सब कुछ समझना परमेश्वर के अनुग्रह के कारण होता है।

अभी भी कुछ ऐसी परिस्थितियाँ हैं जो बहुत गम्भीर हैं। हर कोई स्पष्ट रूप से देख सकता है कि विभिन्न प्रकार के बुरे लोगों ने अपने आप को पहले से ही प्रकट कर दिया है। कुछ लोग पुरुषों और स्त्रियों के मध्य सीमाओं का पालन नहीं करते हैं और कामुक व्यवहार में लिप्त रहते हैं जिसे देखना घृणास्पद और वमनकारी है। वे नहीं सुधरने वाले बदमाश, जानवरों से भी बदतर हैं। इस प्रकार के लोगों के लिए अंत में और भी अधिक गम्भीर दण्ड प्रतीक्षा कर रहा होगा। एक और प्रकार का व्यक्ति हैः शायद उनका परिवार अत्यंत गरीब है और वे जीवित नहीं रह सकते हैं, इसलिए उन्हें जब कभी भी अवसर मिलता है तो वे जब भी उठा सकें लाभ उठाएँगे, वे अनैतिक ढ़ंग से पैसों और भौतिक चीज़ों में अपना हाथ लगाते हैं। वे नीच चरित्र वाले कमीने मनुष्य हैं। ये लोग दया को समझने करने में विफल रहते हैं और दया के लायक नहीं होते हैं। ऐसे भी लोग हैं जो, अपने अधिकृत क्षेत्र से बाहर हर जगह झूठ बोलते हुए और लोगों को धोखा देते हुए हर उस दुष्टता को करते हैं जो उन्हें अच्छी लगती है। किन्तु बाद में वे दूसरों को अपनी वास्तविक प्रकृति के बारे में ज्ञात होने देते हुए और अंत में नकार दिए जाने से पहले, अन्य लोगों की घृणा और नफ़रत प्राप्त करते हुए, अपना भेद खोल देते हैं। ये सभी ऐसे दुष्ट लोग हैं जिनसे परमेश्वर घृणा करता है। ये इस धारा में खलनायक हैं, और जिस प्रकार का दण्ड वे प्राप्त करेंगे वह इस बात से निर्धारित होगा कि घटनाएँ कैसे विकसित और परिवर्तित होती हैं। मुझे आशा है कि हर कोई इन व्यक्तियों की असफलताओं को एक चेतावनी के रूप में ले सकता है, ताकि वे परमेश्वर का क्रोध उत्पन्न होने और दण्ड भुगतने से बच सकें। और हैं। मुझे आशा है कि हर कोई स्वयं के लिए सावधान रहता है।

जब एक सामान्य व्यक्ति की तरह व्यवहार की बात आती है तो ध्यान देने और अभ्यास करने के लिए 10 बातें हैं:

1. शिष्टाचार का पालन करो, नियमों को जानो और वृद्धों का आदर करो तथा युवाओं

की देखभाल करो।

2. एक उपयुक्त जीवन-शैली अपनाओ; जो तुम्हारे लिए और अन्य लोगों के लिए

लाभकारी हो।

3. सम्मानजनक और सीधी-सादी पोशाक पहनो; अजीब सा अनोखे कपड़े निषिद्ध हैं।

4. भाइयों या बहनों से किसी भी कारण से पैसा उधार न माँगो, और अन्य लोगों की

चीज़ों को यूँ ही उपयोग में मत लाओ।

5. विपरीत लिंग के व्यक्ति के साथ सम्पर्क में आने पर सीमाओं में रहो; क्रिया-

कलाप हमेशा सम्मानीय और ईमानदार अवश्य होने चाहिए।

6. लोगों के साथ वाद-विवाद मत करो; लोगों को धैर्य से सुनना सीखो।

7. स्वच्छता के बारे में विशेष रूप से ध्यान रखो, किन्तु वास्तविक परिस्थितियों के

आलोक में।

8. लोगों के साथ सामान्य बातचीत और सम्बन्धों में शामिल रहो, उनका आदर

करना और उनके प्रति विचारशील होना सीखो, और एक दूसरे से प्रेम करो।

9. ज़रूरत मंदों की हर सम्भव सहायता करो; दूसरे लोगों से चीज़ों को मत लो या

स्वीकार मत करो।

10. लोगों को तुम्हारी सेवा मत करने दो; अन्य लोगों को उस कार्य को मत करने दो

जो तुन्हें स्वयं करना चाहिए।

ये 10 नियम वे न्यूनतम होने चाहिए जिनका परमेश्वर के सभी विश्वासियों द्वारा अपना मानव जीवन जीने में अवश्य पालन किया जाना चाहिए। जो लोग इन नियमों को तोड़ते हैं वे कमज़ोर चरित्र के होते हैं। तुम कह सकते हो कि ये परमेश्वर के घर के नियम हैं। जो लोग बार-बार इनका उल्लंघन करते हैं वे निश्चित रूप से बहिष्कृत कर दिए जाएँगे।

जो लोग सत्य की खोज करते हैं उन सबको भी प्राचीन संतों के 10 अच्छे चरित्र के लक्षणों का पालन करने की आवश्यकता है। जो लोग इन्हें निंरतर अभ्यास में लाते और बनाए रखते हैं वे निश्चित रूप से बहुत लाभ प्राप्त करेंगे। ये अत्यंत लाभदायक हैं।

संत जैसी शालीनता के अनुरूप बनने के लिए 10 सिद्धांत:

1. सुबह के समय लगभग आधे घंटे तक परमेश्वर के वचन की प्रार्थना-पढ़ कर

आध्यात्मिक विन्यास करें।

2. अधिक परिशुद्धता के साथ सत्य का अभ्यास करने में सहायता के लिए हर दिन

सभी बातों में परमेश्वर के इरादों को खोजें।

3. तुम्हारे सम्पर्क में आने वाले सभी के साथ संवाद करो, दोनों के विकास के लिए

एक दूसरे से सीखो।

4. जीवन के प्रति सकारात्मक रवैया अपनाओ, और बार-बार भजनों और स्तुतियों को

गाओ और परमेश्वर के अनुग्रह के लिए धन्यवाद दो।

5. धर्मनिरपेक्ष संसार द्वारा मत उलझो; नियमित रूप से अपने हृदय में परमेश्वर के

नज़दीक रहो और हस्तक्षेप मत करो।

6. अपने हृदय में बुद्धि रखो और बुरे और खतरनाक स्थानों से दूर रहो।

7. लोगों के साथ वाद-विवाद मत करो, सत्य का संवाद करो, और दूसरों के साथ

मिलजुल कर रहो।

8. दूसरों की सहायता के लिए वह सब करने के लिए तत्पर रहो जो तुम कर सकते

हो, उनकी चिंताओं को कम करो, और परमेश्वकर में विश्वास के प्रवेश में उनकी कठिनाईयों को सुलझाने में उनकी सहायता करो।

9. सीखो कि कैसे लोगों का आज्ञापालन करें, लोगों पर शासन मत करो और उन्हें

मज़बूर मत करो; लोगों को सभी चीज़ों में लाभ लेने दो।

10. अपने हृदय में बार-बार परमेश्वर की आराधना करो, उसे प्रभु बने रहने दो और

उसे सभी बातों में संतुष्ट करो।

मानव जीवन के उपरोक्त 10 नियम और संत जैसी शालीनता के अनुरूप बनने के लिए 10 तरीके वे सभी बातें हैं जिन्हें करने में लोग सक्षम हैं। लोग इन चीज़ों का अभ्यास कर सकते हैं यदि वे इन्हें समझ जाएँ। यदि ये यदा-कदा उल्लंघन भी करते हैं तो इसे सुलझाना मुश्किल नहीं है। विशिष्ट लोगों के बारे में बातचीत करने की आवश्यकता नहीं है जिनकी मानवता बहुत ही बुरी है।

हो सकता है कि तुम अधिक गहरे सत्य को समझने में सक्षम नहीं हो, किन्तु तुम्हें कम से कम यह समझना चाहिए कि सामान्य मानवता को कौन सा ज्ञान होना चाहिए। जो लोग इन थोड़े से सिद्धांतों का पालन नहीं कर सकते हैं वे उसके बहुत असदृश हैं जैसा कि मनुष्य को होना चाहिए, और वास्तव में मानव वस्त्रों में जानवर से भिन्न नहीं हैं। मैं कुछ लोगों को दुर्व्यवहार नहीं करने और कुछ आत्म-सम्मान रखने की सलाह देता हूँ। ऐसी बातें करो जो परमेश्वर का अनादर करती हैं और शैतान के द्वारा मज़ाक के रूप में उपयोग की जा सकती हैं। देह में संतुष्टि का एक पल अनंत शर्मिंदगी और पीड़ा ला सकता है। परमेश्वर शीघ्र ही लोगों को दण्ड देने ही वाला है। दण्डित किया जाना अत्यंत कष्टदायक और सबसे अधिक शर्मनाक बात है। प्रतिफल प्राप्त करने में असमर्थ होना और इसके बजाय दण्ड प्राप्त करना तुम्हें जीवन जीते रहने का सामना नहीं करवा सकता है। क्या तुम्हें ऐसा नहीं लगता है?

"मसीह की बातचीतों के अभिलेख"से "परमेश्वर के विश्वासी का एक उचित रूप"से

सामान्य मानवता मुख्य रूप से अंतरात्मा और समझ रखने, चरित्र और गरिमा रखने का संकेत करती है। अंतरात्मा और समझ में सहनशीलता, अन्य लोगों के प्रति धैर्य होना, ईमानदार होना, लोगों के साथ बुद्धिमानी से व्यवहार करना, और भाइयों और बहनों के प्रति सच्चा प्रेम रखना शामिल हैं। ये वे पाँच अभिलक्षण हैं जिनसे सामान्य मानवजाति को अवश्य सम्पन्न होना चाहिए।

सबसे पहला अभिलक्षण है सहिष्णुता वाला हृदय होना। यहाँ सहिष्णुता का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि इस बात की परवाह किए बिना कि हम अपने भाइयों और बहनों में कौन से दोष देखते हैं हमें उनके साथ सही ढंग से व्यवहार करना चाहिए, उन्हें अलग नहीं करना चाहिए और उनकी निंदा नहीं करनी चाहिए। उनके साथ सही ढंग से व्यवहार करना सहिष्णुता और समझदारी व्यक्त करना है। जब हम दूसरों में दोष या भ्रष्टता प्रकट हुई देखें तो हमें स्मरण रखना चाहिए कि यह परमेश्वर द्वारा उद्धार के कार्य का समय है और परमेश्वर के चुने हुए लोगों में से हर एक में भ्रष्टता का प्रकटन है। यह सामान्य है और हमें समझना चाहिए। इसके अलावा, हमें अपनी स्वयं की भ्रष्टता पर विचार करने की आवश्यकता है, जिसका प्रकटन अन्य लोगों की अपेक्षा आवश्यक नहीं कि कम हो। जिस प्रकार से हम दूसरों की भ्रष्टता के प्रकटन के साथ व्यवहार करते हैं उसी तरह से हमें अपनी स्वयं की भ्रष्टता के प्रकटन के साथ व्यवहार करना चाहिए। इस तरह, हम दूसरों के प्रति सहिष्णु हो सकते हैं और सहिष्णुता के प्रभाव को प्राप्त कर सकते हैं। यदि तुम अन्य लोगों के प्रति सहिष्णु नहीं हो सकते हो, तो इसका अर्थ है कि तुम्हारी समझ में कोई समस्या है जो यह सिद्ध करता है कि तुम सत्य को नहीं समझते हो और परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते हो। परमेश्वर के कार्य को नहीं जानने का क्या अर्थ है? यह इस बात को नहीं जानना है कि परमेश्वर का कार्य वर्तमान मे पूरा नहीं हुआ है और मनुष्य अभी भी परमेश्वर द्वारा उद्धार के कार्य की अवधि में रह रहा है और पूर्ण नहीं बनाया गया है। इसलिए, प्रत्येक व्यक्ति अनिवार्य रूप से भ्रष्टता को प्रकट कर रहा होगा। अब हर कोई सामान्य रूप से सत्य को प्राप्त करने की कोशिश में लगा हुआ है, अपनी स्वयं की भ्रष्टता को जान रहा है, और परमेश्वर के वचन को अनुभव कर रहा है। हर व्यक्ति सत्य में प्रवेश करने की अवधि में है और उसने अभी तक सत्य को पूरी तरह से प्राप्त नहीं किया है। यह केवल लोगों द्वारा सत्य को ग्रहण कर लेने के बाद ही होता है कि उनके जीवन स्वभाव में परिवर्तन होना आरम्भ हो जाएगा। जब लोग इस बिन्दु को समझ जाएँगे तो उनमें एक सामान्य व्यक्ति की समझ आ जाएगी। जब लोग विवेकशील होगे तो वे दूसरों के साथ विवेकशीलता से व्यवहार करेंगे। यदि लोग विवेकशील नहीं होंगे तो वे दूसरों के साथ विवेकशीलता से व्यवहार नहीं करेंगे। यही सहिष्णुता का पहलू है।

दूसरा अभिलक्षण धैर्य है। केवल सहिष्णु होना ही पर्याप्त नहीं है; तुम्हें धैर्यवान भी अवश्य होना चाहिए। कभी-कभी तुम सहिष्णु और समझदार हो सकते हो, किन्तु किसी विशेष भाई या बहन को टालना कठिन होता है जो तुम्हें चोट पहुँचा या अपमानित कर सकता है। इस प्रकार की परिस्थिति में मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव फूट कर बाहर आना आसान है। हम सभी लड़ना और अपने स्वयं के गौरव की रक्षा करना चाहते हैं, हम सभी स्वार्थी और बेकार हैं। इसलिए यदि कोई कुछ कहता है जिससे तुम्हें चोट पहुँचती है या कुछ करता है जिससे तुम्हारा अपमान होता है, तो तुम्हें धैर्यवान होना चाहिए है। तो धैर्य क्या है? धैर्य को समझ के दायरे में भी शामिल किया जाता है। धैर्य होने के लिए हममें समझ होने की आवश्यकता है। किन्तु हम धैर्यवान कैसे बन सकते हैं? यदि तुम दूसरों के प्रति धैर्यवान होना चाहते हो, तो सबसे पहले तुम्हें उन्हें समझने की आवश्यकता है, जिसका अर्थ है कि इस बात की परवाह किए बिना कि कोई तुम्हें कुछ भी कहे जिससे तुम्हें चोट पहुँचती है, तो तुम्हें यह जानना चाहिए कि इस तुम इस पर कैसे विचार करो और इसके साथ कैसे व्यवहार करो। तुम्हें सबसे पहले यह समझना चाहिएः उसके वचनों ने मुझे चोट पहुँचायी है। जो कुछ उसने कहा है वह मेरी कमियों को उजागर करता हुआ प्रतीत हुआ है और मुझ पर निर्देशित हुआ प्रतीत हुआ है। यदि उसके वचन मुझ पर निर्देशित हैं, तो उनसे उसका क्या अर्थ है? क्या वह मुझे नुकसान पहुँचाने की कोशिश कर रहा है? क्या वह मुझे अपने शत्रु के रूप में देखता है? क्या वह मुझसे घृणा करता है? क्या वह मुझसे बदला ले रहा है? मैंने उसका अपमान नहीं किया, इसलिए इन प्रश्नों के उत्तर हाँ नहीं हो सकते हैं। यदि ऐसा मामला है, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका भाई या बहन क्या कहता है, मुझे चोट पहुँचाने या मुझसे अपने शुत्र की तरह व्यवहार करने के उसके इरादे नहीं थे। यह तो पक्का है। जब उन्होंने इन वचनों को कहा, तो उन्हें कोई विशेष व्यक्ति की ओर निर्देशित करने के बजाय, वे सिर्फ़ वैसा व्यक्त कर रहे थे जो एक सामान्य व्यक्ति सोचता है। यह कहा जा सकता है कि वे सत्य की चर्चा कर रहे थे, ज्ञान की चर्चा कर रहे थे, लोगों की भ्रष्टता को प्रकट कर रहे थे, या अपनी स्वयं की भ्रष्ट अवस्था को अभिस्वीकृत कर रहे थे, वे निश्चित रूप से जानबूझ कर किसी व्यक्ति विशेष को लक्षित नहीं कर रहे थे। सबसे पहले तुम समझ प्रस्तावित करते हो, तब तुम्हारा क्रोध नष्ट हो सकता है और फिर तुम धैर्य को प्राप्त कर सकते हो। फिर कोई पूछेगाः यदि कोई जानबूझ कर मुझ पर प्रहार करता और मुझे निशाना बनाता है, और किसी प्रयोजन को प्राप्त करने के लिए केवल जानबूझकर इन बातों को कहता है, तो मैं किस प्रकार से धैर्यवान हो सकता हूँ? तुम्हें इस प्रकार से सहनशील होना चाहिए: भले ही कोई मेरे ऊपर जानबूझ कर प्रहार करे, मुझे तब भी धैर्यवान रहना चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे मेरे भाई या बहन हैं और मेरे शत्रु नहीं हैं, और निश्चित रूप से दुष्टात्मा, शैतान नहीं हैं। यह अपरिहार्य है कि भाई और बहन कुछ भ्रष्टता प्रकट करेंगे और उनके हृदय के कुछ निश्चित इरादे होंगे। यह सामान्य बात है। मैं समझता हूँ और मुझे सहानुभूति दिखानी चाहिए और धैर्यवान होना चाहिए। एक बार तुम इस प्रकार से सोच लो, तो तुम्हें परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और कहना चाहिएः "परमेश्वर, किसी ने अभी-अभी मेरे अभिमान पर प्रहार किया है। मैं अपमान स्वीकार नहीं कर सकता हूँ और इससे हमेशा मुझे पागल हो जाने और उन पर प्रहार करने की इच्छा होती है। यह वास्तव में एक भ्रष्टता का प्रकाशन है। मैं इस प्रकार से सोचा करता था कि मैं दूसरों से प्रेम करता हूँ, किन्तु अब जब कि किसी के वचन मेरे हृदय को भेद गए हैं तो मैं इसे सहन नहीं कर सकता हूँ। मैं वापस प्रहार करना चाहता हूँ। मैं बदला लेना चाहता हूँ। यहाँ पर कोई प्रेम नहीं है! क्या यह सब केवल घृणा नहीं है? मेरे हृदय में अभी भी घृणा है! परमेश्वर, जिस प्रकार से तू हमारे ऊपर दया करता है और हमारे पापों के लिए हमें क्षमा करता है वैसे ही हमें दूसरों पर दया करनी चाहिए। हमें द्वेष नहीं रखना चाहिए। परमेश्वर, कृपया मेरी रक्षा कर, मेरे स्वभाव को मत टूटने दे। मैं तेरा आज्ञापालन करने की इच्छा रखता हूँ और तेरे प्रेम में रहना चाहता हूँ। हम मसीह और परमेश्वर की बहुत अधिक अवज्ञा और विरोध करते हैं, किन्तु मसीह तब भी हमारे साथ धैर्यवान रहता है। परमेश्वर अपने कार्य के इस चरण को बहुत ही धैर्य और प्रेम के साथ कर रहा है। मसीह ने कितना अधिक दुःख, अपमान और बदनामी सहन की? यदि मसीह इसके साथ धैर्यवान रह सका, तो थोड़ी सी सहनशीलता जिसकी हममें होने की आवश्यकता है तो कुछ भी नहीं है! हमें जिस बारे में सहनशील होने की आवश्यकता है उसकी मसीह के साथ कोई तुलना नहीं की जा सकता है। ..." एक बार तुम इस प्रकार से प्रार्थना करोगे तो तुम महसूस करोगे कि जैसे कि तुम अत्यधिक भ्रष्ट हो, बहुत की तुच्छ हो, कद-काठी में अत्यधिक कम हो, और यह तब होगा जब तुम सहनशील बनने में समर्थ हो जाओगे, जब तुम अब और क्रोधित नहीं होगे और तुम्हारा रोष समाप्त हो जाएगा। इसी प्रकार से तुम धैर्य प्राप्त कर सकते हो।

तीसरा अभिलक्षण है लोगों के साथ ईमानदारी के साथ व्यवहार करना। लोगों के प्रति ईमानदार होने का अर्थ कि हम कुछ भी करें, चाहे यह दूसरों की सहायता करना हो या अपने भाइयों और बहनों की सेवकाई करना हो या सत्य का संवाद करना हो, हमें हृदय से बोलना है। कभी भी झूठ मत बोलो या नकली मत बनो। इसके अलावा, तुमने जो नहीं किया है उसका उपदेश मत दो। जब भी भाईयों और बहनों को हमारी सहायता की आवश्यकता हो हमें उनकी सहायता करनी चाहिए। हमें जो भी कर्तव्य पूरा करने की आवश्यकता है हमें उसे अवश्य ही पूर्ण करना चाहिए। हमेशा ईमानदार रहो और झूठे या आडंबरी मत बनो ... निस्संदेह, कुछ विशेष व्यक्तियों के साथ व्यवहार करते समय, ईमानदार व्यक्ति होने के लिए थोड़ी सी बुद्धि की आवश्यकता होती है। यदि तुम देखते हो कि यह व्यक्ति विश्वसनीय नहीं है, यदि उनकी भ्रष्टता काफी गहरी है, यदि तुम उनकी वास्तविक प्रकृति का पता नहीं लगा सकते हो और नहीं जानते हो कि वे क्या कर सकते हैं, तो तुम्हें बुद्धिमान होने और उन्हें सब कुछ नहीं कहने की आवश्यकता है। एक ईमानदार व्यक्ति होने के लिए सिद्धांतों की आवश्यकता होती है। आँख बंद करके उन चीज़ों के बारे में न कहें जिनके बारे में आपको नहीं बोलना चाहिए। हमें उन्हीं चीजों के बारे में बात करनी चाहिए जिनके बारे मे हमें बात करनी चाहिए। इसके अलावा, ईमानदार व्यक्ति होने के लिए तर्क और सामान्यता के साथ बातचीत करने की आवश्यकता होती है। किसी से ऐसा मत कहें: "आज मैं तुम्हारे साथ ईमानदार रहूँगा और तुम्हें अपने बारे में सब कुछ बताऊँगा।" यह ईमानदार व्यक्ति होना नहीं है। यह बच्चों का खेल है। तुम्हें सामान्य होना है। वे कहते हैं: "मैं आज काम कर रहा हूँ, इसलिए यदि तुम लोगों के साथ कुछ नहीं चल रहा है तो मैं अपने मामलों को सँभालने जा रहा हूँ।" तुम कहते हो: "अरे, एक मिनट रूको, मुझे सबसे पहले तुम्हारे साथ ईमानदार व्यक्ति अवश्य हो ना चाहिए तुम्हें कुछ बताना चाहिए।" वे कहते हैं: "मेरे पास सुनने के लिए समय नहीं है, मैं चीजों को करवाने की जल्दी में हूँ।" तुम कहते हो: "नहीं, मुझे तुम्हारे साथ एक ईमानदार व्यक्ति अवश्य होना चाहिए। मैं तुम्हारे प्रति उस तरह का हुआ करता था और अब मुझे तुम्हारे प्रति ऐसा होना चाहिए।" क्या यह मूर्खतापूर्ण नहीं है? एक ईमानदार व्यक्ति होना एक चतुर व्यक्ति होना है और एक मूर्ख व्यक्ति होना नहीं। यह चतुर, साधारण और स्पष्ट, तथा सन्मार्ग पर लाने वाला होने के बारे में है। तुम्हें सामान्य और विवेकपूर्ण होना है। ईमानदारी समझ पर बनती है। दूसरे लोगों के साथ व्यवहार करते समय ईमानदार होना और एक ईमानदार व्यक्ति होना, यही इसका अर्थ है। वास्तव में, एक ईमानदार व्यक्ति होने के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात परमेश्वर के प्रति ईमानदार होना है। यदि तुम केवल दूसरे लोगों के सामने तो ईमानदार हो किन्तु तुम परमेश्वर के सामने ईमानदार नहीं हो और उसे धोखा देते हो तो क्या यह एक बड़ी समस्या नही होगी? यदि तुम परमेश्वर के सामने ईमानदार व्यक्ति बनना चाहते हो, तो तुम दूसरों के सामने प्राकृतिक रूप से ईमानदार बन जाते हो। यदि तुम परमेश्वर के सामने ऐसा नहीं कर सकते हो, तो तुम दूसरे लोगों के सामने तो ऐसा और भी नहीं कर सकते हो। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम सत्य के कौन से पहलू या सकारात्मक चीज़ में प्रवेश कर रहे हो, तुम्हें सबसे पहले इसे परमेश्वर के सामने अवश्य करना चाहिए। जब तुम परमेश्वर के सामने इसे सफलतापूर्वक कर सकते हो, तो तुम दूसरों के सामने इसे प्राकृतिक रूप से आसानी से करने में समर्थ हो जाओगे। दूसरों के सामने ऐसा वैसा करने के लिए अपने आप को तनाव में मत डालो और परमेश्वर के सामने जो कुछ तुम करना चाहते हो वह स्वतंत्रता से करो। इससे काम नही चलेगा। सबसे महत्वपूर्ण बात है इसे परमेश्वर के सामने करना, जो मानवजाति का परीक्षण करता है और उनके हृदयों को खोजता है। यदि तुम परमेश्वर के सामने परीक्षण को उत्तीर्ण कर लेते हो तो तुममें सच में वास्तविकता है। यदि तुम परमेश्वर के सामने इस परीक्षण को पास नहीं करते हो तो तुममें वास्तविकता नहीं है। जब तुम सत्य का अभ्यास कर रहे हो तो यही नियम है।

चौथा अभिलक्षण है दूसरों के साथ बुद्धिमत्ता से व्यवहार करना। कुछ लोग कहते हैं: "क्या भाइयों और बहनों के साथ मेल-जोल के लिए बुद्धि की आवश्यकता होती है?" हाँ, होती है, क्योंकि बुद्धि का उपयोग करना तुम्हारे भाइयों और बहनों को और भी अधिक लाभ प्रदान करता है। कुछ लोग पूछेंगेः "क्या भाइयों और बहनों के साथ बुद्धिमान बनना चालाक होना नहीं है?" बुद्धिमानी चालाकी नहीं है, बल्कि, यह चालाकी से पूरी तरह विपरीत है। बुद्धि का उपयोग करने का अर्थ है भाइयों और बहनों से बातचीत करने के अपने तरीके पर ध्यान देना जब उनकी कद-काठी छोटी हो, ऐसा न हो कि तुम जो कहते हो वे उसे स्वीकार करने में असमर्थ हों। साथ ही, छोटी कद-काठी वाले लोगों के लिए, विशेषरूप से जो सत्य को धारण नहीं करते हैं और जो कुछ भ्रष्टता को प्रकट करते हैं और जिसका कुछ भ्रष्ट स्वभाव है, यदि तुम बहुत ही साधारण और निष्कपट हो और उन्हें सब कुछ बता देते हो, तो तुम्हारे ऊपर कुछ करवाना या तुम्हारा उपयोग करवाना उनके लिए कभी-कभी आसान हो सकता है। यह भी तो अच्छा नहीं है। चूँकि मनुष्यों का स्वभाव भ्रष्ट है, इसलिए बोलते समय तुम्हें कमोबेश सावधानियाँ अवश्य रखनी चाहिए और तुम्हारे पास कुछ तकनीकें अवश्य होनी चाहिए। किन्तु लोगों के सामने सचेत रहने का अर्थ उनकी सहायता नहीं करना या उनके प्रति प्रेम नहीं होना नहीं है। इसका सिर्फ इतना ही अर्थ है कि उन्हें परमेश्वर के घर के बारे में कुछ आवश्यक बातों को तुरंत नहीं बताना है, और उन्हें सत्य संवादित करना है। यदि उन्हें जीवन में आध्यात्मिक सहायता की और उन्हें सत्य आपूर्ति किए जाने की आवश्यकता होती है, तो हमें इस संबंध में उन्हें संतुष्ट करने के लिए अपनी क्षमता के अंतर्गत सब कुछ करना है। किन्तु यदि वे परमेश्वर के घर के बारे में इधर-उधर की पूछताछ कर रहे हैं, या उसके अगुवों और कार्यकर्ताओं के बारे में इधर-उधर की पूछताछ कर रहे हैं, तो उन्हें बताने की आवश्यकता नहीं है। यदि तुम उन्हें बताते हो, तो इस जानकारी को प्रकट करने की उनकी संभावना है और इससे परमेश्वर के घर का कार्य प्रभावित होगा। दूसरे शब्दों में, यदि यह कुछ ऐसा है जो उन्हें नहीं जानना चाहिए या कुछ ऐसा है जिसके बारे में उन्हें जानने की आवश्यकता नहीं है, तो उन्हें इसके बारे में कुछ भी मत जानने दो। यदि यह कुछ ऐसा है जो उन्हें जानना चाहिए, तो इसके बारे में उन्हें, वस्तुतः और बिना रोक के, जानने देने के लिए तुम वह सब करो जो तुम कर सकते हो। इसलिए वे कौन सी बातें हैं जो उन्हें जाननी चाहिए? सत्य की खोज ही उन्हें जाननी चाहिए; किस सत्य से उन्हें सुसज्जित होना चाहिए, सत्य के किन पहलुओं को उन्हें समझना चाहिए, कौन से कर्तव्य उन्हें पूरे करने चाहिए, कौन से कर्तव्य पूरा करना उनके लिए उचित होगा, उन्हें उन कर्तव्यों को किस प्रकार से पूरा करना चाहिए, सामान्य मानवता को कैसे जीना है, कलीसिया का जीवन किस प्रकार से जीना है—इन सभी बातों को लोगों को जानना चाहिए। दूसरी ओर, परमेश्वर के घर के नियम और सिद्धांत और कलीसिया के कार्य बाहरी लोगों के लिए प्रकट नहीं किए जा सकते हैं, न ही तुम्हारे परिवार के भाइयों और बहनों की स्थितियों को बाहरी लोगों या तुम्हारे परिवार के गैर-विश्वासियों के लिए प्रकट किया जा सकता है। यही वह सिद्धांत है जिसे हमें तब अवश्य पालन करना चाहिए जब हम बुद्धि का उपयोग करते हैं। उदारहण के लिए, तुम्हारे अगुवों के नाम और पते, ऐसी चीजें हैं जिनके बारे में तुम्हें बात नहीं करनी चाहिए। यदि तुम इन चीजों के बारे में बात करते हो, तो तुम्हें कभी पता नहीं चलता है कि कब ये जानकारियाँ बाहरी लोगों के कानों में पड़ सकती हैं, और चीजें कष्टप्रद हो सकती हैं यदि ये बातें तब कुछ दुष्ट जासूसों या गुप्त एजेंटों तक पहुँच जाती हैं। तुम्हें इन बातों के बारें में बुद्धिमान अवश्य होना चाहिए। यही कारण है कि मैं कहता हूँ कि बुद्धि की अत्यंत आवश्यकता है। इसके अलावा, जब तुम साधारण और निष्कपट होते हो, तो तुम कुछ व्यक्तिगत बातें किसी को भी यूँ ही नहीं बताओगे। यह देखने के लिए तुम्हें अपने भाई और बहनों की कद-काठी का आँकलन करना होगा कि क्या, तुम्हारे उन्हें बताने के बाद तुम जो कहते हो वे उसके बारे में बुरा कह सकते हैं और मज़ाक बना सकते हैं। यदि वे इसे वहाँ बाहर जाने देते हैं तो यह एक समस्या होगी; यह तुम्हारे चरित्र को नुकसान पहुँचाएगी। इसलिए साधारण और निष्कपट होने के लिए भी बुद्धि की आवश्यकता है। यह चौथा मानक है जो सामान्य मानवजाति को धारण अवश्य करना चाहिए—लोगों के साथ बुद्धिमत्ता के साथ व्यवहार करना।

पाँचवाँ अभिलक्षण है ऐसे भाइयों और बहनों की सच्ची देखभाल करना जो सच में परमेश्वर पर विश्वास करते हैं। इसमें थोड़ा सा वास्तविक प्रेम, सच्ची सहायता, और समर्पण का भाव शामिल है। हमें, इसकी परवाह किए बिना कि चाहे वे नए विश्वासी हों या कई सालों से विश्वासी रहे हों, उन भाइयों और बहनों के साथ विशेष रूप से अधिक संवाद करना चाहिए और उन्हें अधिक आपूर्ति करनी चाहिए जो सत्य की खोज में हैं। यहाँ कलीसियाई जीवन का यह एक विशेष सिद्धांत हैः उन लोगों के साथ विशेष व्यवहार करो जो सत्य की खोज करते हैं। उनके साथ अधिक संवाद करो, उन्हें अधिक आपूर्ति करो, और शीघ्रता से ऊपर उठने में उनकी सहायता करने के लिए, यथाशीघ्र उनका जीवन विकसित करवाने के लिए, उन्हें अधिक सिंचित करो। जो सत्य को नहीं खोजते हैं उनके लिए, यदि यह स्पष्ट हो जाता है कि एक अवधि तक सिंचित करने के बाद वे सत्य को प्रेम नहीं करते हैं, तो उन पर बहुत अधिक प्रयास व्यय करने की आवश्यकता नहीं है। यह आवश्यक नहीं है क्योंकि तुम मानव रूप से संभव सभी प्रयासों को पहले से ही कर चुके हो। इतना पर्याप्त है तुमने अपने उत्तरदायित्वों को पूरा कर लिया है ... तुम्हें यह देखने की आवश्यकता है कि तुम्हें किस पर अपने कार्य को केन्द्रित करना है। क्या सत्य को नहीं खोजने वालों को परमेश्वर पूर्ण बनाएगा? यदि पवित्र आत्मा नहीं बनाएगा, तो तुम्हें आँख बंद करके यह क्यों करते रहना चाहिए? तुम पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते हो फिर भी हमेशा अहंकार के साथ कार्य करते हो—क्या यह तुम्हारी मूर्खता और अज्ञानता नहीं है? इसलिए, सत्य को खोजने वाले भाइयों और बहनों को अधिक सहायता दो, क्योंकि वे परमेश्वर द्वारा उद्धार की वस्तुएँ हैं और उसके पूर्व निर्धारित चुने हुए लोग हैं। यदि हम प्रायः एक हृदय और मन से इन लोगों के साथ सत्य का संवाद करते हैं और एक दूसरे की सहायता करते हैं और उन्हें आपूर्ति करते हैं, तो अंत में हम सभी उद्धार प्राप्त करेंगे। यदि तुम इन लोगों के साथ नहीं जुड़ते हो तो तुम परमेश्वर की इच्छा के साथ विश्वासघात कर रहे हो। ... कलीसिया में सामान्य मानवता वाले लोगों को अपने आप को सत्य की खोज करने वाले लोगों के बीच रखना चाहिए, इन लोगों के साथ समरसता में होना चाहिए और सत्य की खोज के माध्यम से धीरे-धीरे एक ही हृदय और मन के साथ परमेश्वर के लिए व्यय करना चाहिए। इस तरह से, सत्य की खोज में लगे लोग बचाए जाएँगे और तुम भी बचाए जाओगे, क्योंकि पवित्र आत्मा सत्य की खोज करने वाले लोगों के बीच कार्य करता है...

हमनें ऊपर उन पाँच पहलुओं के बारे में संवाद किया है जिन्हें सामान्य मानवता को अवश्य धारण करना चाहिए। यदि तुम इन सभी पाँचों अभिलक्षणों से सुसज्जित हो, तो तुम अपने भाइयों और बहनों के साथ समरसता के साथ मिल-जुल कर रहने में समर्थ होगे, तुम कलीसिया में अपना स्थान प्राप्त करने में समर्थ होगे, और तुम अपनी सर्वोत्तम योग्यता के साथ अपनी भूमिका को निभाने में समर्थ होगे।

"जीवन में प्रवेश के विषय में संगति एवं प्रवचन (I)" में "कलीसिया के जीवन का निर्माण कैसे करें और कलीसियाई जीवन के निर्माण का अर्थ" से

स्वभाव संबंधी परिवर्तन की अभिव्यक्ति का चौथा प्रकार है अंतःकरण का होना, समझ का होना और दयालु होना और एक ईमानदार व्यक्ति बनना। अंतःकरण और समझ होने का अर्थ है कि व्यक्ति परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द ले रहा है और परमेश्वर के प्रेम को चुकाना जानता है। वे परमेश्वर पर विश्वास करने के माध्यम से सृजित प्राणी के अपने कर्तव्य को पूरा कर सकते हैं क्योंकि उन्हें परमेश्वर के बारे में समझ है, वे दयालु हैं और एक ईमानदार व्यक्ति बन चुके हैं। एक ईमानदार व्यक्ति के रूप में, वे अपना कर्तव्य पूरा कर सकते हैं और परमेश्वर के प्रेम को चुका सकते हैं, और दूसरों के साथ दयालुता से व्यवहार कर सकते हैं। इस प्रकार का व्यक्ति झूठ नहीं बोलता है, धोखा नहीं देता है और निश्चित रूप से कोई साज़िश नहीं रचता है। इस तरह के किसी के साथ मेलजोल होना कभी भी तुम्हारे लिए कोई खतरा खड़ा नहीं करेगा या चोट नहीं पहुँचाएगा। ... उनका जीवन स्वभाव परिवर्तित हो जाने के बाद, लोग दयालु बन सकते हैं, हर एक के साथ निष्पक्षता से व्यवहार कर सकते हैं, और उन लोगों के प्रति विशेषरूप से दयालु हो सकते हैं जो खास तौर पर अच्छे होते हैं। सबसे पहले, वे तुम्हें धोखा नहीं देंगे। दूसरा, वे तुम्हें फँसाने का प्रयास नहीं करेंगे। तीसरा, वे निश्चित रूप से तुम्हें चोट पहुँचाने का इरादा नहीं करेंगे। तुम्हें इन बातों की कभी भी चिंता नहीं करनी है। इसके अलावा, यदि तुम उन्हें किसी तरह से चोट पहुँचाते हो, तो वे तुम्हें क्षमा कर देंगे और तुम्हारे अपराध को पकड़ कर नहीं रखेंगे। वे तुम्हें सहेंगे, तुम्हारे प्रति सहिष्णु रहेंगे, तुम्हारे साथ धैर्यवान रहेंगे और तब भी तुम्हारे साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करेंगे। यदि तुम इस प्रकार के व्यक्ति से मिले होते हो तो क्या यह अधिक सुरक्षित नहीं होता? एक व्यक्ति जिसका जीवन स्वभाव बदल गया है उसका हृदय दयालु होता है और उसमें प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रेम होता है और वह उनकी सहायता करने के लिए तैयार रहता है। यहाँ तक कि यदि तुम उन्हें चोट पहुँचाते हो या उनके साथ गलत करते हो, तब भी वे तुम्हारे साथ सहिष्णु रह सकते हैं, तुम्हारे प्रति धैर्यवान रह सकते हैं और तुम्हें क्षमा कर सकते हैं। इस प्रकार का व्यक्ति सामान्य मानवता वाला और एक वास्तविक व्यक्ति की सदृशता वाला होता है। एक वास्तविक व्यक्ति की सदृशता वाला मनुष्य लोगों के साथ अंतःकरण, विवेक और सत्य के साथ व्यवहार करता है। वे परमेश्वर का आज्ञापालन करते हैं, एक प्रेमी हृदय रखते हैं और सच्ची उपासना करते हैं। यह एक ऐसा व्यक्ति है जिसका जीवन स्वभाव बदल गया है। आज कल लोगों में बहुत सारे द्वेषपूर्ण घटक होते हैं, तो वे कैसे कार्य करते हैं? यदि वे किसी ऐसे को देखते हैं जिसे वे उसे नापसंद करते हैं तो वे उनके बारे में राय बनाएँगे और उनका अपमान करेंगे। क्या यह क्रूरता नहीं है? साथ ही, यदि वे किसी ऐसे को देखते हैं जो भ्रष्टता को प्रकट करता है, तो वे उसके साथ मनुष्य जैसा व्यवहार नहीं करेंगे, और इसके बजाय वे उसके साथ दुष्ट आत्माओं जैसा व्यवहार करेंगे। लोगों के साथ उचित व्यवहार नहीं करना—क्या यह दुर्भावनापूर्ण नहीं है? यदि कोई उनके साथ गलत करता है या कुछ ऐसी बात कहता है जो उसे नहीं कहनी चाहिए थी, जैसे कि ऐसे वचन जो उनके बारे में राय बनाते हों या उन पर संदेह करते हों, या उनका अपमान करते हों, तो वे अक्षम्य हो जाएँगी, वे बदला लेना चाहेंगे और जैसे को तैसा व्यवहार करना चाहेंगे। क्या यह बुरा नहीं है? इन सबसे ऊपर, वे हमेशा लोगों से लाभ लेने की कोशिश करते हैं, अपने आस-पास आदेश देते हैं और दूसरों से अपना कार्य करवाते हैं, किन्तु वे कभी भी किसी दूसरे की सहायता नहीं करते हैं। क्या यह ओछापन नहीं है? ये सभी बातें घातक अभिव्यक्तियाँ हैं। दयालु व्यक्तियों के हृदय में दुष्टता नहीं होती है। यदि आप उनके एहसानमंद हैं तो वे ध्यान नहीं देंगे, किन्तु वे तुम्हारे एहसानमंद नहीं हैं क्योंकि उनके लिए यह निश्चित रूप से अस्वीकार्य है। साथ ही, यदि तुम उनका अपमान करते हो तो उनके लिए कोई समस्या नहीं है, परन्तु वे कभी भी तुम्हारा अपमान नहीं करना चाहेंगे, तुम्हें चोट पहुँचाने की तो बात ही छोड़ो। क्या यह दयालुता नहीं है? जब कोई उनके प्रति कुछ प्रतिकूल करता है, तो वे भी स्वयं को उस व्यक्ति के स्थान पर रख कर समझ सकते हैं और उनके प्रति विचारशील हो सकते हैं, उन्हें क्षमा कर सकते हैं, और उन्हें समझ सकते हैं। यह भी दयालु हृदय की एक अभिव्यक्ति है। कुछ लोगों ने अतीत में बहुत सी दुष्टता की है, किन्तु अब उन्हें परमेश्वर पर विश्वास है और सत्य की खोज कर सकते हैं, और इसके अलावा वे दूसरों को क्षमा कर सकते हैं और उनके साथ सही और उचित व्यवहार कर सकते हैं। इस प्रकार के व्यक्ति को दयालु व्यक्ति के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। दयालु व्यक्ति के हृदय में सहिष्णुता, दया, क्षमा, और धैर्य होता है, और इससे भी अधिक उनके पास प्रेम और सहानुभूति होती है। यही कारण है कि हर व्यक्ति इस तरह के किसी व्यक्ति के सम्पर्क में आना पसंद करता है और इस तरह के व्यक्ति को दोस्त बनाना चाहता है।

"जीवन में प्रवेश के विषय में संगति एवं प्रवचन (IV)" में "स्वभाव परिवर्तन को प्राप्त करने के लिए एक सत्य जिस में प्रवेश करना आवश्यक है और स्वभाव परिवर्तन की अभिव्यक्तियां" से

एक बार जब बचाये गए व्यक्ति के पास परमेश्वर की सही समझ आ जाती है, तो वह एक सच्चे व्यक्ति के सदृश जीवन जीने के योग्य बन जाता है। एक सच्चे व्यक्ति की इस सदृशता को दो वाक्यांशों में सारांश किया जा सकता है। पहला है सत्य को धारण करना, और दूसरा है मानवता रखना। केवल इसी तरह का व्यक्ति ही परमेश्वर के सामने पूरी तरह से ईमानदार होता है। एक वास्तव में ईमानदार व्यक्ति के भीतर सत्य होता है, इसलिए उसे शैतान के द्वारा फिर से भ्रष्ट नहीं किया जा सकता है या धोखा नहीं दिया जा सकता है। वे इस संसार और इसकी दुष्टता और अंधकार को, और साथ ही भ्रष्ट मनुष्य की प्रकृति और उसके सार की वास्तविक प्रकृति को जानते हैं। इसलिए, वे वास्तव में परमेश्वर की आराधना कर सकते हैं, वास्तव में परमेश्वर का आज्ञापालन कर सकते हैं, और उनका जीवन परमेश्वर पर उनके विश्वास की वास्तविक गवाही बन जाता है। इस प्रकार का व्यक्ति एक बचाया गया व्यक्ति है। चूँकि बचाया गया व्यक्ति सत्य को धारण करता है, इसलिए उसमें परमेश्वर के सामने अंतःकरण और विवेक तथा दूसरों के सामने चरित्र और गरिमा होती है। वे परमेश्वर के वचन पर डटे रहते हैं, और वे एक सृजित प्राणी के रूप में अपने कर्तव्यों को पूरा करते हुए सृष्टा को संतुष्ट कर सकते हैं। यह एक बचाया गया व्यक्ति है। बचाए गए व्यक्ति का एक पहलू जो सत्य को धारण करता है वह है कि वे संसार की वास्तविक प्रकृति का, शैतान की वास्तविक प्रकृति का और भ्रष्ट लोगों की वास्तविक प्रकृति का पता लगा सकते हैं। इसलिए, वे जानते हैं कि संसार के साथ किस प्रकार से व्यवहार करना है, वे जानते हैं कि शैतान के साथ कैसे निपटना है, और वे विशेष रूप से जानते हैं कि भ्रष्ट लोगों से कैसे निपटना है। वैसे तो, उनके जीवन में कई बातें हैं जिसके लिए उनके पास सिद्धांत और सत्य होते हैं। सत्य से सुसज्जित व्यक्ति विभिन्न तरीकों से व्यवहार करता है। सबसे पहले, जब सत्य से सम्बन्धित चीजों की बात आती है, तो वे परमेश्वर से प्रार्थना करते और उससे माँग करते हैं, और उसका आज्ञापालन करते हैं। दूसरा, जब वे परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य पूरा करते हैं, तो वे परमेश्वर के कार्य की रक्षा करते हैं, वे सत्य और सिद्धांतों को निर्भीकता से थामे रहते हैं और लोगों का अपमान करने से भयभीत नहीं होते हैं। वे सृजित प्राणी के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन कर सकते हैं और उनका हृदय हमेशा परमेश्वर की ही ओर बने रहते हुए उसके साथ एक रहता है। यही बचाए गए व्यक्ति का पक्ष है जो सत्य को धारण करता है। उनका मानवीय पक्ष यह है कि वे परमेश्वर के प्रेम को चुकाना जानते हैं और एक सृजित प्राणी के रूप में अपने कर्तव्यों को करना जानते हैं और अपनी क्षमता के भीतर अपने उन कर्तव्यों को पूरा करने के लिए सब कुछ करते हैं जो वे कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, उनका अन्य लोगों के साथ सामान्य सम्बन्ध होता है और अधिकतर लोगों के साथ-साथ रह सकते हैं, उनके साथ मिलजुल सकते हैं, ईमानदारी से बात कर सकते हैं और चीज़ों को बुद्धिमानी के साथ कर सकते हैं। यह उनका मानवीय पक्ष है। जो लोग इन दो तरीकों से व्यवहार करते हैं वे ही सत्य वाले और मानवता वाले लोग हैं। मानवता वाले लोग अभिमानी नहीं दिखाई दे सकते हैं, और उनके पास कोई विशेष ज्ञान या अनुभव नहीं हो सकता है, किन्तु क्योंकि वे सत्य को धारण करते हैं, इसलिए उनमें सामान्य मानवता होती है। जो सत्य को वास्तव में समझते हैं उनमें सामान्य मानवता होती है। बाहरी तौर पर, इस प्रकार का व्यक्ति अलग से या खास नहीं दिखाई दे सकता है। वे बहुत ही साधारण, बहुत ही सामान्य, और मामूली प्रतीत हो सकते हैं, परन्तु सत्य से रहित लोग इनकी सही प्रकृति का पता नहीं लगा सकते हैं। जो लोग सत्य के साथ सुसज्जित होते हैं, केवल वे ही, इस व्यक्ति के जीवन का अवलोकन करने के माध्यम से, अंत में यह बताने में समर्थ होंगे कि यह व्यक्ति भिन्न है। उनके भीतर सत्य होता है, उनके सिद्धांत होते हैं और वे चीज़ों को अत्यधिक बुद्धिमत्ता के साथ करते हैं। इसके अलावा, उनकी सामान्य मानवता साधारण, ईमानदार और निष्कपट होती है, जो उनके साथ मेलजोल रखना अत्यंत आसान बना देती है। जो कोई भी इस प्रकार के व्यक्ति के सम्पर्क में आएगा वह सोचेगा कि यह एक अच्छा व्यक्ति है। इस तरह के अच्छे लोग अब और अधिक नहीं हैं। ये बहुत दुर्लभ हैं। इस तरह के व्यक्ति के कोई बुरे इरादे नहीं होते हैं और वह कोई बुरे कर्म नहीं करता है। जब तुम इस व्यक्ति के साथ समय व्यतीत करते हो, तो भले ही वे बुद्धिमान और तुम्हारे प्रति सैद्धांतिक दिखाई दें, किन्तु वे कभी भी तुम्हें चोट नहीं पहुँचाएँगे, तुम्हें धोखा देने की तो बात ही छोड़ो। यह इस बात को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि ऐसा व्यक्ति जो सत्य को धारण करता है और जिसमें मानवता है वह वास्तव में दयालु हृदय और ईमानदार व्यक्ति है। वह एक बचाया गया व्यक्ति है।

"जीवन में प्रवेश के विषय में संगति एवं प्रवचन (III)" में "उद्धार के लिए चार मानक और एक बचाए गए व्यक्ति की वास्तविक स्थिति" से

पिछला:परमेश्वर पर विश्वास में, तुम्हें परमेश्वर के साथ सामान्य सम्बन्ध स्थापित करना चाहिए।

अगला:परमेश्वर पर विश्वास केवल शान्ति और आशीषों को खोजने के लिए ही नहीं होना चाहिए।

शायद आपको पसंद आये