70. दिखावा, अब और नहीं

मुझे याद है, 2018 में मैं कलीसिया में सुसमाचार का काम करता था, बाद में मुझे उस काम का प्रभारी बना दिया गया। मैं अपने भाई-बहनों के कामों में समस्याओं और गलतियों का पता लगा कर, संगति के द्वारा उन्हें ठीक कर लेता, इस कारण सभी लोग मुझसे संतुष्ट रहते, मुझे भी कुछ हासिल कर पाने का एहसास होता। मैं अपने आप से बहुत खुश रहने लगा, सोचने लगा, मैं बाकी सबसे बेहतर हूँ। मैं दिखावा किये बिना नहीं रह पाया। मैंने सोचा, "मैं सुझाव देकर लोगों की समस्याएँ सुलझाता हूँ, सब लोग मेरे बारे में अच्छी राय रखते हैं। अगर मैं उनकी और ज़्यादा मदद करूं, तो मैं खुद को उनसे और भी ज़्यादा काबिल दिखा पाऊंगा। फिर वे मेरे बारे में और भी ऊंची राय रखेंगे।" एक दिन एक सभा में, भाई लू ने कहा कि सुसमाचार फैलाते समय उन्होंने एक धार्मिक सहकर्मी को देखा। वह 20 साल से भी ज़्यादा से एक प्रचारक है, एक सच्चा विश्वासी है, मगर उसकी अपनी मज़बूत धार्मिक धारणाएं हैं। भाई लू ने उसके साथ संगति की, लेकिन वह सुसमाचार को स्वीकार नहीं करना चाहता था, भाई लू को समझ नहीं आया कि अब क्या करें। मैंने मन-ही-मन सोचा, "यह व्यक्ति एक सच्चा विश्वासी है, संगति सुनना चाहता है। आप उसे बदल नहीं पाये, क्योंकि आपने उसके साथ सत्य के बारे में बहुत स्पष्ट रूप से संगति नहीं की। मुझे पहले ऐसा अनुभव हो चुका है, इसलिए मैं आपको इस बारे में बता सकता हूँ।" मैंने उनसे कहा, "मुझे इसमें कोई मुश्किल नज़र नहीं आती। आपको ख़ास मुद्दों पर ध्यान देने और स्पष्ट रूप से संगति करने पर ध्यान देना होगा। अगर वह सुनने को तैयार होता है और आप उसकी समस्याएँ सुलझा देते हैं, तो वह इसे स्वीकार क्यों नहीं करेगा? सहकर्मी झांग भी बहुत-सी धारणाएं रखता था, मैंने संगति से उसकी सबसे मज़बूत धारणा का खंडन किया, फिर अगली धारणा पर बात शुरू की। अंत में उसने सुसमाचार को स्वीकार कर लिया। परमेश्वर के कार्य की गवाही देते समय आपको स्पष्ट रूप से संगति करनी चाहिए।" फिर मैंने उन्हें अपने प्रचार के दौरान मिले लोगों की तमाम समस्याओं के बारे में बताया, यह भी बताया कि मैंने उनको सुलझाने के लिए किस तरह संगति की, और उन्होंने सुसमाचार को कैसे स्वीकार कर लिया। मैंने इन अनुभवों को बड़े विस्तार से बयाँ किया, पक्का किया कि इसमें सब-कुछ शामिल हो, ताकि वे सब समझ सकें कि मैं कितना काबिल हूँ। बाद में, सबने मेरी तारीफ़ की, एक बहन ने कहा, "आपने बिल्कुल सटीक बात कही है। मैं इसे क्यों नहीं समझ पायी?" मैंने कहा कि यह सब परमेश्वर के मार्गदर्शन का नतीज़ा है, लेकिन अंदर-ही-अंदर मुझे बहुत खुशी हुई। कभी-कभार काम की चर्चा करते वक्त, मैं मुझे क्या कहना है, इस पर विचार करता, ताकि सब ये सोचें कि मैं तमाम बारीकियों पर विचार कर विश्लेषण कर रहा हूँ, मुझमें काबिलियत है, मैं अक्लमंद हूँ, और दूसरों से बेहतर हूँ। चर्चा में जब मेरी बारी आती, तो मैं बोलता ही जाता, मेरे होंठों पर हमेशा "मैं" शब्द होता। "मैं यह सोचता हूँ" और "मैंने उसे सुलझा दिया।" "मैं, मैं, मैं।..." मैं अपने सिद्धांतों और विचारों की सूची पेश करता और विस्तार से उनका विश्लेषण करता। समय के साथ, दूसरे लोग मेरे भरोसे रहने लगे, इसलिए समस्याएँ आने पर वे सिद्धांत खोजने के बारे में नहीं जान पाते। काम की चर्चा करते समय, कभी-कभी वे मुझसे सबसे पहले बोलने को कहते, फिर अपनी बात जोड़ते। कभी-कभी मेरे मन में एक विचार कौंधता : "अगर मैं ऐसा ही करता रहूँ, तो क्या लोग मेरी आराधना करने लगेंगे?" फिर मैं सोचता, "मैं किसी से मेरी बात सुनने की ज़बरदस्ती नहीं करता। मैं बस अपने विचार बता रहा हूँ। वैसे, पहल करना एक सकारात्मक और ज़िम्मेदार रवैया है।" मैंने इस बात पर ज़्यादा नहीं सोचा, और वैसे ही करता गया।

बाद में, सुसमाचार फैलाने में हमें बहुत-सी मुश्किलें पेश आयीं, भाई-बहन बहुत मायूस हो गये। मेरा भी यही हाल था। मैं सबसे अपने मन की बात कहना चाहता, लेकिन लगता मैं प्रभारी हूँ, अगर इतनी आसानी से मैं निराश हो गया, तो क्या मैं कमज़ोर नहीं लगूंगा? अगर लोग जान जाएं कि मेरा आध्यात्मिक कद इतना छोटा है, तो वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे? क्या मेरे बारे में उनकी ऊँची सोच नष्ट नहीं हो जाएगी? मैंने सोचा, "अगर मैं सकारात्मक प्रवेश के बारे में बोलूँ, सकारात्मक तरीके से सबकी अगुआई करूं, तो क्या सभी लोग प्रेरित नहीं होंगे?" इसलिए हर संगति में, मैं इस पर ध्यान देने लगा कि मैंने समस्याओं का सामना, सकारात्मकता के साथ कैसे किया, मैंने मुसीबत में परमेश्वर पर भरोसा कैसे किया, किस तरह मैं चुनौती का सामना करने को उठ खड़ा हुआ। सबको लगा मुझमें आध्यात्मिक कद है, और मैं समस्याओं से निपट सकता हूँ। उन सबने मेरी प्रशंसा की। कभी-कभी दूसरों से काम के बारे में चर्चा करते समय, मैं खुलासा करता कि अपने काम में मुझ पर बहुत दबाव है, मैं इतना व्यस्त रहता हूँ कि मेरे पास खाने या सोने का भी वक्त नहीं है, ताकि वे जान सकें कि मैं कितने कष्ट झेलता हूँ। सभाओं में, मैं परमेश्वर के वचनों पर चिंतन या आत्मचिंतन नहीं करता, बस सोचता कि सब यही सोचें कि मेरी संगतियाँ बहुत गूढ़ हैं, इनमें वज़न है। मुझे एहसास भी नहीं होता और मैं ऊंचे सिद्धांतों का प्रचार करता, दूसरों की हामी देख कर मैं बहुत खुश होता। समय के साथ, अपने काम में कोई समस्या आने पर कुछ लोग सबसे पहले मुझसे पूछने लगे। थोड़े-से सोच-विचार से उसे सुलझा सकने के काबिल होने बावजूद, वे पहले मेरी ही राय लेते। वे मुझे अपनी दशा और अंदरूनी विचारों के बारे में बताते, मुझमें उनका भरोसा देख कर मुझे बहुत खुशी होती। समय के साथ, मैं बहुत व्यस्त दिखाई देने लगा, लेकिन परमेश्वर के वचन पढ़ते समय मुझे पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता का एहसास नहीं होता था। दूसरों के साथ काम की चर्चा करते समय, मेरे सभी सुझाव बेकार होते, हम लोगों के काम की सबसे ज़ाहिर समस्याओं को भी मैं नहीं समझ पाता था। आखिरकार मुझे एहसास हो गया कि मेरी हालत बहुत भयंकर है। मेरा पूरा अहंकार हवा हो गया। मैं खुद को सबसे बढ़िया समझता था, लेकिन एकाएक मैंने महसूस किया कि मैं पूरा बेवकूफ़ हूँ, दिखावे के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है। मेरी आत्मा में घना अंधियारा और दर्द है।

एक दिन मैं दो भाइयों से बात कर रहा था, तभी भाई सू ने कहा, "मैं आपको कुछ समय से जानता हूँ, आप हमेशा खुद को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते हैं और दिखावा करते हैं। आप अपनी संगति में शायद ही कभी अपनी भ्रष्टता या कमियों का ज़िक्र करते हैं, ज़्यादातर अपने अच्छे गुणों का ही बखान करते हैं, इससे मुझे लगा कि आप महान हैं, और मैं आपका आदर करने लगा। मेरे काम में समस्याएँ आने पर, आप सत्य के सिद्धांतों के बारे में चर्चा नहीं करते, सिर्फ यही बताते हैं कि आपने क्या किया है और समस्याओं को कैसे सुलझाया है, इससे मुझे लगता है कि आप कमाल के हैं और हम सबसे बेहतर हैं। ..." मैं भाई सू की यह बात मानने को बिल्कुल भी तैयार नहीं था, ख़ास तौर से उनकी यह बात कि मैं हमेशा खुद को ऊंचा दिखाता हूँ, दिखावा करता हूँ। ये शब्द मेरे मन में गूँजने लगे। वैसे मैंने बहस नहीं की, लेकिन उनकी बात मुझे ज़रा भी नहीं जंची। मैंने सोचा "मैंने कभी भी आपसे आराधना करने को नहीं कहा। क्या मैं वाकई उतना बुरा हूँ जितना आप कहते हैं?" मैं इसे स्वीकार नहीं कर पा रहा था, इसलिए मैंने एक दूसरे भाई से उसकी राय पूछी। उसकी बात सुनकर मुझे हैरानी हुई, "आप कभी भी अपनी भ्रष्टता या कमियों की बात नहीं करते। अब मैं आपको नहीं समझ पाता हूँ।" इससे मैंने और भी बदतर महसूस किया। "ये कैसे कह सकता है कि वह अब मुझे नहीं समझ पाता? क्या मैं ऐसी अबूझ पहेली हूँ?" मैं कुछ कहना चाहता था ताकि थोड़ी प्रतिष्ठा वापस बटोर सकूं, लेकिन उन दोनों को इस तरह से मेरी काँट-छाँट और निपटान करते देख, मैं समझ गया कि कोई तो कारण है। अगर उनकी बात सच है, तो वाकई मेरे साथ कोई समस्या है!

मैंने बिना वक्त गँवाये परमेश्वर के वे वचन ढूँढ़े, जो खुद को ऊंचा दिखा कर अपनी खुद की गवाही देने वाले लोगों को उजागर करते हैं। मैंने ये वचन पढ़े : "स्वयं का उत्कर्ष करना और स्वयं की गवाही देना, स्वयं पर इतराना, दूसरों की अपने बारे में बहुत अच्छी राय बनवाने की कोशिश करना—भ्रष्‍ट मनुष्‍यजाति इन चीज़ों में माहिर है। जब लोग अपनी शैता‍नी प्रकृतियों से शासित होते हैं, तब वे सहज और स्‍वाभाविक ढंग से इसी तरह प्रतिक्रिया करते हैं, और यह भ्रष्‍ट मनुष्यजाति के सभी लोगों में है। लोग सामान्यतः कैसे स्वयं का उत्कर्ष करते और गवाही देते हैं? वे इस लक्ष्‍य को कैसे हासिल करते हैं? एक तरीक़ा इस बात की गवाही देना है कि उन्‍होंने कितना अधिक दुःख भोगा है, कितना अधिक काम किया है, और स्वयं को कितना अधिक खपाया है। अर्थात, वे इन चीज़ों का उपयोग उस मुद्रा की तरह करते हैं जिसके द्वारा वे अपना उत्कर्ष करें, जो उन्‍हें लोगों के दिमाग़ में अधिक ऊँचा, अधिक मज़बूत, अधिक सुरक्षित स्थान दे, ताकि अधिक से अधिक लोग उन्‍हें मान दें, सराहना करें, सम्मान करें, यहाँ तक कि श्रद्धा रखें, पूज्‍य मानें, और अनुसरण करें। यह परम प्रभाव है। इस लक्ष्‍य—पूर्णतया अपना उत्कर्ष करना और स्वयं अपनी गवाही देना—को प्राप्त करने के लिए वे जो चीज़ें करते हैं, क्‍या वे तर्कसंगत हैं? वे नहीं है। वे तार्किकता के दायरे से बाहर हैं। इन लोगों में कोई शर्म नहीं है : वे निर्लज्‍ज ढंग से गवाही देते हैं कि उन्‍होंने परमेश्‍वर के लिए क्‍या-क्‍या किया है और उसके लिए कितना अधिक दुःख झेला है। वे तो अपनी योग्‍यताओं, प्रतिभाओं, अनुभव, और विशेष दक्षताओं तक पर, या अपने आचरण की चतुर तकनीकों और लोगों के साथ खिलवाड़ के लिए प्रयुक्त अपने तौर-तरीक़ों तक पर इतराते हैं। स्वयं अपना उत्कर्ष करने और अपनी गवाही देने का उनका तरीक़ा स्वयं पर इतराने और दूसरों को नीचा दिखाने के लिए है। वे पाखण्‍ड और छद्मों का सहारा भी लेते हैं, जिनके द्वारा वे लोगों से अपनी कमज़ोरियाँ, कमियाँ, और नाकामियाँ छिपाते हैं ताकि लोग हमेशा सिर्फ़ उनकी चमक-दमक ही देखें। जब वे नकारात्‍मक महसूस करते हैं तब दूसरे लोगों को यह बताने का साहस तक नहीं करते; उनमें लोगों के साथ खुलने और संगति करने का साहस नहीं होता, और जब वे कुछ ग़लत करते हैं, तो वे उसे छिपाने और उस पर लीपा-पोती करने में अपनी जी-जान लगा देते हैं। अपना कर्तव्‍य निभाने के दौरान उन्‍होंने परमेश्‍वर के घर को जो नुक़सान पहुँचाया होता है उसका तो वे ज़ि‍क्र तक नहीं करते। जब उन्‍होंने कोई छोटा-मोटा योगदान किया होता है या कोई छोटी-सी कामयाबी हासिल की होती है, तो वे उसका दिखावा करने को तत्पर रहते हैं। वे सारी दुनिया को यह जानने देने का इंतज़ार नहीं कर सकते कि वे कितने समर्थ हैं, उनमें कितनी अधिक क्षमता है, वे कितने असाधारण हैं, और सामान्‍य लोगों से कितने बेहतर हैं। क्‍या यह स्वयं अपना उत्कर्ष करने और अपनी गवाही देने का ही तरीक़ा नहीं है? क्‍या स्वयं अपना उत्कर्ष करना और अपनी गवाही देना सामान्‍य मानवता की तर्कसंगत सीमाओं में आता है? यह नहीं आता है। इसलिए जब लोग यह करते हैं, तो सामान्यतः कौन-सा स्‍वभाव प्रगट होता है? अहंकार मुख्‍य अभिव्यंजनाओं में से एक है, जिसके बाद छल-कपट आता है, जिसमें यथासंभव वह सब करना शामिल है जिससे दूसरे उनके प्रति अत्यधिक सम्‍मान का भाव रखें। उनकी कहानियाँ पूरी तरह अकाट्य होती हैं; उनके शब्‍दों में अभिप्रेरणाएँ और कुचक्र स्पष्ट रूप से होते हैं, और उन्‍होंने इस तथ्‍य को छिपाने का तरीक़ा ढूँढ़ निकाला होता है कि वे दिखावा कर रहे हैं, लेकिन वे जो कुछ कहते हैं उसका परिणाम यह होता है कि लोगों को अब भी यह महसूस करवाया जाता है कि वे दूसरों से बेहतर हैं, कि उनके बराबर कोई नहीं है, कि हर कोई उनसे हीनतर है। और क्‍या यह परिणाम चालाकीपूर्ण साधनों से हासिल नहीं किया गया है? ऐसे साधनों के मर्म में कौन-सा स्‍वभाव है? और क्‍या उसमें दुष्‍टता के कोई तत्त्व हैं? यह एक प्रकार का दुष्‍ट स्‍वभाव ही है। देखा जा सकता है कि उनके द्वारा प्रयुक्‍त ये साधन कपटपूर्ण स्‍वभाव से निर्देशित होते हैं—तो मैं क्‍यों कहता हूँ कि यह दुष्‍टतापूर्ण है? दुष्‍टता के साथ इसका क्‍या संबंध है? तुम लोग क्‍या सोचते हो : स्वयं का उत्कर्ष करने तथा गवाही देने के अपने लक्ष्‍यों के बारे में क्या वे निष्कपट हो सकते हैं? (नहीं।) उनके दिलों की गहराइयों में हमेशा एक आकांक्षा होती है, और जो कुछ भी वे कहते और करते हैं वह उस आकांक्षा को बल प्रदान करता है, और इसलिए वे जो कुछ कहते और करते हैं उसके लक्ष्‍य और प्रयोजन उनके दिलों की गहराइयों में बहुत गुप्त रखे जाते हैं। उदाहरण के लिए, इन लक्ष्‍यों को हासिल करने के लिए वे गुमराह करने वाली या किन्‍हीं संदिग्ध चालों का इस्‍तेमाल करेंगे। क्‍या इस तरह का दुराव-छिपाव अपनी प्रकृति में ही धूर्ततापूर्ण नहीं है? और क्‍या इस तरह की धूर्तता को दुष्‍टता नहीं कहा जा सकता? इसे निश्‍चय ही दुष्टता कहा जा सकता है, और इसकी जड़ें छल-कपट से कहीं ज्‍़यादा गहराई तक फैली होती हैं" (मसीह की बातचीत के अभिलेख)। मैंने अपने काम में अपने व्यवहार पर गौर किया : जब भाई-बहनों के सामने समस्याएँ आतीं, तो मैं यों दिखाता जैसे मैं उनके साथ संगति कर उनकी मदद कर रहा हूँ, यह बताता कि मैं समस्याएँ कैसे सुलझाता हूँ, ताकि मैं काम में अपनी सामर्थ्य का दिखावा कर, सबको यह सोचने दूं कि मैं उनसे ज़्यादा काबिल हूँ। काम पर चर्चा करते समय, मेरे मुंह से निकलने वाला पहला शब्द होता "मैं", ताकि मैं खुद को उनके सामने रख सकूं, लोगों को सोचने दूं कि मैं सब-कुछ जानता हूँ ताकि वे मेरी आराधना करें। मैंने दूसरों से अपनी नकारात्मकता और भ्रष्टता को छुपाया। मैंने अपने भ्रष्ट स्वभाव का विश्लेषण करना तो दूर, अपनी मुश्किलों पर भी कभी चर्चा नहीं की। इसके बजाय, मैंने अपनी कमियों को छुपाने के लिए सकारात्मक प्रवेश के बारे में चर्चा की, ताकि लोग समझें कि मुझमें आध्यात्मिक कद है और वे मुझे आदर से देखें। मैं हमेशा यही बताता कि अपने काम में मैंने कितने कष्ट झेले हैं, यह कितना मुश्किल था, ताकि वे समझें कि मैं अपने कर्तव्य के प्रति बहुत समर्पित हूँ। सभाओं में, यह साफ़ था कि मुझे परेश्वर के वचनों की या खुद की बिल्कुल समझ नहीं है, लेकिन मैं बस बोलता जाता, कहानी बनाता जाता कि मैं खुद को जानता हूँ, ताकि दूसरे मेरे बारे में और भी ज़्यादा ऊंचा सोचें। उनके इस आदर-भाव और प्रशंसा का आनंद लेते रहने के लिए, मैं सही लगने वाली बातें कहता और करता चला गया, जबकि वास्तव में मैं शेखी बघारते हुए दिखावा कर रहा था, जिससे दूसरों के दिल परमेश्वर से दूर होते चले गये। क्या मेरा व्यवहार परमेश्वर के वचनों में प्रकट किये गए दुष्ट स्वभाव के कारण नहीं था? मैंने जो भी किया, या मैं जिस भी तरह से खुद को खपाता हुआ लगा, मेरा लक्ष्य कभी भी अपने कर्तव्य को ठीक ढंग से निभाना नहीं था। मैंने अपनी स्थिति को मज़बूत करने के लिए सब-कुछ किया, ताकि लोग मेरी आराधना करें। मैं मसीह-विरोधियों के रास्ते पर चल रहा था। आखिरकार मुझे अपने खुद के खतरे का एहसास हुआ, इसलिए मैंने जल्दी से परमेश्वर से प्रार्थना की, और प्रायश्चित करने की इच्छा जतायी।

परमेश्वर के ये वचन एकाएक मन में कौंध गये : "अगर किसी को सामान्‍य मनुष्‍यता जीना है, तो उन्‍हें स्वयं को किस तरह खोलना और उघाड़ना चाहिए? यह स्‍वयं को खोलकर और दूसरों को अपनी सच्ची अंर्ततम भावनाओं को दिखाकर, सरलता और शुद्धता से सत्‍य का अभ्‍यास करने में सक्षम होकर किया जाता है। अगर कोई अपनी भ्रष्‍टता उजागर करता है, तो उसे समस्‍या का सार समझ पाना और अपने हृदय की गहराई से स्वयं से गहरी घृणा कर पाना चाहिए। जब वे खुद को उघाड़ देंगे, तब फिर वे अपने आचरण को उचित सिद्ध करने का प्रयास नहीं करेंगे, न ही वे उनका बचाव करने की कोशिश करेंगे। ... सबसे पहले, व्‍यक्ति को अपनी समस्‍याओं को मूलभूत स्‍तर पर समझना चाहिए, स्वयं का विश्लेषण करना चाहिए, और खुद को उघाड़ना चाहिए। दूसरे, व्‍यक्ति को हृदय से ईमानदार और अपने रवैये में संजीदा होना चाहिए, और उन्‍हें अपने स्‍वभाव की उन समस्‍याओं के बारे में बात करना चाहिए जिन्‍हें वे समझ सकते हैं। और तीसरे, अगर व्‍यक्ति को यह महसूस होता है कि उनका स्‍वभाव विशेष रूप से बुरा है, तो उन्‍हें सबसे कहना ही चाहिए कि 'अगर मैं ऐसा भ्रष्‍ट स्‍वभाव फिर प्रकट करूँ, तो तुम सब तनकर खड़े हो जाना—मुझसे निपटना, और उसकी ओर मेरा ध्‍यान दिलाना। मेरी आलोचना करने में कोई कसर मत छोड़ना। हो सकता है कि मैं उस वक्‍़त यह सह न सकूँ, लेकिन उस पर ध्‍यान मत देना। सब मिलकर मुझ पर नज़र रखना। अगर यह भ्रष्‍ट स्‍वभाव गंभीर रूप ले लेता है, तो मुझे उजागर करने और मुझसे निपटने के लिए सब तन कर खड़े हो जाना। मैं सच्‍चे मन से उम्‍मीद करता हूँ कि हर कोई मुझ पर नज़र रखेगा, मेरी मदद करेगा, और मुझे पथभ्रष्‍ट होने से रोकेगा।' यही वह रवैया है जिसके साथ व्‍यक्ति सत्‍य का अभ्‍यास करता है" (मसीह की बातचीत के अभिलेख)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे सही दिशा दिखायी। अपनी समस्याओं को मैंने चाहे जितना भी समझा हो, मैं जानता था कि मैं ऐसा नहीं चलने दे सकता। मुझे ईमानदार होकर खुद को बिना किसी मुखौटे के दिखाना था, ताकि लोगों को अपने कर्मों के पीछे की मंशाएं दिखा सकूं, वे समझ सकें कि मैं खुद को ऊंचा दिखा रहा हूँ, दिखावा कर रहा हूँ, और मसीह-विरोधियों की राह पर चल रहा हूँ। यह सबसे महत्वपूर्ण था। दूसरे लोग मेरे बारे में चाहे जो सोचें, मुझे उनके सामने अपनी सच्ची दशा का खुलासा करना होगा।

अगली सभा में, मैंने भाई-बहनों के सामने बिल्कुल खुल कर अपने दिल की बात कह दी, फिर उनकी मदद और सलाह माँगी। पूरी तरह खुल जाने के बाद, मुझे बहुत आराम और सुकून मिला। दूसरे लोगों ने अगले कुछ दिन मुझे मेरी समस्याओं की तरफ इशारा करने वाले संदेश भेजे, "आप अपने काम में हमेशा दिखावा करते हैं। मैं अब अपने कर्तव्य में सिद्धांतों की खोज नहीं करना चाहता, सिर्फ आपके भरोसे रहने लगा हूँ। मुझे लगता है आप सब-कुछ जानते हैं और आपसे पूछ लेना आसान है।" कुछ लोगों ने कहा, "मैंने हाल में परमेश्वर के बारे में कुछ नहीं सीखा, बस आपकी आराधना करना ज़्यादा सीखा है, यह सोच कर कि आप काम में काबिल हैं, अपने कर्तव्य में ज़िम्मेदार हैं। मैं सच में आपका आदर करता रहा।" यह सब सुनकर मैं परेशान हो गया। मुझे यकीन नहीं हुआ कि इतने महीनों से किये मेरे कर्तव्य का यह नतीज़ा निकला है। मैं बहुत मायूस और दुखी हो गया, यह सोच कर कि परमेश्वर ज़रूर मुझसे घृणा करता होगा। मैं निराशा की गहराइयों में डूब गया। मगर परमेश्वर की निरंतर प्रार्थना करके, दूसरों की मदद और सहारे से, मैंने आखिरकार समझ लिया कि परमेश्वर यह सब मुझे हटाने के लिए नहीं बल्कि मुझे शुद्ध करके बदलने के लिए कर रहा है। अगर ऐसा नहीं हुआ होता, तो मैं नहीं समझ पाता कि मैं गलत रास्ते पर हूँ। यह मेरे लिए परमेश्वर का महान उद्धार है! परमेश्वर की इच्छा को समझते ही, मैंने आत्मचिंतन करने और सही मायनों में प्रायश्चित करने का संकल्प लिया।

मैंने परमेश्वर के कुछ वचन पढ़े : "कुछ लोग विशेष रूप से पौलुस को आदर्श मानते हैं। उन्हें बाहर जा कर भाषण देना और कार्य करना पसंद होता है, उन्हें सभाओं में भाग लेना और प्रचार करना पसंद होता है; उन्हें अच्छा लगता है जब लोग उन्हें सुनते हैं, उनकी आराधना करते हैं और उन्हें चारों ओर घूमते हैं। उन्हें पसंद होता है कि दूसरों के मन में उनकी एक हैसियत हो, और जब दूसरे उनके द्वारा प्रदर्शित छवि को महत्व देते हैं, तो वे उसकी सराहना करते हैं। आओ हम इन व्यवहारों से उनकी प्रकृति का विश्लेषण करें: उनकी प्रकृति कैसी है? यदि वे वास्तव में इस तरह से व्यवहार करते हैं, तो यह इस बात को दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि वे अहंकारी और दंभी हैं। वे परमेश्वर की आराधना तो बिल्कुल नहीं करते हैं; वे ऊँची हैसियत की तलाश में रहते हैं और दूसरों पर अधिकार रखना चाहते हैं, उन पर अपना कब्ज़ा रखना चाहते हैं, उनके दिमाग में एक हैसियत प्राप्त करना चाहते हैं। यह शैतान की विशेष छवि है। उनकी प्रकृति के पहलू जो अलग से दिखाई देते हैं, वे हैं उनका अहंकार और दंभ, परेमश्वर की आराधना करने की अनिच्छा, और दूसरों के द्वारा आराधना किए जाने की इच्छा। ऐसे व्यवहारों से तुम उनकी प्रकृति को स्पष्ट रूप से देख सकते हो" (मसीह की बातचीत के अभिलेख)। परमेश्वर के वचनों के खुलासों ने मुझे समझाया कि अपनी अहंकारी प्रकृति के कारण ही मैं दूसरों के दिलों में ऊंचा दर्जा खोज रहा था, इस तरह मैं परमेश्वर का प्रतिरोध कर रहा था। इस अहंकारी प्रकृति के काबू में आकर, अपने कर्तव्य के परिणाम देख कर मैं आत्ममुग्ध रहने लगा, मैंने खुद को ऊंचे दर्जे का मान कर अपनी मर्ज़ी से दिखावा किया। मैं सिर्फ अलग दिखने, अपने गुणों और काबिलियत का प्रदर्शन करने के लिए बोलता और करता गया। मैंने अपने कर्तव्य के दौरान सहे कष्ट, ज़बरदस्त थकान, और समस्याओं को सुलझाने के बारे में, बेशर्मी से शेखी बघारी, ताकि इन सबसे लोग सोचें कि मैं उनसे बेहतर हूँ, असाधारण हूँ। मेरे लिए ज़रूरी था कि लोग मेरा आदर करें और मेरे बारे में ऊँचा सोचें। क्या यह एक मसीह-विरोधी का स्वभाव नहीं है? पौलुस भी ऐसा ही था। वह अपने प्रचार और कार्य के जरिये निरंतर अपने ज्ञान और गुणों का प्रदर्शन करता था, दिखावा करता था ताकि लोग उसकी प्रशंसा करें। वह हमेशा कलीसियाओं को पत्र लिखता रहता, जताता रहता कि उसने प्रभु के लिए कितना काम किया है और कितने कष्ट झेले हैं, ताकि वह लोगों का दिल जीत सके। उसने काम किया, कड़ी मेहनत की, अपना कर्तव्य ठीक ढंग से निभाने के लिए या देहधारी मसीह की गवाही देने के लिए नहीं, बल्कि अपनी खुद की महत्वाकांक्षाओं और अभिलाषाओं को पूरा करने के लिए। उसने चाहे जितना भी काम किया हो, कष्ट झेले हों, चाहे जितने भी लोगों ने उसकी आराधना की हो, सत्य का अनुसरण न करने और खुद को अधिक महान समझने के कारण, अंत में उसने खुल कर गवाही दे दी कि वह खुद ही मसीह है। इससे परमेश्वर के स्वभाव का गंभीर अपमान हुआ और परमेश्वर ने उसे दंडित किया। मेरी प्रकृति भी बस पौलुस जैसी ही थी। मैं बहुत अहंकारी, कपटी और रुतबे का लोभी था, हमेशा खुद को ऊंचा मान कर दिखावा करता, ताकि सभी मेरी आराधना करें, उनके दिलों में परमेश्वर के लिए कोई जगह न हो, समस्याएँ आने पर वे परमेश्वर पर भरोसा न करें और सत्य को न खोजें। मेरा इस तरह कर्तव्य निभाना दरअसल परमेश्वर का प्रतिरोध करना और भाई-बहनों को नुकसान पहुंचाना है। मैंने कभी नहीं सोचा कि अपनी अहंकारी प्रकृति के साथ जीने से मुझमें ऐसी दुष्टता और परमेश्वर का प्रतिरोध पैदा होगा। अगर मैंने प्रायश्चित नहीं किया, तो देर-सवेर मैं परमेश्वर का क्रोध जगा दूंगा और दंड का भागी बनूंगा। परमेश्वर के अनुशासन और भाई-बहनों की मदद और सहारे के बिना, मैं आत्मचिंतन नहीं कर पाता। परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव और महान उद्धार से ही, मैं इस तरह उजागर हो पाया।

इस बारे में सोचूँ, तो मैंने अपने कर्तव्य में जो भी हासिल किया, जिन भी समयाओं से जूझा, वे सब परमेश्वर की प्रबुद्धता और मार्गदर्शन का नतीजा थे। पवित्र आत्मा के कार्य के बिना, मैं तो एक बेवकूफ ही था, जिसे किसी भी चीज़ की समझ नहीं थी। मुझे सत्य की वास्तविकता का ज्ञान था ही नहीं, फिर भी मैं बेहद अहंकारी और ढीठ बनकर, बेशर्मी से परमेश्वर की जगह लेने की होड़ में लगा हुआ था। मैं बेहद बेअकल था! मैंने अपने कर्तव्य में सत्य के बारे में संगति नहीं की, परमेश्वर की गवाही नहीं दी, बल्कि सिर्फ दिखावा करके लोगों को गुमराह किया—कितना दुष्ट काम किया! फिर मैं वाकई खुद से घृणा करने लगा। मैं इसी तरह नहीं चलने देना चाहता था, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की : "हे परमेश्वर, मैं बहुत गलत रहा हूँ! अब समझ गया हूँ कि मैं कितना अहंकारी और बेअकल हूँ। मुझे प्रायश्चित का मौक़ा देने के लिए धन्यवाद। अब से मैं ईमानदारी से सत्य का अभ्यास करूंगा, सही मार्ग पर चलूँगा। मेरा मार्गदर्शन करो।"

फिर मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : "स्वयं अपना उत्कर्ष न करने और अपनी ही गवाही न देने के लिए किसी को क्‍या करना चाहिए? परमेश्‍वर द्वारा वांछित अभिव्‍यक्तियाँ, आचरण और स्‍वभाव कौन-से हैं जो स्वयं अपना उत्कर्ष करने और अपनी ही गवाही के विपरीत हैं? अर्थात, वे कौन-से स्‍वभाव और आचरण हैं जो सत्‍य के अनुरूप हैं और स्वयं अपना उत्कर्ष करने और अपनी ही गवाही देने के अत्यंत विपरीत हैं? तुम्‍हें अपना विश्लेषण कर स्वयं को उघाड़ना चाहिए, और उन शब्‍दों या बात करने के तरीक़ों को बदलना ही चाहिए जो स्वयं का उत्कर्ष करने तथा स्वयं की गवाही देने से जुड़े हैं। क्‍या ये विवरण नहीं हैं? विषय-वस्‍तु एक ही हो सकती है, लेकिन बात करने का एक ढंग अपनाकर तुम स्वयं का उत्कर्ष करने और स्वयं की गवाही देने तथा दूसरों में अपने प्रति श्रद्धा जगाने का लक्ष्‍य प्राप्त करोगे, जबकि बात करने का दूसरा ढंग अपनाने पर, तुम जो कहते हो उसकी प्रकृति बदल जाती है। उदाहरण के लिए, जब तुम अपने बारे में अपना दिल खोल कर रखते हो, तो तुम्‍हारे द्वारा इस्‍तेमाल की जाने वाली वह शब्‍दावली, भाषा, और बातें किस तरह की होती हैं जो तुम्‍हारा उत्कर्ष करती हैं और तुम्‍हारी ही गवाही देती हैं, और किस तरह की शब्‍दावली तुम्‍हें सच्‍चे अर्थों में उघाड़ने वाली और सत्‍य का अभ्‍यास करने वाली होती है? (अत्यधिक सामान्य होना, वादों की बात करना, और खोखले शब्‍द बोलना अपना स्वयं का उत्कर्ष करना और अपनी गवाही देना है, जबकि विशिष्‍ट अभिव्‍यक्तियों और अपने भ्रष्‍ट स्‍वभाव की तफ़सीलों की बात करना खुद को उजागर करना है।) खुद को उजागर करने में प्रयोजन निहित होता है : अगर किसी का प्रयोजन स्वयं अपना उत्कर्ष करने की बजाय अपनी भ्रष्‍टता हर किसी को दिखाना है, तो उनके शब्‍द गंभीर, सच्‍चे और तथ्‍यों पर आधारित होंगे; अगर उनका प्रयोजन लोगों में अपने प्रति श्रद्धा जगाना है, अगर यह दूसरों को धोखा देना है, और उनसे अपनी सच्चाई छिपाना है, अपने स्‍वभाव तथा अपनी कमज़ोरियों और नाकामियों को दूसरों के सामने प्रकट होने से रोकना है, तो वे जो कुछ भी कहेंगे वह अलग होगा। क्‍या यहाँ इसमें एक ठोस अंतर नहीं है?" "जब तुम परमेश्वर के लिए गवाही देते हो, तो तुमको मुख्य रूप से इस बारे में अधिक बात करनी चाहिए कि परमेश्वर कैसे न्याय करता है और लोगों को कैसे दंड देता है, लोगों का शुद्धिकरण करने और उनके स्वभाव में परिवर्तन लाने के लिए किन परीक्षणों का उपयोग करता है। तुमको इस बारे में भी बात करनी चाहिए कि तुमने कितना सहन किया है, तुम लोगों के भीतर कितने भ्रष्टाचार को प्रकट किया गया है, और आखिरकार परमेश्वर ने कैसे तुमको जीता था; इस बारे में भी बात करो कि परमेश्वर के कार्य का कितना वास्तविक ज्ञान तुम्हारे पास है और तुमको परमेश्वर के लिए कैसे गवाही देनी चाहिए और परमेश्वर के प्रेम का मूल्य कैसे चुकाना चाहिए। तुम लोगों को इन बातों को सरल तरीके से प्रस्तुत करते हुए, इस प्रकार की भाषा का अधिक व्यावहारिक रूप से प्रयोग करना चाहिए। खोखले सिद्धांतों की बातें मत करो। वास्तविक बातें अधिक किया करो; दिल से बातें किया करो। तुम्हें इसी प्रकार अनुभव करना चाहिए। अपने आपको बहुत ऊंचा दिखाने की कोशिश न करो, और खोखले सिद्धांतों के बारे में बात न करो; ऐसा करने से तुम्हें बहुत घमंडी और तर्क हीन माना जाएगा। तुम्हें अपने असल अनुभव की वास्तविक, सच्ची और दिल से निकली बातों पर ज़्यादा बात करनी चाहिए; यह दूसरों के लिए बहुत लाभकारी होगा और उनके समझने के लिए सबसे उचित होगा" (मसीह की बातचीत के अभिलेख)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे समझाया कि मुझे आत्मचिंतन करने और खुद को जानने पर ध्यान देना होगा, खुद को ऊंचा मान कर दिखावा करने की अपनी समस्या को अनुभवों से मिटाना होगा। संगति करते समय मेरी मंशाएं सही होनी चाहिए, मुझे अपनी भ्रष्टताओं के बारे में ज़्यादा बोलना चाहिए, अपनी मंशाओं और अशुद्धियों का विश्लेषण करना चाहिए, बताना चाहिए कि परमेश्वर के वचनों के न्याय को मैंने कैसे अनुभव किया, खुद के बारे में सचमुच क्या समझ पाया, परमेश्वर के स्वभाव और उसके प्रेम के बारे में क्या समझ पाया, मुझे अपने वास्तविक अनुभवों का इस्तेमाल करके परमेश्वर का उत्कर्ष करना चाहिए और उसकी गवाही देनी चाहिए। यही सच में अपना कर्तव्य निभाना होता है। अगली सभा में, मैंने जानबूझ कर विश्लेषण किया कि मैंने कैसी चालें चलीं, रुतबे के लिए कैसे दिखावा किया, परमेश्वर ने मुझसे निपटने और मुझे मेरी बदसूरती दिखाने का माहौल कैसे बनाया। तब एक भाई ने मुझसे कहा, "आपके अनुभव ने मुझे दिखाया है कि भ्रष्ट स्वभाव के होने के बावजूद, हमें सिर्फ परमेश्वर के वचनों के न्याय और निपटान को स्वीकार करने, सत्य का अभ्यास करने, अपने देह-सुख का त्याग करने की ज़रूरत है, ऐसा करने से ही हम बदल जाएंगे। मैं यह भी समझ गया हूँ कि परमेश्वर के सभी कार्य इंसान को बचाने के लिए होते हैं।" यह सुनकर मैं परमेश्वर के प्रति आभार से सराबोर हो गया। परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना से ही मैं अपने बारे में ऐसी समझ हासिल कर पाया।

इसके बाद मैं अपने कर्तव्य में पूरा जागरूक होकर इसमें प्रवेश करने लगा। दूसरों के कामों में गलतियाँ देखने पर, मैं परमेश्वर से प्रार्थना करता, सही मंशाओं के साथ अपने विचार सच्चाई के साथ व्यक्त करता। पहले की तरह अब शेखी नहीं बघारता। भाई-बहनों से साझा करने के लिए मैं सत्य के कुछ सिद्धांत भी ढूँढ़ता। सभाओं में, अपने कर्मों की मंशाओं, दाग-धब्बों और अपने स्वभाव में ज़ाहिर भ्रष्टताओं का विश्लेषण करता, ताकि दूसरे लोग मेरी असलियत जान सकें। इस तरह अभ्यास करके, मेरे दिल को बड़ा सुकून मिलने लगा, परमेश्वर के साथ मेरा रिश्ता सामान्य होने लगा। कुछ समय बाद, मुझे लगा कि दूसरे लोग मेरे साथ सही ढंग से पेश आ रहे हैं, वे अब पहले की तरह मुझे आदर से नहीं देखते। जब कभी मैं सत्य के सिद्धांतों के विपरीत कर्म करता या कुछ कहता, तो वे मुझे संकेत देते ताकि मैं सुधार कर सकूं। दूसरे लोगों के साथ इस तरह से बातचीत करने से मुझे वाकई मुक्त होने का एहसास हुआ। मैं परमेश्वर का सच में धन्यवाद करता हूँ कि उन्होंने मुझे शुद्ध कर बदलने के लिए ऐसा माहौल बनाया!

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