73. परमेश्वर द्वारा उद्धार

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक कदम—चाहे यह कठोर शब्द हों, न्याय हो, या ताड़ना हो—मनुष्य को सिद्ध बनाता है, और यह बिलकुल सही है। सदियों से कभी परमेश्वर ने ऐसा कार्य नहीं किया है; आज वह तुम्हारे भीतर कार्य करता है ताकि तुम उसकी बुद्धि को सराहो। यद्यपि तुमने अपने भीतर कुछ पीड़ा को सहा है, फिर भी तुम्हारे हृदय अटल महसूस करते हैं और शांतिमय भी; यह तुम्हारे लिए आशीष है कि तुम परमेश्वर के कार्य के इस चरण का आनंद ले सकते हो। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम भविष्य में क्या प्राप्त कर सकते हो, आज अपने भीतर परमेश्वर के जिस कार्य को तुम देखते हो वह प्रेम है। यदि मनुष्य परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना का अनुभव नहीं करता, तो उसके कार्य और उसका जोश सदैव बाहरी बातों पर होगा, और उसका स्वभाव सदैव अपरिवर्तित रहेगा। क्या इसे परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किया जाने वाला माना जाता है? यद्यपि आज मनुष्य के भीतर काफी अहंकार और घमंड है, फिर भी मनुष्य का स्वभाव पहले से बहुत स्थिर है। तुम्हारे प्रति परमेश्वर का व्यवहार तुम्हें बचाने के लिए है, और यद्यपि तुम इस समय कुछ पीड़ा को महसूस करते हो, फिर भी एक ऐसा दिन आएगा जब तुम्हारे स्वभाव में बदलाव आएगा। उस समय, तुम पीछे की ओर मुड़ोगे और देखोगे कि परमेश्वर का कार्य कितना बुद्धिमान है, और यह तब होगा जब सचमुच तुम परमेश्वर की इच्छा को समझने के योग्य होगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल पीड़ादायक परीक्षाओं का अनुभव करने के द्वारा ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो')। यह अंश पढ़कर, मुझे हैरानी होती है कि मैं कितनी अहंकारी थी। मेरी इच्छाएँ बेकाबू थीं, मैं हमेशा शोहरत और रुतबे के पीछे भागती थी, दूसरों से होड़ और तुलना करती रहती थी। मेरे अंदर कोई इंसानियत नहीं थी। परमेश्वर के वचनों के न्याय, ताड़ना और अनुशासन का अनुभव करके, मैंने अपनी शैतानी प्रकृति को थोड़ा-बहुत समझना शुरू किया। मुझे पछतावा और अपने आपसे घृणा होने लगी, मैं ज़्यादा ईमानदार और विनम्र हो गयी। मुझे वाकई लगा कि परमेश्वर के वचनों का न्याय और उसकी ताड़ना इंसान के उद्धार के लिए है।

2005 में, सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकारने के एक साल से भी अधिक होने पर, मुझे कलीसिया की अगुआ चुन लिया गया। परमेश्वर द्वारा उन्नत किए जाने और भाई-बहनों द्वारा मुझ पर विश्वास किए जाने पर, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और संकल्प लिया कि मैं उसके प्रेम का प्रतिदान देने के लिए अपने कर्तव्य का निर्वहन अच्छी तरह से करूँगी। मैंने फौरन खुद को कलीसिया के काम में झोंक दिया। जब कोई किसी खास परेशानी में फँस जाता, तो मैं परमेश्वर के कुछ वचन ढूँढ़कर उसकी मदद करती, हालाँकि मेरी संगति बहुत सतही होती थी, लेकिन फिर भी कुछ तो फायदा हो ही जाता था। भाई-बहन कहते थे कि उन्हें मेरी संगति से थोड़ी-बहुत मदद मिल जाती है। कामकाज में मेरी सफलता को देखते हुए, एक अगुआ ने मुझे एक दिन कई और कलीसियाओं का काम भी सौंप दिया। मैं रोमांचित हो गयी। खास तौर से मैंने देखा कि मैं परमेश्वर के वचनों को अपने साथ काम करने वाली बहन से ज़्यादा तेज़ी से समझ रही हूँ, और अगुआ की राय भी मेरे बारे में काफी अच्छी थी। मैं अपने आपसे काफी खुश थी। मुझे लगा अगुआ को मुझमें कलीसिया के कामकाज को लेकर अच्छी संभावनाएं और ज़रूरी प्रतिभा दिखायी दी। वक्त के साथ-साथ मैं ज़्यादा अहंकारी होती गयी और मुझे लगा कि मुझमें सत्य की थोड़ी वास्तविकता है। मैंने परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने पर ध्यान देना या आत्म-चिंतन करना छोड़ दिया, कोई समस्या आने पर मैं सत्य की खोज भी नहीं करती थी। मैं पूरी तरह से आत्म-तुष्ट और अकड़बाज़ थी, और भाई-बहनों को नीची नज़र से देखती थी। जब मैं देखती कि उनमें से कुछ लोग अपने भ्रष्ट स्वभाव के कारण लाचार हैं और अपना कामकाज ठीक से नहीं कर पा रहे हैं, तो प्यार से उनकी मदद करने के लिए सत्य की संगति करने के बजाय, मैं तुरंत उन्हें फटकार लगाती : "परमेश्वर का काम इतने अहम मुकाम पर है और तुम लोग अभी भी लालचियों की तरह देह-सुख के मज़े ले रहो हो। क्या तुम्हें इस बात का डर नहीं है कि तुम लोग आपदा में जा फँसोगे और दंडित किए जाओगे? अगर तुम लोगों ने अपने कर्तव्य का निर्वहन अच्छे से नहीं किया, तो तुम्हें हटा दिया जाएगा।" मैंने देखा कि वे लोग खुद को विवश महसूस कर रहे थे और मुझसे मिलना नहीं चाह रहे थे, लेकिन आत्म-चिंतन करने के बजाय, मैं उन्हीं पर झुँझला पड़ी कि वे लोग सत्य का अनुसरण नहीं कर रहे।

शीघ्र ही, हमारी सभा में एक अगुआ आयी। मुझे लगा कि यह मेरी तरक्की के लिए है। मुझे हैरानी हुई, जब उसने कहा कि जीवन में मेरा प्रवेश सतही है और मेरी संगति समस्याओं को नहीं सुलझा सकती, और मैं कई कलीसियाओं का काम संभालने के लायक नहीं हूँ। ये सुनकर मैं स्तब्ध रह गयी, मेरे दिमाग ने बिल्कुल काम करना बंद कर दिया। मुझे ये भी याद नहीं कि मैं सभा से घर कैसे पहुँची। मैं रास्ते भर यही सोचकर रोती रही : "मैंने इतनी मेहनत से अपने कर्तव्य का निर्वहन किया है, लेकिन आगे बढ़ने के बजाय मैं और नीचे गिर गयी। भाई-बहन मेरे बारे में क्या सोचेंगे? लगता है मैं इतने विशाल पैमाने का काम नहीं संभाल सकती, लेकिन मैं ऐसे मामूली कामों के आगे हार कैसे मान सकती हूँ?" मैं कई दिनों तक न कुछ खा पायी, न सो पायी, बस शोक में ही डूबी रही। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, उसके प्रबोधन और मार्गदर्शन के लिए प्रार्थना की, ताकि मैं उसकी इच्छा को समझ सकूँ। प्रार्थना के बाद मेरा मन काफी शांत हुआ, और मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : "तुम लोगों की खोज में, तुम लोगों की बहुत सी व्यक्तिगत अवधारणाएँ, आशाएँ और भविष्य होते हैं। वर्तमान कार्य तुम लोगों की हैसियत की अभिलाषा और तुम्हारी अनावश्यक अभिलाषाओं से निपटने के लिए है। आशाएँ, हैसियत, और अवधारणाएँ सभी शैतानी स्वभाव के उत्कृष्ट प्रतिनिधित्व हैं। ... अब तुम लोग अनुयायी हो, और तुम लोगों को कार्य के इस स्तर की कुछ समझ प्राप्त हो गयी है। हालाँकि, तुम लोगों ने अभी तक हैसियत के लिए अपनी अभिलाषा की उपेक्षा नहीं की है। जब तुम लोगों की हैसियत ऊँची होती है तो तुम लोग अच्छी तरह से खोज करते हो, किन्तु जब तुम्हारी हैसियत निम्न होती है तो तुम लोग अब और खोज नहीं करते हो। हैसियत के आशीष हमेशा तुम्हारे मन में होते हैं। ऐसा क्यों है कि अधिकांश लोग अपने आप को नकारात्मकता से नहीं हटा सकते हैं? क्या उत्तर हमेशा निराशाजनक संभावनाओं के कारण नहीं है? ... जितना अधिक तू इस तरह से तलाश करेगी उतना ही कम तू पाएगी। हैसियत के लिए किसी व्यक्ति की अभिलाषा जितनी अधिक होगी, उतनी ही गंभीरता से उसके साथ निपटा जाना होगा उतने ही अधिक बड़े शुद्धिकरण से उसे अवश्य गुजरना होगा। इस तरह के लोग व्यर्थ हैं! उसके द्वारा इन चीज़ों को पूरे तरह से छोड़ दिए जाने के उद्देश से उसके साथ पर्याप्त रूप से निपटा और उसका ठीक से न्याय अवश्य किया जाना चाहिए। यदि तुम लोग अंत तक इस तरह से अनुकरण करते हो, तो तुम लोग कुछ भी नहीं पाओगे। जो लोग जीवन का अनुकरण नहीं करते हैं वे रूपान्तरित नहीं किए जा सकते हैं; जिन्हें सच्चाई की प्यास नहीं है वे सच्चाई को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। तू व्यक्तिगत रूपान्तरण का अनुकरण करने और प्रवेश पर ध्यान केन्द्रित नहीं करती है; बल्कि इसके बजाय तू हमेशा उन अनावश्यक अभिलाषाओं और उन चीज़ों पर ध्यान केंद्रित करती है जो परमेश्वर के लिए तेरे प्रेम को बाधित करती हैं और तुझे उसके करीब आने से रोकती हैं। क्या वे चीजें तुझे रूपान्तरित कर सकती हैं? क्या वे तुझे राज्य में ला सकती हैं?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम एक विषमता होने के अनिच्छुक क्यों हो?')। इसे पढ़कर मैंने परमेश्वर की इच्छा को समझा। परमेश्वर ने रुतबे की मेरी ख्वाहिश से निपटने के लिए ये स्थिति पैदा की है, ताकि मैं आत्म-चिंतन करूँ और सत्य पर चलने के लिए सही मार्ग चुनूँ। मैंने विचार किया कि क्या मेरी आस्था में मेरा उत्कट प्रयास और त्याग वाकई सत्य का अनुसरण करना और एक सृजित प्राणी के कर्तव्य का निर्वहन करना रहा था। सच्चाई ये है कि मेरा लक्ष्य सत्य का अनुसरण करना नहीं, बल्कि दूसरों से आगे निकलने की अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करना था! इसलिए एक बार जब मुझे पद मिल गया तो मैं अपने आपसे काफी खुश थी और मैंने प्रगति करने का कोई प्रयास नहीं किया। बर्खास्तगी के बाद, आत्म-चिंतन करने के बजाय, मैं निराश और कमज़ोर पड़ गयी और परमेश्वर को दोष देने लगी। मैं हार मानकर परमेश्वर को छलने लगी। मुझमें न ज़मीर बचा था, न विवेक, मैं बेहद स्वार्थी और घिनौनी हो गयी थी। मेरा बर्खास्त होना परमेश्वर द्वारा मेरी रक्षा करना था। मुझे निराश नहीं होना चाहिए था, न ही परमेश्वर को गलत समझना चाहिए था, बल्कि अपनी भ्रष्टता को दूर करने के लिए मुझे सत्य की खोज करनी चाहिए थी। इस बात का एहसास होने पर, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की। "हे परमेश्वर, अब मैं रुतबे के पीछे नहीं भागना चाहती। मैं तेरे नियमों और व्यवस्थाओं के आगे समर्पित होना चाहती हूँ, सत्य का अनुसरण करके, तेरी संतुष्टि के लिए अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना चाहती हूँ।" आने वाले दिनों में, मैंने परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने पर ध्यान दिया, आत्म-चिंतन किया, और जब मेरा अहंकारी स्वभाव उजागर हुआ, तो मैंने पूरे होश-हवास में परमेश्वर से प्रार्थना की और अपनी दैहिक इच्छाओं का त्याग कर दिया। कुछ समय तक इस तरह अभ्यास करके मुझे काफी अच्छा लगा, और मैं भाई-बहनों के साथ सही ढंग से व्यवहार कर पायी।

इस घटनाक्रम के कुछ सालों बाद, मुझे एक बार फिर कलीसिया की अगुआ चुन लिया गया। उसके कुछ समय बाद ही, मेरी कलीसिया को एक दूसरी कलीसिया में मिला दिया गया, इसलिए हमें अगुआओं का चुनाव करवाने की ज़रूरत पड़ी। इस कारण, रुतबे की मेरी दबी हुई इच्छा ने एक बार फिर से सिर उठाया, मेरे अंदर अपने पद को गँवाने का भय पैदा हो गया। दूसरी कलीसियाओं के अगुआओं के साथ सभाओं में, मुझे परमेश्वर के वचनों पर उनकी समझ और सत्य पर उनकी संगति कोई असाधारण नहीं लगी, तो मुझे लगा कि मेरा अगुआ चुना जाना तय है। अपने पद को सुरक्षित करने और अधिक लोगों को अपनी योग्यता दिखाने की नीयत से, मैंने एक कमज़ोर-सी कलीसिया में कुछ मसलों को निपटाने और तुरंत सुलझाने का भरोसा दिलाते हुए, खुद को प्रस्तुत किया। मैं संगति करते और समस्याएँ सुलझाते हुए हर रोज़ सभाओं में व्यस्त रहती, और अपनी संगति में जान-बूझ कर बताती कि मैं पहले अपना काम कैसे करती थी, मेरी ख़ास उपलब्धियां क्या थीं और उस समय अगुआ मेरी कितनी इज़्ज़त करते थे। साथ ही, मैं कलीसिया के दूसरे अगुआओं के काम की ग़लतियों और भटकावों के बारे में भी जानबूझ कर बताती, ताकि चोरी-चोरी खुद को ऊपर उठाऊँ और उन्हें नीचे गिराऊँ। मगर परमेश्वर मेरे दिल और दिमाग़ के अंदर देखता है, और चूंकि अपने कर्तव्य में मेरी मंशा ग़लत थी, परमेश्वर ने खुद को मुझसे छिपा लिया। उस दौरान, निरंतर व्यस्त होने के बावज़ूद मैं अपने काम में कुछ भी हासिल नहीं कर पायी। मेरे मुंह में छाले पड़ गये और पानी पीना तक मुश्किल हो गया था। मैं बहुत दुखी थी और मैंने सोचा कि जब से मैं यहाँ हूँ एक भी चीज़ नहीं सुलझा पायी हूँ और मेरे काम से कुछ भी हासिल नहीं हुआ। मैं जानना चाहती थी कि अगुआ मेरे बारे में क्या सोचेंगे, कहीं वे मुझे नाकाबिल तो नहीं समझेंगे। चुनाव से पहले ही अगर मुझे बर्खास्त कर दिया गया तो? कितनी बेइज़्ज़ती होगी! यह सोच कर मैं उसी वक्त तमाम समस्याओं को सुलझाने के लिए बेकरार हो गयी, मगर मेरी संगति चाहे जैसी भी रही हो, सब-कुछ पहले जैसा ही खिंचता रहा। मैं बहुत संतप्त थी, मैं बस परमेश्वर के सामने आकर उससे प्रार्थना ही कर सकती थी: "हे परमेश्वर! मैं अंधेरों में गिर गयी हूँ और किसी भी समस्या को बिल्कुल भी समझ नहीं पा रही हूँ। हे परमेश्वर, मैंने तुम्हारी अवज्ञा की होगी, इसलिए मैं तुमसे मार्गदर्शन की भीख मांगती हूँ। मैं आत्मचिंतन करने और तुम्हारे आगे प्रायश्चित करने को तैयार हूँ।"

फिर मैंने परमेशर के वचनों का एक अंश पढ़ा। "तुम लोगों के मुँह में अधर्मी जिह्वा और दाँत हैं। तुम लोगों के वचन और कार्य उस साँप के समान हैं जिसने हव्वा को पाप करने के लिए प्रलोभित किया था। तुम लोग एक दूसरे से आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत की माँग करते हो, और तुम लोग अपने लिए पद, प्रतिष्ठा और लाभ को झपटने के लिए मेरी उपस्थिति में संघर्ष करते हो, फिर भी तुम लोग नहीं जानते हो कि मैं गुप्त रूप से तुम लोगों के वचनों एवं कर्मों को देख रहा हूँ। यहाँ तक कि इससे पहले कि तुम लोग मेरी उपस्थिति में भी आओ, मैंने तुम लोगों के हृदयों की गहराइयों थाह ले ली है। मनुष्य हमेशा मेरे हाथ की पकड़ से बच निकलना और मेरी आँखों के निरीक्षण से बचना चाहता है, किन्तु मैं कभी भी उसके कथनों या कर्मों से कतराया नहीं हूँ। इसके बजाए, मैं उद्देश्यपूर्ण ढंग से उन कथनों और कर्मों को अपनी नज़रों में प्रवेश करने की अनुमति देता हूँ ताकि मैं उनकी अधार्मिकता को ताड़ना दे सकूँ, और उनके विद्रोह पर न्याय कर सकूँ। इस प्रकार, मनुष्य के गोपनीय कथन और कर्म हमेशा मेरे न्याय के आसन के सामने रहते हैं, और मेरे न्याय ने मनुष्य को कभी नहीं छोड़ा है, क्योंकि उसका विद्रोह बहुत ज़्यादा है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्यों को बचाने का कार्य भी है')। न्याय और प्रकाशन के परमेश्वर के वचन पढ़कर मैं भय से सिहर गयी! मैंने याद किया कि मैं क्या सोच कर काम करती थी। अपना अगुआ का पद पक्का करने और ज़्यादा लोगों से आदर पाने के लिए, मैंने संगति करते हुए समस्याएँ सुलझाने का दिखावा किया था, ताकि अपनी काबिलियत साबित करके मैं सबका दिल जीत सकूं, और हर मोड़ पर खुद को उन्नत कर दूसरों को नीचे गिरा सकूं। मैं चालें चल कर और तरकीबें आज़मा कर भाई-बहनों के साथ प्रतियोगियों जैसे पेश आयी। मुझमें आस्थावान इंसान जैसा कोई गुण नहीं था, कोई इंसानियत नहीं थी। मैं खाने के निवाले के लिए लड़ते किसी जानवर से अलग कैसे थी? मैं बहुत स्वार्थी और घिनौनी थी! मैं दुष्टता कर रही थी और अपने कर्मों से परमेश्वर का विरोध कर रही थी और बहुत पहले ही उसके स्वभाव का अपमान कर चुकी थी। इन घावों का दर्द सहना और अपने काम में कुछ भी हासिल न कर पाना, परमेश्वर द्वारा मेरी ताड़ना और मुझे अनुशासित करना था। उसकी इच्छा यह थी कि मैं आत्मचिंतन करूं, प्रायश्चित करूं और बदल जाऊं। मैंने इस बात पर गौर किया कि मैं हमेशा शोहरत और रुतबे को हर चीज़ से ज़्यादा अहमियत देकर, उनके पीछे क्यों भाग रही थी। यह पूरी तरह से शैतान से धोखा खाना और भ्रष्ट होना ही था। उसने शिक्षा और सामाजिक प्रभावों के इस्तेमाल से मेरे दिल को ऐसे ज़हर और फलसफों से भर दिया, जैसे कि "बुद्धिमान लोग बाहुबलियों पर राज करते हैं" और "अपने आप में विभेद करना और अपने पूर्वजों को सम्मान देना" ये शैतानी फलसफे बड़ी गहराई से मेरे दिल में घर कर चुके थे और मेरी प्रकृति बन चुके थे। मैं इस ज़हर के सहारे जी रही थी, ज़्यादा-से ज़्यादा अहंकारी और दंभी हो गयी थी, शोहरत और रुतबे की इबादत कर रही थी, हमेशा दूसरों से आगे निकलने और बेहतर बनने की कोशिश कर रही थी। सही रास्ते पर न चल कर भ्रष्ट शैतानी स्वभाव में जीने के कारण, मेरी आँखों पर पट्टी बंधी हुई थी और मैं न तो किसी भी मसले की असली वजह को देख पा रही थी, न ही दूसरों की समस्याओं को सुलझा पा रही थी, और मैं कलीसिया के काम में भी देर करने लगी। मैं अपना कर्तव्य न निभा कर दुष्टता कर रही थी। मैंने परमेश्वर के सामने साष्टांग होकर पश्चाताप किया: "हे परमेश्वर, मैंने शोहरत और फायदे के लिए अपने कर्तव्य की परवाह न करते हुए तुम्हें मूर्ख बनाने और धोखा देने की कोशिश की। मुझे शाप मिलना चाहिए! हे परमेश्वर, मैं अब ऐसी नहीं रहना चाहती। मैं आपके सामने प्रायश्चित करना चाहती हूँ|" तब मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े: "चूँकि तुम लोग परमेश्वर के प्राणी हो, इसलिए तुम लोगों को प्राणी का कर्तव्य अवश्य करना चाहिए। तुम लोगों से अन्य कोई अपेक्षाएँ नहीं हैं। तुम लोगों को ऐसे प्रार्थना करनी चाहिए : 'हे परमेश्वर, चाहे मेरी हैसियत हो या नहीं, अब मैं स्वयं को समझती हूँ। यदि मेरी हैसियत ऊँची है तो यह तेरे उत्कर्ष के कारण है, और यदि यह निम्न है तो यह तेरे आदेश के कारण है। सब कुछ तेरे हाथों में है। मेरे पास न तो कोई विकल्प हैं ना ही कोई शिकायतें हैं। ... मैं हैसियत पर ध्यान नहीं देती हूँ; आखिरकार, मैं मात्र एक प्राणी हूँ। यदि तू मुझे अथाह गड्ढे में, आग और गंधक की झील में डालता, तो मैं एक प्राणी से अधिक कुछ नहीं हूँ। यदि तू मुझे उपयोग करता है, तो मैं एक प्राणी हूँ। यदि तू मुझे परिपूर्ण बनाता है, मैं तब भी एक प्राणी हूँ। यदि तू मुझे परिपूर्ण नहीं बनाता है, तो मैं तब भी तुझ से प्यार करती हूँ क्योंकि मैं सृष्टि के एक प्राणी से अधिक कुछ नहीं हूँ।'" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम एक विषमता होने के अनिच्छुक क्यों हो?')। परमेश्वर के वचनों ने मुझे अभ्यास का रास्ता दिखाया। चाहे मुझे हटा दिया गया हो, मेरा कोई रुतबा हो न हो, मुझे अब भी सत्य का अनुसरण करते हुए अपना कर्तव्य ठीक ढंग से निभाना था, अपने कर्तव्य में सत्य का अभ्यास करने और अपने शैतानी स्वभाव को निकाल फेंकने पर ध्यान देना था। इसके बाद मैंने अपने कर्तव्य की मंशाओं में सुधार किया और परमेश्वर के सामने खुद को शांत कर उसके वचन पढ़ कर प्रार्थना करने पर ध्यान देने लगी। मैं कलीसिया की समस्याओं को परमेश्वर के हाथों में सौंप कर उसका ध्यान करने लगी, और भाई-बहनों के साथ सत्य का अनुसरण करने लगी। कलीसिया के वे मसले बड़ी जल्दी हल हो गये। मेरा दिल परमेश्वर के प्रति आभार से सराबोर हो गया। परमेश्वर बहुत ही वास्तविक, बहुत मनभावन है, आमीन। वह मेरे साथ था, मुझे शुद्ध और परिवर्तित करने की तैयारी कर रहा था। आमीन। परमेश्वर का धन्यवाद। मैंने यह भी महसूस किया कि सत्य का अनुसरण करना और अपनी आस्था में स्वभाव में बदलाव लाना कितना अहम है।

छह महीने बाद, मुझे कुछ और कलीसियाओं के काम की जिम्मेदारी सौंपी गयी। मैं जानती थी कि मुझमें रुतबे की इच्छा कितनी प्रबल है और मेरा स्वभाव कितना अहंकारी है, इसलिए मैंने परमेश्वर से ईमानदारी से प्रार्थना की, ताकि मैं अपनी मंशाओं को सुधार कर अपना कर्तव्य ठीक ढंग से निभा सकूं। उस समय मुझे बहन वांग के साथ रखा गया, उसे मसलों के बारे में सपष्ट समझ थी और वह समस्याएँ सुलझाने में अनुभवी थी। मैं अक्सर उसकी सलाह लेती और उसकी खूबियों से सीखती। इस तरह कुछ महीने बिताने के बाद, मैंने समस्याएँ सुलझाने के लिए सत्य पर संगति करने और कलीसिया के तरह-तरह के काम करने में काफी तरक्की की। भाई-बहन भी मेरी सलाह लेने को आतुर होने लगे। अनजाने में ही, मैं एक बार फिर खुद से बहुत खुश होने लगी, सोचने लगी कि आस्था में नयी होने के बावज़ूद, मेरी संगति बहन वांग जितनी ही अच्छी है और मसले निपटाने की मेरी काबिलियत बढ़ गयी है। मुझे लगा कि मेरी कद-काठी ऊँची हो गई है। मैं नहीं जान पायी कि हर मोड़ पर मेरा अहंकार नज़र आ रहा है, शोहरत और रुतबे की मेरी इच्छा पहले से कहीं ज़्यादा मज़बूत होकर लौट आयी है। मैं चाहती थी कि बहन वांग हर चीज़ में मेरी बात सुनें। जब दूसरे उसकी संगति को स्वीकार करते या जब कलीसिया के मामलों में वह अगुआई करती तो मैं सह नहीं पाती। मुझे लगा कि मैंने कुछ अभ्यास किया है और बहुत सारा अनुभव इकट्ठा किया है, मैं कोई नासमझ नौसिखिया नहीं हूँ, और मेरी काबिलियत उसके बराबर ही है। हम दोनों ही अगुआ हैं, तो फिर हमेशा वही क्यों आगे आ जाती है? मैं उसकी बात क्यों सुनूं? अगर यूं ही चलता रहा, तो क्या मैं सिर्फ नाम की अगुआ नहीं रह जाऊंगी? परमेश्वर के वचनों को अच्छी तरह पढ़ कर मैंने ज़्यादा मेहनत से काम करना शुरू किया. ताकि मैं उससे अच्छा कर सकूं, और सहकर्मियों की बैठकों में कलीसिया के कार्य के बारे में चर्चाओं के दौरान, जब वह अपने विचार व्यक्त करती, तो मैं जान-बूझ कर मीनमेख निकालती और गलतियाँ पकड़ती। तब मैं उसे नीचा दिखाने और खुद को ऊंचा उठाने के लिए अपनी "शानदार योजना" साझा करती। कुछ वक्त बाद, कलीसिया के कार्य के बारे में चर्चा करते समय, कुछ सहकर्मियों को मेरी योजनाएं पसंद आयीं और जब उन्हें कुछ दिक्कतें पेश आयीं तो वे मेरे पास आकर मेरे सुझाव सुनने लगे। उन सबको अपने चारों ओर देख कर मुझे बहुत अच्छा लगता था। बाद में, सीसीपी के नज़र रखने के कारण बहन वांग अपना कर्तव्य निभाने के लिए बाहर नहीं जा पा रही थी, तो इस दौरान कलीसिया के काम की पूरी जिम्मेदारी मुझे ही उठानी पड़ी। मैं काम के बोझ तले दबी नहीं, बल्कि मैं बेफ़िक्र ही थी, मैंने सोचा कि आखिरकार हर चीज़ में मेरी ही चलेगी। उस वक्त मैंने महसूस तो किया कि मेरी सोच सही नहीं है, मगर मैंने न तो आत्मचिंतन किया और न ही इसे दिल से कबूल किया।

एक दिन एक अगुआ ने मुझसे एक दूसरे इलाके की सभा में भाग लेने को कहा, एक बड़ा क्षेत्र होने के बावज़ूद इसके लिए करीब दस लोगों को ही चुना गया था। मैंने यह भी सुना कि मेरी पदोन्नति होने वाली है। मुझे सचमुच लगा कि मैं बहुत ख़ास हूँ, हमारे इलाके के लोगों में मैं सबसे बढ़िया हूँ। मैं चार दूसरी बहनों के साथ बड़े उत्साह के साथ ट्रेन में बैठ गयी, लेकिन रास्ते में एक अनहोनी घट गयी| सीसीपी पुलिस ने हमारी टोह लेकर हमें गिरफ़्तार कर लिया। जब उनकी जांच-पड़ताल में कुछ भी पता नहीं चला, तो उन्होंने मुझे "क़ानून के प्रवर्तन को कमज़ोर करने वाले संगठन शी जीआऊ की व्यवस्था करने और उसका इस्तेमाल करने" के अपराध में दो साल की कड़ी मशक्कत की सज़ा दे दी। सज़ा का ऐलान होने के बाद मेरी मुश्किलें बढ़ गयीं। मेरे दिल में परमेश्वर के बारे में गलतफहमियां और शक पैदा होने लगे: "मेरी पदोन्नति से ठीक पहले मुझे क्यों गिरफ़्तार करके जेल में डाल दिया गया? क्या परमेश्वर मुझे उजागर करने और हटाने के लिए इसका इस्तेमाल नहीं रहे हैं? क्या अपना कर्तव्य निभाने और बचाये जाने का मौक़ा मैंने गंवा दिया है?" मैं बहुत दुखी थी और कुछ समझ नहीं पा रही थी। जाने कितनी बार मैंने रो-रो कर परमेश्वर से प्रार्थना की: "हे परमेश्वर, मैं अब तेरी इच्छा नहीं समझ पा रही हूँ। लगता है तू मुझे खारिज कर रहा है, तुझे मेरी ज़रूरत नहीं। हे परमेश्वर, तुझसे विनती करती हूँ, मुझे प्रबुद्ध कर, मुझे रास्ता दिखा, ताकि मैं तेरी इच्छा को समझ सकूं, इस हालत में मैं सत्य में प्रवेश करने का तरीका जान सकूं।" आखिरकार परमेश्वर ने मेरी प्रार्थना सुनी। एक दिन, जेल के उसी वार्ड की एक बहन ने परमेश्वर के कुछ वचनों की एक पर्ची चुपचाप मेरी तरफ सरका दी, जिसमें उसने वे वचन कहीं से लिखे थे। वचनों में कहा गया था: "सब लोगों के लिए शोधन कष्टदायी होता है, और इसे स्वीकार करना बहुत कठिन होता है—परंतु फिर भी, परमेश्वर शोधन के समय में ही मनुष्य के समक्ष अपने धर्मी स्वभाव को स्पष्ट करता है, और मनुष्य के लिए अपनी मांगों को सार्वजनिक करता है, और अधिक प्रबुद्धता के साथ-साथ और अधिक वास्तविक कांट-छांट और व्यवहार को भी प्रदान करता है; तथ्यों और सत्यों के बीच की तुलना के द्वारा वह स्वयं के बारे में और सत्य के बारे में मनुष्य को और अधिक ज्ञान प्रदान करता है, और मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा के विषय में अधिक समझ प्रदान करता है, और इस प्रकार मनुष्य को परमेश्वर के प्रति सच्चे और शुद्ध प्रेम को प्राप्त करने देता है। शोधन का कार्य करने में परमेश्वर के लक्ष्य ये हैं। वह सारा कार्य जो परमेश्वर मनुष्य में करता है, उसके अपने लक्ष्य और उसका अपना महत्व होता है; परमेश्वर व्यर्थ कार्य नहीं करता है, और न ही वह ऐसा कार्य करता है जो मनुष्य के लिए लाभदायक न हो। शोधन का अर्थ परमेश्वर के सामने से लोगों को हटा देना नहीं है, और न ही इसका अर्थ उन्हें नरक में डालकर नाश कर देना है। इसका अर्थ शोधन के दौरान मनुष्य के स्वभाव को बदलना है, उसकी प्रेरणाओं, उसके पुराने दृष्टिकोणों को बदलना है, परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम को बदलना है, और उसके पूरे जीवन को बदलना है। शोधन मनुष्य की वास्तविक परख है, और एक वास्तविक प्रशिक्षण का रूप है, और केवल शोधन के दौरान ही उसका प्रेम उसके अंतर्निहित कार्य को पूरा कर सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल शोधन का अनुभव करने के द्वारा ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है')। मेरा दिल तुरंत रोशन हो गया। ये हालात परमेश्वर द्वारा मेरी परीक्षा के थे, उसकी इच्छा मुझे हटाने की नहीं थी, आमीन। बल्कि मुझे आत्मचिंतन कर खुद को जानने और सत्य में प्रवेश करने की बेहतर सामर्थ्य देने के लिये थी। मैं जान गयी थी कि अब मैं नकारात्मक और कमज़ोर नहीं हो सकती थी, अब मैं परमेश्वर की इच्छा के बारे में अपनी खुद की धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार नहीं चल सकती थी। इसके बजाय, मुझे शांति से सत्य को खोजना चाहिए, और ईमानदारी से आत्मचिंतन कर खुद को जानना चाहिए।

एक रात, मुझे बिल्कुल भी नींद नहीं आ रही थी, मैं चाहे जैसी भी थी, मैं जानना चाहती थी कि परमेश्वर ने मेरे साथ ऐसा क्यों होने दिया। तब परमेश्वर के वचन मेरे मन में कौंधे: "क्या तुम लोग सच में विशाल लाल अजगर से घृणा करते हो? क्या तुम सच में, दिल से इससे घृणा करते हो? मैंने तुम लोगों से इतनी बार क्यों पूछा है? मैं तुमसे यह प्रश्न बार-बार क्यों पूछता हूँ?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 28')। मैंने स्वयं से बार-बार ये पूछा: "क्या मैं बड़े लाल अजगर से सचमुच नफ़रत करती हूँ? क्या मैं वाकई, सच में उससे घृणा करती हूँ?" तब मैंने 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' के इस अंश पर विचार किया: "कुछ लोग कहते हैं, 'मैंने बड़े लाल अजगर को त्याग दिया है। वह मेरा दमन करता है, अब मैं उससे घृणा करता हूँ।' तुम अपने शब्दों से उसको त्याग सकते हो, मगर दिल से नहीं। शायद तुम अपने भीतर उससे अवश्य नफ़रत करते हो, लेकिन तुम्हारा व्यवहार और प्रकृति अभी भी उसके नियंत्रण में हैं। कारण यह है कि बड़े लाल अजगर के विष, विचार, दृष्टिकोण, फ़लसफ़े और जीवन के नज़रिये का तुम्हारे दिल पर अभी भी कब्ज़ा है। चीज़ों को देखने की तुम्हारी दृष्टि अब भी उसकी दृष्टि जैसी ही है। तुम्हारे विचार, जीवन और सामान्य चीज़ों के प्रति तुम्हारा नज़रिया उसके विचारों और नज़रिये के सामान ही हैं। ये सारे-के-सारे बड़े लाल अजगर के ही नज़रिये हैं, इसलिए तुम अभी भी उसकी सत्ता के अधीन ही हो। ... अगर तुम सचमुच शैतान के प्रभाव से बचना चाहते हो तो तुम्हें अपने अंदर के शैतानी ज़हर की पूरी तरह से सफाई करनी होगी। ..." (जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति)। इन वचनों के आधार पर, मैंने महसूस किया कि मैं बड़े लाल अजगर से सिर्फ इसलिए नफ़रत करती हूँ क्योंकि उसने भाई-बहनों को गिरफ़्तार कर उत्पीड़ित किया है, और परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ी पैदा कर उसे नुकसान पहुँचाया है, लेकिन यह वास्तव में उससे नफ़रत करना और उसे त्यागना नहीं था। सचमुच में नफ़रत करना और त्यागना तभी होगा जब हम उसके दुष्ट, प्रतिक्रियावादी सार को पूरी तरह से समझ लेंगे, ताकि हम सचमुच अपने दिल की गहराई से उससे नफ़रत कर सकें, और हमारे अंदर के ज़हर का त्याग कर सकें। सही बात है| बड़े लाल अजगर द्वारा गिरफ़्तारी, उत्पीड़न और यातना का व्यक्तिगत रूप से अनुभव कर, और जबरन उसके सिद्धांत मन में बसा दिये जाने को जान कर, मैंने वाकई देखा कि यह एक दानव है जो सत्य और परमेश्वर से घृणा करता है। मैंने इंसान को धोखा देने और भ्रष्ट करने वाला उसका कुरूप चेहरा देखा। यह नास्तिकता और भौतिकवाद का नगाड़ा बजाता है, यह परमेश्वर के अस्तित्व को नकारने पर तुला हुआ है, यह खुद को "महान, यशस्वी, और सही" घोषित कर ऊंचा उठाने और झूठी शान दिखाने की भरसक कोशिश करता है। यह लोगों के उद्धारक के रूप में अपना गुणगान करता है और चाहता है कि सब उसकी आराधना करें और उसमें विश्वास करें मानो वह परमेश्वर हो, हाँ, घमंड से यह उम्मीद करता है कि वह लोगों के दिलों में परमेश्वर का स्थान ले लेगा। बड़ा लाल अजगर बेहद घिनौना, दुष्ट और बेशर्म है। वाकई! मैंने महसूस किया कि मेरा सार बहुत हद तक उसके सार जैसा ही है। परमेश्वर ने मुझे उन्नत किया, एक अगुआ के कर्तव्य देकर अभ्यास का मौक़ा दिया, सत्य के बारे में संगति करके मसले सुलझाने का तरीका सिखाया, ताकि दूसरे यह जान कर परमेश्वर को समर्पित हो सकें, लेकिन मैंने उस मौके का इस्तेमाल ज़्यादा-से-ज़्यादा दिखावे के लिए किया, सिर्फ ये चाहा कि दूसरे मेरा आदर करें और मेरे कहे अनुसार काम करें। ऐसा करके क्या मैं परमेश्वर का विरोध नहीं कर रही थी? मैं बहन वांग से ईर्ष्या करती थी और मैंने उसे अलग रखा। हमेशा उसकी गलतियों को उछाला और उसे नीचा दिखाया। मैं तो उसे निकलवा देना चाहती थी, ताकि कलीसिया में मेरी ही बात चले। क्या मैं एक निरंकुश इंसान जैसा नहीं कर रही थी? क्या मैं बड़े लाल अजगर के इस ज़हर के काबू में नहीं थी? "केवल एक ही अल्फा पुरुष हो सकता है" और "मैं अपने स्वर्ग और पृथ्वी पर स्वयं प्रभु हूं"? परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों में कहा गया है, "मनुष्य को स्वयं को बड़ा नहीं ठहराना चाहिए, और न ही अपने आपको ऊँचा ठहराना चाहिए। उसे परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए और परमेश्वर को ऊँचा ठहराना चाहिए" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'दस प्रशासनिक आज्ञाएँ जिनका परमेश्वर के चयनित लोगों द्वारा राज्य के युग में पालन अवश्य किया जाना चाहिए')। मैंने जो कुछ किया था उसे अपना कर्तव्य निभाना कैसे कहा जा सकता है? मैं दुष्टता करके परमेश्वर का विरोध कर रही थी! मेरे कर्मों ने बहुत पहले ही परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन कर दिया था, और अगर परमेश्वर ने मुझे अनुशासित नहीं किया होता, अगर उसने उस परिस्थिति का उपयोग मुझे दुष्टता करने से रोकने के लिए न किया होता, अगर मैं अपनी ही प्रकृति और महत्वाकांक्षा के अनुसार चलती रहती, तो मैं शोहरत और रुतबे के लिए तब तक कुछ भी करती रहती, जब तक मैं कोई बहुत बड़ी दुष्टता नहीं कर देती और परमेश्वर द्वारा दंडित न की जाती। इसका एहसास होना मेरे लिए एक गंभीर चेतावनी थी। मैं बेहद खतरनाक हद तक पहुँच गयी थी, मगर मुझे ज़रा भी अंदेशा नहीं था। आखिरकार गिरफ़्तारी के कारण मैं आत्मचिंतन करने और खुद को जानने के लिए मजबूर हो गयी। अगर ये दुष्ट, बड़ा लाल अजगर उभारक के रूप में न होता, तो शायद मैं कभी न जान पाती कि उसका कितना ज़हर मेरे अंदर है, और मैं वास्तव में उसके जैसी ही हूँ। मैं सच में उसे बिल्कुल भी नहीं छोड़ पाती और उसके ज़हर से खुद को छुड़ाने की कोशिश न कर पाती। मैंने देखा कि परमेश्वर ने सब-कुछ मुझे शुद्ध करने के लिए किया था, मुझे बचाने के लिए मैंने उसे दिल की गहराइयों से धन्यवाद दिया।

जेल में मैंने बहुत आत्मचिंतन किया, अपना कर्तव्य निभाने के अवसरों को न संजोने के लिए मैं ख़ास तौर से पछतायी। इसके बजाय मैंने शोहरत और रुतबा खोजने पर ज़ोर दिया था और शैतान के ज़हर के मुताबिक जी रही थी। मैंने बहुत-से ऐसे काम किये जो सत्य के ख़िलाफ़ थे और जिन कामों ने भाई-बहनों का दिल दुखाया था, मैंने कलीसिया के कार्य में रुकावट पैदा करके गड़बड़ी की थी। मैंने परमेश्वर को बहुत आहत किया था, मैं बहुत ऋणी थी और मुझे बड़ा पछतावा हो रहा था। तभी मेरे दिल में सत्य का अनुसरण करने और परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना को अनुभव करने की इच्छा गहराई से जागी, ताकि मैं शीघ्र ही उस ज़हर से छुटकारा पा सकूं और इंसानियत के साथ जी सकूं। जेल से बाहर निकलने के बाद मैं फिर से काम पर लौट आयी, और जब मुझे दोबारा कलीसिया की अगुआ चुना गया, तो मैं पहले की तरह बेपरवाह और खुद को बड़ा समझने वाली नहीं रही। इसके बजाय, मैंने इसे बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी माना, इसे परमेश्वर का आदेश माना जिसे मुझे संजोना चाहिए, सत्य का अनुसरण करने और अपना कर्तव्य निभाने की मुझे भरसक कोशिश करनी चाहिए। बार-बार ताड़ना पाने और अनुशासित किये जाने से शैतान द्वारा छली गयी मेरी आत्मा आखिरकार जागरूक हो गयी। मैंने यह पहचाना कि सत्य का अनुसरण करना, अपने स्वभाव में बदलाव लाने की कोशिश करना, और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाना ही सही लक्ष्य हैं! शोहरत और रुतबे की मेरी आकांक्षा अब पहले जितनी प्रबल नहीं है और मेरा अहंकार भी धीरे-धीरे कम हो रहा है। मैं दूसरों के साथ ठीक ढंग से काम करते हुए अपना कर्तव्य सही तरीके से निभा पा रही हूँ, और अब मैं थोड़ी इंसानियत के साथ जी रही हूँ। मैं गहराई से महसूस करती हूँ कि ये थोड़ा-सा बदलाव आसानी से नहीं आया है। ये सब परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना से हासिल हुआ है। मैं अपने उद्धार के लिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर का धन्यवाद करती हूँ!

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