वचन देह में प्रकट होता है

विषय-वस्तु

तुम लोग एक विषमता होने के इच्छुक क्यों नहीं हो?

जिन लोगों को जीता जाता है वे विषमताएँ हैं, और केवल सिद्धपूर्ण किए जाने के बाद ही वे अंत के दिनों के कार्य के आदर्श और नमूने हैं। पूर्ण किए जाने से पहले वे विषमताएँ, औजार, और साथ ही सेवा की वस्तुएँ हैं। जो लोग परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से जीते जा चुके हैं वे उसकी प्रबंधन योजना के निश्चित रूप और साथ ही साथ आदर्श और नमूने हैं। लोगों के लिए बस ये कुछ विनम्र उपाधियाँ कई मनोरंजक कहानियाँ प्रदर्शित करती हैं। तुम लोगों में से जो कम विश्वास वाले हैं, वे हमेशा एक तुच्छ उपाधि पर बहस करेंगे जब तक कि तुम लोगों का चेहरा लाल न हो जाए, और कभी-कभी तो इसे हमारे संबंधों को भी प्रभावित करने देगा। देंगे। यद्यपि यह एक छोटी सी उपाधि है, किन्तु तुम लोगों की सोच में, तुम लोगों के विश्वास में, यह मात्र एक छोटा सा नाम नहीं, बल्कि यह तुम लोगों के भाग्य से संबंधित एक महत्वपूर्ण चीज है। इसलिए जो समझदार नहीं हैं, उन्हें प्रायः इस तरह की छोटी-छोटी चीज़ों पर बहुत नुकसान पहुँचेगा - —यह अशर्फियाँ लुटें और कोयलों पर मोहर लगें के समान है, और तुम लोग कुछ छोटे नामों की वजह से भाग जाते हो और कभी नहीं लौटते हैं। इसका कारण यह है कि तुम लोग जीवन को महत्वहीन मानते हो और तुम लोग जो कहलाते हो उसे बहुत महत्व देते हो। इसलिए तुम लोगों के आध्यात्मिक जीवनों में, और यहाँ तक कि तुम लोगों के व्यावहारिक जीवन में भी, तुम लोग अपनी कद-काठी की अवधारणा की वजह से प्रायः कई पेचीदी और अजीब कहानियाँ बना लेंगे। शायद तुम लोग इसे स्वीकार नहीं करोगे, लेकिन मैं तुम्हें बताऊँगा कि ऐसे लोग वास्तव में तुम लोगों के व्यावहारिक जीवनों में विद्यमान हैं। यह मात्र इतना ही है कि तुम लोग एक-एक करके प्रकट नहीं किए गए हो। इस प्रकार की चीजें तुम लोगों में से प्रत्येक के जीवन में हुई हैं। यदि तुम्हें इस पर विश्वास नहीं है, तो बस नीचे एक बहन (या एक भाई) के जीवन के शब्दचित्र पर नज़र डालो। यह संभव है कि वह व्यक्ति वास्तव में तुम हो, या हो सकता है कि यह कोई ऐसा व्यक्ति हो जिससे तुम अपने जीवन में परिचित हो। यदि मैं गलत नहीं हूँ, तो यह शब्दचित्र एक ऐसा अनुभव है जो तुमतुम्हें हुआ था, और वर्णन में कोई कमी नहीं है, एक भी विचार या अवधारणा को छोड़ा नहीं गया है, बल्कि उन्हें इस कहानी में पूरी तरह से दर्ज किया गया है। यदि तुम्हें इस पर विश्वास नहीं है, तो बस एक नज़र डालें।डालो।

यह एक "आध्यात्मिक व्यक्ति" का छोटा सा अनुभव है जो यहाँ दर्ज है। जब वह कलीसिया में गई और अपने भाइयों और बहनों की परिस्थितियों को देखा, तो वह चिंतित हो गई: "तुम लोग क्यों कभी भी परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट नहीं करते हो? निर्लज्ज प्राणियों! (अपने भाइयों और बहनों को डाँटते हुए)। वास्तव में, तुम लोग पाशविक चीजों को करने के लिए अपने विवेक की उपेक्षा करते हो। ... मेरा तुमसे यह कहना भी मेरी स्वयं के लिए घृणा है। मैं देखती हूँ कि परमेश्वर अधीरता के साथ जलता है और मैं अपने अंतर्गत एक आग महसूस करती हूँ। मैं सच में पूरी तरह से परमेश्वर का कार्य करने के लिए तैयार हूँ और मैं सच में चाहती हूँ कि तुम लोग मेरी सेवा के माध्यम से ऊपर उठो। यह सिर्फ इतना ही है कि मेरी वर्तमान ताकत बहुत कमज़ोर है। परमेश्वर ने हम पर बहुत समय बिताया है और बहुत से वचन कहे हैं, किन्तु हम अभी भी ऐसे ही हैं। मेरे हृदय में, मैं हमेशा महसूस करती हूँ कि मैं परमेश्वर की अत्यधिक ऋणी हूँ ..." (रोने लगती है और बोलने में असमर्थ)। और फिर उसने प्रार्थना की: "हे परमेश्वर! मैं आपतुझसे विनती करती हूँ कि मुझे शक्ति दो दे और मुझे आगे भी बढ़ाओ, और आपकीतेरी आत्मा मुझ में कार्य करे। मैं आपकेतेरे साथ सहयोग करने को तैयार हूँ। जब तक आपतू अंत में महिमा प्राप्त करते हैंता है, तब तक मैं अपना स्वयं का सर्वस्व आपकोतुझे देने के लिए तैयार हूँ, भले ही इसका अर्थ हो कि मुझे अपना जीवन अर्पित करना होगा। मैं तब तक तैयार हूँ [क] जब तक हम महान स्तुतियाँ अर्पित कर सकते हैं, आपकेतेरे पवित्र नाम की स्तुति करने के लिए भाई और बहनें खुशी से गाते हैं और नृत्य करते हैं, आप कोतुझे गौरवान्वित करते हैं, आप कोतुझे अभिव्यक्त करते हैं, और आपकेतेरे कार्य के बारे में निश्चित होते हैं और साथ ही आपकीतेरी ज़िम्मेदारी के लिए मनन करने हेतु तैयार हैं...।" उसने इस तरह से ईमानदारी से प्रार्थना की, और पवित्र आत्मा ने वास्तव में उसे ज़िम्मेदारी दी। इस समय के दौरान उस पर बहुत ज़िम्मेदारी थी, और वह पूरा दिन पढ़ने, लिखने और सुनने में बिताती थी। वह उतनी व्यस्त थी जितनी कि वह संभवतः हो सकती थी। उसकी आध्यात्मिक स्थिति उत्कृष्ट थी और अपने हृदय में वह हमेशा ऊर्जावान और ज़िम्मेदार थी। समय-समय पर वह कमजोर हो जाती थी और थक कर चूर हो जाती थी, किन्तु शीघ्र ही वह सामान्य अवस्था को पुनः प्राप्त कर लेती थी। इस तरह की एक अवधि के बाद, उसने तेजी से प्रगति की, वह परमेश्वर के बहुत से वचनों को समझने में सक्षम हो गई थी, और उसने गाने को तेजी से सीख लिया था—कुल मिला कर, उसकी आध्यात्मिक अवस्था उत्कृष्ट थी। जब उसने देखा कि कलीसिया में कई चीजें परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप नहीं हैं, तो वह चिंतित हो गईं थी। जब उसने देखा कि कोई भी प्रतिलिपि किए गए कैसेट टेप को हृदय से नहीं लेता है, तो वह चिंतित हो गई थी: "क्या यह परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण है? क्या यह उसकी इच्छा को संतुष्ट करना है? तुम लोग इतनी छोटी सी, मूर्त कीमत भी अर्पित नहीं कर सकते हो? यदि तुम लोग ऐसा नहीं करना चाहते हो, तो मैं...।"

जब उस पर जिम्मेदारी पड़ी, तो जितना अधिक पवित्र आत्मा ने काम किया उतना ही बेहतर उसने महसूस किया। वह कभी-कभी कुछ नकारात्मकता या कुछ कठिनाइयों का सामना किया करती थी, लेकिन वह इस पर विजय पाने में सक्षम थी। अर्थात्, जब उसने पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव किया था, यहाँ तक कि जब उसकी परिस्थितियाँ बहुत बढ़िया थीं, तब भी वह कुछ कठिनाइयों या थोड़ी सी कमजोरी से बच नहीं सकी थीं। ये अपरिहार्य हैं, किन्तु शीघ्र ही वह उन अवस्थाओं में से बाहर आने में सक्षम हो गई थी। कमजोरी का अनुभव करते समय, एक बार उसने प्रार्थना की तो उसे महसूस हुआ कि उसकी स्वयं की कद-काठी वास्तव में अपर्याप्त थी लेकिन वह परमेश्वर के साथ सहयोग करने को तैयार थी। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर ने क्या किया, वह उसकी इच्छा को संतुष्ट करने के लिए तैयार थी, और वह परमेश्वर की सभी व्यवस्थाओं का पालन करने के लिए तैयार थी। कुछ ऐसे लोग थे, जिनकी उसके बारे में कुछ राय और पूर्वाग्रह थे। वह अपने आप को एक तरफ रखने में सक्षम थी और उनके साथ संगति में लगातार अग्रसक्रिय हो कर शामिल हो सकती थी। ये सभी पवित्र आत्मा के सामान्य कार्य के दौरान अवस्थाएँ थी। एक समयावधि के बाद कार्य बदलना शुरू हुआ, और सभी लोगों ने कार्य के दूसरे चरण में प्रवेश किया जिसमें उनसे अलग-अलग अपेक्षाएँ थीं। इसलिए इसमें नए वचन थे जिनमें लोगों से अपेक्षाओं को उठाया गया था: "... तुम लोगों के लिए मेरे पास केवल घृणा है, आशीर्वाद कदापि नहीं। मुझे तुम लोगों को आशीर्वाद देने का विचार कभी नहीं आया, न ही मुझे तुम लोगों को पूर्ण करने का विचार आया। तुम लोगों के लिए मेरे पास मात्र घृणा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम लोग विद्रोही हो, क्योंकि तुम लोग कुटिल और कपटी हो, और क्योंकि तुम लोगों में क्षमता का अभाव है और तुम लोग निम्न हैसियत के हो। इसलिए तुम लोग मेरी दृष्टि में या मेरे हृदय में कभी नहीं रहे हो। मेरा कार्य केवल तुम लोगों की निंदा करने के आशय से है; मेरा हाथ कभी भी तुम लोगों से दूर नहीं रहा है, और न ही मेरी ताड़ना तुम लोगों से दूर रही है। मैंने तुम लोगों को न्याय और शाप देना जारी रखा है। क्योंकि तुम लोगों को मेरी समझ नहीं है। यही कारण है कि मेरा कोप हमेशा तुम लोगों पर रहा है। यद्यपि मैंने हमेशा तुम लोगों के बीच कार्य किया है, फिर भी तुम लोगों को अपने प्रति मेरी प्रवृत्ति का पता होना चाहिए। यह कुछ नहीं मात्र अरुचि है—कोई अन्य प्रवृत्ति या राय नहीं है। मैं केवल यह चाहता हूँ कि तुम लोग मेरी बुद्धि और मेरी महान सामर्थ्य के लिए विषमता के रूप में कार्य करें। तुम लोग मेरी विषमताओं से अधिक कुछ नहीं हो क्योंकि मेरी धार्मिकता तुम लोगों के विद्रोहीपन के माध्यम से प्रकट होती है। मैं, तुम लोगों से अपने कार्य के विषमता के रूप में, अपने कार्य का उपांग होने के लिए कार्य करवाता हूँ......।" जैसे ही उसने वचनों[ख] के "उपांगों" और "विषमताओं" को देखा, तो वह सोचने लगी: "यह मुझसे अनुसरण कैसे करवाएगा? इस तरह एक कीमत चुकाने के बाद, मैं अभी भी एक विषमता हूँ। क्या कोई विषमता केवल एक सेवा करने वाला नहीं है? अतीत में यह कहा जाता था कि हम सेवा करने वाले नहीं होंगे, बल्कि परमेश्वर के लोग होंगे, फिर भी क्या आज हम वही भूमिका नहीं निभा रहे हैं? क्या सेवा करने वालों में जीवन का अभाव नहीं है? यहाँ तक कि यदि मैं अब और पीड़ित होती हूँ, तो भी परमेश्वर इसकी प्रशंसा नहीं करेगा! परमेश्वर के महान सामर्थ्य के लिए एक विषमता होना पूर्ण हो जाने के बाद, क्या यह समाप्त नहीं हो जाएगा?...।" इसके बारे में उसने जितना अधिक सोचा वह उतनी ही अधिक निरुत्साहित हो गई थी। वह कलीसिया में आयी और अपने भाइयों और बहनों की अवस्था देखी तब उसे और भी बदतर महसूस हुआ: "तुम लोग ठीक नहीं हो! मैं ठीक नहीं हूँ! मैं नकारात्मक हूँ। ओह! क्या किया जा सकता है? परमेश्वर अभी भी हमें नहीं चाहता है। इस तरह के कार्य करने में, कोई रास्ता नहीं है कि वह हमें नकारात्मक नहीं बनाएगा। मुझे नहीं पता कि मेरे साथ क्या गलत है। यहाँ तक कि मैं प्रार्थना भी नहीं करना चाहती हूँ। फिर भी, अभी मैं ठीक नहीं हूँ और मैं स्वयं को इससे बाहर नहीं निकाल सकती हूँ। मैंने कई बार प्रार्थना की है लेकिन तब भी मैं इसे जारी नहीं रख सकती हूँ, और जारी रखने के लिए तैयार नहीं हूँ। मैं इसे इसी तरह से देखती हूँ। परमेश्वर कहते हैंता है कि हम विषमताएँ हैं, तो क्या 'विषमताएँ' मात्र सेवा करने वाले नहीं हैं? परमेश्वर कहते हैंता है कि हम विषमताएँ हैं, पुत्र नहीं, न ही हम उसके लोग हैं। हम उसके पुत्र नहीं हैं, उसकी पहली संतान तो बिल्कुल नहीं हैं। हम कुछ भी नहीं, मात्र विषमताएँ हैं। इस तरह के संबोधन के साथ, क्या हमें संभवतः कोई अनुकूल परिणाम प्राप्त हो सकता है? विषमताओं की कोई आशा नहीं है क्योंकि उनमें जीवन नहीं होता है। यदि हम उसके पुत्र, उसके लोग होते, तो उसमें आशा होती, और हम पूर्ण बनाए जा सकते। क्या विषमताओं के अंदर परमेश्वर का जीवन हो सकता है? क्या परमेश्वर उन लोगों को जीवन दे सकता है जो उसके लिए सेवा करते हैं? जिन्हें वह प्रेम करता है ये वे लोग हैं जिनके पास उसका जीवन है, और जिनके पास उसका जीवन है वे उसके पुत्र हैं, उसके लोग हैं। यद्यपि मैं नकारात्मक और कमजोर हूँ, किन्तु मुझे आशा है कि तुम सभी लोग नकारात्मक नहीं हो। मुझे पता है कि इस तरह से पीछे हटने और नकारात्मक होने से परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट नहीं किया जा सकता है, लेकिन मैं एक विषमता बनने के लिए तैयार नहीं हूँ। मुझे विषमता होने से डर लगता है। फिर भी, मेरे पास केवल इतनी ही ऊर्जा है, और अब मैं आगे नहीं बढ़ सकती हूँ। मुझे आशा है कि तुम सभी लोग मुझसे सीखते नहीं हो, बल्कि तुम मुझ से कुछ प्रबुद्धता प्राप्त कर सकते हो। मुझे लगता है कि मैं मर भी सकती हूँ! मैं अपने मरने से पहले तुम लोगों के लिए कुछ अंतिम वचन छोड़ जाऊँगी - —मुझे आशा है कि तुम लोग अंत तक विषमताओं के रूप में कार्य कर सकते हो; हो सकता है कि अंत में परमेश्वर विषमताओं की प्रशंसा करेगा...." जब भाइयों और बहनों ने यह देखा, तो उन्होंने सोचा:[ग] वह इतनी नकारात्मक कैसे हो सकती है? क्या वह उन कुछ दिनों तक ठीक-ठाक नहीं थी? वह अचानक इतनी निरुत्साही क्यों हो गई है? वह सामान्य क्यों नहीं हो रही है? उसने कहा: "मत कहो कि मैं सामान्य नहीं हो रही हूँ। वस्तुतः, मैं अपने हृदय में हर चीज के बारे में स्पष्ट हूँ। मैं जानती हूँ कि मैंने परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट नहीं किया है—क्या यह मात्र इसलिए नहीं है कि मैं उसकी विषमता के रूप में कार्य करने के लिए तैयार नहीं हूँ? मैंने और ऐसा कुछ नहीं किया है जो बहुत गंभीर हो। शायद एक दिन परमेश्वर अपने उन प्राणियों में विषमताओं की[घ] उपाधियों को बदल देगा जो उसके द्वारा महत्वपूर्ण तरीकों से उपयोग किये जाते हैं। क्या इस बात में कुछ आशा नहीं है? मुझे आशा है कि तुम लोग नकारात्मक या निरुत्साहित नहीं हो, कि तुम लोग परमेश्वर का अनुसरण करना और बेहतर विषमताएँ होना जारी रखने में सक्षम हो। बहरहाल, मैं जारी नहीं रह सकती हूँ।" अन्य लोगों ने यह सुना, और उन्होंने कहा:[ङ] यद्यपि तुम ठीक नहीं हो, किन्तु हम पालन करते रहेंगे, और हम इसलिए विवश नहीं होंगे क्योंकि तुम नकारात्मक हो।

एक समयाविधि तक इससे गुजरने के बाद वह अभी भी एक विषमता होने के बारे में नकारात्मक थी, इसलिए मैंने उससे कहा: "तुम्हें तुझे मेरे कार्य की कोई समझ नहीं है। तुम्हें तुझे मेरे वचनों की आंतरिक सच्चाई, सार या उनके अभीष्ट परिणामों की कोई समझ नहीं है। तुम तू मेरे कार्य के लक्ष्यों को, या इसकी बुद्धि को नहीं जानती हो। है। तुम्हें तुझे मेरी इच्छा की कोई समझ नहीं है। तुम तू केवल पीछे हटना जानती हो है क्योंकि तुम तू विषमता होहै—हैसियत के लिए तुम्हारी तेरी अभिलाषा बहुत बड़ी है! तुम तू बेवकूफ होहै! अतीत में मैंने तुम्हें तुझे बहुत कुछ कहा है, और मैंने कहा है कि मैं तुम्हें तुझे सिद्धपूर्ण बना दूँगा। क्या तुम तू भूल गई होहै? विषमताओं के बारे में बोलने से पहले, क्या सिद्धपूर्ण बनाए जाने के बारे में नहीं बोला गया था?" "रुकोरुक, मैं इसके बारे में विचार करूँगा! विषमताओं से बात करने से पहले, तुमने तूने वास्तव में कहा था कि; यह ऐसा था!" "जब मैंने पूर्ण किए बनाए जाने के बारे में बोला था, तो क्या मैंने ऐसा नहीं कहा कि केवल लोगों को जीते जाने के बाद ही उन्हें सिद्धपूर्ण बनाया जाएगा?" "हाँ!" "क्या मेरे वचन ईमानदार नहीं थे? क्या वे सदाशय में नहीं कहे गए थे?" "हाँ! आपतू एक ऐसे परमेश्वर हैं है जिसने कभी भी बेईमानी की बात नहीं कही है और कोई भी इस से इनकार करने की हिम्मत नहीं कर सकता है। लेकिन जिन तरीकों से आपतू बोलते हैं है वे बहुत अधिक हैं।" "क्या मेरे बोलने का तरीका कार्य के चरणों के अनुसार बदलता नहीं है? क्या मैं जो कहता हूँ वह तुम्हारी तेरी आवश्यकताओं के आधार पर किया और कहा नहीं जाता है?" "आपतू लोगों की आवश्यकताओं के अनुसार कार्य करते हैं है और आपतू वह भरण पोषण करते हैंता है जिसकी उन्हें आवश्यकता होती है। यह असत्य नहीं है!" "तब फिर क्या मेरे कथन और मैंने जो कुछ आपसेतुझसे कहा है वह लाभप्रद नहीं रहे हैं? क्या मेरी ताड़नाएँ आपकेतेरे वास्ते नहीं रही है?" "तब भी आपतू कहते हैंती है कि यह मेरे तेरे स्वयं के वास्ते है! मुझे आपकेतेरे द्वारा ताड़ना से मृत्यु लगभग दी ही जाने वाली है तथा मैं अब और जीवित नहीं रहना चाहती हूँ। आज आपतू ऐसा कहते हैंता है, कल आपतू वैसा कहते हैंता है। मुझे पता है कि आपकेतेरे द्वारा मुझे सिद्धपूर्ण किया जाना मेरे स्वयं के वास्ते हैं, किन्तु आपनेतूने मुझे सिद्धपूर्ण नहीं किया बनाया है—आपतू मुझे एक विषमता बनाते हैंता है और आपतू मुझे अभी भी ताड़ित करते हैंता है। क्या आपतू मुझसे नफरत नहीं करते हैंता है? कोई भी आपकेतेरे वचनों पर विश्वास करने की हिम्मत नहीं करता है, और केवल अब मैंने स्पष्ट रूप से देखा है कि यह केवल आपकेतेरे हृदय में घृणा का समाधान करने के लिए है, मुझे बचाने के लिए नहीं। आपनेतूने इसे पहले मुझसे छिपाया था, आपनेतूने कहा था कि आपतू मुझे सिद्धपूर्ण करेंगे बनाएगा और यह कि ताड़ना मुझे सिद्धपूर्ण करने बनाने के लिए दी गई थी। इसलिए मैंने हमेशा ताड़ना का पालन किया है; मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि आज मुझे एक विषमता की उपाधि मिलेगी। परमेश्वर, क्या यह बेहतर नहीं होता यदि आपनेतूने मुझसे किसी और के रूप में कार्य करवाया होता? क्या आपकातेरा मुझसे विषमता की भूमिका निभवाना आवश्यक है? यदि मैं स्वर्ग में द्वारपाल होती तो यह ठीक रहा होता। मैं इधर-उधर दौड़ी, अब मेरे हाथ खाली हैं, और मैंने सब कुछ बलिदान कर दिया है, मगर अभी भी आपतू मुझे कहते हैंता है, आपतू मुझसे अपने विषमता के रूप में कार्य करवाते हैंता है। मैं यहाँ तक कि अपना चेहरा भी कैसे दिखा सकती हूँ?" "मैंने अतीत में इतना अधिक ताड़ना का कार्य किया है, और क्या आपकोतुझे समझ नहीं है? क्या आपकोतुझे अपने स्वयं के बारे में समझ नहीं है? क्या ताड़ना वचनों का न्याय नहीं है? क्या 'विषमता' की उपाधि भी वचनों का न्याय नहीं है?" "इसे इस तरह से कहें तो, जिन विषमताओं के बारे में आपतू बोलते हैंता है वह भी एक तरीका है? यह इस के माध्यम से मेरे बारे में न्याय करना है? यदि यह मामला है, तो मैं पालन करूँगी।" "तब फिर अब आपतू मेरा अनुसरण कैसे करेंगेकरेगी?" "आप कातेरा अनुसरण करेंकरूँ—मैंने अभी तक योजना नहीं बनायी है कि आप कातेरा अनुसरण कैसे करूँ! मैं चाहती हूँ कि आपतू कोई वचन कहें कहे जो कोई तरीका न हो। क्या मैं एक विषमता हूँ या नहीं? क्या विषमताओं को भी सिद्धपूर्ण किया बनाया जा सकता है? क्या 'विषमता' का नाम बदला जा सकता है? क्या मैं एक विषमता होने के माध्यम से एक शानदार गवाही दे सकती हूँ, और फिर कोई ऐसा व्यक्ति बन सकती हूँ जिसे सिद्धपूर्ण किया बनाया जाता है, जो परमेश्वर को प्यार करने के लिएका एक आदर्श हो और परमेश्वर का अंतरंग हो? क्या मुझे पूर्ण बनाया जा सकता है? मुझे सत्य सच बताएँबताओ!" "क्या तुम तू नहीं जानते जानती कि चीजें हमेशा विकसित हो रही हैं, हमेशा बदल रही हैं? जब तक तुम तू वर्तमान में विषमता होने का पालन करने की इच्छुक होहै, तब तक तुम तू बदलने में सक्षम हो सकोगी। सकेगी। तुम तू विषमता हो है या नहीं इसका तुम्हारी तेरी नियति से कोई संबंध नहीं है—मुख्य बात यह है कि तुम तू कोई ऐसा व्यक्ति हो सकते सकती हैहो या नहीं जिसके अपने जीवन स्वभाव में परिवर्तन हो।" "मुझे बताएँबताओ! क्या आपतू मुझे पूर्ण कर सकते होता है या नहीं?" "जब तक तुम तू अंत तक अनुसरण और आज्ञा पालन करते करती हैहैं, तब तक मैं गारंटी देता हूँ कि मैं तुम्हें तुझे पूर्ण बना सकता हूँ।" "और मुझे किस तरह के दुःख का अनुभव करना होगा?" "वचनों द्वारा दुर्दिन और साथ ही न्याय और ताड़ना, विशेष रूप से वचनों की ताड़ना—एक विषमता को दी गई जैसी ताड़ना!" "विषमता के रूप में भी वही ताड़ना? किन्तु यदि दुर्दिन से गुजरने के द्वारा मैं आपकेतेरे द्वारा पूर्ण की बनायी जा सकती हूँ, यदि आशा है तो यह ठीक है। यहाँ तक ​​कि यदि इसमें लेशमात्र ही आशा हो, तो एक विषमता होने की तुलना में बेहतर है। वह उपाधि, 'विषमता', बहुत भयंकर लगती है। मैं एक विषमता बनने की इच्छुक नहीं हूँ!" "एक विषमता में क्या गलत है? क्या विषमताएँ भी काफी अच्छे नहीं होते हैं? क्या विषमताएँ आशीषों का आनंद लेने के अयोग्य हैं? यदि मैं कहता हूँ कि विषमताएँ आशीषों का आनंद ले सकते हैं तो तुम आशीषों का आनंद लेने में सक्षम हो जाओगे। क्या मेरे कार्य के कारण लोगों की उपाधियाँ बदल नहीं रही हैं? मात्र एक उपाधि तुम्हें इतना परेशान कर रही है? इस तरह की विषमता होना अच्छी तरह से उचित है। क्या तुम तू अनुसरण करने के लिए तैयार हो है या नहीं?" "तो क्या तुम तू मुझे पूर्ण कर सकतेबना सकता हो है या नहीं?! क्या तुम तू मुझे अपने आशीषों का आनंद लेने दे सकते हैंता है?" "क्या तुम तू अंत तक अनुसरण करने के लिए तैयार हो है या नहीं? क्या तुम तू खुद को अर्पित करने के लिए तैयार होहै?" "मुझे इस पर विचार करने दें। दो। एक विषमता भी आपकेतेरे आशीष का आनंद ले सकता है, और उसे पूर्ण किया बनाया जा सकता है। पूर्ण किए जाने के बाद मैं आपकातेरी अंतरंग हो जाऊँगी और आपकीतेरी सभी इच्छाओं को समझ जाऊँगी, और मैं वह धारण करूँगी जो आपतू धारण करते हैंता है। मैं वह आनंद ले पाऊँगी, जो आनंद आप लेते हैंतू लेता है, और मैं वह जानूँगी जो आप जानते हैंतू जानता है।... दुर्दिन से गुजरने और सिद्धपूर्ण किए जाने के बाद, मैं आशीषों का आनंद ले सकती हूँ। तो मैं किन आशीषों का वास्तव में आनंद लूँगी?" "आपतू किन आशीषों का आनंद लेंगी इस बारे में चिंता न करेंमत कर। भले ही मैं तुमसे तुझसे कह दूँ, तब भी तुम तू उनकी कल्पना करने में सक्षम नहीं होंगी। होगी। एक अच्छी विषमता होने के बाद, तुम तू जीत ली जाओगीजाएगी, तुम तू एक सफल विषमता हो जाएँगी। जाएगी। यह जीते गए का एक प्रतिदर्श और नमूना है, लेकिन निस्संदेह तुम तू ऐसा केवल जीत लिए जाने के बाद ही हो सकती हो।है।" "एक प्रतिदर्श और नमूना क्या है?" "यह सभी बुतपरस्तों अन्य जातियों के लिए एक प्रतिदर्श और नमूना है, अर्थात्, वे जिन्हें जीता नहीं गया है।" "कितने लोग?" "बहुत से लोग। यह तुम लोगों में से मात्र चार या पाँच हजार नहीं हैं—पूरी दुनिया में जो इस नाम को स्वीकार करते हैं, वे अवश्य जीते जाने चाहिए।" "इसलिए यह मात्र पाँच या दस शहर नहीं है!" "इसके बारे में अभी चिंता न करेंमत कर—स्वयं को अत्यधिक चिंतित न करेंमत कर। बस इस बात पर ध्यान दें दे कि तुम्हें तुझे अभी कैसे प्रवेश करना चाहिए! मैं गारंटी देती देता हूँ कि तुम्हें तुझे पूर्ण बनाया जा सकता है।" "किस अंश तक? और मैं किन आशीषों का आनंद ले सकता सकती हूँ?" "तुम तू किस बारे में इतने चिंतित होहै? मैं गारंटी देती देता हूँ कि तुम्हें तुझे पूर्ण किया बनाया जा सकता है; क्या तुम भूल गए होई है कि मैं विश्वसनीय हूँ?" "यह सच है कि आपतू विश्वसनीय हैंहै, किन्तु बोलने के आपकेतेरे कुछ तरीके हमेशा बदलते रहते हैं। आज आपतू कहते हैंता है कि आपतू गारंटी देते हैंता है कि मुझे पूर्ण किया बनाया जा सकता है, लेकिन कल आपतू कह सकते हैंता है कि यह अनिश्चित है। और कुछ लोगों को आपतू कहता है कहते हैं, 'मैं गारंटी देता हूँ कि आपकेतेरे जैसा कोई व्यक्ति पूर्ण नहीं किया बनाया जा सकता है।' मुझे नहीं पता कि आपकेतेरे वचनों के साथ क्या चल रहा है। मैं बस उस पर विश्वास करने की हिम्मत नहीं करती हूँ।" "क्या आपतू स्वयं को अर्पित कर सकते हैंती है या नहीं?" "क्या अर्पित करेंकरूँ?" "अपने भविष्य को, अपनी आशाओं को अर्पित करें।कर।" "ओह! इसे मैं जाने दे सकती हूँ! मुख्य बात 'विषमता' की उपाधि है - —मैं वास्तव में इसे नहीं चाहती हूँ। यदि आपतू मुझ में से 'विषमता' की उपाधि को हटा दें तो मैं किसी भी चीज के लिए उन्मुक्त हो जाऊँगी, मैं कुछ भी करने में सक्षम हो जाऊँगी। क्या ये मात्र क्षुद्र चीजें नहीं हैं? क्या आपतू उस पदनाम को हटा सकते हैंता है?" "क्या यह बहुत आसान नहीं हैं? यदि मैं तुम्हें तुझे वह उपाधि दे सकता हूँ तो मैं इसे हटा भी सकता हूँ। लेकिन अभी समय नहीं आया है—तुम्हें तुझे कार्य के इस चरण का अपना अनुभव अवश्य पूरा करना चाहिए, और तभी तुम तू एक नयी उपाधि प्राप्त कर सकती हो। है। कोई व्यक्ति जितना तुम्हारे तेरे जैसा होता है, उतना ही अधिक उसे एक विषमता होने की आवश्यकता है। एक विषमता होने के बारे तुम तू जितना अधिक भयभीत होगेहोगी, उतना ही अधिक मैं तुम्हें तुझे इस रूप में लेबल करूँगा। तुम्हारे तेरे जैसे व्यक्ति को अवश्य सख्ती से अनुशासित किया चाहिए और निपटा जाना चाहिए। कोई व्यक्ति जितना अधिक विद्रोही होगा, उतना ही अधिक वह एक सेवा करने वाला होगा, और अंत में उसे कुछ प्राप्त नहीं होगा।" "इस प्रकार के प्रयास से, मैं 'विषमता' के उपनाम को क्यों नहीं हटा सकती हूँ? हमने इन सभी वर्षों में आपकातेरा अनुसरण किया है और बहुत अधिक दुःख सहा है। हमने ऐसा आपकेतेरे लिए किया है और हमने वैसा आपकेतेरे लिए किया है, हम हवा और बारिश में बाहर गए हैं। हम सब अपने 20 के दशक के अंत में हैं—हम अपनी युवावस्था के अंत में हैं। हमने विवाह नहीं किया है या परिवार आरंभ नहीं किया है, और हम में से जो ऐसा कर चुके हैं वे फिर भी बाहर आए हैं। मैं हाई स्कूल तक विद्यालय में थी; जैसे ही मैंने सुना कि आप आए हैंतू आया है, मैंने विश्वविद्यालय में जाने के अपने अवसर को त्याग दिया। और आप कहते हैंतू कहता है कि हम विषमता हैं—हमने ऐसे नुकसान सहे हैं! हम ये सब चीजें करते हैं लेकिन पता चलता है कि हम आपकीतेरी विषमता हैं। यह मेरे साथियों, मेरे सहयोगियों और मेरे हमउम्रों को मेरे बारे में कैसा विचार करवाता है? जब वे मुझे देखते हैं और मेरी स्थिति और मेरी हैसियत के बारे में पूछते हैं, तो मुझे उन्हें बताने में शर्मिंदगी कैसे नहीं हो सकती है? वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे? सबसे पहले, आपतुझ पर अपने विश्वास के कारण मैंने हर मूल्य चुकाया, और अन्य सभी लोगों ने मुझे बेवकूफ समझकर मेरा उपहास किया। लेकिन मैंने तब भी अनुसरण किया, और उस समय की लालसा की कि मेरा दिन आएगा, और उन सभी को दिखाएगा जिन्होंने विश्वास नहीं किया। लेकिन इसके बजाय, आज आप तू मुझे कहते हैंता है कि मैं एक विषमता हूँ। यदि आपनेतूने मुझे निम्नतम उपाधि दी, यदि आपनेतूने मुझे राज्य का एक व्यक्ति होने की अनुमति दी, तो यह ठीक होगा! भले ही मैं आपकीतेरी अनुयायी या आपकीतेरी विश्वासपात्र न हो सकी हूँ, किन्तु मैं मात्र आपकीतेरी अनुयायी बन कर भी ठीक रहूँगी! हमने इन सभी वर्षों में आपकातेरा अनुसरण किया है, अपने परिवारों को त्याग दिया है, और प्रयास जारी रखना अभी तक बहुत मुश्किल रहा है, लेकिन हमारे पास केवल 'विषमता' की उपाधि है! मैंने आपकेतेरे लिए हर चीज का परित्याग कर दिया है; मैंने सभी सांसारिक समृद्धियों का त्याग कर दिया है। पिछले साल से पहले किसी ने मुझे एक संभावित साथी से परिचित करवाया। वह वास्तव में सुंदर था और सुन्दर वस्त्र धारण किये किए हुए था; वह किसी उच्च स्तरीय कैडर का पुत्र था। उसके पास कोई अच्छा कार्य नहीं था, वह एक वाहनचालक था, लेकिन वह वास्तव में खूबसूरत था, और उस समय मैं उसके प्रति आकृष्ट हो गई थी। लेकिन जैसे ही मैंने सुना कि आपतू हमें राज्य में ले जाने जा रहे हैंहा है, कि आपतू हमें पूर्ण करेंगेबनाएगा, और कि आपनेतूने हमें दृढ़ संकल्प रखने और जल्दी ही सब कुछ पीछे छोड़ देने के लिए कहा है, जब मैंने यह सुना, मैंने देखा कि मेरे पास दृढ़ संकल्प बिल्कुल भी नहीं था! मैंने स्वयं को फ़ौलादी बना दिया और उसे अस्वीकार कर दिया। उसने मेरे परिवार को कई बार उपहार भेजे, लेकिन मैंने उनको देखा भी नहीं। उस समय, क्या आप कहेंगेतू कहेगा कि मैं परेशान थी? कुछ ऐसा कि अच्छाई व्यर्थ हो गई। मैं परेशान कैसे नहीं हो सकती थी? मैं इसके बारे में कई दिनों तक इतने स्तर तक परेशान थी कि रात में सो नहीं सकी, लेकिन अंत में मैंने तब भी उसे जाने दिया। हर बार जब भी मैंने प्रार्थना की तो मैं आपकीतेरी पवित्रात्मा से प्रेरित हुई, जिसने कहा: 'क्या आपतू मेरे लिए सब कुछ बलिदान करने को तैयार हैं? क्या आपतू मेरे लिए अपने आप को व्यय करने के लिए तैयार हैं?' जब कभी भी मैंने आपकेतेरे उन वचनों पर विचार किया, तो मैं रोया करती थी। मैं द्रवित हो गई थी और दुःख में बहुत ज्यादा रोयी। बाद में, वह कुछ बार मेरे घर में आया, लेकिन मैंने उसे एक बार भी नहीं देखा। अब मैं यह भी भूल गई हूँ कि वह कैसा दिखता है; मैं उसे पहचान नहीं पाऊँगी। एक साल बाद मैंने सुना कि उसने शादी कर ली है। कहने की आवश्यकता नहीं है, मैं अत्यंत दुःखी हो गई थी, लेकिन मैं तब भी आपकेतेरे वास्ते उसे जाने दिया। मैंने उस विवाह को छोड़ दिया—कहने उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं है कि मेरा भोजन और कपड़े अच्छे नहीं है—मैंने यह सब त्याग दिया है, इसलिए आपकोतुझे मुझसे विषमता के रूप में कार्य नहीं करवाना चाहिए! दूसरों ने कहा था कि उसके पिता एक कैडर हैं, और यदि हम शादी कर लेते तो वह मुझे नौकरी दिलवा देता। मैंने इस बात पर स्वयं को उत्पीड़ित किया और इसके साथ आधे महीने तक संघर्ष किया, लेकिन अंत में मैं इससे बाहर आ गई। मैंने अपने आप को आपकेतेरे लिए अर्पित करने के वास्ते अपने विवाह, अपने जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटना, का त्याग कर दिया! एक व्यक्ति का पूरा जीवन एक अच्छा साथी खोजने और एक सुखी परिवार पाने से अधिक कुछ नहीं है। मैंने सर्वोत्तम चीजों को जाने दिया, और अब मेरे हाथ खाली हैं और मैं बिल्कुल अकेली हूँ। आपतू मुझे कहाँ भेजना चाहेंगेचाहेगा? जब से मैंने आपकातेरा अनुसरण करना शुरू किया है तब से मैंने कष्ट उठाए हैं। मेरा जीवन अच्छा नहीं रहा है। मैंने अपने परिवार और अपनी जीविका और साथ ही देह के सभी आनन्द छोड़ दिए हैं, और हम सभी के द्वारा चुकाए गए समस्त मूल्य आपकेतेरे आशीषों का आनंद लेने के लिए अभी भी पर्याप्त नहीं है? तो अब यह 'विषमता' की चीज है। परमेश्वर, आपनेतूने वास्तव में सीमा लाँघ दी है! हमें देखेंदेखो—हमारे पास इस दुनिया में भरोसा करने के लिए कुछ भी नहीं है। हममें से कुछ ने अपने बच्चों को छोड़ दिया है, कुछ ने अपनी नौकरी, अपने जीवनसाथियों,[च] इत्यादि को छोड़ दिया है; हमने सभी दैहिक सुखों को छोड़ दिया है। हमें और किस चीज के लिए आशा करनी है? हम दुनिया में कैसे जीवित बचे रहना जारी रख सकते हैं? हमने जो कीमतें चुकाई हैं वे एक पैसे के मूल्य की भी नहीं हैं? क्या आपतू इसे बिल्कुल भी नहीं देख सकते हैंता है? हमारी हैसियत निम्न है और हममें क्षमताओं का अभाव है—हम इसे स्वीकार करते हैं, लेकिन जो आपतू हमसे करवाना चाहते थेता था हमने उस पर कब ध्यान नहीं दिया है? अब तुमतू, केवल विषमताएँ होने के 'पारिश्रमिक' के साथ, निर्दयतापूर्वक हमें छोड़ रहे हैंहा है? हमने जो कीमत चुकाई है, उससे हमने केवल[छ] 'विषमता' की उपाधि खरीदी है? अंत में, लोग मुझसे पूछेंगे कि मुझे परमेश्वर पर विश्वास करने से क्या प्राप्त हुआ है। क्या मैं उनके सामने 'विषमता' शब्द[ज] को रख सकती हूँ? यह कहने के लिए अपना मुँह कैसे खोल सकती हूँ कि मैं एक विषमता हूँ? मैं अपने माता-पिता को कोई कारण नहीं बता सकती हूँ, और मैं अपने पूर्व संभावित साथी को कोई कारण नहीं बता सकती हूँ। आप केतेरे कारण, मेरा अपने सहपाठियों से कोई लेना देना नहीं है। उन्होंने मुझे उपहार भेजे किन्तु मैंने उन सभी को वापस लौटा दिया। कुछ लोग हैं, क्योंकि उन्होंने मुझे कई चीजें भेजीं और मैंने उन्हें स्वीकार नहीं किया, वे मेरे संपर्क में रहने के अब और इच्छुक नहीं हैं। मैंने इन चीजों को छोड़ दिया है और अब सांसारिक व्यवहारों में हिस्सा नहीं लेती हूँ। मैंने इतनी बड़ी कीमत चुकाई है, और मुझे बदले में जो मिला है वह है एक विषमता होना! आह! मुझे बहुत भयानक लग रहा है!" (अपनी जाँघों को पीटते हुए रोना शुरू कर दिया।) "यदि मैंने कहा होता कि अब मैं अब तुम्हेंतुझे[झ] एक विषमता की उपाधि नहीं दूँगा, किन्तु तुम कोतुझे अपने लोगों में से एक बनाऊँगा और तुमसे तेरे से सुसमाचार का प्रसार करवाऊँगा, यदि मैंने तुम्हें तुझे कार्य करवाने के लिए हैसियत दी होती, तो क्या तुम तू ऐसा करने में सक्षम हो पाती? इस कार्य के कदम के बाद कदम से तुमने तूने वास्तव में क्या प्राप्त किया है? और यहाँ तक कि तुमने तूने अपनी कहानी भी बताई है - —तुम्हें तुझे कोई शर्म नहीं है! तुम तू कहती हो है कि तुमने तूने एक कीमत चुकाई है, लेकिन कुछ नहीं मिला है। क्या ऐसा हो सकता है कि मैंने तुम्हें तुझे यह नहीं बताया हो है कि किसी व्यक्ति को पाने के लिए मेरी शर्तें क्या हैं? मेरा कार्य किसके लिए है? क्या तुम तू जानती होहै? तुम तू पुराने घावों को खोल रही होहै! क्या तुम तू अब इंसान के रूप में भी गिनी जाती होहै? क्या कोई भी कष्ट तुम्हारी तेही स्वयं की इच्छा से नहीं था? और क्या तुमका तेरा कष्ट आशीषों को पाने के उद्देश्य से नहीं था? क्या तुमने तूने मेरी अपेक्षाओं को पूरा कर दिया है? वह सब जो तुम तू चाहती हो है वह है आशीषों को पाना। तुम्हें तुझे कोई शर्म नहीं है! तुमसे तुझसे मेरी अपेक्षाएँ कब अनिवार्य थी? यदि तुम तू मेरा अनुसरण करने की इच्छुक हो है तो तुम्हें तुझे हर चीज में मेरी आज्ञा का पालन अवश्य करना चाहिए। परिस्थितियों की बात न करेंमत कर। अंततः, मैंने तुम्हें तुझे पहले ही बताया था कि यह रास्ता कष्ट का रास्ता है। यह थोड़ी शुभता के साथ, विकट संभावनाओं से भरा हुआ है। क्या तुम तू भूल गयी होहै? मैंने ऐसा कई बार कहा है। यदि तुम तू कष्ट उठाने के लिए तैयार हो है तो ही मेरा अनुसरण करोकर, और यदि तुम तू कष्ट उठाने के लिए तैयार नहीं होहै, तो रुक जाओ। मैं तुम्हें तुझे बाध्य नहीं कर रहा हूँ—तुम तू आने या जाने के लिए स्वतंत्र होहै! हालाँकि, मेरा कार्य ऐसे ही किया जाता है, और मैं तुम्हारी तेरी व्यक्तिगत विद्रोहशीलता के कारण अपने समस्त कार्य में विलंब नहीं कर सकता हूँ। तुम तू आज्ञा पालन करने के लिए तैयार नहीं हो सकती हैंहै, लेकिन अन्य लोग हैं जो तैयार हैं। तुम सभी हताश लोग हो! तुम कोतुझे किसी चीज का डर नहीं है! तुम तू अपनी परिस्थितियों की मेरे साथ चर्चा कर रही होहै—क्या तुम तू जीवित रहना चाहती हो है या नहीं?! तुम तू अपने लिए योजना बनाती हो है और अपनी स्वयं की प्रसिद्धि और लाभ के लिए संघर्ष करती हो है। क्या मेरा कार्य तुम सभी लोगों के लिए नहीं है? क्या तुम तू अंधी होहै? मेरे शरीर धारण करने से पहले, तुम तू मुझे नहीं देख सकती थी, और ये वचन माफ करने योग्य होते, लेकिन अब मैं देहधारी हूँ और मैं तुम लोगों के बीच कार्य कर रहा हूँ, मगर तब भी तुम तू नहीं देख सकती होहै? तुम तू क्या नहीं समझती होहै? तुम तू कहती हो है कि तुमने तूने नुकसान सहा है; इसलिए मैं तुम हताश लोगों को बचाने के लिए देह बन गया हूँ और इतना सारा कार्य किया है, और तब भी तुम तू अब तक शिकायत कर रही होहै—क्या तुम कहोगीतू कहेगी कि मैंने कष्ट उठाए हैं? क्या मैंने जो कुछ भी किया है वह तुम लोगों के लिए नहीं किया गया है? लोगों के लिए मेरी यह उपाधि उनकी वर्तमान कद-काठी के आधार पर है। यदि मैं तुम्हें तुझे एक 'विषमता' कहता हूँ, तो तुम तू तुरंत एक विषमता हो। है। यदि मैं तुम्हें तुझे 'परमेश्वर के लोग' कहता हूँ, तो तुम तू तुरंत परमेश्वर के लोग हो। है। मैं तुम्हें तुझे जो भी बुलाता हूँ, तुम तू वह हो। है। क्या यह सब वैसा नहीं है जैसा कि मैं कहता हूँ? और मेरा यह एक वचन अपको तुझे इतना क्रोधित कर रहा है? ठीक है, तो मुझे क्षमा करेंकर! यदि तुम तू अब आज्ञापालन नहीं करती होहै, तो अंत में तुम्हें तुझे शाप दिया जाएगा—क्या तब तुम तू खुश होगी? तुम तू जीवन के तरीके पर ध्यान नहीं देती हैं है बल्कि केवल अपनी हैसियत और उपाधि पर ध्यान केंद्रित करती होहै; तुम्हारा तेरा जीवन किस प्रकार का है? मैं इनकार नहीं करता कि तुमने तूने एक बड़ी कीमत चुकाई है, लेकिन अपनी स्वयं की कद- काठी और अभ्यास पर एक नज़र डालेंडाल, और अभी भी तुम तू अपनी परिस्थितियों की चर्चा कर रही हो। है। क्या यही वह कद - काठी है जो तुमने तूने अपने संकल्प के बदले में प्राप्त की है? क्या तुम्हारे तेरे पास अभी भी कोई ईमानदारी है? क्या तुममें तुझ में कोई विवेक है? क्या यह मैं हूँ जिसने कुछ गलत कर दिया है? क्या तुमसे तुझ से मेरी अपेक्षाएँ त्रुटिवश थीं? यह क्या है? मैं तुमसे तुझ से कुछ दिनों के लिए एक विषमता के रूप में कार्य करवाता और तुम तू ऐसा करने के लिए तैयार नहीं हो। है। यह किस तरह का संकल्प है? तुम सभी कमजोरकमज़ोर-इच्छाशक्ति वाले हो, तुम तू डरपोक होहै! तुम तुझ जैसे लोगों को दंडित करना निस्संदेह अनिवार्य बात है!" एक बार जब मैंने ऐसा कह दिया, तो वह एक शब्द नहीं बोली।

अब इस प्रकार के कार्य का अनुभव करते हुए, तुम लोगों को कार्य के चरणों और लोगों को रूपांतरित करने के तरीकों पर तुम्हें कुछ बोध अवश्य हो जाना चाहिए। रूपांतरण में परिणामों को प्राप्त करने का यही एकमात्र तरीका है। तुम लोगों के प्रयास में, तुम लोगों की बहुत सी व्यक्तिगत अवधारणाएँ, आशाएँ और भविष्य होते हैं। वर्तमान कार्य तुम लोगों की हैसियत की अभिलाषा और तुम्हारी अनावश्यक अभिलाषाओं से निपटने के लिए है। आशाएँ, हैसियत की[ञ] अभिलाषा, और अवधारणाएँ सभी शैतानी स्वभाव के उत्कृष्ट निरूपण हैं। लोगों के हृदयों में ये चीजें विद्यमान हैं इसका कारण पूरी तरह से यह है कि शैतान का विष हमेशा लोगों के विचारों को दूषित कर रहा है, और लोग शैतान के इन प्रलोभनों से पीछा छुड़ाने में हमेशा असमर्थ हैं। वे पाप के बीच में रहते हैं, मगर इसे पाप होना नहीं मानते हैं, और वे अभी भी विश्वास करते हैं: "हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, इसलिए उसे अवश्य हमें आशीष प्रदान करने चाहिए और हमारे लिए सब कुछ उचित प्रकार से व्यवस्थित करना चाहिए। हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, इसलिए हमें दूसरों से श्रेष्ठतर अवश्य होना चाहिए, और हमारे पास किसी और की तुलना में अधिक हैसियत और अधिक भविष्य अवश्य होना चाहिए। चूँकि हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, इसलिए उसे हमें असीम आशीषें अवश्य देनी चाहिए। अन्यथा, इसे परमेश्वर पर विश्वास नहीं कहा जाएगा।" कई सालों से, जिन विचारों पर लोगों ने अपने अस्तित्व के लिए भरोसा रखा था, वे उनके हृदयों को इस स्थिति तक दूषित कर रहे हैं कि वे विश्वासघाती, डरपोक और नीच हो गए हैं। न केवल उनमें इच्छा शक्ति और संकल्प का अभाव है, बल्कि वे लालची, अभिमानी और स्वेच्छाचारी भी बन गए हैं। उनमें ऐसे किसी भी संकल्प का सर्वथा अभाव है जो स्वयं को ऊँचा उठाता हो, और इससे भी ज्यादा, उनमें इन अंधेरे प्रभावों की बाध्यताओं से पीछा छुड़ाने की लेश मात्र भी हिम्मत नहीं है। लोगों के विचार और जीवन सड़े हुए हैं, परमेश्वर पर विश्वास करने के बारे में उनके दृष्टिकोण अभी भी असहनीय रूप से कुरूप हैं, और यहाँ तक ​​कि जब लोग परमेश्वर में विश्वास के बारे में अपने दृष्टिकोण की बात करते हैं तो इसे सुनना मात्र ही असहनीय है। सभी लोग कायर, अक्षम, नीच, और दुर्बल हैं। वे अंधेरे की शक्तियों के लिए गुस्सा महसूस नहीं करते हैं, और वे प्रकाश और सत्य के लिए प्यार महसूस नहीं करते हैं; इसके बजाय, वे उन्हें बाहर निकालने का अधिकतम प्रयास करते हैं। क्या तुम लोगों के वर्तमान विचार और दृष्टिकोण इस तरह के नहीं हैं? "चूँकि मैं परमेश्वर पर विश्वास करता हूँ कि मुझ पर केवल आशीषों की वर्षा होनी चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि मेरी हैसियत कभी नहीं गिरती है और कि यह अविश्वासियों की तुलना में अधिक है।" तुम लोग केवल एक या दो वर्षों से ही इस तरह के दृष्टिकोण को अपने भीतर प्रश्रय नहीं दे रहे हो; यह वहाँ कई वर्षों से है। तुम लोगों की लेन-देन संबंधी मानसिकता अति विकसित है। यद्यपि आज तुम लोग इस चरण तक पहुँच गए हो, तब भी तुम लोगों ने हैसियत को जाने नहीं दिया है, बल्कि तुम लोग हमेशा इस बारे में पूछताछ करने और इस पर ध्यान देने के लिए संघर्ष करते रहते हो, एक गहरे डर के साथ कि एक दिन तुम लोगों की हैसियत खो जाएगी और तुम लोगों का नाम बर्बाद हो जाएगा। लोगों ने सहुलियत की अपनी अभिलाषा की कभी भी उपेक्षा नहीं की है। तुम लोगों को वर्तमान में इस तरह से दंडित किया जाता है, और अंत में तुम लोगों को कितने अंश की समझ होगी? तुम लोग कहोगे कि यद्यपि तुम लोगों की स्थिति उच्च नहीं है, फिर भी तुम लोगों ने परमेश्वर के उत्कर्ष का आनंद लिया है। तुम लोगों के पास हैसियत नहीं है क्योंकि तुम लोग अधम पैदा हुए थे, और हैसियत का होना परमेश्वर के उत्कर्ष के कारण है—यही है वह जो उसने तुम लोगों को प्रदान किया था। आज तुम लोग व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर का प्रशिक्षण, उसकी ताड़ना, और उसका न्याय प्राप्त करने में सक्षम हो । यह उसका उत्कर्ष अधिक है। तुम व्यक्तिगत रूप से उसके द्वारा शुद्धिकरण और जलाए जाने को प्राप्त करने में सक्षम हो। यह परमेश्वर का महान प्रेम है। युगों से एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसने उसका शुद्धिकरण और जलाया जाना प्राप्त किया है, और एक भी व्यक्ति उसके वचनों के द्वारा सिद्धपूर्ण किया जाना प्राप्त करने में सक्षम नहीं हो पाया है। परमेश्वर अब तुम लोगों के साथ आमने-सामने बात कर रहा है, तुम लोगों को शुद्ध कर रहा है, तुम लोगों के भीतर के विद्रोहीपन को प्रकट कर रहा है—यह वास्तव में उसका उत्कर्ष है। लोग क्या कर सकते हैं? चाहे वे दाऊद के पुत्र हों या मोआब के वंशज, कुल मिला कर, लोग रचना किए गए प्राणी है जिनके पास शेख़ी मारने के लिए कुछ नहीं है। चूँकि तुम लोग परमेश्वर के प्राणी हो, इसलिए तुम लोगों को प्राणी का कर्तव्य अवश्य करना चाहिए। तुमसे अन्य कोई अपेक्षाएँ नहीं हैं। और तुम प्रार्थना कर सकती और कह सकती हो: "हे परमेश्वर! चाहे मेरी हैसियत हो या नहीं, अब मैं स्वयं को समझती हूँ। यदि मेरी हैसियत ऊँची है तो यह आपकेतेरे उत्कर्ष के कारण है, और यदि यह निम्न है तो यह आपकेतेरे आदेश के कारण है। सब कुछ आपकेतेरे हाथों में है। मेरे पास कोई विकल्प या शिकायतें नहीं हैं। आपनेतूने निश्चित किया कि मैं इस देश में और इन लोगों के बीच पैदा हूँगी, और मुझे केवल आपकेतेरे प्रभुत्व के अधीन पूरी तरह से आज्ञाकारी होना चाहिए क्योंकि सब कुछ उसी के भीतर है जो आपनेतूने निश्चित किया है। मैं हैसियत पर ध्यान नहीं देती हूँ; आखिरकार, मैं सृजनों में से मात्र एक हूँ। यदि आपनेतूने मुझे अथाह गड्ढे, आग और गंधक की झील में डाल दिया, तो मैं एक प्राणी से अधिक कुछ नहीं हूँ। यदि आपतून मुझे उपयोग करते हैंता है, तो मैं एक प्राणी हूँ। यदि आपतू मुझे सिद्धपूर्ण करते हैंबनाता है, मैं तब भी एक प्राणी हूँ। यदि आपतू मुझे सिद्धपूर्ण नहीं करते हैंबनाता है, तो मैं तब भी आपसेतुझ से प्यार करती हूँ क्योंकि मैं सृजन से अधिक कुछ नहीं हूँ। मैं सृष्टि के परमेश्वर द्वारा रचित एक सूक्ष्म प्राणी से अधिक कुछ नहीं हूँ, निर्मित मनुष्यों के बीच सिर्फ एक। यह आप तू थे था जिसने मुझे बनाया है, और अब आपनेतूने एक बार फिर मुझे अपने हाथों में अपनी दया पर रखा है। मैं आपकातेरा उपकरण और आपकीतेरी विषमता होने के लिए तैयार हूँ क्योंकि सब कुछ वही है जो आपनेतूने निश्चित किया है। कोई इसे बदल नहीं सकता है। सभी चीजें और सभी घटनाएँ आपकेतेरे हाथ में हैं।" जब वह समय आएगा, तब तुम तू हैसियत पर ध्यान केंद्रित नहीं करोगीकरेगी, और तुम तू इससे छुटकारा पा लोगी। लेगी। केवल तभी तुम तू आत्मविश्वास से, निर्भीकता से प्रयास करने में सक्षम होगी, और तभी तुम्हारा तेरा हृदय किसी भी बाधा से मुक्त हो सकता है। एक बार लोगों को मुक्त कर दिया जाता है, जब वे उस से बाहर आ जाते हैं, तो उनके पास और कोई चिंताएँ नहीं होती हैं। अभी तुम लोगों में से अधिकांश की चिंताएँ क्या हैं? तुम लोग हमेशा हैसियत द्वारा विवश होते हो और हमेशा अपनी संभावनाओं की तलाश करते रहते हो। तुम लोग पुस्तकें लेते हो और मानव जाति के गंतव्य के बारे में क्या कहा गया है उसे देखे बिना पन्ने पलटते हो; तुम लोग थोड़ा अधिक उलटते-पुलटते हो किन्तु तब भी इसे नहीं पाते हो । तुम लोगों को लगता है:[ट] "ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई संभावना न हो? क्या ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर ने उन संभावनाओं को हटा दिया है? ऐसा नहीं हो सकता है! तो फिर कोई भी क्यों नहीं हैं? परमेश्वर केवल विषमता के बारे में बात करता है, इसलिए अन्य कुछ नहीं है?" अब तुम लोग अनुयायी हो, और तुम लोगों को कार्य के इस स्तर की कुछ समझ है। हालाँकि, तुम लोगों ने अभी तक हैसियत के लिए अपनी अभिलाषा की उपेक्षा नहीं की है। जब तुम लोगों की हैसियत उच्च होती है तो तुम लोग अच्छी तरह से प्रयास करते हो, किन्तु जब तुम्हारी हैसियत निम्न होती है तो तुम लोग अब और प्रयास नहीं करते हो। हैसियत के आशीष हमेशा तुम्हारे मन में होते हैं। ऐसा क्यों है कि अधिकांश लोग नकारात्मकता से बाहर नहीं आ सकते हैं? क्या यह हमेशा निराशाजनक संभावनाओं के कारण नहीं है? जैसे ही परमेश्वर के कथनों को जारी किया जाता है, तुम लोग यह देखने के लिए हड़बड़ी करते हो कि तुम्हारी हैसियत और पहचान वास्तव में क्या हैं। तुम लोग हैसियत और पहचान को प्राथमिक स्थान देते हो, और परिकल्पना दूसरे स्थान पर आती है। तीसरे स्थान पर वह है जिसमें तुम लोगों को प्रवेश करना चाहिए, और चौथे स्थान पर परमेश्वर की वर्तमान इच्छा है। तुम लोग सबसे पहले देखते हो कि क्या तुम लोगों की "विषमताओं" के रूप में परमेश्वर द्वारा दी गई उपाधि बदल गई है या नहीं। तुम लोग बार-बार पढ़ते हो, और जब तुम लोग देखते हो कि "विषमता" की उपाधि हटा दी गई है, तो तुम लोग खुश हो जाते हो और लगातार परमेश्वर का धन्यवाद करते हो, तुम लोग उसकी महान सामर्थ्य की स्तुति करते हो। लेकिन जैसे ही तुम लोगों को झलक दिखाई देती है कि तुम लोग अभी भी विषमता हो, तो तुम लोग परेशान हो जाते हो और तुरंत तुम लोगों के हृदय में कोई प्रेरणा नहीं होती है। जितना अधिक तुम तू इस तरह से तलाश करेंगे करेगी उतना ही कम तुम पाओगेतू पाएगी। हैसियत के लिए किसी व्यक्ति की अभिलाषा जितनी अधिक होगी, उतनी ही गंभीरता से उसके साथ निपटा जाना होगा उतने ही अधिक बड़े शुद्धिकरण से उसे अवश्य गुजरना होगा। इस तरह का व्यक्ति अत्यधिक व्यर्थ है! उसके द्वारा इसे पूरे तरह से छोड़ दिए जाने के उद्देश से उसके साथ पर्याप्त रूप से निपटा और उसका ठीक से न्याय अवश्य किया जाना चाहिए। यदि तुम लोग अंत तक इस तरह अनुकरण करते रहते हो, तो तुम लोग कुछ भी नहीं पाओगे। जो लोग जीवन का अनुकरण नहीं करते हैं वे रूपान्तरित नहीं हो सकते हैं; जिन्हें सच्चाई की प्यास नहीं है वे सच्चाई को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। तुम तू व्यक्तिगत रूपान्तरण का अनुकरण करने और प्रवेश करने पर ध्यान केन्द्रित नहीं करते होती है; तुम तू हमेशा उन अनावश्यक अभिलाषाओं और उन चीजों पर ध्यान केंद्रित करते होती है जो परमेश्वर के लिए तुम्हारे प्रेम को बाधित करती हैं और तुम्हें तुझे उसके करीब आने से रोकती हैं। क्या वे चीजें तुम्हें तुझे रूपान्तरित कर सकती हैं? क्या वे तुम्हें तुझे राज्य में ला सकती हैं? यदि तुम्हारी तेरी खोज का उद्देश्य सच्चाई की तलाश करना नहीं है, तब भी तुम तू इस अवसर का लाभ उठा सकते होती है और इसकी सफलता का प्रयास करने के लिए दुनिया में लौट सकते हैंती है। तुतुम्हारातेरा समय वास्तव में इस तरह से बर्बाद करने योग्य नहीं है—क्यों अपने आप को यातना देंदो? क्या तुम तू सुंदर दुनिया में सभी प्रकार की चीजों का आनंद नहीं उठा सकते होती है? धन, खूबसूरत महिलाएँ, हैसियत, घमंड, परिवार, बच्चे, इत्यादि—क्या दुनिया के ये सभी उत्पाद वे सर्वोत्तम चीजें नहीं हैं जिनका तुम तू आनंद ले सकते होती है? एक ऐसे स्थान की खोज में जहाँ तुम तू खुश रह सकते सकती हो है यहाँ इधर-उधर भटकने का क्या उपयोग है? मनुष्य के पुत्र को अपना सिर रखने के लिए कहीं जगह नहीं है, तो तुम्हें तुझे आराम की जगह कैसे मिल सकती है? वह तुम्हारे तेरे लिए आराम की सुन्दर जगह कैसे बना सकता है? क्या यह संभव है? मेरे न्याय के अतिरिक्त, आज तुम तू केवल सत्य पर शिक्षाएँ प्राप्त कर सकते होती है। तुम तू मुझ से आराम प्राप्त नहीं कर सकते होती है और न ही तुम तू उस सुखद आशियाने को प्राप्त कर सकते होती है जिसके बारे में तुम तू दिन-रात सोचते रहते होती रहती है। मैं तुम्हें तुझे दुनिया की दौलत प्रदान नहीं करूँगा। यदि तुम तू निष्कपटता से अनुसरण करते होती है, तो मैं तुम्हें तुझे संपूर्णता में जीवन का मार्ग देने, तुम्हें तुझे पानी में वापिस आयी एक मछली की तरह स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ। यदि तुम तू निष्कटता से अनुसरण नहीं करती है, तो मैं यह सब वापस ले लूँगा। मैं अपने मुँह के वचनों को उन लोगों को देने को तैयार नहीं हूँ जो आराम के लालची हैं और मात्र सूअरों और कुत्तों जैसे हैं!

फुटनोट:

क. मूल पाठ "मैं तैयार हूँ" को छोड़ देता है।

ख. मूल पाठ "वचनों" को छोड़ देता है।

ग. मूल पाठ "उन्होंने सोचा" को छोड़ देता है।

घ. मूल पाठ "की उपाधि" को छोड़ देता है।

ङ. मूल पाठ "और उन्होंने कहा" को छोड़ देता है।

च. मूल पाठ में "पत्नियाँ" पढ़ा जाता है।

छ. मूल पाठ "की उपाधि" को छोड़ देता है।

ज. मूल पाठ "वचन" को छोड़ देता है।

झ. मूल पाठ "की उपाधि" को छोड़ देता है।

ञ. मूल पाठ "की इच्छा" को छोड़ देता है।

ट. मूल पाठ "तुम सोचते हो" को छोड़ देता है।