48. सही रास्ते पर लौटना

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "परमेश्वर की सेवा करना कोई सरल कार्य नहीं है। जिनका भ्रष्ट स्वभाव अपरिवर्तित रहता है वे परमेश्वर की सेवा कभी नहीं कर सकते हैं। यदि परमेश्वर के वचनों के द्वारा तुम्हारे स्वभाव का न्याय और उसे ताड़ित नहीं किया गया है, तो तुम्हारा स्वभाव अभी भी शैतान का प्रतिनिधित्व करता है। यह इस बात को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि परमेश्वर की तुम्हारी सेवा, तुम्हारी स्वयं की भलाई के अभिप्राय से है। यह सेवा तुम्हारे शैतानी स्वभाव पर आधारित है। तुम परमेश्वर की सेवा अपने प्राकृतिक स्वभाव से और अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के अनुसार करते हो; इसके अलावा, तुम सोचते रहते हो कि जो कुछ भी तुम करना चाहते हो, उसे परमेश्वर पसंद करता है, और जो कुछ भी तुम नहीं करना चाहते हो उससे परमेश्वर घृणा करता है, और अपने कार्य में तुम पूर्णतः अपनी प्राथमिकताओं द्वारा मार्गदर्शित होते हो। क्या इसे परमेश्वर की सेवा करना कह सकते हैं? अंततः तुम्हारे जीवन स्वभाव में रत्ती भर भी सुधार नहीं आएगा; तुम और भी अधिक ज़िद्दी बन जाओगे क्योंकि तुम परमेश्वर की सेवा कर रहे हो, और इससे तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव गहराई तक समा जाएगा। इस तरह, तुम मन में परमेश्वर की सेवा के बारे में ऐसे सिद्धान्त विकसित कर लोगे जो मुख्यतः तुम्हारे स्वयं के चरित्र पर आधारित होते हैं, और तुम्हारे सेवा करने से तुम्हारे स्वयं के स्वभाव के अनुसार अनुभव प्राप्त होता है। यह मानवीय अनुभव का सबक है। यह दुनिया में जीने का मनुष्य के जीवन का दर्शन है। इस तरह के लोग फरीसियों और धार्मिक अधिकारियों से संबंधित होते हैं। यदि वे कभी भी जागते और पश्चताप नहीं करते हैं, तो अतंतः वे झूठे मसीह बन जाएँगे जो अंत के दिनों में दिखाई देंगे, और मनुष्यों को धोखा देने वाले होंगे। झूठे मसीह और धोखेबाज़, जिनके बारे में कहा गया था, इसी प्रकार के लोगों में से ही उठ खड़े होंगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'धार्मिक सेवाओं को अवश्य शुद्ध करना चाहिए')। जब मैं यह अंश पढ़ता हूँ, "परमेश्वर की सेवा करना कोई सरल कार्य नहीं है। जिनका भ्रष्ट स्वभाव अपरिवर्तित रहता है वे परमेश्वर की सेवा कभी नहीं कर सकते हैं। यदि परमेश्वर के वचनों के द्वारा तुम्हारे स्वभाव का न्याय और उसे ताड़ित नहीं किया गया है, तो तुम्हारा स्वभाव अभी भी शैतान का प्रतिनिधित्व करता है," मुझ पर गहरा असर होता है। मैंने अतीत में नाकामयाबी का सामना किया है। मैंने अभिमानी स्वभाव के आधार पर अपना कर्तव्य पालन किया, और मैं बहुत शेखीबाज़ था। मैं दिखावा करता था, प्रवचनों में छिछले शब्दों और सिद्धांतों का इस्तेमाल करता था, ताकि लोग मुझे बहुत काबिल समझें और मेरा आदर करें, और अनजाने में मैं परमेश्वर के विरोध के रास्ते पर चल निकला। बाद में, परमेश्वर के वचनों के न्याय और प्रकाशन की मदद से मैं परमेश्वर के खिलाफ़ अपने विरोध के स्रोत और अपनी शैतानी प्रकृति को पहचान पाया और परमेश्वर के सामने पश्चाताप करना शुरू किया।

सन् 2013 की बात है जब मुझे कलीसिया का अगुआ चुना गया। उस समय मैं काफ़ी उत्साही था। जब भी मैं अपने भाई-बहनों को किसी परेशानी में देखता, तो मैं परमेश्वर के वचनों पर उनके साथ सहभागिता करके उनकी समस्याओं को हल करने में मदद करता था। जब सबकी मुश्किलें हल हो जाती थीं, तो वे सामान्य ढंग से अपने कर्तव्यों का पालन कर पाते थे। कुछ महीने बाद, मेरे अगुआ ने मुझसे कहा, "एक कलीसिया है जहाँ नए शामिल हुए भाई-बहनों की संख्या काफ़ी है, और तुम्हारे सभी सहकर्मियों ने सुझाव दिया है कि तुम वहां जाकर उनके अगुआ बनकर काम करो।" आत्मविश्वास से भरपूर, मैंने यह सुझाव स्वीकार कर लिया। मैंने सोचा कि मुझे उन भाई-बहनों को सिंचित करने का अच्छा काम करना होगा, ताकि वे जल्द से जल्द सत्य को समझ सकें और सत्य के मार्ग पर अपनी शुरुआत कर सकें। कलीसिया पहुँचने के बाद, मैंने वहाँ के पूरे हालात की समझ हासिल की, और भाई-बहनों की समस्याओं और मुश्किलों को भी जाना, ताकि मैं परमेश्वर के वचनों के प्रासंगिक अंशों की तलाश करके उनके साथ सहभागिता कर सकूँ और उनकी समस्याओं को हल कर सकूँ। मुझे बस यह लगा कि क्योंकि मैं यहाँ नया हूँ, काफ़ी भाई-बहन मुझे जानते नहीं, इसलिए मुझे ज़्यादा मेहनत करनी होगी और उनके साथ ज़्यादा सहभागिता करनी होगी। अगर मैं कलीसिया का काम कुछ ही समय में अच्छे से कर पाऊँगा, तो ये भाई-बहन ज़रूर मान लेंगे कि मुझे सत्य की वास्तविकता की समझ है, और मैं अपने काम में काबिल हूँ—और जब ऐसा होगा, तो मेरे अगुआ भी मुझे काबिल समझेंगे। उसी दौरान कलीसिया ने एक नोटिस जारी किया, यह बताने के लिए कि इस पड़ाव पर कौन से सत्यों में प्रवेश करना है, और हमें परमेश्वर के वचनों के प्रासंगिक अंशों की तलाश करके उन पर सहभागिता करनी है। मैं बहुत ख़ुश था क्योंकि अपने आप को साबित करने का यह शानदार मौका था। तो मैंने सत्य के इन सभी पहलुओं से संबंधित परमेश्वर के कुछ कथनों को ढूंढ लिया, और फिर अच्छे से उन्हें व्यवस्थित किया, और बस यही सोच रहा था, "कल सहकर्मियों की एक सभा हो रही है। मेरे सहकर्मी देखेंगे कि मैंने पूरी रात जागकर परमेश्वर के इन वचनों को ढूंढा है, और वे ज़रूर ये समझेंगे कि मैं अपने कर्तव्य पालन में ईमानदार और ज़िम्मेदार हूँ।" इसलिए, मुझे तैयारी खत्म करते-करते भोर हो गई। और वही हुआ, सभा के दौरान जब मेरे सहकर्मियों ने मेरे ढूंढे परमेश्वर के वचनों को पढ़ा, तो वे मेरी तरफ़ प्रशंसा से देखने लगे। कुछ लोगों ने कहा, "भाई चेन को देखो! वे कितने ईमानदार हैं। पूरी रात जागकर उन्होंने परमेश्वर के वचनों के इन प्रासंगिक अंशों को ढूंढ निकाला।" कुछ ने कहा, "बिल्कुल सच! ऐसा लगता है कि भाई चेन ने परमेश्वर के वचनों को बहुत ही ग़ौर से पढ़ा है।" सभा की आयोजन करने वाले भाई ने मेरी तरफ़ चिंता से देखा, "भाई चेन, परमेश्वर के वचनों के इन अंशों को ढूंढने के लिए आप रात को कितनी देर तक जागते रहे?" ये सब कुछ सुनकर मैं अत्यंत ख़ुश था। मेरा भोर तक जागना बेकार नहीं गया, और मेरे भाई-बहन देख सकते थे कि मैंने कितनी मेहनत की है। अपने उत्साह को छुपाते हुए, मैंने कहा, "इन्हें ढूंढते हुए भोर हो गई थी। मैं अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए अक्सर रात भर जागता हूँ, जैसा कि होना भी चाहिए। इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। मैं बस चाहता था कि सभा के दौरान सहभागिता करने में मेरे भाई-बहनों को कोई रुकावट न हो।" तब मेज़बान भाई ने कहा कि मैं अपने कर्तव्य पालन में ईमानदार हूँ, और मैं पूरी रात जागकर कष्ट सहन कर सकता हूँ। मेरा सीना ख़ुशी से फूल गया। मुझे मेहनत करना जारी रखना पड़ा, ताकि मेरे भाई-बहन यह कहें कि मैं एक काबिल अगुआ हूँ।

बाद में, जब सुसमाचार के प्रचार का काम आगे बढ़ा, तो हमने कुछ नई कलीसियाओं की स्थापना की। हर रोज़, मैं सुबह से लेकर शाम तक काम करता था, पूरी कलीसिया में घूम-घूम कर अपने भाई-बहनों को सिंचित करता था। अगर कोई भी मुश्किल में होता, तो मैं उनकी समस्याओं को हल करने के लिए धैर्यपूर्वक उन्हें परमेश्वर के वचन पढ़कर सुनाता, और इस तरह मेरे बारे में लोगों की राय और बेहतर होती गई। एक बार, सुसमाचार का प्रचार करते समय कुछ भाई-बहनों को किसी समस्या का सामना करना पड़ा और वे इसे हल नहीं कर पा रहे थे। वे नकारात्मक और कमज़ोर हो रहे थे, तो वे इसके बारे में मेरे साथ सहभागिता करने के लिए आए। मैंने उनके साथ सुसमाचार के प्रचार के अपने अतीत के अनुभव साझा किए। मैंने कहा, "जिन लोगों को मैं सुसमाचार सुना रहा था उनकी अपनी अवधारणाएं थीं और वे इसे स्वीकार नहीं कर रहे थे। कुछ लोगों ने तो मुझे अपने घरों से धक्का देकर बाहर निकाल दिया। उस समय, मुझे भी लगा कि ये काम बहुत मुश्किल है, इसलिए मैं बार-बार परमेश्वर से प्रार्थना करता था। मैं पूरी रात उसके वचनों से संबंधित अंश ढूंढने में निकाल देता और अक्सर उन लोगों की समस्याओं को दूर करने के लिए उनके साथ सहभागिता करने जाता था। मैं ऐसा इसलिए करता था ताकि वे परमेश्वर की वाणी सुन सकें और अंत के दिनों में उन्हें परमेश्वर का उद्धार हासिल हो सके। मैंने बहुत अपमान और मुश्किलों का सामना किया, लेकिन मैंने हार नहीं मानी। आखिर में, मैं उन्हें कलीसिया का हिस्सा बनाने में कामयाब रहा...।" जब मैंने अपनी बात पूरी की, तो एक भाई ने प्रशंसा भरी नज़रों से मेरी तरफ़ देखा और कहा, "हमारे भाई चेन को देखो। उन्हें सच में मालूम है कि कष्ट कैसे सहन किया जाता है। वे सच में जिम्मेदारी के बोझ को अपने कंधों पर उठाना जानते हैं।" कुछ ने कहा, "हम सबको भाई चेन की तरह सुसमाचार का प्रचार करना चाहिए।" जब मैंने देखा कि ये सभी भाई-बहन मुझे कितना काबिल समझते हैं, तो मैं सातवें आसमान पर था। इसके बाद, जब बाकी लोगों को अपने कर्तव्य पालन में कोई भी मुश्किल आती, तो वे मदद के लिए मेरे पास आ जाते, और बहुत कम लोग ही मेरे सहकर्मी भाई के पास जाते थे। अपने कर्तव्य पूरे करते समय, भाई-बहन सक्रियता से वो सब करते जो मैं उन्हें करने के लिए कहता। यह देखकर कि ये लोग मुझे बहुत काबिल समझ रहे हैं, मेरा अपने लिए सम्मान बढ़ता गया; मुझे लगने लगा कि मैं कलीसिया का एक स्तंभ बन चुका हूँ।

एक सभा के दौरान, मैं बोलता जा रहा था कि अपने कर्तव्य का पालन करते समय मैंने कितनी परेशानियां सहीं और कितनी कीमत चुकाई, और क्या नतीजे हासिल किए। अचानक एक बहन ने मुझसे कहा, "भाई चेन, आप ज़्यादातर इस बारे में बात कर रहे हैं कि अपने कर्तव्य पालन के दौरान आपने कितनी परेशानियों का सामना किया और कितनी मेहनत की, लेकिन आप ये बात नहीं कर रहे हैं कि जब आपने इन मुश्किलों का सामना किया तो आपकी क्या कमज़ोरियाँ थीं या आपके कौन से भ्रष्ट स्वभावों का खुलासा हुआ, या आपने अपने बारे में क्या ज्ञान प्राप्त किया, या आपने कैसे अपनी मुश्किलों को हल करने के लिए सत्य का इस्तेमाल किया। ऐसा लगता है जैसे आपके अंदर कोई भ्रष्टता है ही नहीं...।" जब उन्होंने अपनी बात पूरी की, तो हर इंसान मेरी तरफ़ देख रहा था। मैं दंग रह गया। मैं शर्मिंदा हो गया, और मेरा चेहरा लाल हो गया। अंदर ही अंदर मैं सोच रहा था, "इस तरह से बात करके इस बहन ने इन सभी भाई-बहनों के सामने मेरा मज़ाक बना दिया है। ये मेरे बारे में क्या सोचेंगे?" अपना थोड़ा-बहुत गौरव वापस पाने की कोशिश में, मैंने जल्दी से कहा, "बहन, आपने जो कहा है वह सही है, और मैं इसे स्वीकार भी कर सकता हूँ। लेकिन, हमारे भाई-बहन अपने कर्तव्यों में मुश्किलों का सामना कर रहे हैं, वे नकारात्मक और कमज़ोर होते जा रहे हैं। हमें बस अपनी भ्रष्टता के बारे में बात नहीं करनी चाहिए। हमें सकारात्मक अभ्यासों के बारे में ज़्यादा सहभागिता करनी चाहिए; यही एक तरीका है जिससे हमारे भाई-बहन आगे का रास्ता खोज सकते हैं और अपना विश्वास हासिल कर सकते हैं...।" बाद में, कुछ भाई-बहनों ने मुझसे कहा कि जब मैं अपने अनुभवों और ज्ञान के बारे में बात कर रहा था, तो मैंने उस भ्रष्टता के बारे में बात नहीं की जो मेरे सामने खुलकर आई थी, और क्योंकि मैंने अपने कष्ट और अपनी चुकाई गई कीमत के बारे में ज़्यादा बातें की थी, और यही कहा था कि कैसे मैंने अपने कर्तव्य पालन में अपनी देह की इच्छाओं को त्याग दिया था, मैं सत्य के अभ्यास में काफ़ी माहिर लग रहा था। अपने भाई-बहनों की इन चेतावनी भरी बातों के बाद, मैं थोड़ा परेशान रहने लगा। क्या मैं जिन बातों पर सहभागिता कर रहा था, वे असल में उचित नहीं थीं? कभी-कभी मैं इस बात पर सहभागिता करता था कि मैं कैसे अभिमानी और स्वार्थी था। इसके अलावा, अपने कर्तव्य पालन में मैं हमेशा बहुत अच्छे नतीजे प्राप्त करता था, और मैंने कभी भी कलीसिया के काम में बाधा नहीं पहुँचाई थी। तो क्या इसका मतलब ये नहीं कि मेरे सहभागिता करने के तरीके में कुछ भी गलत नहीं है? और इसलिए, मैंने ईमानदारी से अपने बारे में विचार नहीं किया।

बाद में, मेरे कर्तव्य की वजह से मुझे अपना काम जारी रखने के लिए दूसरी कलीसिया में भेज दिया गया। अपने सहकर्मियों के साथ एक सभा के दौरान, भाई ज़ैंग ने गंभीर स्वर में मुझसे कहा, "भाई चेन, जब से आपने उस कलीसिया को छोड़ा है, कुछ भाई-बहनों की कर्तव्य पालन में दिलचस्पी ख़त्म हो गई है। जब भी वे किसी मुश्किल का सामना करते हैं, वे न तो परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं और न ही वे सत्य की खोज करते हैं; वे बस यही चाहते हैं कि आप उनकी समस्याएं हल कर दें। कुछ ने तो सभाओं में आना भी बंद कर दिया है। इससे साफ़ दिखता है कि अपने कर्तव्य पालन में न आपने परमेश्वर की जय की है और न ही आपने उसकी गवाही दी है। आप बस दिखावा करते रहे हैं, ताकि दूसरे आपके बारे में अच्छा सोचें और आपका आदर करें। यह एक बुरा काम है, और आपको कुछ समय बिताकर अपने बारे में विचार करना चाहिए!” उनकी बात सुनकर, मैं हक्का-बक्का रह गया। ऐसा कैसे हुआ? मेरे सभी भाई-बहन मेरा बहुत आदर करते थे? यह तो एक गंभीर समस्या है! मैं बहुत डर गया। इसके बाद, मैंने कुछ नहीं सुना कि सभा में किस बारे में सहभागिता हो रही थी; मैं असमंजस में था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं इस परिस्थिति से कैसे निकलूँ। घर पहुँचकर, मैं भाई ज़ैंग के शब्दों के बारे में सोचता रहा। पहले, मैं सोचता था कि मेरे कर्तव्य पालन से कुछ नतीजे हासिल हुए हैं और कुछ समस्याओं को हल करने के लिए मैं सत्य पर सहभागिता कर सकता हूँ। हज़ार वर्षों में भी मैं सोच नहीं सकता था कि इसका यह नतीजा होगा। दरअसल, इस बात ने मुझे बहुत परेशान किया। अपनी लाचारी में, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की। मैंने कहा, "हे परमेश्वर, मुझे प्रबुद्ध करो ताकि मैं अपनी समस्या का स्रोत जान सकूँ और ख़ुद की सच्ची समझ पा सकूँ।"

बाद में, मैंने परमेश्वर के कुछ वचन पढ़े, "वे सभी जो अधोगति पर होते हैं स्वयं का उत्कर्ष करते हैं और स्वयं की गवाही देते हैं। वे स्वयं के बारे में शेखी बघारते हैं और आत्म-प्रशंसा करते हैं, और उन्होंने परमेश्वर को हृदय में तो बिल्कुल नहीं लिया है। मैं जिस बारे में बात कर रहा हूँ, क्या तुम लोगों को उसका कोई अनुभव है? बहुत से लोग लगातार खुद के लिए गवाही दे रहे हैं : 'मैं इस तरह से या उस तरह से पीड़ित रहा हूँ; मैंने फलाँ-फलाँ कार्य किया है और परमेश्वर ने मेरे साथ फलाँ-फलाँ ढंग से व्यवहार किया है; उसने मुझे ऐसा-ऐसा करने के लिए कहा; वह विशेष रूप से मेरे बारे में ऊँचा सोचता है; अब मैं फलाँ-फलाँ हूँ।' वे जानबूझकर एक निश्चित लहजे में बोलते हैं, और निश्चित मुद्राएँ अपनाते हैं। अंतत: कुछ लोग इस विचार पर पहुँचते हैं कि ये लोग परमेश्वर हैं। एक बार जब वे उस बिंदु पर पहुँच जायेंगे, तो पवित्र आत्मा उन्हें लंबे समय पहले ही छोड़ चुका होगा। यद्यपि, इस बीच, उन्हें नजरअंदाज किया जाता है, और निष्कासित नहीं किया जाता है, उनका भाग्य निर्धारित किया जाता है, और वे केवल अपने दण्ड की प्रतीक्षा कर सकते हैं" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'लोग परमेश्वर से बहुत अधिक माँगें करते हैं')। "जबकि अन्य लोग बार बार स्वयं के विषय में गवाही देने, स्वयं की ख्याति को बढ़ाने, और लोगों एवं हैसियत के लिए परमेश्वर के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए अपने पदों का उपयोग कर सकते हैं। वे लोगों से अपनी आराधना करवाने के लिए विभिन्न तरीकों एवं साधनों का उपयोग करते हैं, और लोगों को जीतने एवं उनको नियन्त्रित करने की लगातार कोशिश करते हैं। यहाँ तक कि कुछ लोग जानबूझकर लोगों को यह सोचने के लिए गुमराह करते हैं कि वे परमेश्वर हैं और इस प्रकार उनके साथ परमेश्वर के जैसा व्यवहार किया जा सकता है। वे लोगों को कभी नहीं बताएँगे कि उन्हें भ्रष्ट कर दिया गया है, कि वे भी भ्रष्ट एवं अहंकारी हैं, और उनकी आराधना नहीं करनी है, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे कितना अच्छा करते हैं, यह सब परमेश्वर के ऊंचा उठाने के कारण है और वह है जो उन्हें वैसे भी करना ही चाहिए। वे ऐसी बातों को क्यों नहीं कहते हैं? क्योंकि वे लोगों के हृदयों में अपने स्थान खोने से बहुत अधिक डरते हैं। इसीलिए ऐसे लोग परमेश्वर को कभी ऊँचा नहीं उठाते हैं और परमेश्वर के लिए कभी गवाही नहीं देते हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I')। परमेश्वर के वचनों को पढ़कर, मैं बहुत परेशान हो गया। अपने बारे में विचार करके ही मैंने समझा कि ऊपरी तौर पर तो मैं यह दिखा रहा था कि मैंने कष्ट सहा है और कीमत चुकाई है, और अपने भाई-बहनों की समस्याओं को हल करने के लिए परमेश्वर के वचनों पर उनके साथ सहभागिता करता था, लेकिन मैं ऐसा इसलिए कर रहा था ताकि मैं बेहतर दिखूँ और दिखावा कर सकूँ, ताकि दूसरे मेरे बारे में ऊँचा सोचें और मेरा आदर करें। मैं उस वक्त के बारे में सोचने लगा जब मेरे सहकर्मियों ने मेरी सिफ़ारिश की थी कि मुझे नए सदस्यों वाली उस कलीसिया का अगुआ बनना चाहिए। मुझे समझ आया कि उस समय मैंने बस यही सोचा था कि कैसे मैं कुछ उपलब्धियाँ हासिल करूँ, ताकि मेरे भाई-बहन मेरे बारे में ऊँचा सोचें और मेरे अगुआ की मेरे बारे में अच्छी राय हो। इसके लिए, मैंने अतिरिक्त समय लगाया, रात भर जागकर परमेश्वर के वचनों के प्रासंगिक अंशों को ढूंढा और व्यवस्थित किया, ताकि सभाओं में हम उन बातों पर सहभागिता कर सकें। सुसमाचार के प्रचार के समय, जब मेरे भाई-बहनों ने मुश्किलों का सामना किया, तो मैंने उनके साथ इस बात पर सहभागिता नहीं की कि सत्य के सिद्धांतों के ज्ञान तक उन्हें पहुँचाने में अगुआई करना परमेश्वर की इच्छा है, बल्कि मैंने अपनी बड़ाई की और दिखावा किया कि सुसमाचार का प्रचार करते हुए मैं कितनी परेशानियों से गुज़रा और कितनी कीमत चुकाई। मेरे काम में सुधार आया था, इसलिए मेरे भाई-बहनों ने मेरी तारीफ़ की। मुझे यह अच्छा लगता था, और मैंने पवित्र आत्मा के काम से हासिल नतीजों के लिए व्यक्तिगत श्रेय लिया, बेशर्मी और शान से उन्हें अपनी उपलब्धियों की तरह पेश किया। सभाओं में सहभागिता करते समय, मैंने अपने आप को बार-बार ध्यान का केंद्र बनाकर रखा। मैं सिर्फ़ सकारात्मक अभ्यासों के बारे में सहभागिता करता था और मेरे सामने प्रकट हुए अपने भ्रष्ट स्वभावों की बात करने से बचता था। अगर कभी यह विषय उठता भी था, तो मैं गोलमोल बातें करके टाल देता था। जहाँ तक मेरे कर्तव्यों को पूरा करने के नीच इरादों का सवाल है, इनके बारे में विचार करने या इन्हें सामने रखने के लिए मैं बिल्कुल भी तैयार नहीं था। बार-बार, परमेश्वर ने मेरे भाई-बहनों का इस्तेमाल मेरी समस्याओं को बताने के लिए किया था, लेकिन अपनी गरिमा और छवि को बचाने के लिए, मैंने बस मुँह से बोल दिया कि मैं उनकी बातों को स्वीकार करता हूँ, लेकिन सच तो यह था कि मैंने ज़रा सा भी अपने आप पर विचार नहीं किया था। मैंने सहभागिता के दौरान, बड़ी-बड़ी बातें करके अपने भाई-बहनों को धोखा देने का काम जारी रखा। इस तरह, मैं यह मानने लगा कि मैं अपने कर्तव्य को ज़िम्मेदारी से पूरा करता हूँ, मैं परेशानियां सहन कर सकता हूँ और कीमत चुका सकता हूँ। कलीसिया की कोई भी समस्या या परेशानी होती, या मेरे भाई-बहन किसी भी मुश्किल परिस्थिति में होते, तो मैं पीछे नहीं हटता था, बल्कि हमेशा समाधान निकालने में उनकी मदद करता था। इन तथ्यों ने मुझे बेनक़ाब कर दिया था, और मैंने देखा कि अपना काम करते समय, मैं बिल्कुल भी सत्य का अभ्यास नहीं कर रहा था, और न ही मुझे परमेश्वर की इच्छा की परवाह थी। मैंने अपने कर्तव्य की ज़िम्मेदारी को पूरा करने के मौके का फ़ायदा दूसरों के सामने दिखावा करने के लिए उठाया, ताकि वे मेरे बारे में ऊँचा सोचें, और इस तरह मैंने शोहरत और ओहदे की अपनी इच्छा को संतुष्ट किया। ऐसा करके मैं अपने भाई-बहनों को परमेश्वर के सामने नहीं लेकर आया; बल्कि उनसे अपनी आराधना करवाने लगा। इसका मतलब हुआ कि मैं लोगों और ओहदे के लिए परमेश्वर से मुकाबला कर रहा था। सच है। तब जाकर मैं इस बात के प्रति जागरूक हुआ कि मैं परमेश्वर के विरोध के रास्ते पर चलना शुरू कर चुका था और मैंने बहुत ही गंभीर अपराध किया है। मैं डरा हुआ था और बहुत दोषी महसूस कर रहा था। फिर मैंने अपने आप से पूछा: मैं अनजाने में, कैसे परमेश्वर के विरोध के रास्ते पर चल पड़ा?

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा: "शैतान ने जब मनुष्यों को भ्रष्ट कर दिया, तो उनकी प्रकृति शैतानी हो गयी। मनुष्य होते हुए भी लोगों ने मनुष्य की तरह बर्ताव करना बंद कर दिया है; बल्कि, वे मानवता के ओहदे को पार कर गए हैं। वे इंसान होने की इच्छा नहीं रखते; वे किसी और ऊँचे स्तर के लिए तरसते हैं। और यह ऊँचा स्तर क्या है? वे परमेश्वर से बढ़कर होना चाहते हैं, स्वर्ग से बढ़कर होना चाहते हैं, और बाकी सभी से बढ़कर होना चाहते हैं। लोग इस तरह क्यों है, इसका मूल क्या है? सबसे यही नतीजा निकलता है कि मनुष्य की प्रकृति बहुत अभिमानी है। ... जब लोगों की प्रकृति और सार अभिमानी हो जाते हैं, तो वे ऐसी चीज़ें करने के काबिल हो जाते हैं जो परमेश्वर की अवज्ञा और विरोध करती हैं, उसके वचनों को ध्यान में रखे बिना चीज़ें करते हैं, ऐसी चीज़ें करते हैँ जो परमेश्वर के बारे में धारणाएं उत्पन्न करती हैं, जो उसका विरोध करती हैं, और जो उस व्यक्ति का उत्कर्ष करती हैं और उस व्यक्ति की गवाही देती हैं। तुम्हारा कहना है कि तुम अभिमानी नहीं हो, लेकिन मान लो कि तुम्हें कई कलीसियाओं को चलाने और उनकी अगुआई करने की ज़िम्मेदारी दी जाती है; मान लो कि मैं तुम्हारे साथ नहीं निपटता हूँ, और परमेश्वर के परिवार के किसी सदस्य ने तुम्हारी कांट-छांट नहीं की : थोड़ी देर उनका नेतृत्व करने के बाद, तुम उन्हें अपने पैरों पर गिरा लोगे और उनसे अपनी आज्ञा का पालन करवाने लगोगे। और तुम ऐसा क्यों करोगे? यह तुम्हारी प्रकृति द्वारा निर्धारित होता है; यह स्वाभाविक प्रकटीकरण के अलावा और कुछ नहीं है। इसे सीखने के लिए तुम्हें दूर जाने की आवश्यकता नहीं है, और न ही दूसरों से यह कहने की ज़रूरत है कि वे तुम्हें सिखाएं। तुम्हें यह सब जानबूझकर करने की आवश्यकता नहीं है। इस तरह की स्थिति स्वाभाविक रूप से तुम्हारे सामने आएगी : तुम लोगों से अपने सामने समर्पण करवाओगे, उनसे अपनी आराधना करवाओगे, अपनी प्रशंसा करवाओगे, अपनी गवाही दिलवाओगे, उनसे अपनी सभी बातें मनवाओगे, और उन्हें ऐसी कोई चीज़ नहीं करने दोगे जो तुम्हारे द्वारा स्वीकृत नहीं है। तुम्हारे नेतृत्व में, ऐसी परिस्थितियाँ स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती हैं। और ये हालात कैसे आते हैं? ये मनुष्य की अभिमानी प्रकृति से निर्धारित होते हैं" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का अभिमानी स्वभाव परमेश्वर के प्रति उसके विरोध की जड़ है')। परमेश्वर के वचनों को पढ़कर मुझे समझ आया कि मैं क्यों अपने कर्तव्य में परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहता था, लेकिन अनजाने में उसके विरोध के रास्ते पर चल निकला था। इसका स्रोत था मेरे अंदर मौजूद अभिमानी शैतानी प्रकृति। इस अभिमानी प्रकृति के काबू में रहने की वजह से मेरी अपने बारे में राय बहुत ऊँची थी, मैं अक्सर अपनी बोली और अपने कार्यों में दिखावा करता था, ताकि लोग मेरे बारे में ऊँची राय रखें और मेरा आदर करें। जब मेरे भाई-बहनों ने अपने कर्तव्य पालन के दौरान समस्याओं का सामना किया, तो मैंने सत्य को समझने और अभ्यास के मार्ग की तलाश करने में उनकी मदद के लिए उनके साथ सत्य के सिद्धांतों पर सहभागिता नहीं की, बल्कि सिर्फ़ छिछले शब्दों और सिद्धांतों का इस्तेमाल किया, ताकि मैं अच्छा दिख सकूँ। यही नहीं, कष्ट और काम के अपने अनुभव का मैंने पूंजी की तरह दिखावा करने के लिए इस्तेमाल किया। इसकी वजह से मेरे भाई-बहन मेरी तरफ़ सम्मान से देखते थे और मानते थे कि मैं सत्य को समझता हूँ और उनकी समस्याओं को हल कर सकता हूँ। जब भी कोई समस्या उनके सामने आती, वे हमेशा मेरे पास आते थे, बिना यह समझे कि अपनी समस्याओं को हल करने के लिए उन्हें परमेश्वर पर निर्भर करना चाहिए और सत्य की तलाश करनी चाहिए। उनके दिलों में परमेश्वर के लिए कोई जगह नहीं थी। यहाँ तक हो गया कि जब मुझे दूसरी जगह भेज दिया गया, तो कुछ भाई-बहन अब सभाओं में जाना ही नहीं चाहते थे। इसे अपने कर्तव्यों का पालन करना कैसे कहा जा सकता है? मैं बुराई कर रहा था और परमेश्वर का विरोध कर रहा था! सिर्फ़ मेरे अभिमान और दंभ की वजह से मैं इस तरह के बुरे काम कर रहा था। मैं बस यही चाहता था कि मैं दिखा पाऊँ कि मैं दूसरों से बेहतर हूँ, मैं अपनी प्रतिष्ठा और छवि की भी सुरक्षा कर पाऊँ, सभी भाई-बहन मेरा आदर करें और सिर्फ़ मुझ पर ही ध्यान दें। मैं अपनी प्रतिष्ठा के आशीष का लोभ करने लगा था। मैं अपने अंदर गहराई में कहीं देख पा रहा था कि मेरे मन में परमेश्वर के लिए आदर का एक कतरा भी नहीं था। जब आप एक अभिमानी प्रकृति के साथ जीते हैं, तो परमेश्वर के प्रति विरोध अपने आप शुरू हो जाता है। यह वाकई बहुत खतरनाक है। यह सच है। मैं धार्मिक दुनिया के पादरियों और एल्डरों के बारे में सोचने लगा। वे परमेश्वर की जय नहीं करते या उसकी गवाही नहीं देते, न ही वे विश्वासियों को प्रभु के वचनों को अभ्यास में लाने की तरफ़ ले जाते हैं। इसके बजाय, वे विश्वासियों को धोखा देने के लिए बाइबल के ज्ञान और धर्मशास्त्रीय सिद्धांतों की आँख बंद करके व्याख्या करते हैं, वे दिखावा करते हैं कि उन्होंने कितना कष्ट सहा है, सुसमाचार का प्रचार करने की उनकी कोशिश से कितना लाभ हुआ है, और उन्होंने कितनी कलीसियाओं की स्थापना की है। इस वजह से विश्वासी उनकी आराधना करने लगते हैं, उनकी तरफ़ सम्मान से देखते हैं, और उनकी कही हर बात को पूरा करते हैं। कुछ लोगों ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़ा है और परमेश्वर की वाणी सुनी है, लेकिन फिर भी वे पादरियों और एल्डरों के पास जाकर उनका मतलब पूछते हैं। पादरियों की सहमति के बिना, उनमें सर्वशक्तिमान परमेश्वर के काम को स्वीकार करने की हिम्मत नहीं होती, हालांकि वे जानते हैं कि सच्चा रास्ता यही है। बिल्कुल सच। धार्मिक दुनिया के पादरी और एल्डर लोगों को मजबूती से काबू में रखते हैं। वे अविश्वासियों के परमेश्वर-विरोधी पथ पर चलते हैं, और एक स्वतंत्र राज्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं! कर्तव्य पालन करते समय मैं अक्सर लोगों के सामने दिखावा करता था, ताकि लोग मुझे काबिल समझें और मेरी तरफ़ सम्मान से देखें। मैं उन पादरियों और एल्डरों से कैसे अलग हूँ? मैंने नए सदस्यों वाली उस कलीसिया के भाई-बहनों के बारे में सोचा: उन्होंने अभी-अभी परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार किया था, और अभी भी काफ़ी ऐसे सत्य थे जो वो समझ नहीं पाए थे। परमेश्वर ने मुझे कलीसिया की अगुआई करने के कर्तव्य को पूरा करने के लिए तैयार किया था, इसलिए मुझे उनके साथ परमेश्वर के वचनों पर ज़्यादा सहभागिता करनी चाहिए थी और उसके कार्य के लिए ज़्यादा गवाही देनी चाहिए थी, ताकि वे सत्य को समझ सकें, परमेश्वर के बारे में ज्ञान हासिल कर सकें और सत्य के मार्ग पर अपनी शुरुआत कर सकें। लेकिन मैंने क्या किया? अपने कर्तव्यों को पूरा करने की मेरी कोशिशों का क्या नतीजा हुआ? मैंने दूसरों से ख़ुद की आराधना करवाई, और उन्हें परमेश्वर का ज्ञान हासिल करने से रोका। ऐसा करके, मैंने अपने भाई-बहनों को नुकसान पहुँचाया, और कलीसिया के काम को बाधित किया और बिगाड़ दिया। मैं जिस रास्ते पर चल रहा था वह अविश्वासियों का परमेश्वर-विरोधी रास्ता था! बिल्कुल सही। मैं जितना इस बारे में सोचता, उतना ही चिंतित और परेशान महसूस करता। मैं देख सकता था कि मैं कितना घमंडी था, मेरे मन में परमेश्वर के लिए कोई आदर नहीं था, और मेरे काम उसके स्वभाव को बहुत समय से नाराज़ कर रहे थे। अगर उसने मेरे भाई-बहनों को मेरी कांट-छांट करने और मुझसे निपटने के लिए इस्तेमाल नहीं किया होता, तो मैं कभी भी यह समझ नहीं पाता कि मुझे अपने व्यवहार पर विचार करने की ज़रूरत है। अगर मैं उस रास्ते पर चलना जारी रखता, तो कोई नहीं जानता कि मैंने कितनी बुराई की होती, जिससे मुझे परमेश्वर का श्राप और सज़ा भुगतनी पड़ती। यह सच है। एक अनजाने से डर के अहसास के साथ, मैं परमेश्वर के सामने दंडवत अवस्था में प्रार्थना करने लगा। मैंने कहा, "हे परमेश्वर! मैं कितना घमंडी रहा हूँ। मैं कर्तव्य पालन करते हुए हमेशा दिखावा करता हूँ, और इस वजह से मेरे भाई-बहन मेरा आदर करते हैं और उनके दिलों में तुम्हारे लिए जगह नहीं है। मैंने बुराई की है और तुम्हारा विरोध किया है। मैं तुम्हारी सज़ा के लायक हूं। हे परमेश्वर! मैं तुम्हारे सामने पश्चाताप करना चाहता हूँ, ईमानदारी से सत्य की राह पर चलना चाहता हूँ, और एक नई शुरुआत करना चाहता हूँ।"

बाद में, मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े: "जीवधारियों में से एक होने के नाते, मनुष्य को अपनी स्थिति को बना कर रखना होगा और शुद्ध अंतःकरण से व्यवहार करना होगा। सृष्टिकर्ता के द्वारा तुम्हें जो कुछ सौंपा गया है, कर्तव्यनिष्ठा के साथ उसकी सुरक्षा करो। अनुचित ढंग से आचरण मत करो, या ऐसे काम न करो जो तुम्हारी क्षमता के दायरे से बाहर हों या जो परमेश्वर के लिए घृणित हों। महान या अद्भुत व्यक्ति बनने की चेष्टा मत करो, दूसरों से श्रेष्ठ होने की कोशिश मत करो, न ही परमेश्वर बनने की कोशिश करो। लोगों को ऐसा बनने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। महान या अद्भुत व्यक्ति बनने की कोशिश करना बेतुका है। परमेश्वर बनने की कोशिश करना और भी अधिक लज्जाजनक है; यह घृणित है और नीचता भरा है। जो काम तारीफ़ के काबिल है और जिसे प्राणियों को सब चीज़ों से ऊपर मानना चाहिए, वह है एक सच्चा जीवधारी बनना; यही वह एकमात्र लक्ष्य है जिसे पूरा करने का निरंतर प्रयास सब लोगों को करना चाहिए" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I')। "मनुष्य जो भी तलाश करे या जो भी चाहे, जो सृष्टिकर्ता के सामने लौटेगा और कर्तव्यनिष्ठा के साथ वह निभाएगा और पूरा करेगा जो उसे करना चाहिए और जो उसे सौंपा गया है, केवल वही एक सहज अंतरात्मा के साथ, सही और उचित ढंग से, बिना किसी कष्ट के जीवित रह पाएगा। यही जीने का अर्थ और मूल्य है।" परमेश्वर के वचनों को पढ़कर मुझे समझ आया कि वह सृष्टि का प्रभु है, और यही सही और उचित है—यही स्वाभाविक है—कि इंसान उनकी आराधना करे और अपने आप को उसके सामने समर्पित करे। इसके अलावा, मुझे मालूम था कि मैं एक छोटा सा प्राणी हूँ, एक भ्रष्ट इंसान। मेरे अंदर शैतान के स्वभाव भरे हुए थे—मैं अभिमानी, कपटी, स्वार्थी, और घिनौना था। इसके बावजूद, मैं हमेशा दिखावा करता और लोगों के दिलों में जगह बनाने की कोशिश करता था। मुझमें सच में बिल्कुल भी शर्म नहीं बची थी और मेरा अभिमान सभी तर्कों से परे था! मैं जितना इस बारे में सोचता, मुझे उतनी ही शर्म महसूस होती थी। मुझे अपने आप से नफ़रत थी कि मैं अंधा बना रहा और परमेश्वर को नहीं जान पाया। मुझे नहीं पता था कि मैं कौन हूँ। अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए आज भी मैं यहाँ मौजूद हूँ, यह सिर्फ़ परमेश्वर के अनुग्रह और उत्थान की वजह से है। मुझे एक सृजित प्राणी की अपनी उचित जगह लेनी चाहिए, और एक ईमानदार, सच्चा इंसान बनना चाहिए, जो सत्य की खोज पर ध्यान देता हो, परेमश्वर की जय करता हो, उसकी गवाही देता हो, और अपने कर्तव्यों का भी पालन करता हो—ऐसा करने से ही मुझमें एक सृजित प्राणी की चेतना और समझ होगी।

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों से अभ्यास और प्रवेश का रास्ता तलाश किया। मैंने परमेश्वर के कुछ वचनों को पढ़ा जो इस तरह थे, "जब तुम परमेश्वर के लिए गवाही देते हो, तो तुमको मुख्य रूप से इस बारे में अधिक बात करनी चाहिए कि परमेश्वर कैसे न्याय करता है और लोगों को कैसे दंड देता है, मनुष्यों का शुद्धिकरण करने और मनुष्यों के स्वभाव में परिवर्तन लाने के लिए किन परीक्षणों का उपयोग करता है। तुमको इस बारे में भी बात करनी चाहिए कि तुमने कितना सहन किया है, तुम लोगों के भीतर कितने भ्रष्टाचार को प्रकट किया गया है, और आखिरकार परमेश्वर ने कैसे तुमको जीता था; परमेश्वर के कार्य का कितना वास्तविक ज्ञान तुम्हारे पास है और तुमको परमेश्वर के लिए कैसे गवाही देनी चाहिए और परमेश्वर के प्रेम का मूल्य कैसे चुकाना चाहिए। तुम लोगों को इन बातों को सरल तरीके से प्रस्तुत करते हुए, इस प्रकार की भाषा का अधिक व्यावहारिक रूप से प्रयोग करना चाहिए। खोखले सिद्धांतों की बातें मत करो। वास्तविक बातें अधिक किया करो; दिल से बातें किया करो। तुम्हें इसी प्रकार अनुभव करना चाहिए। अपने आपको बहुत ऊंचा दिखाने की कोशिश न करो, और खोखले सिद्धांतों के बारे में बात न करो; ऐसा करने से तुम्हें बहुत घमंडी और तर्कहीन माना जाएगा। जिन वास्तविक, यथार्थ बातों का तुम दिल से और असल में अनुभव करते हो उनके बारे में ज़्यादा बात करो; यह दूसरों के लिए बहुत लाभकारी होगा और उनके समझने के लिए सबसे उचित होगा" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही तू अपने स्वभाव में परिवर्तन को प्राप्त कर सकता है')। परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, मुझे थोड़ा-बहुत समझ आया कि मुझे परमेश्वर की जय करने और अपने कर्तव्य में उसके लिए गवाही देने का अभ्यास कैसे करना चाहिए। शुक्रिया परमेश्वर! परमेश्वर की गवाही देते हुए, मुझे इस बारे में ज़्यादा बात करनी चाहिए कि मैंने उसके कार्य का अनुभव कैसे किया, मेरे कौन से भ्रष्ट स्वभाव मेरे सामने प्रकट हुए, मैंने कैसे उसके खिलाफ़ बगावत की और उसका विरोध किया, कैसे उसके वचनों से अपनी तुलना करके मैं अपने बारे में विचार कर पाया और ख़ुद को जान पाया, और मैंने कैसे पश्चाताप किया और कैसे अपने आप को बदला। सत्य पर सहभागिता करते हुए, मुझे परमेश्वर की इच्छा और उसकी अपेक्षाओं को समझने में दूसरों की मदद करनी चाहिए। उन्हें यह समझने में मदद करनी चाहिए कि परमेश्वर लोगों को बचाने के लिए क्या कार्य करता है और उसका स्वभाव क्या है, ताकि वे परमेश्वर का आदर कर सकें, उसके सामने ख़ुद को समर्पित कर सकें और सृजित प्राणी के कर्तव्यों को पूरा कर सकें। सिर्फ़ ऐसा करके मैं परमेश्वर की सच में जय कर सकता हूँ और उसकी गवाही दे सकता हूँ। मैं उस बारे में सोचने लगा जब मैं अपने भाई-बहनों के साथ सहभागिता करता था। ज़्यादातर समय मैं अपने कष्ट और मेरी चुकाई गई कीमत के बारे में बात करता था, और यह बात करता था कि कैसे मैं परमेश्वर के कार्यों को देख चुका हूँ और कैसे मुझे परमेश्वर के आशीष मिले हैं। लेकिन मेरे कौन से भ्रष्ट स्वभाव प्रकट हुए थे या मेरे कौन से नीच इरादे थे, इन बातों पर मैं हमेशा पर्दा डाल देता था और शायद ही कभी इनके बारे में बात करता था। मुझे बहुत डर था कि अगर मेरे भाई-बहन मेरी भ्रष्टता को देखेंगे, तो मेरे बारे में उनकी राय नीची हो जाएगी। वास्तव में ऐसी थी मेरी कपटी प्रकृति। इन सब बातों को जानने के बाद, मैं भाई ज़ैंग के पास गया और उनसे दूसरों को धोखा देने के लिए दिखावा करने के अपना बुरे कर्मों के बारे में बात की। मैंने भाई ज़ैंग से यह भी आग्रह किया कि वे उस कलीसिया में जाएं, जहाँ मैं पहले काम करता था, और मेरे बर्ताव के बारे में विस्तार से वहाँ के भाई-बहनों से बात करें, ताकि वे सही और गलत के अंतर को बेहतर समझ सकें। सभा के दौरान, मैंने अपने भाई-बहनों के सामने अपने बुरे बर्ताव के बारे में भी खुलकर बात की, परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की गवाही दी, और सबसे कहा कि वे मुझे यह सीखने के लिए उदाहरण मानें कि उन्हें क्या नहीं करना चाहिए, ताकि वे मेरी तरह परमेश्वर के विरोध के रास्ते पर न चलें।

इसके बाद, मैं अपने कर्तव्यों को पूरा करते समय थोड़ा शांत रहता था, और मेरे मन में परमेश्वर के लिए थोड़ा आदर पैदा हो गया था। मुझे याद है एक सभा के दौरान, एक नया भाई था जिसे कोई समस्या थी, और मैंने उसकी समस्या का हल करने में उसकी मदद करने के लिए परमेश्वर के वचनों पर उसके साथ सहभागिता की। मेरी बात सुनने के बाद, भाई ने ख़ुशी-ख़ुशी कहा, "भाई चेन, आपकी सहभागिता बहुत अच्छी है। यह समस्या मुझे बहुत समय से परेशान कर रही थी, और मैं आज तक इसका हल नहीं निकाल पाया था। आप सच में सत्य को समझते हैं! आपको हमारी सभाओं में सहभागिता के लिए आगे भी आना होगा।" एक और भाई ने भी यही कहा। उस समय मुझे बहुत ख़ुशी महसूस हुई, लेकिन मैं फौरन सचेत हो गया कि दिखावा करने की मेरी पुरानी कमज़ोरी फिर अपना बदसूरत चेहरा दिखाने वाली है, इसलिए मैंने जल्द परमेश्वर से प्रार्थना की और अपनी इच्छाओं को त्याग दिया। इसके बाद से, मैं सचेत मन से परमेश्वर की गवाही देता था और अपने भाई-बहनों को उसके सामने लेकर आता था। मैंने कहा, "हमने आज की सभा में जिस बात पर सहभागिता की है, उससे हम सब सीख सकते हैं। पवित्र आत्मा हमारा मार्गदर्शन कर रहा है और हमें प्रबुद्ध कर रहा है। हमें परमेश्वर के वचनों को और ज़्यादा पढ़ना चाहिए, और जब भी कोई परेशानी आए, तो हमें उसके वचनों में सत्य की तलाश करनी चाहिए, तब पवित्र आत्मा हमें प्रबुद्ध और रोशन करेगा। ऐसा करके, हमारी समझ बेहतर होगी।" ये कहने के बाद, मुझे अपने अंदर बहुत शांति महसूस हुई। मैं इस छोटे से बदलाव से गुज़र पाया और जान पाया कि परमेश्वर की जय करने और अपने कर्तव्य पालन में उसकी गवाही देने का अभ्यास कैसे किया जाए।

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