72. एक पाखंडी का पश्चाताप

शिनरुई, दक्षिण कोरिया

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "परमेश्वर की सेवा करना कोई सरल कार्य नहीं है। जिनका भ्रष्ट स्वभाव अपरिवर्तित रहता है, वे परमेश्वर की सेवा कभी नहीं कर सकते हैं। यदि परमेश्वर के वचनों के द्वारा तुम्हारे स्वभाव का न्याय नहीं हुआ है और उसे ताड़ित नहीं किया गया है, तो तुम्हारा स्वभाव अभी भी शैतान का प्रतिनिधित्व करता है जो प्रमाणित करता है कि तुम परमेश्वर की सेवा अपनी भलाई के लिए करते हो, तुम्हारी सेवा तुम्हारी शैतानी प्रकृति पर आधारित है। तुम परमेश्वर की सेवा अपने स्वाभाविक चरित्र से और अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के अनुसार करते हो। इसके अलावा, तुम हमेशा सोचते हो कि जो कुछ भी तुम करना चाहते हो, वो परमेश्वर को पसंद है, और जो कुछ भी तुम नहीं करना चाहते हो, उनसे परमेश्वर घृणा करता है, और तुम पूर्णतः अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार कार्य करते हो। क्या इसे परमेश्वर की सेवा करना कह सकते हैं? अंततः तुम्हारे जीवन स्वभाव में रत्ती भर भी परिवर्तन नहीं आएगा; बल्कि तुम्हारी सेवा तुम्हें और भी अधिक ज़िद्दी बना देगी और इससे तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव गहराई तक जड़ें जमा लेगा। इस तरह, तुम्हारे मन में परमेश्वर की सेवा के बारे में ऐसे नियम बन जाएँगे जो मुख्यतः तुम्हारे स्वयं के चरित्र पर और तुम्हारे अपने स्वभाव के अनुसार तुम्हारी सेवा से प्राप्त अनुभवों पर आधारित होंगे। ये मनुष्य के अनुभव और सबक हैं। यह दुनिया में जीने का मनुष्य का जीवन-दर्शन है। इस तरह के लोगों को फरीसियों और धार्मिक अधिकारियों के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। यदि वे कभी भी जागते और पश्चाताप नहीं करते हैं, तो वे निश्चित रूप से झूठे मसीह और मसीह विरोधी बन जाएँगे जो अंत के दिनों में लोगों को धोखा देते हैं। झूठे मसीह और मसीह विरोधी, जिनके बारे में कहा गया था, इसी प्रकार के लोगों में से उठ खड़े होंगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'धार्मिक सेवाओं का शुद्धिकरण अवश्य होना चाहिए')। परमेश्वर के वचनों का ये अंश मुझे पाखंडी फ़रीसियों, पादरियों और उन सभी मसीह विरोधियों की याद दिलाता था जिन पर अपने रुतबे का जुनून सवार रहता है। मुझे लगता था परमेश्वर इनके बारे में ही बात कर रहा है। मैं जानती थी सिद्धांतों के मुताबिक परमेश्वर उस चीज़ का खुलासा कर रहा है जो हम सभी के भीतर है, और मेरे भीतर भी उसी तरह का भ्रष्ट स्वभाव है। मगर वास्तव में मैं खुद को नहीं पहचानती थी, इसलिए मैंने खुद को उन फ़रीसियों, मसीह विरोधियों और पाखंडियों से अलग समझा। मैं उनके जैसी नहीं थी, न कभी हो सकती थी। मैं सालों से विश्वासी रही हूँ, मैंने बहुत से अच्छे काम किये हैं और अपने कर्तव्य में कीमत भी चुकायी है। कलीसिया मुझे जो भी कर्तव्य सौंपती, मैं उसे पूरे मन से निभाती थी। और तो और मुझे अगुआ बनने का भी कोई लालच नहीं था, मेरे पास रुतबा हो या न हो, इससे बेपरवाह होकर मैं अपना कर्तव्य निभाती थी। मैं मसीह विरोधी और पाखंडी कैसे हो सकती थी? मगर वास्तव में, मैं पूरी तरह अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में जी रही थी, और बाद में जब सत्य से मेरा सामना हुआ, तो मेरी ये धारणाएँ पूरी तरह बदल गईं।

मैं शहर के बाहर की कलीसिया के सुसमाचार कार्य की जिम्मेदारी निभाने के लिए गयी। कलीसिया का ये काम जल्द ही आगे बढ़ने लगा और सभी अगुआ मुझे काफ़ी मानने लगे। कभी-कभी काम से जुड़ी दूसरी बातों पर चर्चा करने के लिए वो मेरी मदद भी लेते। सबसे बड़ी बात, मैं कई सालों से विश्वासी थी और अपना कर्तव्य निभाने के लिए मुश्किलों का सामना कर सकती थी, इसलिए, भाई-बहन मेरा आदर करते थे। मैं भी खुद को दूसरों से ऊपर समझने लगी थी। मैंने कई सालों से आस्था रखी थी और प्रभारी भी थी, इसलिए मुझे लगा कि मैं दूसरों जैसी नहीं हो सकती, और मुझे उनसे बेहतर दिखना चाहिए। मुझे लगा जैसे मैं उनके जितनी भ्रष्ट नहीं हो सकती, मैं उनकी तरह नकारात्मक या कमज़ोर नहीं बन सकती। वरना, वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे? क्या वे ये नहीं कहेंगे कि इतने सालों तक आस्था रखने के बाद भी मेरा आध्यात्मिक कद कितना छोटा है, क्या वे मुझे तुच्छ नहीं समझेंगे? बाद में, अपने कर्तव्य के दौरान सिद्धांतों का उल्लंघन करने के कारण एक अगुआ ने मेरा निपटान किया। उन्होंने कहा कि इतने सालों तक विश्वासी रहने के बावजूद मुझे चीज़ों की समझ नहीं है और मुझमें सत्य की वास्तविकता नहीं है। ये बेहद शर्म और अपमान की बात थी, मगर फिर भी मैंने अपनी भ्रष्टता और कमियों पर विचार नहीं किया, अपनी कमियों को दूर करने के लिए सत्य की खोज नहीं की। बल्कि मैंने कुछ खोखली बातों और सिद्धांतों के बारे में बोलकर खुद को समझने का दिखावा किया, और आध्यात्मिक इंसान बनने का ढोंग करने लगी ताकि किसी को पता न चले कि मुझमें सत्य की वास्तविकता नहीं है।

एक बार की बात है, प्रभु में विश्वास करनेवाले एक सहकर्मी ने बताया कि वह सच्चे मार्ग की जांच-पड़ताल करना चाहता था। अगुआ ने मुझे फ़ौरन परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य की गवाही देने के लिए जाने को कहा। मैंने कहा कि मैं चली जाऊँगी, मगर मुझे पता चला कि उसकी कई ऐसी धारणाएँ हैं जिन्हें सुलझाना मुश्किल है। उस दौरान मैं काफ़ी व्यस्त थी, इसलिए मैंने ये काम कुछ समय के लिए टाल दिया। कुछ हफ़्तों बाद अगुआ ने मुझसे पूछा, "तुमने अब तक उसके साथ गवाही साझा क्यों नहीं की? वो सच्चे मार्ग की खोज करना चाहता है और वो कई विश्वासियों की अगुआई भी करता है, जो प्रभु की वापसी का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं। तुमने अब तक उसके सामने परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य की गवाही क्यों नहीं दी?" अपराध बोध होने पर, मैं फौरन अपनी सफ़ाई देने लगी, मैंने कहा, "मैं दूसरे कामों में बहुत व्यस्त थी जिसके कारण ये काम नहीं कर सकी।" ये सुनकर अगुआ बहुत गुस्सा हो गयीं, और कहने लगीं कि मैं अपने कर्तव्य को लेकर गैर-ज़िम्मेदार और लापरवाह हूँ, और काम से जी चुराती हूँ, और मैंने सुसमाचार के काम को बहुत नुकसान पहुँचाया है। उन्होंने बेहद कठोरता से मुझे फटकार लगायी। उस वक्त कई सारे भाई-बहन वहाँ मौजूद थे, मैं शर्म से पानी-पानी हो गयी। मैंने सोचा, "क्या तुम मेरी थोड़ी-बहुत इज्ज़त रख कर अच्छे से बात नहीं कर सकती थी? जानती हूँ मैं गलत थी, मगर क्या मैं अभी जाकर उसके साथ सुसमाचार साझा नहीं कर सकती? मेरे साथ इतनी बुरी तरह से व्यवहार करने की कोई ज़रूरत नहीं है।" मैं मन में भी इसे सही ठहरा रही थी, ये सोचकर कि मेरे पास ज़रा-भी समय नहीं था, मैं सुबह से लेकर शाम तक सुसमाचार के प्रचार में लगी रहती थी। लेकिन फिर भी अगुआ ने कहा कि मैं लापरवाही से काम करके गैर-ज़िम्मेदार बन रही हूँ। कोई मुझसे और कितना काम करने की अपेक्षा कर सकता है? मुझे मेरा काम बहुत मुश्किल लगने लगा। उस सभा के बाद मैं अपने कमरे में छिपकर बहुत रोई। मुझे लगा मेरे साथ गलत हुआ है और नकारात्मक महसूस करने लगी, मन में परमेश्वर को लेकर ग़लतफ़हमियाँ भरी हुई थीं। मेरे मन में एक विश्वासघाती विचार आया। मुझे लगा चूँकि अगुआ ने मुझ पर इतनी कठोरता दिखाई है तो परमेश्वर ज़रूर मुझसे बहुत नफ़रत करता होगा, अगर ऐसा हुआ तो मैं अपना कर्तव्य कैसे निभा सकती हूँ? शायद मुझे खून का घूँट पीकर दोष खुद पर ले लेना चाहिए, और ये जिम्मेदारी छोड़ देनी चाहिए ताकि परमेश्वर के घर का कार्य न रुके और मुझे वो काम न करना पड़े जिसका कोई एहसान न माने। ज़ोर-ज़ोर से रो लेने के बाद, मुझे एहसास हुआ कि मेरी हालत ठीक नहीं है। वैसे तो मैं इतने सालों से विश्वासी रही हूँ, मगर जैसे ही मेरे साथ कठोरता से निपटा गया, तो मैं खुद को संभाल नहीं पायी। मैं परमेश्वर के साथ तर्क और होड़ करने लगी, मैं तो अपना कर्तव्य भी छोड़ देना चाहती थी। मेरे पास कोई सच्चा आध्यात्मिक कद नहीं था। मुझे परमेश्वर के वचनों की याद आई जो कहते हैं कि मुश्किल से मुश्किल हालात में भी अपना कर्तव्य निभाना जारी रखना। इससे मुझे काफ़ी प्रेरणा मिली। चाहे परमेश्वर या अगुआ मेरे बारे में कुछ भी सोचें, मैं हार नहीं मान सकती, मेरा कर्तव्य कितना भी मुश्किल क्यों न हो, मुझे इस चुनौती का सामना करना ही होगा। ये सब सोचकर मैं थोड़ा बेहतर महसूस करने लगी। मैंने फ़ौरन अपने आँसू पोंछे और भाई-बहनों के साथ चर्चा करने गयी। कुछ ही दिनों में, मैं उस सहकर्मी को हमारे बीच लेकर आयी। मगर उसके बाद, मैंने ईमानदारी से सत्य की खोज करना और अपनी समस्याओं पर विचार करना छोड़ दिया। बल्कि, मैं तो अपने विवेक और इच्छा के अनुसार अपना कर्तव्य निभाने पर अड़ी थी। मैंने सोचा मेरे पास थोड़ा आध्यात्मिक कद और थोड़ी व्यावहारिकता तो है ही।

असल में, अगुआ ने व्यावहारिक काम न करने के लिए, गैर-ज़िम्मेदार होने और आसान रास्ता चुनने के कारण मेरा निपटान किया। ये सभी बहुत गंभीर समस्याएँ थीं। सुसमाचार के हमारे काम की जिम्मेदारी मुझ पर थी और जब किसी के पास बहुत सी धारणाएँ होतीं, तो मैं सहभागिता करके गवाही देने की कोशिश नहीं करती थी। मैं बस लापरवाही से उस काम को एक-आध महीने के लिए टाल देती थी। इससे कई लोगों को सच्चे मार्ग की खोज और प्रभु की वापसी का स्वागत करने में देरी हो रही थी! अपने काम में ऐसी लापरवाही करके मैं परमेश्वर का विरोध ही नहीं बल्कि उसके स्वभाव का अपमान भी कर रही थी। ऐसा लगता था कि मैं हर समय व्यस्त रहती हूँ और अपने कर्तव्य में कीमत भी चुका सकती हूँ, मगर जैसे ही मेरे सामने कोई चुनौती आती, मैं समस्या का हल निकालने के लिए सत्य की खोज करने और अपना कर्तव्य ठीक से निभाने पर ध्यान देने के बजाय वही करती जो मुझे करने का मन करता था। मैं बेपरवाह होकर परमेश्वर का आदेश टालती जा रही थी। आखिर ये किस तरह की भक्ति हुई? अगुआ ने काम को लेकर मेरे लापरवाह और गैर-ज़िम्मेदार बर्ताव और मेरे कपटी शैतानी स्वभाव के बारे में चर्चा की, और ऐसा नहीं था कि मैंने ये सब पहली बार किया हो। अगुआ ने मेरे भले के लिए इसका विश्लेषण किया ताकि मैं खुद को पहचानूँ, पश्चाताप करूं और बदल सकूँ, मगर मैंने खुद पर बिलकुल भी विचार नहीं किया और न ही अपनी समस्याओं की जड़ तक पहुँचने की कोशिश की। मैं ऐसे बर्ताव कर रही थी जैसे मैंने काट-छाँट और निपटान को स्वीकार कर लिया, मगर वास्तव में मैं खुद को समझ नहीं पायी थी। इसलिए मैंने सभा में कुछ खोखली बातों और सिद्धांतों की चर्चा की और ऐसा दिखाया कि मैं खुद को पहचानने लगी हूँ। मैंने कहा कि मैं अपने कर्तव्य को लेकर गैर-ज़िम्मेदार थी और परमेश्वर के घर के कार्य में रुकावट डाल रही थी, उसे गंभीर नुकसान पहुँचा रही थी, और कहा कि हमारी अगुआ ने मुझे फटकार लगाकर बिलकुल सही किया, और अगुआ मेरी प्रकृति और मेरे शैतानी स्वभाव के बारे में चर्चा कर रही थी, इसलिए मैं अपने सही-गलत कर्मों का विश्लेषण नहीं कर पायी। मगर मैंने कभी इस बारे में सहभागिता नहीं की कि मैं कहाँ गलत हो गयी थी, मेरे कर्मों की प्रकृति और उनके नतीजे क्या थे, अपने कर्तव्य को लेकर मेरे लापरवाह रवैये में मैंने किस तरह के भ्रष्ट स्वभाव का खुलासा किया, और मैंने कैसी बेतुकी सोच और धारणाएं पाल रखी थीं। मैंने इन बातों के विस्तृत पहलुओं पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया। तो फिर मैंने किस बारे में बात की? मैंने बात की कि कैसे मैं परमेश्वर पर भरोसा करती हूँ और सकारात्मकता से प्रवेश करती हूँ। मैं लगातार इसी तरह की सकारात्मक समझ के बारे में बोलती गयी। मैंने बताया कि मैंने नकारात्मक महसूस किया और निपटाये जाने पर शिकायतें कीं, यहाँ तक कि मैं तो अपने कर्तव्य से हार मान लेना चाहती थी, मगर परमेश्वर के वचनों को याद करके मुझे बहुत प्रेरणा मिली और मुझे एहसास हुआ कि मैं टूट नहीं सकती। परमेश्वर ने मुझमें कितना कुछ किया है और मुझे कितना कुछ दिया है, इसलिए मुझे विवेक रखना ही होगा, मैं परमेश्वर को निराश नहीं कर सकती। इसलिए मैंने तय किया कि भले ही कितनी भी काट-छाँट और निपटान किया जाये, चाहे मेरा कर्तव्य कितना भी मुश्किल हो, मैं उसे अच्छी तरह पूरा करूँगी, अगुआ द्वारा मेरा निपटान इसलिए था कि मैं अपने ऊपर विचार कर सकूँ, खुद को पहचानकर पश्चाताप कर सकूँ और बदल सकूँ। मुझे ये सब कहते सुनकर दूसरों को मेरी समस्याओं और मेरी भ्रष्टता का कुछ पता नहीं चला और न ही उन्हें ऐसा लगा कि मैंने परमेश्वर के घर के काम को कोई बड़ा नुकसान पहुँचाया था। इसके बजाय, उन्हें तो ऐसा लगा कि मेरे कर्तव्य में थोड़ी-सी गड़बड़ी के लिए अगुआ मेरी काट-छाँट और निपटान करके मुझ पर ज़्यादा ही कठोरता दिखा रही थी। उन्होंने मुझे समझा और मुझसे सहानुभूति रखी। ये देखकर कि इतनी कठोरता से निपटाये जाने के बाद भी मैं नकारात्मक नहीं हुई थी और अपना कर्तव्य निभा पा रही थी, उन्हें लगा कि मैं वाकई सत्य को समझती हूँ और मेरा आध्यात्मिक कद अच्छा है। वो सभी मेरा बहुत आदर करते थे और मेरी चापलूसी करते थे। उस समय कुछ लोगों का कहना था कि इतनी कठोरता से निपटाए जाने के बाद भी मेरा हिम्मत नहीं हारना और अपना कर्तव्य निभाते रहना बहुत प्रशंसनीय था। कुछ लोगों का तो कहना था कि मेरा काम बहुत ही कठिन था, और मैं अपना काम पूरे उत्साह से करती थी, मगर ज़रा-सी ग़लती होने पर मुझे अगुआ की डांट सुननी पड़ी। उन्होंने मुझे अपने आँसू पोंछकर अपना कर्तव्य निभाते देखा, और कहा कि वे मेरी जगह होते तो बहुत पहले ही टूट गये होते और उनके पास मेरे जैसा आध्यात्मिक कद नहीं था। मेरी सहभागिता सुनने के बाद, वो काट-छाँट और निपटान को स्वीकार करने के अभ्यास के मार्ग को नहीं समझ सके, और न ही ये समझ सके कि काट-छाँट और निपटान असल में परमेश्वर का प्रेम और उद्धार ही है। बल्कि उन्होंने तो परमेश्वर को गलत समझकर सावधानी बरतते हुए खुद को उससे दूर कर लिया और मेरे करीब आ गए। उसके बाद भी कई बार मेरा निपटान किया गया और हर बार वही हुआ। मैं हमेशा शाब्दिक सिद्धांतों के बारे में बातें करती थी, आध्यात्मिकता और आत्मज्ञान के साथ आध्यात्मिक कद और व्यावहारिकता होने का नाटक करती थी, मैं सभी भाई-बहनों को बेवक़ूफ़ बना रही थी। बिल्कुल नहीं जानती थी, मुझे कोई अंदाजा नहीं था, इन सबके बीच अडिग रह पाने के कारण मुझे खुद पर बहुत गर्व था। मैं बहुत आत्ममुग्ध थी, मुझे लगा कि मेरे पास आध्यात्मिक कद और सत्य की वास्तविकता है। धीरे-धीरे मैं और भी ज़्यादा अहंकारी और आत्मविश्वासी बन गयी।

एक बार, एक भाई ने मेरे काम में कुछ गलतियाँ निकालीं। मैंने उन्हें स्वीकार करने से मना कर दिया और शिकायत की कि वो गलतियाँ खोज रहा है और हमारी परेशानियाँ बढ़ा रहा है। मैं उससे काफ़ी तंग आ चुकी थी। मगर मुझे डर था कि इतने सालों तक विश्वासी रहने के बाद भी वो मुझे इतना अहंकारी देखकर लोग मेरे बारे में बुरा सोचेंगे। मुझे इस बात का भी डर था कि अगुआ को पता चल जाएगा और वो कहने लगेंगी कि मैं सत्य को स्वीकार नहीं कर सकी, तो मैंने नाटक करके इस बारे में शिकायत नहीं करने की कोशिश की। शांत होने का दिखावा करते हुए, मैंने उनसे कहा, "भाई, बताओ, तुम्हें इसमें कौन-सी समस्याएं नज़र आ रही हैं, फ़िर हम एक-एक करके उन पर चर्चा करेंगे। और अगर फ़िर भी इन्हें सुलझा नहीं सके, तो हम अगुआ के पास चलेंगे।" फ़िर उसने एक-एक करके समस्याएँ बतायीं, और मैंने एक-एक करके सबका खंडन कर दिया। आखिर में, उसने जो भी समस्याएँ उठाई थीं, मैंने उन सबका जवाब दे दिया। मुझे लगा, वे समस्याएँ सुलझ गईं और मुझे काफ़ी ख़ुशी हुई। मगर उसे कुछ समझ नहीं आया, इसलिए वो चर्चा के लिए एक अगुआ के पास गया। उसने जो समस्याएँ उठाई थीं उनमें से कुछ तो वास्तव में बड़ी समस्याएँ थीं, और अगुआ को इस बारे में पता चलते ही उसने सबके सामने ही मेरी काट-छाँट की और निपटारा किया। उन्होंने कहा कि मैं अहंकारी हूँ और दूसरों के सुझावों पर ध्यान नहीं देती हूँ, मैं अपने कर्तव्य को लेकर सिद्धांतवादी नहीं हूँ, और इतने सालों तक आस्था रखने के बाद भी मुझमें सत्य की वास्तविकता बिल्कुल नहीं है। उन्होंने कहा कि मैं कोई भी व्यावहारिक समस्या नहीं सुलझा सकती, मैं बहुत ही अहंकारी और बिल्कुल तर्कहीन हूँ। मेरे लिए ये सब सुनना बहुत मुश्किल था, लेकिन मुझे इस बात पर भरोसा नहीं हुआ। मैंने सोचा, "मैं अहंकारी हूँ और कई बार ज़्यादा आत्मविश्वासी भी हो जाती हूँ, मगर मैं दूसरों के सुझावों पर ध्यान देती हूँ। मैं इतनी भी ज़्यादा अहंकारी नहीं।"

इसके कुछ ही समय बाद, एक बैठक के दौरान, मुझे फिर से उजागर किया गया। हमारी अगुआ को पता चला कि मैं अपने कर्तव्य को टाल रही थी इसलिए उन्होंने मुझसे पूछा, "तुम इतनी अकुशलता से काम क्यों कर रही हो? क्या परेशानी है तुम्हें? क्या तुम इससे बेहतर कर सकती हो?" मैंने कहा, "नहीं, नहीं कर सकती।" मुझे लगा कि अगुआ हमारी वास्तविक स्थिति को नहीं समझ पा रही, उन्होंने हमसे ज़्यादा ही उम्मीद लगा रखी थी। फ़िर उन्होंने हमारे लिए परमेश्वर के कुछ वचन पढ़े और सुसमाचार के प्रचार के महत्त्व पर सहभागिता की। उन्होंने ये भी कहा कि हमारे पास ज़्यादा समय नहीं है, इसलिए हमें अपनी कार्यक्षमता बढ़ानी होगी। सच कहूँ तो मैंने उनकी एक भी बात नहीं सुनी। मैं सिर्फ़ अपनी ही धारणाओं और अनुभवों से चिपकी रही, ये सोचती रही कि "मैं हमारी कार्यक्षमता नहीं बढ़ा सकती।" मैंने शांति से अपने अगल-बगल के भाई-बहनों से पूछा, "क्या हम और मेहनत कर सकते हैं?" उनसे ये पूछने के पीछे मेरी एक ही मंशा थी और वो थी उन्हें अपने पक्ष में करना, ताकि वो वही कहें जो मैं कहूँ, और अगुआ के खिलाफ़ होकर धीरे-धीरे काम करते रहें। ज़ाहिर है कि मेरा यही इरादा था, मगर मुझे इसका अंदाजा नहीं था। न ही उन्हें मेरे बारे में कुछ पता था। आप कह सकते हैं कि उन्होंने मुझे लेकर अपना विवेक इस्तेमाल नहीं किया। वो सभी मेरी बात मानकर मेरा साथ देने लगे।

बाद में, क्योंकि मैं अपने कर्तव्य को लेकर अहंकारी और अकुशल हो चुकी थी, और टीम का काम नहीं संभालने के साथ उसमें रुकावट भी डाल रही थी, इसलिए मुझे मेरे कर्तव्य से हटा दिया गया। मगर हैरानी की बात है कि जब नया अगुआ चुनने की बारी आयी तो सभी भाई-बहनों ने न सिर्फ़ मुझे चुना बल्कि वे सभी मुझे ही वापस अगुआ देखना चाहते थे। मैंने उनमें से कुछ को ये कहते हुए सुना कि मुझे निकालने से पूरी टीम बिखर जाएगी, और मेरे अलावा टीम को चला भी कौन सकता है? तब जाकर मुझे एहसास हुआ कि मुझमें वाकई कोई गंभीर समस्या है, जो मेरे ऐसे काम करने के तरीके के बावजूद सभी मेरे साथ खड़े हैं और मेरी बात मान रहे हैं। अगुआ द्वारा मुझे निकाल दिए जाने के बावजूद सब मुझे ही चुन रहे थे, और मेरे साथ अच्छा बर्ताव करने के लिए अगुआ से लड़ रहे थे। मैंने वाकई भाई-बहनों को मार्ग से भटका दिया था।

फिर मुझे परमेश्वर के वचनों का ये अंश याद आया : "जहाँ तक तुम सभी का प्रश्न है, यदि किसी क्षेत्र या जिले की कलीसियाएँ तुम लोगों को सौंप दी जाएँ, और छह महीनों तक कोई भी तुम्हारा निरीक्षण न करे, तो तुम लोग भटकना शुरू कर दोगे। अगर कोई तुम्हारी एक वर्ष के लिए देख-रेख न करे, तो तुम उन्हें दूर ले जाओगे और उन्हें गुमराह कर दोगे। दो साल गुजरने पर, अब भी अगर कोई तुम्हारी निगरानी न करे, तो तुम उन लोगों को अपने सामने ले आओगे। ऐसा क्यों है? क्या तुम लोगों ने पहले कभी इस प्रश्न पर विचार किया है? मुझे बताओ, क्या तुम लोग इस तरह के हो सकते हो? तुम लोगों का ज्ञान केवल कुछ समय के लिए लोगों को पोषित कर सकता है। जैसे-जैसे समय बीतता है, यदि तुम वही एक बात कहते रहे, तो कुछ लोग इसे जान लेंगे; वे कहेंगे कि तुम अत्यधिक सतही हो, तुममें गहराई की कमी है। तुम्हारे पास सिद्धांतों की बात कहकर लोगों को धोखा देने की कोशिश करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा। अगर तुम इसे हमेशा इस तरह से जारी रखोगे, तो तुम्हारे नीचे के लोग तुम्हारे तरीकों, कदमों, और परमेश्वर में विश्वास करने और अनुभव करने के तुम्हारे प्रतिमान का अनुसरण करेंगे, वे उन शब्दों और सिद्धांतों को व्यवहार में रखेंगे। अंततः, तुम जिस तरह उपदेश पर उपदेश देते चले जाते हो, वे तुम्हारा एक प्रतिमान के रूप में इस्तेमाल करेंगे। तुम सिद्धांतों की बात करने के लिए लोगों की अगुवाई करते हो, इसलिए तुम्हारे नीचे के लोग तुम से सिद्धांतों को सीखेंगे, और जैसे-जैसे बात आगे बढ़ेगी, तुम एक गलत रास्ता अपना चुके होगे। तुम्हारे नीचे के सभी लोग तुम्हारा अनुसरण करते हैं, इसलिए तुम महसूस करते हो: 'मैं अब शक्तिशाली हूँ; इतने सारे लोग मेरी बात सुनते हैं, और कलीसिया मेरे इशारे पर चलती है।' मनुष्य के अंदर का यह विश्वासघात की यह प्रकृति अचेतन रूप से तुम्हारे द्वारा परमेश्वर को एक नाम मात्र में बदल देती है, और तब तुम स्वयं कोई एक पंथ, कोई संप्रदाय बना लेते हो। पंथ और संप्रदाय कैसे उत्पन्न होते हैं? वे इसी तरह से बनते हैं। हर पंथ और संप्रदाय के अगुवाओं को देखो। वे सभी अभिमानी और आत्म-तुष्ट हैं, और वे बाइबल की व्याख्या संदर्भ के बाहर और उनकी अपनी कल्पना के अनुसार करते हैं। वे सभी अपना काम करने के लिए प्रतिभा और पांडित्य पर भरोसा करते हैं। यदि वे कुछ भी उपदेश करने में असमर्थ होते, तो क्या वे लोग उनका अनुसरण करते? कुछ भी हो, उनके पास कुछ ज्ञान तो है ही, और वे सिद्धांत के बारे में थोड़ा-बहुत बोल सकते हैं, या वे जानते हैं कि दूसरों को कैसे जीता जाए, और कुछ चालाकियों का उपयोग कैसे करें, जिनके माध्यम से वे लोगों को अपने सामने ले आए हैं और उन्हें धोखा दे चुके हैं। नाम मात्र के लिए, वे लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन वास्तव में वे अपने अगुवाओं का अनुसरण करते हैं। अगर वे उन लोगों का सामना करते हैं जो सच्चे मार्ग का प्रचार करते हैं, तो उनमें से कुछ कहेंगे, 'हमें परमेश्वर में अपने विश्वास के बारे में हमारे अगुवा से परामर्श करना है।' देखिये, परमेश्वर में विश्वास करने के लिए कैसे उन्हें किसी की सहमति की आवश्यकता है; क्या यह एक समस्या नहीं है? तो फिर, वे सब अगुवा क्या बन गए हैं? क्या वे फरीसी, झूठे चरवाहे, मसीह-विरोधी, और लोगों के सही मार्ग को स्वीकार करने में अवरोध नहीं बन चुके हैं? इस तरह के लोग पौलुस के प्रकार के ही हैं" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य का अनुसरण करना ही परमेश्वर में सच्चे अर्थ में विश्वास करना है')। परमेश्वर के वचनों से मैंने जाना कि मैं उन्हीं फरीसियों जैसी थी जिन्हें परमेश्वर उजागर करता है, मेरे अंदर न सिर्फ़ यह कपटी और दुष्ट शैतानी स्वभाव था, बल्कि मेरा बर्ताव भी इतना बुरा हो चुका था कि मैं लोगों को गुमराह करके उन्हें काबू में कर रही थी और परमेश्वर को मैंने एक किनारे कर दिया था। मैंने उन पाखंडी फरीसियों और पादरियों के बारे में सोचा जो सिर्फ़ सिद्धांतों के बारे में बात करते हैं और लोगों को गुमराह करने के लिए कड़ी मेहनत करने का दिखावा करते हैं। उनका कहना है कि वे परमेश्वर के ऋणी हैं और बहुत विनम्र और आत्मविश्वासी भी मालूम पड़ते हैं, मगर असल में वो हमेशा दिखावा करते हैं कि उन्होंने प्रभु के लिए कितना कुछ त्याग किया है, कितना कुछ सहा है और कितनी सारी मेहनत की है। इसलिए, विश्वासी उन्हें पूजने लगते हैं और उनकी हर बात को प्रभु की इच्छा के अनुरूप मान बैठते हैं। वो उन्हें समझ नहीं पाते। वो तो ये भी मानते हैं कि उनकी आज्ञा को मानना प्रभु की आज्ञा को मानना है। यह प्रभु में बस नाम के लिए विश्वास करना है, असल में तो ये उन पादरियों में विश्वास करना है। जिस मार्ग पर मैं चल रही थी वह उन फरीसियों और पादरियों के मार्ग से कैसे अलग था? मैं भी सिद्धांतों और बाहरी त्यागों पर ध्यान देती थी ताकि भाई-बहनों को लगे कि मैं अपने कर्तव्य को लेकर समर्पित हूँ। जब मेरा निपटान किया गया, तो न मैंने सत्य की खोज की और न ही आत्मचिंतन किया। मैं सबको गुमराह करने के लिए वही कहती जो मुझे सही लगता, ताकि उन्हें लगे मैं खुद को समर्पित कर रही हूँ, मेरे पास आध्यात्मिक कद है, फिर वो मेरी प्रशंसा करें और मेरी बात मानें। मैंने तो सभी को उन अपेक्षाओं के खिलाफ़ कर दिया जो परमेश्वर को मुझसे थीं। असल में वहां मेरा ही राज चलता था। मैं किसी मसीह विरोधी से अलग कहां थी? मैं न तो अगुआ थी और न ही किसी ऊँचे पद पर थी। मैं बस दो बहनों के साथ किसी कर्तव्य की ज़िम्मेदारी संभाल रही थी और वो भी अगुआ की निगरानी में, मगर इसके बावजूद मेरी समस्या पहले से भी ज़्यादा बिगड़ गयी। मैं सोचना भी नहीं चाहती कि कोई ऊँचा पद मिलने पर, जहाँ हर चीज़ की ज़िम्मेदारी मेरी होती, मैं कितना बुरा काम कर बैठती। मैंने सोचा, क्योंकि मैं काफ़ी सालों से विश्वासी रही हूँ और हर मुश्किल हालात या परीक्षणों में अपना कर्तव्य निभाती आयी हूँ, मुझमें अच्छी इंसानियत है, और मैंने अगुआ बनने के लिए भी कभी संघर्ष नहीं किया, इसलिए मैं कभी फरीसी या मसीह-विरोधी नहीं बनूँगी। मगर सच्चाई से सामना होने पर मैं हैरान रह गयी, मेरे पास कहने को कुछ नहीं था। आखिरकार मुझे एहसास हुआ कि मेरी धारणाएँ कितनी बेतुकी और नुकसानदेह थीं, मेरा स्वभाव कितना दुष्ट और भयानक था। मैंने देखा कि एक विश्वासी होने के नाते, मैंने कभी सत्य की खोज नहीं की, न ही मैंने परमेश्वर द्वारा मेरे साथ किये गए न्याय, ताड़ना, निपटान या काट-छाँट को कभी स्वीकार किया। मैंने परमेश्वर के वचनों की रोशनी में कभी अपनी शैतानी प्रकृति को जानने और उस पर विचार करने की कोशिश नहीं की। मैं बाहरी तौर पर इनका पालन करके और मुख से इन्हें स्वीकार करके संतुष्ट थी। मैं चाहे कितनी भी अच्छी या नियमों का पालन करने वाली प्रतीत होऊँ, मगर मौक़ा मिलते ही, परमेश्वर को धोखा देने की मेरी शैतानी प्रकृति अपना रंग दिखाने लगती थी, और मैं अनजाने में ऐसे बुरे काम कर बैठती थी जिनका मुझे कोई अंदाज़ा नहीं होता। मेरी हालत वैसी ही थी जैसा परमेश्वर ने कहा है: "इस बात की अभी भी सौ प्रतिशत संभावना है कि तुम लोग मेरे साथ विश्वासघात करोगे।"

परमेश्वर जानता था मैं शैतान द्वारा कितनी भ्रष्ट की जा चुकी हूँ, मैं कितनी उदासीन और ज़िद्दी हूँ। अपने बारे में सिर्फ़ थोड़ा-सा जान कर मैं खुद को नहीं बदल सकती थी। इसलिए, बाद में भाई-बहनों द्वारा मुझे उजागर करके मेरा निपटान किया गया। एक बार की बात है, एक बहन ने मुझे सीधा आकर कहा, "अब मैं आपको थोड़ा पहचान गयी हूँ। आप शायद ही कभी अपने आंतरिक विचारों पर सहभागिता या अपनी भ्रष्टता का खुलासा करती हैं। आप बस अपने कुछ सकारात्मक प्रवेश और समझ के बारे में ही बात करती हैं, जैसे आपकी भ्रष्टता पूरी तरह से सुलझ गयी हो, और अब आप बिलकुल इससे मुक्त हैं।" उसने ये भी कहा कि वो मेरा बहुत सम्मान करती थी, उसे लगता था कि मैं एक बहुत पुरानी विश्वासी हूँ जिसे सत्य की समझ है, मुझे पता था कि कई चीज़ों का अनुभव कैसे करना है, मैं सह सकती हूँ और अपने कर्तव्य में कीमत चुका सकती हूँ, खास तौर पर मैं अपने कड़ाई से किए गए निपटान और काट-छाँट को स्वीकार कर सकती हूँ। इसलिए वो मेरा इतना सम्मान करती थी। उसे मेरी सभी बातें सही लगती थीं और वो हमेशा मेरी बात मानती थी, उसने तो अपने दिल में मुझे परमेश्वर की जगह दे रखी थी। उसके मुँह से ये सुनकर कि वो मुझे परमेश्वर का दर्जा दे बैठी थी, मुझे ऐसा लगा कि बिजली का जोरदार झटका लगा हो। मैं बहुत डर गयी और इस बात का विरोध करने लगी। मैंने सोचा, "अगर ये सच है, तो क्या अब मैं मसीह विरोधी बन गयी हूँ? तुम इतनी बेवकूफ़ और विवेकहीन कैसे हो सकती हो? मैं शैतान द्वारा भ्रष्ट की जा चुकी हूँ। तुम मुझे उस तरह कैसे देख सकती हो?" मैं कई दिनों तक काफ़ी निराश रही। जब भी उसकी बातों को याद करती तो खुद को दोषी समझने लगती, मुझे अजीब सा डर लगा रहता था, जैसे मेरे साथ कुछ बहुत बुरा होने वाला है। मैं जानती थी कि ये मेरे प्रति परमेश्वर का क्रोध है, उसका धार्मिक स्वभाव मेरा पीछा कर रहा है, इसलिए मुझे उस तरह के बुरे कर्म करने के नतीजों को स्वीकार करना ही था। मैं जानती थी कि परमेश्वर का स्वभाव कोई अपमान नहीं सहता, मुझे लगा कि परमेश्वर ने मुझे पहले ही दंडित कर दिया है, इसलिए अब मेरी आस्था के मार्ग का अंत करीब था। ये सब सोचकर मैं अपने आँसू नहीं रोक सकी। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं, जिसे देखकर नहीं लगता कि कोई बहुत बुरा काम किया होगा, ऐसे नाज़ुक मुकाम पर पहुँच जाऊँगी। मैंने सिर्फ़ सिद्धांतों से लोगों को गुमराह ही नहीं किया, बल्कि उन्हें परमेश्वर की तरह मेरी पूजा करने के लिए भी मजबूर कर दिया। ये परमेश्वर को मुखौटा बना देना था और इससे परमेश्वर के स्वभाव का गंभीर अपमान हुआ। मैं बहुत नकारात्मक महसूस कर रही थी, लग रहा था जैसे मेरे अपराध और बुरे कर्म मेरा दिल जला रहे थे। मैं महसूस करने लगी कि मैं बिलकुल एक फरीसी और मसीह विरोधी जैसी हूँ, मैं शैतान की हूँ, एक सेवाकर्ता हूँ जिसे हटा दिया जाएगा। मैं समझ नहीं पायी कि मैं इतनी बुरी कैसे बन गयी। पछतावे से भरकर, मैं परमेश्वर के पास आकर पश्चाताप करने आयी और कहने लगी, "परमेश्वर, मैंने बहुत बुरे काम किये हैं। मैंने तुम्हारे स्वभाव का अपमान किया है, इसलिए मुझे शापित और दंडित किया जाना चाहिए! मैं तुम्हारी माफ़ी के लायक नहीं, मगर मैं चाहती हूँ तुम मुझे प्रबुद्ध करो ताकि मैं अपनी शैतानी प्रकृति को समझ सकूँ और शैतान द्वारा अपनी भ्रष्टता की सच्चाई को देख सकूँ। परमेश्वर, सच कहूँ तो मैं पश्चाताप करना चाहती हूँ, ईमानदार और नेक बनना चाहती हूँ।"

अगले कुछ दिनों तक, मैं यही विचार करने लगी कि मैं इतनी अधिक कैसे गिर गयी, और मेरी समस्या की जड़ क्या है। एक बार अपने भक्ति कार्यों के दौरान मैंने ये पढ़ा : "तो मसीह-विरोधी अपना किस तरह का व्यक्तित्व गढ़ते हैं? वे क्या दिखने की कोशिश करते हैं? उनका यह स्वांग निश्चित ही प्रतिष्ठा और साख के लिए होता है। इसे इन चीज़ों से अलग नहीं किया जा सकता, अन्यथा वे शायद इस तरह का दिखावा नहीं करेंगे—कोई वजह नहीं है कि वे ऐसी मूर्खता करें। यह देखते हुए कि इस तरह का व्यवहार निंदनीय, घृणित और वितृष्णापूर्ण माना जाता है, वे फिर भी ऐसा क्यों करते हैं? निस्संदेह उनके अपने लक्ष्य और मंतव्य हैं—इसमें इरादे और मंशाएँ शामिल हैं। अगर मसीह-विरोधियों को लोगों के मन में अपनी प्रतिष्ठा बढ़ानी है, तो उन्हें यह कोशिश करनी होगी कि लोग उन्हें ऊंची नज़र से देखें। और लोग किस तरह ऐसा करेंगे? लोगों की धारणाओं में अच्छा माने जाने वाले कुछ व्यवहारों और अभिव्यक्तियों का स्वांग रचने के साथ-साथ, मसीह-विरोधियों का एक दूसरा पहलू यह है कि वे कुछ ऐसे व्यवहारों और छवियों का भी स्वांग रचते हैं जो लोगों की नज़रों में महान और भव्य हैं, ताकि वे लोगों की नज़रों में ऊपर उठ सकें" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (18)')। "चाहे कैसा भी परिवेश हो, या चाहे कहीं भी वे अपना कर्तव्य निभा रहे हों, ये मसीह-विरोधी दूसरों से अपना असली रवैया और सत्य और परमेश्वर के बारे में अपने हृदय की गहराइयों में छिपी अपनी असली धारणाओं को छिपाते हुए ऐसा जतलाते हैं कि वे दुर्बल नहीं हैं, कि उनमें परमेश्वर के लिए असीम प्रेम है, उनमें परमेश्वर के लिए भरपूर आस्था है, कि वे कभी भी नकारात्मक नहीं हुए। वास्तव में, क्या अपने हृदय की गहराइयों में वे सचमुच खुद को सर्वशक्तिमान समझते हैं? क्या वे सचमुच ऐसा समझते हैं कि उनमें कोई दुर्बलता नहीं है? नहीं। तो, यह जानते हुए कि उनमें दुर्बलता, विद्रोहीपन और भ्रष्ट स्वभाव हैं, वे दूसरों के सामने इस तरह की बातें और व्यवहार क्यों करते हैं? उनका उद्देश्य स्पष्ट है : यह बस दूसरों के सामने और उनके बीच अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए है। उन्हें लगता है कि अगर दूसरों के सामने वे खुलकर नकारात्मक हों, खुलकर ऐसी बातें कहें जो दुर्बलता की प्रतीक हों और विद्रोहीपन को उजागर करती हों, और अपने आपको जानने की बात कहें, तो यह ऐसी चीज़ है जिससे उनकी प्रतिष्ठा और साख को नुकसान पहुँच सकता है, यह नुकसान की बात है। वे यह कहने के बजाय मर जाना पसंद करेंगे कि वे दुर्बल और नकारात्मक हैं, कि वे संपूर्ण न होकर मात्र एक सामान्य व्यक्ति हैं। उन्हें लगता है कि अगर वे यह स्वीकार कर लेंगे कि वे एक सामान्य व्यक्ति हैं, एक छोटे और गौण व्यक्ति, तो वे लोगों के मन में अपनी प्रतिष्ठा खो बैठेंगे। और इसलिए, चाहे कुछ भी हो जाए, वे अपनी यह प्रतिष्ठा खो नहीं सकते, बल्कि इसे बचाने के लिए हर संभव कोशिश करते हैं। जब भी उनका किसी समस्या से सामना होता है, वे आगे बढ़ते हैं—लेकिन यह देखकर कि उनका भेद खुल सकता है, कि लोग उनकी असलियत को भाँप सकते हैं, वे जल्दी-से छिप जाते हैं। अगर उन्हें लगता है कि कुछ कर सकने की गुंजाइश है, अगर उन्हें अपनी नुमाइश का अवसर नज़र आता है, यह दिखाने का कि वे इसमें माहिर हैं, कि उन्हें इस मामले की जानकारी है, और वे इसे समझते हैं, और इस समस्या को हल कर सकते हैं, तो वे दूसरों की वाह-वाही बटोरने के लिए झट-से आगे बढ़कर इस अवसर को लपक लेते हैं, उन्हें यह जतलाते हुए कि वे इस मामले में सिद्धहस्त हैं" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (18)')। "ये मसीह-विरोधी आध्यात्मिक लोगों की भूमिका निभाना चाहते हैं, वे भाइयों और बहनों में विशिष्ट बनना चाहते हैं, ऐसे लोग जिनके पास सत्य है और जो सत्य को समझते हैं, ताकि वे ऐसे लोगों की मदद कर सकें जो कमज़ोर और अधपके हैं। और यह भूमिका निभाने के पीछे उनका क्या मकसद है? सबसे पहले तो, वे यह मानते हैं कि वे पहले ही देह से ऊपर उठ चुके हैं, वे सांसारिक सरोकारों को पीछे छोड़ चुके हैं, वे सामान्य मानवता की दुर्बलताओं को त्याग चुके हैं, और सामान्य मानवता की दैहिक जरूरतों से उबर चुके हैं; वे खुद को ऐसे व्यक्ति समझते हैं जो परमेश्वर के घर में महत्वपूर्ण कामों की जिम्मेदारी ले सकते हैं, जो परमेश्वर की इच्छा को ध्यान में रख सकते हैं, जिनके मस्तिष्क परमेश्वर के वचनों से ओतप्रोत हैं। वे खुद को ऐसे लोगों की शैली में ढाल लेते हैं जो पहले से ही परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा कर चुके हैं और उसे प्रसन्न कर चुके हैं, और जो परमेश्वर की इच्छा को ध्यान में रख सकते हैं, और परमेश्वर द्वारा अपने मुख से किए गए वायदे के अनुसार मनोरम गंतव्य को प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए वे अक्सर आत्म-संतुष्ट होते हैं और खुद को दूसरों से अलग समझते हैं। ऐसे शब्दों और वाक्यांशों का इस्तेमाल करके जो उन्हें याद होते हैं और जिन्हें वे अपने मस्तिष्क में समझने में समर्थ होते हैं, वे दूसरों को धिक्कारते हैं, उनकी निंदा करते हैं और उनके बारे में निष्कर्ष निकालते हैं; इसी तरह, वे अक्सर ऐसे अभ्यासों और बातों का भी इस्तेमाल करते हैं जो उनकी अपनी धारणाओं की उपज होते हैं, ताकि दूसरों के बारे में निष्कर्ष निकालकर उन्हें सीख दे सकें, दूसरों से भी इन अभ्यासों और बातों का पालन करवा सकें, और इस तरह, भाइयों और बहनों के बीच वह दर्जा हासिल कर सकें जो वे चाहते हैं। उन्हें लगता है कि अगर वे सही शब्द और वाक्यांश बोल सकते हैं, सही सिद्धांतों की बात कर सकते हैं, कुछ नारे लगा सकते हैं, परमेश्वर के घर में थोड़ी-सी जिम्मेदारी उठा सकते हैं, थोड़े-से महत्वपूर्ण काम कर सकते हैं, अगुवाई करने के लिए तैयार हैं, और लोगों के किसी समूह में व्यवस्था बनाए रख सकते हैं, तो इसका मतलब है कि वे आध्यात्मिक हैं, और उनकी स्थिति सुरक्षित है। और इसलिए, आध्यात्मिक होने का ढोंग करते हुए और अपने अध्यात्म की शेखी बघारते हुए, वे सर्वशक्तिमान होने और कुछ भी कर सकने का दिखावा भी करते हैं, एक संपूर्ण व्यक्ति होने का दिखावा, और सोचते हैं कि वे सब कुछ कर सकते हैं और हर चीज में श्रेष्ठ हैं" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (18)')।

परमेश्वर के वचनों ने मुझे दिखाया कि क्यों मैं इतनी पाखंडी थी और सहभागिता के दौरान सिर्फ़ अपनी अच्छाई क्यों दिखाती थी, ऐसा करते हुए मैं बड़ी कोशिशें करती थी कि अपने कुरूप, बुरे पक्ष को छिपा दूँ जिससे कोई इसे देख न सके। मैंने ये सब लोगों के दिलों में अपनी जगह को बचाने के लिए किया, एक पुरानी विश्वासी होने की अपनी छवि को बनाए रखने के लिए किया। इससे उन्हें लगेगा कि इतने सालों से आस्था रखने के कारण मैं खास हूँ, दूसरे भाई-बहनों से अलग हूँ, मेरे पास आध्यात्मिक कद और सत्य की समझ है, इसलिए वो मेरा सम्मान और मेरी प्रशंसा करेंगे। मुझे एहसास हुआ कि मैं बहुत अहंकारी, दुष्ट और मक्कार हूँ! मुझे लगा मैं एक पुरानी विश्वासी हूँ और कुछ सिद्धांतों को समझती हूँ, इसलिए मैं खुद को दूसरों से ऊँचा समझकर एक आध्यात्मिक इंसान होने का नाटक करने लगी। दरअसल मुझमें सत्य की वास्तविकता का अभाव था, मैंने सत्य को खोजने और उसका अनुसरण करने पर ध्यान नहीं दिया। मैंने सिद्धांतों, अच्छे बर्ताव और कुछ बाहरी त्यागों का इस्तेमाल करके सत्य की वास्तविकता का अभाव होने की सच्चाई को छुपाने की कोशिश की। मैंने काट-छाँट और निपटान किये जाने के बाद भी आत्ममंथन करके खुद को पहचानने की कोशिश नहीं की, मैंने अपनी समस्याओं और भ्रष्टता का विश्लेषण भी नहीं किया। मैं अपनी बुरी मंशाओं और भ्रष्ट स्वभाव को छुपाती रही ताकि किसी को भी इसकी भनक न लगे, और मेरा पद और मेरी छवि सुरक्षित रहे। मेरा यह पाखंडी बर्ताव प्रभु यीशु का विरोध करनेवाले फरीसियों के बर्ताव से अलग कैसे था? प्रभु यीशु ने ये कहकर फरीसियों को फटकार लगायी थी : "हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम चूना फिरी हुई कब्रों के समान हो जो ऊपर से तो सुन्दर दिखाई देती हैं, परन्तु भीतर मुर्दों की हड्डियों और सब प्रकार की मलिनता से भरी हैं। इसी रीति से तुम भी ऊपर से मनुष्यों को धर्मी दिखाई देते हो, परन्तु भीतर कपट और अधर्म से भरे हुए हो" (मत्ती 23:27-28)। "हे अंधे अगुवो, तुम मच्छर को तो छान डालते हो, परन्तु ऊँट को निगल जाते हो" (मत्ती 23:24)। क्या मैं भी इनके जैसी नहीं थी? ऐसा लगा जैसे मैं अपने अनुभव के आधार पर सहभागिता कर रही थी, मगर असल में मैं खाली सिद्धांतों और उन आम बातों पर चर्चा कर रही थी, जिनके बारे में सभी जानते हैं, मैं हमेशा अपने विचारों और अपने भीतर की भ्रष्ट, दुष्ट चीज़ों को छुपाती थी, मैंने एक बार भी उनका नाम तक नहीं लिया। इससे लोगों को ऐसा लगता कि भले ही मुझमें भ्रष्टता है और मैं विद्रोही हूँ, मगर फिर भी दूसरों से कहीं बेहतर हूँ। मैं छोटी बातों पर तो ध्यान दे रही थी लेकिन महत्वपूर्ण बातों को नज़रंदाज़ करती जा रही थी। मैं बाहर से तो विनम्र दिखती थी, मगर अंदर ही अंदर, मैं बस अपने नाम और रुतबे की रक्षा कर रही थी, दूसरों के मन में बनी अपनी छवि की रक्षा कर रही थी। मैं बेहद पाखंडी, कपटी और धोखेबाज़ थी। मैंने सभी भाई-बहनों की आँखों में धूल झोंका था। मैं एक नेक और सच्ची इंसान नहीं थी और न ही मैं सृजित प्राणी की उचित जगह खड़ी थी, मैंने परमेश्वर के कार्य को ऐसे इंसान के नज़रिये से अनुभव करने की कोशिश नहीं की जिसे शैतान ने गहराई तक भ्रष्ट कर दिया है, न ही मैंने अपनी भ्रष्टता से छुटकारा पाने के लिए परमेश्वर के न्याय, ताड़ना, काट-छाँट और निपटान को स्वीकार किया। मैं तो दिखावा करने, खुद की जगह बनाने, दूसरों को गुमराह करने और परमेश्वर द्वारा चुने गए लोगों के लिये उससे होड़ करने के लिए अपने कर्तव्य का इस्तेमाल कर रही थी। क्या ये मसीह विरोधी बनकर परमेश्वर का विरोध करने का मार्ग नहीं है? परमेश्वर इस मार्ग की निंदा करता है। जहाँ तक मेरी बात है, इतने सालों तक आस्था रखने के बावजूद, काबिलियत या सत्य का अनुसरण करने के मामले में दूसरों से मेरी बराबरी नहीं हो सकती थी। इतने सालों के बाद भी मुझमें सत्य की वास्तविकता नहीं थी, और न ही मेरे जीवन स्वभाव में कोई बदलाव आया। मैं अब भी शैतान की वही अहंकारी और अभिमानी छवि थी और मेरे कर्तव्य में सिद्धांत का नामोनिशान नहीं था। मैं केवल परमेश्वर की इच्छा का ध्यान रखने और परमेश्वर का उत्कर्ष करने में ही नाकाम नहीं हुई, बल्कि मैंने हमारे सुसमाचार के काम में भी रुकावट डाली। इतने सालों तक विश्वासी रहने के बावजूद ऐसा करना बेहद शर्मनाक था। मगर मैंने सोचा कि मैं इसी खूबी का इस्तेमाल करके लोगों को मेरा सम्मान और गुणगान करने पर मजबूर कर दूँगी। मैं बहुत विवेकहीन और बेशर्म थी!

एक बार मैंने अपने धार्मिक कार्य में परमेश्वर के वचनों का ये अंश पढ़ा : "अगर कोई व्यक्ति सत्य की तलाश नहीं करता, तो वह इसे कभी नहीं समझेगा। तुम शब्दों और सिद्धांतों को दस हजार बार कह सकते हो, लेकिन वे फिर भी केवल शब्द और सिद्धांत ही रहेंगे। कुछ लोग बस यही कहते हैं, 'मसीह सत्य, मार्ग और जीवन है।' अगर तुम इन शब्दों को दस हजार बार भी दोहराते हो, तो भी यह व्यर्थ होगा; तुम्हें इसके अर्थ की कोई समझ नहीं है। ऐसा क्यों कहा जाता है कि मसीह सत्य, मार्ग और जीवन है? क्या तुम इसके बारे में अनुभव से प्राप्त ज्ञान को साफ़-साफ़ बता सकते हो? क्या तुमने सत्य, मार्ग और जीवन की वास्तविकता में प्रवेश किया है? परमेश्वर ने अपने वचन इसलिए बोले हैं, ताकि तुम उन्हें अनुभव कर सको और ज्ञान प्राप्त कर सको; केवल शब्दों और सिद्धांतों का उच्चारण करना बेकार है। परमेश्वर के वचनों को समझने और उनमें प्रवेश करने के बाद ही तुम स्वयं को जान सकते हो। यदि तुम परमेश्वर के वचनों को नहीं समझते, तो तुम स्वयं को नहीं जान सकते। तुम्हारे पास सत्य हो, तभी तुम जान सकते हो; सत्य के बिना तुम नहीं जान सकते। तुम किसी मुद्दे को पूरी तरह से तभी समझ सकते हो, जब तुम्हारे पास सत्य हो; सत्य के बिना तुम किसी मुद्दे को नहीं समझ सकते। तुम्हारे पास सत्य होने पर ही तुम स्वयं को जान सकते हो; सत्य के बिना तुम स्वयं को नहीं जान सकते। तुम्हारे पास सत्य होने पर ही तुम्हारा स्वभाव बदल सकता है; सत्य के बिना तुम्हारा स्वभाव नहीं बदल सकता। तुम्हारे पास सत्य होने पर ही तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कर सकते हो; सत्य के बिना तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा नहीं कर सकते। तुम्हारे पास सत्य होने पर ही तुम परमेश्वर की आराधना कर सकते हो; सत्य के बिना, तुम्हारी आराधना धार्मिक कर्म-कांडों के आयोजन से ज्यादा कुछ नहीं होगी। ये सभी चीज़ें परमेश्वर के वचनों से सत्य प्राप्त करने पर निर्भर हैं" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें')। इन्हें पढ़कर मैं स्पष्ट रूप से समझ गयी कि मैंने क्यों एक फरीसी की तरह परमेश्वर का विरोध करने का गलत मार्ग चुना। ऐसा इसलिए था क्योंकि इतने सालों में मैंने कभी सत्य का अनुसरण करने या उसे अभ्यास में लाने की कोशिश नहीं की, और परमेश्वर के वचनों को पढ़ते वक्त मैंने सिर्फ़ उसके शाब्दिक अर्थ पर ही ध्यान दिया। मैंने न तो परमेश्वर के वचनों में प्रवेश किया और न ही उनका अभ्यास किया, मुझे सत्य की वास्तविक समझ नहीं थी। इसलिए स्वाभाविक रूप से, मैं किताबी सिद्धांतों के बारे में ही चर्चा करती रही। अपनी आस्था में, मैंने सत्य से प्रेम नहीं किया या न मैं परमेश्वर के वचनों की प्यासी थी, शायद ही कभी मैंने खुद को परमेश्वर के सामने शांत किया कि उसके वचनों पर यह विचार कर सकूँ कि वचनों का कोई अंश सत्य के किस पहलू का खुलासा कर रहा है, मैंने सत्य को कितना समझा, कैसे उसका अभ्यास किया, कैसे उसमें प्रवेश किया, परमेश्वर की इच्छा क्या है या उसके वचनों ने मुझमें कितना कुछ हासिल किया। कोई बात होने पर, मैंने परमेश्वर के वचनों की रोशनी में अपनी स्थिति के बारे में सोचने, अपनी निजी समस्याओं पर विचार करने और यह जांचने की कोशिश नहीं की कि मैं किस तरह की भ्रष्टता दिखा रही थी, और मेरे अंदर किस तरह की गलत धारणाएं थीं। मैं बस पौलुस की तरह लगातार खुद को व्यस्त रख रही थी, अपने ही कार्य के लिये पीड़ा सहने और अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के बारे में सोचती थी। अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर ने बहुत से सत्यों को व्यक्त किया है और उसने सत्य के सभी पहलूओं पर विस्तार से सहभागिता भी की है। ऐसा इसलिए ताकि हम सत्य को समझें, शैतान द्वारा अपनी भ्रष्टता के सत्य को समझकर और पश्चाताप करके खुद को बदल सकें। मगर मैंने परमेश्वर के वचनों को गंभीरता से नहीं लिया। मैंने उन्हें खोजने या उन पर विचार करने की कोशिश नहीं की, न ही कभी उनका अभ्यास करने या उनमें प्रवेश करने के बारे में सोचा। क्या ये मानवजाति को बचाने की परमेश्वर की इच्छा के बिलकुल विपरीत नहीं है? क्या ये मार्ग पूरी तरह से फरीसियों और धार्मिक पादरियों के चुने गए मार्ग जैसा ही नहीं है? फरीसी सिर्फ़ उपदेश देने, अपने काम में पीड़ा सहने और अपने पद की रक्षा करने पर ध्यान देते थे। उन्होंने कभी परमेश्वर के वचनों का अभ्यास नहीं किया और न ही कभी अपने निजी अनुभव और परमेश्वर के वचनों की अपनी समझ को साझा कर पाये। वो लोगों को सत्य की वास्तविकता में नहीं ले जा सके, उन्होंने बस शास्त्रों के शाब्दिक अर्थ, अपने ज्ञान और सिद्धांतों की मदद से लोगों को गलत मार्ग ही दिखाया। इस तरह वो परमेश्वर के विरोधी बन गए। मैंने भी अपनी आस्था में सत्य का अभ्यास करने की कोशिश नहीं की, बल्कि सिर्फ कुछ नियमों का पालन करती रही। मैं बहुत बुरे या बहुत गलत काम नहीं कर रही थी, मेरा व्यवहार अच्छा प्रतीत होता था, और सभाओं में भी वही साझा करती थी जो मुझे सही लगता था, इसलिए मुझे लगा कि मैं अपनी आस्था में बिलकुल सही थी। मगर फिर मुझे एहसास हुआ, क्या मैं बस एक पाखंडी नहीं थी? इसे परमेश्वर में सच्ची आस्था रखना कैसे कहा जाएगा? अगर मैं सत्य की वास्तविकता के बिना और अपने भ्रष्ट स्वभाव में कोई बदलाव लाये बिना ही अपनी उस आस्था पर डटी रही, तो क्या अंत में मुझे हटा नहीं दिया जाएगा? मुझे पछतावा हो रहा था इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, "अब मैं पाखंडी नहीं बनना चाहती। मैं सत्य का अनुसरण करना, तुम्हारे न्याय और ताड़ना को स्वीकार करके उनके प्रति समर्पित होना और खुद को बदलना चाहती हूँ।"

उसके बाद, मैंने अपने भक्ति कार्य के दौरान परमेश्वर के वचनों का ये अंश पढ़ा : "उदाहरण के लिए, तुम्हें लगता है कि अगर एक बार तुम कोई दर्जा हासिल कर लो, तो तुम्हें अपने-आपको एक खास तरह से पेश करने की आवश्यकता है, एक खास अंदाज़ में बोलने की आवश्यकता है। यह अहसास हो जाने के बाद कि यह सोचने का गलत तरीका है, तुम्हें इसे छोड़ देना चाहिए; इस रास्ते पर मत चलो। जब तुम्हारे मन में इस तरह के विचार आएँ तो तुम्हें इस अवस्था से बाहर निकल आना चाहिए, तुम्हें अपने-आपको इसमें फँसने नहीं देना चाहिए। एक बार तुम इसमें फंस गए और ये सोच-विचार तुम्हारे भीतर आकार लेने लगे, तो तुम एक छद्म भेस धारण कर लोगे और अपने ऊपर एक आवरण लपेट लोगे, इतना मज़बूती से कस लोगे कि कोई देख न पाए या तुम्हारे दिल अथवा मन को भाँप न पाए। तुम दूसरों से ऐसे बात करोगे जैसे तुमने कोई मुखौटा लगा रखा हो। वे तुम्हारा हृदय नहीं देख पाएंगे। तुम्हें दूसरों को अपना हृदय देखने देना सीखना चाहिए, इसे उनके लिए खोलना सीखना चाहिए, और इसे उनके नजदीक ले जाना चाहिए—पर तुम बिल्कुल उल्टा रवैया अपनाते हो। क्या यही सिद्धांत नहीं है? क्या अभ्यास का यही मार्ग नहीं है? अपने विचारों और चेतना के भीतर से शुरू करो: जैसे ही तुम्हारे मन में अपने-आपको लपेटने की भावना जागे, तुम्हें इस तरह की प्रार्थना करनी चाहिए, 'हे परमेश्वर, मैं फिर से अपना भेस बदलना चाहता हूँ, और मैं एक बार फिर चालबाजी और छल-कपट में लिप्त होना चाहता हूँ। मैं कितना शैतान हूँ! मैं तुम्हारे अंदर अपने लिए कितनी नफरत पैदा कर रहा हूँ! मुझे इस समय अपने-आप पर कितनी कोफ्त हो रही है, कृपा करके मुझे अनुशासित करो, मुझे धिक्कारो और मुझे दंडित करो।' तुम्हें यह प्रार्थना करते हुए अपने रवैये को प्रकाश में लाना चाहिए। यह तुम्हारे अभ्यास के तरीके से जुड़ा हुआ है। यह अभ्यास मानवता के कौन से पहलू पर लक्षित है? यह उस सोच, उन विचारों और उन मंतव्यों पर लक्षित है जो लोग किसी मामले को लेकर प्रकट कर चुके हैं, और साथ ही जिस रास्ते पर और जिस दिशा में वे चलते हैं। अर्थात, जैसे ही इस तरह के विचार तुम्हारे मन में आएँ और तुम उन पर अमल करने की सोचो, तुम्हें इस पर रोक लगानी चाहिए और फिर इसका विश्लेषण करना चाहिए। जैसे ही तुम अपने विचार को रोक लेते हो और इसका विश्लेषण करते हो, तो क्या तुम इस विचार को उतना ही कम व्यक्त नहीं करोगे और इस पर उतना ही कम अमल नहीं करोगे? और फिर, क्या तुम्हारे भीतर के भ्रष्ट स्वभावों को एक झटका नहीं लगेगा?" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने भ्रष्ट स्वभाव का समाधान करने के लिए होना ही चाहिए अभ्यास का सुनिश्चित मार्ग')। परमेश्वर के वचनों ने मुझे अभ्यास का मार्ग दिखाया। अपने पाखंडी, मक्कार और दुष्ट शैतानी स्वभाव को ठीक करने के लिए, मुझे सत्य का अभ्यास करने, ईमानदार इंसान बनने, परमेश्वर से कुछ नहीं छुपाने और दूसरों के साथ सच्चे मन से सहभागिता करने और समस्याओं का सामना होने पर अपने सच्चे इरादों और विचारों को साझा करने की ज़रूरत थी। जब मेरा दोबारा छल-कपट करने का मन करता तो मैं परमेश्वर से प्रार्थना करके और खुद की इच्छाओं का त्याग करके बिलकुल इसके विपरीत करती थी। मुझे खुले दिल से अपनी भ्रष्टता का खुलासा करके उसका विश्लेषण करना था, ताकि मैं अपने शैतानी स्वभाव को हरा सकूँ। फिर मुझे परमेश्वर के ये वचन याद आये : "यदि तुम्हारे पास ऐसी बहुत-से गुप्त भेद हैं जिन्हें तुम साझा नहीं करना चाहते, और यदि तुम प्रकाश के मार्ग की खोज करने के लिए दूसरों के सामने अपने राज़ और अपनी कठिनाइयाँ उजागर करने के विरुद्ध हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम्हें आसानी से उद्धार प्राप्त नहीं होगा और तुम सरलता से अंधकार से बाहर नहीं निकल पाओगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ')। फिर मैंने एक ईमानदार इंसान होने की अहमियत को जाना। इतने सालों तक आस्था रखने के बावजूद, मैंने कभी सत्य का अभ्यास करने या इसमें प्रवेश करने की कोशिश नहीं की। वो बेहद निराशाजनक था! इसलिए मैंने पश्चाताप करने, सत्य का अभ्यास करने और एक ईमानदार इंसान बनने के लिए तैयार होकर परमेश्वर से प्रार्थना की।

उसके बाद, जब भी मुझे कोई कहता कि मेरे पास सत्य की समझ और आध्यात्मिक कद है, तो मैं बहुत बेचैन हो जाती और शर्मिंदगी महसूस करने लगती। मैंने पहले की तरह इन बातों पर खुशी मनाना बंद कर दिया। एक बार मैं एक बहन से मिली जिसने मेरे बारे में सुना था कि मैं एक पुरानी विश्वासी हूँ और अपने कर्तव्य के लिए पीड़ा सह सकती हूँ, वो मेरी बहुत प्रशंसा करती थी। उसने मुझे साफ़-साफ़ कहा, "बहन, मैं जानती हूँ तुम काफ़ी समय से विश्वासी रही हो, तुमने बहुत सारे उपदेश सुने हैं और बहुत से सत्यों को समझा है। मैं तुम्हारी बहुत सराहना करती हूँ।" उसकी ये बातें सुनकर मैं डर गयी और मुझे घृणा होने लगी। मैंने उसी समय मामले की सच्चाई उसे बता दी, मैंने कहा, "बहन, दरअसल ये सच नहीं है। केवल बाहरी चीज़ों पर ध्यान मत दो। मैं भले ही परमेश्वर की पुरानी विश्वासी हूँ, मगर मुझमें वो काबिलियत नहीं है, और न ही मैं सत्य का अनुसरण या सत्य से प्रेम करती हूँ। इतने सालों की आस्था में मैंने सिर्फ़ कुछ छोटे-मोटे त्याग ही किये हैं। मैंने कुछ अच्छे काम करती हूँ और कीमत भी चुका सकती हूँ, मगर मैं अपने कर्तव्य में सिद्धांतवादी नहीं हूँ और न ही मैंने अपने जीवन स्वभाव में अधिक बदलाव किया है। मैं परमेश्वर द्वारा मुझे सौंपे गए कर्तव्यों को निभाने में सक्षम नहीं रही। मैं परमेश्वर की इच्छा पर विचार या उसका उत्कर्ष नहीं करती, बल्कि परमेश्वर का विरोध करके उसे शर्मिंदा करती हूँ।" फिर मैंने उसके साथ ये सहभागिता की : "तुम्हारी सोच सत्य के अनुरूप नहीं है। बिना सोचे-समझे लोगों की चापलूसी करने के बजाय परमेश्वर के वचनों के सत्यों के आधार पर लोगों और चीज़ों को देखो। परमेश्वर लोगों को कैसे देखता है? उसे इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वो कितने पुराने विश्वासी हैं, कितनी पीड़ा सही है, कितनी दौड़-भाग की है, या वो कितने उपदेश दे सकते हैं। उसे सिर्फ़ इस बात की परवाह है कि क्या वो सत्य का अनुसरण करते हैं, क्या उनके स्वभाव में बदलाव आया है, और क्या वो अपने कर्तव्य में गवाही दे सकते हैं। कुछ ऐसे नए विश्वासी हैं जो सत्य का अनुसरण कर सकते हैं और सत्य में प्रवेश करके उसका अभ्यास कर सकते हैं। वे तेज़ी से प्रगति करते हैं। वो मुझसे कहीं बेहतर हैं। तुम्हें पुरानी विश्वासी होने या पीड़ा सहने के लिए मेरी प्रशंसा नहीं करनी चाहिए बल्कि उनकी ईमानदारी और सत्य का अनुसरण करने के जज़्बे के लिए उनकी प्रशंसा करनी चाहिए। कौन कब तक विश्वासी बना रहेगा, ये परमेश्वर द्वारा निर्धारित है। इसमें प्रशंसा करने वाली कोई बात नहीं। अगर एक पुराना विश्वासी सत्य का अनुसरण नहीं करता और उसने अपना जीवन स्वभाव नहीं बदला है, मगर वो ऊपर-ऊपर से छोटे-मोटे अच्छे काम करता है, तो वो उन्हीं फरीसियों जैसा है जो दूसरों को गुमराह करते हैं। इसलिए सत्य का अनुसरण करना और अपने स्वभाव में बदलाव लाना ही सबसे ज़रूरी चीज़ें हैं।" उस सहभागिता के बाद मेरा मन काफ़ी शांत हो गया। उसके बाद से, सिद्धांतों के बारे में बात करने और सभाओं में बढ़ा-चढ़ाकर बखान करने के बजाय, मैंने सिर्फ़ परमेश्वर के वचनों की रोशनी में स्वयं की अपनी समझ को साझा किया। मैंने ये भी घोषित किया, "मैंने हाल ही में थोड़ा-बहुत आत्मज्ञान प्राप्त किया है। मैं अब तक बदली नहीं हूँ, न ही मैंने अब तक सत्य का अभ्यास किया या इसमें प्रवेश किया है।" मेरी सहभागिता बिलकुल सतही थी, मगर इससे मुझे सुकून मिला।

अपने अनुभव से, मैंने एक बात तो जान ही ली है और इसका गहराई से अनुभव भी किया है। चाहे कोई कितना भी पुराना विश्वासी हो, वो कितना भी अच्छा प्रतीत होता हो, उसका व्यवहार कितना भी अच्छा हो, वो कितनी भी मेहनत करे और पीड़ा सहे, अगर वो सत्य का अनुसरण नहीं करता, उसे स्वीकार नहीं करता और परमेश्वर के न्याय, ताड़ना, काट-छाँट और निपटान के दौरान उसके प्रति समर्पित नहीं होता, खुद को पहचानने की कोशिश नहीं करता और समस्याओं का सामना होने पर परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश नहीं करता, और उसका शैतानी स्वभाव नहीं बदला है, तो इसका मतलब है वो फरीसियों और मसीह विरोधियों के मार्ग पर चल रहा है। अनुकूल मौका मिलते ही वो फिर से एक कपटी, मसीह विरोधी बन जायेगा। इसमें कोई संदेह नहीं। ये एक निश्चित परिणाम है। मैंने देखा है कि बचाये जाने और अपने स्वभाव को बदलने के लिए लोगों द्वारा सत्य का अनुसरण करना, परमेश्वर के न्याय, ताड़ना और निपटान को स्वीकार करके उसके प्रति समर्पित होना आखिर कितना महत्वपूर्ण है! परमेश्वर का धन्यवाद!

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