88. जेल की यातना मुसीबत

मई 2004 में एक दिन, मैं कुछ भाई-बहनों के साथ एक सभा में हिस्सा ले रही थी, तभी 20 से ज़्यादा पुलिस अफसरों ने धावा बोल दिया। उन्होंने बताया कि वे म्युनिसिपल नेशनल सिक्योरिटी ब्रिगेड से आये हैं और पिछले चार महीनों से मेरे सेलफ़ोन की निगरानी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वे पूरे प्रांत में चल रही कानूनी कार्यवाही का हिस्सा हैं जिसके तहत सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कई विश्वासियों को गिरफ्तार कर लिया गया है। वे पूछताछ के लिये मुझे शहर के एक पार्टी स्कूल में लेकर गये। जैसे ही मैं वहां पहुँची, उन्होंने मुझे जूते उतारकर घुटनों के बल बैठ जाने को कहा। कुछ ही देर बाद, मेरे पैर सुन्न पड़ गये, जैसे ही अपनी स्थिति बदलने की कोशिश करती, पुलिसवाले मुझ पर बरस पड़ते, कहते कि मुझे ज़रा भी हिलने-डुलने की इजाज़त नहीं है। उन्होंने करीब दो घंटे तक मुझे वैसे ही घुटनों के बल बिठाये रखा, उसके बाद अपनी पूछताछ शुरू की। "तुम्हारा अगुआ कौन है? कलीसिया का पैसा कहां रखा है?" मैंने कुछ नहीं कहा। उसके बाद नेशनल सिक्योरिटी ब्रिगेड का कप्तान एक जोड़ी हथकड़ी लेकर आया और दहाड़ते हुए कहा, "उसके साथ अपना समय खराब मत करो। उसे इनका मज़ा चखाओ!" फिर उसने मुझसे कहा, "दूसरे कमरे की आवाज़ सुन रही हो?" उस कमरे से एक बहन के चीखने की आवाज़ आ रही थी, मुझे थोड़ी घबराहट हुई और डर भी लगा, ये सोचकर कि "ये पुलिसवाले मुझे इसी तरह यातना देने वाले हैं। मैं इसे कैसे सह पाऊँगी?" फिर मैंने मन-ही-मन परमेश्वर से प्रार्थना की, मैंने हिम्मत देने की विनती करते हुए कहा कि मैं उसके आगे समर्पण करने और गवाही देने के लिये तैयार हूँ। तभी कप्तान ने मुझे ज़मीन पर धकेल दिया, मेरे हाथों को पीछे मोड़कर हथकड़ी लगा दी और फिर ऊपर-नीचे झटके देने लगा। इसी तरह कई बार ऊपर-नीचे खींचने और झटके दिये जाने के बाद, दर्द के मारे मेरे शरीर से पसीने निकलने लगे। करीब दस मिनट तक इसी तरह करते रहने के बाद आखिरकार उन्होंने मुझे छोड़ा। ये तरीका काम न आया देखकर उन्होंने कोई और तरीका आज़माने का फ़ैसला किया। वे दूसरे इलाके से कुछ और पुलिसवालों को लेकर आये जिनमें शहर की दंगा रोकने वाली पुलिस भी शामिल थी, फिर पुलिसवाले बारी-बारी से समूह बनाकर मुझसे पूछताछ करने लगे। हर समूह में चार पुलिसवाले होते और वे दिन-रात बारी-बारी से मेरी खबर लेते रहे, मुझे सोने तक नहीं देते और लगातार सताते रहते। जैसे ही मेरी आँखें नींद से बोझिल होने लगतीं और मुझे नींद आती, पुलिसवाले मेरे चेहरे पर ठंडा पानी उड़ेल देते और मेरे बालों को खींचने लगते, ताकि वे मेरे दृढ़ संकल्प को तोड़ सकें और मैं अपने भाई-बहनों से गद्दारी करने और परमेश्वर को धोखा देने पर मजबूर हो जाऊं। हर दिन मेरी हिम्मत टूटने के कगार पर पहुंच जाती, मुझे डर था कि अगर मैं एक पल के लिये भी होश खो बैठी, तो कहीं मैं कलीसिया की जानकारी का ख़ुलासा न कर दूँ। मन-ही-मन मैं परमेश्वर से प्रार्थना करती रही, उन भयावह दिनों में मुझे राह दिखाने की गुहार लगाती रही। पुलिसवाले भी जान-बूझकर मुझे अपमानित करते रहे। जब मुझे शौचालय का इस्तेमाल करना होता, तो वे मुझे दरवाज़ा भी बंद नहीं करने देते, यहां तक कि पुलिसवाले शौचालय के अंदर-बाहर आते जाते रहते। उनमें से कुछ ने तो अंदर झाँकने का इंतज़ाम तक कर लिया था और कई बार वे दरवाज़े पर खड़े होकर मुझे शौचालय जाते हुए देखते। 12 दिनों तक मुझसे इसी तरह पूछताछ होती रही और मुझे यातना दी जाती रही। 10 से ज़्यादा दिनों तक नहीं सो पाने और नसें खिंच जाने के कारण, मुझे गंभीर कब्ज की शिकायत हो गयी। उनकी यातनाओं के कारण मेरा वज़न 58 किलो से घटकर 52 किलो रह गया। 12 दिन में ही मेरा वज़न 6 किलो कम हो गया।

तेरहवें दिन पुलिसवाले मुझे शहर की एक जेल में लेकर आये। करीब एक महीने बाद, वे निगरानी के लिये मुझे एक महंगे होटल में लेकर गये। वे मेरे पति को लेकर आये और उन्हें मेरे साथ कमरे में अकेले छोड़ दिया, ताकि वे मुझे कलीसिया की जानकारी देने के लिये मना सकें। पहले तो मैं कमज़ोर पड़ने लगी और सोचने लगी कि मैं जल्द से जल्द अपने पति के साथ इस नरक से बाहर निकल सकती हूँ। मगर यहाँ से निकलने के लिए मुझे परमेश्वर को धोखा देना होगा और अपने भाई-बहनों से गद्दारी करनी होगी। तभी मुझे परमेश्वर के वचन याद आये: "तुम लोगों को जागते रहना चाहिए और समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए, और तुम लोगों को मेरे सामने अधिक बार प्रार्थना करनी चाहिए। तुम्हें शैतान की विभिन्न साजिशों और चालाक योजनाओं को पहचानना चाहिए, आत्माओं को पहचानना चाहिए, लोगों को जानना चाहिए और सभी प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीजों को समझने में सक्षम होना चाहिए" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 17')। परमेश्वर के वचनों ने मुझे याद दिलाया कि पुलिस मेरी कमज़ोरी का फायदा उठाने के लिये मेरे पति को लेकर आयी है ताकि मैं परमेश्वर को धोखा दे दूँ। ये शैतान की मक्कार साजिश है और मैं इसके जाल में फंसने ही वाली थी। मैंने सोचा कि कैसे जब पुलिसवाले मुझे पूछताछ कर रहे थे तो उन्होंने कुछ भाई-बहनों के नाम और तस्वीरों की सूची दिखाकर मुझसे उनकी पहचान करने के लिये कहा था, मगर मैंने इनकार कर दिया। मुझे यह भी याद आया कि कैसे मेरे पति मेरी आस्था को लेकर हमेशा मेरा साथ दिया करते थे, मैंने सोचा कि मैं उन भाई-बहनों को सचेत करने के लिए अपने पति को मनाकर इस मौके का फ़ायदा उठा सकती हूँ ताकि भाई-बहन भूमिगत होकर गिरफ़्तारी से बच सकें। इसलिये मैंने पति के कंधे पर सिर रखकर रोने का बहाना बनाया और धीमी आवाज़ में अपनी योजना उनके कानों में बता दी। वे इससे सहमत हो गये। मैं हैरान रह गई जब फ़ौरन एक महिला अधिकारी दनदनाते हुए कमरे में दाखिल हुई और मेरे पति से कहा, "हम तुम्हें यहां हमारी मदद के लिये लाये थे। तुम क्या बातें कर रहे हो? यहां से निकल जाओ!" पुलिस चाहती थी कि मेरे पति मुझे मनाएं ताकि मैं उन्हें कलीसिया की जानकारी देकर परमेश्वर को धोखा दूँ लेकिन जब इस महिला अधिकारी ने देखा कि उनकी तरकीब काम नहीं आयी है, वो आगबबूला हो उठी और मेरे पति को फ़ौरन निकल जाने के लिए कहा। ये पुलिस कितनी पापी और दुष्ट है! परमेश्वर के मार्गदर्शन ने ही मुझे शैतान की मक्कार साजिश में फँसने से बचाया।

इसके बाद, पुलिस मुझे वापस पूछताछ के लिए पार्टी स्कूल ले गयी। उन्होंने मुझे एक टाइगर चेयर से बाँध दिया, फिर एक महिला अधिकारी दनदनाती हुई अंदर आयी और प्लास्टिक के चप्पल से मेरे चेहरे पर मारने लगी। सब कुछ धुंधला दिखने लगा और फिर मैं कुर्सी पर लुढ़क गई। उसने कहा कि मैं नाटक कर रही हूँ, उसने गाली देते हुए मेरे बालों को जोर का झटका दिया और मुझे फिर से मारने लगी। मेरा चेहरा बैंगन की तरह सूज गया और आँखों से खून टपकने लगा। फिर एक पुरुष अधिकारी आया और उसने मुझे टाइगर चेयर से निकाला, फिर मेरे बालों को बुरी तरह से खींचकर मुझे टाइगर चेयर के नीचे डालने की कोशिश करने लगा। मैं उसके नीचे फ़िट नहीं हो पायी, तो उसने लात मारकर गाली दी और कहा कि मैं कुतिया से भी बदतर हूँ। उन्होंने मुझे कुर्सी के नीचे धकेल दिया और हिलने-डुलने से मना किया, उसके बाद मुझे वापस कुर्सी में डालकर जंजीरों से बाँध दिया। इस तरह बेरहमी से पीटे जाने और अपमानित होने से मैं बहुत ज़्यादा परेशान हो गई और कमज़ोर पड़ने लगी। मैंने मन-ही-मन सोचा: "वे मुझे यातनाएं देना बंद नहीं करेंगे। आखिर ये कब तक चलेगा?" ऐसी भयानक पीड़ा में, मैं मौत मांगने लगी, लेकिन उन्होंने मुझे टाइगर चेयर से बाँध रखा था, तो उसकी भी गुंजाइश नहीं थी। इसलिये मैं मन-ही-मन परमेश्वर से प्रार्थना करती रही और फिर उन सभी संतों के बारे में सोचा जिन्हें प्रभु के सुसमाचार का प्रचार करने के कारण बुरी तरह सताया गया था। कुछ संतों को घोड़ों से कुचलवाया गया, कुछ को पत्थरों से मार डाला गया और कुछ को तो टुकड़े-टुकड़े कर फेंक दिया गया। उन सभी ने ऐसी यातनाएं सहीं जो कोई आम इंसान नहीं सह सकता और उन सबने अपने जीवन में परमेश्वर के लिये गवाही दी। और एक मैं हूँ जो थोड़ी सी पीड़ा नहीं सहन कर पा रही हूँ और इससे बचने के लिये मौत मांग रही हूँ। मैं बहुत कमज़ोर थी और गवाही बिल्कुल भी नहीं दे रही थी। इन चीज़ों के बारे में सोचकर, मैं दुख और पछतावे से भर गई, मैंने फ़ौरन परमेश्वर के सामने जाकर प्रार्थना और पश्चाताप करने लगी। तभी मेरी नज़र पास की खिड़की के बाहर बैठी छोटी सी चिड़िया पर पड़ी। इसके पंख धूसर रंग के थे, मुझे याद है उस दिन हल्की-सी बारिश भी हो रही थी। वो चिड़िया चहचहा रही थी और मुझे लग रहा कि चिड़िया ये कह रही हो, "गवाही दो, गवाही दो ..." चिड़िया की चहचहाहट तेज़ होती गई और फिर आवाज़ करीब-करीब कर्कश होने लगी। मुझे एहसास हुआ कि इस चिड़िया के ज़रिए परमेश्वर मुझे याद दिला रहा है और मैं काफ़ी प्रेरित हुई। परमेश्वर से प्रार्थना करते हुए मैं रो-रोकर कहने लगी, "प्रिय परमेश्वर, मैं डरपोक या कायर नहीं बनना चाहती। मैं इस तरह कमज़ोर और आतंकित होकर मरना नहीं चाहती। कृपा करके मुझे आस्था और शक्ति दो। मैं गवाही देकर शैतान को शर्मिंदा करना चाहती हूँ।" तभी परमेश्वर के वचन मुझे याद आये: "तुम सब लोगों को शायद ये वचन स्मरण हों : 'क्योंकि हमारा पल भर का हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।' तुम सब लोगों ने पहले भी ये वचन सुने हैं, किंतु तुममें से कोई भी इनका सच्चा अर्थ नहीं समझा। आज, तुम उनकी सच्ची महत्ता से गहराई से अवगत हो। ये वचन परमेश्वर द्वारा अंत के दिनों के दौरान पूरे किए जाएँगे, और वे उन लोगों में पूरे किए जाएँगे जिन्हें बड़े लाल अजगर द्वारा निर्दयतापूर्वक उत्पीड़ित किया गया है, उस देश में जहाँ वह कुण्डली मारकर बैठा है। बड़ा लाल अजगर परमेश्वर को सताता है और परमेश्वर का शत्रु है, और इसीलिए, इस देश में, परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोगों को इस प्रकार अपमान और अत्याचार का शिकार बनाया जाता है, और परिणामस्वरूप, परमेश्वर के वचन तुम लोगों में, लोगों के इस समूह में, पूरे किए जाते हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है जितना मनुष्य कल्पना करता है?')। "इन अंतिम दिनों में, तुम्हें परमेश्वर के प्रति गवाही देनी है। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारे कष्ट कितने बड़े हैं, तुम्हें अपने अंत की ओर बढ़ना है, अपनी अंतिम सांस तक भी तुम्हें परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य बने रहना आवश्यक है, और परमेश्वर की कृपा पर रहना चाहिए; केवल यही वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करना है और केवल यही मजबूत और सामर्थी गवाही है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो')। परमेश्वर के वचनों से मुझे सुकून और हौसला मिला। इन वचनों ने मुझे दिखाया कि परमेश्वर में विश्वास करने और अपना कर्तव्य निभाने के दौरान सीसीपी द्वारा मुझे सताया और नुकसान पहुंचाया जाना निश्चित है क्योंकि सीसीपी दानव शैतान है, परमेश्वर का शत्रु है। मगर परमेश्वर अपनी बुद्धि का प्रयोग शैतान की मक्कार साजिशों के हिसाब से करता है, परमेश्वर हमारी आस्था और आज्ञाकारिता को पूर्ण करने के लिए शैतान के ज़रिए उत्पीड़न और क्रूर यातनाओं का इस्तेमाल करता है, और ऐसा करने में, वह विजेताओं का एक समूह बनाता है। मैं सत्य को हासिल करने के लिए पीड़ा सह रही थी, यह पीड़ा सार्थक भी है और उपयोगी भी। तभी मुझे याद आया कि कैसे परमेश्वर हमें बचाने के लिए स्वयं देहधारी हुआ, कैसे उसे ठुकराया और बदनाम किया गया, कैसे सीसीपी ने उसका पीछा करके सताया, उसे कहीं शरण नहीं मिली। परमेश्वर ने इतना अधिक अपमान और पीड़ा झेली, तो एक भ्रष्ट इंसान होने के नाते, मेरी इस थोड़ी सी पीड़ा की क्या तुलना? मसीह के साथ पीड़ा सहन करने में सक्षम होना तो एक सम्मान है। मैं डरकर मौत का सामना नहीं कर सकती; चाहे शैतान मुझे कितनी भी यातना दे, मैंने फ़ैसला कर लिया कि मैं अपनी आख़िरी सांस तक परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए गवाही दूँगी। फिर नेशनल सिक्योरिटी ब्रिगेड के चीफ़ ने कुटिल मुस्कान के साथ कहा, "तुम बड़ी मजबूती से डटी हुई हो। हमने इस तरह तुम्हारी खातिरदारी करने की नहीं सोची थी। अगर तुम हमें सब कुछ बता दो और सहयोग करो, तो मेरी गारंटी है तुम्हें जल्दी ही घर जाने दिया जाएगा और तुम अपने परिवार से मिल सकोगी।" वे मुझे खिलाने के लिये चिकन और ब्रेड भी लेकर आये, मगर मैं जानती थी कि ये मुझे बहकाने का एक और स्वांग था ताकि मैं परमेश्वर को धोखा दे दूँ। मैंने उनकी ओर देखकर पक्के इरादे से कहा, "मुझे आपका ये तरीका पसंद नहीं आया, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। मैं आपके लिये उस बकरे जैसी हूँ जिसे आप जब चाहें हलाल कर सकते हैं। मुझे पता है मैं यहां से जिंदा बचकर नहीं जा सकती और मैंने इसे स्वीकार भी कर लिया है, तो आप जो चाहें कर सकते हैं। मैंने आपको पहले ही बता दिया है कि मुझे आपके सवालों के जवाब नहीं मालूम!" फिर उसने एक भेद भरी मुस्कान के साथ कहा, "इतनी संजीदा मत बनो। थोड़ी अकलमंदी दिखाओ। बस हमें वो बता दो जो हम जानना चाहते हैं और तुम घर जा सकती हो।" फिर वो मुड़कर चुपचाप निकल गया। उसके बाद पुलिस ने मुझे टाइगर चेयर पर ही बिठाये रखा। दो हफ़्ते बाद, वे मुझे नज़रबंदी घर लेकर गये। वहां के स्टाफ ने मेरी गंभीर चोट को देखा तो मुझे वहां रखने से मना कर दिया। नेशनल सिक्योरिटी ब्रिगेड की पुलिस ने मुझे कहने को मजबूर किया कि ये चोट गिरने की वजह से लगी है, तो नज़रबंदी घर की पुलिस के पास मुझे स्वीकार करने के सिवा कोई चारा न रहा।

एक महीने तक मैं नज़रबंदी घर में ही रही, जिसके बाद पुलिस मुझे और पूछताछ के लिये वापस पार्टी स्कूल लेकर आयी। उन्होंने चौबीसों घंटे मुझे टाइगर चेयर पर बिठाये रखा, पीठ सीधी रहती और पैरों को 90 डिग्री पर मोड दिया जाता। ऐसा एक महीने तक चला। गर्दन में असहनीय दर्द होने लगा और पैर बुरी तरह सूज गये। पुलिस लगातार मुझे मारती, परेशान करती, अपमानित करती, अंदर से मैं काफ़ी डर गई थी। खासकर, मैंने उन्हें बात करते हुए सुना कि कैसे उन्होंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के बहुत से विश्वासियों को गिरफ्तार किया, पुरुष हो या महिला, बुजुर्ग हो या युवा, गिरफ्तार होने वाले हर इंसान को पहले यातना देकर डराया जाता और फिर वे अपनी बात मनवाने की कोशिश करते। ये उनका हिम्मत तोड़ देने वाला तरीका था। इन दानवों को इतनी बेशर्मी से डींगें हांकते सुनकर और उन्हें आत्मतुष्ट हँसी हँसते और पाशविक ठहाके लगाते देखकर, मैं नफ़रत से दांत पीसने लगी। उनकी बातों से पता चला कि वे मेरे भाई-बहनों को कैसी तकलीफ़ दे रहे हैं। सीसीपी सच में ऐसे दानवों का गिरोह है जो मज़े के लिये लोगों को तकलीफ़ देता है। इन दानवों को धिक्कारते हुए मैंने मन-ही-मन प्रार्थना की। बाद में, जब पुलिसवालों ने देखा कि उन्हें मुझसे अपने मतलब की जानकारी नहीं मिल रही है, तो उन्होंने मुझे एक नज़रबंदी केंद्र में भेज दिया जो दरअसल अपराधियों वाला नज़रबंदी केंद्र था, उसके बाद मेरा मत-परिवर्तन करने के लिये कहीं और भेज दिया गया। आखिर में, मुझे वापस शहर के नज़रबंदी घर लाया गया जहां मैं एक साल तीन महीने तक बंद रही। पुलिस ने ये सब मेरे हौसले को तोड़ने और मुझे परमेश्वर को धोखा देने को मजबूर करने के लिये किया मगर उन्हें कामयाबी नहीं मिली। बाद में, उन्होंने मुझ पर "क़ानून लागू करने के काम में दखल देने के लिये सामंती अंधविश्वास का इस्तेमाल करने" का आरोप लगाकर चार साल के लिये जेल भेज दिया।

जेल में, मुझे फिर पता चला कि नर्क में रहने पर कैसा महसूस होता है। मुझे एक प्रोडक्शन लाइन पर कपड़े बनाने का काम दिया गया जहां हर किसी को अपना काम पूरा करना होता था। वहां प्रक्रिया के अनुसार नहीं चलने या अपना काम ख़त्म नहीं कर पाने पर, रात को 11 बजे काम ख़त्म होने के बाद, 30 मिनट से लेकर एक घंटे तक खड़े रहने को मजबूर किया जाता। उस अवधि के दौरान, खाने-पीने को छोड़कर, मेरा पूरा समय काम वाले उसी कमरे में बीतता। प्यास लगने पर पानी भी नहीं पी पाती, शौचालय के लिए भागकर जाना और वापस आना पड़ता। मुझे गंभीर कब्ज की शिकायत हो गयी। क्योंकि मेरा पूरा दिन बैठकर काम करने में ही निकलता और वहां काम भी बहुत ज़्यादा करना होता था, फिर पुलिस के हाथों मिली यातना और दो महीने से ज़्यादा समय तक टाइगर चेयर पर बिठाये रखने के कारण, मेरी गर्दन में फिर से तेज़ दर्द रहने लगा और अक्सर मुझे सिर दर्द और मतली की समस्या रहने लगी। एक बार, मैं शॉवर में फिसलकर गिर पड़ी और मेरा सिर जोर से ज़मीन पर टकराया। मेरी पीठ पर भी चोट लगी और मेरी आँखें चौंधिया गयीं, मैं बिल्कुल भी हिल-डुल नहीं पा रही थी। मुझे लगा जैसे मेरी पीठ की हड्डी टूट गई है, इसमें काफ़ी दर्द होने लगा। दूसरे कैदियों ने भी कहा कि मेरा काम तमाम हो गया या अब मैं अपाहिज हो जाऊँगी। वे सभी मदद के लिये चिल्लाने लगे और अलार्म की घंटी बजा दी, मगर कोई नहीं आया। आखिरकार, कुछ कैदियों ने मुझे बिस्तर पर पहुंचाया। मुझे लगा कि मेरा शरीर टूट गया है और मैं लगातार दर्द से रोती रही। उस रात इतना तेज़ दर्द हुआ कि मैं बिल्कुल भी सो नहीं पायी। अगले दिन सुबह 8 बजे एक महिला गार्ड मेरे कमरे में आयी। उसने बेधड़क पूछा कि मुझे कितनी ज़्यादा चोट लगी है। मैंने कहा, "लगता है मेरी पीठ टूट गई है। मैं बिल्कुल भी हिल-डुल नहीं सकती और सिर में काफ़ी दर्द हो रहा है।" मगर उसने बस मज़ाक उड़ाते हुए कहा, "कोई बड़ी बात नहीं। तुम्हें काम के लिये ऊपर जाना होगा, बहुत से काम करने हैं। अगर तुम हिल-डुल नहीं सकती, तो किसी की मदद लेकर ऊपर पहुँचो। अगर कोई मदद नहीं करता, तो तुम्हें खुद ही रेंगकर वहां तक पहुंचना होगा!" फिर वो मुड़कर वहां से निकल गयी। मुझे उस भयानक पीड़ा को सहन करते हुए दूसरे कैदियों से मुझे धीरे-धीरे बिस्तर से उतरने में मदद करने के लिए कहना पड़ा। मुझे उठाकर बिठाने में ही 30-40 मिनट लग गये और फिर मैं धीरे-धीरे सीढ़ियों वाली दीवार की ओर बढ़ी और सीढ़ियां चढ़ने लगी। काम की जगह पर पहुंचना बहुत ही मुश्किल था, जब मैंने बैठने की कोशिश की, तो बार-बार कोशिश करने के बाद भी, कामयाब नहीं हो पायी। आखिरकार, मैंने अपनी मशीन को पकड़कर और दर्द से दांत पीसते हुए, खुद ही बैठने की भरसक कोशिश की। मुझे लगा कि मेरी पीठ में कुछ टूट गया है, दर्द और तेज़ होने लगा। इस दर्द को सहन करना बहुत मुश्किल था, फिर वहां का डॉक्टर आया जिसने मेरी पीठ पर थोड़ा आयोडीन लगाकर रगड़ने के बाद तीन नोटोजिनसेंग टैबलेट खाने को दिये। उसने कहा कि मैं तीनों टैबलेट खाकर वापस काम पर लग जाऊं। और फिर, शरीर और सीने में हो रहे तेज़ दर्द के कारण मुझे ऐसा लगा कि अब मेरा बचना मुश्किल है। इस तरह अमानवीय ढंग से पेश आने पर मुझे इन पुलिसवालों से काफ़ी नफ़रत हो गयी। उनकी नज़रों में, कैदी कुत्तों से भी बदतर हैं। हम उनके लिये बस पैसे कमाने की मशीन थे। मैंने सोचा कि जेल में तो अभी एक साल भी नहीं बीता है, जबकि मुझे चार साल की सजा मिली है। इतने लंबे समय मैं जिंदा कैसे रह पाऊँगी? मैं नहीं जानती थी कि यहाँ से बचकर निकल पाऊँगी भी या नहीं। ये सोचकर मैंने खुद को काफ़ी अकेला और अलग-थलग महसूस किया। इन सबसे बेखबर, मैं परमेश्वर के वचनों का अपना पसंदीदा भजन गुनगुनाने लगी: "जब तुम कष्टों का सामना करते हो तो तुम्हें देह पर विचार नहीं करने और परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत नहीं करने में समर्थ अवश्य होना चाहिए। जब परमेश्वर अपने आप को तुमसे छिपाता है, तो तुम्हें उसका अनुसरण करने के लिए, अपने पिछले प्यार को लड़खड़ाने या मिटने न देते हुए उसे बनाए रखने के लिए, तुम्हें विश्वास रखने में समर्थ अवश्य होना चाहिए। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर क्या करता है, तुम्हें उसके मंसूबे के प्रति समर्पण अवश्य करना चाहिए, और उसके विरूद्ध शिकायत करने की अपेक्षा अपनी स्वयं की देह को धिक्कारने के लिए तैयार रहना चाहिए। जब तुम्हारा परीक्षणों से सामना होता है तो तुम्हें अपनी किसी प्यारी चीज़ से अलग होने की अनिच्छा, या बुरी तरह रोने के बावजूद तुम्हें अवश्य परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए। केवल इसी को सच्चा प्यार और विश्वास कहा जा सकता है। तुम्हारी वास्तविक कद-काठी चाहे जो भी हो, तुममें सबसे पहले कठिनाई को भुगतने की इच्छा और सच्चा विश्वास, दोनों ही अवश्य होना चाहिए और तुममें देह-सुख को त्याग देने की इच्छा अवश्य होनी चाहिए। तुम्हें परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने के उद्देश्य से व्यक्तिगत कठिनाइयों का सामना करने और अपने व्यक्तिगत हितों का नुकसान उठाने के लिए तैयार होना चाहिए। तुम्हें अपने हृदय में अपने बारे में पछतावा महसूस करने में भी अवश्य समर्थ होना चाहिए : अतीत में तुम परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर पाते थे, और अब तुम स्वयं पर पछतावा कर सकते हो। इनमें से किसी भी एक का अभाव तुममें बिलकुल नहीं होना चाहिए—परमेश्वर इन चीज़ों के द्वारा तुम्हें पूर्ण बनाएगा। यदि तुम इन कसौटियों पर खरे नहीं उतरते हो, तो तुम्हें पूर्ण नहीं बनाया जा सकता है" ("मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ" में 'पूर्ण कैसे किए जाएँ')। मैंने मन-ही-मन इस भजन को गाया, जितना अधिक इसे गाती, मुझे उतनी अधिक प्रेरणा मिलती। मुझे लगने लगा कि मेरी हिम्मत वापस आ रही है और महसूस हुआ कि भले ही मैं इस शैतान की मांद में, अपनी कमज़ोर हालत में काफ़ी तकलीफ़ उठा रही हूँ, मगर परमेश्वर के वचन अभी भी मेरा मार्गदर्शन कर रहे हैं, मुझे विश्वास और हिम्मत दे रहे हैं। परमेश्वर ने मुझे कभी नहीं छोड़ा और परमेश्वर के वचनों के साथ, मैं अकेली नहीं रहूँगी। यह सोचकर मुझे काफ़ी सुकून मिला और पीड़ा सहन करने का संकल्प न होने पर मुझे काफ़ी पछतावा हुआ। इन मुश्किलों और परीक्षणों का सामना करके, मैं निराश हो गयी और परमेश्वर के दिल को दुखाया। मैंने सोचा कि अपनी गिरफ़्तारी के बाद से अब तक मैंने क्या कुछ झेला। पुलिस ने मुझे काफ़ी समय तक नुकसान पहुंचाया और यातना दी, अगर परमेश्वर के वचनों का मार्गदर्शन न होता और परमेश्वर मेरी देखभाल न कर रहा होता, तो अब तक मैं कई बार मर चुकी होती। अब एक बार फिर इस अमानवीय यातना को सहते हुए, मुझे यह विश्वास था कि अगर मेरा भरोसा परमेश्वर पर बना रहा, तो मैं इस नर्क से भी निकल पाऊँगी। परमेश्वर मेरी आस्था को पूर्ण करने के लिए इस हालात का इस्तेमाल कर रहा था। मैं जानती थी कि मैं उसका दिल और नहीं दुखा सकती; मुझे उस पर भरोसा करना होगा और मजबूत बनना होगा, ज़िंदा रहकर उसके लिये गवाही देनी होगी। इन बातों को सोचकर, मेरी निराशा ख़त्म होने लगी। परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन से ही मैं उस दौरान शैतान द्वारा पहुंचायी गयी चोट और यातना को सहन कर पायी। आखिरकार, मेरी सजा पूरी हुई और मैं उस नर्क से बाहर निकल पाने तक जिंदा रह पायी।

जब मैं वापस घर पहुँची, तो सुना कि पुलिस ये कहकर अफवाहें फ़ैलाने में जुटी है कि मैंने धोखाधड़ी की है। इन अफ़वाहों और पड़ोसियों के उलाहनों से बचने के लिए, मेरे पति को दूसरी जगह जाकर काम ढूंढना पड़ा। अब वे मुझसे तलाक लेना चाहते थे। मुझे जेल भेजे जाने को लेकर उनकी माँ को इतनी शर्मिंदगी हो रही थी कि वो मुझे देखना भी नहीं चाहती थीं। मेरी बेटी का भी टीचर और सहपाठियों द्वारा लगातार इस कदर उपहास उड़ाया गया कि गाँव का एक भी बच्चा उसके साथ खेलना नहीं चाहता था। जो कुछ भी हुआ उसे देखकर मैं अपने आँसुओं को नहीं रोक पायी। हमारा परिवार बड़ा ही खुशहाल था, मगर सीसीपी के अत्याचार के कारण अब इस हाल में आ पहुंचा है। मेरी रग-रग में सीसीपी के प्रति नफ़रत भर गई! अनायास परमेश्वर के वचनों का एक अंश मुझे याद आया: सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "प्राचीन पूर्वज? प्रिय नेता? वे सभी परमेश्वर का विरोध करते हैं! उनके हस्तक्षेप ने स्वर्ग के नीचे के सभी लोगों को अंधेरे और अराजकता की स्थिति में छोड़ दिया है! धार्मिक स्वतंत्रता? नागरिकों के वैध अधिकार और हित? ये सब पाप छिपाने की चालें हैं! ... परमेश्वर के कार्य में ऐसी अभेद्य बाधा क्यों खड़ी की जाए? परमेश्वर के लोगों को धोखा देने के लिए विभिन्न चालें क्यों चली जाएँ? वास्तविक स्वतंत्रता और वैध अधिकार एवं हित कहां हैं? निष्पक्षता कहां है? आराम कहां है? गर्मजोशी कहां है? परमेश्वर के लोगों को छलने के लिए धोखेभरी योजनाओं का उपयोग क्यों किया जाए? परमेश्वर के आगमन को दबाने के लिए बल का उपयोग क्यों किया जाए? क्यों नहीं परमेश्वर को उस धरती पर स्वतंत्रता से घूमने दिया जाए, जिसे उसने बनाया? क्यों परमेश्वर को तब तक खदेड़ा जाए, जब तक उसके पास आराम से सिर रखने के लिए जगह न रहे? मनुष्यों के बीच की गर्मजोशी कहां है? लोगों के बीच स्वागत की भावना कहां है? परमेश्वर में इस तरह की हताश तड़प क्यों पैदा की जाए? परमेवर को बार-बार पुकारने पर मजबूर क्यों किया जाए? परमेश्वर को अपने प्रिय पुत्र के लिए चिंता करने पर मजबूर क्यों किया जाए? इस अंधेरे समाज में इसके घटिया रक्षक कुत्ते परमेश्वर को इस दुनिया में स्वतंत्रता से आने-जाने क्यों नहीं देते, जिसे उसने बनाया?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (8)')। जब मैंने परमेश्वर के वचनों पर विचार किया, तो मैं सीसीपी की कुरूपता को अच्छी तरह समझ गई। बाहर से ये धार्मिक होने का बहाना करती है, "धार्मिक आस्था की आजादी देने", "लोगों के लिए क़ानून-व्यवस्था बनाये रखने" और "लोगों की देखभाल करने" की बातें करती है। यह मूल्य और नैतिकता के बारे में सारी सही बातें करती है मगर गुप्त रूप से विश्वासियों को गिरफ्तार करके सताने और अफवाहें फ़ैलाने के लिए किसी भी हद तक जाती है, जिसकी वजह से असंख्य ईसाईयों को जेल में डाल दिया गया, वे घर भी नहीं लौट पाये और उनके परिवार बिखर गए। मैंने सीसीपी का ये चेहरा पहले कभी नहीं देखा था, मैं तो उसकी पूजा करती थी। मगर इसके अत्याचार को सहन करने के बाद, आखिरकार मुझे समझ आया कि सीसीपी प्रधान दानव है जो लोगों को नुकसान पहुंचाती है। अपने सार में, यह परमेश्वर और सत्य की दुश्मन है, और यह शैतानों का सबसे दुष्ट, सबसे प्रतिक्रियाशील गिरोह है।

जेल से छूटने के बाद भी, पुलिस ने मेरी निगरानी करना कभी नहीं छोड़ा। हमारे लोकल थाने की पुलिस हमेशा मुझसे पूछती कि क्या मैं अभी भी परमेश्वर में विश्वास करती हूँ, जब मैं घर में परमेश्वर के वचन पढ़ती, तो मुझे सामने का दरवाज़ा मजबूती से बंद रखना पड़ता। परमेश्वर के वचनों की किताब को मुझे सबसे गुप्त जगह पर छिपाकर रखना पड़ता, किसी सभा में जाते वक्त या सुसमाचार का प्रचार करते हुए, मुझे बहुत अधिक सावधानी बरतनी पड़ती। मार्च 2013 में एक दिन, मेरी जिम्मेदारी वाली कलीसिया के एक अगुआ और दो उपयाजकों को गिरफ्तार कर लिया गया, मुझे फ़ौरन कलीसिया की कुछ चीज़ों को छिपाने का इंतज़ाम करना पड़ा, कुछ भाई-बहनों को मैंने बिल्कुल सचेत रहने की सूचना दी। जब मैं ये सब इंतज़ाम कर रही थी, तभी एक बहन को ये कहते सुना, "जिन अगुआ को गिरफ्तार किया गया है उनके पास भाई-बहनों की एक सूची है, इसका मतलब है कि वो सूची अब पुलिस के पास है।" उसने कहा कि पुलिस अजनबियों को ढूंढने के लिए सभी लोकल सीसीटीवी कैमरों को खंगाल रही है, और वे लोग विश्वासियों की खोज में घर-घर जाने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने ये धमकी भी दी है: "हज़ारों लोगों को गलत तरीके से गिरफ्तार करवाने से बेहतर है एक को जाल से निकल जाने देना!" ये सुनकर मुझे काफ़ी डर और घबराहट महसूस हुई। क्योंकि मुझे पहले गिरफ्तार किया जा चुका था, उनके पास मेरी फ़ाइल मौजूद थी। अगर पुलिस ने चेहरे की पहचान करने वाली निगरानी शुरू की, तो मुझे ज़रूर गिरफ्तार कर लिया जाएगा। अगर मुझे फिर से गिरफ्तार किया गया, तो यकीनन मेरे बचने की कोई उम्मीद नहीं रह जाएगी। ये सोचकर, मैंने महसूस किया कि मुझे जल्द से जल्द यहां से निकलना होगा। हालांकि, जब मैं दूसरी कलीसिया पहुँची, तब भी मेरा मन शांत नहीं हुआ और मुझे बेहोशी छाने लगी। मैंने उस कलीसिया के सभी कामों के बारे में सोचा जिन्हें निपटाने का इंतज़ाम करना ज़रूरी था, मगर मैंने अपनी जिंदगी की रक्षा करने की आज्ञा पर ध्यान नहीं दिया। अगर मैं अभी चली गयी, तो परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा नहीं कर पाऊँगी! मेरी समझ और इंसानियत कहां चली गयी? क्या मैं एक डरपोक और कायर इंसान की तरह काम नहीं कर रही थी? परमेश्वर में मेरा विश्वास सच्चा नहीं था—मेरी गवाही कहां थी? इन बातों को सोचकर, मैं तुरंत परमेश्वर के सामने जाकर प्रार्थना करने लगी, मैंने उससे मुझे आस्था और हिम्मत देने, मेरी रक्षा करने की गुहार लगाई ताकि मैं उसकी गवाही दे सकूँ।

फिर मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का ये अंश पढ़ा: "जब लोग अपने जीवन का त्याग करने के लिए तैयार होते हैं, तो सब कुछ तुच्छ हो जाता है, और कोई भी उनका लाभ नहीं उठा सकता। जीवन से अधिक महत्वपूर्ण क्या हो सकता है? इस प्रकार, शैतान लोगों में अधिक कार्य करने में असमर्थ हो जाता है, वह मनुष्य के साथ कुछ भी नहीं कर सकता। हालांकि, 'देह' की परिभाषा में यह कहा जाता है कि देह शैतान द्वारा दूषित है, अगर लोग वास्तव में स्वयं को अर्पित कर देते हैं, और शैतान से प्रेरित नहीं रहते हैं, तो कोई भी उनसे लाभ नहीं प्राप्त कर सकता" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 36')। परमेश्वर के वचनों पर विचार करके, मैं समझ गयी कि यह स्थिति परमेश्वर की परीक्षा थी, और आध्यात्मिक जगत में एक युद्ध छिड़ गया है। मैं जानती थी कि मुझे परमेश्वर के साथ खड़ी होकर, शैतान को शर्मिंदा करने के लिये अपना जीवन भेंट करना होगा और परमेश्वर के लिए गवाही देनी होगी, ऐसे अहम मौके पर यहां से भागकर मैं पीठ नहीं दिखा सकती! जैसी कि कहावत है, 'इंसान का असली चेहरा मुश्किलों में ही दिखता है।' मुझे परमेश्वर के घर के कार्य की रक्षा करनी होगी, एक समझदार और इंसानियत पसंद व्यक्ति को यही करना चाहिए। मैं धार्मिकता को बचाने के लिए अत्याचार सह रही थी, अगर मैं मर भी गयी तो मेरी मौत सार्थक होगी। अगर मैं नीच बनकर ज़िंदा रही और शैतान के आगे समर्पण कर दिया, तो मेरा शरीर भले ही ज़िंदा रहेगा, मगर मैं चलती-फिरती लाश बनकर रह जाऊँगी। यह सोचकर मैंने खुद को मुक्त महसूस किया, फिर भागकर उस कलीसिया में पहुँची और भाई-बहनों को साथ लेकर परमेश्वर के वचनों की सभी किताबें हटाने में जुट गयी और उन सभी से नीचे झुके रहने के लिए कहा। कलीसिया का सारा काम बहुत जल्दी निबट गया और मैंने परमेश्वर के मार्गदर्शन के लिए उसका धन्यवाद किया!

20 से भी ज़्यादा सालों से सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करते हुए और लगातार सीसीपी का उत्पीड़न और दमन सहते हुए, भले ही मैंने थोड़ी पीड़ा सही हो, मगर परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन से, मैंने कुछ सत्यों को समझा है, सही और गलत में, धार्मिकता और दुष्टता में भेद करना सीखा है। ऐसे असाधारण हालात में मैंने परमेश्वर पर भरोसा करना सीखा है। परमेश्वर के वचनों में मुझे वाकई अधिकार महसूस होता है और परमेश्वर में मेरी आस्था बढ़ गयी है। ये सब परमेश्वर का अनुग्रह है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर का धन्यवाद!

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