89. जबरन मत-परिवर्तन के खिलाफ एक लड़ाई

जब मैं 19 साल का था, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की पुलिस ने आस्था रखने के कारण मुझे गिरफ़्तार कर लिया था। वो मुझे परमेश्वर को ठुकराने और अपने भाई-बहनों को धोखा देने पर मजबूर करने के लिए 60 दिनों तक यातना देते रहे और मेरे मत-परिवर्तन की कोशिश करते रहे। उस अनुभव ने मुझे कमज़ोर कर दिया था। मैं उसे कभी नहीं भूल सकूँगा।

उस सुबह जब मैं सभा में जा रहा था, तब मेरी नज़र उस जगह के पास खड़ी तीन गाड़ियों पर पड़ी। मुझे कुछ गड़बड़ लगा। वहाँ पहले कभी इतनी गाड़ियाँ नहीं होती थीं। मैंने सभा में पहुँचते ही भाई-बहनों को इस बात की ख़बर दी और हमें एहसास हुआ कि अब वहाँ हमारी सभा सुरक्षित नहीं। हम कहीं और जाने की योजना बनाने लगे। जल्दी ही, चार अजनबी हमारे आँगन में आये, कहने लगे कि वो नेशनल सिक्योरिटी ब्रिगेड से आये हैं और घर-घर जाकर छिपे विस्फोटकों की तलाश कर रहे हैं। वो जबरन हमें सोफे पर बिठाकर हमारी तलाशी लेने लगे, जब उन्हें कुछ नहीं मिला तो उन्होंने मुझे और एक भाई को अपनी गाड़ी में डाल लिया। वो हमें पुलिस थाने लेकर आये, जहाँ पुलिस ने हमें बेसमेंट में ले जाकर अलग-अलग बंद कर दिया। हमारा इस तरह से अचानक गिरफ़्तार किया जाना किसी सपने के जैसा था, मुझे कोई अंदाजा नहीं था कि पुलिस हमारे साथ कैसा बर्ताव करेगी। मैं डरा हुआ था और लगातार परमेश्वर से मुझे विश्वास देने के लिए प्रार्थना कर रहा था। मैंने परमेश्वर के वचनों के इस भजन को याद किया जिसे हम अक्सर गाया करते हैं, "सर्वशक्तिमान की उत्कृष्टता और महानता।" "इस दुनिया की हर चीज़ तेज़ी से सर्वशक्तिमान के विचारों और उसकी नज़रों तले बदलती है। मानवजाति ने जिन चीज़ों के बारे में कभी नहीं सुना है वो अचानक आ जाती हैं, जबकि माउसके पास जो कुछ लंबे समय से रहा है वो अनजाने में उसके हाथ से फिसल जाता है। सर्वशक्तिमान के ठौर-ठिकाने की थाह कोई नहीं पा सकता, सर्वशक्तिमान की जीवन शक्ति की उत्कृष्टता और महानता का एहसास करने की तो बात ही दूर है। ..." (मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ)। मैंने परमेश्वर से ये प्रार्थना की: "सर्वशक्तिमान परमेश्वर, मैं तुम्हारा धन्यवाद करते हुए आपकी स्तुति करता हूँ! इस ब्रह्मांड की हर चीज़ पर तुम्हारा राज है और मेरी किस्मत भी तुम्हारे हाथों में है। आज तुम्हारी इच्छा से पुलिस मुझे गिरफ़्तार कर पायी है। चाहे वो मुझे कितनी भी यातना दें या मुझे कितनी भी पीड़ा सहनी पड़े, मैं गवाही दूँगा, तुम्हें धोखा देकर कभी यहूदा नहीं बनूंगा।"

करीब 4 बजे, पुलिस मुझे एक रिमोट कंपाउंड में लेकर गयी, जहाँ एक लाइन में कई चार मंज़िला इमारतें खड़ी थीं, जो किसी होटल जैसी दिख रही थीं। कई भाई-बहनों का कहना था कि पुलिस कैदियों से गुप्त पूछताछ करने और यातना देने के लिए उन्हें होटलों में भेजती है। मुझे लग रहा था कि वो मुझे भी यातना देंगे। वो काफ़ी सुनसान जगह थी। अगर वो मुझे मार भी दें तो किसी को कुछ पता नहीं चलेगा। इस बारे में सोचकर मेरा डर बढ़ता गया और मैं मन ही मन लगातार परमेश्वर को पुकारता रहा। वो मुझे चौथी मंज़िल के किसी कमरे में ले गये, वहाँ अपराधियों से पूछताछ करनेवालों के मुखिया ने मुझसे कहा, अच्छाई का नाटक करनेवाले, "तुम्हारा नाम क्या है? तुम कहाँ रहते हो?" मैंने उनसे पूछा, "मुझे गिरफ़्तार क्यों किया गया है? आप लोग मुझे यहाँ क्यों लेकर आये हैं?" उन्होंने कहा, "ये एक कानूनी शिक्षा का कोर्स है खास तौर पर विश्वासियों को शिक्षित करने और उनका मन बदलने के लिए। हम तुम्हें यहाँ इसलिए लेकर आये हैं क्योंकि हमें तुम्हारे बारे में सब पता है। वरना, तुम्हारी जगह यहाँ कोई और होता। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया पर पूरे देश की नज़र है, उसे मिटा दिया जाएगा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करनेवालों की गिरफ़्तारी निश्चित है।" मैंने पूछा, "क्या हमारा संविधान हमें आस्था की आज़ादी नहीं देता?" उसने ठहाके लगाते हुए कहा, "आस्था की आज़ादी? उसकी भी एक हद है। अगर तुम्हें हमारा समर्थन चाहिए, तो अपनी आस्था में तुम्हें पार्टी की बात माननी होगी और उनके नियमों का पालन करना होगा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करके, तुम खुद को पार्टी के ख़िलाफ़ कर रहे हो। हम तुम्हें गिरफ़्तार कैसे नहीं करते?" मैंने कहा, "हम तो बस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं और परमेश्वर की गवाही देने के लिए सुसमाचार साझा करते हैं। हमने कभी राजनीति में कदम नहीं रखा। आप ऐसा कैसे कह सकते हैं कि हम पार्टी के ख़िलाफ़ हैं?" "सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, 'परमेश्वर मनुष्य की राजनीति में भाग नहीं लेता, फिर भी देश या राष्ट्र का भाग्य परमेश्वर द्वारा नियंत्रित होता है। परमेश्वर इस संसार को और संपूर्ण ब्रह्मांड को नियंत्रित करता है। मनुष्य का भाग्य और परमेश्वर की योजना घनिष्ठता से जुड़े हैं, और कोई भी मनुष्य, देश या राष्ट्र परमेश्वर की संप्रभुता से मुक्त नहीं है। यदि मनुष्य अपने भाग्य को जानना चाहता है, तो उसे परमेश्वर के सामने आना होगा। परमेश्वर उन लोगों को समृद्ध करेगा, जो उसका अनुसरण और उसकी आराधना करते हैं, और वह उनका पतन और विनाश करेगा, जो उसका विरोध करते हैं और उसे अस्वीकार करते हैं'" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है')। परमेश्वर के वचन बिलकुल स्पष्ट हैं। पूरे ब्रह्मांड पर उसका राज है, सभी देशों और लोगों की किस्मत उसके हाथों में है, मगर परमेश्वर कभी राजनीति में शामिल नहीं होता।" देहधारी परमेश्वर मुख्य रूप से अंत के दिनों में सत्य व्यक्त करने और न्याय का कार्य करने आया है ताकि लोग सत्य को समझ सकें, अपने भष्ट शैतानी स्वभाव से छुटकारा पा सकें और बचाये जा सकें।" उस अफ़सर ने मेरी बात खत्म होने से पहले ही मुझे रोक दिया, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया का तिरस्कार करने वाली हर तरह की बेतुकी बातें बोलने लगा। उसने मुझे अपनी आस्था को त्यागने का सुझाव दिया। उसकी फालतू बातें सुनने के बाद भी मैं परमेश्वर के लिए शांत रहा, मैंने उससे शैतान के जाल से मेरी रक्षा करने को कहा।

तीसरे दिन की दोपहर, उन्होंने दोबारा मुझे मीटिंग रूम में बुलवाया। एक अफ़सर ने अपना परिचय देते हुए कहा कि वो नेशनल सिक्योरिटी ब्रिगेड का कप्तान है, उसने शिक्षा देने और मत-परिवर्तन का काम किया है। उसने मुझसे मेरा नाम, निवास का पता और कलीसिया की जानकारी माँगी। मेरे बात करने से इनकार करने पर उसने मेरा बायाँ हाथ लेकर ज़बरदस्ती टेबल पर रखा, मेरी हथेली ऊपर की, और उस पर अपनी जलती सिगरेट की राख छिड़कते हुए कहने लगा, "तुम्हें पता होना चाहिए कि आज की तकनीक के साथ, तुमसे जवाब निकलवाना मुश्किल नहीं होगा। क्या तुम बेवकूफ़ हो? मैं तुम्हें एक आखिरी मौक़ा दे रहा हूँ। मेरी सिगरेट की नोक का तापमान करीब 800 डिग्री है। महसूस करना चाहोगे? उसने दो बार सिगरेट का ज़ोरदार कश लगाया, और उसकी जलती हुई लाल नोक को मेरी हथेली पर दाग दिया। जब मैंने दर्द के मारे हाथ झटकने की कोशिश की, तो दूसरे अफ़सर ने जबरन मेरा हाथ टेबल पर दबा दिया। जलती हुई सिगरेट की लाल नोक बार-बार दागे जाने के कारण मेरी हथेली जलने लगी थी। मेरे माथे से पसीना टपकने लगा। थोड़ी कमज़ोरी महसूस करते हुए, मैंने उसे अपना नाम बताया। तब उसने मुझ पर अत्याचार करना तो बंद कर दिया, मगर वो मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के बारे में कुछ वीडियो देखने और उसकी निंदा और तिरस्कार करनेवाली अफवाहें पढ़ने पर मजबूर करने लगा।

पाँचवें दिन की दोपहर, उन्होंने मुझे शानडोंग झाओयुआन के मामले से संबंधित कुछ खबरें दिखायीं और फिर मुझसे मेरी राय माँगी। मैंने कहा, "ये लोग सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के सदस्य नहीं हैं। मेरी कलीसिया का कोई भी सदस्य ऐसी हरकत नहीं कर सकता।" "हमारे यहाँ सुसामाचार साझा करने के कुछ सिद्धांत हैं। हम सिर्फ़ परमेश्वर में विश्वास करनेवाले नेकदिल लोगों के साथ ही सुसमाचार साझा करते हैं, बुरे लोगों के साथ नहीं।" "झांग लिडोंग जैसे बुरे लोग सुसमाचार साझा करने के हमारे मानकों पर खरे नहीं उतरते। परमेश्वर उन्हें विश्वासी नहीं मानता और न ही कलीसिया उन्हें कभी स्वीकार करेगी।" ये देखकर कि मेरी आस्था डगमगाई नहीं, उसने कहा, "हमने तुम्हारे सभी अगुओं को गिरफ़्तार कर लिया है, हम उनसे अपने सभी जवाब निकलवा लेंगे। हमें तुम पर अपना वक्त बर्बाद करने की कोई ज़रूरत नहीं। तुम्हारी उम्र ज़्यादा नहीं है, इसलिए हम तुम्हें बचाना चाहते थे।" मैंने सोचा, "ये सब झूठ है। वो सिर्फ़ मुझे परमेश्वर को धोखा देने पर मजबूर करने की कोशिश कर रहे हैं। चाहे वो कुछ भी कहें, मैं किसी भी कीमत पर अपने भाई-बहनों को दांव पर नहीं लगाऊँगा। मैं कभी भी परमेश्वर को धोखा नहीं दूँगा!" उस शाम सात बजे के बाद, मत-परिवर्तन करने वाले एक साइकोलोजिस्ट ने मुझे कोर्स के बारे में अपने विचार लिखने को कहा। मैंने लिखा कि "झाओयुआन की घटना में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के किसी विश्वासी का हाथ नहीं था। ये किसी दुष्ट राक्षस का काम था। उसके अपराध के लिए परमेश्वर उसे दंड ज़रूर देगा।"

रात नौ बजे के बाद, नेशनल सिक्योरिटी ब्रिगेड का कप्तान अंदर आया, वो मेरे विचार पढ़कर बेहद नाराज़ था। उसने एक हाथ से मुझे मेरे स्टूल से उठाया, और दूसरे हाथ से लगातार मुझे मारता रहा, फिर लात से ज़मीन पर दे मारा। फिर वो मुझे घसीटते हुए बिस्तर के पास ले गया और घूँसे मारने लगा। कई घूँसे मारने के बाद, उसने एक लकड़ी का हैंगर उठाया और लगातार मुझे मारने लगा और कलीसिया की जानकारी माँगता रहा। मैंने कुछ नहीं कहा। इससे गुस्सा होकर, उसने मुझे अपने सारे कपड़े उतारने को कहा। उसका पागलपन देखकर मैं डर गया। मैं मन ही मन परमेश्वर को पुकारता रहा, उससे मुझे आस्था और हिम्मत देने को कहता रहा। वो मुझ पर चिल्लाने लगा और कपड़े उतारने पर मजबूर करने के बाद दोबारा मुझे हैंगर से मारने लगा, और फिर दो प्रशिक्षकों को मुझे बिस्तर पर पकड़ने को कहा। मुझे लगा कि वो दोनों प्रशिक्षक पुलिस के आदमी हैं, मगर कहीं न कहीं मेरा मन कह रहा था कि वो एक जवान लड़के पर अत्याचार करने में पुलिस का साथ नहीं देंगे। मैं गलत था। उन्होंने मुझे कसकर पकड़े रखा, मैं हिल नहीं पा रहा था। नेशनल सिक्योरिटी ब्रिगेड का कप्तान पागलों की तरह सिगरेट से मेरे निप्पल जलाता रहा, जल्दी ही वो झुलस गए और आस-पास की हवा से जली हुई चमड़ी की गंध आने लगी। दर्द के मारे मेरा शरीर पसीने से भीग चुका था और मेरे पैर झटक रहे थे। फिर वो मेरे जननांगों पर अत्याचार करते हुए चिल्लाने लगा, "बताते हो या नहीं?" दर्द से कराहते हुए, मेरे मन में सिर्फ़ एक ही विचार आ रहा था: "मैं परमेश्वर को धोखा नहीं दे सकता।" मैं मन ही मन परमेश्वर से प्रार्थना करता रहा, उससे मुझे हिम्मत और आस्था देने को कहता रहा, ताकि मैं उस दुष्ट अफ़सर की यातना को सह सकूँ।

मेरे चुप रहने के कारण, उस अफ़सर ने गुस्से में कहा, "शायद मुझे तुम पर और सख्ती दिखानी होगी।" फिर वो पीछे मुड़ा, एक थर्मस उठाया, और एक कप खौलता हुआ पानी मेरे ऊपर डाल दिया। मैं दर्द से चीखने लगा। उसने बेरुखी से कहा, "अब बात करोगे?" मैंने निडर होकर कहा, "मैं कुछ नहीं जानता!" इस बात से चिढ़कर, उसने और दो कप खौलता हुआ पानी मेरे पेट पर डाल दिया। ये देखकर कि मुझे पहले जितनी पीड़ा नहीं हो रही थी, वो मेरा पेट छूकर चिल्लाने लगा कि पानी गरम नहीं है। उसने एक थर्मस खौलता हुआ पानी लाने का आदेश दिया। फिर उसने एक राक्षसी मुस्कान के साथ कहा, "जल्द ही तुम्हें अपने पूरे शरीर पर खौलते हुए गरम पानी का आनंद मिलेगा।" ये सुनकर मैं बुरी तरह डर गया और सोचने लगा कि इससे पहले जो पानी मुझ पर डाला गया था वो कहाँ से ठंडा था। अगर मुझ पर वाकई एकदम खौलता हुआ पानी डाला गया, तो क्या मैं उसे सह पाऊँगा? घबराहट और डर के मारे, मैंने मन ही मन परमेश्वर से प्रार्थना की: "सर्वशक्तिमान परमेश्वर, मुझे आस्था और हिम्मत दो। मैं तुम्हें धोखा देना या भाई-बहनों को दांव पर लगाना नहीं चाहता, मैं तो गवाही देना चाहता हूँ।" प्रार्थना के बाद मैंने परमेश्वर के इन वचनों को याद किया: "विश्वास लकड़ी के इकलौते लट्ठे के पुल की तरह है : जो लोग घृणास्पद ढंग से जीवन से लिपटे रहते हैं उन्हें इसे पार करने में परेशानी होगी, परन्तु जो खुद का त्याग करने को तैयार रहते हैं, वे बिना किसी फ़िक्र के, मजबूती से कदम रखते हुए उसे पार कर सकते हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 6')। परमेश्वर के वचनों पर विचार करने से मुझे ये एहसास हुआ कि घबराहट भरे और डरावने खयाल आना शैतान के जाल में फँसने की निशानियाँ हैं, फिर मुझे पता चला कि परमेश्वर में मेरी आस्था सच्ची नहीं है। गवाही देने के लिए मुझे हर हाल में अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर परमेश्वर पर भरोसा रखने की ज़रूरत थी। इस एहसास से मुझे अपने ऊपर होने वाले अत्याचार का सामना करने का विश्वास मिला।

और तभी, उस अफ़सर ने सिगरेट के दो गहरे कश लगाए, और मेरे सामने बैठकर एक राक्षसी मुस्कान के साथ कहने लगा, "आराम से बैठो, पानी आने ही वाला है!" अपनी बात कहते हुए, उसने मेरी छाती पर अपने सिगरेट की नोक उसी जगह दागी जहाँ पर खौलते हुए पानी से मुझे झुलसाया गया था। मैं पीड़ा को सहने की कोशिश करता रहा। सात-आठ मिनट बाद पानी खौलने लगा। पतीले में पानी को उबलते और भाप छोड़ते देख, मेरे सिर में सिहरन दौड़ गई, मैं डर से काँप रहा था और मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे। उस अफ़सर ने पतीला उठाया, उसका ढक्कन खोला और मेरे पास आया। मैं भाप की गर्मी को अपने शरीर पर महसूस कर पा रहा था। उसने खौलते हुए पानी का पतीला मेरे पेट पर सटाया। तेज़ दर्द के कारण मैं बुरी तरह रोने लगा। उसने मौके का फ़ायदा उठाकर दोबारा मुझसे पूछा कि मैं बात करना चाहता हूँ या नहीं, और अब भी मुझे शांत देखकर, उसने एक कप उठाया, उसमें खौलता हुआ पानी भरा और सीधा मेरी छाती पर डाल दिया। वो इतना दर्दनाक था कि मैं उछल पड़ा, वो तब तक मुझ पर खौलता हुआ पानी डालता रहा, जब तक पतीला खाली नहीं हो गया। मैं लगातार काँपता रहा, मेरे शरीर का सामने वाला पूरा हिस्सा जलन के छालों से भर गया। सबसे बड़े छाले अंडे के आकार के थे। प्रशिक्षक ये नज़ारा नहीं देख पा रहे थे और वहाँ से जाना चाहते थे, मगर उस अफ़सर ने दरवाज़ा बंद कर दिया, और चिल्लाने लगा, "तुम नहीं जा सकते, यहीं रुको और देखो। देखो, मैं इसके साथ क्या करता हूँ।" फिर उसने और पानी उबालने का आदेश दिया। ये सुनकर मैं बहुत डर गया। ये सितम अभी बाकी था, अगर पहले पतीले के पानी ने मेरी ये हालत कर दी है, तो और पतीलों से मेरा क्या होगा? क्या मैं ये सब सह पाऊँगा? मैं परमेश्वर को मुझे विश्वास और हिम्मत देने के लिए पुकारता रहा। फिर मुझे परमेश्वर के ये वचन याद आये: "सत्ता में रहने वाले लोग बाहर से दुष्ट लग सकते हैं, लेकिन डरो मत, क्योंकि ऐसा इसलिए है तुम सब का विश्वास बहुत कम है। जब तक तुम सभी का विश्वास बढ़ता है, तब तक कुछ भी मुश्किल नहीं होगा।" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 75')। पुलिसवाले परमेश्वर की मंज़ूरी से ही मुझे यातना दे रहे थे। परमेश्वर मेरी आस्था को पूर्ण करना चाहता था। चाहे वो कितने ही बुरे और दुष्ट लोग हों, मेरी किस्मत परमेश्वर के हाथों में ही थी। जब तक मैं प्रार्थना करके परमेश्वर पर भरोसा करूँगा, परमेश्वर शैतान की यातना पर विजय पाने के लिए मेरा मार्गदर्शन करता रहेगा। मेरा डर काफ़ी हद तक कम हो गया और मुझे अत्याचार को सहने का विश्वास मिला।

जल्द ही, दूसरा पतीला उबल गया। अफ़सर उसे लेकर आया, एक कप गरम पानी भरा, फिर उसे मेरे पास लेकर आया और मेरे शरीर के निचले हिस्से पर खौलता हुआ पानी डालने लगा। मैं दर्द से चिल्लाते हुए पीछे हटने लगा। वो कुछ कदम आगे बढ़ा और मुझसे सवाल करने लगा, मगर मैंने उसके सवालों का कोई जवाब नहीं दिया। फिर उसने एक कप गरम पानी मेरे जननांगों के नीचे रखकर कहा, "बताओगे या नहीं?" मैंने कुछ भी नहीं कहा। उसने झटके से कप को ऊपर उठाया ताकि मेरे जननांग उसमें पूरी तरह डूब जाएं। मैं दर्द से चीख रहा था और बार-बार काँपते हुए पीछे हट रहा था। मैं ये सब नहीं सह पा रहा था, मैं लगातार प्रार्थना करता रहा, परमेश्वर से मुझे हिम्मत देने को कहता रहा, ताकि मैं उसे धोखा देने से बच सकूँ। फिर मैंने प्रभु यीशु की इस बात को याद किया: "क्योंकि जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे, वह उसे खोएगा; और जो कोई मेरे लिये अपना प्राण खोएगा, वह उसे पाएगा" (मत्ती 16:25)। मैं जानता था कि अगर मैंने केवल शारीरिक पीड़ा से बचने के लिए दूसरों को दांव पर लगा दिया और परमेश्वर को धोखा दिया, तो इससे परमेश्वर के स्वभाव का अपमान होगा। मुझे नर्क में भेज दिया जाएगा जहाँ मुझे अनंत काल तक पीड़ा झेलनी पड़ेगी। ये समझकर, मैंने निश्चय किया कि चाहे मुझे कितनी भी पीड़ा सहनी पड़े, मैं दांत भींचकर उसे सहूँगा और कभी परमेश्वर को धोखा नहीं दूँगा। उस दुष्ट अफ़सर ने और दो कप गरम पानी मेरे जननांग पर डाला और पूछताछ करता रहा। मैंने नीचे देखा तो पता चला कि मेरे जननांग की चमड़ी की बाहरी परत झुलस चुकी थी, प्रशिक्षक मेरी हालत को नहीं देख पा रहे थे। मजबूर होकर, उन्होंने कहा, "बेटा, कुछ तो बोलो। इस तरह से पीड़ा सहकर तुम्हें क्या हासिल होगा?" मैं चुप रहा। तभी उस अफ़सर का सहायक अंदर आया। मेरी हालत देखकर वो चौंक गया। उसने मुझ पर से नज़र हटाई, मेरे पास आया और कहने लगा, "अपना जुर्म कबूल कर लो। हमारे पास तुम्हारे जैसे बहुत से लोग हैं। तुम नहीं करोगे, तो कोई और कर लेगा। हम तुम्हें मौक़ा दे रहे हैं।" मैंने कुछ नहीं कहा और अपना सिर झुका लिया। मुझे चुप देखकर, अफ़सर गुस्से से चिल्लाया, "हटो तुम लोग। मैं देखता हूँ ये कब तक पीड़ा सह सकता है!" उसने दोबारा गरम पानी लेकर मेरी छाती पर डाल दिया, जिससे मैं बेतहाशा रोते हुए दर्द से उछलने लगा। जैसे ही उसने मेरे ऊपर गरम पानी डाला, मेरे शरीर के छाले और मेरी चमड़ी झुलस गयी। जल्द ही नए छाले उभर आये, दर्द सहना मुश्किल हो रहा था। मैं कमज़ोर पड़ने लगा। मैंने सोचा, "अच्छा, तो उन्होंने बहुत से भाई-बहनों को पकड़ा है। अगर मैंने अपना मुँह नहीं खोला, तो कोई और ज़रूर खोल देगा। मैं ये सब क्यों सहूँ? मैं बस उन्हें थोड़ी-बहुत बातें बता देता हूँ, इससे मुझे इतना कुछ तो नहीं सहना पड़ेगा।" मैंने देखा कि उस अफ़सर को अपना अत्याचार रोकने का कोई इरादा नहीं था, और मुझे कोई अंदाज़ा नहीं था कि मैं उस पीड़ा को सह सकूँगा या नहीं जो वो मुझे देने वाला है। मगर मैंने अपना मुँह खोला, तो मैं यहूदा बन जाऊँगा। तभी मुझे परमेश्वर के वचन याद आये: "मैं उन लोगों पर अब और दया नहीं करूँगा जिन्होंने गहरी पीड़ा के दिनों में मेरे प्रति रत्ती भर भी निष्ठा नहीं दिखाई है, क्योंकि मेरी दया का विस्तार केवल इतनी ही दूर तक है। इसके अतिरिक्त, मुझे ऐसा कोई इंसान पसंद नहीं है जिसने कभी मेरे साथ विश्वासघात किया हो, ऐसे लोगों के साथ जुड़ना तो मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं है जो अपने मित्रों के हितों को बेच देते हैं। चाहे व्यक्ति जो भी हो, मेरा स्वभाव यही है।" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो')। अपने भाई-बहनों के हितों को दांव पर लगा देने वालों में परमेश्वर को कोई दिलचस्पी नहीं है। अगर मैंने अपना मुँह खोला, तो क्या ये परमेश्वर को धोखा देना नहीं होगा? मैं कुछ नहीं कह सकता। बिलकुल नहीं। मैंने मन ही मन ये प्रार्थना की: "परमेश्वर, मुझे प्रबुद्ध बनाने और भाई-बहनों को दांव पर लगाने से रोकने के लिए तुम्हारा धन्यवाद। चाहे मुझे कितनी भी पीड़ा सहनी पड़े, मैं कभी यहूदा नहीं बनूँगा।"

मुझे चुप देखकर, नेशनल सिक्योरिटी ब्रिगेड के कप्तान ने एक सिगरेट जलाकर कुटिल मुस्कान के साथ कहा, "इतनी जल्दी क्या है। हमारे पास अभी काफ़ी समय है," इस दौरान वो मेरी नाक के आगे सिगरेट का धुंआ छोड़ता रहा। फिर, उसने एक कप गरम पानी लिया और उसे मेरे सिर पर डाल दिया। मैं जल्दी से पीछे हट गया, जिससे पानी मेरे कान से होते हुए पीठ पर चला गया। मैं दर्द से रोने लगा, ऐसा लग रहा था जैसे मेरी पीठ में आग लग गयी हो। उसने मेरे पेट और जाँघों पर कुछ कप पानी और डाला। वो जहाँ भी पानी डालता वहाँ छाले पड़ जाते। एक पतीला खाली होते ही वो प्रशिक्षकों को दूसरा पतीला गर्म करने का आदेश दे देता। कुछ ही मिनटों बाद तीसरा पतीला गर्म होने के लिए चढ़ा दिया गया। पतीले से निकलते भाप को देखकर मैं काँपने लगा। खिखियाते हुए, उसने पतीला उठाया और कहा, "बहुत बढ़िया!" एक बार फिर उसने पतीले को मेरे शरीर के आने रखकर डरावने ढंग से कहा, "तो तुम बताओगे या नहीं?" मैंने जवाब नहीं दिया, तो उसने एक कप खौलता हुआ पानी मेरे ऊपर डाल दिया। मैं दर्द से निढ़ाल हो चुका था। मैंने देखा कि उसका रुकने का कोई इरादा नहीं था, मैं नहीं जानता था कि कब तक ये सब सह पाऊँगा। मुझे बहुत पीड़ा हो रही थी, मैं मरना चाहता था ताकि मुझे इस तरह से पीड़ा न झेलनी पड़े और न ही अपनी शारीरिक कमज़ोरी के कारण किसी को दांव पर लगाना पड़े। मैं कमरे में ऐसी सख्त चीज़ ढूँढने लगा जिससे अपना इरादा पूरा कर सकूँ, मगर वहाँ एक टेबल और लकड़ी की दीवारों के अलावा कुछ भी नहीं था। मुझे नहीं लगा कि मैं एक बार सिर पर मारने से मर जाऊँगा, फिर मुझे और अत्याचार नहीं सहना पड़ेगा। मैंने तय किया कि उन्हें अभी के लिए हाँ बोल दूँगा, फिर वो मुझे कुछ घरों की पहचान करवाने ले जायेंगे। बाहर, मैं चलती हुई गाड़ी से कूदकर अपनी मौत को गले लगा लूंगा। जब मेरे मन में ये विचार चल रहे थे, तभी अफ़सर ने मुझसे पूछा कि मैं अपना मुँह खोलूँगा या नहीं, मैंने सहमति में सिर हिलाया। मुझे लगा कि वो मुझे सीधा घरों की पहचान करवाने ले जायेंगे, मगर हैरानी कि बात है कि वो मुझसे कलीसिया की जानकारी माँगने लगे। नीचे से दस से ज़्यादा अफ़सर आ गये। उस वक्त मैं ज़रा घबरा गया। मैंने अभी अपनी सहमति जताई है, अगर मैंने अपना मुँह नहीं खोला, तो क्या वो मुझे पहले से भी ज़्यादा कठोर यातना देंगे? मैंने सोचा मैं उसे किसी भी कलीसिया का नाम और उसके आस-पास की जगह का पता दे दूँगा। मैंने उसे थोड़ी-बहुत जानकारी दी, मगर उसके लिये इतना काफ़ी नहीं था। उसने मुझसे कलीसिया से संबंधित कई और सवाल पूछे, और तब मुझे शैतान को ये मौक़ा देने का पछतावा हुआ। अगर मैं ऐसा करता रहा तो क्या मैं यहूदा नहीं बन जाऊँगा? मैं उसके सवालों को नज़रंदाज़ करने लगा। उसे मुझसे कुछ हासिल नहीं हो रहा था, इसलिए उसने मुझे वापस कमरे में भेज दिया। अपने कमरे में जाकर, मैं मन ही मन सोचने लगा, "मैं मरने की कोशिश क्यों कर रहा था? क्या परमेश्वर मेरी मौत चाहता है? क्या ये कमज़ोर पड़ने का संकेत नहीं?" फिर मुझे परमेश्वर के वचनों का ये भजन याद आया, "तुम्हारी पीड़ा जितनी भी हो ज़्यादा, परमेश्वर को प्रेम करने का करो प्रयास।" "आज अधिकाँश लोगों का मानना है कि दुःख उठाने का कोई महत्व नहीं है, आस्था रखने के कारण उन पर अत्याचार किया जाता है, वे संसार के द्वारा त्यागे जाते हैं, उनके पारिवारिक जीवन में परेशानी होती है, और उनकी अपेक्षाएँ काफी निराशापूर्ण होती हैं। कुछ लोगों के कष्ट चरम तक पहुँच जाते हैं, और उनके विचार मृत्यु की ओर मुड़ जाते हैं। ये परमेश्वर से प्रेम करने वाला हृदय कैसे हो सकता है? ऐसे लोग निरर्थक होते हैं, उनमें बिलकुल धीरज नहीं होता, वे कमजोर और शक्तिहीन होते हैं! ... इस प्रकार, इन अंतिम दिनों में, तुम्हें परमेश्वर के प्रति गवाही देनी है। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारे कष्ट कितने बड़े हैं, तुम्हें अपने अंत की ओर बढ़ना है, अपनी अंतिम सांस तक भी तुम्हें परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य बने रहना आवश्यक है, और परमेश्वर की कृपा पर रहना चाहिए; केवल यही वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करना है और केवल यही मजबूत और सामर्थी गवाही है।" (मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ)। परमेश्वर के वचनों पर विचार करके, मुझे एहसास हुआ कि मैं कितना बुज़दिल, कमज़ोर और नाकारा था। मैं अपनी ज़रा सी शारीरिक पीड़ा के कारण मौत को गले लगाना चाहा था क्योंकि मुझे उस पीड़ा का खौफ़ था। इससे परमेश्वर को कोई प्रसन्नता नहीं होगी। ये सच्ची गवाही नहीं है। अपनी गिरफ़्तारी से पहले, मैंने परमेश्वर के सामने शपथ ली थी कि अगर कभी सीसीपी ने मुझे गिरफ़्तार करके मुझ पर अत्याचार किया तो मैं अन्य भाई-बहनों की तरह गवाही दूँगा। मैं यहूदा बनकर, कभी परमेश्वर को धोखा नहीं दूँगा। मगर जब ये साबित करने का मौक़ा आया, जब मुझे पुलिसवालों का अत्याचार सहना पड़ा, तो मैं इन हालात से बचने का रास्ता ढूँढने लगा। मैंने गवाही देने और परमेश्वर को प्रसन्न करने पर एक बार भी विचार नहीं किया। मुझे एहसास हुआ कि मुझमें सच्ची आस्था या परमेश्वर के प्रति समर्पण की भावना नहीं है। उन अफ़सरों ने मुझ पर अत्याचार किया ताकि मैं परमेश्वर को धोखा देकर गवाही देने का मौक़ा गँवा दूँ। अगर मैंने इन सबसे बचने के लिए मौत को गले लगा लिया, तो क्या शैतान मेरा मज़ाक नहीं उड़ाएगा? ये सब सोचकर, मुझे अपनी कमज़ोरी पर पछतावा होने लगा। मैं अपने वादे से कैसे मुकर सकता हूँ? परमेश्वर ने मुझे गवाही देने का मौक़ा दिया था, मगर मैंने वो मौक़ा गँवा दिया। ये परमेश्वर के लिए दुख भरा और निराशाजनक पल था। मैंने ये निश्चय किया कि अगर वो लोग मुझे घरों की पहचान करवाने ले जायेंगे, तो मैं नहीं जाऊँगा। चाहे वो मुझ पर कितना भी अत्याचार करें, मैंने परमेश्वर पर भरोसा रखकर गवाही दूँगा!

अगली सुबह 6:30 बजे, म्युनिसिपल एंटी कल्ट ऑफिस के डायरेक्टर ने मेरी गंभीर हालत देखकर मुझे अस्पताल ले जाने को कहा ताकि उन्हें मेरी ज़िम्मेदारी न उठानी पड़े। अस्पताल जाते वक्त, उसने कुटिलता से चेतावनी देते हुआ कहा, "अगर तुमने अस्पताल में गलती से भी कुछ कहा, तो उसके नतीजों के लिये ज़िम्मेदार तुम खुद होगे!" ये सुनकर मुझे बहुत गुस्सा आने लगा। वो लोग मुझे डरा रहे थे ताकि इतनी पीड़ा सहने के बाद भी मैं उनके बारे में किसी को कुछ नहीं कहूँ। वो लोग बेहद दुष्ट और नीच थे! डॉक्टर ने मुझसे पूछा कि मेरे शरीर पर इतने छाले कैसे पड़ गए, मैं जानता था अगर मैंने उसे सच्चाई बता भी दी तो वो कुछ नहीं कर सकेगा। मैंने उससे कहा कि मेरे ऊपर एक थर्मस टूट गया था। उसने मेरी बात पर विश्वास न करते हुए पूछा, "एक टूटे हुए थर्मस ने तुम्हारी ये हालत कर दी?" तभी वो अफ़सर डॉक्टर को अपने पास बुलाकर कुछ फुसफुसाने लगा, जिसके बाद डॉक्टर ने मेरे घावों पर मरहम-पट्टी करनी शुरू कर दी, और कहा कि मुझे अस्पताल में भर्ती होना पड़ेगा। फिर अफ़सर ने ये कहकर कि किसी खास वजह से मैं अस्पताल में भर्ती नहीं हो सकता, मुझसे किसी भी नुकसान का ज़िम्मेदार खुद को मानने वाले फॉर्म पर दस्तखत करवाया। उसके फ़ौरन बाद वो मुझे दोबारा ब्रेनवाशिंग सेंटर लेकर गया। मेरी चोटें इतनी गंभीर थीं कि मैं क्लास लेने की स्थिति में नहीं था, मगर पुलिस को ये मंज़ूर नहीं था, उन्होंने रोज़ मुझे पर नज़र रखने और मेरा मत-परिवर्तन करने के लिए दो लोगों को भेज दिया। उन्होंने मेरे ऊपर कठोर और नरम, दोनों तरीकों का इस्तेमाल किया, ताकि मैं अपनी आस्था त्याग दूँ।

सत्रह दिनों के बाद, मेरी चोटें ठीक भी नहीं हुई थी कि उन्होंने मुझे दोबारा क्लास में भेज दिया। यहाँ यूनिवर्सिटी का एक प्रोफेसर और एक साइकोलोजिस्ट थे, जो अच्छा बनने का ढोंग करते थे, मुझसे अच्छी-अच्छी बातें करके मेरे करीब आने की कोशिश करते थे, ताकि मैं उन्हें उनके सवालों के जवाब दूँ। मैं बार-बार परमेश्वर को पुकारता रहा, शैतान की इन तरकीबों से मेरी रक्षा करने की गुहार लगाता रहा। मैंने उनके साथ परमेश्वर की गवाही साझा की। मेरा दृढ़ संकल्प देखकर वो गुस्सा हो गए। अगले कुछ दिनों तक, वो मुझसे हमारी कलीसिया की निंदा और तिरस्कार करनेवाली किताबें पढ़वाते और वीडियो दिखाते रहे। इतनी सारी झूठी अफ़वाहें सुनकर मुझे बुरा लगा और उनसे घिन आने लगी। मैंने उनकी कसी भी बात पर ध्यान नहीं दिया।

एक सुबह, डिविज़न का डायरेक्टर कुछ प्रशिक्षकों के साथ मेरे लिविंग क्वार्टर में आया। ये सब देखकर मैं काफ़ी डर गया, मैंने मन ही मन एक प्रार्थना की, परमेश्वर से मुझे बुद्धि देने की गुहार लगायी ताकि मैं उन दुष्ट पुलिसवालों का सामना कर सकूँ। उसने डरावने ढंग से कहा, "कल हमने सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के खिलाफ सौ दिनों के हमारे विरोध को लेकर हमने एक मीटिंग की थी। विश्वासियों को कड़ी सजा दी जायेगी। ये सज़ा तुम जैसे जवान और अविवाहित लोगों के लिए और भी ज़्यादा कड़ी होगी। खासकर जो लोग तुम्हारी तरह अपने आप में बदलाव नहीं लायेंगे उन्हें सीधा फायरिंग टीम के हवाले कर दिया जाएगा। वो तुम्हारा सिर और दिमाग, दोनों गोली से उड़ा देंगे।" उसकी ये बातें सुनकर मैं घबराने लगा मगर तभी मैंने प्रभु यीशु के इन वचनों को याद किया: "क्योंकि जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे, वह उसे खोएगा; और जो कोई मेरे लिये अपना प्राण खोएगा, वह उसे पाएगा" (मत्ती 16:25)। मैं जानता था कि परमेश्वर के लिए शहीद होना एक सम्मान है और परमेश्वर इससे प्रसन्न होगा। मगर मौत के डर से परमेश्वर को धोखा देने से उसके स्वभाव का अपमान होगा और उसकी घृणा बढ़ेगी। भले ही मेरी जान बच जायेगी मगर मैं परमेश्वर के नज़रों में मर चुका होऊंगा। परमेश्वर मेरी आत्मा को ठुकरा देगा और मुझे नर्क की सजा मिलेगी। सदियों से अनगिनत विश्वासी अत्याचार सहते-सहते शहीद हो गए। उन सभी ने परमेश्वर के लिए गवाही दी। शहीद होकर मुझे परमेश्वर का उत्थान मिलेगा। चाहे मुझे मौत आ जाये, फिर भी मैं परमेश्वर के आयोजनों के प्रति समर्पित होकर गवाही देने के लिए राजी था। जब मैंने कुछ नहीं कहा तो अफ़सर मुझे धमकाने लगा: "तुम घर जाना चाहते हो या जेल?" मैं वाकई घर जाना चाहता था, मगर मैं इसकी कीमत जानता था, मुझे पश्चाताप के पत्र लिखने पड़ते और कलीसिया से सारे संबंध तोड़ने पड़ते। मैंने निडरता से जवाब दिया, "जेल!" गुस्से से अफ़सर की आँखें चौड़ी हो गयीं, उसने मेरी ओर उँगली दिखाकर कहा, "लगता है इतनी पीड़ा तुम्हारे लिए काफी नहीं थी!" फिर वो गुस्से में वहाँ से चला गया।

उसके बाद वो मेरा ब्रेनवाश करने के लिए एक पादरी को लेकर आये। अंदर आते ही, उसने मुझसे कहा, "बेटा, तुम अभी छोटे हो। मेरी बात मानो, तुम ग़लत मार्ग पर चल रहे हो।" वो बाइबिल में मत्ती 24:23-24 का अंश निकालकर कहने लगा, "तुम कहते हो कि प्रभु यीशु लौट आया है, मगर देखो बाइबल क्या कहती है: 'उस समय यदि कोई तुम से कहे, "देखो, मसीह यहाँ है!" या "वहाँ है!" तो विश्‍वास न करना। क्योंकि झूठे मसीह और झूठे भविष्यद्वक्‍ता उठ खड़े होंगे, और बड़े चिह्न, और अद्भुत काम दिखाएँगे कि यदि हो सके तो चुने हुओं को भी भरमा दें।' अगर कोई कहता है कि प्रभु यीशु वापस आया है तो वो गलत है। तुम इसका अनुसरण नहीं कर सकते।" मैंने उनसे बाइबल लेकर जवाब दिया, "प्रभु यीशु हमें चेतावनी दे रहा था कि अंत के दिनों में जब वो वापस आयेगा, तब झूठे मसीह और झूठे पैगंबर लोगों का मार्ग भटकाने के लिए बड़े संकेत और चमत्कार दिखाएँगे। उसने हमें सावधान रहने की चेतावनी दी थी। प्रभु यीशु की वापसी के सुसमाचार को झूठा ठहराकर क्या आप प्रभु यीशु की वापसी के सत्य को ठुकरा नहीं रहे?" "झूठे मसीहों के पास सत्य नहीं होता। वो केवल संकेतों और चमत्कारों से लोगों को बहकाते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ये सब नहीं करता। वो सिर्फ़ मानवजाति को शुद्ध करने और बचाने के लिए सत्य व्यक्त करता है और अपना न्याय कार्य करता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर लौटकर आया प्रभु यीशु है, वह एकमात्र सच्चा परमेश्वर है।" मेरा दृढ़ संकल्प देखकर, वो बहुत सी निंदनीय बातें कहने लगे। तब मैंने गुस्से से कहा, "पवित्र आत्मा का तिरस्कार करके आपको न इस जनम में माफ़ी मिलेगी और न ही अगले जनम में।" इस पर, उसने मुझसे कहा, "तुम वाकई एक ज़िद्दी लड़के हो। समझने की कोशिश करो, बेटा। वो जो कुछ भी जानना चाहते हैं उन्हें बता दो। अगर तुम जेल चले गए तो बाद में बहुत पछताओगे!" मैंने कहा, "मैं बिलकुल नहीं पछताऊँगा, बल्कि मैं तो आपको भी सच्चे मार्ग की खोज करने की सलाह देता हूँ। परमेश्वर का विरोध करना बंद कीजिये। अगर आपने कोई बड़ा पाप कर दिया, तब तक बहुत देर हो जायेगी।" तंग आकर, उसने मुझसे कहा, "तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता। तुम बहुत ज़िद्दी हो।" फिर वो मायूस होकर वहाँ से चले गए।

कुछ दिनों बाद, आपराधिक पूछताछ वाली टीम के मुखिया ने मुझे परमेश्वर विरोधी और निंदनीय बातें दोहराने पर मजबूर करने की कोशिश की। जब मैंने इनकार किया, तो उसने गुस्से से कहा, "क्या तुम्हें दंड मिलने का डर है? जब परमेश्वर है ही नहीं, तो तुम्हें दंड कौन देगा? जिन लोगों ने हार मान ली क्या वो अपना जीवन खुशी-खुशी नहीं जी रहे?" मैंने कहा, "अपने मौके का इस्तेमाल नहीं करने से कुछ अच्छा हासिल नहीं होता। परमेश्वर तुरंत लोगों को दंड नहीं देता है।" वो गुस्से से मुझे पकड़कर चांटे मारने लगा, मगर मैं अब भी चुप रहा। मैं प्रभु यीशु के इस कथन पर विचार कर रहा था: "मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी, परन्तु पवित्र आत्मा की निन्दा क्षमा न की जाएगी" (मत्ती 12:31)। इन वचनों की हिम्मत से मेरा संकल्प अटूट बना रहा। कुछ घंटे बीत गए, मैं अब भी चुप था। गुस्सा होकर, वो मेरे बाल पकड़ते हुए मुझे डोरमेट्री में लेकर गया, फिर कुटिलता से कहने लगा, "जब तब ये अपना मुँह नहीं खोलता, इसका खाना-पीना बंद।" मैं मन ही मन परमेश्वर से प्रार्थना करता रहा और तभी प्रभु यीशु के वचन मुझे याद आये: "मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्‍वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा" (मत्ती 4:4)। परमेश्वर के वचन हमारे जीवन का आधार हैं। भले ही मुझे खाना न मिले, मगर परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध मेरी मौत नहीं होगी। हैरानी की बात है कि उस रात सफ़ाई करनेवाली औरत ने मुझे खाने के लिए एक गरम बन लाकर दिया। मुझे महसूस हुआ जैसे लोगों का दिल और आत्मा परमेश्वर के हाथों में है। उसके बाद पुलिस रोज़ाना मुझसे अपने दफ़्तर की सफ़ाई करवाने लगी, और अचानक मुझे वहाँ वचन देह में प्रकट होता है की एक प्रति दिखी। रोज़ाना की साफ़-सफ़ाई करते हुए मैं उसे पढ़ा करता और परमेश्वर के वचन मुझे आस्था और हिम्मत देते। पुलिसवाले लगातार मुझे नास्तिक झूठे तर्क देते रहते, मगर परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन से मुझ पर कभी भी उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

एक दिन वो मेरा ब्रेनवाश करने के लिए यूनिवर्सिटी के दो प्रोफेसर लेकर आये जिन्होंने हर तरीके से मुझे मजबूर करने की कोशिश की, कहने लगे, "अगर तुमने उन तीन पत्रों पर अपने दस्तखत नहीं किये, तो तुम्हें पाँच साल के लिए जेल भेज दिया जाएगा, फिर तुम्हारी शादी भी नहीं हो पायेगी। तुम अपनी जवानी इस तरह बर्बाद क्यों कर रहे हो? इसका क्या फ़ायदा?" मुझ पर इस बात का प्रभाव ज़रूर पड़ा। मैंने सोचा कि मैं तो अभी जवान हूँ, और पता नहीं मुझे कितने सालों तक वहाँ पीड़ा झेलनी पड़ेगी। यह सोचकर, मुझे एहसास हुआ कि मैं शैतान के जाल में फंस रहा था, इसलिए मैंने फ़ौरन ये प्रार्थना की: "हे परमेश्वर, मैं शैतान के जाल में फंसने ही वाला था। मेरी रक्षा करो ताकि मैं गवाही दे सकूँ।" प्रार्थना के बाद मैंने परमेश्वर के वचनों के एक भजन की पंक्ति को याद किया: "युवाओं को सत्य से रहित नहीं होना चाहिए, न ही उन्हें ढोंग और अधर्म को छिपाना चाहिए— उन्हें उचित रुख पर दृढ़ रहना चाहिए। उन्हें सिर्फ यूँ ही धारा के साथ बह नहीं जाना चाहिए, बल्कि उनमें न्याय और सत्य के लिए बलिदान और संघर्ष करने की हिम्मत होनी चाहिए।" ("मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ" में 'किसका अनुसरण करें नौजवान')। मैं जानता था सत्य को पाने के लिए मुझे कितनी भी पीड़ा झेलने के काबिल बनना होगा। मैं ज़रा से आराम के लिए परमेश्वर को धोखा नहीं दे सकता। चाहे पुलिस मेरे साथ कुछ भी करे, मुझे हर हाल में गवाही देकर परमेश्वर को प्रसन्न करना है। जब मैंने कुछ नहीं कहा, तो वो मायूस होकर वहाँ से चले गए। उस दोपहर वो पादरी वापस आया और एक कपट भरी मुस्कान के साथ कहने लगा, "मैंने सुना कि तुम जेल जा रहे हो। तुम ऐसा नहीं कर सकते। वहाँ का जीवन इंसानों के लिए नहीं है। तुम्हें वाकई ऐसा लगता है कि तुम्हारे जैसा छोटा सा लड़का वो सब सह सकेगा?" उन्होंने अपना फ़ोन निकाला और कुछ उनके अत्याचार का शिकार हुए ईसाइयों की कुछ तस्वीरें दिखाते हुए कहा, "देखो इन्हें। इनमें से कुछ ने 10 साल गुज़ारे हैं, और कुछ ने 20 साल। कुछ ने तो जेल में ही अपना दम तोड़ दिया। मैं जानता हूँ तुम एक सच्चे विश्वासी हो। वो जहाँ तुम्हारे दस्तखत चाहते हैं कर दो और यहाँ से बाहर निकलते ही वापस अपनी आस्था का अभ्यास शुरू कर देना। इस तरह से पीड़ा झेलने का कोई मतलब नहीं है! अपने दस्तखत कर दो और मैं तुम्हारी ओर से उन्हें मना लूँगा। इसके अलावा तुम्हारे पास और कोई रास्ता नहीं है।" मुझे चिंता होने लगी कि कहीं सच में तो मुझे जेल नहीं भेजा जा रहा है, जेल में पुलिसवाले जैसे चाहे वैसे मुझ पर अत्याचार कर सकते हैं। मुझे कितनी ज़्यादा पीड़ा सहनी पड़ेगी। मुझे डर लगने लगा, मगर मैं जानता था कि उन पत्रों पर दस्तखत करना परमेश्वर को धोखा देना होगा और मेरे ऊपर राक्षस का ठप्पा लग जाएगा। मैं मन ही मन प्रार्थना करते हुए परमेश्वर को पुकारता रहा उससे मुझे आस्था देने को कहता रहा ताकि मैं गवाही दे सकूँ। मैंने पादरी से कहा, "मैं दस्तखत नहीं करूँगा।" वो हैरान होकर वहाँ से चले गए।

म्युनिसिपल एंटी-कल्ट ऑफिस के डायरेक्टर ने भी मुझसे उन तीन पत्रों पर दस्तखत करवाने की कोशिश की, उसने मुझसे गुस्से में कहा, "तुम दो महीनों से यही कर रहे हो। मुझे तुमसे बदले हुए बर्ताव की उम्मीद थी। अगर तुमने अपना विश्वास त्याग दिया तो तुम्हें घर भेज दिया जाएगा, लेकिन अगर तुमने अपना विश्वास नहीं त्यागा तो तुम जेल में ही सड़ोगे! क्या तुम अब भी एक विश्वासी हो?" मैं उलझन में पड़ गया। अगर मैंने हाँ कहा तो मुझे जेल भेज दिया जाएगा, और पता नहीं वहाँ मुझ पर अत्याचार करने के लिए क्या-क्या इंतज़ाम किये गए हैं। मगर उनको ना कहना परमेश्वर को धोखा देना होगा। मैंने प्रार्थना करके परमेश्वर से हिम्मत देने की गुहार लगाता रहा, और गवाही देने के लिए तैयार हो गया। तभी मुझे परमेश्वर के वचनों का ये अंश याद आया: "यीशु परमेश्वर का आदेश—समस्त मानवजाति के छुटकारे का कार्य—पूरा करने में समर्थ था, क्योंकि उसने अपने लिए कोई योजना या व्यवस्था किए बिना परमेश्वर की इच्छा का पूरा ध्यान रखा। वह परमेश्वर की प्रबंधन योजना को बिलकुल केंद्र में रखने में समर्थ था, और हमेशा स्वर्गिक पिता से प्रार्थना करता था और स्वर्गिक पिता की इच्छा जानने का प्रयास करता था। उसने प्रार्थना की और कहा : 'परमपिता परमेश्वर! जो तेरी इच्छा हो, उसे पूरा कर, और मेरी इच्छाओं के अनुसार नहीं, बल्कि अपनी योजना के अनुसार कार्य कर। मनुष्य कमज़ोर हो सकता है, किंतु तुझे उसकी चिंता क्यों करनी चाहिए? मनुष्य, जो कि तेरे हाथों में एक चींटी के समान है, तेरी चिंता के योग्य कैसे हो सकता है? मैं अपने हृदय में केवल तेरी इच्छा पूरी करना चाहता हूँ, और चाहता हूँ कि तू वह कर सके, जो तू अपनी इच्छाओं के अनुसार मुझमें करना चाहता है।'" ("मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ" में 'प्रभु यीशु का अनुकरण करो')। प्रभु यीशु ने भी पीड़ा भोगी थी जब उसे क्रूस पर चढ़ाया जाने वाला था। वो शरीर से कमज़ोर था, मगर वो परमेश्वर के कार्य को पूरा करने में सक्षम हुआ। वो शारीरिक पीड़ा के बजाय परमेश्वर के आयोजनों के प्रति समर्पित हो गया। और पतरस, वो तो परमेश्वर के प्रेम की खातिर मरने को तैयार था, परमेश्वर के लिए क्रूस पर चढ़ने को तैयार था। मेरी इस मामूली सी पीड़ा का तो कहना ही क्या? परमेश्वर के वचनों ने मेरी आस्था दृढ़ कर दी और मेरा डर खत्म हो गया। मैंने तय किया कि भले ही मैं जेल चला जाऊँ, मगर फिर भी मैं परमेश्वर के लिए गवाही दूँगा! मैंने धैर्य के साथ जवाब दिया, "मुझे जेल जाना स्वीकार है।" गुस्से में उसने कहा, "अपना सामान बांधो, तुम जेल जा रहे हो।" फिर वो चिढ़कर दरवाज़ा बंद करते हुए वहाँ से चला गया। अचानक, दो दिनों बाद, मेरे इलाके के चार पुलिसवाले आकर कहने लगे कि वो मुझे घर ले जा रहे हैं। उस पल मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर का कार्य कितना शानदार है, मैंने अपने लिए उसकी चिंता और दया को भी महसूस किया। पुलिस मुझे मेरे शहर वापस लेकर आयी और मेरा एक मौखिक बयान रिकॉर्ड किया, और मुझे हर हफ़्ते एक बार पुलिस थाने आने को कहा। परमेश्वर के मार्गदर्शन से, मैं उस इलाके से निकलकर वापस अपना कर्तव्य निभाने में सक्षम हो पाया।

पुलिस की गिरफ्तारी और अत्याचार का अनुभव मेरे भीतर बसा हुआ है। मैंने देखा है कि कम्युनिस्ट पार्टी कितनी दुष्ट और अमानवीय है। मैंने उनके परमेश्वर विरोधी सार को स्पष्ट देखा है। मुझे उन राक्षसों से नफ़रत है। मैंने परमेश्वर के वचनों की सामर्थ्य और अधिकार का भी अनुभव किया। परीक्षणों और मुश्किलों के दौरान, परमेश्वर ने मुझे आस्था, हिम्मत और मार्गदर्शन देने के लिए अपने वचनों का इस्तेमाल किया। मैंने देखा कि केवल परमेश्वर ही हमसे प्रेम करता है, और उसके वचन ही हमारा जीवन हैं। परमेश्वर में मेरी आस्था पहले से भी ज़्यादा दृढ़ हो गयी। सर्वशक्तिमान परमेश्वर का धन्यवाद!

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