71. दिखावा करने से हुआ नुकसान

रुओयू, स्पेन

कुछ साल पहले मैं अपनी ही उम्र के कुछ भाई-बहनों के साथ सिंचन का कर्तव्य निभा रही थी। वे बहुत उत्साही और जिम्मेदार लोग थे। दूसरे अकसर उनकी प्रशंसा करते, जिससे मैं भी उनकी सराहना करने लगी। मैं भी एक दिन उनकी तरह बनने और दूसरों का सम्मान पाने की उम्मीद करने लगी। बाद में मेरा दूसरी कलीसिया में तबादला कर दिया गया। कुछ ही समय बाद वहाँ एक अगुआ को व्यावहारिक कार्य न करने के कारण झूठा अगुआ बताकर बदल दिया गया और उसकी जगह मुझे कलीसिया का अगुआ चुन लिया गया। मुझे जानने वाले भाई-बहनों ने यह कहकर मेरा हौसला बढ़ाया, "परमेश्वर आपको उन्नत कर रहा है, आपको इसका आनंद उठाना चाहिए।" मैं जानती थी कि यह कर्तव्य एक बड़ी जिम्मेदारी होगी, और मुझे लगा कि यह मेरे लिए खुद को साबित करने का एक अच्छा मौका होगा। अगर मैंने अच्छा किया, तो भाई-बहन मेरा सम्मान करेंगे। मैंने मन ही मन एक संकल्प लिया कि इस कर्तव्य को अच्छी तरह निभाने का मैं सर्वोत्तम प्रयास करूँगी।

उसके बाद हर सामूहिक सभा में मैंने यह विश्लेषण किया कि कैसे पिछले अगुआ ने व्यावहारिक कार्य नहीं किया और अकसर नकारात्मक बातें कीं, और हर कोई उससे नाराज दिखा। यह देखकर मुझे अकसर खुद को याद दिलाना पड़ता था कि भाई-बहन अब झूठे अगुआ को पहचानने में सक्षम हैं और वे मुझसे व्यावहारिक कार्य करने की उम्मीद रखते हैं। मुझे कड़ी मेहनत करनी होगी और उनका अनुमोदन हासिल करने की भरपूर कोशिश करनी होगी। कलीसिया की अगुआ के रूप में मुझे कलीसिया में काफी बढ़-चढ़कर काम करना होगा, किसी और के मुकाबले अधिक कष्ट सहने के लिए तैयार रहना होगा, और किसी और से ज्यादा त्याग करने में भी सक्षम होना होगा। परीक्षणों का सामना होने पर मुझे दूसरों के मुकाबले अधिक विश्वास रखना होगा और उनके निराश होने पर मुझे निराश नहीं होना होगा। कलीसिया में मुझे हर मामले में दूसरों से बेहतर होना होगा, ताकि हर कोई लगातार मेरे ही गुण गाता रहे। ऐसे विचारों के साथ मैंने सभी सामूहिक सभाओं में खुद को व्यस्त कर लिया और हर दिन देर से सोने लगी। कभी-कभी दूसरों के साथ चैटिंग करते हुए मैं जान-बूझकर यह दिखाती कि मैं कलीसिया के काम में कितनी व्यस्त हूँ और कितनी देर से सोती हूँ। यह सुनकर वे सोचते कि मैं कितनी जिम्मेदार हूँ और हमेशा कष्ट उठाने के लिए तैयार रहती हूँ, और वे हमेशा मुझे अपना ध्यान रखने की सलाह देते। वे अपने घरों से खाने-पीने की चीजें भी उपहार के तौर पर भेजते। जब भी उनमें से कोई बुरी हालत में होता, तो चाहे जैसा भी मौसम हो, मैं उसकी मदद के लिए दौड़कर जाती। सभाओं में मैं भाई-बहनों से कहती कि कैसे अमुक इंसान काफी समय से नकारात्मक महसूस कर रहा था, लेकिन जब मैंने उसके साथ संगति की तो वह फिर से सकारात्मक हो गया। तब हर कोई यह सोचता कि छोटी उम्र की होने के बावजूद मैं कितनी स्नेही और धैर्यवान हूँ। कलीसिया के कार्य पर पकड़ बनाने के लिए, जब भी मुझे कोई संभावित ईसाई दिखता, तो मैं फौरन सुसमाचार-उपयाजक से उसके साथ संगति करने के लिए जाने को कहती और कभी-कभी मैं खुद ही उसके साथ गवाही साझा करने के लिए पहुँच जाती। सुसमाचार का कार्य अच्छी तरह आगे बढ़ने लगा और एक सभा में मैंने लोगों से कहा : "देखा? पहले हमारा सुसमाचार-कार्य ठीक से नहीं चलता था, लेकिन अब हर महीने लोग परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कर रहे हैं। हमें और भी अधिक कोशिश करनी होगी।" तब भाई-बहनों को महसूस होने लगा कि मेरे आने के बाद से सुसमाचार-कार्य अच्छा चलने लगा है, और वे मेरा पहले से भी ज्यादा सम्मान करने लगे और मेरी आराधना करने लगे। जब मैं सभाओं में अपने अनुभवों के बारे में संगति करती, तो सकारात्मक प्रवेश के कुछ उदाहरणों पर काफी जोर देती थी। मुझे डर था कि अगर मैं अपनी भ्रष्टता के बारे में बहुत ज्यादा बोलूँगी, तो दूसरों को लगेगा कि समस्याओं से सामना होने पर मैं कमजोर पड़ जाती हूँ, और कि मेरा आध्यात्मिक कद छोटा है, और फिर वे मेरा सम्मान नहीं करेंगे। इसलिए मैं अपनी कमजोरी या अपने नकारात्मक होने या अपनी भ्रष्टता का खुलासा होने की बात बहुत ही कम करती। जब यह बताने की बात आती कि मैंने सत्य की खोज कैसे की, परमेश्वर के वचनों का अभ्यास कैसे किया, कैसे विश्वास के साथ अपना कर्तव्य निभाया और कैसे परमेश्वर का मार्गदर्शन देखा, तो मैं इनके बारे में खूब बोलती और हर छोटी बात भी बहुत बारीकी से बताती। चूँकि मैंने काफी समय तक इसी तरह से संगति की, इसलिए दूसरों को लगता कि मैं सत्य का अनुसरण करने में बहुत अच्छी हूँ और मैं हमेशा अभ्यास का मार्ग ढूँढ़ सकती हूँ। मुश्किलों से सामना होने पर वे संगति के लिए मुझे ही ढूँढ़ते।

कुछ समय बाद कलीसिया का कार्य हर मामले में अच्छे से आगे बढ़ने लगा। लोगों की आस्था बढ़ने लगी और अब ज्यादा से ज्यादा लोग अपना कर्तव्य निभाना चाहने लगे। इस कामयाबी को देखकर मुझे और भी लगने लगा कि मैं कलीसिया की मजबूत स्तंभ हूँ। सभाओं में मैं हमेशा तनकर खड़ी होती और जोरदार ढंग से अपनी बात कहती। मुझे लगा कि कलीसिया की अगुआ के तौर पर मैं बेहतरीन काम कर रही हूँ और मेरा पद मेरी काबिलियत के मुताबिक है। दूसरों के साथ काम करते हुए मैं हमेशा लोगों की अगुआई करती। मैं यह दिखाती कि मैं उनसे बेहतर हूँ, ताकि वे मेरी प्रशंसा करें और मेरा कहा मानें। एक बार हमें सभा के लिए एक मकान किराये पर लेना था। एक उपयाजक और मेरे साथ काम करने वाले एक भाई उस मकान को देखने गए। मैंने सोचा : "ऐसे अहम मामले में मेरी बात मानी जानी चाहिए। जब तक मैं इस मकान को नहीं देख लेती, आप इसे मंजूरी नहीं दे सकते।" वास्तव में, मैं जानती थी कि यह भाई वरिष्ठ है और इसके पास मुझसे ज्यादा अनुभव है, और वह मकान सही होगा या नहीं, यह बात वह मुझसे बेहतर बता सकता है। लेकिन मैंने इस बारे में अपना दिमाग लड़ाया कि मैं खुद को ज्यादा चतुर कैसे दिखा सकती हूँ, और सोचा : "कोई मकान किराये पर लेते समय अन्य किन बातों और मुद्दों पर विचार करना चाहिए?" इसलिए मैंने कुछ सवाल उठाए और उन्हें जाकर और ज्यादा जाँच-पड़ताल करने के लिए कहा। आखिर, उस मकान में कुछ समस्याएँ निकल आईं और जब मेरे सहकर्मियों को उनका पता चला, तो उन्होंने कहा, "हम काफी शर्मिंदा हैं। हम आपसे वरिष्ठ हैं, लेकिन हमने चीजों पर उतनी सावधानी से गौर नहीं किया, जितना कि आपने किया।" यह सुनकर मुझे काफी खुशी हुई। तब से हर कोई सवालों के जवाब ढूँढ़ने और चीजों की चर्चा करने मेरे पास आने लगा। कुछ वक्त बीतने के बाद, जिन लोगों के साथ मैं काम करती थी, वे थोड़े नकारात्मक होने लगे और हर बात पर मेरी राय मिलने का इंतजार करने लगे। वे मुझ पर ज्यादा से ज्यादा निर्भर रहने लगे।

धीरे-धीरे मैंने देखा कि सहकर्मियों के बीच मेरी प्रतिष्ठा अधिक स्थापित होती जा रही है और कलीसिया की हर छोटी-बड़ी बात में मेरी राय जरूरी समझी जाने लगी है। भाई-बहन हर मुश्किल घड़ी में संगति के लिए मेरी राह देखा करते। मुझे लगा कि मेरे बिना कलीसिया का काम नहीं चलने वाला, और मैं अकसर बहुत आत्मतुष्ट महसूस करने लगी। कभी-कभी मैं सोचती कि जिन लोगों का सम्मान किया जाता है, उनका दुर्भाग्य से सामना होगा, और मैं परेशान होकर खुद से पूछती : "हर कोई मेरा इतना आदर करता है—क्या मैं भटक गई हूँ?" लेकिन फिर मैं सोचती : "मैं एक अगुआ हूँ। भाई-बहन तो अपनी समस्याएँ लेकर मेरे पास आएँगे ही। उनकी कुछ समस्याओं को हल करने में मैं उनकी मदद भी कर सकती हूँ। उनका मुझ पर भरोसा करना तो सामान्य बात है! ऐसे इंसान के साथ भला कौन नहीं होना चाहेगा, जो उसकी मदद करता है?" इसलिए मैंने पवित्र आत्मा की फटकारें और चेतावनियाँ अनदेखी कर दीं, और अपनी हालत या उस मार्ग की जाँच-पड़ताल नहीं की, जिस पर मैं चल रही थी। इसके बजाय, मैं बस उसी पुराने गलत मार्ग पर चलती रही। जब परमेश्वर ने मुझे ताड़ना दी और मुझे अनुशासित किया, तब कहीं जाकर मेरा सुन्न हृदय जागरूक होना शुरू हुआ।

एक सुबह जब मैं नींद से जागी, तो मेरी बाईं आँख में बहुत दर्द हो रहा था। उससे लगातार पानी निकल रहा था, और जब मैंने आईने में देखा तो पाया कि मेरे चेहरे का पूरा बायाँ हिस्सा सूज गया था। मैं न तो अपनी आँख बंद कर पा रही थी और न ही मुँह घुमा सकती थी। मुझे समझ नहीं आया कि हुआ क्या है। उस दिन दोपहर बाद की सभा में एक बहन मुझे देखकर हैरान रह गई और बोली, यह तो चेहरे का लकवा है और मुझे फौरन इलाज की जरूरत है। अगर मैंने देर की, तो मेरा चेहरा फिर कभी सामान्य नहीं हो पाएगा। यह एक जोरदार झटका था, जिससे मेरा दिमाग बिलकुल सुन्न पड़ गया। इतनी कम उम्र में मुझे ऐसी बीमारी कैसे हो सकती है? अगर उसकी बात सही है और मेरा चेहरा टेढ़ा हो गया, तो मैं अपना कर्तव्य कैसे निभा पाऊँगी? लोगों का सामना कैसे कर पाऊँगी? मुझे बहुत घबराहट महसूस होने लगी और फिर मेरा दिल कमजोर पड़ने लगा। दूसरे सभी लोग मेरी बीमारी की चर्चा कर रहे थे, लेकिन मेरे दिमाग में उथल-पुथल मची हुई थी। मुझमें जरा-सी भी ताकत नहीं बची थी।

उस दिन घर आते हुए मेरे पैर नहीं उठ रहे थे। मैं परमेश्वर से प्रार्थना करना चाहती थी, लेकिन नहीं जानती थी कि क्या कहूँ। मैं बस परमेश्वर से मुझे राह दिखाने, मेरे दिल को शांत करने और अपनी इच्छा से अवगत कराने की गुहार लगाती रही। अचानक परमेश्वर के वचनों का एक भजन मेरे खयाल में आया : "जब तुम पर बीमारी का कष्ट आ पड़ता है, तो तुम्हें उसका अनुभव किस तरह करना चाहिए? तुम्हें प्रार्थना करने के लिए परमेश्वर के सामने आना चाहिए, उसकी इच्छा समझने की कोशिश करनी चाहिए और इस बात की जाँच करनी चाहिए कि तुमने किस तरह के पाप किए हैं या किन भ्रष्टाचारों से अभी तक मुक्ति नहीं पाई है। तुम्हें शारीरिक कष्ट उठाने ही होंगे। केवल कष्ट उठाने के द्वारा ही लोग निरंकुशता छोड़ सकते हैं और हमेशा परमेश्वर के सामने रह सकते हैं। जब लोग परेशानी महसूस करते हैं, तो वे हमेशा प्रार्थना करते हैं और इस बात पर विचार करते हैं कि उन्होंने कुछ ग़लती तो नहीं की या किसी तरह परमेश्वर को नाराज तो नहीं कर दिया। यह उनके लिए फायदेमंद है। जब लोग बहुत दर्द और परीक्षण से गुजरते हैं, तो निश्चित रूप से यह संयोग से नहीं होता" ("मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ" में 'बीमारी का प्रहार होने पर परमेश्वर की इच्छा की खोज करनी चाहिए')। परमेश्वर के वचन कहते हैं : "जब लोग बहुत दर्द और परीक्षण से गुजरते हैं, तो निश्चित रूप से यह संयोग से नहीं होता।" परमेश्वर के वचनों ने मुझे एहसास कराया कि यह बीमारी कोई संयोग नहीं है। इसके पीछे यकीनन परमेश्वर की नेक इच्छा है और वह मुझे अनुशासित कर रहा है। मुझे ईमानदारी से आत्मचिंतन करके यह पता लगाना होगा कि मैंने कैसे परमेश्वर को नाराज कर दिया। मैं परमेश्वर के सामने आकर प्रार्थना करने लगी : "सर्वशक्तिमान परमेश्वर! मैं अब बीमार हूँ और अच्छी तरह जानती हूँ कि तुम मुझे अनुशासित कर रहे हो, तुम मुझे चेतावनी देने के लिए इस बीमारी का इस्तेमाल कर रहे हो, ताकि मैं आत्मचिंतन करूँ। लेकिन मैं बिलकुल सुन्न पड़ गई हूँ। मैं अपनी समस्याओं का पता नहीं लगा पाई हूँ। कृपा करके मुझे प्रबुद्ध करो, ताकि इस बीमारी के जरिये मैं अपना सबक सीख सकूँ।" प्रार्थना के बाद मैं इस बारे में सोचती रही, लेकिन जान नहीं पाई कि मैंने कैसे परमेश्वर को नाराज कर दिया। इसलिए मैंने फिर परमेश्वर के पास आकर सच्चे मन से प्रार्थना की और उससे राह दिखाने के लिए कहा। मैं कई दिनों तक इसी तरह प्रार्थना करती रही। परमेश्वर का धन्यवाद कि उसने मेरी पुकार सुन ली। कुछ ही दिनों में परमेश्वर ने ऐसे हालात बनाए, जिससे कि मैं अपनी समस्याएँ जान सकूँ।

एक दिन मैं एक्यूपंक्चर के लिए बहन झाओ के घर गई। उनके पूरे परिवार ने इस डर से मेरा हालचाल पूछा कि शायद मैं निराश महसूस कर रही हूँगी। एक्यूपंक्चर के दौरान उसने बीमारी की रोकथाम के सिद्धांत पढ़कर सुनाए। उसने मुझे चिंता छोड़कर प्रार्थना करने, परमेश्वर पर भरोसा करने और आस्था रखने की सलाह दी, और यह भी कहा कि इलाज से मैं जल्दी ही ठीक हो जाऊँगी। लेकिन चूँकि पहले उसने कहा था कि फौरन इलाज न होने पर मेरा चेहरा हमेशा के लिए टेढ़ा हो सकता है, इसलिए मैं बहुत डर गई थी। लेकिन उन्हें अपनी इतनी अधिक फिक्र करते देख मैंने सोचा : "अगर दूसरों को पता चला कि मैं असल में कैसा महसूस कर रही हूँ, तो क्या वे यह नहीं सोचेंगे कि मेरा आध्यात्मिक कद छोटा है? जब भी कोई परीक्षण का सामना करता है या बीमार होता है, तो मैं आस्था से जुड़े सत्यों पर उसके साथ संगति करती हूँ, तब मुझे अपनी आस्था काफी मजबूत महसूस होती है। लेकिन अब जबकि मैं अचानक बीमार पड़ गई हूँ, तो मैं अपनी आस्था की कमी प्रदर्शित कर रही हूँ, और चिंता और भय व्यक्त कर रही हूँ। क्या हर कोई यह नहीं सोचेगा कि मैं सिर्फ सिद्धांतों का प्रचार कर रही थी?" इसलिए मैंने मुसकराते हुए बहन झाओ से कहा, "मैं असल में थोड़ा कमजोर महसूस कर रही हूँ क्योंकि मैं बीमार हूँ, लेकिन मेरा मानना है कि सब-कुछ परमेश्वर के हाथों में है। यह शारीरिक तकलीफ तो कुछ भी नहीं है। मुझे सबसे ज्यादा तकलीफ इस बात से है कि मैं परमेश्वर की इच्छा या अपनी समस्याओं को नहीं जान पा रही हूँ। यही बात मुझे सबसे अधिक परेशान करती है।" उन्होंने प्रशंसा भरी नजरों से मेरी ओर देखते हुए कहा, "अब आपको अपनी बीमारी के बारे में आत्मचिंतन करना चाहिए। जाँच-पड़ताल करके खुद को समझने की कोशिश करनी चाहिए और इलाज भी कराना चाहिए। हो सकता है कि आप इसलिए बीमार हो गई हों, क्योंकि आपने हमेशा बहुत कड़ी मेहनत की। आप सुबह से शाम तक अपना कर्तव्य निभाती रहीं और हम सब इसका सम्मान भी करते हैं। आप तो अब भी अपना कर्तव्य निभाने जाना चाहती हैं। इतनी ज्यादा फिक्र न करें। मैंने आपके साथ काम करने वाली बहन को भी फटकार लगाई कि वह अपने हिस्से का काम नहीं कर रही है। मैंने उसे कलीसिया के काम पर ज्यादा ध्यान देने की याद दिलाई है।" जब उसने ऐसा कहा, तो मुझे थोड़ा असहज महसूस हुआ, फिर मैंने यह कहते हुए उन्हें उनकी गलती का एहसास कराया, "सिर्फ मैं ही कलीसिया का काम नहीं करती। मुझे इतना महत्त्व न दें।" उस दिन घर लौटते हुए मैंने सोचा : "वह मेरी वजह से उस बहन की इतनी आलोचना कैसे कर सकती है? क्या मैं उसकी नजरों में दूसरों से अधिक जिम्मेदार हूँ? जरूर मैं हमेशा खुद की प्रशंसा करती रहती हूँ और दूसरों को नीचा दिखाती रहती हूँ।" मैंने सोचा कि कैसे मैंने अपनी कमजोरियाँ बहन झाओ से छिपा ली थीं और ऐसी मजबूत आस्था होने का दिखावा किया था—क्या मैंने उसे धोखा नहीं दिया? मैं इस बारे में सोच ही रही थी कि सामने से बहन झांग को अपनी ओर आते देखा। उसने मेरी फिक्र करते हुए कहा, "आपको अपना पूरा ध्यान रखना होगा। अगर आप इस बीमारी की वजह से कमजोर पड़ गईं, तो हम क्या करेंगे?" उसे इतनी बेबाकी से यह कहते सुनकर मुझे बहुत डर लगा। रास्ते पर चलते हुए मैं उसकी कही बातों के बारे में सोचती रही। मुझे अंदर से घबराहट महसूस होने लगी, और मैंने सोचा : "मैं बस एक मामूली कलीसिया-अगुआ हूँ। कलीसिया मेरे बिना भी अच्छी तरह चल सकती है। वह ऐसा कैसे कह सकती है कि मेरे बिना वे क्या करेंगी? उनका ऐसा कहना यही दिखाता है कि मैंने उनके दिलों में जगह बना ली है। दिल परमेश्वर का मंदिर है, अगर मैंने उसमें जगह बना ली है, तो क्या मैं परमेश्वर का विरोध नहीं कर रही हूँ?" मैंने सोचा कि कैसे मैं हमेशा लोगों का अनुमोदन और प्रशंसा पाना चाहती थी, लेकिन जब मैंने उस बहन को ऐसा कहते हुए सुना, तो मैं परेशान हो गई, और मुझे डर लगने लगा। मैंने सोचा, "क्या मैंने दूसरे भाई-बहनों को भी धोखा दिया है? अगर दूसरे लोग भी बहन झांग की तरह ही सोचते हैं, तो क्या इसका मतलब यह नहीं कि मैं लोगों को अपने ही सामने लेकर आई हूँ? मैं मसीह-विरोधियों के मार्ग पर चल रही हूँ!" मैंने कुछ मसीह-विरोधियों के बारे में सोचा, जिन्हें मैंने पहले निष्कासित होते देखा था, और मेरी रीढ़ में एक ठंडी सिहरन-सी दौड़ गई। मुझे लगा, जैसे किसी भयानक आपदा से मेरा सामना हो गया हो।

घर पहुँचकर मैंने परमेश्वर के वचनों की अपनी किताब उठाई और यह अंश पढ़ा : "अहंकारी प्रकृति के लोग परमेश्वर की अवज्ञा करते हैं, उसका प्रतिरोध करते हैं, ऐसे कार्य करते हैं जिनसे परमेश्वर की आलोचना होती है, वे उसे धोखा देते हैं, अपना उत्कर्ष करने और अपना राज्य स्थापित करने का प्रयत्न करने वाले काम करते हैं। मान लो, किसी देश में बीस हज़ार लोगों को परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करना हो, और वहाँ कार्य करने के लिए तुम्हारे जाने की व्यवस्था की जाए, और मैं तुम्हें एक महीने तक अनदेखा कर, तुम्हें अपने बलबूते पर कार्य करने का अधिकार दे दूँ, दस दिन भी नहीं बीतते कि सब लोग तुम्हें जानने लगते हैं; और एक महीने के भीतर ही वे तमाम लोग तुम्हारे आगे घुटने टेक देते हैं, दिल खोलकर तुम्हारी प्रशंसा करते हैं, कहते हैं कि तुम्हारे उपदेशों में अंतर्दृष्टि है, और लगातार इस बात का दावा करते हैं कि हमें तुम्हारे कथनों की ही आवश्यकता थी, तुमने 'परमेश्वर' शब्द बोले बिना ही हमारी अपेक्षाएँ पूरी कर दी। तुमने यह कार्य कैसे किया होगा? उन लोगों की ऐसी प्रतिक्रिया से सिद्ध होता है कि तुम जो काम कर रहे थे, उसमें परमेश्वर के लिए गवाही देना शामिल नहीं था; बल्कि तुम्हारी अपनी गवाही और तुम्हारा अपना दिखावा शामिल था। तुम ऐसा परिणाम कैसे प्राप्त कर पाए? कुछ लोग कहते हैं, 'मैं सत्य की संगति करता हूँ; मैंने अपनी गवाही बिल्कुल नहीं दी!' तुम्हारा रवैया, तुम्हारा अंदाज़, परमेश्वर के स्थान से लोगों के साथ संगति करने का प्रयास करने जैसा है, न कि एक भ्रष्ट इंसान के स्थान पर खड़े होने जैसा। तुम्हारी हर बात में बड़बोलापन और लोगों से अपेक्षाएँ करना है। इसलिए, तुम जो परिणाम हासिल करोगे, वो लोगों से अपनी पूजा करवाना होगा, लोग तुमसे ईर्ष्या करेंगे, तुम्हारी प्रशंसा करेंगे, और ऐसा तब तब चलेगा जब तक लोग तुम्हारे बारे में जान नहीं लेते, तुम्हारी गवाही नहीं दे देते, तुम्हें ऊँचा नहीं उठा देते, तुम्हारी चटुकारिता कर-करके तुम्हें आसमान पर नहीं बैठा देते। और जब ऐसा होगा, तो तुम खत्म हो जाओगे; तुम असफल हो चुके होगे! क्या तुम लोग फिलहाल इसी रास्ते पर नहीं चल रहे हो? अगर तुम्हें कुछ हज़ार या हज़ारों लोगों की अगुआई करने के लिए कह दिया जाए, तो तुम गर्व से फूल जाते हो। तुम्हारे अंदर अहंकार आ जाता है, तुम परमेश्वर का स्थान हथियाने का प्रयास करने लगते हो, बतियाने और भाव-भंगिमाएँ दिखाने लगते हो, तुम्हें पता नहीं होता कि क्या पहनना है, क्या खाना है और कैसे चलना है। अपने से निम्न-स्तर के अधिकतर लोगों से तुम मिलना भी पसंद नहीं करते, धीरे-धीरे तुम्हारा पतन होने लगता है और तुम महादूत की तरह मार गिराए जाते हो। तुम लोग ऐसा कर सकते हो, है न? तो, तुम लोगों को क्या करना चाहिए? अगर वाकई किसी दिन तुम लोगों के बाहर जाकर कार्य करने की व्यवस्था कर दी जाए, और तुम ऐसी हरकतें करने लगो, तो कार्य का विस्तार कैसे होगा? क्या समस्या पैदा नहीं हो जाएगी? फिर कौन तुम लोगों को बाहर जाने देने की हिम्मत दिखाएगा? तुम जाने के बाद वापस नहीं आओगे; तुम परमेश्वर की किसी बात पर ध्यान नहीं दोगे, तुम बस दिखावे में लगकर, अपनी ही गवाही देते रहोगे, जैसे कि तुम लोगों का उद्धार कर रहे हो, परमेश्वर का कार्य कर रहे हो, लोगों को यह महसूस कराओगे मानो वहाँ परमेश्वर प्रकट होकर कार्य कर रहा हो—जब लोग तुम्हारी पूजा करेंगे तो तुम आनंदित हो जाओगे, और जब लोग तुम्हें परमेश्वर का दर्जा देंगे, तो उसमें तुम्हारी मौन स्वीकृति होगी। उस अवस्था में पहुँचने पर तुम खत्म हो जाओगे; तुम्हें रद्दी की टोकरी में फेंक दिया जाएगा। तुम्हारी अहंकारी प्रकृति ने कब तुम्हारा विनाश कर दिया, तुम्हें पता भी नहीं चलेगा। यह मसीह-विरोधी राह पर चलने वाले व्यक्ति का एक उदाहरण है। इस मुकाम पर पहुँचने वाले लोग विवेक गँवा चुके होते हैं; उनका ग्रहणबोध कार्य करना बंद कर चुका होता है" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अहंकारी स्वभाव ही परमेश्वर के प्रति मनुष्य के प्रतिरोध की जड़ है')। "कुछ लोग बार-बार अपने बारे में गवाही देने, अपनी शक्ति बढ़ाने और लोगों एवं हैसियत के लिए परमेश्वर के साथ प्रतिस्पर्धा करने हेतु अपने पदों का उपयोग कर सकते हैं। वे लोगों से अपनी आराधना करवाने के लिए विभिन्न तरीकों एवं साधनों का उपयोग करते हैं और लोगों को जीतने एवं उनको नियंत्रित करने की लगातार कोशिश करते हैं। यहाँ तक कि कुछ लोग जानबूझकर लोगों को यह सोचने के लिए गुमराह करते हैं कि वे परमेश्वर हैं ताकि उनके साथ परमेश्वर की तरह व्यवहार किया जाए। वे किसी को कभी नहीं बताएँगे कि उन्हें भ्रष्ट कर दिया गया है-कि वे भी भ्रष्ट एवं अहंकारी हैं, उनकी आराधना नहीं करनी है और चाहे वे कितना भी अच्छा करते हों, यह सब परमेश्वर द्वारा उन्हें ऊँचा उठाने के कारण है और वे वही कर रहे हैं जो उन्हें वैसे भी करना ही चाहिए। वे ऐसी बातें क्यों नहीं कहते? क्योंकि वे लोगों के हृदय में अपना स्थान खोने से बहुत डरते हैं। इसीलिए ऐसे लोग परमेश्वर को कभी ऊँचा नहीं उठाते हैं और परमेश्वर के लिए कभी गवाही नहीं देते हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I')। "वे सभी जो अधोगति पर होते हैं स्वयं का उत्कर्ष करते हैं और स्वयं की गवाही देते हैं। वे स्वयं के बारे में शेखी बघारते हैं और आत्म-प्रशंसा करते हैं, और उन्होंने परमेश्वर को हृदय में तो बिल्कुल नहीं लिया है। मैं जिस बारे में बात कर रहा हूँ, क्या तुम लोगों को उसका कोई अनुभव है? बहुत से लोग लगातार खुद के लिए गवाही दे रहे हैं : 'मैं इस तरह से या उस तरह से पीड़ित रहा हूँ; मैंने फलाँ-फलाँ कार्य किया है और परमेश्वर ने मेरे साथ फलाँ-फलाँ ढंग से व्यवहार किया है; उसने मुझे ऐसा-ऐसा करने के लिए कहा; वह विशेष रूप से मेरे बारे में ऊँचा सोचता है; अब मैं फलाँ-फलाँ हूँ।' वे जानबूझकर एक निश्चित लहजे में बोलते हैं, और निश्चित मुद्राएँ अपनाते हैं। अंतत: कुछ लोग इस विचार पर पहुँचते हैं कि ये लोग परमेश्वर हैं। एक बार जब वे उस बिंदु पर पहुँच जायेंगे, तो पवित्र आत्मा उन्हें लंबे समय पहले ही छोड़ चुका होगा। यद्यपि, इस बीच, उन्हें नजरअंदाज किया जाता है, और निष्कासित नहीं किया जाता है, उनका भाग्य निर्धारित किया जाता है, और वे केवल अपने दण्ड की प्रतीक्षा कर सकते हैं" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'लोग परमेश्वर से बहुत अधिक माँगें करते हैं')। परमेश्वर के वचनों ने मेरे दिल को किसी तलवार की तरह बेध दिया। मेरी हालत बिलकुल वैसी थी, जैसा परमेश्वर के वचनों में कहा गया था; मैंने हमेशा खुद को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया और अपने कर्तव्य में दिखावा किया। जबसे मैं अगुआ बनी, मैंने सोचा कि अगुआ होने के नाते मुझे दूसरों से बेहतर होना चाहिए और मेरा आध्यात्मिक कद बड़ा होना चाहिए, ताकि मुझे दूसरों का अनुमोदन और प्रशंसा मिल सके। जब मैंने अपने अनुभवों के बारे में संगति की, तो मैंने बस दिखावा किया, अपनी कमजोरी और भ्रष्टता के बारे में शायद ही कभी कोई बात की, इस डर से कि अगर उन्हें पता चला कि मैं भी उन्हीं की तरह भ्रष्ट हूँ, तो उनके दिलों में मेरे लिए आदर नहीं रहेगा। जब मैं बीमार पड़ी, तो निराश होकर शिकायत करने लगी, मुझे काफी डर लगा, लेकिन अपनी छवि बनाए रखने के लिए मैंने अपनी सच्ची भावनाओं को छिपाया और सिर्फ सकारात्मक चीजों की बात की, ताकि दूसरे मेरी आराधना करें और सोचें कि मैं कितनी सकारात्मक हूँ, दूसरों के मुकाबले मुझमें कितनी अधिक आस्था है। एक अगुआ के तौर पर मुझसे हर हाल में देर तक काम करने और अधिक पीड़ा सहन करने की उम्मीद की जाती थी। लेकिन मैं हमेशा जानबूझकर भाई-बहनों को दिखाती थी कि मैं कितनी अधिक व्यस्त रहती हूँ, कितनी देर तक काम करती हूँ और कितनी अधिक मेहनत करती हूँ, ताकि वे यही सोचें कि मैं कितनी अधिक जिम्मेदार और मेहनती हूँ। अपने कर्तव्य में मुझे साफ तौर पर पवित्र आत्मा की वजह से ही कामयाबी मिली थी, लेकिन मैंने कभी परमेश्वर की बड़ाई नहीं की, बस यही दिखावा करती रही कि मैंने कितना अधिक कष्ट उठाया और त्याग किया, ताकि हर कोई मेरे बारे में यही सोचे कि मैं कलीसिया की मजबूत स्तंभ हूँ, और मेरे बिना कोई काम नहीं हो सकता। मैंने हमेशा इसी तरह संगति की और दूसरों को धोखा दिया, जिसकी वजह से मुझे इस बीमारी के जरिये अनुशासित किया गया। लेकिन दूसरों ने यही माना कि मैं कड़ी मेहनत की वजह से बीमार पड़ी हूँ, यहाँ तक कि उन्होंने उस बहन को भी, जिसके साथ मैं काम करती थी, अपनी जिम्मेदारी न निभाने के कारण फटकारा, मानो मैं कलीसिया के लिए सबसे बड़ा बोझ उठा रही थी। इस तरह मैंने खुद का उत्कर्ष और दिखावा किया, दूसरों को धोखा देकर बेबस करती रही और उन्हें अपने ही सामने लाती रही। मैं तो खुले तौर पर परमेश्वर से शत्रुता कर रही थी। यह सोचकर मैं डरे बिना नहीं रह सकी। मैंने खुद का दिखावा करने और दूसरों को धोखा देने के लिए सभी तरह के साधनों का इस्तेमाल किया, ताकि दूसरे मेरा सम्मान और मेरी आराधना करें, जिसके कारण वे मुझ पर आँखें मूँदकर इतना भरोसा करने लगे कि उनके दिलों में परमेश्वर के लिए कोई जगह नहीं रही। हर चीज में उन्हें मेरी राय और अनुमोदन की जरूरत होती थी—क्या मैं कलीसिया में किसी महारानी की तरह शासन नहीं कर रही थी? कलीसिया परमेश्वर की आराधना करने की जगह होनी चाहिए। खुद का उत्कर्ष करके और दूसरों को अपने सामने लाकर क्या मैं परमेश्वर की जगह लेने और उसे एक पुतला साबित करने की कोशिश नहीं कर रही थी? मैं बिलकुल एक मसीह-विरोधी की तरह परमेश्वर का विरोध कर रही थी और उससे विश्वासघात कर रही थी—मैंने परमेश्वर के स्वभाव का अपमान करने का भयानक पाप किया था! मुझे काफी डर लगने लगा। मैं इसलिए बीमार पड़ी थी, क्योंकि मैंने परमेश्वर को नाराज किया था, और अब वह अपना धार्मिक स्वभाव दिखा रहा था। इतनी संवेदनहीन और विद्रोही होने के कारण मुझे खुद से नफरत हो गई, और मैंने देखा कि कैसे परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव कोई अपमान सहन नहीं करता। मैं परमेश्वर के सामने गिरकर प्रार्थना और पश्चात्ताप करने लगी : "सर्वशक्तिमान परमेश्वर! पिछले साल से मैं तुम्हारी सेवा न करके दुष्टता करती रही हूँ। मैंने लोगों को खुद के सामने लाकर, उन पर काबू करने के लिए तुम्हारे साथ होड़ की। मैंने कितनी नीचता और बेशर्मी से एक मसीह-विरोधी की तरह काम किया। प्यारे परमेश्वर, मैंने बहुत बड़ी गलती की है।" पछतावे से भरकर मुझे परमेश्वर का सामना करने में बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई।

फिर मैं सोचने लगी : "मैं ऐसे गलत मार्ग पर कैसे चल पड़ी? दुनिया में ऐसी क्या चीज है, जिसके कारण ऐसा हुआ?" मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : "कुछ लोग विशेष रूप से पौलुस को आदर्श मानते हैं। उन्हें बाहर जा कर भाषण देना और कार्य करना पसंद होता है, उन्हें सभाओं में भाग लेना और प्रचार करना पसंद होता है; उन्हें अच्छा लगता है जब लोग उन्हें सुनते हैं, उनकी आराधना करते हैं और उनके चारों ओर घूमते हैं। उन्हें पसंद होता है कि दूसरों के मन में उनकी एक हैसियत हो, और जब दूसरे उनके द्वारा प्रदर्शित छवि को महत्व देते हैं, तो वे उसकी सराहना करते हैं। आओ हम इन व्यवहारों से उनकी प्रकृति का विश्लेषण करें: उनकी प्रकृति कैसी है? यदि वे वास्तव में इस तरह से व्यवहार करते हैं, तो यह इस बात को दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि वे अहंकारी और दंभी हैं। वे परमेश्वर की आराधना तो बिल्कुल नहीं करते हैं; वे ऊँची हैसियत की तलाश में रहते हैं और दूसरों पर अधिकार रखना चाहते हैं, उन पर अपना कब्ज़ा रखना चाहते हैं, उनके दिमाग में एक हैसियत प्राप्त करना चाहते हैं। यह शैतान की विशेष छवि है। उनकी प्रकृति के पहलू जो अलग से दिखाई देते हैं, वे हैं उनका अहंकार और दंभ, परेमश्वर की आराधना करने की अनिच्छा, और दूसरों के द्वारा आराधना किए जाने की इच्छा। ऐसे व्यवहारों से तुम उनकी प्रकृति को स्पष्ट रूप से देख सकते हो" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें')। "शैतान ने जब मनुष्यों को भ्रष्ट कर दिया, तो उनकी प्रकृति शैतानी हो गई। मनुष्य होते हुए भी लोगों ने मनुष्य की तरह बर्ताव करना बंद कर दिया है; बल्कि, वे मानवता के ओहदे को पार कर गए हैं। वे इंसान होने की इच्छा नहीं रखते; वे अब और ऊँचे स्तर की आकांक्षा करते हैं। और यह ऊँचा स्तर क्या है? वे परमेश्वर से बढ़कर होना चाहते हैं, स्वर्ग से बढ़कर होना चाहते हैं, और बाकी सभी से बढ़कर होना चाहते हैं। लोग इस तरह क्यों हो गए हैं, इसका मूल कारण क्या है? कुल मिलाकर यही नतीजा निकलता है कि मनुष्य की प्रकृति बहुत अधिक अहंकारी है। ... अहंकार की अभिव्यक्ति परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह और उसका विरोध है। जब लोग अहंकारी, दंभी और आत्मतुष्ट होते हैं, तो उनकी अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित करने और इच्छानुसार चीज़ों को करने की प्रवृत्ति होती है। वे दूसरों को भी अपनी ओर खींचकर उन्हें अपने आलिंगन में ले लेते हैं। लोगों का ऐसी हरकतें करने का अर्थ है कि उनके अहंकार का सार महादूत जैसा ही बन गया है। जब उनका अहंकार और दंभ एक निश्चित स्तर पर पहुँच जाता है, तो इससे यह तय हो जाता है कि वे महादूत हैं और वे परमेश्वर को दरकिनार कर देंगे। यदि तुम्हारा स्वभाव ऐसा ही अहंकारी है, तो तुम्हारे हृदय में परमेश्वर के लिए कोई स्थान नहीं होगा" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अहंकारी स्वभाव ही परमेश्वर के प्रति मनुष्य के प्रतिरोध की जड़ है')। परमेश्वर के वचनों ने मुझे अपनी समस्या के सार की स्पष्ट समझ दी और मैंने देखा कि क्यों मैंने हमेशा खुद का उत्कर्ष किया और क्यों अपने कर्तव्य में दिखावा किया। यह मेरी अहंकारी, दंभी प्रकृति के कारण हुआ। मैं जिस मार्ग पर चल रही थी, वह शुरू से ही गलत था। खुद का उत्कर्ष करके और अपने कर्तव्य में दिखावा करके मैं बिलकुल पौलुस की तरह बन गई थी। पौलुस अपना कार्य करते हुए हमेशा खुद का उत्कर्ष करता और खुद की गवाही देता था, और उसने अपने पत्रों में एक बार भी यह गवाही नहीं दी कि प्रभु ईशु देहधारी परमेश्वर है। सिर्फ यह गवाही दी कि उसने कितने कष्ट उठाए और कितने त्याग किए, और यहाँ तक कहा, "क्योंकि मेरे लिये जीवित रहना मसीह है" (फिलिप्पियों 1:21), और "मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्‍वास की रखवाली की है। भविष्य में मेरे लिये धर्म का वह मुकुट रखा हुआ है" (2 तीमुथियुस 4:7-8)। उसने लोगों को यह मानने पर मजबूर किया कि उसे मुकुट और इनाम मिलना चाहिए। मैंने देखा कि मेरी प्रकृति बिलकुल पौलुस जैसी है। मुझे इसमें आनंद आता है कि लोग मेरा सम्मान और मेरी आराधना करें, मेरे आसपास झुंड बनाकर चलें, और मैं जहाँ भी जाऊँ, लोग मेरा गुणगान करें। मैं बस लोगों के दिलों में जगह बनाना चाहती थी। जैसा कि परमेश्वर के वचन कहते हैं, मैंने देखा कि मेरी प्रकृति "अहंकार और दंभ, परेमश्वर की आराधना करने की अनिच्छा, और दूसरों के द्वारा आराधना किए जाने की इच्छा" से भरी है। मैं इतनी अहंकारी थी कि मुझे किसी चीज की समझ ही नहीं रही। मैं एक सृजित प्राणी के रूप में अपनी जगह लेने और परमेश्वर की आराधना करने में सक्षम नहीं थी, मैंने परमेश्वर को परमेश्वर नहीं समझा, बल्कि खुद का सम्मान बढ़ाया। मैंने अपने कर्तव्य में खुद को इस तरह ढाला कि लोग मेरा सम्मान करें, मेरी पूजा करें, जिसकी वजह से मैंने भाई-बहनों को धोखा दिया। समस्याएँ आने पर उन्होंने सिर्फ मुझ पर भरोसा किया और कार्य के सभी निर्णय मुझसे ही करवाए। मैं लोगों को अपने सामने लेकर आई और अपना ही साम्राज्य स्थापित कर लिया। ऐसा व्यवहार भला कैसे परमेश्वर को नाराज न करता, कैसे वह मुझसे नफरत न करता? मेरी बीमारी परमेश्वर की धार्मिकता थी, बुरे कर्म करने और परमेश्वर का विरोध करने के कारण मैं इसी लायक थी। मुझे अनुशासित करने और मेरे बुरे कर्मों पर विराम लगाने के लिए मैंने परमेश्वर का धन्यवाद किया।

यह एहसास होने पर मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की : "कल से मैं हर हाल में सत्य का अभ्यास करूँगी और देह-सुख त्याग दूँगी। मैं अपनी भ्रष्टता उजागर करूँगी, ताकि लोग मेरी कुरूपता देख सकें, मेरा असली चेहरा देख सकें और अब मेरी पूजा न करें।" अगली सुबह धार्मिक कार्यों के दौरान मैंने परमेश्वर के कुछ वचन पढ़े, जिनमें सच्चा और ईमानदार इंसान होने, परमेश्वर का उत्कर्ष करने और उसके लिए गवाही देने के बारे में बताया गया था। परमेश्वर के वचन कहते हैं : "जब तुम परमेश्वर के लिए गवाही देते हो, तो तुमको मुख्य रूप से इस बारे में अधिक बात करनी चाहिए कि परमेश्वर कैसे न्याय करता है और लोगों को कैसे दंड देता है, लोगों का शुद्धिकरण करने और उनके स्वभाव में परिवर्तन लाने के लिए किन परीक्षणों का उपयोग करता है। तुमको इस बारे में भी बात करनी चाहिए कि तुमने कितना सहन किया है, तुम लोगों के भीतर कितने भ्रष्टाचार को प्रकट किया गया है, और आखिरकार परमेश्वर ने कैसे तुमको जीता था; इस बारे में भी बात करो कि परमेश्वर के कार्य का कितना वास्तविक ज्ञान तुम्हारे पास है और तुमको परमेश्वर के लिए कैसे गवाही देनी चाहिए और परमेश्वर के प्रेम का मूल्य कैसे चुकाना चाहिए। तुम लोगों को इन बातों को सरल तरीके से प्रस्तुत करते हुए, इस प्रकार की भाषा का अधिक व्यावहारिक रूप से प्रयोग करना चाहिए। खोखले सिद्धांतों की बातें मत करो। वास्तविक बातें अधिक किया करो; दिल से बातें किया करो। तुम्हें इसी प्रकार अनुभव करना चाहिए। अपने आपको बहुत ऊंचा दिखाने की कोशिश न करो, और खोखले सिद्धांतों के बारे में बात न करो; ऐसा करने से तुम्हें बहुत घमंडी और तर्क हीन माना जाएगा। तुम्हें अपने असल अनुभव की वास्तविक, सच्ची और दिल से निकली बातों पर ज्यादा बात करनी चाहिए; यह दूसरों के लिए बहुत लाभकारी होगा और उनके समझने के लिए सबसे उचित होगा। तुम लोग परमेश्वर के सबसे कट्टर विरोधी थे और उनके प्रति समर्पित होने के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन अब परमेश्वर के वचनों के द्वारा तुम जीत लिए गए हो, इसे कभी नहीं भूलो। इन मामलों पर तुम्हें और विचार करना और सोचना चाहिए। एक बार जब लोग इसे ठीक से समझ जाएँगे, तो उन्हें गवाही देने का तरीका पता चल जाएगा; अन्यथा वे और अधिक बेशर्मी भरे मूर्खतापूर्ण कृत्य कर बैठेंगे" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है')। "'अनुभव साझा करने और संगति करने' का अर्थ है अपने हृदय के हर विचार, अपनी अवस्था, अपने अनुभवों और परमेश्वर के वचनों के ज्ञान, और साथ ही अपने भीतर के भ्रष्ट स्वभाव के बारे में बात करना और उसके बाद, अन्य लोग इन बातों को समझते हैं, और सकारात्मक को स्वीकार करते हैं और जो नकारात्मक है उसे पहचानते हैं। केवल यही साझा करना है, और केवल यही वास्तव में संगति करना है" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास')। परमेश्वर के वचनों से मैंने समझा कि सचमुच परमेश्वर का उत्कर्ष करने और उसके लिए गवाही देने के लिए हमें अपनी भ्रष्टता और विद्रोहशीलता के बारे में ज्यादा बात करनी होगी, अपनी असली स्थिति और विचार लोगों के सामने खोलकर रखने होंगे, अपनी नीच मंशाओं के बारे में बात करनी होगी, और बताना होगा कि हमने क्या किया और उसके क्या नतीजे रहे, और हमने परमेश्वर के वचनों का न्याय कैसे अनुभव किया और खुद को कैसे जाना। हमें अपना भ्रष्ट सार उजागर करके उसका विश्लेषण भी करना होगा, ताकि सभी लोग हमारी असलियत देख सकें, और बताना होगा कि कैसे परमेश्वर ने हमें ताड़ना देकर अनुशासित किया और हमारे मार्गदर्शन के लिए कैसे हालात बनाए, ताकि सभी लोग इंसान के लिए परमेश्वर के प्रेम को जान सकें। हमें खुद का बखान करने या दिखावा करने के बजाय सचमुच अपने दिल की गहराइयों से बात करनी होगी। अब अभ्यास का मार्ग मिल जाने के बाद मैंने संगति में लोगों के सामने खुलकर बताया कि किस तरह मैं मसीह-विरोधियों के मार्ग पर चल पड़ी थी। मैंने इस मार्ग पर चलने और लोगों को धोखा देने के कारण मिले भयानक नतीजों का विश्लेषण किया, और मैंने इस बारे में जितनी अधिक संगति की, उतनी ही स्पष्टता से मैंने खुद को जाना। बाद में लोगों ने कहा कि उन्हें इनमें से किसी भी बात का एहसास नहीं हुआ, वे मेरी चिकनी-चुपड़ी बातों और अच्छे कर्मों के झाँसे में आते रहे। एक बहन ने कहा, "मैं सोचती थी कि आप सत्य का अभ्यास करने में बहुत अच्छी हैं, क्योंकि आप परमेश्वर के वचन पढ़कर हमेशा सकारात्मक रह सकती हैं। अब मैंने समझा कि आप भी उतनी ही भ्रष्ट हैं, आप भी निराश और कमजोर हुईं, सभी भ्रष्ट इंसान एक जैसे हैं। हम किसी की पूजा नहीं कर सकते, न ही किसी को ऊँचे आसन पर बिठा सकते हैं।" दूसरी बहन ने कहा, "मैं सोचती थी कि आप बहुत मजबूत हैं और कभी भी आपके आसपास खुलकर बात नहीं करना चाहती थी। सोचती थी कि मैं आपकी तुलना में बहुत अधिक भ्रष्ट हूँ! आज हमारे सामने खुलकर सारी बातें बताने के बाद, मैं देख रही हूँ कि हम सब एक जैसे हैं।" बहनों को ऐसा कहते सुनकर मुझे काफी शर्मिंदगी महसूस हुई और मन पछतावे से भर गया। मैंने उनसे कहा, "अब मेरे बारे में ऊँचा मत सोचो। मैं मसीह-विरोधियों के मार्ग पर चल रही थी, मैंने तुम सभी को गुमराह किया।" फिर मेरे सहकर्मियों और सहयोगियों ने परमेश्वर के वचनों के जरिये खुद को जानने में मेरी मदद की, और अचानक मुझे लगा कि मैं उन सभी के काफी करीब आ गई हूँ। उस दिन घर आकर मुझे काफी सुकून महसूस हुआ। उस रात मैं अपनी बीमारी भूलकर एक बच्चे की तरह सोई। अगले दिन जब मैं सोकर उठी, तो यह देखकर काफी खुश हुई कि मेरा चेहरा पहले की तरह सामान्य हो गया था। एक ही रात में मेरी हालत बेहतर हो गई।

उसके बाद एक सभा में मैंने परमेश्वर के वचनों में यह पढ़ा : "आम तौर पर, जब उनकी बात आती है जिनके इरादे और उद्देश्य सही नहीं होते, और साथ ही उनकी जो दूसरों के द्वारा देखे जाना पसंद करते हैं, जो चीज़ों को करने के लिए उतावले होते हैं, जो बाधा डालने में उद्यत होते हैं, जो धार्मिक सिद्धांतों की झड़ी लगाने में अच्छे होते हैं, जो शैतान के अनुचर होते हैं, आदि—ऐसे लोग जब खड़े हो जाते हैं तो वे कलीसिया के लिए कठिनाइयाँ बन जाते हैं, और भाई-बहनों द्वारा परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने को व्यर्थ कर देते हैं। अगर तुम इस तरह के लोगों को ढोंग करते हुए पाओ, तो तुरंत उन पर प्रतिबंध लगा दो। यदि वे बार-बार फटकारे जाने पर भी न बदलें, तो उन्हें नुकसान उठाना पड़ेगा। यदि वे लोग जो अपने तौर-तरीक़ों में जिद्दी होते हैं, वे अपना बचाव करने और अपने पापों को ढँकने की कोशिश करें, तो कलीसिया को उन्हें तुरंत बहिष्कृत कर देना चाहिए और उनकी चालबाज़ी के लिए कोई जगह नहीं छोड़नी चाहिए। थोड़ा-सा बचाने की कोशिश में बहुत कुछ न खो देना; अपनी निगाह मुख्य बातों पर बनाये रखो" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 17')। परमेश्वर के वचनों ने मेरी पिछले साल भर की सबसे बड़ी खासियत उजागर कर दी। जब से मैं अगुआ बनी, मैंने हमेशा अपने हर काम में अगुआई करने का आनंद उठाया। मैंने दिखावा किया कि मैं बाकी सभी लोगों से बेहतर हूँ। अपने सहयोगियों से काम पर चर्चा करते समय, उनकी अलग राय होने के बावजूद, मैं हमेशा आगे बढ़कर अपनी "श्रेष्ठ" राय को सबसे अधिक तरजीह देती। मैं बढ़-चढ़कर काम करने वाली और सकारात्मक दिखती, लेकिन असल में मैं अपने हर काम में दिखावा करना चाहती थी और लोगों से अपनी प्रशंसा करवाना चाहती थी। इस बारे में सोचकर मुझे एहसास हुआ कि मेरी अहंकारी प्रकृति ने मुझे बहुत बेशर्म बना दिया था। लोग मेरी राय का सम्मान करते और मेरे साथ चीजों के बारे में चर्चा करते। वे वास्तविकता में जी रहे थे—वे तानाशाह या अहंकारी नहीं थे। लेकिन मैंने समझ लिया कि मैं उनसे बेहतर हूँ, मैं हमेशा दूसरों को नीचा और खुद को उनसे बहुत बेहतर दिखाना चाहती थी। यह सब कितना हास्यास्पद था। मैं "सम्राट के नए कपड़ों में" सम्राट की तरह महसूस करती थी, और मुझे कोई आत्मबोध नहीं था। मुझे पता नहीं था कि मैं कितनी बेशर्मी से पेश आ रही थी, बल्कि हर मौके पर मैंने दिखावा किया। अपने व्यवहार के बारे में सोचकर मैंने बहुत अपमानित और शर्मिंदा महसूस किया। मैं खुद को बहुत बेहतरीन मानती थी, क्योंकि मैंने कभी खुद को जाना ही नहीं। जिस मार्ग पर मैं चल रही थी, उसके बारे में सोचकर मुझे काफी डर लगा, खास तौर पर जब मैंने परमेश्वर के वचनों में पढ़ा कि जब हमारा सामना गलत मंशाओं वाले ऐसे लोगों से हो जाए, जिन्हें दिखावा करना पसंद है, तो हमें "तुरंत उन पर प्रतिबंध लगा" देना चाहिए, और अगर वे आत्मचिंतन न करके सिर्फ बहाने बनाएँ, तो "कलीसिया को उन्हें तुरंत बहिष्कृत कर देना चाहिए।" इसने परमेश्वर की धार्मिकता और प्रताप दिखाया। मैं स्वयं को मिले हर मौके पर दिखावा करती रही और आखिरकार मैंने अपने भाई-बहनों को धोखा दिया और उनसे अपनी पूजा करवाई। इसके कारण उनके दिलों में परमेश्वर के लिए कोई जगह नहीं रही। मैंने जिन लोगों के साथ काम किया, गुप्त रूप से उन्हें पुतला बना डाला और अब वे जिम्मेदारी से काम नहीं करते थे। कलीसिया में अनियंत्रित होकर मैंने सिर्फ नुकसान ही पहुँचाया और मुझे इसका एहसास तक नहीं हुआ, बल्कि मैंने खुद को एक उभरता सितारा मान लिया था। अगर परमेश्वर ने सख्ती से मेरा न्याय न किया होता, तो मैं अपने या उस गलत मार्ग के बारे में कुछ भी न जान पाती जिस पर मैं चल रही थी, या यह कि मैं उस मार्ग पर चल रही थी, जहाँ से वापसी नामुमकिन है। इसे समझने के बाद चीजों के बारे में मेरा नजरिया बदलने लगा। मैं सोचती थी कि अगर मैं ऐसी इंसान हूँ, जिसे लोग आदर से देखते हैं, तो थोड़ा-बहुत दिखावा करना कोई बड़ी बात नहीं, बल्कि यह तो और भी अच्छा है। अब मुझे एहसास हुआ कि ऐसी नीचता से दिखावा करना, जिससे कि लोग मेरे बारे में ऊँचा सोचें, शर्मनाक है। मुझे महसूस हुआ कि खुद को न समझना, स्वभाव में बदलाव लाने की कोशिश न करना, अपने अहंकारी स्वभाव के अनुसार चलना और हर मौके पर दिखावा करना कितनी घिनौनी बात है। जिनके पास इंसानियत होती है, वे अपना अहंकार त्याग सकते हैं, परमेश्वर में श्रद्धा रखते हैं, उचित आचरण करते हैं, व्यावहारिक तरीके से अपना कर्तव्य निभाते हैं, वाणी और कर्म दोनों से परमेश्वर की गवाही देते हैं। ऐसे लोग समझदारी से भरा और सम्मानित जीवन जीते हैं।

उसके बाद जब भी मैंने अनजाने में दिखावा किया, मुझे खुद से नफरत और पछतावा महसूस हुआ। फिर मैंने सचेत होकर खुद को याद दिलाया कि मैं चाहे जिसके साथ भी रहूँ, मुझे वास्तविक होना होगा और अपनी बड़ाई नहीं करनी होगी। खास तौर पर अपनी संगतियों में मुझे अधिक व्यावहारिक होना पड़ेगा और दिखावा नहीं करना होगा। अपने अनुभवों के बारे में संगति करने से पहले, मैं परमेश्वर की प्रार्थना करते हुए उससे मेरे दिल की निगरानी करने के लिए कहती, जिससे कि मैं अपनी मंशाएँ ठीक कर सकूँ और उसके लिए ज्यादा गवाही दे सकूँ। संगति के बाद मैं खुद से पूछती कि मैंने जो कुछ अभी कहा, उसमें किसी तरह का दिखावा तो नहीं था। कभी-कभी मुझे पता चलता कि मैंने जो भी कहा, उसमें थोड़ा-सा दिखावा जरूर था, इसलिए अगली बार जब उसी समूह से मेरा सामना होता, तो मैं अपनी बात खुलकर सामने रखती और अपने पिछले व्यवहार का विश्लेषण करती, ताकि सभी लोग मेरी बातों पर ध्यान दें और आँखें मूँदकर मेरी पूजा न करें। इस तरह से संगति करने के बाद भाई-बहन मेरे असली आध्यात्मिक कद को देख पाते और अब मेरे बारे में ऊँचा न सोचते।

मेरे साथ जो कुछ भी हुआ, उसके बारे में पीछे मुड़कर सोचूँ तो, परमेश्वर ने मुझे अपना कर्तव्य निभाने का एक मौका दिया, लेकिन मैं अपना राज कायम करने के लिए मसीह-विरोधियों के मार्ग पर चल पड़ी और परमेश्वर की दुश्मन बन गई। मैं परमेश्वर की बहुत अधिक ऋणी हूँ। अगर उसने मुझे उस बीमारी के जरिये अनुशासित न किया होता और उसके वचनों का न्याय न होता, तो मैं अब भी खुद को न जान पाती। मैं हमेशा "परमेश्वर की ताड़ना और न्याय प्रेम हैं ये जान लो" नामक भजन गाया करती थी, लेकिन मैंने कभी उसका वास्तविक अनुभव नहीं किया और न ही उसे समझ पाई। अब मैं सच में यह महसूस करती हूँ कि परमेश्वर का न्याय, ताड़ना और अनुशासन उसका सबसे बड़ा प्रेम और उद्धार हैं! परमेश्वर के प्रेम के बारे में विचार करने पर मुझे बहुत प्रेरणा मिली और मुझे पछतावा हुआ कि मैंने पहले सत्य का अनुसरण नहीं किया था। मैंने खुद से कहा कि मुझे एक ईमानदार इंसान बनने की कोशिश करनी होगी। सभाओं में मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में इस तरह संगति करने पर ध्यान दिया, जिससे कि परमेश्वर के लिए गवाही दी जा सके। अपने सहकर्मियों के साथ मैंने उनकी ऐसी राय का सम्मान करने और उसे स्वीकार करने पर ज्यादा जोर दिया जो सत्य के अनुरूप होती, और मैंने उन्हें नीचा दिखाना और पहले की तरह दिखावा करना बंद कर दिया। मैं और मेरे सहयोगी एक जैसा सोचने लगे, अब कोई भी किसी की अगुआई नहीं करता। समस्याएँ आने पर सभी लोग सिद्धांतों की खोज करते हैं और उन पर अमल करते हैं। मैं परमेश्वर के न्याय और ताड़ना की बहुत आभारी हूँ, जिनकी वजह से मैंने उसके धार्मिक स्वभाव को जाना और उसमें श्रद्धा रखने लगी। परमेश्वर की सेवा करते हुए मैंने एक सृजित प्राणी का अपना स्थान ग्रहण करने और अपना कर्तव्य अच्छे से निभाने की कोशिश की। मुझे बचाने के लिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर को मेरा धन्यवाद।

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