विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (1)

मनुष्यजाति, जो शैतान के द्वारा अत्यधिक भ्रष्ट कर दी गई है, नहीं जानती कि एक परमेश्वर भी है और इसने परमेश्वर की आराधना करनी बंद कर दी है। आरम्भ में, जब आदम और हव्वा को रचा गया था, तो यहोवा की महिमा और गवाही सर्वदा उपस्थित थी। परन्तु भ्रष्ट होने के पश्चात, मनुष्य ने उस महिमा और गवाही को खो दिया, क्योंकि हर किसी ने परमेश्वर से विद्रोह कर उसका भय मानना पूर्णतया बन्द कर दिया। आज की विजय का कार्य उस सम्पूर्ण गवाही और उस सम्पूर्ण महिमा को पुनः प्राप्त करने और सभी लोगों से परमेश्वर की आराधना करवाने के लिए है, ताकि सृजित प्राणियों के बीच गवाही हो; कार्य के इस चरण के दौरान यही किए जाने की आवश्यकता है। मनुष्यजाति किस प्रकार जीती जानी है? मनुष्य को सम्पूर्ण रीति से कायल करने के लिए इस चरण के वचनों के कार्य का प्रयोग करके; उसे पूरी तरह यकीन दिलाने के लिए प्रकाशन, न्याय, ताड़ना और निर्मम शाप का प्रयोग करके; मनुष्य के विद्रोहीपन को उजागर करके और उसके विरोध का न्याय करके, ताकि वह मानवजाति की अधार्मिकता और मलिनता को जान सके और इस तरह इनका प्रयोग परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की विषमता के रूप में कर सके। मुख्यतः, मनुष्य को इन्हीं वचनों से जीता और पूर्णतः कायल किया जाता है। वचन मनुष्यजाति पर अंतिम रूप से विजय करने के साधन हैं और वे सभी जो परमेश्वर की विजय को स्वीकार करते हैं, उन्हें उसके वचनों के प्रहार और न्याय को भी स्वीकार करना चाहिए। बोलने की वर्तमान प्रक्रिया, जीतने की ही प्रक्रिया है। और लोगों को किस प्रकार सहयोग देना चाहिए? यह जानकर कि इन वचनों को कैसे खाना-पीना है और उनकी समझ हासिल करके। जहाँ तक यह बात है कि लोगों पर विजय कैसे पाई जाती है, इसे इंसान खुद नहीं कर सकता। तुम सिर्फ इतना कर सकते हो कि इन वचनों को खाने और पीने के द्वारा, अपनी भ्रष्टता और अशुद्धता, अपने विद्रोहीपन और अपनी अधार्मिकता को जानकर, परमेश्वर के समक्ष दण्डवत हो सकते हो। यदि तुम परमेश्वर के इरादों को समझने के बाद अभ्यास कर लेते हो और अगर तुम्हारे पास दर्शन हों, और इन वचनों के प्रति पूरी तरह से समर्पित हो सकते हो, और अपने मन से कोई चुनाव नहीं करते हो, तब तुम जीत लिए जाओगे और यह उन वचनों का नतीजा रहा होगा। मनुष्यजाति ने साक्ष्य क्यों खो दिया? क्योंकि किसी की भी परमेश्वर में आस्था नहीं है, क्योंकि लोगों के हृदयों में परमेश्वर के लिए कोई स्थान नहीं है। मनुष्यजाति की विजय लोगों की आस्था की बहाली है। लोग हमेशा अंधाधुंध लौकिक संसार की ओर भागना चाहते हैं, वे अनेक आशाएँ रखते हैं, अपने भविष्य के लिए बहुत अधिक चाहते हैं और उनकी अनेक अनावश्यक मांगें हैं। वे हमेशा अपने शरीर के विषय में सोचते, शरीर के लिए योजनाएं बनाते रहते हैं, उनकी रुचि कभी भी परमेश्वर में विश्वास रखने के मार्ग की खोज में नहीं होती। उनके हृदय को शैतान ने छीन लिया है, उन्होंने परमेश्वर का भय मानने वाला अपना दिल खो दिया है और उनका हृदय शैतान पर ही केंद्रित रहता है। परन्तु मनुष्य की सृष्टि परमेश्वर द्वारा की गई थी। इसलिए मनुष्य वह गवाही खो चुका है; यानी वह परमेश्वर की महिमा को खो चुका है। मनुष्य को जीतने का उद्देश्य परमेश्वर के लिए मनुष्य के भय की महिमा को पुनः प्राप्त करना है। इसे इस प्रकार कहा जा सकता है : ऐसे अनेक लोग हैं जो जीवन का अनुसरण नहीं करते; यदि अनुसरण करने वाले कुछ हैं भी, तो उनकी संख्या को उँगलियों पर गिना जा सकता है। लोग सबसे ज्यादा अपने भविष्य के बारे में चिंतित रहते हैं और जीवन की ओर जरा-सा भी ध्यान नहीं देते। कुछ लोग परमेश्वर से विद्रोह और उसका विरोध करते हैं, उसकी पीठ पीछे उस पर दोष लगाते हैं और सत्य का अभ्यास नहीं करते। इन लोगों को फिलहाल अनदेखा कर दिया गया है; फिलहाल विद्रोह के इन पुत्रों का कुछ नहीं किया जाता है, लेकिन भविष्य में तुम विलाप करते और दाँत पीसते हुए अंधकार में रहोगे। जब तुम ज्योति में रह रहे होते हो तो उसके बहुमूल्य होने का अनुभव नहीं करते, परंतु जब तुम अंधेरी रात में रहने लगोगे, तब तुम इसकी बहुमूल्यता को जान जाओगे। तब तुम्हें अफसोस होगा। अभी तुम्हें अच्छा लगता है, परन्तु वह दिन आएगा जब तुम्हें अफसोस होगा। जब वह दिन आएगा और अंधकार नीचे उतरेगा और रोशनी फिर कभी नहीं होगी, तब इतनी देर हो चुकी होगी कि तुम्हारा अफसोस करना बेकार होगा। क्योंकि तुम अभी भी आज के कार्य को नहीं समझते हो, इसलिए अभी तुम्हारे पास जो समय है, उसे सँजोने में असफल हो। एक बार जब संपूर्ण ब्रह्मांड का कार्य आरंभ हो जाएगा अर्थात ये वचन जो मैं आज बोल रहा हूँ, साकार हो चुके होंगे, तो बहुत-से लोग अपने सिर पकड़कर दुःख के आँसू बहाएँगे। ऐसा करते समय, क्या वे रोते और दाँत पीसते हुए अंधकार में नहीं गिर चुके होंगे? जो लोग वास्तव में जीवन का अनुसरण करते हैं और जिन्हें पूर्ण किया गया है, उनका उपयोग किया जा सकता है, जबकि विद्रोह के समस्त पुत्र, जो उपयोग किए जाने के लिए अनुपयुक्त हैं, अंधकार में गिरेंगे। वे पवित्र आत्मा के कार्य से पूरी तरह वंचित होंगे, कुछ भी समझने में असमर्थ होंगे। इसलिए, वे दंड में फँस जाएँगे और रोएँगे। कार्य के इस चरण में यदि तुम अच्छी तरह से सज्जित हो और तुम जीवन में विकसित हो चुके हो, तब तुम उपयोग किए जाने के उपयुक्त हो। यदि तुम अच्छी तरह से सज्जित नहीं हो, तब अगर तुम्हें कार्य के अगले चरण के लिए बुलाया भी गया है, तो भी इस मुकाम पर इस्तेमाल के लिए अनुपयुक्त ही रहोगे, यदि तुम स्वयं को तैयार करना भी चाहोगे, तो भी तुम्हें दूसरा अवसर नहीं मिलेगा। जब परमेश्वर जा चुका होगा, तब तुम इस प्रकार का अवसर कहाँ प्राप्त कर पाओगे, जो परमेश्वर ने अभी तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत किया है? तब तुम वह प्रशिक्षण कहाँ प्राप्त कर पाओगे, जो परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से उपलब्ध करवाया गया है? उस समय तक, परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से बात नहीं कर रहा होगा और न ही अपनी वाणी बोल रहा होगा; तुम मात्र वही चीजें पढ़ रहे होगे जो आज बोली जा रही हैं—तो फिर सरलता से समझ कैसे मिलेगी? भविष्य का जीवन किस प्रकार आज के जीवन के बराबर बन पाएगा? उस समय, तुम रोते और दाँत पीसते रह जाओगे, क्या यह पीड़ा में जीना नहीं होगा? अभी तुम्हें आशीष प्रदान किए जा रहे हैं; लेकिन तुम उनका आनंद उठाना नहीं जानते; तुम आशीष में जीवनयापन कर रहे हो; फिर भी तुम अनजान हो। यह प्रमाणित करता है कि तुम पीड़ा उठाने के लिए अभिशप्त हो! आज कुछ लोग विरोध करते हैं, कुछ विद्रोह करते हैं, और कुछ यह या वह करते हैं, मैं बस इसे अनदेखा करता हूँ—लेकिन यह मत सोचना कि मैं तुम सबके कार्यों से अनभिज्ञ हूँ। क्या मैं तुम सबके सार को नहीं समझता? तुम हमेशा मेरे खिलाफ क्यों खड़े रहते हो? क्या तुम अपने हित की खातिर जीवन और आशीष की खोज के लिए परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते? तुम्हारे अंदर आस्था का होना क्या तुम्हारे अपने हित में नहीं है? फिलहाल मैं केवल बोलकर विजय का कार्य कर रहा हूँ और जब विजय का यह कार्य पूरा हो जाएगा, तो तुम्हारे परिणाम का खुलासा हो जाएगा। क्या मुझे और स्पष्ट रूप से बताने की आवश्यकता है?

आज के विजय के कार्य का अभिप्राय यह खुलासा करना है कि मनुष्य का परिणाम क्या होगा। ऐसा क्यों कहा जाता है कि आज की ताड़ना और न्याय, अंत के दिनों के महान श्वेत सिंहासन के सामने का न्याय है? क्या तुम यह नहीं देखते हो? विजय का कार्य अन्तिम चरण क्यों है? क्या यह इस बात का खुलासा करने के लिए नहीं है कि मनुष्य के प्रत्येक वर्ग का परिणाम कैसा होगा? क्या यह प्रत्येक व्यक्ति को ताड़ना और न्याय के विजय कार्य के दौरान उसका असली स्वरूप दिखाने और फिर उसके प्रकार के अनुसार छाँटने के लिए नहीं है? यह कहने के बजाय कि यह मनुष्यजाति को जीतना है, यह कहना बेहतर होगा कि यह इस बात खुलासा करना है कि व्यक्ति के प्रत्येक वर्ग का परिणाम किस प्रकार का होगा। यह लोगों के पापों का न्याय करने और फिर लोगों के विभिन्न वर्गों को उजागर करने और इस प्रकार यह निर्णय करने के बारे में है कि वे दुष्ट हैं या धार्मिक। विजय-कार्य के पश्चात अच्छे को पुरस्कृत करने और बुरे को दंड देने का कार्य आता है। जो लोग पूर्णतः समर्पण करते हैं अर्थात जो पूर्ण रूप से विजय कर लिए गए हैं, उन्हें सम्पूर्ण कायनात में परमेश्वर के कार्य को फैलाने के अगले चरण में रखा जाएगा; जिन्हें विजय नहीं किया गया उनको अंधकार में रखा जाएगा और उन पर महाविपत्ति आएगी। इस प्रकार लोगों को अपनी किस्म के अनुसार छाँटा जाएगा, बुरों को बुरों की जमात में रखा जाएगा और उन्हें फिर कभी सूर्य का प्रकाश नसीब नहीं होगा और धार्मिकों को रोशनी प्राप्त करने और सर्वदा रोशनी में रहने के लिए अच्छे लोगों के साथ रखा जाएगा। सभी चीजों के परिणाम निकट हैं और लोगों के परिणाम साफ तौर पर उनकी आँखों के सामने दिखा दिए गए हैं। सभी चीजों को उनकी अपनी किस्म के अनुसार छाँटा जाएगा, तो फिर लोग प्रत्येक व्यक्ति को उसकी अपनी किस्म के अनुसार छाँटे जाने की पीड़ा से किस प्रकार बच सकते हैं? जब सभी चीजों के परिणाम निकट होते हैं, तब प्रत्येक प्रकार के व्यक्ति के परिणामों का खुलासा किया जाता है और यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड (इसमें समस्त विजय-कार्य सम्मिलित है, जो वर्तमान कार्य से आरम्भ होता है) के विजय-कार्य के दौरान किया जाता है। सभी लोगों के परिणामों का खुलासा, न्याय के सिंहासन के सामने, ताड़ना के दौरान और अंत के दिनों के विजय-कार्य के दौरान किया जाता है। लोगों को उनकी अपनी किस्म के अनुसार छाँटना, उन्हें उनके मूल वर्ग में लौटाना नहीं है, क्योंकि संसार की रचना के समय जब मनुष्य को बनाया गया था, तब एक ही किस्म के मनुष्य थे, केवल पुरुष और स्त्री का विभाजन था। उस समय विभिन्न प्रकार के वर्ग नहीं थे। यह तो हजारों वर्षों की भ्रष्टता के पश्चात ही हुआ कि मनुष्य के अनेक वर्ग उत्पन्न हुए, जिनमें कुछ अशुद्ध आत्माओं की सत्ता के अंतर्गत हैं, कुछ दुष्ट दानवों की सत्ता के अंतर्गत हैं और कुछ ऐसे हैं जो जीवन के मार्ग का अनुसरण करते हैं और सर्वशक्तिमान के प्रभुत्व के अधीन हैं। इसी रीति से धीरे-धीरे लोगों के वर्ग अस्तित्व में आते हैं और इसी तरह लोग मनुष्य के विस्तृत परिवारों में से वर्गों में विभाजित होते हैं। समस्त लोगों के “पिता” भिन्न हो गए हैं; ऐसा नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति पूर्णतः सर्वशक्तिमान के प्रभुत्व के अधीन आता है, क्योंकि इंसान बहुत ही विद्रोही है। धार्मिक न्याय प्रत्येक प्रकार के व्यक्ति के सच्चे रूप को उजागर करता है और कुछ भी छिपा नहीं रहने देता। प्रकाश में प्रत्येक व्यक्ति अपना वास्तविक चेहरा दिखाता है। इस बिंदु पर मनुष्य अब वैसा नहीं रहा जैसा वह आरंभ में था और उसके पूर्वजों की मूल समानता बहुत पहले ही लुप्त हो चुकी है, क्योंकि आदम और हव्वा के अनगिनत वंशज बहुत पहले से शैतान द्वारा बंदी बना लिए गए हैं, ताकि वे फिर कभी स्वर्गिक सूर्य को न देख सकें और क्योंकि लोग शैतान के हर प्रकार के विष से भर दिए गए हैं। इसीलिए, लोगों के लिए उनकी उपयुक्त मंजिलें हैं। इसके अलावा, उनके विभिन्न प्रकार के विषों के आधार पर उन्हें उनकी किस्मों में छाँटा जाता है, अर्थात आज उन्हें जिस हद तक जीता गया है उसके अनुसार अलग-अलग किया जाता है। मनुष्य का परिणाम संसार की सृष्टि के समय से ही पूर्वनियत नहीं किया गया था। क्योंकि आरंभ में मात्र एक ही वर्ग था, जिसे सामूहिक रूप से “मनुष्यजाति” पुकारा जाता था और मनुष्य को पहले शैतान के द्वारा भ्रष्ट नहीं किया गया था, सभी लोग परमेश्वर के प्रकाश में जीवनयापन करते थे और उन पर किसी भी प्रकार का अंधकार नहीं था। परन्तु बाद में जब मनुष्य शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया, तो सभी प्रकार और किस्म के लोग सम्पूर्ण पृथ्वी पर फैल गए—सभी प्रकार और किस्म के लोग, जो उस परिवार से आए थे, जिसे सामूहिक रूप से “मनुष्यजाति” कहा जाता था, जो पुरुष और स्त्री से बनी थी। अपने सबसे पुराने पूर्वजों—एक पुरुष और एक स्त्री से बनी मानवजाति (अर्थात आरंभ में आदम और हव्वा, जो उनके सबसे पुराने पूर्वज थे) से अलग होने के लिए उन सभी का मार्गदर्शन उनके पूर्वजों के द्वारा किया गया था। उस समय, इस्राएली वे एकमात्र लोग थे, जिनका पृथ्वी पर जीवनयापन के लिए यहोवा के द्वारा मार्गदर्शन किया जा रहा था। विभिन्न प्रकार के लोग जो सम्पूर्ण इस्राएल (अर्थात मूल पारिवारिक कुल से) से अस्तित्व में आए थे, उन्होंने बाद में यहोवा की अगुआई को खो दिया। ये आरम्भिक लोग, जो मानव संसार के मामलों से पूरी तरह से अनभिज्ञ थे, वे उन क्षेत्रों में रहने के लिए अपने पूर्वजों के साथ हो लिए, जिन क्षेत्रों पर उन्होंने अधिकार किया था और आज तक ऐसा ही चला आ रहा है। इस तरह, वे आज भी अनजान हैं कि वे यहोवा से कैसे अलग हो गए और कैसे आज तक सभी प्रकार की अशुद्ध आत्माओं और दुष्टात्माओं के द्वारा भ्रष्ट किए गए हैं। जो अब तक अत्यधिक गहन रूप से भ्रष्ट और विष से भरे हुए हैं—जिन्हें अंततः बचाया नहीं जा सकता—उनके पास अपने पूर्वजों, अशुद्ध आत्माओं, जिन्होंने उन्हें भ्रष्ट किया, उनके साथ जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होगा। वे लोग जिन्हें अंततः बचाया जा सकता है, वे मनुष्यजाति की उपयुक्त मंजिल पर पहुँच जाएँगे, अर्थात उस परिणाम पर, जिसे बचाए गए और जीते गए लोगों के लिए संरक्षित रखा गया है। उन सभी को बचाने के लिए सब कुछ किया जाएगा, जिन्हें बचाया जा सकता है—परंतु उन लोगों के लिए जो इस कदर सुन्न हैं कि उनका कोई इलाज ही नहीं है, उनके पास अपने पूर्वजों के पीछे-पीछे ताड़ना के अथाह कुंड में जाना ही एकमात्र विकल्प होगा। यह मत सोचो कि तुम्हारा परिणाम, आरंभ में ही पूर्वनियत कर दिया गया था और केवल इसका खुलासा अब किया गया है। यदि तुम ऐसा सोचते हो, तब क्या तुम भूल गए हो कि मनुष्य की आरंभिक रचना के दौरान, मनुष्य के किसी भी अलग शैतानी वर्ग की रचना नहीं की गई थी, आदम और हव्वा से बनी मात्र एक मनुष्यजाति (अर्थात मात्र पुरुष और स्त्री) को रचा गया था? मान लिया जाए कि आरंभ में तुम ही शैतान के वंशज होते, तो क्या यहोवा ने मनुष्य की अपनी रचना में एक शैतानी वर्ग को भी सम्मिलित कर लिया होता? क्या उसने ऐसा कुछ किया होता? उसने मनुष्य को अपनी गवाही के लिए बनाया था; उसने मनुष्य को अपनी महिमा के लिए रचा था। क्या वह जानबूझकर शैतान की संतान के ऐसे एक वर्ग की सृष्टि करता जो जानबूझकर उसका प्रतिरोध करे? यहोवा ऐसा कैसे कर सकता था? यदि उसने ऐसा किया होता तो कौन कहता कि वह धार्मिक परमेश्वर है? आज जब मैं यह बात कहता हूँ कि तुम सब में से कुछ लोग अंत में शैतान को दे दिए जाओगे, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि तुम आरम्भ से ही शैतान के थे; बल्कि इसका अर्थ यह है कि तुम इतना गिर चुके हो कि यदि परमेश्वर ने तुम्हें बचाने का प्रयास किया भी है, तब भी तुम वह उद्धार पाने में असफल हो गए हो। तुम्हें शैतान के साथ वर्गीकृत करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। ऐसा केवल इसलिए है कि तुम उद्धार से परे हो; इसका कारण यह नहीं है कि परमेश्वर तुम्हारे प्रति अधार्मिक है और उसने जान-बूझकर तुम्हें शैतान का एक प्रतिरूप बनने के लिए पूर्वनियत किया है, फिर तुम्हें शैतान को सौंप देता है और जान-बूझकर चाहता है कि तुम्हें कष्ट पहुँचे। यह विजय के कार्य की वास्तविक कहानी नहीं है। यदि तुम ऐसा मानते हो तो तुम्हारी समझ बहुत ही एक पक्षीय है! अन्तिम चरण की विजय पाने का उद्देश्य लोगों को बचाना और साथ ही उनके परिणामों को प्रकट करना है। यह न्याय के द्वारा लोगों की पतित अवस्था को उजागर करना है और इस प्रकार उनसे पश्चात्ताप करवाना, उन्हें उठ खड़े होने के लिए प्रेरित करना और जीवन और जीवन के सही मार्ग का अनुसरण करवाना है। यह सुन्न और मन्दबुद्धि लोगों के हृदयों को जगाना और न्याय के द्वारा मनुष्य की भीतरी विद्रोहशीलता को प्रकट करना है। परंतु यदि लोग अभी भी पश्चात्ताप करने में असमर्थ हैं, अभी भी मानव जीवन में सही मार्ग का अनुसरण करने में असमर्थ हैं और अभी भी अपनी इन भ्रष्टताओं को उतार फेंकने में असमर्थ हैं, तो वे शैतान द्वारा निगल लिए जाने की वस्तुएँ बन जाएँगे, जो कि उद्धार से परे हैं। विजय-कार्य की महत्ता ऐसी है : लोगों को बचाना और साथ ही उनके परिणाम भी प्रकट करना। अच्छे परिणाम, बुरे परिणाम—वे सभी विजय-कार्य के द्वारा प्रकट किए जाते हैं। लोग बचाए जाएँगे या शापित होंगे, यह सब विजय-कार्य के दौरान प्रकट किया जाता है।

अंत के दिन वे हैं जब सभी वस्तुएँ विजय के जरिए अपनी किस्म के अनुसार छाँटी जाएँगी। विजय, अंत के दिनों का कार्य है; दूसरे शब्दों में, प्रत्येक व्यक्ति के पापों का न्याय करना, अंत के दिनों का कार्य है। अन्यथा, लोगों की छँटाई उनकी किस्म के अनुसार कैसे की जा सकेगी? तुम लोगों के बीच किस्म के अनुसार की जाने वाली छँटाई का कार्य सम्पूर्ण ब्रह्मांड में ऐसे कार्य का आरंभ है। इसके पश्चात सभी देशों के लोगों और तमाम लोगों को भी विजय-कार्य को स्वीकार करना होगा। इसका अर्थ यह है कि सृष्टि में प्रत्येक व्यक्ति की अपनी किस्म के अनुसार छँटाई होगी और उसे न्याय के लिए न्याय के सिंहासन के समक्ष आत्मसमर्पण करना होगा। कोई भी व्यक्ति और कोई भी वस्तु इस ताड़ना और न्याय को सहने से बच नहीं सकती और न ही कोई व्यक्ति और वस्तु ऐसी है जिसकी किस्म के अनुसार छँटाई नहीं की जाती; प्रत्येक व्यक्ति की छँटाई की जाएगी, क्योंकि सभी चीजों के परिणाम निकट आ रहे हैं और समस्त स्वर्ग और पृथ्वी अपने अंत तक पहुँच गए हैं। मनुष्य उस दिन से कैसे बचेगा जिस दिन मानवीय अस्तित्व का अंत होगा? और इस प्रकार, तुम सब और कितनी देर तक अपने विद्रोही कार्य जारी रख सकते हो? क्या तुम लोगों का अंतिम दिन अभी ठीक तुम्हारे सामने नहीं है? वे जो परमेश्वर का भय मानते हैं और उसके प्रकट होने के लिए तरसते हैं, वे परमेश्वर की धार्मिकता के प्रकटन के दिन को कैसे नहीं देख सकते? वे नेकी के लिए अन्तिम पुरस्कार कैसे नहीं प्राप्त कर सकते? क्या तुम वह व्यक्ति हो, जो भला करता है या वह जो बुरा करता है? क्या तुम वह हो जो धार्मिक न्याय को स्वीकार करता है और फिर समर्पण करता है या तुम वह हो जो धार्मिक न्याय को स्वीकार करता है फिर शापित किया जाता है? क्या तुम रोशनी में न्याय के सिंहासन के समक्ष जीते हो या तुम अंधकार के बीच रसातल में जीते हो? क्या तुम्हीं सबसे साफ तौर पर नहीं जानते हो कि तुम्हारा परिणाम बस पुरस्कार पाने का होगा या दंड का? क्या तुम सबसे साफ तौर पर नहीं जानते और गहराई से नहीं समझते हो कि परमेश्वर धार्मिक है? तो तुम्हारा आचरण और तुम्हारा हृदय किस प्रकार का है? आज जब मैं तुम्हें जीतता हूँ, तो क्या मुझे तुम्हें वास्तव में यह बताने की आवश्यकता है कि तुम्हारा आचरण भला है या बुरा? तुमने मेरे लिए कितना त्याग किया है? तुम मेरी आराधना कितनी गहराई से करते हो? क्या तुम स्वयं सबसे स्पष्ट नहीं जानते कि तुम मेरे प्रति कैसा व्यवहार करते हो? किसी और से ज्यादा खुद तुम्हें अच्छी तरह ज्ञात होना चाहिए कि तुम्हारा परिणाम भला क्या होगा! मैं तुम्हें सच कहता हूँ : मैंने केवल मनुष्यजाति को सृजित किया है और मैंने तुम्हें सृजित किया है; परंतु मैंने तुम लोगों को शैतान के हाथों में नहीं दिया और न ही मैंने जान-बूझकर तुम लोगों से अपने खिलाफ विद्रोह करवाया या तुम लोगों से अपना प्रतिरोध करवाया और इस प्रकार तुम्हें दंडित किया। क्या तुम्हें मिलने वाली ये सारी विपत्तियाँ इसलिए नहीं हैं कि तुम लोगों के हृदय बहुत कठोर हैं और तुम लोगों का आचरण बहुत घिनौना है? तो क्या जो परिणाम तुम्हें मिलेगा, वह भी तुम स्वयं निर्धारित करने में सक्षम नहीं हो? क्या तुम अपने हृदय में किसी से भी बेहतर नहीं जानते कि तुम्हारा परिणाम क्या होगा? मैं लोगों को इसलिए जीतता हूँ, क्योंकि मैं उन्हें प्रकट करना और बेहतर ढंग से तुम्हारा उद्धार करना चाहता हूँ। यह तुम से बुरा करवाने या जानबूझकर तुम्हें विनाश के नरक में ले जाने के लिए नहीं है। समय आने पर, तुम्हारी बड़ी पीड़ाएँ, तुम्हारा रोना और दाँत पीसना—क्या यह सब तुम्हारे पापों के कारण नहीं होगा? इस प्रकार, क्या तुम्हारी अपनी भलाई या तुम्हारी अपनी बुराई ही तुम्हारा सर्वोत्तम न्याय नहीं है? क्या यह उसका प्रमाण नहीं है जो सबसे अच्छी तरह खुलासा कर सकता है कि तुम्हारा परिणाम क्या होगा?

आज मैं चीन में परमेश्वर के चुने हुए लोगों पर इसलिए काम करता हूँ ताकि उनके सारे विद्रोही स्वभावों को प्रकट करूँ और उनकी समस्त कुरूपता को उजागर करूँ और इस संदर्भ का उपयोग वह कहने के लिए करूँ जो मुझे कहने की ज़रूरत है। उसके बाद, मैं संपूर्ण ब्रह्मांड को जीतने के अपने कार्य का अगला चरण करूँगा। मैं पूरे ब्रह्मांड में प्रत्येक व्यक्ति की अधार्मिकता का न्याय करने के लिए तुम लोगों के प्रति अपने न्याय का प्रयोग करूँगा, क्योंकि तुम्हीं लोग मनुष्यजाति में विद्रोहियों के प्रतिनिधि हो। जो लोग ऊपर नहीं उठ पाएँगे, वे सिर्फ विषमता और सेवा करने वाले बन जाएँगे, जबकि जो लोग ऊपर उठ पाएँगे, उनका प्रयोग किया जाएगा। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ कि जो लोग नहीं उठ पाएँगे, वे केवल विषमता के रूप में कार्य करेंगे? क्योंकि मेरे वर्तमान वचन और कार्य, तुम लोगों की पृष्ठभूमि को निशाना बनाते हैं और इसलिए कि तुम सब समस्त मनुष्यजाति में विद्रोही लोगों के प्रतिनिधि और साक्षात प्रतिमान बन चुके हो। बाद में, मैं इन वचनों को, जो तुम सबको जीतते हैं, विदेशों में ले जाऊँगा और वहाँ के लोगों को जीतने के लिए उनका प्रयोग करूँगा, फिर भी तुम उन्हें प्राप्त नहीं कर पाओगे। क्या वह तुम्हें एक विषमता नहीं बनाएगा? समस्त मनुष्यजाति का भ्रष्ट स्वभाव, मनुष्य के विद्रोही कार्य, मनुष्य की भद्दी छवियाँ और चेहरे, आज ये सभी उन वचनों में दर्ज होते हैं, जिनका प्रयोग तुम लोगों को जीतने के लिए किया गया था। तब मैं इन वचनों का प्रयोग प्रत्येक राष्ट्र और सम्प्रदाय के लोगों को जीतने के लिए करूँगा, क्योंकि तुम सब आदर्श और उदाहरण हो। हालाँकि मैंने तुम लोगों को जानबूझकर नहीं त्यागा; यदि तुम अपने अनुसरण में असफल होते हो और इस प्रकार तुम असाध्य होना प्रमाणित करते हो, तो क्या तुम सब मात्र सेवा करने वाले और विषमता नहीं होगे? मैंने एक बार कहा था कि शैतान की युक्तियों के आधार पर मेरी बुद्धि प्रयुक्त की जाती है। मैंने ऐसा क्यों कहा था? क्या वह उसके पीछे की वास्तविक कहानी नहीं है, जो मैं अभी कह और कर रहा हूँ? यदि तुम आगे नहीं बढ़ सकते, यदि तुम पूर्ण नहीं बनाए जाते, बल्कि दंडित किए जाते हो, तो क्या तुम विषमता नहीं बन जाओगे? हो सकता है कि आज के दिन तक पहुँचने से ठीक पहले तक तुमने अत्यधिक पीड़ा सही हो, परन्तु तुम अभी भी कुछ नहीं समझते; तुम जीवन की प्रत्येक बात के विषय में अज्ञानी हो। यद्यपि तुम्हें ताड़ना दी गई और तुम्हारा न्याय किया गया; फिर भी तुम बिल्कुल भी नहीं बदले और तुम ने भीतर तक जीवन ग्रहण ही नहीं किया है। जब तुम्हारे कार्य को जाँचने का समय आएगा, तुम अग्नि जैसे परीक्षण और अधिक बड़े क्लेश का अनुभव करोगे। जब यह अग्नि तुम पर आ पड़ेगी, तो तुम्हारा सम्पूर्ण अस्तित्व राख में बदल जाएगा। तुम्हारे पास जीवन नहीं है, तुम्हारे भीतर रत्ती भर भी शुद्ध स्वर्ण नहीं है, तुम अभी भी पुराने भ्रष्ट स्वभाव में फँसे हुए हो, यहाँ तक कि तुम एक अच्छी विषमता भी नहीं हो सकते, तो तुम्हें क्यों नहीं हटाया जाएगा? विजय-कार्य में क्या किसी ऐसे व्यक्ति का उपयोग किया जा सकता है, जिसका मूल्य एक पाई भी नहीं है और जिसके पास जीवन ही नहीं है? जब वह समय आएगा, तो तुम सब के दिन नूह और सदोम के दिनों से भी अधिक कठिन होंगे! तुम किसी भी तरह से प्रार्थना करो, इससे तुम्हारा कोई भला नहीं होगा। उद्धार का कार्य पहले ही समाप्त हो चुकने पर क्या तुम वापस आकर नए सिरे से पश्चात्ताप करना आरंभ कर सकते हो? एक बार जब उद्धार का सम्पूर्ण कार्य पूरा हो जाएगा, तब उद्धार का कोई और कार्य नहीं रहेगा; उसके बाद केवल बुरे लोगों को दंड देने का कार्य आरम्भ होगा। तुम प्रतिरोध करते हो, तुम विद्रोह करते हो, और तुम जानबूझकर गलत काम करते हो। क्या तुम कठोर दण्ड के लक्ष्य नहीं हो? मैं आज यह तुम्हारे लिए स्पष्ट रूप से बोल रहा हूँ। यदि तुम अनसुना करते हो, तो जब बाद में तुम पर विपत्ति टूटेगी, यदि तुम तब विश्वास और पछतावा करना आरम्भ करोगे, तो क्या इसमें तब बहुत देर नहीं हो चुकी होगी? मैं तुम्हें आज पश्चात्ताप करने का एक अवसर प्रदान कर रहा हूँ, लेकिन तुम ऐसा नहीं करते हो। तुम और कितनी प्रतीक्षा करना चाहते हो? ताड़ना के दिन तक? मैं आज तुम्हारे पिछले अपराध याद नहीं रखता हूँ; मैं तुम्हें बार-बार क्षमा करता हूँ, मात्र तुम्हारे सकारात्मक पक्ष को देखने के लिए मैं तुम्हारे नकारात्मक पक्ष को अनदेखा करता हूँ, क्योंकि मेरे समस्त वर्तमान वचन और कार्य तुम्हें बचाने के लिए हैं। तुम्हारे प्रति मैं कोई बुरा इरादा नहीं रखता। फिर भी तुम प्रवेश करने से इन्कार करते हो; तुम भले और बुरे में अंतर नहीं कर सकते और दयालुता की कद्र करना नहीं जानते हो। क्या ऐसे लोग बस दण्ड और धार्मिक प्रतिफल की प्रतीक्षा नहीं कर रहे हैं?

जब मूसा ने चट्टान पर प्रहार किया, और यहोवा द्वारा प्रदान किया गया पानी उसमें से बहने लगा, तो यह उसकी आस्था के कारण ही था। जब दाऊद ने—आनंद से भरे अपने हृदय के साथ—मुझ यहोवा की स्तुति में तंतुवाद्य और वीणा बजाई, तो यह उसकी आस्था के कारण ही था। जब अय्यूब ने पहाड़ों में भरे अपने पशु और संपदा के अनगिनत ढेर खो दिए, और उसका शरीर पीड़ादायक फोड़ों से भर गया, तो यह उसकी आस्था के कारण ही था। जब वह मुझ यहोवा की वाणी सुन सका, और मेरी महिमा देख सका, तो यह उसकी आस्था के कारण ही था। पतरस उसकी आस्था के कारण ही यीशु मसीह का अनुसरण कर सका था। वह जो मेरे वास्ते सलीब पर चढ़ाया जा सका और महिमामयी गवाही दे सका, तो यह भी उसकी आस्था के कारण ही था। जब यूहन्ना ने मनुष्य के पुत्र की महिमामयी छवि देखी, तो यह उसकी आस्था के कारण ही था। जब उसने अंत के दिनों का दर्शन देखा, तो यह सब और भी ज्यादा उसकी आस्था के कारण था। तथाकथित अन्य-जाति राष्ट्रों के असंख्य लोगों ने मेरा प्रकाशन प्राप्त किया है और यह जाना है कि मैं मनुष्यों के बीच अपना कार्य करने के लिए देह में लौट आया हूँ; इसका कारण भी उनकी आस्था ही है। वे सब जो मेरे कठोर वचनों से आघात पाते हैं और फिर भी उनसे सांत्वना पाते हैं और बचाए जाते हैं—क्या उन्होंने ऐसा अपनी आस्था के कारण ही नहीं किया है? अपनी आस्था के कारण लोग बहुत-सी चीजें पा चुके हैं और जरूरी नहीं है कि ये आशीषें हों। उन्हें शायद उस तरह की प्रसन्नता और आनन्द का अनुभव न हो, जो दाऊद ने अनुभव किया था, या यहोवा के द्वारा प्रदान किया गया वैसा जल प्राप्त न हो, जैसा मूसा ने प्राप्त किया था। उदाहरण के लिए, अय्यूब को उसकी आस्था की वजह से यहोवा द्वारा आशीष प्रदान किया गया था, लेकिन उसे विपत्ति भी मिली। चाहे तुम्हें आशीष प्राप्त हो या तुम किसी विपत्ति का सामना करो, दोनों ही आशीषित घटनाएँ हैं। यदि तुम्हारी आस्था नहीं होती, तो तुम यह विजय का कार्य स्वीकार नहीं कर सकते और आज अपनी आँखों के सामने यहोवा के कर्मों को प्रदर्शित होते तो तुम बिल्कुल भी नहीं देख पाते—तुम इसे देख पाने में सक्षम नहीं होते और इसे प्राप्त करना तो बिल्कुल ही नामुमकिन होता। ये विपत्तियाँ, ये आपदाएँ, और ये समस्त न्याय—यदि ये तुम पर न आते, तो क्या तुम आज यहोवा के कार्य को देखने में समर्थ होते? आज, यह आस्था ही है जो तुम्हारा जीता जाना संभव बनाती है और यह तुम्हारा जीता जाना ही है जो तुम्हें यहोवा के प्रत्येक कार्य पर विश्वास करने देता है। केवल आस्था के कारण ही तुम इस प्रकार की ताड़ना और न्याय पाते हो। इस ताड़ना और न्याय के द्वारा तुम जीते और पूर्ण किए जाते हो। यदि आज यह ताड़ना और न्याय न हो, तो तुम्हारी आस्था व्यर्थ होगी, क्योंकि तुम परमेश्वर को नहीं जान पाओगे; इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम उसमें कितना विश्वास करते हो, तुम्हारी आस्था बस खोखले शब्द रह जाएगी और उसमें कोई वास्तविकता नहीं होगी। जब तुम इस विजय के कार्य को प्राप्त कर लेते हो, जो तुम्हें पूर्णतः समर्पित बनाता है, तभी तुम्हारी आस्था सच्ची और विश्वसनीय बनती है और तुम्हारा हृदय परमेश्वर की ओर मुड़ता है। भले ही तुम इस “आस्था” शब्द के कारण काफी अधिक न्याय या बहुत से शापों से होकर गुजरते हो, फिर भी तुममें सच्ची आस्था है और तुम सबसे सच्ची, सबसे वास्तविक और सबसे मूल्यवान वस्तु प्राप्त कर चुके हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि न्याय की प्रक्रिया में ही तुम सृजित प्राणियों की मंजिल को देखते हो; इस न्याय में ही तुम सृष्टिकर्ता की मनोहरता देखते हो; इस प्रकार के विजय-कार्य में ही तुम परमेश्वर की भुजा को देखते हो; इसी विजय में तुम मानव जीवन को पूरी तरह समझते हो; इसी विजय में तुम जीवन में सही मार्ग प्राप्त करते हो और “मनुष्य” का सच्चा अर्थ समझ जाते हो; केवल इसी विजय में तुम सर्वशक्तिमान के धार्मिक स्वभाव और उसके सुंदर, महिमामय मुखमंडल को देखते हो। इसी विजय-कार्य में तुम मनुष्य की उत्पत्ति को जान पाते हो और समस्त मनुष्यजाति के “अनश्वर इतिहास” को समझते हो; इसी विजय में तुम मनुष्यजाति के पूर्वजों और मनुष्यजाति की भ्रष्टता के उद्गम के बारे में जान पाते हो; इसी विजय में तुम आनंद और दिलासा के साथ-साथ अंतहीन ताड़ना, अनुशासन और उस मनुष्यजाति के लिए सृष्टिकर्ता के फटकार के वचन प्राप्त करते हो जिसे उसने बनाया है; इसी विजय-कार्य में तुम आशीष प्राप्त करते हो, साथ ही वे विपत्तियाँ भी भुगतते हो जो मनुष्य को भोगनी ही हैं...। क्या यह सब तुम्हारी थोड़ी-सी आस्था के कारण नहीं है? और क्या ये चीजें प्राप्त करने से तुम्हारी आस्था नहीं बढ़ती है? क्या तुमने काफी अधिक प्राप्त नहीं कर लिया है? तुमने मात्र परमेश्वर के वचन को ही नहीं सुना और परमेश्वर की बुद्धि को ही नहीं देखा, अपितु तुमने उसके कार्य के प्रत्येक चरण को भी व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया है। हो सकता है तुम कहो कि यदि तुम्हारे पास आस्था नहीं होती तो तुम इस प्रकार की ताड़ना और न्याय से पीड़ित न होते। परन्तु तुम्हें जानना चाहिए कि बिना आस्था के न केवल तुम इस प्रकार की ताड़ना प्राप्त करने या सर्वशक्तिमान से इस प्रकार की देखभाल प्राप्त करने में असमर्थ होते, बल्कि तुम सृष्टिकर्ता से मिलने के इस सुअवसर को भी सदा के लिए खो देते। तुम मनुष्यजाति के उद्गम को कभी भी नहीं जान पाते और न ही मानव जीवन की महत्ता को समझ पाते। भले ही तुम्हारी देह नष्ट हो जाती और तुम्हारी आत्मा अलग हो जाती, फिर भी तुम सृष्टिकर्ता के समस्त कार्यों को नहीं समझ पाते, तुम्हें इस बात का ज्ञान तो कभी न हो पाता कि मनुष्यजाति को बनाने के पश्चात सृष्टिकर्ता ने इस पृथ्वी पर कितने महान कार्य किए। उसके द्वारा बनाई गई इस मनुष्यजाति के एक सदस्य के रूप में क्या तुम इस प्रकार अज्ञानतावश अंधकार में गिरने और अनंत दंड की पीड़ा उठाने के लिए तैयार हो? यदि तुम स्वयं को आज की ताड़ना और न्याय से अलग करते हो, तो तुम्हें किसका सामना करना पड़ेगा? क्या तुम सोचते हो कि वर्तमान न्याय से एक बार अलग होकर तुम इस कष्ट भरे जीवन से बचने में समर्थ हो जाओगे? क्या यह सत्य नहीं है कि यदि तुम “इस स्थान” को छोड़ते हो, तो जिससे तुम्हारा सामना होगा, वह दानवों के द्वारा दी जाने वाली पीड़ादायक यातना या गंभीर नुकसान होगा? क्या तुम्हारा सामना असहनीय दिनों और रातों से हो सकता है? क्या तुम सोचते हो कि आज इस न्याय से बचकर, तुम भविष्य की उस पीड़ा को सदा के लिए टाल सकते हो? तुम्हारे मार्ग में क्या आएगा? क्या यह कोई स्वप्न-लोक होगा जिसकी तुम आशा करते हो? क्या तुम सोचते हो कि वास्तविकता से वैसे ही भागकर, जैसे तुम आज भाग रहे हो, तुम भविष्य की उस अनंत ताड़ना से बच सकते हो? क्या आज के बाद, तुम दोबारा इस प्रकार का अवसर और इस प्रकार का आशीष प्राप्त कर पाओगे? क्या तुम उन्हें तब खोज पाओगे जब आपदाएँ तुम पर आ पड़ेंगी? क्या तुम उन्हें खोज पाओगे, जब सम्पूर्ण मनुष्यजाति विश्राम में प्रवेश करेगी? तुम्हारा वर्तमान खुशहाल जीवन और तुम्हारा छोटा-सा मैत्रीपूर्ण परिवार—क्या वे तुम्हारी भविष्य की अनन्त मंजिल की जगह ले सकते हैं? यदि तुम सच्ची आस्था रखते हो और यदि अपनी आस्था के कारण तुम्हें बहुत अधिक प्राप्त होता है, तो यह सबकुछ तुम्हें, एक सृजित प्राणी को, प्राप्त होना चाहिए और यह सब तुम्हारे पास पहले ही हो जाना चाहिए था। तुम्हारी आस्था और तुम्हारे जीवन के लिए ऐसी विजय से अधिक लाभकारी और कुछ नहीं है।

आज तुम्हें यह समझने की आवश्यकता है कि परमेश्वर उनसे क्या चाहता है जो जीते जाते हैं, जो पूर्ण बनाए जाते हैं उनके प्रति उसका क्या दृष्टिकोण है, और वर्तमान में तुम्हें किसमें प्रवेश करना चाहिए। कुछ बातों को तुम्हें कम ही समझने की आवश्यकता है। तुम्हें रहस्य के कुछ शब्दों पर शोध करने की आवश्यकता नहीं है; वे जीवन के लिए अधिक सहायक नहीं हैं और उन्हें केवल सरसरी तौर पर देख लेना ही पर्याप्त है। उदाहरण के लिए, जब आदम और हव्वा के रहस्य जैसे रहस्यों की बात आती है, उन पर गौर करना और यह देखना आवश्यक है कि उस समय आदम और हव्वा क्या थे और परमेश्वर आज क्या काम करना चाहता है। तुम्हें समझने की आवश्यकता है कि मनुष्य को जीतने और पूर्ण बनाने में, परमेश्वर मनुष्य को उसी रूप में वापस लाना चाहता है, जैसे आदम और हव्वा थे। तुम्हें अपने दिल में, पूर्णता के उस स्तर का पता होना चाहिए जो परमेश्वर के अपेक्षित मानकों पर खरा उतरने के लिए प्राप्त किया जाना चाहिए और फिर तुम्हें उसे हासिल करने के लिए प्रयास करने का इच्छुक होना होगा। यह तुम्हारे अभ्यास से संबंधित है और इसे तुम्हें समझना चाहिए। इन मामलों के विषय में परमेश्वर के वचनों के अनुसार तुम्हें प्रवेश करने का प्रयास करना ही तुम्हारे लिए पर्याप्त है। जब तुम पढ़ते हो कि “आज के दिन तक मानवजाति के विकास के इतिहास के दसियों हजार साल पहले ही बीत चुके हैं”, तो तुम जिज्ञासु हो जाते हो, और इसलिए तुम भाई-बहनों के साथ शोध करना शुरू कर देते हो। “परमेश्वर कहता है कि मनुष्यजाति का विकास छह हजार वर्ष पुराना है, ठीक है न? यह दसियों हजार वर्ष क्या हैं?” इसके बारे में शोध करने का तुम्हारे लिए क्या उपयोग है? चाहे परमेश्वर दसियों हज़ार वर्षों से कार्य कर रहा हो या करोड़ों वर्षों से—क्या उसे वास्तव में इस बात की आवश्यकता है कि तुम इसके बारे में शोध करो? एक सृजित प्राणी के रूप में तुम्हें यह सब जानने की आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार के शब्दों को तुम्हें बस संक्षेप में पढ़ लेना चाहिए—उन्हें इस तरह से समझने की कोशिश मत करो जैसे कि वे कोई दर्शन हों। तुम्हें केवल इतना जानने की आवश्यकता है कि आज तुम्हें किसमें प्रवेश करना है और क्या समझना है; और फिर उसे स्पष्ट रूप से समझने के लिए तुम्हें उस पर मनन करना चाहिए। तभी तुम्हें जीता जा सकेगा। उपरोक्त वचनों को पढ़कर तुम्हारी सामान्य प्रतिक्रिया यह होनी चाहिए : परमेश्वर अत्यंत व्याकुल है। वह हमें जीतकर महिमा और गवाही प्राप्त करना चाहता है, तो हमें उसका सहयोग कैसे करना चाहिए? उसके द्वारा पूरी तरह जीत लिए जाने और उसकी गवाही बनने के लिए हमें क्या करना चाहिए? हमें क्या करना चाहिए ताकि परमेश्वर महिमा प्राप्त करे? हमें शैतान की सत्ता के अधीन नहीं बल्कि परमेश्वर के प्रभुत्व में जीने के लिए क्या करना चाहिए? लोगों को इसी बारे में सोचना चाहिए। तुम सभी लोगों को परमेश्वर के विजय-कार्य की महत्ता को समझना चाहिए। यह तुम लोगों का उत्तरदायित्व है। यह समझ प्राप्त करने के बाद ही, तुम लोगों को प्रवेश प्राप्त होगा, तुम सब इस चरण के कार्य को समझोगे और तुम पूर्णतः समर्पित बन जाओगे। अन्यथा, तुम लोग सच्चा समर्पण प्राप्त नहीं कर पाओगे।

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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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